श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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- समर्पण - लेखक 1
- चित्र स्वामी जी महाराज ध्यान सहित 2
- चित्र जगतजननी पीताम्बरा माता ध्यान सहित 3
- विमोचन - 4 ग्रन्थ विमोचन अनन्त श्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज द्वारा दिनांक 9 अगस्त 2019 भृगुवार को कोलकाता में ग्रन्थ विमोचन किया गया।
- चित्र में अनन्त श्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका 5 शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज ग्रन्थ विमोचन करते हुये।
- आशीर्वाद - ज्योतिर्मठ अवांतर भानपुरा पीठ जगद्गुरु 6 शङ्कराचार्य मठ भानपुरा पो. भानपुरा जिला-मन्दसौर, पिन-453775 (म.प्र.)
- प्रस्तावना - आचार्य ओमनारायण शास्त्री (श्री पीताम्बरा पीठ 7-8 दतिया)
- प्रकाशकीय - श्री हरिराम सांवला (न्यासी/कोषाध्यक्ष) 9-10 पीताम्बरा पीठ दतिया
- दो शब्द - डॉ. मोलीलाल खड्डर शास्त्री (मास्टर जी) लेखक 11-12
- शुभकामना - 1. नरेन्द्र पंजवानी (ज्योतिषाचार्य आगरा) 13
- डॉ. एस.पी. मिश्र 14
- गुरु गीता 15-50
- गुरुस्तवराज 51-55
- गुरुरष्टक 56-58
- आरती (भगवती पीताम्बरा माता) 59-61
- क्षमापन स्तोत्र 62-67 Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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गुरुगीता - गुरु स्तवराज गुर्वष्टकञ्च (गुरुगीता - गुरु स्तवराज, गुरु अष्टक का हिन्दी अनुवाद) अनंतश्री विभूषित दतिया पीताम्बरा पीठाधी श्वर राष्ट्रगुरु श्री स्वामी जी महाराज साधौ गुरु समान कोऊ नाहीं यद्यपि मातु पितु सब कुछ है, जो जन्मे जग माही पर गुरु बिनु इन्हकी भी महिमा को जाने जग मांही समर्पणम् स्वामिनैः राष्ट्रगुरुवर्यैः श्री पीताम्बरा पीठाधीश्वरैः शब्दे चक्रे निगदितं सद्गुरुं प्रणमाम्यहम् गुरुगीता गुरोष्टक गुरु स्तवराजानां हिन्द्यानुवादः सर्वमेतत् गुरुपादपद्मेषु समर्पयामि॥ अनुवादकः ( मास्टर जी ) ( 1 )
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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अनंतश्री विभूषित दतिया पीताम्बरा पीठाधीश्वर राष्ट्रगुरु श्री स्वामी जी महाराज Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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१. प्रथम अध्याय: कैलास शिखर पर पार्वती-शिव संवाद एवं गुरु-तत्त्व
जगतजननी श्री पीताम्बरा माता ध्यानम् सौवर्णासनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम् हेमाभाङ्गरुचिं शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्। हस्तैर्मुद्गर पाश वज्र रसनाः संविभ्रतीं भूषणैः, व्याप्तांगीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत्॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अनन्तश्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ज्योतिर्मठ श्रीशारदापीठम् तोटकाचार्य गुफा, चमोली, गढ़वाल (उत्तराखण्ड) द्वारका-३६१३३५, देवभूमि द्वारका (गुजरात) दूरभाष : ०१३८९-२२२१८५ दूरभाष : ०२८९२-२३४०६४ www.jagadgurushankaracharya.org क्रमांक : दिनांक : 09 अगस्त 2019 स्थल : अलिपुर, कोलकाता ॥ शुभाशंसनम् ॥ स्वस्तिश्री मोतीलाल खड्डर जी , नारायणस्मरण-पूर्वक शुभाशीर्वादाः । पीताम्बरा पीठ दतिया के स्वामी जी की पावन स्मृति में मोतीलाल खड्डर जी ने विभिन्न ग्रन्थों से गुरु महिमा के श्लोकों को संकलन किया है एवं गुरुगीता का भी इसमें समावेश किया है । गुरुतत्त्व पर भारतीय संस्कृति ने जो दृष्टिपात किया है वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं । भारतभूमि इसीलिए गुरुभूमि मानी जाती है यहाँ गुरुता भूमि में है । श्रीमद्भागवत में कहा है - आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित् । न मर्त्यबुद्ध्याऽसूयेत सर्वदेवमयोगुरुः ।। अर्थात् ब्रह्मरूप से स्वयं कृष्ण कह रहे हैं गुरु सर्वदेवमय हैं । अस्तु । पीताम्बरा पीठ के स्वामी जी भारत की संत परम्परा के दैदीप्यमान नक्षत्र की भाँति थे । उनके कारण ही दतिया को एक विशिष्ट पहचान मिली । वे उच्च कोटि के साधक थे, हमने उनके साथ शास्त्रचर्चा-पूर्वक बहुत समय व्यतीत किया है । उनकी स्मृति में गुरुगीता गुरुस्तवराज एवं गुर्वष्टकम् का प्रकाशन किया जा रहा है । ग्रन्थ की निर्विघ्न सफलता के लिए भगवान् चन्द्रमौलीश्वर से प्रार्थनापूर्वक हमारे भूरिशः शुभाशीर्वाद प्रेषित हैं । शुभैषी ०९/०८/२०१९ श्रावण शु.९/ २०७६ वि. स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ५/१ बी. बेलवेडियर रोड, जगद्गुरु शङ्कराचार्य अलिपुर, कोलकाता (प.बं.) ज्योतिष्पीठ एवं शारदापीठ, द्वारका Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri पूज्यपाद अनन्त श्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के 70वें भव्य चातुर्मास समारोह कोलकाता में उनके कर कमलों द्वारा आज दिनाँक 09 अगस्त 2019 को मास्टर जी दतिया (म.प्र.) द्वारा संकलित गुरुगीता, गुरुस्तवराज एवं गुरुअष्टक के श्लोकों का भाषानुवाद-पुस्तक का विमोचन किया गया। Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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ज्योतिर्मठ अवान्तर भानपुरा पीठ जगद्गुरु शङ्कराचार्य मठ भानपुरा पो. भानपुरा जिला-मन्दसौर पिन-458775 ( म.प्र. ) स्वस्ति डॉ. मोतीलाल खड्डर शास्त्री ( मास्टर जी ) नारायणात्मक शुभाशीष आपके द्वारा भेजा हुआ पत्र एवं सन्देश प्राप्त हुआ संशोधित विचार एवं लेख गुरुचरणानुरागियों, साधकों, पाठकों तथा आध्यात्मिक लक्ष्य व लक्षणों की लक्षणावृत्ति में बहुत ही सहायक लघुकाय ग्रन्थ भाषानुवाद सिद्ध होगा। अनन्त श्री विभूषित श्रीमद् श्री पीताम्बरा पीठाधीश्वर श्री स्वामी जी महाराज की अनुकम्पा अहेतुकृपा अनुग्रह साधक शिक्षा दीक्षा के रूप में मुझे 1968 से 1979 तक साक्षात् रहा और है। हम श्री पीताम्बरा पीठ दतिया एवं पीठ विद्वानों, साधको, अनुयायियों तथा सेवकों, न्यासियों को हृदय से सस्नेह शुभाशीष प्रदान करता हूँ, अनवरत। गीत छन्द दोहा कवित्व हरि विनु अक्षर जेह। ज्ञानानन्द व्यर्थ प्राण विनु नख शिख सुन्दर देह॥ शुभेच्छु वैशाख शुक्ल दशमी 2076/14.05.19 स्वामी ज्ञानानन्द तीर्थ 9406607636 जगदगुरु शङ्कराचार्य ज्योतिर्मठ अवान्तर भानपुरा पीठ पोस्ट-भानपुरा जिला-मन्दसौर-458775 ( म.प्र. ) ( 6 )
प्रस्तावना कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् यह एक प्रसिद्ध उक्ति है इसके अनुसार भगवान् कृष्ण को जगद्गुरु माना गया है वर्तमान समय मे श्री शंकराचार्य जी को जगद्-गुरु माना जाता है. यदि हम जगद्गुरु शब्द का अर्थ निकालें तो जगत् का अर्थ है यह सम्पूर्ण दृश्यमान प्रपञ्च अर्थात् सम्पूर्ण विश्व. गुरु शब्द में गु तथा रु दोनों के भिन्न-भिन्न अर्थ हैं गु का अर्थ है अन्धकार तथा रु का अर्थ है प्रकाश. अर्थात जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये. इस प्रकार जगद्गुरु का अर्थ हुआ जो सम्पूर्ण विश्व को अज्ञान रूपी अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाए. वस्तुतः यह जो दृश्यमान जगत् है वह मिथ्या है उसके मिथ्यत्व को प्रकाशित करने के कारण ही सम्भवतः जगद्गुरु इस उपाधि से शंकराचार्य जी को विभूषित किया गया है. भगवान् श्री कृष्ण और श्रीमद् आदि शंकराचार्य भगवत्पाद भारतीय इतिहास के ऐसे दो महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं जिससे (7)
सनातन धर्म आज भी अपने मूल रूप में सुरक्षित है. भगवान श्री कृष्ण ने बाल्यकाल से ही दैवीय सम्पत्ति की स्थापना तथा आसुरी सम्पत्ति का विनाश प्रारम्भ कर दिया था. श्रीमद्भगवत् गीता के रूप में सम्पूर्ण सनातन मतावलम्बी लोगों के लिये प्रेरणा स्रोत बना हुआ है. आद्य शंकराचार्य जी ने श्रीमद्भगवद्गीता पर भाष्य लिखकर उसके भाव को प्रकाशित किया. उन्होंने अनेक मत-मतान्तरों में बिखर रहे भारतवर्ष को एक सूत्र में आबद्ध किया. उक्त संकलन माननीय डॉ. श्री मोती लाल खड्डर जी ने स्कन्दपुराण, वामकेश्वर तन्त्र, आद्य शंकराचार्य विरचित गुरोरष्टक सभी को पढ़कर किया है। गुरु भक्तजन आत्म कल्याण के भागी बनें, यही गुरुदेव से प्रार्थना है कि सब का कल्याण हो. 23.04.2019 न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॐ शम् आचार्य ॐ नारायण द्विवेदः शास्त्री श्री पीताम्बरा-पीठ, दतिया (म.प्र.) (8)
श्री पीताम्बरा पीठ दतिया ( मध्य प्रदेश ) प्रकाशकीय अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥ श्री गुरु गीता के इस श्लोक के संबंध में पूज्यपाद श्री स्वामी जी से एक शिष्य ने पूछा - महाराज जी यह अखंड मंडलाकार से क्या तात्पर्य है। महाराज जी ने कहा आप कहीं मार्ग में जा रहे हैं आगे चल कर आपको दो रास्ते मिलते हैं आप भ्रम में पड़ जाते हैं कि किस मार्ग से जायें जिससे गन्तव्य तक पहुंच जायें। इतने में ही एक राहगीर निकलता है आप उससे अपने गन्तव्य को बता कर उससे मार्ग पूछते हैं वह आपको मार्ग बता देता है। आप उस मार्ग से चल देते हैं और गन्तव्य तक पहुंच जाते हैं। यदि आप भ्रम में पड़कर दूसरे मार्ग चले जाते तो गन्तव्य तक नहीं पहुंच पाते। यही अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् अर्थात गुरु तत्त्व सब में समाया हुआ है। केवल श्रद्धा, विश्वास की जरूरत है। श्री गुरु गीता-गुरु की महत्ता, गुरु की आज्ञा, गुरु की सेवा, और ( 9 )
गुरु को पूर्ण समर्पण करने के लिये शिष्य में तीव्र भावना उत्पन्न करता है जिससे शिष्य का कल्याण होता है। गुरु गीतात्मकं देवि शुद्ध तत्त्व मयोदितं। भव व्याधि विनाशार्थ स्वमेव सदा जपेत्॥ श्री मोती लाल जी खड्डर शास्त्री ने गुरु गीता, गुरु स्तवराज व गुर्वष्टकम् इन तीन स्तोत्रों का हिन्दी अनुवाद करके संस्कृत न जानने वाले साधकों को समझने के लिये सरलता कर दी है साथ ही मास्टर जी ने पीठ में रात्रि कालिक गायी जाने वाली आरती और क्षमापन स्तोत्र का भी हिन्दी अनुवाद कर दिया है। इन स्तोत्रों का हिन्दी अनुवाद अभी सुलभ नहीं था। अस्तु इस कमी को भी पूरा करने के लिये श्री मास्टर मोती लाल जी ने बहुत परिश्रम किया है इसके लिये मास्टर जी बहुत-बहुत धन्यवाद के पात्र हैं। श्री पीताम्बरा पीठ इस लघुकाय ग्रन्थ को प्रकाशित करने में प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है। श्री गुरु पूर्णिमा हरि राम सांवला संवत 2076 न्यासी/कोषाध्यक्ष सन् 2019 श्री पीताम्बरा पीठ दतिया (मध्य प्रदेश) ( 10 )
दो शब्द गुरु तत्त्व बोध का सागर है गुरु रित्यक्षरं देवि जपतो मम निश्चितम्। ब्रह्म हत्या पुरामुक्ता सत्यमेतन्न संशय॥ परशुरामो मातृ वधात् देवेन्द्रो ब्रह्महिंसनात्। पातकादपि मुक्तअभूत गुरोरुच्चारण मात्रतः (गुरु तन्त्र) सप्तकोटि महामन्त्र निश्चितं विश्रंश कारकाः एक एवं महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम् मन्त्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् स्मृति वेद पुराणाना सारमेव न संशय गुरु सेवा परमतीर्थ अन्य तीर्थ निरर्थकम् सर्व तीर्थाश्चि ये देवि सद्गुरु चरणाम्बुजम् (गुरु गीता) सात करोड़ महामंत्र चित्त को भ्रमित करने वाले हैं 'गुरु' दो अक्षर का एक मात्र ही महामंत्र सर्वोपरि है। 'गुरु' दो अक्षर ही मंत्रों का राजा है जो स्मृति, वेद, पुराण आदि का निःसंदेह सारभूत है। जिसकी वाणी से 'गुरु' अक्षर ही व्यवहारित होता है उसे कोई मोह नहीं होता। वेद पढ़ने की आवश्यकता उसे नहीं रह जाती। ग-कार के उच्चारण मात्र से ब्रह्म हत्या का दोष नहीं लगता। उ-कार के उच्चारण मात्र से जन्म मरण के पापों से छूट जाता है। रेफ उ-कार और विसर्ग के उच्चारण मात्र से कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। परशुराम माता के वध से, इन्द्र ब्रह्म हत्या के पाप से 'गुरु' का उच्चारण करने मात्र से मुक्त हुए थे। गुरुस्तवराज में आया है - ध्यानं दैवत पूजनं गुरुतपोदानाग्निहोत्रादयः पाठो होम निवेषणं पितृमखाह्याभ्यागतार्च्चा बलिः। एते व्यर्थफला भवन्ति सततं यस्य प्रसादं बिना तं वन्दे शिवरुपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥ ध्यान, योग, पूजा जप तप या दान हवन श्राद्धादि कर्म महान गुरुतरतप व्रत पाठ आतिथि अभ्यागत का विधिवत पूजागत सत्कर्म सम्मान ये समस्त शुभ कार्य जिनकी कृपा प्रसाद बिना सुफलदायी नहीं होते अर्थात् निरन्तर ही व्यर्थ फलाश्रित हो जाते हैं ऐसे शिवस्वरूप कल्याणकारी समस्त सिद्धियों के प्रदाता अपने समर्थ सदगुरु की वंदना करता हूँ। (11)
इसी प्रकार गुरु अष्टकम् में आया है - शरीरं सरूपं तथा वा कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् । गुरोरंघ्रिपद्मे मन श्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ॥ सुन्दर सुडौल सुरुपवान शरीर, उसी भांति की रुपवती पत्नी विस्तृत विशाल निर्मल यश कीर्ति अपार धन दौलत होने पर यदि गुरु के चरण कमलों के अग्रभाग में मन नहीं रमता तो सब व्यर्थ गया यानि व्यर्थ नष्ट कर दिया। अस्तु सद्गुरु के पादपद्मों में मन को लीन करना ही जीवन धन सारवान है। प्रस्तुत लघुकाय ग्रन्थ में गुरुगीता, गुरु स्तवराज एवं गुरु अष्टकम् के श्लोकों का हिन्दी अर्थ करके दिया गया है। पीठ में रात्रि कालिक माई की आरती और क्षमापन स्तोत्र भी हिन्दी अनुवाद सहित दिया गया है। साधना के क्षेत्र में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है। परन्तु संस्कृत पाठ का भावार्थ जानते हुए पाठ हृदय को गुरु के सानिध्य में शीघ्रता से ले जाता है। मात्र शाब्दिक पाठ बहुत अधिक समय बाद ही प्रभावी होता है। इसी अंतप्रेरणा को शायद महाराज जी समझ गये थे और उन्होंने मुझे यह कार्य करने की शक्ति प्रदान की। इस लघुकाय ग्रन्थ की मूल प्रेरणा के रूप में हैं-श्री पीताम्बरा-पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित राष्ट्र गुरु श्री स्वामी जी महाराज। उन्हीं के शुभाशीर्वाद से प्रस्तुत पुस्तक में दिये गये श्लोकों का हिन्दी अनुवाद कर सका हूँ। ग्रन्थ के प्रकाशन का कार्य श्री पीताम्बरा पीठ कर रहा है। पीठ के न्यासी श्री हरिराम सावला जी के प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूँ। व्याकरणाचार्य एवं पीठ के आचार्य पं. ओमनारायण शास्त्री द्विवेदः जी ने अपना बहुमूल्य समय देकर प्रस्तुत पुस्तक के श्लोकों के अनुवाद को आद्योपांत पढ़कर प्रस्तावना लिखी है। मैं उनका हृदय से सदैव ऋणी रहूंगा। उनके प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ। पुस्तक के मुद्रण का व्यय भार आगरा निवासी श्री नरेन्द्र पञ्जवानी ज्योतिषाचार्य ने सहर्ष वहन किया है। एतदर्थ मैं उन्हें साधुवाद ज्ञापित करता हूँ और भगवती की कृपा के लिये मैं पीताम्बरा माता से प्रार्थना भी करता हूँ। कथावाचक पं. यशोदानन्द मिश्र प्रयागराज (उ.प्र.) ने इस कार्य में अथक परिश्रम किया है अतएव उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। साधक एवं तांत्रिक डॉ. सूर्यप्रकाश मिश्र ने शुभकामना देकर मुझे अनुग्रहीत किया है। अस्तु उनके प्रति भी मैं आभार व्यक्त करता हूँ। झाँसी निवासी भाई मधुर वर्मा संचालक स्वाधीन प्रेस द्वारा पुस्तक टंकण कार्य बड़ी सावधानी से किया गया है, एतदर्थ उन्हें भी मैं साधुवाद देता हूँ। विनयावनत डॉ. मोतीलाल खङ्गरशास्त्री (मास्टर जी) (12)
शुभकामना श्री गुरुचरण सरोज रज, निजमन मुकुर सुधार। बरनऊं रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि॥ दुर्गम काज जगत् के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते। (हनुमान चालीसा) डॉ. श्रीमोती लाल खड्डर शास्त्री (मास्टर जी) द्वारा लिखित गुरुगीता, गुरु स्तवराज एवं गुरु अष्टक के श्लोकों का हिन्दी अनुवाद करके पुस्तक रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो समस्त भक्त-जनों का मार्ग प्रशस्त करेगा, ऐसा विश्वास है। मैं माई महाराज से उनके दीर्घायु होने की कामना करते हुए प्रार्थना भी करता हूँ कि भविष्य में इसका अंग्रेजी रूपान्तर भी हो। शुभकामना सहित नरेन्द्र पंजवानी ज्योतिषाचार्य डी-563 कमला नगर, आगरा (उ०प्र०) मो.-9410875488 (13)