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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

७२२

  • रामचरितमानस *

विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनायीं। तब हनुमान्जी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके जिस भागमें) सीताजी रहती थीं ॥ ३ ॥

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥ कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥

सीताजीको देखकर हनुमान्जीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं ॥ ४ ॥

दो०—निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ ८ ॥

श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीको दीन (दुखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत ही दुखी हुए ॥ ८ ॥

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौँ का भाई ॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ॥

हनुमान्जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय बहुत-सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया ॥ १ ॥

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ॥

उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा—हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको— ॥ २ ॥

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥ तून धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥

मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा) करके कहने लगीं— ॥ ३ ॥

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥ अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७२३

हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं— तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर नहीं है ॥ ४ ॥

सठ सूनें हरि आनेहि मोही । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥

रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम! निलज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती? ॥ ५ ॥

दो०—आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।

परुष बचन सुनि काहि असि बोला अति खिसिआन ॥ ९ ॥

अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला— ॥ ९ ॥

सीता तैं मम कृत अपमाना । कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ॥

नाहिं त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होती न त जीवन हानी ॥

सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा! ॥ १ ॥

स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥

सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥

[सीताजीने कहा—] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है ॥ २ ॥

चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥

सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥

सीताजी कहती हैं—हे चन्द्रहास (तलवार)! श्रीरघुनाथजीके विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले ॥ ३ ॥

सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥

कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥

सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ ॥ ४ ॥

मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ मैं मारबि काहि कृपाना ॥

७२४

  • रामचरितमानस *

यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा ॥ ५ ॥

दो०— भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बूंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥ १० ॥

[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे ॥ १० ॥

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका ॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥

उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी सेवा करके अपना कल्याण कर लो ॥ १ ॥

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी ॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥

स्वप्नमें [मैंने देखा कि] एक बंदरने लड़्का जला दी। राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी। रावण नङ्गा है और गदहेपर सवार है। उसके सिर मुँडे हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं ॥ २ ॥

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥

इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है और मानो लड़्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा ॥ ३ ॥

यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गाउँ दिन चारी ॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥

मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥

दो०— जहाँ तहाँ गई सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ ११ ॥

तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा ॥ ११ ॥

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७२५

सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोली—हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता ॥ १ ॥

आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥

काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने? ॥ २ ॥

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि । प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥

सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने कहा—] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी ॥ ३ ॥

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा । अवनि न आवत एकउ तारा ॥

सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं—[क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें अङ्गारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता ॥ ४ ॥

पावकमय ससि स्वत न आगी । मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका । सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥

चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर ॥ ५ ॥

नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥ देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥

तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान्जीको कल्पके समान बीता ॥ ६ ॥

सो०—कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।

जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२ ॥

७२६

  • रामचरितमानस *

तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने अङ्गारा दे दिया। [यह समझकर] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया ॥ १२ ॥

तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम नाम अंकित अति सुंदर ॥ चकित चित्त मुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥

तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं ॥ ११ ॥

जीति को सकड़ अजय रघुराई । माया तें अस्मि रचि नहीं जाई ॥ सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥

[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है ? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्जी मधुर बचन बोले— ॥ २१ ॥

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥

वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३१ ॥

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होती किन भाई ॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥

[सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमूर्तरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई ! प्रकट क्यों नहीं होता ? तब हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥

राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुणानिधान की ॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी । दीन्हि राम तुम्ह कहैं सहिदानी ॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी ! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता ! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥ ५ ॥

नर बानरहि संग कहु कैसैं । कही कथा भड़ संगति जैसैं ॥

[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ ? तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही ॥ ६ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७२७

दो०—कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।

जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ॥ १३ ॥

हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्मसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है ॥ १३ ॥

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी । सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना । भयहु तात मो कहँ जलजाना ॥

भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजीने कहा—] हे तात हनुमान्! विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए ॥ १ ॥

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी । अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥ कोमलचित्त कृपाल रघुराई । कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥

मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमलहृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है? ॥ २ ॥

सहज बानि सेवक सुखदायक । कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥ कबहुँ नयन मम सीतल ताता । होइहँहि निरखि स्याम मृदु गाता ॥

सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अङ्गोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे? ॥ ३ ॥

बचनु न आव नयन भरे बारी । अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥ देखि परम बिरहाकुल सीता । बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥

[मुँहसे] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका] जल भर आया। [बड़े दुःखसे वे बोलीं—] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर हनुमान्जी कोमल और विनीत वचन बोले— ॥ ४ ॥

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता । तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ॥ जनि जननी मानहु जियँ ऊना । तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥

हे माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित [शरीरसे] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुखी हैं। हे माता! मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है ॥ ५ ॥

७२८

  • रामचरितमानस *

दो०—रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर ॥ १४ ॥

हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये। ऐसा कहकर हनुमान्जी प्रेमसे गद्द हो गये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ १४ ॥

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहँ सकल भए बिपरीता ॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥

[हनुमान्जी बोले—] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वृक्षोंके नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्निके समान, रात्रि कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान ॥ १ ॥

कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिविध समीरा ॥

और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खोलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु सोंपके शासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी हैं ॥ २ ॥

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहैं यह जान न कोई ॥ तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥

मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है ॥ ३ ॥

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं ॥ प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥

और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेममें मग्न हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही ॥ ४ ॥

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥

हनुमान्जीने कहा—हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो ॥ ५ ॥

दो०—निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥ १५ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७२१

राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो ॥ १५ ॥

जों रघुबीर होती सुधि पाई। करते नहीं बिलंबु रघुराई ॥ राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरुथ कहँ जातुधान की ॥

श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है? ॥ १ ॥

अबहिन मातु मैं जाऊँ लवाई। प्रभु आयसु नहीं राम दोहाई ॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिन रघुबीरा ॥

हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥ २ ॥

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिन। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिन ॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना ॥

और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने कहा—] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥ ३ ॥

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा ॥

अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु) के आकारका (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥

सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥

तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ५ ॥

दो०—सुनु माता सारखामृग नहीं बल बुद्धि बिसाल।

प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाड़ परम लघु ब्याल ॥ १६ ॥

हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है) ॥ १६ ॥

७३०

  • रामचरितमानस *

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥ आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥

भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय जानकर हनुमान्जीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शीलके निधान होओ ॥ १ ॥

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेममें मग्न हो गये ॥ २ ॥

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥ अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

हनुमान्जीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा—हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥ सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥

हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजीने कहा—] हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं ॥ ४ ॥

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौँ तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! यदि आप मनमें सुख मानें (प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है ॥ ५ ॥

दो०— देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७॥

हनुमान्जीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने कहा—जाओ। हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण करके मीठे फल खाओ ॥ १७ ॥

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥ रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥

वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार की—॥ १ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७३१

नाथ एक आवा कपि भारी । तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥ खाएसि फल अरु बिटप उपारे । रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥

[और कहा—] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़ डाला और रखवालोंको मसल-मसलकर जमीनपर डाल दिया ॥ २ ॥

सुनि रावन पठए भट नाना । तिन्हहि देखि गर्जैउ हनुमाना ॥ सब रजनीचर कपि संघारे । गए पुकारत कछु अधमारे ॥

यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमान्जीने गर्जना की। हनुमान्जीने सब राक्षसोंको मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये ॥ ३ ॥

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा । चला संग लै सुभट अपारा ॥ आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥

फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान्जीने एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि (बड़े जोर) से गर्जना की ॥ ४ ॥

दो०— कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि । कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ॥ १८ ॥

उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है ॥ १८ ॥

सुनि सुत बध लंकेस रिमाना । पठएसि मेघनाद बलवाना ॥ मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही । देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥

पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनादको भेजा। (उससे कहा कि—) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा जाय कि कहाँका है ॥ १९ ॥

चला इंद्रजित अतुलित जोधा । बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥ कपि देखा दारुन भट आवा । कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥

इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमान्जीने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जें और दौड़े ॥ २० ॥

७३२

  • रामचरितमानस *

अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमार॥ रहे महाभट ताके संग। गहि गहि कपि मर्दड़ निज अंगा॥

उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्जी अपने शरीरसे मसलने लगे॥ ३ ॥

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई॥

उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों। हनुमान्जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥ ४ ॥

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते॥ ५ ॥

दो०—ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटड़ अपार॥ १९ ॥

अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९ ॥

ब्रह्मबान कपि कहँ तेहिं मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा॥

तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥

उसने हनुमान्जीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १ ॥

जामु नाम जपि सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥

तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २ ॥

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए । कौतुक लागि सभा सव आए॥

दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७३३

बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये (तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमान्जीने जाकर रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥ ३ ॥

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भूकृटि बिलोकत सकल सभीता ॥ देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महँ गरुड़ असंका ॥

देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भाँ ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे जैसे सपोंके समूहमें गरुड़ निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं ॥ ४ ॥

दो०—कपिहि बिलोकिक दसानन बिहसा कहि दुर्बादि ।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ २० ॥

हनुमान्जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-बधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया ॥ २० ॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहि कें बल घालेहि बन खीसा ॥ की धौँ श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ॥

लङ्कापति रावणने कहा—रे वानर! तू कौन है? किसके बलपर तूने बनको उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ ॥ १ ॥

मारे निसिचर केहिं अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कड़ बाधा ॥

सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया । पाड़ जासु बल विरचति माया ॥

तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [हनुमान्जीने कहा—] हे रावण! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी रचना करती है; ॥ २ ॥

जाकें बल विरंचि हरि ईसा । पालत सूजत हरत दससीसा ॥

जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन ॥

जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे सहस्रमुख (फणों) वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं; ॥ ३ ॥

धरड़ जो बिबिध देह सुरव्राता । तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ॥

हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा । तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥

७३४

  • रामचरितमानस *

जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खोंको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया ॥४॥

खर दूषण त्रिसिरा अरु बाली । बधे सकल अतुलित बल साली ॥

जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिको मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान् थे; ॥५॥

दो०—जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि ।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥ २१ ॥

जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [चोरीसे] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ ॥ २१ ॥

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई ॥

समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥

मैं तुम्हारी प्रभुताको खूब जानता हूँ, सहसबाहुसे तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमान्जीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात टाल दी ॥ १ ॥

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥

सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥

हे [राक्षसोंके] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके) मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमारगपर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे ॥ २ ॥

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ॥

मोहि न कछु बाँधे कड़ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥

तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ ॥ ३ ॥

बिनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥

देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्को भजो ॥ ४ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७३५

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥ तासों बयरु कबहुँ नहीं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥

जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो॥५॥

दो०— प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२ ॥

खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें रख लेंगे॥ २२ ॥

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥

रिषि पुलस्ति जसु बिमल मर्यंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और लङ्काका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो॥ १ ॥

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥

बसन हीन नहीं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥

रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़, विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु! सब गहनोंसे सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥ २ ॥

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाही। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥

रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके मूलमें कोई जलस्त्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥ ३ ॥

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहीं कोपी॥

संकर सहस बिष्णु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते॥ ४ ॥

दो०— मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३ ॥

७३६

  • रामचरितमानस *

मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥ जदपि कही कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥ बोला बिहसि महा अभिमानी । मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥

यद्यपि हनुमान्जीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला! ॥ १ ॥

मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ॥ उलटा होइहि कह हनुमाना । मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥

रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमान्जीने कहा—इससे उलटा ही होगा (अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम (बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है ॥ २ ॥

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना ॥ सुनत निसाचर मारन धाए । सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ॥

हनुमान्जीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [और बोला—] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे ॥ ३ ॥

नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति बिरोध न मारिअ दूता ॥ आन दंड कछु करिअ गोसाईँ । सबहीं कहा मंत्र भल भाई ॥

उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं! कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा—भाई! यह सलाह उत्तम है ॥ ४ ॥

सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि पठइअ बंदर ॥

यह सुनते ही रावण हँसकर बोला—अच्छा तो, बंदरको अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय ॥ ५ ॥

दो०—कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥ २४ ॥

मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर फिर आग लगा दो ॥ २४ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७३७

पूँछहीन बानर तहाँ जाइहि । तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ॥ जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई । देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥

जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो देखूँ! ॥ १ ॥

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भइ सहाय सारद मैं जाना ॥ जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रचैँ मूढ़ सोड़ रचना ॥

यह वचन सुनते ही हनुमान्जी मनमें मुसकराये [और मन-ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि देनेमें] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे ॥ २ ॥

रहा न नगर बसन घृत तेल। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥ कौतुक कहैँ आए पुरबासी । मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥

[पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि] नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्जीने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासीलोग तमाशा देखने आये। वे हनुमान्जीको पैसे ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हाँसी करते हैं ॥ ३ ॥

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी । नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥ पावक जरत देखि हनुमंता । भयउ परम लघुरूप तुरंता ॥

ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान्जीको नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्निको जलते हुए देखकर हनुमान्जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये ॥ ४ ॥

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं । भई सभीत निसाचर नारीं ॥

बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं ॥ ५ ॥

दो०— हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास ।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढि लाग अकास ॥ २५ ॥

उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान्जी अट्टहास करके गर्जें और बढ़कर आकाशसे जा लगे ॥ २५ ॥

देह बिसाल परम हरुआई । मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ॥

जरइ नगर भा लोग बिहाला । झपट लपट बहु कोटि कराला ॥

७३८

  • रामचरितमानस *

देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं ॥ १ ॥

तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहिं अवसर को हमहि उबारा ॥ हम जो कहा यह कपि नहीं होई । बानर रूप धरें सुर कोई ॥

हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा? [चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता है! ॥ २ ॥

साधु अवग्या कर फलु ऐसा । जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥ जारा नगरु निमिष एक माहीं । एक बिभीषण कर गृह नाहीं ॥

साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी तरह जल रहा है। हनुमान्जीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला डाला। एक बिभीषणका घर नहीं जलाया ॥ ३ ॥

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा । जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥ उलटि पलटि लंका सब जारी । कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको बनाया, हनुमान्जी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले। हनुमान्जीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी लङ्का जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े ॥ ४ ॥

दो०—पूँछ बुझाइ खोड़ श्रम धरि लघु रूप बहोरि ।

जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥ २६ ॥

पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमान्जी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए ॥ २६ ॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवनसुत लयऊ ॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया ॥ १ ॥

कहेहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी ॥

[जानकीजीने कहा—] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना—हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ] अतः उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकटको दूर कीजिये ॥ २ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७३१

तात सकसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥ मास दिवस महुँ नाथु न आवा । तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥

हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा (घटना) सुनाना और प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे ॥ ३ ॥

कहु कपि केहि बिधि राखौँ प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥ तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ॥

हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात! ॥ ४ ॥

दो०— जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह ।

चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ २७ ॥

हनुमान्जीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास गमन किया ॥ २७ ॥

चलत महाधुनि गर्जेंसि भारी । गर्भ स्वर्वाहिं सुनि निसिचर नारी ॥ नाधि सिंधु एहि पारहि आवा । सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा ॥

चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँधकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सुनाया ॥ १ ॥

हरषे सब बिलोकि हनुमाना । नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥ मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा । कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा ॥

हनुमान्जीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने अपना नया जन्म समझा। हनुमान्जीका मुख प्रसन्न है और शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि] ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं ॥ २ ॥

मिले सकल अति भए सुखारी । तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥ चले हरषि रघुनायक पास। पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥

सब हनुमान्जीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर नये-नये इतिहास (वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ ३ ॥

७४०

  • रामचरितमानस *

तब मधुवन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥ रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥

तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे सबने मधुर फल [या मधु और फल] खाये। जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे ॥ ४ ॥

दो०—जाड़ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥ २८ ॥

उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद बन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर आये हैं ॥ २८ ॥

जौँ न होती सीता सुधि पाई। मधुवन के फल सकहिं कि खाई॥

एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आड़ गए कपि सहित समाजा ॥

यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर ही रहे थे कि समाज-सहित वानर आ गये ॥ १ ॥

आड़ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥

पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥

सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने उत्तर दिया—] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल हैं। श्रीरामजीकी कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है) ॥ २ ॥

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ ॥

हे नाथ! हनुमान्ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमान्जीसे फिर मिले और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ ३ ॥

राम कपिन्ह जब आवत देखा। किऐँ काजु मन हरष बिसेषा ॥

फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥

श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े ॥ ४ ॥

दो०—प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ॥ २९ ॥

  • सुन्दरकाण्ड *

७४१

दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। [वानरोने कहा—] हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है ॥ २९ ॥

जामवंत कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दया ॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥

जाम्बवान्ने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं ॥ १ ॥

सोड़ बिजई बिनई गुन सागर । तासु सुजसु त्रैलोक उजागर ॥ प्रभु कौँ कृपा भयउ सबु काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू ॥

वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है। प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया ॥ २ ॥

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहँ मुख न जाड़ सो बरनी ॥ पवनतनय के चरित सुहाए । जामवंत रघुपतिहि सुनाए ॥

हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्ने जो करनी की, उसका हजार मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्ने हनुमान्जीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥ ३ ॥

सुनत कृपानिधि मन अति भाए । पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी । रहति करति रच्छा स्वप्रांन की ॥

[वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्जीको फिर हृदयसे लगा लिया और कहा—हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं? ॥ ४ ॥

दो०—नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिँ प्रांन केहिँ बाट ॥ ३० ॥

(हनुमान्जीने कहा—) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस मार्गसे? ॥ ३० ॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही । रघुपति हृदयँ लाड़ सोड़ लीन्ही ॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी । बचन कहे कछु जनककुमारी ॥

चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमान्जीने फिर कहा—] हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे— ॥ १ ॥