श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- उत्तरकाण्ड *
१००३
कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर और मर्यादासे च्युत हो गये। वे पाप करते हैं और [उनके फलस्वरूप] दुःख, भय, रोग, शोक और [प्रिय वस्तुका] वियोग पाते हैं ॥ १०० (क) ॥
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥ १०० (ख) ॥
वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं ॥ १०० (ख) ॥
छं०—बहु दाम सँवारहिं धाम जती । बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही ॥
संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयोंने हर लिया। तपस्वी धनवान् हो गये और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुगकी लीला कुछ कही नहीं जाती ॥ १ ॥
कुलवंति निकारहिं नारि सती । गृह आनहिं चेरि निबेरि गती ॥
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं । अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥
कुलवती और सती स्त्रीको पुरुष घरसे निकाल देते हैं और अच्छी चालको छोड़कर घरमें दासीको ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक स्त्रीका मुँह नहीं दिखायी पड़ा ॥ २ ॥
ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपुरूप कुटुंब भए तब तें ॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ॥
जबसे ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुटुम्बी शत्रुरूप हो गये। राजा लोग पापपरायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजाको नित्य ही [बिना अपराध] दण्ड देकर उसकी विडम्बना (दुर्दशा) किया करते हैं ॥ ३ ॥
धनवंत कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उधार तपी ॥
नहिं मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक संत सही कलि सो ॥
धनी लोग मलिन (नीच जातिके) होनेपर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विजका चिन्ह जनेऊमात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वीका। जो वेदों और पुराणोंको नहीं मानते, कलियुगमें वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं ॥ ४ ॥
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी । गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी ॥
कलि बारहिं बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ॥
१००४
- रामचरितमानस *
कवियोंके तो झुंड हो गये, पर दुनियामें उदार (कवियोंका आश्रयदाता) सुनायी नहीं पड़ता। गुणमें दोष लगानेवाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है। कलियुगमें बार-बार अकाल पड़ते हैं। अत्रके बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं ॥ ५ ॥
दो०— सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।
मान मोह मारादि मद व्यापि रहे ब्रह्मंड ॥ १०१ ( क ) ॥
हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाषण्ड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभरमें व्याप्त हो गये (छा गये) ॥ १०१ ( क ) ॥
तामस धर्मकरहिं नर जप तप व्रत मख दान।
देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥ १०१ ( ख ) ॥
मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भावसे करने लगे। देवता (इन्द्र) पृथ्वीपर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं ॥ १०१ (ख) ॥
छं०—अबला कच भूषण भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥
स्त्रियोंके बाल ही भूषण हैं (उनके शरीरपर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं।) वे धनहीन और बहुत प्रकारकी ममता होनेके कारण दुखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्ममें उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है; उनमें कोमलता नहीं है ॥ १ ॥
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान विरोध अकारनहीं ॥
लघु जीवन संबतु पंच दसा। कल्पपांत न नास गुमानु असा ॥
मनुष्य रोगोंसे पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्षका थोड़ा-सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा ॥ २ ॥
कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा ॥
नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता ॥
कलिकालने मनुष्यको बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटीका भी विचार नहीं करता। [लोगोंमें] न सन्तोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगनेवाले हो गये ॥ ३ ॥
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता ॥
सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥
- उत्तरकाण्ड *
१००५
ईर्ष्या (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गयी। सब लोग वियोग और विशेष शोकसे भरे पड़े हैं। वर्णाश्रम-धर्मके आचरण नष्ट हो गये ॥ ४ ॥
दम दान दया नहीं जानपनी । जड़ता परबंचनताति घनी ॥ तनु पोषक नारि नरा सगरे । परनिंदक जे जग मो बगरे ॥
इन्द्रियोंका दमन, दान, दया और समझदारी किसीमें नहीं रही। मूर्खता और दूसरोंको ठगना यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीरके ही पालन-पोषणमें लगे रहते हैं। जो परायी निन्दा करनेवाले हैं, जगत्में वे ही फैले हैं ॥ ५ ॥
दो०— सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ।
गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥ १०२ ( क ) ॥
हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर है। किन्तु कलियुगमें एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबन्धनसे छुटकारा मिल जाता है ॥ १०२ ( क ) ॥
कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग ।
जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥ १०२ ( ख ) ॥
सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें जो गति पूजा, यज्ञ और योगसे प्राप्त होती है, वही गति कलियुगमें लोग केवल भगवान्के नामसे पा जाते हैं ॥ १०२ ( ख ) ॥
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥
सत्ययुगमें सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरिका ध्यान करके सब प्राणी भवसागरसे तर जाते हैं। त्रेतामें मनुष्य अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं और सब कर्मोंको प्रभुके समर्पण करके भवसागरसे पार हो जाते हैं ॥ १ ॥
द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥
द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है। और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं ॥ २ ॥
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥
१००६
- रामचरितमानस *
कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है, ॥ ३ ॥
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥ कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥
वही भवसागरसे तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है। कलियुगका एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [मानसिक] पाप नहीं होते ॥ ४ ॥
दो०— कलिजुग सम जुगआन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।
गाड़ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥ १०३ ( क ) ॥
यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुगके समान दूसरा युग नहीं है। [क्योंकि] इस युगमें श्रीरामजीके निर्मल गुणसमूहोंको गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [रूपी समुद्र] से तर जाता है ॥ १०३ ( क ) ॥
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण ॥ १०३ ( ख ) ॥
धर्मके चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमेंसे कलियुगमें एक [दानरूपी] चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ॥ १०३ ( ख ) ॥
नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥ सुब्द सत्व समता बिग्याना । कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥
श्रीरामजीकी मायासे प्रेरित होकर सबके हृदयोंमें सभी युगोंके धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मनका प्रसन्न होना, इसे सत्ययुगका प्रभाव जाने ॥ १ ॥
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥ बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥
सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मोंमें प्रीति हो, सब प्रकारसे सुख हो, यह त्रेताका धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मनमें हर्ष और भय हो, यह द्वापरका धर्म है ॥ २ ॥
तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥ बुध जुग धर्म जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥
- उत्तरकाण्ड *
१००७
तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुगका प्रभाव है। पण्डित लोग युगोंके धर्मको मनमें जान (पहिचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्ममें प्रीति करते हैं ॥ ३ ॥
काल धर्म नहीं व्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥ नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न व्यापइ माया ॥
जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षिराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट-चरित्र (इन्द्रजाल) देखनेवालोंके लिये बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नटके सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती ॥ ४ ॥
दो०— हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥ १०४ ( क ) ॥
श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं जाते। मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर (निष्कामभावसे) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ॥ १०४ ( क ) ॥
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेश ।
परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥ १०४ ( ख ) ॥
हे पक्षिराज! उस कलिकालमें मैं बहुत वर्षांतक अयोध्यामें रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्तिका मारा विदेश चला गया ॥ १०४ ( ख ) ॥
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥ गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥
हे सर्पाँके शत्रु गरुड़जी! सुनिये। मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतनेपर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीँ भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा ॥ १ ॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥ परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥
एक ब्राह्मण वेदविधिसे सदा शिवजीकी पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थके ज्ञाता थे, वे शम्भुके उपासक थे, पर श्रीहरिकी निन्दा करनेवाले न थे ॥ २ ॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥ बाहिज नम्र देखि मोहि साई । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाई ॥
मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीतिके घर थे। हे स्वामी! बाहरसे नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्रकी भाँति मानकर पढ़ाते थे ॥ ३ ॥
१००८
- रामचरितमानस *
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥ जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयें दंभ अहमिति अधिकार्ई ॥
उन ब्राह्मणश्रेष्ठने मुझको शिवजीका मन्त्र दिया और अनेकों प्रकारके शुभ उपदेश किये । मैं शिवजीके मन्दिरमें जाकर मन्त्र जपता । मेरे हृदयमें दम्भ और अहंकार बढ़ गया ॥ ४ ॥
दो०— मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।
हरिजन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्णु कर द्रोह ॥ १०५ ( क ) ॥
मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धिवाला मोहवश श्रीहरिके भक्तों और द्विजोंको देखते ही जल उठता और विष्णुभगवान्से द्रोह करता था ॥ १०५ ( क ) ॥
सो०— गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरण मम ।
मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥ १०५ ( ख ) ॥
गुरुजी मेरे आचरण देखकर दुखित थे । वे मुझे नित्य ही भलीभाँति समझाते, पर [मैं कुछ भी नहीं समझता, उलटे] मुझे अत्यन्त क्रोध उत्पन्न होता । दम्भीको कभी नीति अच्छी लगती है? ॥ १०५ ( ख ) ॥
एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥
सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥
एक बार गुरुजीने मुझे बुला लिया और बहुत प्रकारसे [परमार्थ] नीतिकी शिक्षा दी कि हे पुत्र! शिवजीकी सेवाका फल यही है कि श्रीरामजीके चरणोंमें प्रगाढ़ भक्ति हो ॥ १ ॥
रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावैर कै केतिक बाता ॥
जासु चरन अज सिव अनुरागी । तासु द्रोहैं सुख चहसि अभागी ॥
हे तात! शिवजी और ब्रह्माजी भी श्रीरामजीको भजते हैं [फिर] नीच मनुष्यकी तो बात ही कितनी है? ब्रह्माजी और शिवजी जिनके चरणोंके प्रेमी हैं, अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है? ॥ २ ॥
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥
गुरुजीने शिवजीको हरिका सेवक कहा । यह सुनकर हे पक्षिराज! मेरा हृदय जल उठा । नीच जातिका मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलानेसे साँप ॥ ३ ॥
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥
- उत्तरकाण्ड *
१००९
अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति मैं दिन-रात गुरुजीसे द्रोह करता। गुरुजी अत्यन्त दयालु थे, उनको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं आता। [मेरे द्रोह करनेपर भी] वे बार-बार मुझे उत्तम ज्ञानकी ही शिक्षा देते थे ॥ ४ ॥
जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥ धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥
नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसीको मारकर उसीका नाश करता है। हे भाई! सुनिये, आगसे उत्पन्न हुआ धुआँ मेघकी पदवी पाकर उसी अग्निको बुझा देता है ॥ ५ ॥
रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥ मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥
धूल रास्तेमें निरादरसे पड़ी रहती है और सदा सब [राह चलनेवालों] के लातोंकी मार सहती है। पर जब पवन उसे उड़ाता (ऊँचा उठाता) है, तो सबसे पहले वह उसी (पवन) को भर देती है और फिर राजाओंके नेत्रों और किरीटों (मुकुटों) पर पड़ती है ॥ ६ ॥
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥ कबि कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥
हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, ऐसी बात समझकर बुद्धिमान् लोग अधम (नीच) का संग नहीं करते। कवि और पण्डित ऐसी नीति कहते हैं कि दुष्टसे न कलह ही अच्छा है, न प्रेम ही ॥ ७ ॥
उदासीन नित रहिअ गोसाई । खल परिहरिअ स्वान की नाई ॥ मैं खल हृदयें कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥
हे गोसाई! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये। दुष्टको कुतेकी तरह दूसरे ही त्याग देना चाहिये। मैं दुष्ट था, हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी। [इसीलिये यद्यपि] गुरुजी हितकी बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी ॥ ८ ॥
दो०—एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।
गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥ १०६ ( क ) ॥
एक दिन मैं शिवजीके मन्दिरमें शिवनाम जप रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आये, पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया ॥ १०६ ( क ) ॥
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवल्लेस ।
अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥ १०६ ( ख ) ॥
१०१०
- रामचरितमानस *
गुरुजी दयालु थे, [मेरा दोष देखकर भी] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदयमें लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरुका अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके ॥ १०६ (ख) ॥
मंदिर माझ भई नभबानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥ जद्यपि तव गुर कें नहीं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥
मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी! जद्यपि तेरे गुरुको क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चितके हैं और उन्हें [पूर्ण तथा] यथार्थ ज्ञान है, ॥ १ ॥
तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति विरोध सोहाइ न मोही ॥ जौं नहीं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥
तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा; [क्योंकि] नीतिका विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। अरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय ॥ २ ॥
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥
जो मूर्ख गुरुसे ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगोंतक रौरव नरकमें पड़े रहते हैं। फिर (वहाँसे निकलकर) वे तिर्यक् (पशु, पक्षी आदि) योनियोंमें शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मोंतक दुःख पाते रहते हैं ॥ ३ ॥
बैठि रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई । रहु अधमाधम अधगति पाई ॥
अरे पापी! तू गुरुके सामने अजगरकी भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पापसे ढक गयी है, [अतः] तू सर्प हो जा। और अरे अधमसे भी अधम! इस अधोगति (सर्पकी नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़के खोखलेमें जाकर रह ॥ ४ ॥
दो०—हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।
कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥ १०७ ( क ) ॥
शिवजीका भयानक शाप सुनकर गुरुजीने हाहाकार किया। मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप उत्पन्न हुआ ॥ १०७ (क) ॥
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुद्धि घोर गति मोरि ॥ १०७ ( ख ) ॥
प्रेमसहित दण्डवत् करके वे ब्राह्मण श्रीशिवजीके सामने हाथ जोड़कर मेरी भयङ्कर गति (दण्ड) का विचार कर गद्गद वाणीसे विनती करने लगे— ॥ १०७ (ख) ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०११
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ॥ निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥
हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशाके ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूपमें स्थित (अर्थात् मायादिरहित), [मायिक] गुणोंसे रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाशको ही वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले दिगम्बर [अथवा आकाशको भी आच्छादित करनेवाले] आपको मैं भजता हूँ ॥ १ ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥ करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥
निराकार, ओङ्कारके मूल, तुरीय (तीनों गुणोंसे अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियोंसे परे, कैलासपति, विकराल, महाकालके भी काल, कृपालु, गुणोंके धाम, संसारसे परे आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
तुषाराद्वि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥ स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्वालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥
जो हिमाचलके समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिरपर सुन्दर नदी गङ्गाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और गलेमें सर्प सुशोभित हैं ॥ ३ ॥
चलत्कुंडलं भू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥ मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनार्थं भजामि ॥
जिनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्मका वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [कल्याण करनेवाले] श्रीशङ्करजीको मैं भजता हूँ ॥ ४ ॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥ त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥
प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्योके समान प्रकाशवाले, तीनों प्रकारके शूलों (दुःखों) को निर्मूल करनेवाले, हाथमें त्रिशूल धारण किये, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानीके पति श्रीशङ्करजीको मैं भजता हूँ ॥ ५ ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥ चिदानंद संदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
१०१२
- रामचरितमानस *
कलाओंसे परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करनेवाले, सज्जनोंको सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुरके शत्रु, सच्चिदानन्दधन, मोहको हरनेवाले, मनको मथ डालनेवाले कामदेवके शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये ॥ ६ ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥ न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥
जबतक पार्वतीके पति आपके चरणकमलोंको मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोकमें सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापोंका नाश होता है। अतः हे समस्त जीवोंके अंदर (हृदयमें) निवास करनेवाले प्रभो! प्रसन्न हूजिये ॥ ७ ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥ जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥
मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म [मृत्यु] के दुःखसमूहोंसे जलते हुए मुझ दुखीकी दुःखसे रक्षा कीजिये। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ८ ॥
श्लोक—रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥ ९ ॥
भगवान् रुद्रकी स्तुतिका यह अष्टक उन शङ्करजीकी तुष्टि (प्रसन्नता) के लिये ब्राह्मणद्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं ॥ ९ ॥
दो०—सुनि बिनती सर्वग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥ १०८ (क) ॥
सर्वज्ञ शिवजीने बिनती सुनी और ब्राह्मणका प्रेम देखा। तब मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ! वर माँगो ॥ १०८ (क) ॥
जौँ प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥ १०८ (ख) ॥
[ब्राह्मणेने कहा—] हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीनपर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणोंकी भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिये ॥ १०८ (ख) ॥
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भूलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंधु भगवान ॥ १०८ (ग) ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०१३
हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपकी मायाके वश होकर निरन्तर भूला फिरता है। हे कृपाके समुद्र भगवान्! उसपर क्रोध न कीजिये ॥ १०८ (ग) ॥
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल ।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥ १०८ (घ) ॥
हे दीनोंपर दया करनेवाले [कल्याणकारी] शङ्कर! अब इसपर कृपालु होइये (कृपा कीजिये), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समयमें इसपर शापके बाद अनुग्रह (शापसे मुक्ति) हो जाय ॥ १०८ (घ) ॥
एहि कर होइ परम कल्याना । सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥ बिप्र गिरा सुनि परहित सानी । एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥
हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरेके हितसे सनी हुई ब्राह्मणकी वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई—‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) ॥ १ ॥
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा । मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा ॥ तदपि तुम्हारि साधुता देखी । करहिउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥
यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा ॥ २ ॥
छमासील जे पर उपकारी । ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥ मोर श्राप द्विज व्यर्थ न जाइहि । जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥
हे द्विज! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी। हे द्विज! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा। यह हजार जन्म अवश्य पावेगा ॥ ३ ॥
जनमत मरत दुसह दुख होई । एहि स्वल्पउ नहिं व्यापिहि सोई ॥ कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना । सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥
परन्तु जन्मने और मरनेमें जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। हे शूद्र! मेरा प्रामाणिक (सत्य) वचन सुन ॥ ४ ॥
रघुपति पुरीं जन्म तव भयऊ । पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥ पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें । राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥
[प्रथम तो] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी पुरीमें हुआ। फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया। पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न होगी ॥ ५ ॥
सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥ अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेसु संत अनंत समाना ॥
१०१४
- रामचरितमानस *
हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजोंकी सेवा ही भगवान्को प्रसन्न करनेवाला व्रत है। अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना। संतोंको अनन्त श्रीभगवान्हीके समान जानना ॥६॥
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरि चक्र कराला ॥ जो इन्ह कर मारा नहीं मरई । बिप्र द्रोह पावक सो जरई ॥
इन्द्रके वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालके दण्ड और श्रीहरिके विकराल चक्रके मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रदोहरूपी अग्निसे भस्म हो जाता है ॥७॥
अस बिबेक राखेहु मन माहीं । तुम्ह कहैं जग दुर्लभ कछु नाहीं । औरउ एक आसिषा मोरी । अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥
ऐसा विवेक मनमें रखना। फिर तुम्हारे लिये जगत्में कुछ भी दुर्लभ न होगा। मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति होगी (अर्थात् तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहाँ बिना रोक-टोकके जा सकोगे) ॥८॥
दो०— सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि ।
मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥ १०९ ( क ) ॥
[आकाशवाणीके द्वारा] शिवजीके वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर 'ऐसा ही हो' यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजीके चरणोंको हृदयमें रखकर अपने घर गये ॥१०९ (क)॥
प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल ।
पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गऐ कछु काल ॥ १०९ ( ख ) ॥
कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचलमें जाकर सर्प हुआ। फिर कुछ काल बीतनेपर बिना ही परिश्रम (कष्ट) के मैंने वह शरीर त्याग दिया ॥१०९ (ख)॥
जोड़ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ।
जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥ १०९ ( ग ) ॥
हे हरिवाहन! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है ॥१०९ (ग)॥
सिर्वे राखी श्रुति नीति अरु मैं नहीं पावा क्लेस ।
एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥ १०९ ( घ ) ॥
शिवजीने वेदकी मर्यादाकी रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षिराज! मैंने बहुत-से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया ॥१०९ (घ)॥
त्रिजग देव नर जोड़ तनु धरऊँ । तहैं तहैं राम भजन अनुसरऊँ ॥
एक सूल मोहि बिसर न काऊ । गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०१५
तिर्यक् योनि (पशु-पक्षी), देवता या मनुष्यका, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस-उस शरीरमें) मैं श्रीरामजीका भजन जारी रखता। [इस प्रकार मैं सुखी हो गया] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा। गुरुजीका कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात् मैंने ऐसे कोमल-स्वभाव दयालु गुरुका अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा) ॥ १ ॥
चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥ खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥
मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मणका पाया, जिसे पुराण और वेद देवताओंको भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण-शरीरमें) भी बालकोंमें मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजीकी ही सब लीलाएँ किया करता ॥ २ ॥
प्रीढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा॥ मन ते सकल वासना भागी। केवल राम चरन लय लागी॥
सयाना होनेपर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और विचारता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मेरे मनसे सारी वासनाएँ भाग गयीं। केवल श्रीरामजीके चरणोंमें लव लग गयी ॥ ३ ॥
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥ प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥
हे गरुड़जी! कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनुको छोड़कर गदहीकी सेवा करेगा? प्रेममें मग्न रहनेके कारण मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर हार गये ॥ ४ ॥
भाए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥ जहाँ जहाँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥
जब पिता-माता कालवश हो गये (मर गये), तब मैं भक्तोंकी रक्षा करनेवाले श्रीरामजीका भजन करनेके लिये वनमें चला गया। वनमें जहाँ-जहाँ मुनीश्वरोंके आश्रम पाता, वहाँ-वहाँ जा-जाकर उन्हें सिर नवाता ॥ ५ ॥
बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥ सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥
हे गरुड़जी! उनसे मैं श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता। इस प्रकार मैं सदा-सर्वदा श्रीहरिके गुणानुवाद सुनता फिरता। शिवजीकी कृपासे मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी (अर्थात् मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था) ॥ ६ ॥
१०१६
- रामचरितमानस *
छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥
मेरी तीनों प्रकारकी (पुत्रकी, धनकी और मानकी) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं और हृदयमें एक यही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजीके चरणकमलोंके दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझूँ॥७॥
जेहि पूछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्व भूतमय अहई॥ निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥
जिनसे मैं पूछता, वे ही मुनि ऐसा कहते कि ईश्वर सर्वभूतमय है। यह निर्गुण मत मुझे नहीं सुहाता था। हृदयमें सगुण ब्रह्मपर प्रीति बढ़ रही थी॥८॥
दो०—गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।
रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥ ११० ( क )॥
गुरुजीके वचनोंका स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजीके चरणोंमें लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीरघुनाथजीका यश गाता फिरता था॥११० (क)॥
मेरु सिरवर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।
देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन॥ ११० ( ख )॥
सुमेरुपर्वतके शिखरपर बड़की छायाँमें लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने उनके चरणोंमें सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे॥११० (ख)॥
मुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज।
मोहि सादर पूछत भए द्विज आयहु केहि काज॥ ११० ( ग )॥
हे पक्षिराज! मेरे अत्यन्त नम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि मुझसे आदरके साथ पूछने लगे—हे ब्राह्मण! आप किस कार्यसे यहाँ आये हैं॥११० (ग)॥
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्वग्य सुजान।
सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥ ११० ( घ )॥
तब मैंने कहा—हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं। हे भगवन्! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधना [की प्रक्रिया] कहिये॥११० (घ)॥
तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी। मोहि परम अधिकारी जानी॥
तब हे पक्षिराज! मुनीश्वरने श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कुछ कथाएँ आदरसहित कहीं। फिर वे ब्रह्मज्ञानपरायण विज्ञानवान् मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर—॥१॥
- उत्तरकाण्ड *
१०१७
लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वैत अगुन हृदयेसा ॥ अकल अनीह अनाम अरूपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥
ब्रह्मका उपदेश करने लगे कि वह अजन्मा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदयका स्वामी (अन्तर्यामी) है। उसे कोई बुद्धिके द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित अनुभवसे जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है, ॥ २ ॥
मन गोतीत अमल अविनासी । निर्बिंकार निरवधि सुख रासी ॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहिं बेदा ॥
वह मन और इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्बिंकार, सीमारहित और सुखकी राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत्त्वमसि), जल और जलकी लहरकी भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है ॥ ३ ॥
बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुद्गावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥
मुनिने मुझे अनेकों प्रकारसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें नहीं बैठा। मैंने फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर कहा—हे मुनीश्वर! मुझे सगुण ब्रह्मकी उपासना कहिये ॥ ४ ॥
राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥ सोइ उपदेस कहहु करि दया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥
मेरा मन रामभक्तिरूपी जलमें मछली हो रहा है (उसीमें रम रहा है)। हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशामें वह उससे अलग कैसे हो सकता है? आप दया करके मुझे वही उपदेश (उपाय) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजीको अपनी आँखोंसे देख सकूँ ॥ ५ ॥
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥ मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥
[पहले] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथको देखकर, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मतका खण्डन करके निर्गुणका निरूपण किया ॥ ६ ॥
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥ उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥
तब मैं निर्गुण मतको हटाकर (काटकर) बहुत हठ करके सगुणका निरूपण करने लगा। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, इससे मुनिके शरीरमें क्रोधके चिह्न उत्पन्न हो गये ॥ ७ ॥
१०१८
- रामचरितमानस *
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानन्ह के हिऐँ॥ अति संघरषन जौँ कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥
हे प्रभो! सुनिये, बहुत अपमान करनेपर ज्ञानीके भी हृदयमें क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दनकी लकड़ीको बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जायगी॥ ८ ॥
दो०—बारंबार सकोप मुनि करड़ निरूपण ग्यान।
मैं अपने मन बैठ तब करउँ बिबिधि अनुमान॥ १११ ( क )॥
मुनि बार-बार क्रोधसहित ज्ञानका निरूपण करने लगे। तब मैं बैठ-बैठा अपने मनमें अनेकों प्रकारके अनुमान करने लगा॥ १११ ( क )॥
क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।
मायाबस परिच्छिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥ १११ ( ख )॥
बिना द्वैतबुद्धिके क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वरके समान हो सकता है?॥ १११ ( ख )॥
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥
परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥
सबका हित चाहनेसे क्या कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास क्या दरिद्रता रह सकती है? दूसरेसे द्रोह करनेवाले क्या निर्भय हो सकते हैं और कामी क्या कलङ्करहित (बेदाग) रह सकते हैं?॥ १ ॥
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥
काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥
ब्राह्मणका बुरा करनेसे क्या वंश रह सकता है? स्वरूपकी पहिचान (आत्मज्ञान) होनेपर क्या [आसक्तिपूर्वक] कर्म हो सकते हैं? दुष्टोंके सङ्गसे क्या किसीके सुबुद्धि उत्पन्न हुई है? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है?॥ २ ॥
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक॥
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥
परमात्माको जाननेवाले कहीं जन्म-मरण [के चक्कर] में पड़ सकते हैं? भगवान्की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरिके चरित्र वर्णन करनेपर क्या पाप रह सकते हैं?॥ ३ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०११
पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥ लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥
बिना पुण्यके क्या पवित्र यश [प्राप्त] हो सकता है? बिना पापके भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं उस हरि-भक्तिके समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है? ॥ ४ ॥
हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥ अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥
हे भाई! जगत्में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्यका शरीर पाकर भी श्रीरामजीका भजन न किया जाय? चुगलखोरीके समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे गरुड़जी! दयाके समान क्या कोई दूसरा धर्म है? ॥ ५ ॥
एहि बिधि अमिति जुगति मन गुनऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥ पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा । तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा ॥
इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मनमें विचारता था और आदरके साथ मुनिका उपदेश नहीं सुनता था। जब मैंने बार-बार सगुणका पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोधयुक्त वचन बोले— ॥ ६ ॥
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि । उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥ सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही ॥
अरे मूढ़! मैं तुझे सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ, तो भी तू उसे नहीं मानता और बहुत-से उत्तर-प्रत्युत्तर (दलीलें) लाकर रखता है। मेरे सत्य वचनपर विश्वास नहीं करता! कौएकी भाँति सभीसे डरता है ॥ ७ ॥
सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला । सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥ लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई । नहिं कछु भय न दीनता आई ॥
अरे मूर्ख! तेरे हृदयमें अपने पक्षका बड़ा भारी हठ है, अतः तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनन्दके साथ मुनिके शापको सिरपर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आयी ॥ ८ ॥
दो०—तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥ ११२ ( क ) ॥
तब मैं तुरंत ही कौआ हो गया। फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर और रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीका स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला ॥ ११२ (क) ॥
१०२०
- रामचरितमानस *
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥ ११२ (ख) ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें? ॥ ११२ (ख) ॥
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन । उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥ कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी । लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी ॥
[काकभुशुण्डिजीने कहा—] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, इसमें ऋषिका कुछ भी दोष नहीं था। रघुवंशके विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदयमें प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपासागर प्रभुने मुनिकी बुद्धिको भोली करके (भुलावा देकर) मेरे प्रेमकी परीक्षा ली ॥ १ ॥
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना । मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥ रिषि मम महत सीलता देखी । राम चरन बिस्वास बिसेषी ॥
मन, वचन और कर्मसे जब प्रभुने मुझे अपना दास जान लिया, तब भगवान्ने मुनिकी बुद्धि फिर पलट दी। ऋषिने मेरा महान् पुरुषोंका-सा स्वभाव (धैर्य, अक्रोध, विनय आदि) और श्रीरामजीके चरणोंमें विशेष विश्वास देखा, ॥ २ ॥
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥ मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा । हरषित राममंत्र तब दीन्हा ॥
तब मुनिने बहुत दुःखके साथ बार-बार पछताकर मुझे आदरपूर्वक बुला लिया। उन्होंने अनेकों प्रकारसे मेरा सन्तोष किया और तब हरषित होकर मुझे राममन्त्र दिया ॥ ३ ॥
बालकरूप राम कर ध्याना । कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥ सुंदर सुखद मोहि अति भावा । सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा ॥
कृपानिधान मुनिने मुझे बालकरूप श्रीरामजीका ध्यान (ध्यानकी विधि) बतलाया। सुन्दर और सुख देनेवाला यह ध्यान मुझे बहुत ही अच्छा लगा। वह ध्यान मैं आपको पहले ही सुना चुका हूँ ॥ ४ ॥
मुनि मोहि कछुक काल तहाँ राखा । रामचरितमानस तब भाषा ॥ सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥
मुनिने कुछ समयतक मुझको वहाँ (अपने पास) रखा। तब उन्होंने रामचरितमानस वर्णन किया। आदरपूर्वक मुझे यह कथा सुनाकर फिर मुनि मुझसे सुन्दर वाणी बोले— ॥ ५ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०२१
रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा॥ तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी॥
हे तात! यह सुन्दर और गुप्त रामचरितमानस मैंने शिवजीकी कृपासे पाया था। तुम्हें श्रीरामजीका 'निज भक्त' जाना, इसीसे मैंने तुमसे सब चरित्र विस्तारके साथ कहा॥६॥
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥ मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥
हे तात! जिनके हृदयमें श्रीरामजीकी भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये। मुनिने मुझे बहुत प्रकारसे समझाया। तब मैंने प्रेमके साथ मुनिके चरणोंमें सिर नवाया॥७॥
निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा॥ राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें॥
मुनीश्वरने अपने कर-कमलोंसे मेरा सिर स्पर्श करके हर्षित होकर आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपासे तेरे हृदयमें सदा प्रगाढ़ रामभक्ति बसेगी॥८॥
दो०— सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान।
कामरूप इच्छामरन ग्यान विराग निधान॥ ११३ ( क )॥
तुम सदा श्रीरामजीको प्रिय होओ और कल्याणरूप गुणोंके धाम, मानरहित इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, इच्छामृत्यु (जिसकी शरीर छोड़नेकी इच्छा करनेपर ही मृत्यु हो, बिना इच्छाके मृत्यु न हो), एवं ज्ञान और वैराग्यके भण्डार होओ॥ ११३ ( क )॥
जैहँ आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत।
व्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥ ११३ ( ख )॥
इतना ही नहीं, श्रीभगवान्को स्मरण करते हुए तुम जिस आश्रममें निवास करोगे वहाँ एक योजन (चार कोस) तक अविद्या (माया-मोह) नहीं व्यापेगी॥ ११३ ( ख )॥
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न व्यापिहि काऊ॥
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥
काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभावसे उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा। अनेकों प्रकारके सुन्दर श्रीरामजीके रहस्य (गुप्त मर्मके चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)॥ १॥
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥
जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥
१०२२
- रामचरितमानस *
तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजीके चरणोंमें तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मनमें तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरिकी कृपासे उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी ॥ २ ॥
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा । ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा ॥ एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी । यह मम भगत कर्म मन बानी ॥
हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, मुनिका आशीर्वाद सुनकर आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही (सत्य) हो। यह कर्म, मन और वचनसे मेरा भक्त है ॥ ३ ॥
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ । प्रेम मगन सब संसय गयऊ ॥ करि बिनती मुनि आयसु पाई । पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई ॥
आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। मैं प्रेममें मग्न हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा। तदनन्तर मुनिकी विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरणकमलोंमें बार-बार सिर नवाकर— ॥ ४ ॥
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ । प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ ॥ इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा । बीते कल्प सात अरु बीसा ॥
मैं हर्षसहित इस आश्रममें आया। प्रभु श्रीरामजीकी कृपासे मैंने दुर्लभ वर पा लिया। हे पक्षिराज! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गये ॥ ५ ॥
करउँ सदा रघुपति गुन गाना । सादर सुनहिं बिहंग सुजाना ॥ जब जब अवधपुरीं रघुबीरा । धरहिं भगत हित मनुज सरीरा ॥
मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजीके गुणोंका गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। अयोध्यापुरीमें जब-जब श्रीरघुवीर भक्तोंके [हितके] लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं, ॥ ६ ॥
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ । सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ ॥ पुनि उर राखि राम सिसुरुपा । निज आश्रम आवउँ खगभूपा ॥
तब-तब मैं जाकर श्रीरामजीकी नगरीमें रहता हूँ और प्रभुकी शिशुलीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ। फिर हे पक्षिराज! श्रीरामजीके शिशुरूपको हृदयमें रखकर मैं अपने आश्रममें आ जाता हूँ ॥ ७ ॥
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई । काग देह जेहिं कारन पाई ॥ कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी । राम भगति महिमा अति भारी ॥