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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥ श्रीराम ॥

81

श्रीमद्भोस्वामी तुलसीदासजीविरचित

श्रीरामचरितमानस

[ सचित्र, सटीक, मोटा टाइप ]

श्री सहित दिनकर बंस भूषण काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई॥ मुकुटांगदादि बिचित्र भूषण अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे॥

टीकाकार—हनुमानप्रसाद पोद्दार

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॥ श्रीहरिः ॥

निवेदन

श्रीरामचरितमानसका स्थान हिंदी-साहित्यमें ही नहीं, जगत्के साहित्यमें निराला है। इसके जोड़का ऐसा ही सर्वाङ्गसुन्दर, उत्तम काव्यके लक्षणोंसे युक्त, साहित्यके सभी रसोंका आस्वादन करानेवाला, काव्यकलाकी दृष्टिसे भी सर्वोच्च कोटिका तथा आदर्श गाहस्थ-जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पातिव्रतधर्म, आदर्श भ्रातृधर्मके साथ-साथ सर्वोच्च भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य तथा सदाचारकी शिक्षा देनेवाला, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध और युवा—सबके लिये समान उपयोगी एवं सर्वोपरि सगुण-साकार भगवान्की आदर्श मानवलीला तथा उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेमके गहन तत्त्वको अत्यन्त सरल, रोचक एवं ओजस्वी शब्दोंमें व्यक्त करनेवाला कोई दूसरा ग्रन्थ हिंदी-भाषामें ही नहीं, कदाचित् संसारकी किसी भाषामें आजतक नहीं लिखा गया। यही कारण है कि जितने चावसे गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित, गृहस्थ-संन्यासी, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध—सभी श्रेणीके लोग इस ग्रन्थरत्नको पढ़ते हैं, उतने चावसे और किसी ग्रन्थको नहीं पढ़ते तथा भक्ति, ज्ञान, नीति, सदाचारका जितना प्रचार जनतामें इस ग्रन्थसे हुआ है, उतना कदाचित् और किसी ग्रन्थसे नहीं हुआ।

जिस ग्रन्थका जगत्में इतना मान हो, उसके अनेकों संस्करणोंका छपना तथा उसपर अनेकों टीकाओंका लिखा जाना स्वाभाविक ही है। इस नियमके अनुसार श्रीरामचरितमानसके भी आजतक सैकड़ों संस्करण छप चुके हैं। इसपर सैकड़ों ही टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। हमारे गीता-पुस्तकालयमें रामायण-सम्बन्धी सैकड़ों ग्रन्थ भिन्न-भिन्न भाषाओंके आ चुके हैं। अबतक अनुमानतः इसकी लाखों प्रतियाँ छप चुकी होंगी। आये दिन इसका एक-न-एक नया संस्करण देखनेको मिलता है और उसमें अन्य संस्करणोंकी अपेक्षा कोई-न-कोई विशेषता अवश्य रहती है। इसके पाठके सम्बन्धमें भी रामायणी विद्वानोंमें बहुत मतभेद है, यहाँतक कि कई स्थलोंमें तो प्रत्येक चौपाईमें एक-न-एक पाठभेद भिन्न-भिन्न संस्करणोंमें मिलता है। जितने पाठभेद इस ग्रन्थके मिलते हैं, उतने कदाचित् और किसी प्राचीन ग्रन्थके नहीं मिलते। इससे भी इसकी सर्वोपरि लोकप्रियता सिद्ध होती है।

इसके अतिरिक्त रामचरितमानस एक आशीर्वादत्मक ग्रन्थ है। इसके प्रत्येक पद्यको श्रद्धालु लोग मन्त्रवत् आदर देते हैं और इसके पाठसे लौकिक एवं पारमार्थिक अनेक कार्य सिद्ध करते हैं। यही नहीं, इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने तथा इसमें आये हुए उपदेशोंका विचारपूर्वक मनन करने एवं उनके अनुसार आचरण करनेसे तथा इसमें वर्णित भगवान्की मधुर लीलाओंका चिन्तन एवं कीर्तन करनेसे मोक्षरूप परम पुरुषार्थ एवं उससे भी बढ़कर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति आसानीसे की जा सकती है। क्यों न हो, जिस ग्रन्थकी रचना गोस्वामी

[४]

तुलसीदासजी-जैसे अनन्य भगवद्भक्तके द्वारा, जिन्होंने भगवान् श्रीसीतारामजीकी कृपासे उनकी दिव्य लीलाओंका प्रत्यक्ष अनुभव करके यथार्थ रूपमें वर्णन किया है, साक्षात् भगवान् श्रीगौरीशंकरजीकी आज्ञासे हुई तथा जिसपर उन्हीं भगवान्ने 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' लिखकर अपने हाथसे सही की, उसका इस प्रकारका अलौकिक प्रभाव कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। ऐसी दशामें इस अलौकिक ग्रन्थका जितना भी प्रचार किया जायगा, जितना अधिक पठन-पाठन एवं मनन-अनुशीलन होगा, उतना ही जगत्का मङ्गल होगा—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। वर्तमान समयमें तो, जब सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है, सारा संसार दुःख एवं अशान्तिकी भीषण ज्वालासे जल रहा है, जगत्के कोने-कोनेमें मार-काट मची हुई है और प्रतिदिन हजारों मनुष्योंका संहार हो रहा है, करोड़ों-अरबोंकी सम्पत्ति एक-दूसरेके विनाशके लिये खर्च की जा रही है, विज्ञानकी सारी शक्ति पृथ्वीको श्मशानके रूपमें परिणत करनेमें लगी हुई है, संसारके बड़े-से-बड़े मस्तिष्क संहारके नये-नये साधनोंको दृढ़ निकालनेमें व्यस्त हैं, जगत्में सुख-शान्ति एवं प्रेमका प्रसार करने तथा भगवत्कृपाका जीवनमें अनुभव करनेके लिये रामचरितमानसका पाठ एवं अनुशीलन परम आवश्यक है।

इसी दृष्टिसे गीताकी भाँति मानसके भी कई छोटे-बड़े यथासाध्य शुद्ध, प्रामाणिक, सस्ते, सचित्र एवं सटीक संस्करण निकालनेका आयोजन गीताप्रेसके द्वारा किया जा रहा है। इस संस्करणमें दोहे-चौपाइयोंका अर्थ वही है, जो 'मानसाङ्क'में था। पाठ एवं अर्थकी भूलोंके लिये हम अपने विज्ञ पाठक महानुभावोंसे क्षमा-प्रार्थना करते हैं और भगवान्की वस्तु विनम्रभावसे भगवान्की सेवामें अर्पण करते हैं।

विनीत—प्रकाशक

॥ श्रीहरिः ॥

श्रीरामचरितमानसकी

विषय-सूची

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१- नवाह्नपारायणके विश्राम-स्थान .....१२२२- पतिके अपमानसे दुःखी होकर सतीका
२- मासपारायणके विश्राम-स्थान .....१२योगाग्निसे जल जाना, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस ८३
३- पारायण-विधि .....१३२३- पार्वतीका जन्म और तपस्या .....८४
बालकाण्ड२४- श्रीरामजीका शिवजीसे विवाहके
४- मंगलाचरण .....१७लिये अनुरोध .....९३
५- गुरु-वन्दना .....१९२५- सप्तर्षियोंकी परीक्षामें पार्वतीजीका
६- ब्राह्मण-संत-वन्दना .....२०महत्त्व .....९४
७- खल-वन्दना .....२३२६- कामदेवका देवकार्यके लिये जाना
८- संत-असंत-वन्दना .....२४और भस्म होना .....९८
९- रामरूपसे जीवमात्रकी वन्दना .....२७२७- रतिको वरदान .....१०२
१०- तुलसीदासजीकी दीनता और२८- देवताओंका शिवजीसे ब्याहके लिये
रामभक्तिमयी कविताकी महिमा .....२८प्रार्थना करना, सप्तर्षियोंका पार्वतीके
११- कवि-वन्दना .....३५पास जाना .....१०३
१२- वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता,२९- शिवजीकी विचित्र बारात और
शिव, पार्वती आदिकी वन्दना .....३६विवाहकी तैयारी .....१०७
१३- श्रीसीताराम-धाम-परिकर-वन्दना ....३८३०- शिवजीका विवाह .....११५
१४- श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमा....४१३१- शिव-पार्वती-संवाद .....१२१
१५- श्रीरामगुण और श्रीरामचरितकी३२- अवतारके हेतु .....१३२
महिमा .....४९३३- नारदका अभिमान और मायाका प्रभाव १३८
१६- मानसनिर्माणकी तिथि .....५५३४- विश्वमोहिनीका स्वयंवर, शिवगणोंको
१७- मानसका रूप और माहात्म्य .....५६तथा भगवान्को शाप और नारदका
१८- याज्ञवल्क्य-भरद्वाज-संवादमोह-भंग .....१४०
तथा प्रयाग-माहात्म्य .....६६३५- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान .....१५०
१९- सतीका भ्रम, श्रीरामजीका ऐश्वर्य३६- प्रतापभानुकी कथा .....१५९
और सतीका खेद .....७१३७- रावणादिका जन्म, तपस्या और उनका
२०- शिवजीद्वारा सतीका त्याग, शिवजीकीऐश्वर्य तथा अत्याचार .....१७७
समाधि .....७७३८- पृथ्वी और देवतादिकी करुण पुकार १८५
२१- सतीका दक्ष-यज्ञमें जाना .....८२३९- भगवान्का वरदान .....१८८

[६]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
४०- राजा दशरथका पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियोंका
गर्भवती होना.....१९०५९- बारातका जनकपुरमें आना
और स्वागतादि .....२८८
४१- श्रीभगवान्का प्राकट्य और
बाललीलाका आनन्द .....१९२६०- श्रीसीता-राम-विवाह .....३०६
४२- विश्वामित्रका राजा दशरथसे राम-
लक्ष्मणको माँगना .....२०५६१- बारातका अयोध्या लौटना और
अयोध्यामें आनन्द.....३२६
४३- विश्वामित्र-यज्ञकी रक्षा .....२०८६२- श्रीरामचरित सुनने-गानेकी महिमा...३४१
४४- अहल्या-उद्धार.....२०९अयोध्याकाण्ड
४५- श्रीराम-लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका
जनकपुरमें प्रवेश.....२११६३- मंगलाचरण .....३४३
४६- श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी
प्रेम-मुग्धता .....२१३६४- रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी
व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे
उनकी प्रार्थना .....३४८
४७- श्रीराम-लक्ष्मणका जनकपुर-निरीक्षण... २१६२१६६५- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना,
कैकेयी-मन्थरा-संवाद .....३५३
४८- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका
प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका
परस्पर दर्शन .....२२३६६- कैकेयीका कोपभवनमें जाना .....३६२
४९- श्रीसीताजीका पार्वती-पूजन एवं
वरदानप्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण-संवाद २२९२२९६७- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-
शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और
वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें
भेजना .....३६४
५०- श्रीराम-लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका
यज्ञशालामें प्रवेश .....२३५६८- श्रीराम-कैकेयी-संवाद .....३७७
५१- श्रीसीताजीका यज्ञशालामें
प्रवेश .....२४२६९- श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवध-
वासियोंका विषाद, कैकेयीको
समझाना .....३८१
५२- बन्दीजनोंद्वारा जनकप्रतिज्ञाकी
घोषणा .....२४३७०- श्रीराम-कौसल्या-संवाद .....३८७
५३- राजाओंसे धनुष न उठना,
जनककी निराशाजनक वाणी .....२४४७१- श्रीसीता-राम-संवाद.....३९४
५४- श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध .....२४५७२- श्रीराम-कौसल्या-सीता-संवाद .....४००
५५- धनुषभंग .....२५२७३- श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद .....४०२
५६- जयमाल पहनाना .....२५५७४- श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद .....४०४
५७- श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद २६०२६०७५- श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजीका
महाराज दशरथके पास विदा माँगने
जाना, दशरथजीका सीताजीको समझाना .४०६
५८- दशरथजीके पास जनकजीका
दूत भेजना, अयोध्यासे बारातका
प्रस्थान .....२७३७६- श्रीराम-सीता-लक्ष्मणका वनगमन
और नगर-निवासियोंको सोये
छोड़कर आगे बढ़ना .....४०९

[७]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
७७- श्रीरामका शृङ्गवेरपुर पहुँचना,
निषादके द्वारा सेवा .....४१५९५- भरद्वाजद्वारा भरतका सत्कार .....५२०
७८- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-
सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका
लौटना .....४१८९६- इन्द्र-बृहस्पति-संवाद .....५२४
७९- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना .४२६९७- भरतजी चित्रकूटके मार्गमें .....५२७
८०- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद,
यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम .....४३०९८- श्रीसीताजीका स्वप्न, श्रीरामजीको
कोल-किरातोंद्वारा भरतजीके
आगमनकी सूचना, रामजीका शोक,
लक्ष्मणजीका क्रोध .....५३१
८१- तापस-प्रकरण .....४३५९९- श्रीरामजीका लक्ष्मणजीको समझाना
एवं भरतजीकी महिमा कहना .....५३६
८२- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम .४३६१००- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान,
चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका
परस्पर मिलाप, पिताका शोक
और श्राद्ध .....५३७
८३- श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद .....४४७१०१- वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका
सत्कार, कैकेयीका पश्चात्ताप .....५५१
८४- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके
द्वारा सेवा .....४५४१०२- श्रीवसिष्ठजीका भाषण .....५५५
८५- सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और
सर्वत्र शोक देखना .....४६२१०३- श्रीराम-भरतादिका संवाद .....५६०
८६- दशरथ-सुमन्त्र-संवाद, दशरथ-मरण .४६७१०४- जनकजीका पहुँचना, कोल-
किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर
मिलाप .....५७१
८७- मुनि वसिष्ठका भरतजीको बुलानेके
लिये दूत भेजना .....४७३१०५- कौसल्या-सुनयना-संवाद,
श्रीसीताजीका शील .....५७८
८८- श्रीभरत-शत्रुघ्नका आगमन
और शोक .....४७४१०६- जनक-सुनयना-संवाद,
भरतजीकी महिमा .....५८४
८९- भरत-कौसल्या-संवाद और
दशरथजीकी अन्त्येष्टि क्रिया .....४७९१०७- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी
चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको
समझाना .....५८७
९०- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको
लानेके लिये चित्रकूट जानेकी
तैयारी .....४८४१०८- श्रीराम-भरत-संवाद .....५९२
९१- अयोध्यावासियोंसहित श्रीभरत-
शत्रुघ्न आदिका वनगमन .....४९६१०९- भरतजीका तीर्थ-जल-स्थापन तथा
चित्रकूटभ्रमण .....६०३
९२- निषादकी शङ्खा और सावधानी .....४९९११०- श्रीराम-भरत-संवाद, पादुका-प्रदान,
भरतजीकी विदाई .....६०६
९३- भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं
भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम५०३
९४- भरतजीका प्रयाग जाना और
भरत-भरद्वाज-संवाद .....५१२

[८]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१११-भरतजीका अयोध्या लौटना,
भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना,
नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके
चरित्र-श्रवणकी महिमा .....६०९१२७-शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-
उपदेश और पम्पासरकी ओर
प्रस्थान .....६६६
अरण्यकाण्ड१२८-नारद-राम-संवाद .....६७४
११२-मंगलाचरण .....६१९१२९-संतोंके लक्षण और सत्संग-
भजनके लिये प्रेरणा .....६७८
११३-जयन्तकी कुटिलता और फलप्राप्ति .....६२०किष्किन्धाकाण्ड
११४-अत्रि-मिलन एवं स्तुति .....६२२१३०-मंगलाचरण .....६८१
११५-श्रीसीता-अनसूया-मिलन और
श्रीसीताजीको अनसूयाजीका
पातिव्रतधर्म कहना .....६२५१३१-श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना
और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता .....६८२
११६-श्रीरामजीका आगे प्रस्थान, विराध-
वध और शरभङ्ग-प्रसङ्ग .....६२८१३२-सुग्रीवका दुःख सुनाना, बालिवधकी
प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र-
लक्षण-वर्णन .....६८६
११७-राक्षस-वधकी प्रतिज्ञा करना .....६३०१३३-सुग्रीवका वैराग्य .....६८९
११८-सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन,
अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-
वन-प्रवेश और जटायु-मिलन .....६३११३४-बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धार...६९०
११९-पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-
लक्ष्मण-संवाद .....६३८१३५-ताराका विलाप, ताराको श्रीरामजी-
द्वारा उपदेश और सुग्रीवका राज्याभिषेक
तथा अंगदको युवराजपद .....६९३
१२०-शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका
खर-दूषणके पास जाना और
खर-दूषणादिका वध .....६४११३६-वर्षा-ऋतु-वर्णन .....६९५
१२१-शूर्पणखाका रावणके निकट जाना,
श्रीसीताजीका अग्नि-प्रवेश और
माया-सीता .....६४९१३७-शरद-ऋतु-वर्णन .....६९७
१२२-मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें
मारीचका मारा जाना .....६५२१३८-श्रीरामकी सुग्रीवपर नाराजी,
लक्ष्मणजीका कोप .....६९९
१२३-श्रीसीताहरण और श्रीसीता-विलाप .....६५७१३९-सुग्रीव-राम-संवाद और
सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका
प्रस्थान .....७०१
१२४-जटायु-रावण-युद्ध .....६५८१४०-गुफामें तपस्विनीके दर्शन .....७०५
१२५-श्रीरामजीका विलाप, जटायुका
प्रसंग .....६६०१४१-वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे
भेंट और बातचीत .....७०५
१२६-कबन्ध-उद्धार .....६६५१४२-समुद्र लॉघनेका परामर्श, जाम्बवन्तका
हनुमान्जीको बल याद दिलाकर
उत्साहित करना .....७०९
१४३-श्रीरामगुणका माहात्म्य .....७११

[९]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
सुन्दरकाण्ड
१४४-मंगलाचरण .....७१३१५९-विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति .....७५२
१४५-हनुमान्जीका लङ्काको प्रस्थान, सुरसासे भेंट, छाया पकड़नेवाली राक्षसीका वध .....७१४१६०-समुद्र पार करनेके लिये विचार, रावणदूत शुक्का आना और लक्ष्मणजीके पत्रको लेकर लौटना .....७५९
१४६-लङ्कावर्णन, लङ्कानीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेश .....७१६१६१-दूतका रावणको समझाना और लक्ष्मणजीका पत्र देना .....७६२
१४७-हनुमान्-विभीषण-संवाद .....७२०१६२-समुद्रपर श्रीरामजीका क्रोध और समुद्रकी विनती .....७६६
१४८-हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें सीताको देखकर दुःखी होना और रावणका सीताजीको भय दिखलाना .....७२२१६३-श्रीराम-गुणगानकी महिमा .....७६९
१४९-श्रीसीता-त्रिजटा-संवाद .....७२४लङ्काकाण्ड
१५०-श्रीसीता-हनुमान्-संवाद .....७२६१६४-मंगलाचरण .....७७१
१५१-हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें बाँधकर सभामें ले जाना .....७३०१६५-नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना .....७७३
१५२-हनुमान्-रावण-संवाद .....७३३१६६-श्रीरामजीका सेनासहित समुद्र पार उत्तरना, सुबेल पर्वतपर निवास, रावणकी व्याकुलता .....७७६
१५३-लङ्का-दहन .....७३७१६७-रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाद .....७७७
१५४-लङ्का जलानेके बाद हनुमान्जीका सीताजीसे विदा माँगना और चूड़ामणि पाना .....७३८१६८-सुबेलपर श्रीरामजीकी झाँकी और चन्द्रोदयवर्णन .....७८२
१५५-समुद्रके इस पार आना, सबका लौटना, मधुवन-प्रवेश, सुग्रीव-मिलन, श्रीराम-हनुमान्-संवाद .....७३९१६९-श्रीरामजीके बाणसे रावणके मुकुट-छत्रादिका गिरना .....७८४
१५६-श्रीरामजीका वानरोँकी सेनाके साथ चलकर समुद्रतटपर पहुँचना .....७४५१७०-मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहना ....७८५
१५७-मन्दोदरी-रावण-संवाद .....७४७१७१-अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद .....७८८
१५८-रावणको विभीषणका समझाना और विभीषणका अपमान .....७४९१७२-रावणको पुनः मन्दोदरीका समझाना .....८०७
१७३-अंगद-राम-संवाद .....८०९
१७४-युद्धारम्भ .....८११

$$[१०]$$

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१७५-माल्यवान्‌का रावणको समझाना ...८१९१८९-रावण-हनुमान्-युद्ध, रावणका माया रचना, रामजीद्वारा माया-नाश ......८६८
१७६-लक्ष्मण-मेघनाद-युद्ध, लक्ष्मणजीको शक्ति लगना ........................८२४१९०-घोर युद्ध, रावणकी मूर्च्छा ..........८७१
१७७-हनुमान्‌जीका सुषेण वैद्यको लाना एवं संजीवनीके लिये जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार .............८२५१९१-त्रिजटा-सीता-संवाद ..................८७३
१७८-भरतजीके बाणसे हनुमान्‌का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान्-संवाद ........८२८१९२-राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि .............................८७६
१७९-श्रीरामजीकी प्रलापलीला, हनुमान्‌जीका लौटना, लक्ष्मणजीका उठ बैठना ............................८२९१९३-मन्दोदरी-विलाप, रावणकी अन्त्येष्टि-क्रिया .........................८८१
१८०-रावणका कुम्भकर्णको जगाना, कुम्भकर्णका रावणको उपदेश और विभीषण-कुम्भकर्ण-संवाद ...८३२१९४-विभीषणका राज्याभिषेक ...........८८४
१८१-कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति८३४१९५-हनुमान्‌जीका सीताजीको कुशल सुनाना, सीताजीका आगमन और अग्नि-परीक्षा .........................८८५
१८२-मेघनादका युद्ध, रामजीका लीलासे नागपाशमें बँधना ..........८४२१९६-देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा ..............................८८८
१८३-मेघनाद-यज्ञ-विध्वंस, युद्ध और मेघनाद-उद्धार ....................८४५१९७-विभीषणकी प्रार्थना, श्रीरामजीके द्वारा भरतजीके प्रेमदशाका वर्णन, शीघ्र अयोध्या पहुँचनेका अनुरोध .८९६
१८४-रावणका युद्धके लिये प्रस्थान और श्रीरामजीका विजय-रथ तथा वानर-राक्षसोंका युद्ध ................८४९१९८-विभीषणका वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओंका उन्हें पहनना८९७
१८५-लक्ष्मण-रावण-युद्ध ..................८५४१९९-पुष्पकविमानपर चढ़कर श्रीसीता-रामजीका अवधके लिये प्रस्थान ..८९९
१८६-रावण-मूर्च्छा, रावण-यज्ञ-विध्वंस, राम-रावण-युद्ध .......................८५५२००-श्रीरामचरितकी महिमा ...............९०३
१८७-इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध .......................८६१उत्तरकाण्ड
१८८-रावणका विभीषणपर शक्ति छोड़ना, रामजीका शक्तिको अपने ऊपर लेना, विभीषण-रावण-युद्ध ............................८६७२०१-मंगलाचरण ............................९०५
२०२-भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द .........९०६
२०३-श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्द ....................९१२
२०४-राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति .............................९१९
२०५-वानरोंकी और निषादकी विदाई ..९२६
२०६-रामराज्यका वर्णन ....................९३०

[११]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
२०७-पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता,
सनकादिका आगमन और
संवाद .....९३४शापकी बात सुनना .....१००९
२०८-हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका
प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश.....९४४२१५-रुद्राष्टक .....१०११
२०९-श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश
(श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी
कृतज्ञता .....९५०२१६-गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन,
शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी
आगेकी कथा .....१०१२
२१०-श्रीराम-वसिष्ठ-संवाद, श्रीरामजीका
भाइयोंसहित अमराईमें
जाना .....९५४२१७-काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके
पास जाना और शाप तथा
अनुग्रह पाना .....१०१६
२११-नारदजीका आना और स्तुति
करके ब्रह्मलोकको लौट जाना ....९५६२१८-ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक
और भक्तिकी महान् महिमा .....१०२४
२१२-शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह,
गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा
और राम-महिमा सुनना .....९५८२१९-गरुड़जीके सात प्रश्न तथा
काकभुशुण्डिके उत्तर .....१०३२
२१३-काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा
और कलिमहिमा कहना.....९९८२२०-भजन-महिमा .....१०३६
२१४-गुरुजीका अपमान एवं शिवजीके२२१-रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय
और फलस्तुति.....१०३८
२२२-रामायणजीकी आरती .....१०४८
२२३-गोस्वामी तुलसीदासजीकी संक्षिप्त
जीवनी .....१०४९
२२४-श्रीरामशलाका प्रश्नावली .....१०५३

नवाहपारायणके विश्राम-स्थान

पृष्ठ-संख्या

पहला विश्राम .....१३२
दूसरा ”.....२३४
तीसरा ”.....३३८
चौथा ”.....४४०
पाँचवाँ ”.....५४०
छठा ”.....६६०
सातवाँ ”.....७८३
आठवाँ ”.....९१८
नवाँ ”.....१०४७

मासपारायणके विश्राम-स्थान

पृष्ठ-संख्या

पृष्ठ-संख्या

पहला विश्राम .....सोलहवाँ विश्राम .....
दूसरा ”.....सत्रहवाँ ”.....
तीसरा ”.....अठारहवाँ ”.....
चौथा ”.....उन्नीसवाँ ”.....
पाँचवाँ ”.....बीसवाँ ”.....
छठा ”.....इककीसवाँ ”.....
सातवाँ ”.....बाईसवाँ ”.....
आठवाँ ”.....तेईसवाँ ”.....
नवाँ ”.....चौबीसवाँ ”.....
दसवाँ ”.....पचीसवाँ ”.....
ग्यारहवाँ ”.....छब्बीसवाँ ”.....
बारहवाँ ”.....सत्ताईसवाँ ”.....
तेरहवाँ ”.....अट्ठाईसवाँ ”.....
चौदहवाँ ”.....उन्तीसवाँ ”.....
पंद्रहवाँ ”.....तीसवाँ ”.....

॥ श्रीहरिः ॥

पारायण-विधि

श्रीरामचरितमानसका विधिपूर्वक पाठ करनेवाले महानुभावोंको पाठारम्भके पूर्व श्रीतुलसीदासजी, श्रीवाल्मीकिजी, श्रीशिवजी तथा श्रीहनुमान्जीका आवाहन, पूजन करनेके पश्चात् तीनों भाइयोंसहित श्रीसीतारामजीका आवाहन, घोडशोपचार पूजन और ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर पाठका आरम्भ करना चाहिये। सबके आवाहन, पूजन और ध्यानके मन्त्र क्रमशः नीचे लिखे जाते हैं—

अथ आवाहनमन्त्रः

तुलसीकनमस्तुभ्यमिहागच्छशुचिब्रत।
नैरुह्यउपविश्येदंपूजनं प्रतिगृह्यताम् ॥ १ ॥

ॐ तुलसीदासाय नमः।

श्रीवाल्मीकनमस्तुभ्यमिहागच्छशुभप्रद।
उत्तरपूर्वयोर्यध्येतिष्ठगृहीष्व मेऽर्चनम् ॥ २ ॥

ॐ वाल्मीकाय नमः।

गौरीपतेनमस्तुभ्यमिहागच्छमहेश्वर।
पूर्वदक्षिणयोर्यध्येतिष्ठपूजां गृहाण मे ॥ ३ ॥

ॐ गौरीपतये नमः।

श्रीलक्ष्मणनमस्तुभ्यमिहागच्छसहप्रियः।
याम्यभागेसमातिष्ठपूजनं संगृहाण मे ॥ ४ ॥

ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः।

श्रीशत्रुघ्ननमस्तुभ्यमिहागच्छसहप्रियः।
पीठस्य पश्चिमेभागेपूजनं स्वीकुरुष्व मे ॥ ५ ॥

ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः।

श्रीभरतनमस्तुभ्यमिहागच्छसहप्रियः।
पीठकस्योत्तरेभागेतिष्ठ पूजां गृहाण मे ॥ ६ ॥

ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः।

श्रीहनुमन्मस्तुभ्यमिहागच्छकृपानिधे।
पूर्वभागेसमातिष्ठ

ॐ हनुमते नमः।

[१४]

अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्। पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च ॥ ८ ॥ रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालङ्कृतं श्यामाङ्गं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्। कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावं वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम् ॥ ९ ॥ आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव। गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः ॥ १० ॥

इत्यावाहनम्

सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्। आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम् ॥ ११ ॥

इति षोडशोपचारैः पूजयेत्

ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामितुलसीदासा ऋषयः श्रीसीतारामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः।

अथ आचमनम्

श्रीसीतारामाभ्यां नमः। श्रीरामचन्द्राय नमः। श्रीरामभद्राय नमः। इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्। श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्॥

अथ करन्यासः

जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुक्ति धन धरम धाम के॥ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥ तर्जनीभ्यां नमः।

राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥ मध्यमाभ्यां नमः।

उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई॥ अनामिकाभ्यां नमः।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहि तबहीं॥ कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

[१५]

मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृतं बर चाप रुचिरं कर सायक ॥ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

इति करन्यासः

अथ हृदयादिन्यासः

जग मंगल गुणग्राम राम के । दानि मुक्ति धन धरम धाम के ॥ हृदयाय नमः ।

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥ शिरसे स्वाहा।

राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥ शिखायै वषट्।

उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई ॥ कवचाय हुम्।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहि तबहीं ॥ नेत्राभ्यां वौषट्।

मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृतं बर चाप रुचिरं कर सायक ॥ अस्त्राय फट्।

इति हृदयादिन्यासः

अथ ध्यानम्

मामवलोकय पंकज लोचन । कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥ नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥ जातुधान बरुथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥ भूसुर ससि नव बृंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥ भुज बल बिपुल भार महि खंडित । खर दूषन बिराध बध पंडित ॥ रावनारि सुखरूप भूपबर । जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥ सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥ कारुनीक व्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥ कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥

इति ध्यानम्

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मायामुक्त नारदजी

A black and white line drawing of Lord Vishnu standing on clouds. He has four arms, wearing a crown and jewelry. He holds a conch shell in his upper right hand, a lotus in his lower right hand, and a mace in his left hand. His right hand is raised in a blessing gesture. A devotee is prostrate on the ground before him, with their head resting on his feet. The background consists of stylized clouds.

तब मुनि अति सभीत हरि चरना । गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीरामचरितमानस

प्रथम सोपान

बालकाण्ड

श्लोक

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि । मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥ १ ॥

अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् ॥ २ ॥

श्रद्धा और विश्वासके स्वरूप श्रीपार्वतीजी और श्रीशङ्करजीकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरणमें स्थित ईश्वरको नहीं देख सकते ॥ २ ॥

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् । यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ ३ ॥

ज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है ॥ ३ ॥

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥ ४ ॥

श्रीसीतारामजीके गुणसमूहरूपी पवित्र वनमें विहार करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर श्रीवाल्मीकिजी और कपीश्वर श्रीहनुमानजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ४ ॥

१८

  • रामचरितमानस *

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् । सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् ॥ ५ ॥

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशोंकी हरनेवाली तथा सम्पूर्ण कल्याणोंकी करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीकी प्रियतमा श्रीसीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ५ ॥

यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रजौ यथाहेर्भ्रमः । यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ॥ ६ ॥

जिनकी मायाके वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्तासे रस्सीमें सपंके भ्रमकी भाँति यह सारा दृश्य-जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागरसे तरनेकी इच्छावालोंके लिये एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणोंसे पर (सब कारणोंके कारण और सबसे श्रेष्ठ) राम कहानेवाले भगवान् हरिकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ६ ॥

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्रचिदन्यतोऽपि । स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा- भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति ॥ ७ ॥

अनेक पुराण, वेद और [तन्त्र] शास्त्रसे सम्मत तथा जो रामायणमें वर्णित है और कुछ अन्यत्रसे भी उपलब्ध श्रीरघुनाथजीकी कथाको तुलसीदास अपने अन्तःकरणके सुखके लिये अत्यन्त मनोहर भाषारचनामें विस्तृत करता है ॥ ७ ॥

सो०—जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन । करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ॥ १ ॥

जिन्हें स्मरण करनेसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणोंके स्वामी और सुन्दर हाथीके मुखवाले हैं, वे ही बुद्धिके राशि और शुभ गुणोंके धाम (श्रीगणेशजी) मुझपर कृपा करें ॥ १ ॥

मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन । जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ॥ २ ॥

जिनकी कृपासे गूँगा बहुत सुन्दर बोलनेवाला हो जाता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़पर चढ़ जाता है, वे कलियुगके सब पापोंको जला डालनेवाले दयालु (भगवान्) मुझपर द्रवित हों (दया करें), ॥ २ ॥

  • बालकाण्ड * १९

नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन। करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥ ३॥

जो नील कमलके समान श्यामवर्ण हैं, पूर्ण खिले हुए लाल कमलके समान जिनके नेत्र हैं और जो सदा क्षीरसागरमें शयन करते हैं, वे भगवान् (नारायण) मेरे हृदयमें निवास करें॥ ३॥

कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन। जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥ ४॥

जिनका कुन्दके पुष्प और चन्द्रमाके समान (गौर) शरीर है, जो पार्वतीजीके प्रियतम और दयाके धाम हैं और जिनका दीनोंपर स्नेह है, वे कामदेवका मर्दन करनेवाले (शङ्करजी) मुझपर कृपा करें॥ ४॥

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५॥

मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ, जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं॥ ५॥

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥

मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि(सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमर मूल (सञ्जीवनी जड़ी)का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है॥ १॥

सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥

वह रज सुकृती (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजीके शरीरपर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्दकी जननी है, भक्तके मनरूपी सुन्दर दर्पणके मैलको दूर करनेवाली और तिलक करनेसे गुणोंके समूहको वशमें करनेवाली है॥ २॥

श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥

श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥ ३॥

२० * रामचरितमानस *

उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥ सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥ उसके हृदयमें आते ही हृदयके निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रिके दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्ररूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खानमें है, सब दिखायी पड़ने लगते हैं— ॥४॥

दो०— जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥ १॥ जैसे सिद्धाञ्जनको नेत्रोंमें लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वीके अंदर कौतुकसे ही बहुत-सी खानें देखते हैं॥१॥

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥ तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥ श्रीगुरु महाराजके चरणोंकी रज कोमल और सुन्दर नयनामृत-अञ्जन है, जो नेत्रोंके दोषोंका नाश करनेवाला है। उस अञ्जनसे विवेकरूपी नेत्रोंको निर्मल करके मैं संसाररूपी बन्धनसे छुड़ानेवाले श्रीरामचरित्रका वर्णन करता हूँ॥१॥

बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥ सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥ पहले पृथ्वीके देवता ब्राह्मणोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, जो अज्ञानसे उत्पन्न सब संदेहोंको हरनेवाले हैं। फिर सब गुणोंकी खान संत-समाजको प्रेमसहित सुन्दर वाणीसे प्रणाम करता हूँ॥२॥

साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥ संतोंका चरित्र कपासके चरित्र (जीवन)-के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपासकी डोडी नीरस होती है, संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल होता है, संतका हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकारसे रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपासमें गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार संतका चरित्र भी सद्गुणोंका भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है।) [जैसे कपासका धागा सूईके किये हुए छेदको अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जानेका कष्ट सहकर भी वस्त्रके रूपमें परिणत होकर दूसरोंके गोपनीय स्थानोंको ढकता है उसी प्रकार] संत स्वयं दुःख सहकर दूसरोंके छिद्रों (दोषों)-को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत्में वन्दनीय यश प्राप्त किया है॥३॥