शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* रुद्रसंहिता * ४११
प्राप्त कर और सदा वीरोंके साथ युद्ध करता रह। मुनीश! हिरण्याक्षपुत्र अन्धकके शरीरमें नसें और हड्डियाँ ही शेष रह गयी थीं। वह ब्रह्माके ऐसे वचनको सुनकर शीघ्र ही भक्तिपूर्वक उन लोकेश्वरके चरणोंमें लोट गया और इस प्रकार बोला।
अन्धकने कहा—विभो! जब मेरे शरीरमें नसें और हड्डियाँमात्र ही शेष रह गयी हैं, तब भला इस देहसे शत्रुसेनामें प्रवेश करके मैं कैसे युद्ध कर सकूँगा; अतः अब आप अपने पवित्र हाथसे मेरा स्पर्श करके इस शरीरको मांसल बना दीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! अन्धककी प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजीने अपने हाथसे उसके शरीरका स्पर्श किया और फिर वे मुनिगणों तथा सिद्धसमूहोंसे भलीभाँति पूजित हो देवताओंके साथ अपने धामको चले गये। ब्रह्माके स्पर्श करते ही उस दैत्यराजका शरीर भरा-पूरा हो गया, जिससे उसमें बलका संचार हो आया तथा नेत्रोंके प्राप्त हो जानेसे वह सुन्दर दीखने लगा। तब उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरमें प्रवेश किया। उस समय प्रह्लाद आदि श्रेष्ठ दानवोंने जब उसे वरदान प्राप्त करके आया हुआ जाना, तब वे सारा राज्य उसे समर्पित करके उसके वशवर्ती भृत्य हो गये। तदनन्तर अन्धक सेना और भृत्य-वर्गको साथ ले स्वर्गको जीतनेके लिये गया। वहाँ संग्राममें समस्त देवताओंको पराजित करके उसने वज्रधारी इन्द्रको अपना करद बना लिया। उसने यत्र-तत्र बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़कर नागों, सुपर्णों, श्रेष्ठ राक्षसों, गन्धर्वों, यक्षों, मनुष्यों, बड़े-बड़े पर्वतों, वृक्षों और सिंह आदि समस्त चौपायोंको भी जीत लिया। यहाँतक कि उसने चराचर त्रिलोकीको अपने वशमें कर लिया। तदनन्तर वह रसातलमें, भूतलपर तथा स्वर्गमें जितनी सुन्दर रूपवाली नारियाँ थीं, उनमेंसे हजारोंको, जो अत्यन्त दर्शनीय तथा अपने अनुकूल थीं, साथ लेकर विभिन्न पर्वतोंपर तथा नदियोंके रमणीय तटोंपर विहार करने लगा। दैत्यराज अन्धक सदा दुष्टोंका ही संग करता था। उसकी बुद्धि मदसे अन्धी हो गयी थी, जिससे उस मूढ़को इसका कुछ भी ज्ञान नहीं रह गया कि परलोकमें आत्माको सुख देनेवाला भी कोई कर्म करना चाहिये। इस प्रकार वह महामनस्वी दैत्य उन्मत्त हो और अपने सारे प्रधान-प्रधान पुत्रोंको कुतर्कवादसे पराजित करके दैत्योंसहित सम्पूर्ण वैदिक धर्मोंका विनाश करता हुआ विचरण करने लगा। वह धनके मदसे अभिभूत हो वेद, देवता, ब्राह्मण और गुरु आदि किसीको भी नहीं मानता था। प्रारब्धवश उसकी आयु समाप्त हो चुकी थी, इसीसे वह स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो व्यर्थमें ही अपनी आयुके शेष दिन गँवाता हुआ रमण कर रहा था। उस दानवश्रेष्ठके तीन मन्त्री थे, जिनका नाम था—दुर्योधन, वैधस और हस्ती। एक समय उन तीनोंने उस पर्वतके किसी रमणीय
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स्थानपर एक परम रूपवती नारीको देखा। उसे देखकर वे शीघ्रगामी श्रेष्ठ दैत्य हर्षमग्न हो तुरंत ही महादैत्यपति वीरवर अन्धकके पास पहुँचे और बड़े प्रेमसे उस देखी हुई घटनाका वर्णन करने लगे।
मन्त्रियोंने कहा—दैत्येन्द्र! यहाँ एक गुफाके भीतर हमने एक मुनिको देखा है। ध्यानस्थ होनेके कारण उसके नेत्र बंद हैं। वह बड़ा रूपवान् है। उसके मस्तकपर अर्धचन्द्रकी कला अपनी छटा बिखेर रही है और कमरमें गजेन्द्रकी खाल बँधी हुई है। बड़े-बड़े नाग उसके सारे शरीरमें लिपटे हुए हैं। खोपड़ियोंकी माला ही उस जटाधारीका आभूषण है। उसके हाथमें त्रिशूल है तथा एक विशाल धनुष, बाण और तूणीर भी वह धारण किये हुए है। उसका अक्षसूत्र स्पष्ट दीख रहा है। उसके चार भुजाएँ तथा लंबी-लंबी जटाएँ हैं। वह खड्ग, त्रिशूल और लकुट धारण किये हुए है। उसकी आकृति अत्यन्त गौर है और उसपर भस्मका अनुलेप लगा हुआ है। वह अपने उत्कृष्ट तेजसे सुशोभित हो रहा है। इस प्रकार उस श्रेष्ठ तपस्वीका सारा वेष ही अद्भुत है। उससे थोड़ी ही दूरपर हमने एक और पुरुषको देखा है, जो विकराल वानर-सा है। उसका मुख बड़ा भयंकर है। वह सभी आयुध धारण किये हुए है, परंतु उसका हाथ रूक्ष है। वह उस तपस्वीकी रक्षामें तत्पर है। उसके पास ही एक बूढ़ा सफेद रंगका बैल भी बैठा है। उस बैठे हुए तपस्वीके पार्श्वभागमें हमने एक शुभलक्षणसम्पन्ना नारीको भी देखा है। वह भूतलपर रत्नस्वरूपा है। उसका रूप बड़ा मनोरम है और तरुणी होनेके नाते वह मनको मोहे लेती है। मूँगे, मोती, मणि, सुवर्ण, रत्न और उत्तम वस्त्रोंसे वह सुसज्जित है। उसके गलेमें सुन्दर मालाएँ लटक रही हैं। (कहाँतक कहें, वह इतनी सुन्दरी है कि) जिसने उसे एक बार देख लिया, उसीका नेत्र धारण करना सफल है। उसे फिर इस लोकमें अन्य वस्तुओंके देखनेसे क्या प्रयोजन। वह दिव्य नारी पुण्यात्मा मुनिवर महेशकी मान्या एवं प्रियतमा भार्या है। दैत्येन्द्र! आप तो उत्तमोत्तम रत्नोंका उपभोग करने-वाले हैं। अतः उसे यहाँ बुलवाकर देखिये। वह आपके भी देखनेयोग्य है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! मन्त्रियोंके उन वचनोंको सुनकर दैत्यराज अन्धक कामातुर हो उठा। उसके सारे शरीरमें कम्प छा गया। फिर तो उसने तुरंत ही दुर्योधन आदिको उस मुनिके पास भेजा। मन्त्रियोंने वहाँ जाकर मुनीश्वरको प्रणाम करके उनसे अन्धकासुरका संदेश कहा तथा बदलेमें शिवजीका उत्तर सुनकर वे लौटकर अन्धकसे बोले।
मन्त्रियोंने कहा—राजन्! आप तो सम्पूर्ण दैत्योंके स्वामी हैं, फिर भी उस महान् पराक्रमी वीरवर तपस्वी मुनिने अपनी बुद्धिसे त्रिलोकीको तृणके समान समझकर हँसते हुए आपके लिये ऐसी बातें कही हैं—'उस निशाचरका शौर्य और धैर्य अस्थिर हैं। वह दानव कृपण, सत्त्वहीन,
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क्रूर, कृतघ्न और सदा ही पापकर्म करनेवाला है। क्या उसे सूर्यपुत्र यमका भय नहीं है? कहाँ तो मैं, मेरे दारुण शस्त्र और मृत्युको भी संत्रस्त कर देनेवाला युद्ध और कहाँ वह वानरका-सा मुखवाला डरपोक निशाचर, जिसके सारे अंग बुढ़ापेसे जर्जर हो गये हैं! कहाँ मेरा यह स्वरूप और कहाँ तेरी मन्दभाग्यता! तेरी सेना भी तो नहींके बराबर ही है। फिर भी यदि तुझमें कुछ सामर्थ्य हो तो युद्धके लिये तैयार हो जा और आकर कुछ अपनी करतूत दिखा। मेरे पास तुझ-जैसे पापियोंका विनाश करनेवाला वज्र-सरीखा भयंकर शस्त्र है और तेरा शरीर तो कमलके समान कोमल है। ऐसी दशामें विचार करके तुझे जो रुचिकर प्रतीत हो, वह कर।'
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! मन्त्रियोंकी बात सुनकर (माता) पार्वतीपर मोहित हुआ वह कामान्ध राक्षस विशाल सेना लेकर चल दिया और वहाँ पहुँचकर नन्दीश्वरसे युद्ध करने लगा। बड़ा भयानक युद्ध हुआ। उस समय युद्धस्थलमें चर्बी, मज्जा, मांस और रक्तकी कीच मच गयी। वहाँ सिर कटे हुए धड़ नाच रहे थे और कच्चा मांस खानेवाले जानवर चारों ओर व्याप्त हो गये थे, जिससे वह बड़ा भयंकर लग रहा था। थोड़ी ही देरमें दैत्य भाग खड़े हुए। तब पिनाकधारी भगवान् शंकर दक्ष-कन्या सतीको भलीभाँति धीरज बँधाते हुए बोले- 'प्रिये! मैंने जो पहले अत्यन्त भयंकर महान् पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान किया था, उसमें रात-दिन तुम्हारे प्रसंगवश जो हमारी सेनाका विनाश हुआ है, यह विघ्न-सा आ पड़ा है। देवि! मरणधर्मा प्राणियोंका जो अमरोंपर आक्रमण हुआ है, यह मानो पुण्यका विनाश करनेवाला कोई ग्रह प्रकट हो गया है। अतः अब मैं पुनः किसी निर्जन वनमें जाकर उस परम अद्भुत दिव्य व्रतकी दीक्षा लूँगा और उस कठिन व्रतका अनुष्ठान करूँगा। सुन्दरि! तुम्हारा शोक और भय दूर हो जाना चाहिये।'
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! इतना कहकर उग्र प्रभावशाली महात्मा शंकर धीरेसे अपना सिंगा बजाकर एक अत्यन्त भयंकर पावन वनमें चले गये। वहाँ वे एक हजार वर्षोंके लिये पाशुपतव्रतके अनुष्ठानमें तत्पर हो गये। इस व्रतका निभाना देवों और असुरोंकी शक्तिके बाहर है। इधर शीलगुणसे सम्पन्न पतिव्रता देवी पार्वती मन्दराचलपर ही रहकर शिवजीके आगमनकी प्रतीक्षा करती रहती थीं। यद्यपि पुत्रस्थानीय वीरकगण उनकी सुरक्षामें तत्पर थे, तथापि उस गुहाके भीतर अकेली रहनेके कारण वे सदा भयभीत रहती थीं, जिससे उन्हें बड़ा दुःख होता था। इसी बीच वरदानके प्रभावसे उन्मत्त हुआ वह दैत्य अन्धक, जिसका धैर्य कामदेवके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो गया था, अपने मुख्य-मुख्य योद्धाओंको साथ ले पुनः उस गुफापर चढ़ आया। वहाँ सैनिकोंसहित उसने वीरकगणके साथ अत्यन्त अद्भुत युद्ध किया। उस समय सभी वीरोंने अन्न, जल और नींदका परित्याग कर दिया था। इस प्रकार वह युद्ध लगातार पाँच सौ पाँच
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दिन-राततक चलता रहा। अन्तमें दैत्योंकी भुजाओंसे छूटे हुए आयुधोंके प्रहारसे नन्दीश्वरका शरीर घायल हो गया, जिससे वे गुहाद्वारपर ही गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। उनके गिरनेसे गुहाका सारा दरवाजा ही ढक गया, जिससे उसका खोला जाना असम्भव था। फिर दैत्योंने दो ही घड़ीमें सारे वीरकगणको अपने अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित कर दिया। तब पार्वतीने भगवान् विष्णु और ब्रह्माजीका स्मरण किया। स्मरण करते ही ब्राह्मी, नारायणी, ऐन्द्री, वैश्वानरी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणी, वायवी, कौबेरी, यक्षेश्वरी, गारुड़ी आदि देवियोंके रूपमें समस्त देवता, यक्ष, सिद्ध, गुह्यक आदि शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर अपने-अपने वाहनोंपर सवार हो पार्वतीके पास आ पहुँचे और राक्षसोंके साथ भिड़ गये। कुछ समय बाद भगवान् शिव भी आ गये। फिर तो घोर युद्ध हुआ। तदनन्तर शुक्राचार्यको संजीवनी विद्याके द्वारा दैत्योंको जीवित करते देखकर भूतनाथ शिवजी उनको निगल गये। इससे दैत्य ढीले पड़ गये।
व्यासजी! अन्धक महान् पराक्रमी, वीर और त्रिपुरहन्ता शिवके समान बुद्धिमान् था। सैकड़ों वरदान मिलनेके कारण वह उन्मादके वशीभूत हो रहा था। यद्यपि बहुसंख्यक शस्त्रास्त्रोंकी चोटसे उसका शरीर जर्जर हो गया था, फिर भी शिवजीपर विजय पानेके लिये उसने दूसरी माया रची। जब प्रलयकालीन अग्निके समान शरीर धारण करनेवाले भूतनाथ त्रिपुरारि शंकरने अपने त्रिशूलसे उसे बुरी तरह छेद डाला, तब भूतलपर गिरे हुए उसके रक्तकणोंसे यूथ-के-यूथ अन्धक प्रकट हो गये। उनसे सारी रणभूमि व्याप्त हो गयी। वे विकृत मुखवाले भयंकर राक्षस अन्धकके सदृश ही पराक्रमी थे। इस प्रकार जब पशुपतिद्वारा मारे गये सैनिकोंके घावोंसे निकले हुए अत्यन्त गरम-गरम रक्तबिन्दुओंसे दूसरे सैनिक उत्पन्न होने लगे, तब बहुत-सी भुजारूपी लताओंद्वारा आक्रान्त होनेके कारण कुपित हुए बुद्धिमान् भगवान् विष्णुने प्रमथनाथ शिवको बुलाकर योगबलसे एक ऐसा अजेय स्त्रीरूप धारण किया, जिसका मुख विकृत था और रूप उग्र, विकराल और कंकालमात्र था। वह स्त्रीरूप शम्भुके कानसे निकला था। जब उन देवीने रणभूमिमें उपस्थित हो अपने युगल चरणोंसे पृथ्वीको अलंकृत किया, तब सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे। तत्पश्चात् भगवान्ने उनकी बुद्धिको प्रेरित किया। फिर तो वे क्षुधार्त होकर रणके मुहानेपर उन सैनिकोंके तथा दैत्यराजके शरीरसे निकले हुए अत्यन्त गरम-गरम रुधिरका पान करने लगीं। (जिससे राक्षसोंका उत्पन्न होना बंद हो गया।) तदनन्तर एकमात्र अन्धक ही बच रहा। यद्यपि उसके शरीरका रक्त सूख गया था, तथापि वह अपने कुलोचित सनातन क्षात्रधर्मका स्मरण करके अविनाशी भगवान् शंकरके साथ भयंकर थप्पड़ोंसे, वज्र-सदृश जानुओं और चरणोंसे, वज्राकार नखोंसे, मुख, भुजा और सिरोंसे संग्राम करता रहा। तब प्रमथनाथ शिवने रणभूमिमें उसका हृदय विदीर्ण करके उसे शान्त कर दिया। फिर त्रिशूल भोंककर उसे स्थाणुके समान ऊपरको उठा लिया। उसका जर्जर शरीर नीचेको लटक रहा था। सूर्यकी किरणोंने उसे सुखा दिया। पवनके झोंकोंसे युक्त
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मेघोंने मूसलाधार जल बरसाकर उसे गीला कर दिया। हिमखण्डके समान शीतल चन्द्रमाकी किरणोंने उसे विशीर्ण कर दिया। फिर भी उस दैत्यराजने अपने प्राणोंका परित्याग नहीं किया। उसने विशेषरूपसे शिवजीका स्तवन किया। तब करुणाके अगाध सागर शम्भु प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसे प्रेमपूर्वक गणाध्यक्षका पद प्रदान कर दिया। तत्पश्चात् युद्धके समाप्त हो जानेपर लोकपालोंने नाना प्रकारके सारगर्भित स्तोत्रोंद्वारा विधि-पूर्वक शिवजीकी अर्चना की और हर्षित हुए ब्रह्मा, विष्णु आदि देवोंने गर्दन झुकाकर उत्तमोत्तम स्तुतियोंद्वारा उनका स्तवन किया। फिर जय-जयकार करते हुए वे आनन्द मनाने लगे। तदनन्तर शिवजी उन सबको साथ लेकर आनन्दपूर्वक गिरिराजकी गुफाको लौट आये। वहाँ उन्होंने अपने ही अंशभूत पूजनीय देवताओंको नाना प्रकारकी भेंट समर्पित करके उन्हें विदा किया और स्वयं प्रमुदित हुई गिरिराजकुमारीके साथ उत्तमोत्तम लीलाएँ करने लगे।
(अध्याय ४४—४६)
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नन्दीश्वरद्वारा शुक्राचार्यका अपहरण और शिवद्वारा उनका निगला जाना, सौ वर्षके बाद शुक्रका शिवलिंगके रास्ते बाहर निकलना, शिवद्वारा उनका 'शुक्र' नाम रखा जाना, शुक्रद्वारा जपे गये मृत्युंजय-मन्त्र और शिवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रका वर्णन, शिवद्वारा अन्धकको वर-प्रदान
व्यासजीने पूछा—महाबुद्धिमान् सनत्कुमारजी! जब वह महान् भयंकर एवं रोमांचकारी संग्राम चल रहा था, उस समय त्रिपुरारि शंकरने दैत्यगुरु विद्वान् शुक्राचार्यको निगल लिया था—यह घटना मैंने संक्षेपमें ही सुनी थी। अब आप उसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। पिनाकधारी शिवके उदरमें जाकर उन महायोगी शुक्राचार्यने क्या किया था? शाम्भुकी जठराग्निने उन्हें जलाया क्यों नहीं? भृगुनन्दन बुद्धिमान् शुक्र भी तो कल्पान्तकालीन अग्निके समान उग्र तेजस्वी थे। वे शम्भुके जठर-पंजरसे कैसे निकले? उन्होंने कैसे और कितने कालतक आराधना की थी? तात! उन्हें जो मृत्युका शमन करनेवाली पराविद्या प्राप्त हुई थी, वह विद्या कौन-सी है, जिससे मृत्युका निवारण हो जाता है? मुने! लीलाविहारी देवाधिदेव भगवान् शंकरके त्रिशूलसे छूटे हुए अन्धकको गणाध्यक्षताकी प्राप्ति कैसे हुई? तात! मुझे शिवलीलामृत श्रवण करनेकी विशेष लालसा है, अतः आप मुझपर कृपा करके वह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—अमिततेजस्वी व्यासजीके इन वचनोंको सुनकर सनत्कुमार शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके कहने लगे।
सनत्कुमारजीने कहा—मुनिवर! भगवान् शंकरके प्रमथोंकी जब अत्यन्त विजय होने लगी, तब अन्धक घबराकर शुक्राचार्यजीकी शरणमें गया और उसने
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गिड़गिड़ाकर मृतसंजीवनी विद्याके द्वारा मरे हुए असुरोंको जीवित करनेकी प्रार्थना की। इसपर शुक्राचार्यने शरणागतधर्मकी रक्षा करना उचित समझा। फिर तो वे युद्धस्थलमें गये और आदरपूर्वक विद्याके स्वामी शंकरका स्मरण करके एक-एक दैत्यपर मृतसंजीवनी विद्याका प्रयोग करने लगे। उस विद्याका प्रयोग होते ही वे सभी दैत्य-दानव वीर एक साथ ही हथियार लिये हुए इस प्रकार उठ खड़े हुए मानो अभी सोकर उठे हों। जैसे पूर्णतया अभ्यस्त किया हुआ वेद, समरभूमिमें बादल और श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दिया हुआ धन आपत्तिके समय तुरंत प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार वे उठ खड़े हुए। शुक्राचार्यके संजीवनी-प्रयोगसे जब बड़े-बड़े दानव जीवित होकर प्रमथोंको बुरी तरह मारने लगे, तब प्रमथोंने जाकर प्रमथेश्वरेश शिवको यह समाचार सुनाया। तब शिवजीने कहा—'नन्दिन्! तुम अभी तुरंत ही जाओ और दैत्योंके बीचसे द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यको उसी प्रकार उठा लाओ जैसे बाज लवाको उठा ले जाता है।'
सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! वृषभध्वजके यों कहनेपर नन्दी साँड़के समान बड़े जोरसे गरजे और तुरंत ही सेनाको लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ भृगुवंशके दीपक शुक्राचार्य विराजमान थे। वहाँ समस्त दैत्य हाथोंमें पाश, खड्ग, वृक्ष, पत्थर और पर्वतखण्ड लिये हुए उनकी रक्षा कर रहे थे। यह देखकर बलशाली नन्दीने उन दैत्योंको विक्षुब्ध करके शुक्राचार्यका उसी प्रकार अपहरण कर लिया, जैसे शरभ हाथीको उठा ले जाता है। महाबली नन्दीद्वारा पकड़े जानेपर शुक्राचार्यके वस्त्र खिसक गये। उनके आभूषण गिरने लगे और केश खुल गये। तब देवशत्रु दानव उन्हें छुड़ानेके लिये सिंहनाद करते हुए नन्दीके पीछे दौड़े और जैसे मेघ जलकी वर्षा करते हैं, उसी तरह नन्दीश्वरके ऊपर वज्र, त्रिशूल, तलवार, फरसा, बरेंठी और गोफन आदि अस्त्रोंकी उग्र वृष्टि करने लगे। तब उस देवासुर-संग्रामके विकराल रूप धारण करनेपर गणाधिराज नन्दीने अपने मुखकी आगसे सैकड़ों शस्त्रोंको भस्म कर दिया और उन भृगुनन्दनको दबोचकर शत्रुदलको व्यथित करते हुए वे शिवजीके समीप आ पहुँचे तथा शीघ्र ही उन्हें निवेदित करते हुए बोले—'भगवन्! ये शुक्राचार्य उपस्थित हैं।' तब भूतनाथ देवाधिदेव शंकरने पवित्र पुरुषद्वारा प्रदान किये हुए उपहारकी भाँति शुक्राचार्यको पकड़ लिया और बिना कुछ कहे उन्हें फलकी तरह मुखमें डाल लिया। उस समय समस्त असुर उच्चस्वरसे हाहाकार करने लगे।
व्यासजी! जब गिरिजेश्वरने शुक्राचार्यको निगल लिया, तब दैत्योंकी विजयकी आशा जाती रही। उस समय उनकी दशा सूँडरहित गजराज, सींगहीन साँड़, मस्तकविहीन देह, अध्ययनरहित ब्राह्मण, उद्यमहीन प्राणी, भाग्यहीनके उद्यम, पतिरहित स्त्री, फलवर्जित बाण, पुण्यहीनोंकी आयु, व्रतरहित वेदाध्ययन, एकमात्र वैभवशक्तिके बिना निष्फल हुए कर्मसमूह, शूरताहीन क्षत्रिय और सत्यके बिना धर्मसमुदायकी भाँति शोचनीय हो गयी। दैत्योंका सारा उत्साह जाता रहा। तब अन्धकने महान् दुःख प्रकट करते हुए अपने शूरवीरोंको बहुत उत्साहित किया और
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कहा—'वीरो! जो रणांगण छोड़कर भाग जाते हैं, उनकी ख्याति अपयशरूपी कालिमासे मलिन हो जाती है और उन्हें इस लोकमें तथा परलोकमें—कहीं भी सुख नहीं मिलता। यदि पुनर्जन्मरूपी मलका अपहरण करनेवाले धरातीर्थ—रणतीर्थमें अवगाहन कर लिया जाय तो अन्य तीर्थोंमें स्नान, दान और तपकी क्या आवश्यकता है अर्थात् इनका फल रणभूमिमें प्राणत्याग करनेसे ही प्राप्त हो जाता है।' दैत्यराजके इस वचनको पूर्णरूपसे धारण करके वे दैत्य तथा दानव रणभेरी बजाकर रणभूमिमें प्रमथगणोंपर टूट पड़े और उन्हें मथने लगे तथा बाण, खड्ग, वज्र-सरीखे कठोर पत्थर, भुशुण्डी, भिन्दिपाल, शक्ति, भाले, फरसे, खट्वांग, पट्टिश, त्रिशूल, लकुट और मुसलोंद्वारा परस्पर प्रहार करते हुए भयंकर मार-काट मचाने लगे। इस प्रकार अत्यन्त घमासान युद्ध हुआ। इसी बीच विनायक, स्कन्द, नन्दी, सोमनन्दी, वीर नैगमेय और महाबली वैशाख आदि उग्र गणोंने त्रिशूल, शक्ति और बाणसमूहोंकी धारावाहिक वर्षा करके अन्धकको अन्धा बना दिया। फिर तो प्रमथों तथा असुरोंकी सेनाओंमें महान् कोलाहल मच गया। उस घोर शब्दको सुनकर शम्भुके उदरमें स्थित शुक्राचार्य आश्रयरहित वायुकी भाँति निकलनेका मार्ग ढूँढ़ते हुए चक्कर काटने लगे। उस समय उन्हें रुद्रके उदरमें पातालसहित सातों लोक, ब्रह्मा, नारायण, इन्द्र, आदित्य और अप्सराओंके विचित्र भुवन तथा वह प्रमथासुर-संग्राम भी दीख पड़ा। इस प्रकार वे सौ वर्षोंतक शिवजीकी कुक्षिमें चारों ओर भ्रमण करते रहे; परंतु उन्हें उसी प्रकार कोई छिद्र नहीं दीख पड़ा, जैसे दुष्टकी दृष्टि सदाचारीके छिद्रको नहीं देख पाती। तब भृगुनन्दनने शैवयोगका आश्रय ले एक मन्त्रका जप किया। उस मन्त्रके प्रभावसे वे शम्भुके जठरपंजरसे शुक्ररूपमें लिंगमार्गसे बाहर निकले। तब उन्होंने शिवजीको प्रणाम किया। गौरीने उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया और विघ्नरहित बना दिया। तदनन्तर करुणासागर महेश्वर भृगुनन्दन शुक्राचार्यको वीर्यके रास्ते निकला हुआ देखकर मुसकराते हुए बोले।
महेश्वरने कहा—भृगुनन्दन! चूँकि तुम मेरे लिंगमार्गसे शुक्रकी तरह निकले हो, इसलिये अब तुम शुक्र कहलाओगे। जाओ, अब तुम मेरे पुत्र हो गये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! देवेश्वर शंकरके यों कहनेपर सूर्यके सदृश कान्तिमान् शुक्रने पुनः शिवजीको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।
शुक्रने कहा—भगवन्! आपके पैर, सिर, नेत्र, हाथ और भुजाएँ अनन्त हैं। आपकी मूर्तियोंकी भी गणना नहीं हो सकती। ऐसी दशामें मैं आप स्तुत्यकी सिर झुकाकर किस प्रकार स्तुति करूँ। आपकी आठ मूर्तियाँ बतायी जाती हैं और आप अनन्तमूर्ति भी हैं। आप सम्पूर्ण सुरों और असुरोंकी कामना पूर्ण करनेवाले हैं तथा अनिष्ट-दृष्टिसे देखनेपर आप संहार भी कर डालते हैं। ऐसे स्तवनके योग्य आपकी मैं किस प्रकार स्तुति करूँ।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार शुक्रने शिवजीकी स्तुति करके उन्हें नमस्कार किया और उनकी आज्ञासे वे पुनः
789 संक्षिप्त शिवपुराण—14 A
४१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
दानवोंकी सेनामें प्रविष्ट हुए, ठीक उसी तरह जैसे चन्द्रमा मेघोंकी घटामें प्रवेश करते हैं। व्यासजी! इस प्रकार रणभूमिमें शंकरने जिस तरह शुक्रको निगल लिया था, वह वृत्तान्त तो तुम्हें सुना दिया। अब शम्भुके उदरमें शुक्रने जिस मन्त्रका जप किया था, उसका वर्णन सुनो।
महर्षे! वह मन्त्र इस प्रकार है—
'ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिङ्गललोचनाय बलाय बुद्धिरूपिणे वैयाघ्रवसनच्छायारण्येयाय त्रैलोक्यप्रभवे ईश्वराय हराय हरिनेत्राय युगान्तकरणायनलाय गणेशाय लोकपालाय महाभुजाय महाहस्ताय शूलिने महादंष्ट्रिणे कालाय महेश्वराय अव्ययाय कालरूपिणे नीलग्रीवाय महोदराय गणाध्यक्षाय सर्वात्मने सर्वभावनाय सर्वगाय मृत्युहन्त्रे पारियात्रसुव्रताय ब्रह्मचारिणे वेदान्तगाय तपोऽन्तगाय पशुपतये व्यङ्गाय शूलपाणये वृषकेतवे हरये जटिने शिखण्डिने लकुटिने महायशसे भूतेश्वराय गुहावासिने वीणापणवतालवते अमराय दर्शनीयाय बालसूर्यनिकाय श्मशानवासिने भगवते उमापतये अरिंदमाय भगस्याक्षिपातिने पूष्णो दशननाशनाय क्रूरकर्तकाय पाशहस्ताय प्रलयकालाय उल्कामुखायाग्निकेतवे मुनये दीप्ताय विशाम्पतये उन्नयते जनकाय चतुर्थकाय लोकसत्तमाय वामदेवाय वाग्दाक्षिण्याय वामतो भिक्षवे भिक्षुरूपिणे जटिने स्वयं जटिलाय शक्रहस्तप्रतिस्तम्भकाय वसूनां स्तम्भकाय क्रतवे क्रतुकाराय कालाय मेधाविने मधु कराय चलाय वानस्पत्याय वाजसनेतिसमाश्रमपूजिताय जगद्धात्रे जगत्कर्त्रे पुरुषाय शाश्वताय ध्रुवाय धर्माध्यक्षाय त्रिवर्त्मने भूतभावनाय त्रिनेत्राय बहुरूपाय सूर्ययुतसमप्रभाय देवाय सर्वतूर्यनिनादिने सर्वबाधाविमोचनाय बन्धनाय सर्वधारिणे धर्मोत्तमाय पुष्पदन्तायाविभागाय मुख्याय सर्वहराय हिरण्यश्रवसे द्वारिणे भीमाय भीमपराक्रमाय ॐ नमो नमः।'*
इसी श्रेष्ठ मन्त्रका जप करके शुक्र
* ॐ जो देवताओंके स्वामी, सुर-असुरद्वारा वन्दित, भूत और भविष्यके महान् देवता, हरे और पीले नेत्रोंसे युक्त, महाबली, बुद्धिरूप, बाघंबर धारण करनेवाले, अग्निस্বরূপ, त्रिलोकीके उत्पत्तिस्थान, ईश्वर, हर, हरिनेत्र, प्रलयकारी, अग्निस্বরূপ, गणेश, लोकपाल, महाभुज, महाहस्त, त्रिशूल धारण करनेवाले, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले, कालस्वरूप, महेश्वर, अविनाशी, कालरूपी, नीलकण्ठ, महोदर, गणाध्यक्ष, सर्वात्मा, सबको उत्पन्न करनेवाले, सर्वव्यापी, मृत्युको हटानेवाले, पारियात्र पर्वतपर उत्तम व्रत धारण करनेवाले, ब्रह्मचारी, वेदान्तप्रतिपाद्य, तपकी अन्तिम सीमातक पहुँचनेवाले, पशुपति, विशिष्ट अंगोंवाले, शूलपाणि, वृषध्वज, पापापहारी, जटाधारी, शिखण्ड धारण करनेवाले, दण्डधारी, महायशस्वी, भूतेश्वर, गुहामें निवास करनेवाले, वीणा और पणवपर ताल लगानेवाले, अमर, दर्शनीय, बालसूर्य-सरीखे रूपवाले, श्मशानवासी, ऐश्वर्यशाली, उमापति, शत्रुदमन, भगके नेत्रोंको नष्ट कर देनेवाले, पूषाके दाँतोंके विनाशक, क्रूरतापूर्वक संहार करनेवाले, पाशधारी, प्रलयकालरूप, उल्कामुख, अग्निकेतु, मननशील, प्रकाशमान, प्रजापति, ऊपर उठानेवाले, जीवोंको उत्पन्न करनेवाले, तुरीयतत्त्वरूप, लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ, वामदेव, वाणीकी चतुरतारूप, वाममार्गमें भिक्षुरूप, भिक्षुक, जटाधारी, जटिल—दुराराध्य, इन्द्रके हाथको स्तम्भित करनेवाले, वसुओंको विजडित कर देनेवाले,
789 संक्षिप्त शिवपुराण—14 B
* रुद्रसंहिता * ४१९
शम्भुके जठर-पंजरसे लिंगके रास्ते उत्कट वीर्यकी तरह निकले थे। उस समय गौरीने उन्हें पुत्ररूपसे अपनाया और जगदीश्वर शिवने अजर-अमर बना दिया। तब वे दूसरे शंकरके सदृश शोभा पाने लगे। तीन हजार वर्ष व्यतीत होनेके पश्चात् वे ही वेदनिधि मुनिवर शुक्र पुनः इस भूतलपर महेश्वरसे उत्पन्न हुए। उस समय उन्होंने धैर्यशाली एवं तपस्वी दानवराज अन्धकको देखा। उसका शरीर सूख गया था और वह त्रिशूलपर लटका हुआ परमेश्वर शिवका ध्यान कर रहा था। (वह शिवजीके १०८ नामोंका इस प्रकार स्मरण कर रहा था—)
महादेव—देवताओंमें महान्, विरूपाक्ष—विकराल नेत्रोंवाले, चन्द्रार्धकृतशेखर—मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, अमृत—अमृतस्वरूप, शाश्वत—सनातन, स्थाणु—समाधिस्थ होनेपर ठूंठके समान स्थिर, नीलकण्ठ—गलेमें नील चिह्न धारण करनेवाले, पिनाकी—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, वृषभाक्ष—वृषभके नेत्र-सरीखे विशाल नेत्रोंवाले, महाज्ञेय—'महान्' रूपसे जाननेयोग्य, पुरुष—अन्तर्यामी, सर्वकामद—सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कामारि—कामदेवके शत्रु, कामदहन—कामदेवको दग्ध कर देनेवाले, कामरूप—इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, कपर्दी—विशाल जटाओंवाले, विरूप—विकराल रूपधारी, गिरिश—गिरिवर कैलासपर शयन करनेवाले, भीम—भयंकर रूपवाले, सृक्की—बड़े-बड़े जबड़ोंवाले, रक्तवासा—लाल वस्त्रधारी, योगी—योगके ज्ञाता, कालदहन—कालको भस्म कर देनेवाले, त्रिपुरघ्न—त्रिपुरोंके संहारकर्ता, कपाली—कपाल धारण करनेवाले, गूढव्रत—जिनका व्रत प्रकट नहीं होता, गुप्तमन्त्र—गोपनीय मन्त्रोंवाले, गम्भीर—गम्भीर स्वभाववाले, भावगोचर—भक्तोंकी भावनाके अनुसार प्रकट होनेवाले, अणिमादिगुणाधार—अणिमा आदि सिद्धियोंके अधिष्ठान, त्रिलोकैश्वर्यदायक—त्रिलोकीका ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, वीर—बलशाली, वीरहन्ता—शत्रुवीरोंको मारनेवाले, घोर—दुष्टोंके लिये भयंकर, विरूप—विकट रूप धारण करनेवाले, मांसल—मोटे-ताजे शरीरवाले, पटु—निपुण, महामांसाद—श्रेष्ठ फलका गूदा खानेवाले, उन्मत्त—मतवाले, भैरव—कालभैरवस्वरूप, महेश्वर—देवेश्वरोंमें भी श्रेष्ठ, त्रैलोक्यद्रावण—त्रिलोकीका विनाश करनेवाले, लुब्ध—स्वजनोंके लोभी, यज्ञस्वरूप, यज्ञकर्ता, काल, मेधावी, मधुकर, चलने-फिरनेवाले, वनस्पतिका आश्रय लेनेवाले, वाजसन नामसे सम्पूर्ण आश्रमोंद्वारा पूजित, जगद्धाता, जगत्कर्ता, सर्वान्तर्यामी, सनातन, ध्रुव, धर्माध्यक्ष, भूः-भुवः, स्वः—इन तीनों लोकोंमें विचरनेवाले, भूतभावन, त्रिनेत्र, बहुरूप, दस हजार सूर्योंके समान प्रभावशाली, महादेव, सब तरहके बाजे बजानेवाले, सम्पूर्ण बाधाओंसे विमुक्त करनेवाले, बन्धनस्वरूप, सबको धारण करनेवाले, उत्तम धर्मरूप, पुष्पदन्त, विभागरहित, मुख्यरूप, सबका हरण करनेवाले, सुवर्णके समान दीप्त कीर्तिवाले, मुक्तिके द्वारस्वरूप, भीम तथा भीमपराक्रमी हैं, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—14 C
४२० * संक्षिप्त शिवपुराण *
लुब्धक—महाव्याधस्वरूप, यज्ञसूदन—दक्षयज्ञके विनाशक, कृत्तिकासुतयुक्त—कृत्तिकाओंके पुत्र (स्वामिकार्तिक)-से युक्त, उन्मत्त—उन्मत्तका-सा वेष धारण करनेवाले, कृत्तिवासा—गजासुरके चमड़ेको ही वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, गजकृत्तिपरीधान—हाथीका चर्म लपेटनेवाले, क्षुब्ध—भक्तोंका कष्ट देखकर क्षुब्ध हो जानेवाले, भुजगभूषण—सर्पोंको भूषणरूपमें धारण करनेवाले, दत्तालम्ब—भक्तोंके अवलम्बदाता, वेताल—वेतालस्वरूप, घोर—घोर, शाकिनीपूजित—शाकिनियोंद्वारा समाराधित, अघोर—अघोरपथके प्रवर्तक, घोरदैत्यघ्न—भयंकर दैत्योंके संहारक, घोरघोष—भीषण शब्द करनेवाले, वनस्पति—वनस्पतिस्वरूप, भस्मांग—शरीरमें भस्म रमानेवाले, जटिल—जटाधारी, शुद्ध—परम पावन, भेरुण्डशतसेवित—सैकड़ों भेरुण्डनामक पक्षियोंद्वारा सेवित, भूतेश्वर—भूतोंके अधिपति, भूतनाथ—भूतगणोंके स्वामी, पंचभूताश्रित—पंचभूतोंको आश्रय देनेवाले, खग—गगनविहारी, क्रोधित—क्रोधयुक्त, निष्ठुर—दुष्टोंपर कठोर व्यवहार करनेवाले, चण्ड—प्रचण्ड पराक्रमी, चण्डीश—चण्डीके प्राणनाथ, चण्डिकाप्रिय—चण्डिकाके प्रियतम, चण्डतुण्ड—अत्यन्त कुपित मुखवाले, गरुत्मान्—गरुडस्वरूप, निस्त्रिंश—खड्गस्वरूप, शवभोजन—शवका भोग लगानेवाले, लेलिहान—क्रुद्ध होनेपर जीभ लपलपानेवाले, महारौद्र—अत्यन्त भयंकर, मृत्यु—मृत्युस्वरूप, मृत्योरगोचर—मृत्युकी भी पहुँचसे परे, मृत्योर्मृत्यु—मृत्युके भी काल, महासेन—विशाल सेनावाले कार्तिकेय-स्वरूप, श्मशानारण्यवासी—श्मशान एवं अरण्यमें विचरनेवाले, राग—प्रेमस्वरूप, विराग—आसक्तिरहित, रागान्ध—प्रेममें मस्त रहनेवाले, वीतराग—वैरागी, शतार्चि—तेजकी असंख्य चिनगारियोंसे युक्त, सत्त्व—सत्त्वगुणस्वरूप, रजः—रजोगुणस्वरूप, तमः—तमोगुणस्वरूप, धर्म—धर्मस्वरूप, अधर्म—अधर्मरूप, वासवानुज—इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्रस्वरूप, सत्य—सत्यरूप, असत्य—सत्यसे भी परे, सद्रूप—उत्तम रूपवाले, असद्रूप—बीभत्स रूपधारी, अहेतुक—हेतुरहित, अर्धनारीश्वर—आधा पुरुष और आधा स्त्रीका रूप धारण करनेवाले, भानु—सूर्यस्वरूप, भानुकोटिशतप्रभ—कोटिशत सूर्योंके समान प्रभावशाली, यज्ञ—यज्ञस्वरूप, यज्ञपति—यज्ञेश्वर, रुद्र—संहारकर्ता, ईशान—ईश्वर, वरद—वरदाता, शिव—कल्याणस्वरूप। परमात्मा शिवकी इन १०८ मूर्तियोंका ध्यान करनेसे वह दानव उस महान् भयसे मुक्त हो गया*। उस
* महादेवं विरूपाक्षं चन्द्रार्धकृतशेखरम्। अमृतं शाश्वतं स्थाणुं नीलकण्ठं पिनाकिनम्॥
वृषभाक्षं महाज्ञेयं पुरुषं सर्वकामदम्। कामारिं कामदहनं कामरूपं कपर्दिनम्॥
विरूपं गिरिशं भीमं सृक्वणिं रक्तवाससम्। योगिनं कालदहनं त्रिपुरघ्नं कपालिनम्॥
गूढव्रतं गुप्तमन्त्रं गम्भीरं भावगोचरम्। अणिमादिगुणाधारं त्रिलोकैश्वर्यदायकम्॥
वीरं वीरहणं घोरं विरूपं मांसलं पटुम्। महामांसादमुन्मत्तं भैरवं वै महेश्वरम्॥
789 संक्षिप्त शिवपुराण—14 D
* रुद्रसंहिता * ४२१
समय प्रसन्न हुए जटाधारी शंकरने उसे मुक्त करके उस त्रिशूलके अग्रभागसे उतार लिया और दिव्य अमृतकी वर्षासे अभिषिक्त कर दिया। तत्पश्चात् महात्मा महेश्वर उसने जो कुछ किया था, उस सबका सान्त्वना-पूर्वक वर्णन करते हुए उस महादैत्य अन्धकसे बोले।
ईश्वरने कहा—हे दैत्येन्द्र! मैं तेरे इन्द्रिय-निग्रह, नियम, शौर्य और धैर्यसे प्रसन्न हो गया हूँ; अतः सुव्रत! अब तू कोई वर माँग ले। दैत्योंके राजाधिराज! तूने निरन्तर मेरी आराधना की है, इससे तेरा सारा कल्मष धुल गया और अब तू वर पानेके योग्य हो गया है। इसीलिये मैं तुझे वर देनेके लिये आया हूँ; क्योंकि तीन हजार वर्षोंतक बिना खाये-पीये प्राण धारण किये रहनेसे तूने जो पुण्य कमाया है, उसके फलस्वरूप तुझे सुखकी प्राप्ति होनी चाहिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर अन्धकने भूमिपर अपने घुटने टेक दिये और फिर वह हाथ जोड़कर काँपता हुआ भगवान् उमापतिसे बोला।
अन्धकने कहा—भगवन्! आपकी महिमा जाने बिना मैंने पहले रणांगणमें हर्षगद्गद वाणीसे आपको जो दीन, हीन तथा नीच-से-नीच कहा है और मूर्खतावश लोकमें जो-जो निन्दित कर्म किया है, प्रभो! उस सबको आप अपने मनमें स्थान न दें अर्थात् उसे भूल जायँ। महादेव! मैं अत्यन्त ओछा और दुःखी हूँ। मैंने कामदोषवश पार्वतीके विषयमें भी जो दूषित भावना कर ली थी, उसे आप क्षमा कर दें। आपको तो अपने कृपण, दुःखी एवं दीन भक्तपर सदा ही विशेष दया करनी चाहिये। मैं उसी तरहका एक दीन भक्त हूँ और आपकी शरणमें आया हूँ। देखिये, मैंने आपके सामने अंजलि बाँध रखी है। अब आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये। ये जगज्जननी पार्वतीदेवी भी मुझपर प्रसन्न हो जायँ और सारे क्रोधको त्यागकर मुझे कृपादृष्टिसे देखें। चन्द्रशेखर! कहाँ तो इनका भयंकर क्रोध और कहाँ मैं तुच्छ दैत्य? चन्द्रमौलि! मैं किसी प्रकार उसको सहन नहीं कर सकता। शम्भो! कहाँ तो परम उदार आप और कहाँ बुढ़ापा, मृत्यु तथा काम-क्रोध आदि दोषोंके वशीभूत
त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम्। कृत्तिकानां सुतैर्युक्तमुन्मत्तं कृत्तिवाससम्॥
गजकृत्तिपरीधानं क्षुब्धं भुजगभूषणम्। दत्तालम्बं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम्॥
अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम्। भस्माङ्गं जटिलं शुद्धं भेरुण्डशतसेवितम्॥
भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम्। क्रोधितं निष्ठुरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम्॥
चण्डतुण्डं गरुत्मन्तं निस्त्रिंशं शवभोजनम्। लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम्॥
मृत्योर्मृत्युं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम्। रागं विरागं रागान्धं वीतरागं शतार्चिषम्॥
सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम्। सत्यं त्वसत्यं सद्ग्रूपमसद्रूपमहेतुकम्॥
अर्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम्। यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम्॥
अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः। शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात्॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ४९। ५–१८)
४२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मैं ? (अर्थात् मेरी आपके साथ क्या तुलना है?) महेश्वर! आपके ये युद्धकला-निपुण महाबली वीर पुत्र मेरी कृपणतापर विचार करके अब क्रोधके वशीभूत मत हों। तुषार, हार, चन्द्रकिरण, शंख, कुन्दपुष्प और चन्द्रमाके-से वर्णवाले शिव! मैं इन पार्वतीको गुरुताके गौरववश नित्य मातृ-दृष्टिसे देखूँ! मैं नित्य आप दोनोंका भक्त बना रहूँ। देवताओंके साथ होनेवाला मेरा वैर दूर हो जाय तथा मैं शान्तचित्त हो योग-चिन्तन करता हुआ गणोंके साथ निवास करूँ। महेशान! आपकी कृपासे मैं उत्पन्न हुए इस विरोधी दानवभावका पुनः कभी स्मरण न करूँ, यही उत्तम वर मुझे प्रदान कीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिसत्तम! इतनी बात कहकर वह दैत्यराज माता पार्वतीकी ओर देखकर त्रिनयन शंकरका ध्यान करता हुआ मौन हो गया। तब रुद्रने उसकी ओर कृपादृष्टिसे देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही उसे अपने पूर्ववृत्तान्त तथा अद्भुत जन्मका स्मरण हो आया। उस घटनाका स्मरण होते ही उसका मनोरथ पूर्ण हो गया। फिर तो माता-पिता (उमा-महेश्वर)-को प्रणाम करके वह कृतकृत्य हो गया। उस समय पार्वती तथा बुद्धिमान् शंकरने उसका मस्तक सूँघकर प्यार किया। इस प्रकार अन्धकने प्रसन्न हुए चन्द्रशेखरसे अपना सारा मनोरथ प्राप्त कर लिया। मुने! महादेवजीकी कृपासे अन्धकको जिस प्रकार परम सुखद गणाध्यक्ष-पद प्राप्त हुआ था, वह सारा-का-सारा पुरातन वृत्तान्त मैंने सुना दिया और मृत्युंजय-मन्त्रका भी वर्णन कर दिया। यह मन्त्र मृत्युका विनाशक और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है। इसे प्रयत्नपूर्वक जपना चाहिये।
(अध्याय ४७—४९)
शुक्राचार्यकी घोर तपस्या और इनका शिवजीको चित्तरत्न अर्पण करना तथा अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी विद्या तथा अन्यान्य वर प्रदान करना
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! मुनिवर शुक्राचार्यको शिवसे मृत्युंजय नामक मृत्युका प्रशमन करनेवाली परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी, अब उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालकी बात है, इन भृगुनन्दनने वाराणसीपुरीमें जाकर प्रभावशाली विश्वनाथका ध्यान करते हुए बहुत कालतक घोर तप किया था। वेदव्यासजी! उस समय उन्होंने वहीं एक शिवलिंगकी स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कूप तैयार कराया। फिर प्रयत्नपूर्वक उन देवेश्वरको एक लाख बार द्रोणभर पंचामृतसे तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्योंसे स्नान कराया। फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन, यक्षकर्दम* और सुगन्धित उबटनका उस लिंगपर अनुलेप किया। तत्पश्चात् सावधानीके साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक
* एक प्रकारका अंग-लेप जो कपूर, अगुरु, कस्तूरी और कंकोलको मिलाकर बनाया जाता है।
* रुद्रसंहिता * ४२३
(अमलतास), धतूर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, सिन्धुवार, ढाक, बन्धूकपुष्प (गुलदुपहरी), पुंनाग, नागकेसर, केसर, नवमल्लिक (बेलमोगरा), चिबिलिक (रक्तदला), कुन्द (माघपुष्प), मुचुकुन्द (मोतिया), मन्दार, बिल्वपत्र, गूमा, मरुवृक (मरुआ), वृक (धूप), गँठिवन, दौना, अत्यन्त सुन्दर आमके पल्लव, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, कुशांकु, नन्दावर्त (नाँदरूख), अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक (गुलखेरा), दुर्वांकुर, कुरंटक (करसैला)—इनमेंसे प्रत्येकके पुष्पों और अन्य पल्लवोंसे तथा नाना प्रकारके रमणीय पत्रों और सुन्दर कमलोंसे शंकरजीकी विधिवत् अर्चना की। उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये तथा शिवलिंगके आगे नाचते हुए शिवसहस्रनाम एवं अन्यान्य स्तोत्रोंका गान करके शंकरजीका स्तवन किया। इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके विधि-विधानसे महेश्वरका पूजन करते रहे; परंतु जब उन्हें थोड़ा-सा भी वर देनेके लिये उद्यत होते नहीं देखा, तब उन्होंने एक-दूसरे अत्यन्त दुःसह एवं घोर नियमका आश्रय लिया। उस समय शुक्रने इन्द्रियोंसहित मनके अत्यन्त चंचलतारूपी महान् दोषको बारंबार भावनारूपी जलसे प्रक्षालित किया। इस प्रकार चित्तरत्नको निर्मल करके उसे पिनाकधारी शिवके अर्पण कर दिया और स्वयं धूमकणका पान करते हुए तप करने लगे। इस प्रकार उनके एक सहस्र वर्ष और बीत गये। तब भृगुनन्दन शुक्रको यों दृढ़चित्तसे घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर प्रसन्न हो गये। फिर तो दक्षकन्या पार्वतीके स्वामी साक्षात् विरूपाक्ष शंकर, जिनके शरीरकी कान्ति सहस्रों सूर्योंसे भी बढ़कर थी, उस लिंगसे निकलकर शुक्रसे बोले।
महेश्वरने कहा—महाभाग भृगुनन्दन! तुम तो तपस्याकी निधि हो। महामुने! मैं तुम्हारे इस अविच्छिन्न तपसे विशेष प्रसन्न हूँ। भार्गव! तुम अपना सारा मनोवांछित वर माँग लो। मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्ण कर दूँगा। अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई वस्तु अदेय नहीं रह गयी है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुके इस परम सुखदायक एवं उत्कृष्ट वचनको सुनकर शुक्र प्रसन्न हो आनन्द-समुद्रमें निमग्न हो गये। उन कमलनयन द्विजवर शुक्रका शरीर परमानन्दजनित रोमांचके कारण पुलकायमान हो गया। तब उन्होंने हर्षपूर्वक शम्भुके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। फिर वे मस्तकपर अंजलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्तिधारी* वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे।
भार्गवने कहा—सूर्यस्वरूप भगवन्! आप त्रिलोकीका हित करनेके लिये आकाशमें प्रकाशित होते हैं और अपनी इन किरणोंसे समस्त अन्धकारको अभिभूत
* पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, चन्द्रमा और सूर्य—इन आठोंमें अधिष्ठित शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान—ये अष्टमूर्तियोंके नाम हैं।
४२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
करके रातमें विचरनेवाले असुरोंका मनोरथ नष्ट कर देते हैं। जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। घोर अन्धकारके लिये चन्द्र-स्वरूप शंकर! आप अमृतके प्रवाहसे परिपूर्ण तथा जगत्के सभी प्राणियोंके नेत्र हैं। आप अपनी अमर्याद तेजोमय किरणोंसे आकाशमें और भूतलपर अपार प्रकाश फैलाते हैं, जिससे सारा अंधकार दूर हो जाता है; आपको प्रणाम है। सर्वव्यापिन्! आप पावन पथ—योगमार्गका आश्रय लेनेवालोंकी सदा गति तथा उपास्यदेव हैं। भुवनजीवन! आपके बिना भला, इस लोकमें कौन जीवित रह सकता है। सर्पकुलके संतोषदाता ! आप निश्चल वायुरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धि करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है। विश्वके एकमात्र पावनकर्ता ! आप शरणागतरक्षक और अग्निकी एकमात्र शक्ति हैं। पावक आपका ही स्वरूप है। आपके बिना मृतकोंका वास्तविक दिव्य कार्य दाह आदि नहीं हो सकता। जगत्के अन्तरात्मा ! आप प्राणशक्तिके दाता, जगत्स्वरूप और पद-पदपर शान्ति प्रदान करनेवाले हैं; आपके चरणोंमें मैं सिर झुकाता हूँ। जलस्वरूप परमेश्वर ! आप निश्चय ही जगत्के पवित्रकर्ता और चित्र-विचित्र सुन्दर चरित्र करनेवाले हैं। विश्वनाथ! जलमें अवगाहन करनेसे आप विश्वको निर्मल एवं पवित्र बना देते हैं, इसलिये आपको नमस्कार है। आकाशरूप ईश्वर! आपसे अवकाश प्राप्त करनेके कारण यह विश्व बाहर और भीतर विकसित होकर सदा स्वभाववश श्वास लेता है अर्थात् इसकी परम्परा चलती रहती है तथा आपके द्वारा यह संकुचित भी होता है अर्थात् नष्ट हो जाता है; इसलिये दयालु भगवन्! मैं आपके आगे नतमस्तक होता हूँ। विश्वम्भरात्मक! आप ही इस विश्वका भरण-पोषण करते हैं। सर्वव्यापिन्! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन अज्ञानान्धकारको दूर करनेमें समर्थ हो सकता है। अतः विश्वनाथ! आप मेरे अज्ञानरूपी तमका विनाश कर दीजिये। नागभूषण! आप स्तवनीय पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये आप परात्पर प्रभुको मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ। आत्मस्वरूप शंकर! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मामें निवास करनेवाले, प्रत्येक रूपमें व्याप्त हैं और मैं आप परमात्माका जन हूँ। अष्टमूर्ते! आपकी इन रूप-परम्पराओंसे यह चराचर विश्व विस्तारको प्राप्त हुआ है, अतः मैं सदासे आपको नमस्कार करता हूँ। मुक्तपुरुषोंके बन्धो! आप विश्वके समस्त प्राणियोंके स्वरूप, प्रणतजनोंके सम्पूर्ण योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले और परमार्थस्वरूप हैं। आप अपनी इन अष्टमूर्तियोंसे युक्त होकर इस फैले हुए विश्वको भलीभाँति विस्तृत करते हैं, अतः आपको मेरा अभिवादन है।*
* त्वं भाभिराभिरभिभूय तमस्समस्तमस्तं नयस्यभिमतानि निशाचराणाम्।
देदीप्यसे दिवमणे गगने हिताय लोकत्रयस्य जगदीश्वर तन्नमस्ते॥
लोकेऽतिवेलमतिवेलमहामोभिर्निभासि कौ च गगनेऽखिललोकनेत्रः।
विद्राविताखिलतमास्सुतमो हिमांशो पीयूषपूरपरिपूरित तन्नमस्ते॥
* रुद्रसंहिता * ४२५
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! भृगुनन्दन शुक्रने इस प्रकार अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा शिवजीका स्तवन करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया। जब अमित तेजस्वी भार्गवने महादेवकी इस प्रकार स्तुति की, तब शिवजीने चरणोंमें पड़े हुए उन द्विजवरको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़कर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक मेघगर्जनकी-सी गम्भीर एवं मधुर वाणीमें कहा। उस समय शंकरजीके दाँतोंकी चमकसे सारी दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं।
महादेवजी बोले—विप्रवर कवे! तुम मेरे पावन भक्त हो। तात! तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे, लिंगस्थापनजन्य पुण्यसे, लिंगकी आराधना करनेसे, चित्तका उपहार प्रदान करनेसे, पवित्र अटलभावसे, अविमुक्त महाक्षेत्र काशीमें पावन आचरण करनेसे मैं तुम्हें पुत्ररूपसे देखता हूँ; अतः तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है। तुम अपने इसी शरीरसे मेरी उदरदरीमें प्रवेश करोगे और मेरे श्रेष्ठ इन्द्रियमार्गसे निकलकर पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करोगे। महाशुचे! मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या है, जिसका मैंने ही अपने महान् तपोबलसे निर्माण किया है, उस महामन्त्ररूपा विद्याको आज मैं तुम्हें प्रदान करूँगा; क्योंकि तुम पवित्र तपकी निधि हो, अतः तुममें उस विद्याको धारण करनेकी योग्यता वर्तमान है। तुम नियमपूर्वक जिस-जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वरकी इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे, वह निश्चय ही जीवित हो जायगा—यह सर्वथा सत्य है। तुम आकाशमें अत्यन्त दीप्तिमान् तारारूपसे स्थित होओगे। तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके तेजका भी अतिक्रमण कर जायगा। तुम ग्रहोंमें प्रधान माने जाओगे। जो स्त्री अथवा पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहनेपर यात्रा करेंगे, उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि
त्वं पावने पथि सदा गतिरप्युपास्यः कस्तवां विना भुवनजीवन जीवतीह।
स्तब्धप्रभञ्जनविवर्धितसर्वजन्तो संतोषिताहिकुल सर्वग वै नमस्ते॥
विश्वैकपावक नतावक पावकैक शक्ते ऋते मृतवतामृतदिव्यकार्यम्।
प्राणिष्यदो जगदहो जगदान्तरात्मंस्त्वं पावकः प्रतिपदं शमदो नमस्ते॥
पानीयरूप परमेश जगत्पवित्र चित्रातिचित्रसुचरित्रकरोऽसि नूनम्।
विश्वं पवित्रममलं किल विश्वनाथ पानीयगाहनत एतदतो नतोऽस्मि॥
आकाशरूपबहिरन्तरुतावकाशादानाद् विकस्वरमिहेश्वर विश्वमेतत्।
त्वत्तस्सदा सदय संश्वसिति स्वभावात् संकोचमेति भवतोऽस्मि नतस्ततस्त्वाम्॥
विश्वम्भरात्मक बिभर्षि विभोऽत्र विश्वं को विश्वनाथ भवतोऽन्यतमस्तमोऽरिः।
स त्वं विनाशय तमो मम चाहिभूष स्तव्यात्परः परपरं प्रणतस्ततस्त्वाम्॥
आत्मस्वरूप तव रूपपरम्पराभिराभिस्ततं हर चराचररूपमेतत्।
सर्वान्तरात्मनिलय प्रतिरूपरूप नित्यं नतोऽस्मि परमात्मजनोऽष्टमूर्ते॥
इत्यष्टमूर्तिभिरिमाभिरबन्धबन्धो युक्तः करोषि खलु विश्वजनीनमूर्ते।
एतत्ततं सुविततं प्रणतप्रणीत सर्वार्थसार्थपरमार्थ ततो नतोऽस्मि॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५०।२४-३२)
४२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पड़नेसे नष्ट हो जायगा। सुव्रत! तुम्हारे उदय होनेपर जगत्में मनुष्योंके विवाह आदि समस्त धर्मकार्य सफल होंगे। सभी नन्दा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी) तिथियाँ तुम्हारे संयोगसे शुभ हो जायँगी और तुम्हारे भक्त वीर्यसम्पन्न तथा बहुत-सी संतानवाले होंगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग 'शुक़्रेश' के नामसे विख्यात होगा। जो मनुष्य इस लिंगकी अर्चना करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त हो जायगी। जो लोग वर्षपर्यन्त नक्तव्रतपरायण होकर शुक्रवारके दिन शुक्रकूपके जलसे सारी क्रियाएँ सम्पन्न करके शुक्रेशकी अर्चना करेंगे, उन्हें जिस फलकी प्राप्ति होगी, वह मुझसे श्रवण करो। उन मनुष्योंमें वीर्यकी अधिकता होगी, उनका वीर्य कभी निष्फल नहीं होगा; वे पुत्रवान् तथा पुरुषत्वके सौभाग्यसे सम्पन्न होंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। वे सभी मनुष्य बहुत-सी विद्याओंके ज्ञाता और सुखके भागी होंगे। यों वरदान देकर महादेव उसी लिंगमें समा गये। तब भृगुनन्दन शुक्र भी प्रसन्नमनसे अपने धामको चले गये। व्यासजी! यों शुक्राचार्यको जिस प्रकार अपने तपोबलसे मृत्युंजय नामक विद्याकी प्राप्ति हुई थी, वह वृत्तान्त मैंने तुमसे वर्णन कर दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ५०)
बाणासुरकी तपस्या और उसे शिवद्वारा वर-प्राप्ति, शिवका गणों और पुत्रोंसहित उसके नगरमें निवास करना, बाणपुत्री ऊषाका रातके समय स्वप्नमें अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण, बाणका अनिरुद्धको नागपाशमें बाँधना, दुर्गाके स्तवनसे अनिरुद्धका बन्धनमुक्त होना, नारदद्वारा समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई, शिवके साथ उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाणकी सेनाका संहार करना
व्यासजी बोले—सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! आपने अनुग्रह करके प्रेमपूर्वक ऐसी अद्भुत और सुन्दर कथा सुनायी है, जो शंकरकी कृपासे ओतप्रोत है। अब मुझे शशिमौलिके उस उत्तम चरित्रके श्रवण करनेकी इच्छा है, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुरको गणाध्यक्षपद प्रदान किया था।
सनत्कुमारजीने कहा—व्यासजी! परमात्मा शम्भुकी उस कथाको, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुरको गणनायक बनाया था, आदरपूर्वक श्रवण करो। इसी प्रसंगमें महाप्रभु शंकरका वह सुन्दर चरित्र भी आयेगा, जिसमें उन्होंने बाणासुरपर अनुग्रह करके श्रीकृष्णके साथ संग्राम
* रुद्रसंहिता * ४२७
किया था। व्यासजी! दक्षप्रजापतिकी तेरह कन्याएँ कश्यप मुनिकी पत्नियाँ थीं। वे सब-की-सब पतिव्रता तथा सुशीला थीं। उनमें दिति सबसे बड़ी थी, जिसके लड़के दैत्य कहलाते हैं। अन्य पत्नियोंसे भी देवता तथा चराचरसहित समस्त प्राणी पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। ज्येष्ठ पत्नी दितिके गर्भसे सर्वप्रथम दो महाबली पुत्र पैदा हुए, उनमें हिरण्यकशिपु ज्येष्ठ था और उसके छोटे भाईका नाम हिरण्याक्ष था। हिरण्यकशिपुके चार पुत्र हुए। उन दैत्यश्रेष्ठोंका क्रमशः ह्राद, अनुह्राद, संह्राद और प्रह्लाद नाम था। उनमें प्रह्लाद जितेन्द्रिय तथा महान् विष्णुभक्त हुए। उनका नाश करनेके लिये कोई भी दैत्य समर्थ न हो सका। प्रह्लादका पुत्र विरोचन हुआ, वह दानियोंमें सर्वश्रेष्ठ था। उसने विप्ररूपसे याचना करनेवाले इन्द्रको अपना सिर ही दे डाला था। उसका पुत्र बलि हुआ। यह महादानी और शिवभक्त था। इसने वामनरूपधारी विष्णुको सारी पृथ्वी दान कर दी थी। बलिका औरस पुत्र बाण हुआ। वह शिवभक्त, मानी, उदार, बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और सहस्रोंका दान करनेवाला था। उस असुरराजने पूर्वकालमें त्रिलोकीको तथा त्रिलोकाधिपतियोंको बलपूर्वक जीतकर शोणितपुरमें अपनी राजधानी बनाया और वहीं रहकर राज्य करने लगा। उस समय देवगण शंकरकी कृपासे उस शिवभक्त बाणासुरके किंकरके समान हो गये थे। उसके राज्यमें देवताओंके अतिरिक्त और कोई प्रजा दुःखी नहीं थी। शत्रुधर्मका बर्ताव करनेवाले देवता शत्रुतावश ही कष्ट झेल रहे थे। एक समय वह महासुर अपनी सहस्रों भुजाओंसे ताली बजाता हुआ ताण्डवनृत्य करके महेश्वर शिवको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा। उसके उस नृत्यसे भक्तवत्सल शंकर संतुष्ट हो गये। फिर उन्होंने परम प्रसन्न हो उसकी ओर कृपादृष्टिसे देखा। भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, शरणागतवत्सल और भक्तवांछा-कल्पतरु ही ठहरे। उन्होंने बलिनन्दन महासुर बाणको वर देनेकी इच्छा प्रकट की।
मुने! बलिनन्दन महादैत्य बाण शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और परम बुद्धिमान् था। उसने परमेश्वर शंकरको प्रणाम करके उनकी स्तुति की (और कहा)।
बाणासुर बोला—प्रभो! आप मेरे रक्षक हो जाइये और पुत्रों तथा गणोंसहित मेरे नगरके अध्यक्ष बनकर सर्वथा प्रीतिका निर्वाह करते हुए मेरे पास ही निवास कीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! वह बलिपुत्र बाण निश्चय ही शिवजीकी मायासे मोहमें पड़ गया था, इसीलिये उसने मुक्ति प्रदान करनेवाले दुराराध्य महेश्वरको पाकर भी ऐसा वर माँगा। तब ऐश्वर्यशाली भक्तवत्सल शम्भु उसे वह वर देकर पुत्रों और गणोंके साथ प्रेमपूर्वक वहीं निवास करने लगे। एक बार बाणासुरको बड़ा ही गर्व हो गया। उसने ताण्डवनृत्य करके शंकरको संतुष्ट किया। जब बाणासुरको यह ज्ञात हो गया कि पार्वतीवल्लभ शिव प्रसन्न हो गये हैं, तब वह हाथ जोड़कर सिर झुकाये हुए बोला।
बाणासुरने कहा—देवाधिदेव महादेव! आप समस्त देवताओंके शिरोमणि हैं। आपकी ही कृपासे मैं बली हुआ हूँ। अब आप मेरा उत्तम वचन सुनिये। देव! आपने
४२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
जो मुझे एक हजार भुजाएँ प्रदान की हैं, ये तो अब मुझे महान् भारस्वरूप लग रही हैं; क्योंकि इस त्रिलोकीमें मुझे आपके अतिरिक्त अपनी जोड़का और कोई योद्धा ही नहीं मिला। इसलिये वृषध्वज! युद्धके बिना इन पर्वत-सरीखी सहस्रों भुजाओंको लेकर मैं क्या करूँ। मैं अपनी इन परिपुष्ट भुजाओंकी खुजली मिटानेके लिये युद्धकी लालसासे नगरों तथा पर्वतोंको चूर्ण करता हुआ दिग्गजोंके पास गया; परंतु वे भी भयभीत होकर भाग खड़े हुए। मैंने यमको योद्धा, अग्निको महान् कार्य करनेवाला, वरुणको गौओंका पालनकर्ता गोपाल, कुबेरको गजाध्यक्ष, निर्ऋतिको सैरन्ध्री और इन्द्रको जीतकर सदाके लिये करद बना लिया है। महेश्वर! अब मुझे किसी ऐसे युद्धके प्राप्त होनेकी बात बताइये, जिसमें मेरी ये भुजाएँ या तो शत्रुओंके हाथोंसे छूटे हुए शस्त्रास्त्रोंसे जर्जर होकर गिर जायें अथवा हजारों प्रकारसे शत्रु की भुजाओंको ही गिरायें। यही मेरी अभिलाषा है, इसे पूर्ण करनेकी कृपा करें।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! उसकी बात सुनकर भक्तबाधापहारी तथा महामन्युस्वरूप रुद्रको कुछ क्रोध आ गया। तब वे महान् अद्भुत अट्टहास करके बोले।
रुद्रने कहा—‘अरे अभिमानी! सम्पूर्ण दैत्योंके कुलमें नीच! तुझे सर्वथा धिक्कार है, धिक्कार है। तू बलिके पुत्र और मेरा भक्त है। तेरे लिये ऐसी बात कहना उचित नहीं है। अब तेरा दर्प चूर्ण होगा। तुझे शीघ्र ही मेरे समान बलवान्के साथ अकस्मात् महान् भीषण युद्ध प्राप्त होगा। उस संग्राममें तेरी ये पर्वत-सरीखी भुजाएँ जलौनी लकड़ीकी तरह शस्त्रास्त्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर गिरेंगी। दुष्टात्मन्! तेरे आयुधागारपर स्थापित तेरा जो यह मनुष्यके सिरवाला मयूरध्वज फहरा रहा है, इसका जब वायु-भयके बिना ही पतन हो जायगा, तब तू अपने चित्तमें समझ लेना कि वह महान् भयानक युद्ध आ पहुँचा है। उस समय तू घोर संग्रामका निश्चय करके अपनी सारी सेनाके साथ वहाँ जाना। इस समय तू अपने महलको लौट जा; क्योंकि इसीमें तेरा कल्याण है। दुर्मते! वहाँ तुझे प्रसिद्ध बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देंगे।’ यों कहकर गर्वहारी भक्तवत्सल भगवान् शंकर चुप हो गये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर बाणासुरने दिव्य पुष्पोंकी कलियोंसे अंजलि भरकर रुद्रकी अभ्यर्थना की और फिर उन महादेवको प्रणाम करके वह अपने घरको लौट गया। तदनन्तर किसी समय दैववश उसका वह ध्वज अपने-आप टूटकर गिर गया। यह देखकर बाणासुर हर्षित हो युद्धके लिये उद्यत हो गया। वह अपने हृदयमें विचार करने लगा कि कौन-सा युद्धप्रेमी योद्धा किस देशसे आयेगा, जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंका पारगामी विद्वान् होगा और मेरी सहस्रों भुजाओंको ईंधनकी तरह काट डालेगा तथा मैं भी अपने अत्यन्त तीखे शस्त्रोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर डालूँगा। इसी समय शंकरकी प्रेरणासे वह काल आ गया। एक दिन बाणासुरकी कन्या ऊषा वैशाखमासमें माधवकी पूजा करके मांगलिक शृंगारसे सुसज्जित हो रातके समय अपने गुप्त अन्तःपुरमें सो रही थी, उसी समय वह स्त्रीभाव (कामभाव)-
* रुद्रसंहिता * ४२९
प्राप्त हो गयी। तब देवी पार्वतीकी शक्तिसे ऊषाको स्वप्नमें श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धका मिलन प्राप्त हुआ। जागनेपर वह व्याकुल हो गयी और उसने अपनी सखी चित्रलेखासे स्वप्नमें मिले हुए उस पुरुषको ला देनेके लिये कहा।
तब चित्रलेखाने कहा—'देवि! तुमने स्वप्नमें जिस पुरुषको देखा है, उसे भला, मैं कैसे ला सकती हूँ, जब कि मैं उसे जानती ही नहीं।' उसके यों कहनेपर दैत्यकन्या ऊषा प्रेमान्ध होकर मरनेपर उतारू हो गयी, तब उस दिन उसकी उस सखीने उसे बचाया। मुनिश्रेष्ठ! कुम्भाण्डकी पुत्री चित्रलेखा बड़ी बुद्धिमती थी, वह बाणतनया ऊषासे पुनः बोली।
चित्रलेखाने कहा—सखी! जिस पुरुषने तुम्हारे मनका अपहरण किया है, उसे बताओ तो सही। वह यदि त्रिलोकीमें कहीं भी होगा तो मैं उसे लाऊँगी और तुम्हारा कष्ट दूर करूँगी।
सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! यों कहकर चित्रलेखाने वस्त्रके परदेपर देवताओं, दैत्यों, दानवों, गन्धर्वों, सिद्धों, नागों और यक्ष आदिके चित्र अंकित किये। फिर वह मनुष्योंका चित्र बनाने लगी। उनमें वृष्णिवंशियोंका प्रकरण आरम्भ होनेपर उसने शूर, वसुदेव, राम, कृष्ण और नरश्रेष्ठ प्रद्युम्नका चित्र बनाया। फिर जब उसने प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धका चित्र खींचा, तब उसे देखकर ऊषा लज्जित हो गयी। उसका मुख अवनत हो गया और हृदय हर्षसे परिपूर्ण हो गया।
ऊषाने कहा—'सखी! रातमें जो मेरे पास आया था और जिसने शीघ्र ही मेरे चित्तरूपी रत्नको चुरा लिया है, वह चोर पुरुष यही है।' तदनन्तर ऊषाके अनुरोध करनेपर चित्रलेखा ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीको तीसरे पहर द्वारकापुरी पहुँचकर क्षणमात्रमें ही पलंगपर बैठे हुए अनिरुद्धको महलमेंसे उठा लायी। वह दिव्य योगिनी थी। ऊषा अपने प्रियतमको पाकर प्रसन्न हो गयी। इधर अन्तःपुरके द्वारकी रक्षा करनेवाले बेतधारी पहरेदारोंने चेष्टाओंसे तथा अनुमानसे इस बातको लक्ष्य कर लिया। उन्होंने एक दिव्य शरीरधारी, दर्शनीय, साहसी तथा समरप्रिय नवयुवकको कन्याके साथ दुःशीलताका आचरण करते हुए देख भी लिया। उसे देखकर कन्याके अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले उन महाबली पुरुषोंने बलिपुत्र बाणासुरके पास जाकर सारी बातें निवेदन करते हुए कहा।
द्वारपाल बोले—देव! पता नहीं, आपके अन्तःपुरमें बलपूर्वक प्रवेश करके कौन पुरुष छिपा हुआ है। वह इन्द्र तो नहीं है, जो वेष बदलकर आपकी कन्याका उपभोग कर रहा है? महाबाहु दानवराज! उसे यहाँ देखिये, देखिये और जैसा उचित समझिये वैसा कीजिये। इसमें हमलोगोंका कोई दोष नहीं है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! द्वारपालोंका वह वचन तथा कन्याके दूषित होनेका कथन सुनकर महाबली दानवराज बाण आश्चर्यचकित हो गया। तदनन्तर वह कुपित होकर अन्तःपुरमें जा पहुँचा। वहाँ उसने प्रथम अवस्थामें वर्तमान दिव्य शरीरधारी अनिरुद्धको देखा। उसे महान् आश्चर्य हुआ। फिर उसने उसका बल देखनेके लिये दस हजार सैनिकोंको भेजकर
४३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
आज्ञा दी कि इसे मार डालो। सेनाने अनिरुद्धपर आक्रमण किया। तब अनिरुद्धने बात-की-बातमें दस हजार सैनिकोंको कालके हवाले कर दिया। फिर तो असंख्य सेना-पर-सेना आने लगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका ग्रास बनाने लगे। तदनन्तर उन्होंने बाणासुरका वध करनेके लिये एक शक्ति हाथमें ली, जो कालाग्निके समान भयंकर थी। फिर उसीसे रथकी बैठकमें बैठे हुए बाणासुरपर प्रहार किया। उसकी गहरी चोट खाकर वीरवर बाण उसी क्षण घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया। फिर महावीर बलिपुत्र बाणासुरने, जो महान् बलसम्पन्न तथा शिवभक्त था, छलपूर्वक नागपाशसे अनिरुद्धको बाँध लिया। इस प्रकार उन्हें बाँधकर और पिंजरेमें कैद करके वह युद्धसे उपराम हो गया। तत्पश्चात् बाण कुपित होकर महाबली सूतपुत्रसे बोला।
बाणासुरने कहा—सूतपुत्र! घास-फूससे ढके हुए अगाध कुएँमें ढकेलकर इस पापीको मार डाल। अधिक क्या कहूँ, इसे सर्वथा मार ही डालना चाहिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! उसकी यह बात सुनकर उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ धर्मबुद्धि निशाचर कुम्भाण्डने बाणासुरसे कहा।
कुम्भाण्ड बोला—देव! थोड़ा विचार तो कीजिये। मेरी समझसे तो यह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आहत हो जायगा। पराक्रममें तो यह विष्णुके समान दीख रहा है। जान पड़ता है, आपपर कुपित होकर चन्द्रचूड़ने अपने उत्तम तेजसे इसे बढ़ा दिया है। साहसमें यह शशिमौलिकी समानता कर रहा है; क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर ही डटा हुआ है। यह ऐसा बली है कि यद्यपि नाग इसे बलपूर्वक डँस रहे हैं, तथापि यह हमलोगोंको तृणवत् ही समझ रहा है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! दानव कुम्भाण्ड राजनीतिके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ था। वह बाणसे ऐसा कहकर फिर अनिरुद्धसे कहने लगा।
कुम्भाण्डने कहा—'नराधम! अब तू वीरवर दैत्यराजकी स्तुति कर और दीन वाणीसे 'मैं हार गया' यों बारंबार कहकर उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार कर। ऐसा करनेपर ही तू मुक्त हो सकता है, अन्यथा तुझे बन्धन आदिका कष्ट भोगना पड़ेगा।' उसकी बात सुनकर अनिरुद्ध उत्तर देते हुए बोले।
अनिरुद्धने कहा—दुराचारी निशाचर! तुझे क्षत्रिय-धर्मका ज्ञान नहीं है। अरे! शूरवीरके लिये दीनता दिखाना और युद्धसे मुख मोड़कर भागना मरणसे भी बढ़कर कष्टदायक होता है। मेरे विचारसे तो विरुद्धाचरण काँटेकी तरह चुभनेवाला होता है। वीरमानी क्षत्रियके लिये रणभूमिमें सदा सम्मुख लड़ते हुए मरना ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े हुए दीनकी तरह मरना कदापि नहीं।*
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! इस
* क्षत्रियस्य रणे श्रेयो मरणं सम्मुखे सदा। न वीरमानिनी भूमौ दीनस्येव कृताञ्जलेः॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५३। ३५)