भारतकोश
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इनमेंसे किन्हीं वानरोंमें दस हाथियोंका बल था, कोई उनसे भी दस गुने अधिक बलवान् थे तथा किन्हींमें एक हजार हाथियोंके समान बल था॥ ४७ ॥

किन्हींमें दस हजार हाथियोंकी शक्ति थी, कोई इनसे भी सौ गुने बलवान् थे तथा अन्य बहुतेरे वानर-यूथपतियोंमें तो बलका परिमाण ही नहीं था। वे असीम बलशाली थे॥ ४८ ॥

वहाँ उन वानरसेनाओंका टिड्डीदलके उद्गमके समान अद्भुत एवं विचित्र समागम हुआ था॥ ४९ ॥

लङ्कामें उछल-उछलकर आते हुए वानरोंसे आकाश भर गया था और पुरीमें प्रवेश करके खड़े हुए कपिसमूहोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी॥ ५० ॥

रीछों और वानरोंकी एक करोड़ सेना तो लङ्काके चारों द्वारोंपर आकर डटी थी और अन्य सैनिक सब ओर युद्धके लिये चले गये थे॥ ५१ ॥

समस्त वानरोंने चारों ओरसे उस त्रिकूट पर्वतको (जिसपर लङ्का बसी थी) घेर लिया था। सहस्र अयुत (एक करोड़) वानर तो उस पुरीमें सभी द्वारोंपर लड़ती हुई सेनाका समाचार लेनेके लिये नगरमें सब ओर घूमते रहते थे॥ ५२ ॥

हाथोंमें वृक्ष लिये बलवान् वानरोंद्वारा सब ओरसे घिरी हुई लङ्कामें वायुके लिये भी प्रवेश पाना कठिन हो गया था॥ ५३ ॥

मेघके समान काले एवं भयंकर तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी वानरोंद्वारा सहसा पीड़ित होनेके कारण राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ ५४ ॥

जैसे सेतुको विदीर्ण कर अथवा मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रके जलका महान् शब्द होता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करती हुई विशाल वानरसेनाका महान् कोलाहल हो रहा था॥ ५५ ॥

उस महान् कोलाहलसे परकोटों, फाटकों, पर्वतों, वनों तथा काननोंसहित समूची लङ्कापुरीमें हलचल मच गयी॥ ५६ ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवसे सुरक्षित वह विशाल वानरवाहिनी समस्त देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय हो गयी थी॥ ५७ ॥

इस प्रकार राक्षसोंके वधके लिये अपनी सेनाको यथास्थान खड़ी करके उसके बादके कर्तव्यको जाननेकी इच्छासे श्रीरघुनाथजीने मन्त्रियोंके साथ बारंबार सलाह की और एक

निश्चयपर पहुँचकर साम, दान आदि उपायोंके क्रमशः प्रयोगसे सुलभ होनेवाले अर्थतत्त्वके ज्ञाता श्रीराम विभीषणकी अनुमति ले राजधर्मका विचार करते हुए वालिपुत्र अङ्गदको बुलाकर उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५८-५९ १/२ ॥

‘सौम्य! कपिप्रवर! दशमुख रावण राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया, अब उसका ऐश्वर्य समाप्त हो चला, वह मरना ही चाहता है, इसलिये उसकी चेतना (विचार-शक्ति) नष्ट हो गयी है। तुम परकोटा लाँघकर लङ्कापुरीमें भय छोड़कर जाओ और व्यथारहित हो उससे मेरी ओरसे ये बातें कहो— ॥ ६०-६१ ॥

“निशाचर! राक्षसराज! तुमने मोहवश घमंडमें आकर ऋषि, देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष और राजाओंका बड़ा अपराध किया है। ब्रह्माजीका वरदान पाकर तुम्हें जो अभिमान हो गया था, निश्चय ही उसके नष्ट होनेका अब समय आ गया है। तुम्हारे उस पापका दुःसह फल आज उपस्थित है॥ ६२-६३ ॥

“मैं अपराधियोंको दण्ड देनेवाला शासक हूँ। तुमने जो मेरी भार्याका अपहरण किया है, इससे मुझे बड़ा कष्ट पहुँचा है; अतः तुम्हें उसका दण्ड देनेके लिये मैं लङ्काके द्वारपर आकर खड़ा हूँ॥ ६४ ॥

“राक्षस! यदि तुम युद्धमें स्थिरतापूर्वक खड़े रहे तो उन समस्त देवताओं, महर्षियों और राजर्षियोंकी पदवीको पहुँच जाओगे—उन्हींकी भाँति तुम्हें परलोकवासी होना पड़ेगा॥ ६५ ॥

“नीच निशाचर! जिस बलके भरोसे तुमने मुझे धोखा देकर मायासे सीताका हरण किया है, उसे आज युद्धके मैदानमें दिखाओ॥ ६६ ॥

“यदि तुम मिथिलेशकुमारीको लेकर मेरी शरणमें नहीं आये तो मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा इस संसारको राक्षसोंसे सूना कर दूँगा॥ ६७ ॥

“राक्षसोंमें श्रेष्ठ ये श्रीमान् धर्मात्मा विभीषण भी मेरे साथ यहाँ आये हैं, निश्चय ही लङ्काका निष्कण्टक राज्य इन्हें ही प्राप्त होगा॥ ६८ ॥

“तुम पापी हो। तुम्हें अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है और तुम्हारे संगी-साथी भी मूर्ख हैं; अतः इस प्रकार अधर्मपूर्वक अब तुम एक क्षण भी इस राज्यको नहीं भोग सकोगे॥ ६९ ॥

“राक्षस! शूरताका आश्रय ले धैर्य धारण करके मेरे साथ युद्ध करो। रणभूमिमें मेरे बाणोंसे शान्त (प्राणशून्य) होकर तुम पूत (शुद्ध एवं निष्पाप) हो जाओगे॥ ७० ॥

“निशाचर! मेरे दृष्टिपथमें आनेके पश्चात् यदि तुम पक्षी होकर तीनों लोकोंमें उड़ते और छिपते फिरो तो भी अपने घरको जीवित नहीं लौट सकोगे॥ ७१ ॥

“अब मैं तुम्हें हितकी बात बताता हूँ। तुम अपना श्राद्ध कर डालो—परलोकमें सुख देनेवाले दान-पुण्य कर लो और लङ्काको जी भरकर देख लो; क्योंकि तुम्हारा जीवन मेरे अधीन हो चुका है”॥ ७२ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामके ऐसा कहनेपर ताराकुमार अङ्गद मूर्तिमान् अग्निकी भाँति आकाशमार्गसे चल दिये॥ ७३ ॥

श्रीमान् अङ्गद एक ही मुहूर्तमें परकोटा लाँघकर रावणके राजभवनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने मन्त्रियोंके साथ शान्तभावसे बैठे हुए रावणको देखा॥ ७४ ॥

वानरश्रेष्ठ अङ्गद सोनेके बाजूबंद पहने हुए थे और प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे, वे रावणके निकट पहुँचकर खड़े हो गये॥ ७५ ॥

उन्होंने पहले अपना परिचय दिया और मन्त्रियों-सहित रावणको श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई सारी उत्तम बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं। न तो एक भी शब्द कम किया और न बढ़ाया॥ ७६ ॥

वे बोले—‘मैं अनायास ही बड़े-बड़े उत्तम कर्म करनेवाले कोसलनरेश महाराज श्रीरामका दूत और वालीका पुत्र अङ्गद हूँ। सम्भव है कभी मेरा नाम भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा हो॥ ७७ ॥

‘माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले रघुकुल-तिलक श्रीरामने तुम्हारे लिये यह संदेश दिया है— ‘नृशंस रावण! जरा मर्द बनो और घरसे बाहर निकलकर युद्धमें मेरा सामना करो॥ ७८ ॥

“मैं मन्त्री, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा वध करूँगा; क्योंकि तुम्हारे मारे जानेसे तीनों लोकोंके प्राणी निर्भय हो जायँगे॥ ७९ ॥

“तुम देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस—सभीके शत्रु हो। ऋषियोंके लिये तो कंटकरूप ही हो; अतः आज मैं तुम्हें उखाड़ फेंकूँगा॥ ८० ॥

“अतः यदि तुम मेरे चरणोंमें गिरकर आदरपूर्वक सीताको नहीं लौटाओगे तो मेरे हाथसे मारे जाओगे और तुम्हारे मारे जानेपर लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणको प्राप्त होगा”॥ ८१ ॥

वानरशिरोमणि अङ्गदके ऐसे कठोर वचन कहनेपर निशाचरगणोंका राजा रावण अत्यन्त अमर्षसे भर गया॥

रोषसे भरे हुए रावणने उस समय अपने मन्त्रियोंसे बार-बार कहा— 'पकड़ लो इस दुर्बुद्धि वानरको और मार डालो'॥ ८३ ॥

रावणकी यह बात सुनकर चार भयंकर निशाचरोंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी अङ्गदको पकड़ लिया॥

आत्मबलसे सम्पन्न ताराकुमार अङ्गदने उस समय राक्षसोंको अपना बल दिखानेके लिये स्वयं ही अपने-आपको पकड़ा दिया॥ ८५ ॥

फिर वे पक्षियोंकी तरह अपनी दोनों भुजाओंसे जकड़े हुए उन चारों राक्षसोंको लिये-दिये ही उछले और उस महलकी छतपर, जो पर्वतशिखरके समान ऊँची थी, चढ़ गये॥ ८६ ॥

उनके उछलनेके वेगसे झटका खाकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावणके देखते-देखते पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८७ ॥

तदनन्तर प्रतापी वालिकुमार अङ्गद राक्षसराजके उस महलकी चोटीपर, जो पर्वतशिखरके समान ऊँची थी, पैर पटकते हुए घूमने लगे॥ ८८ ॥

उनके पैरोंसे आक्रान्त होकर वह छत रावणके देखते-देखते फट गयी। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें वज्रके आघातसे हिमालयका शिखर विदीर्ण हो गया था॥

इस प्रकार महलकी छत तोड़कर उन्होंने अपना नाम सुनाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया और वे आकाशमार्गसे उड़ चले॥ ९० ॥

राक्षसोंको पीड़ा देते और समस्त वानरोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे वानरसेनाके बीच श्रीरामचन्द्रजीके पास लौट आये॥ ९१ ॥

अपने महलके टूटनेसे रावणको बड़ा क्रोध हुआ, परंतु विनाशकी घड़ी आयी देख वह लंबी साँस छोड़ने लगा॥ ९२ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी हर्षसे भरकर गर्जना करते हुए बहुसंख्यक वानरोंसे घिरे रहकर युद्धके लिये ही डटे रहे। वे अपने शत्रुको वध करना चाहते थे॥ ९३ ॥

इसी समय पर्वतशिखरके समान विशालकाय महापराक्रमी दुर्जय वानर वीर सुषेणने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुसंख्यक वानरोंके साथ लङ्काके सभी दरवाजोंको काबूमें कर

लिया और सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार वे (अपने सैनिकोंकी रक्षा करने एवं सभी द्वारोंका समाचार जाननेके लिये) बारी-बारीसे उन सबपर विचरने लगे, जैसे चन्द्रमा क्रमशः सब नक्षत्रोंपर गमन करते हैं॥ १४-१५ ॥

लङ्कापर घेरा डालकर समुद्रतक फैले हुए उन वनवासी वानरोंकी सौ अक्षौहिणी सेनाओंको देख राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ। बहुत-से निशाचर भयभीत हो गये तथा अन्य कितने ही राक्षस समराङ्गणमें हर्ष और उत्साहसे भर गये॥ १६-१७ ॥

उस समय लङ्काकी चहारदीवारी और खाईं सारी-की-सारी वानरोंसे व्याप्त हो रही थी। इस तरह राक्षसोंने चहारदीवारीको जब वानराकार हुई देखा, तब वे दीन-दुःखी और भयभीत हो हाहाकार करने लगे॥ १८ ॥

वह महाभीषण कोलाहल आरम्भ होनेपर राक्षसराज रावणके योद्धा निशाचर बड़े-बड़े आयुध हाथोंमें लेकर प्रलयकालकी प्रचण्ड वायुके समान सब ओर विचरने लगे॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१ ॥

बयालीसवाँ सर्ग

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बयालीसवाँ सर्ग

लङ्कापर वानरोंकी चढ़ाई तथा राक्षसोंके साथ उनका घोर युद्ध

तदनन्तर उन राक्षसोंने रावणके महलमें जाकर यह निवेदन किया कि ‘वानरोंके साथ श्रीरामने लङ्कापुरीको चारों ओरसे घेर लिया है’॥ १ ॥

लङ्काके घेरे जानेकी बात सुनकर रावणको बड़ा क्रोध हुआ और वह नगरकी रक्षाका पहलेसे भी दुगुना प्रबन्ध करके महलकी अटारीपर चढ़ गया॥ २ ॥

वहींसे उसने देखा कि पर्वत, वन और काननोंसहित सारी लङ्का सब ओरसे असंख्य युद्धाभिलाषी वानरोंद्वारा घिरी हुई है॥ ३ ॥

इस प्रकार समस्त वानरोंसे आच्छादित वसुधाको कपिल वर्णकी हुई देख वह इस चिन्तामें पड़ गया कि इन सबका विनाश कैसे होगा?॥ ४ ॥

बहुत देरतक चिन्ता करनेके पश्चात् धैर्य धारण करके विशाल नेत्रोंवाले रावणने श्रीराम और वानर-सेनाओंकी ओर पुनः देखा॥ ५ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी सेनाके साथ प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े। उन्होंने देखा, लङ्का सब ओरसे राक्षसोंद्वारा आवृत और सुरक्षित है॥ ६ ॥

विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत लङ्कापुरीको देखकर दशरथनन्दन श्रीराम व्यथित चित्तसे मन-ही-मन सीताका स्मरण करने लगे— ॥ ७ ॥

‘हाय! वह मृगशावकनयनी जनकनन्दिनी सीता यहीं मेरे लिये शोकसंतप्त हो पीड़ा सहन करती है और पृथ्‍वीकी वेदीपर सोती है। सुनता हूँ, बहुत दुर्बल हो गयी है’॥

इस प्रकार राक्षसियोंद्वारा पीड़ित विदेहनन्दिनीका बारम्बार चिन्तन करते हुए धर्मात्मा श्रीरामने तत्काल वानरोंको शत्रुभूत राक्षसोंका वध करनेके लिये आज्ञा दी॥ ९ ॥

अक्लिष्टकर्मा श्रीरामके इस प्रकार आज्ञा देते ही आगे बढ़नेके लिये परस्पर होड़-सी लगानेवाले वानरोंने अपने सिंहनादोंसे वहाँकी धरती और आकाशको गुँजा दिया॥ १० ॥

वे समस्त वानर-यूथपति अपने मनमें यह निश्चय किये खड़े थे कि हमलोग पर्वत-शिखरोंकी वर्षा करके लङ्काके महलोंको चूर-चूर कर देंगे अथवा मुक्कोंसे ही मार-मारकर ढहा देंगे॥ ११ ॥

वे वानरसेनापति पर्वतोंके बड़े-बड़े शिखर उठाकर और नाना प्रकारके वृक्षोंको उखाड़कर प्रहार करनेके लिये खड़े थे॥ १२ ॥

राक्षसराज रावणके देखते-देखते विभिन्न भागोंमें बँटे हुए वे वानर-सैनिक श्रीरघुनाथजीका प्रिय करनेकी इच्छासे तत्काल लङ्काके परकोटोंपर चढ़ गये॥ १३ ॥

ताँबे-जैसे लाल मुँह और सुवर्णकी-सी कान्तिवाले वे वानर श्रीरामचन्द्रजीके लिये प्राण निछावर करनेको तैयार थे। वे सब-के-सब सालवृक्ष और शैल-शिखरोंसे युद्ध करनेवाले थे; इसलिये उन्होंने लङ्कापर ही आक्रमण किया॥ १४ ॥

वे सभी वानर वृक्षों, पर्वत-शिखरों और मुक्कोंसे असंख्य परकोटों और दरवाजोंको तोड़ने लगे॥ १५ ॥

उन वानरोंने स्वच्छ जलसे भरी हुई खाइयोंको धूल, पर्वत-शिखर, घास-फूस और काठोंसे पाट दिया॥

फिर तो सहस्र यूथ, कोटि यूथ और सौ कोटि यूथोंको साथ लिये अनेक यूथपति उस समय लङ्काके किलेपर चढ़ गये॥ १७ ॥

बड़े-बड़े गजराजोंके समान विशालकाय वानर सोनेके बने हुए दरवाजोंको धूलमें मिलाते, कैलास-शिखरके समान ऊँचे-ऊँचे गोपुरोंको भी ढहाते, उछलते-कूदते एवं गर्जते हुए लङ्कापर धावा बोलने लगे॥ १८-१९ ॥

‘अत्यन्त बलशाली श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, महाबली लक्ष्मणकी जय हो और श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो’ ऐसी घोषणा करते और गर्जते हुए इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर लङ्काके परकोटेपर टूट पड़े॥ २०-२१ ॥

इसी समय वीरबाहु, सुबाहु, नल और पनस— ये वानरयूथपति लङ्काके परकोटेपर चढ़कर बैठ गये और उसी बीचमें उन्होंने वहाँ अपनी सेनाका पड़ाव डाल दिया॥ २२ ॥

बलवान् कुमुद विजयश्रीसे सुशोभित होनेवाले दस करोड़ वानरोंके साथ (ईशानकोणमें रहकर) लङ्काके पूर्व^१ द्वारको घेरकर खड़ा हो गया॥ २३ ॥

उसीकी सहायताके लिये अन्य वानरोंके साथ महाबाहु पनस और प्रघस भी आकर डट गये॥ २४ ॥

वीर शतबलिने (आग्नेयकोणमें स्थित हो) दक्षिण^२

द्वारपर आकर बीस करोड़ वानरोंके साथ उसे घेर लिया और वहीं पड़ाव डाल दिया॥ २५ ॥

ताराके बलवान् पिता सुषेण (नैर्ऋत्यकोणमें स्थित हो) कोटि-कोटि वानरोंके साथ पश्चिम³ द्वारपर आक्रमण करके उसे घेरकर खड़े हो गये॥ २६ ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित महाबलवान् श्रीराम तथा वानरराज सुग्रीव उत्तर⁴ द्वारको घेरकर खड़े हुए (सुग्रीव पूर्ववर्णनके अनुसार वायव्यकोणमें स्थित हो उत्तर द्वारवर्ती श्रीरामकी सहायता करते थे।)॥ २७ ॥

लंगूर जातिके विशालकाय महापराक्रमी वानर गवाक्ष, जो देखनेमें बड़े भयंकर थे, एक करोड़ वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके एक बगलमें खड़े हो गये॥ २८ ॥

इसी तरह महाबली शत्रुसूदन ऋक्षराज धूम्र एक करोड़ भयानक क्रोधी रीछोंको साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजीके दूसरी ओर खड़े हुए॥ २९ ॥

कवच आदिसे सुसज्जित महान् पराक्रमी विभीषण हाथमें गदा लिये अपने सावधान मन्त्रियोंके साथ वहीं आकर डट गये, जहाँ महाबली श्रीराम विद्यमान थे॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन—सब ओर घूम-घूमकर वानर-सेनाकी रक्षा करने लगे॥ ३१ ॥

इसी समय अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए राक्षसराज रावणने अपनी सारी सेनाको तुरंत ही बाहर निकलनेकी आज्ञा दी॥ ३२ ॥

रावणके मुखसे बाहर निकलनेका आदेश सुनते ही राक्षसोंने सहसा बड़ी भयानक गर्जना की॥ ३३ ॥

फिर तो राक्षसोंके यहाँ जिनके मुखभाग चन्द्रमाके समान उज्ज्वल थे और जो सोनेके डंडेसे बजाये या पीटे जाते थे, वे बहुत-से धौंसे एक साथ बज उठे॥

साथ ही भयानक राक्षसोंके मुखकी वायुसे पूरित हो लाखों गम्भीर घोषवाले शङ्ख बजने लगे॥ ३५ ॥

आभूषणोंकी प्रभासे सुशोभित काले शरीरवाले वे निशाचर शङ्ख बजाते समय विद्युत्प्रभासे उद्भासित तथा वकपंक्तियोंसे युक्त नील मेघोंके समान जान पड़ते थे॥

तदनन्तर रावणकी प्रेरणासे उसके सैनिक बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये निकलने लगे, मानो प्रलयकालमें महान् मेघोंके जलसे भरे जाते हुए समुद्रके वेग आगे बढ़ रहे हों॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् वानर सैनिकोंनें सब ओर बड़े जोरसे सिंहनाद किया, जिससे छोटे-बड़े शिखरों और कन्दराओंसहित मलयपर्वत गूँज उठा॥ ३८ ॥

इस प्रकार हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, रथोंके पहियोंकी घर्घर्राहट एवं राक्षसोंके मुखसे प्रकट हुई आवाजके साथ ही शङ्ख और दुन्दुभियोंके शब्द तथा वेगवान् वानरोंके निनादसे पृथ्वी, आकाश और समुद्र निनादित हो उठे॥ ३९-४० ॥

इतनेहीमें पूर्वकालमें घटित हुए देवासुर-संग्रामकी भाँति राक्षसों और वानरोंमें घोर युद्ध होने लगा॥ ४१ ॥

वे राक्षस चमकती हुई गदाओं तथा शक्ति, शूल और फरसोंसे समस्त वानरोंको मारने एवं अपने पराक्रमकी घोषणा करने लगे॥ ४२ ॥

उसी प्रकार वेगशाली विशालकाय वानर भी राक्षसोंपर बड़े-बड़े वृक्षों, पर्वत-शिखरों, नखों और दाँतोंसे चोट करने लगे॥ ४३ ॥

वानरसेनामें ‘वानरराज सुग्रीवकी जय हो’ यह महान् शब्द होने लगा। उधर राक्षसलोग भी ‘महाराज रावणकी जय हो’ ऐसा कहकर अपने-अपने नामका उल्लेख करने लगे॥ ४४ ॥

दूसरे बहुत-से भयानक राक्षस जो परकोटेपर चढ़े हुए थे, पृथ्वीपर खड़े हुए वानरोंको भिन्दिपालों और शूलोंसे विदीर्ण करने लगे॥ ४५ ॥

तब पृथ्वीपर खड़े हुए वानर भी अत्यन्त कुपित हो उठे और आकाशमें उछलकर परकोटेपर बैठे हुए राक्षसोंको अपनी बाँहोंसे पकड़-पकड़कर गिराने लगे॥

इस प्रकार राक्षसों और वानरोंमें बड़ा ही अद्भुत घमासान युद्ध हुआ, जिससे वहाँ रक्त और मांसकी कीच जम गयी॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२ ॥


१, २, ३, ४—यहाँ जो पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर शब्द आये हैं, वे क्रमशः ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य और वायव्यकोणका लक्ष्य करानेवाले हैं; क्योंकि पहले (४१ वें सर्गमें) पूर्व आदि दरवाजोंपर नील आदि यूथपतियोंके आक्रमणकी बात कह दी गयी है वे कुमुद आदि वानर निकटवर्ती ईशान आदि कोणोंमें रहकर पूर्वादि द्वारोंपर आक्रमण करके नील आदिकी सहायता करते थे।

तैंतालीसवाँ सर्ग

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तैंतालीसवाँ सर्ग

द्वन्द्वयुद्धमें वानरोंद्वारा राक्षसोंकी पराजय

तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए महामना वानरों और राक्षसोंको एक-दूसरेकी सेनाको देखकर बड़ा भयंकर रोष हुआ॥ १ ॥

सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ों, हाथियों, अग्निकी ज्वालाके समान देदीप्यमान रथों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोरम कवचोंसे युक्त वे वीर राक्षस दसों दिशाओंको अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए निकले। भयानक कर्म करनेवाले वे सभी निशाचर रावणकी विजय चाहते थे॥ ३-४ ॥

भगवान् श्रीरामकी विजय चाहनेवाले वानरोंकी उस विशाल सेनाने भी घोर कर्म करनेवाले राक्षसोंकी सेनापर धावा किया॥ ४ ॥

इसी समय एक-दूसरेपर धावा बोलते हुए राक्षसों और वानरोंमें द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया॥ ५ ॥

वालिपुत्र अङ्गदके साथ महातेजस्वी राक्षस इन्द्रजित् उसी तरह भिड़ गया, जैसे त्रिनेत्रधारी महादेवजीके साथ अन्धकासुर लड़ रहा हो॥ ६ ॥

प्रजङ्घ नामक राक्षसके साथ सदा ही रणदुर्जय वीर सम्पातिने और जम्बुमालीके साथ वानर वीर हनुमान्‌जीने युद्ध आरम्भ किया॥ ७ ॥

अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए रावणानुज राक्षस विभीषण समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली शत्रुघ्नके साथ उलझ गये॥ ८ ॥

महाबली गज तपन नामक राक्षसके साथ लड़ने लगे। महातेजस्वी नील भी निकुम्भसे जूझने लगे॥ ९ ॥

वानरराज सुग्रीव प्रघसके साथ और श्रीमान् लक्ष्मण समरभूमिमें विरूपाक्षके साथ युद्ध करने लगे॥

दुर्जय वीर अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप—ये सब राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके साथ जूझने लगे॥ ११ ॥

मैन्दके साथ वज्रमुष्टि और द्विविदके साथ अशनिप्रभ युद्ध करने लगे। इस प्रकार इन दोनों भयानक राक्षसोंके साथ वे दोनों कपिशिरोमणि वीर भिड़े हुए थे॥ १२ ॥

प्रतपन नामसे प्रसिद्ध एक घोर राक्षस था, जिसे रणभूमिमें परास्त करना अत्यन्त कठिन था। वह वीर निशाचर समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली नलके साथ युद्ध करने लगा॥ १३ ॥

धर्मके बलवान् पुत्र महाकपि सुषेण राक्षस विद्युन्मालीके साथ लोहा लेने लगे॥ १४ ॥

इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वानर बहुतोंके साथ युद्ध करनेके पश्चात् दूसरे-दूसरे राक्षसोंके साथ सहसा द्वन्द्वयुद्ध करने लगे॥ १५ ॥

वहाँ राक्षस और वानरवीर अपनी-अपनी विजय चाहते थे। उनमें बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा॥ १६ ॥

वानरों और राक्षसोंके शरीरोंसे निकलकर बहुत-सी खूनकी नदियाँ बहने लगीं। उनके सिरके बाल ही वहाँ शैवाल (सेवार) के समान जान पड़ते थे। वे नदियाँ सैनिकोंकी लाशरूपी काष्ठसमूहोंको बहाये लिये जाती थीं॥ १७ ॥

जिस प्रकार इन्द्र वज्रसे प्रहार करते हैं, उसी तरह इन्द्रजित् मेघनादने शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाले वीर अङ्गदपर गदासे आघात किया॥ १८ ॥

किंतु वेगशाली वानर श्रीमान् अङ्गदने उसकी गदा हाथसे पकड़ ली और उसी गदासे इन्द्रजित्के सुवर्णजटित रथको सारथि और घोड़ोंसहित चूर-चूर कर डाला॥ १९ ॥

प्रजङ्घने सम्पातिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। तब सम्पातिने भी अश्वकर्ण नामक वृक्षसे युद्धके मुहानेपर प्रजङ्घको मार डाला॥ २० ॥

महाबली जम्बुमाली रथपर बैठा हुआ था। उसने कुपित होकर समराङ्गणमें एक रथ-शक्तिके द्वारा हनुमान्जीकी छातीपर चोट की॥ २१ ॥

परंतु पवननन्दन हनुमान् उछलकर उसके उस रथपर चढ़ गये और तुरंत ही थप्पड़से मारकर उन्होंने उस राक्षसके साथ ही उस रथको भी चौपट कर दिया (जम्बुमाली मर गया)॥ २२ ॥

दूसरी ओर भयानक राक्षस प्रतपन भीषण गर्जना करके नलकी ओर दौड़ा। शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस राक्षसने अपने तीखे बाणोंसे नलके शरीरको क्षतवि क्षत कर दिया। तब नलने तत्काल ही उसकी दोनों आँखें निकाल लीं॥ २३ ॥

उधर राक्षस प्रघस वानरसेनाको कालका ग्रास बना रहा था। यह देख वानरराज सुग्रीवने सप्तपर्ण नामक वृक्षसे उसे वेगपूर्वक मार गिराया॥ २४ १/२ ॥

लक्ष्मणने पहले बाणोंकी वर्षा करके भयंकर दृष्टिवाले राक्षस विरूपाक्षको बहुत पीड़ा दी। फिर एक बाणसे मारकर उसे मौतके घाट उतार दिया॥ २५ १/२ ॥

अग्निकेतु, दुर्जय रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप नामक राक्षसोंने श्रीरामचन्द्रजीको अपने बाणोंसे घायल कर दिया॥ २६ ॥

तब श्रीरामने कुपित हो अग्निशिखाके समान भयंकर बाणोंद्वारा समराङ्गणमें उन चारोंके सिर काट लिये॥ २७ ॥

उस युद्धस्थलमें मैन्दने वज्रमुष्टिपर मुक्केका प्रहार किया, जिससे वह रथ और घोड़ोंसहित उसी तरह पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो देवताओंका विमान धराशायी हो गया हो॥ २८ ॥

निकुम्भने काले कोयलेके समूहकी भाँति नील वर्णवाले नीलको रणक्षेत्रमें अपने पैने बाणोंद्वारा उसी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणोंद्वारा बादलोंको फाड़ देते हैं॥ २९ ॥

परंतु शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस निशाचरने समराङ्गणमें नीलको पुनः सौ बाणोंसे घायल कर दिया। ऐसा करके निकुम्भ जोर-जोरसे हँसने लगा॥ ३० ॥

यह देख नीलने उसीके रथके पहियेसे युद्धस्थलमें निकुम्भ तथा उसके सारथिका उसी तरह सिर काट लिया, जैसे भगवान् विष्णु संग्रामभूमिमें अपने चक्रसे दैत्योंके मस्तक उड़ा देते हैं॥ ३१ ॥

द्विविदका स्पर्श वज्र और अशनिके समान दुःसह था। उन्होंने सब राक्षसोंके देखते-देखते अशनिप्रभ नामक निशाचरपर एक पर्वतशिखरसे प्रहार किया॥ ३२ ॥

तब अशनिप्रभने युद्धस्थलमें वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानरराज द्विविदको वज्रतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल कर दिया॥ ३३ ॥

द्विविदका सारा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गया था, इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने एक सालवृक्षसे रथ और घोड़ोंसहित अशनिप्रभको मार गिराया॥ ३४ ॥

रथपर बैठे हुए विद्युन्मालीने अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा सुषेणको बारम्बार घायल किया। फिर वह जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ ३५ ॥

उसे रथपर बैठा देख वानरशिरोमणि सुषेणने एक विशाल पर्वत-शिखर चलाकर उसके रथको शीघ्र ही चूर-चूर कर डाला॥ ३६ ॥

निशाचर विद्युन्माली तुरंत ही बड़ी फुर्तीके साथ रथसे नीचे कूद पड़ा और हाथमें गदा लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया॥ ३७ ॥

तदनन्तर क्रोधसे भरे हुए वानरशिरोमणि सुषेण एक बहुत बड़ी शिला लेकर उस निशाचरकी ओर दौड़े॥ ३८ ॥

कपिश्रेष्ठ सुषेणको आक्रमण करते देख निशाचर विद्युन्मालीने तत्काल ही गदासे उनकी छातीपर प्रहार किया॥ ३९ ॥

गदाके उस भीषण प्रहारकी कुछ भी परवा न करके वानरप्रवर सुषेणने उसी पहलेवाली शिलाको चुपचाप उठा लिया और उस महासमरमें उसे विद्युन्मालीकी छातीपर दे मारा॥ ४० ॥

शिलाके प्रहारसे घायल हुए निशाचर विद्युन्मालीकी छाती चूर-चूर हो गयी और वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४१ ॥

इस प्रकार वे शूरवीर निशाचर शौर्यसम्पन्न वानरवीरोंद्वारा वहाँ द्वन्द्वयुद्धमें उसी तरह कुचल दिये गये जैसे देवताओंद्वारा दैत्य मथ डाले गये थे॥ ४२ ॥

उस समय भालों, अन्यान्य बाणों, गदाओं, शक्तियों, तोमरों, सायकों, टूटे और फेंके हुए रथों, फौजी घोड़ों, मरे हुए मतवाले हाथियों, वानरों, राक्षसों, पहियों तथा टूटे हुए जूओंसे, जो धरतीपर बिखरे पड़े थे, वह युद्धभूमि बड़ी भयानक हो रही थी। गीदड़ोंके समुदाय वहाँ सब ओर विचर रहे थे। देवासुर-संग्रामके समान उस भयानक मार-काटमें वानरों और राक्षसोंके कबन्ध (मस्तकरहित धड़) सम्पूर्ण दिशाओंमें उछल रहे थे॥ ४३—४५ ॥

उस समय उन वानरशिरोमणियोंद्वारा मारे जाते हुए निशाचर रक्तकी गन्धसे मतवाले हो रहे थे। वे सूर्यके अस्त होनेकी प्रतीक्षा करते हुए पुनः बड़े वेगसे घमासान युद्धमें तत्पर हो गये*॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३ ॥


* सूर्यास्तके बाद प्रदोषकालसे लेकर पूरी रातभर राक्षसोंका बल अधिक बढ़ा होता है, इसीलिये वे सूर्यास्त होनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

चौवालीसवाँ सर्ग

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चौवालीसवाँ सर्ग

रातमें वानरों और राक्षसोंका घोर युद्ध, अङ्गदके द्वारा इन्द्रजित्की पराजय, मायासे अदृश्य हुए इन्द्रजित्का नागमय बाणोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको बाँधना

इस प्रकार उन वानर और राक्षसोंमें युद्ध चल ही रहा था कि सूर्यदेव अस्त हो गये तथा प्राणोंका संहार करनेवाली रात्रिका आगमन हुआ॥ १ ॥

वानरों और राक्षसोंमें परस्पर वैर बँध गया था। दोनों ही पक्षोंके योद्धा बड़े भयंकर थे तथा अपनी-अपनी विजय चाहते थे; अतः उस समय उनमें रात्रियुद्ध होने लगा॥ २ ॥

उस दारुण अन्धकारमें वानरलोग अपने विपक्षीसे पूछते थे, क्या तुम राक्षस हो? और राक्षसलोग भी पूछते थे, क्या तुम वानर हो? इस प्रकार पूछ-पूछकर समराङ्गणमें वे एक दूसरेपर प्रहार करते थे॥ ३ ॥

सेनामें सब ओर ‘मारो, काटो, आओ तो, क्यों भागे जाते हो’—ये भयंकर शब्द सुनायी दे रहे थे॥ ४ ॥

काले-काले राक्षस सुवर्णमय कवचोंसे विभूषित होकर उस अन्धकारमें ऐसे दिखायी देते थे, मानो चमकती हुई ओषधियोंके वनसे युक्त काले पहाड़ हों॥

उस अन्धकारसे पार पाना कठिन हो रहा था। उसमें क्रोधसे अधीर हुए महान् वेगशाली राक्षस वानरोंको खाते हुए उनपर सब ओरसे टूट पड़े॥ ६ ॥

तब वानरोंका कोप बड़ा भयानक हो उठा। वे उछल-उछलकर अपने तीखे दाँतोंद्वारा सुनहरे साजसे सजे हुए राक्षस-दलके घोड़ोंको और विषधर सर्पोंके समान दिखायी देनेवाले उनके ध्वजोंको भी विदीर्ण कर देते थे॥ ७ ॥

बलवान् वानरोंने युद्धमें राक्षस-सेनाके भीतर हलचल मचा दी। वे सब-के-सब क्रोधसे पागल हो रहे थे; अतः हाथियों एवं हाथीसवारोंको तथा ध्वजा-पताकासे सुशोभित रथोंको भी खींच लेते और दाँतोंसे काट-काटकर क्षत-विक्षत कर देते थे॥ ८ १/२ ॥

बड़े-बड़े राक्षस कभी प्रकट होकर युद्ध करते थे और कभी अदृश्य हो जाते थे; परंतु श्रीराम और लक्ष्मण विषधर सर्पोंके समान अपने बाणोंद्वारा दृश्य और अदृश्य सभी राक्षसोंको मार डालते थे॥ ९ १/२ ॥

घोड़ोंकी टापसे चूर्ण होकर रथके पहियोंसे उड़ायी हुई धरतीकी धूल योद्धाओंके कान और नेत्र बंद कर देती थी॥ १० १/२ ॥

इस प्रकार रोमाञ्चकारी भयंकर संग्रामके छिड़ जानेपर वहाँ रक्तके प्रवाहको बहानेवाली खूनकी बड़ी भयंकर नदियाँ बहने लगीं॥ ११ ॥

तदनन्तर भेरी, मृदङ्ग और पणव आदि बाजोंकी ध्वनि होने लगी, जो शङ्खोंके शब्द तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिलकर बड़ी अद्भुत जान पड़ती थी॥ १२ ॥

घायल होकर कराहते हुए राक्षसों और शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हुए वानरोंका आर्तनाद वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ १३ ॥

शक्ति, शूल और फरसोंसे मारे गये मुख्य-मुख्य वानरों तथा वानरोंद्वारा कालके गालमें डाले गये इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ पर्वताकार राक्षसोंसे उपलक्षित उस युद्धभूमिमें रक्तके प्रवाहसे कीच हो गयी थी। उसे पहचानना कठिन हो रहा था तथा वहाँ ठहरना तो और मुश्किल हो गया था। ऐसा जान पड़ता था उस भूमिको शस्त्ररूपी पुष्पोंका उपहार अर्पित किया गया है॥

वानरों और राक्षसोंका संहार करनेवाली वह भयंकर रजनी कालरात्रिके समान समस्त प्राणियोंके लिये दुर्लङ्घ्य हो गयी थी॥ १६ ॥

तदनन्तर उस दारुण अन्धकारमें वहाँ वे सब राक्षस हर्ष और उत्साहमें भरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए श्रीरामपर ही धावा करने लगे॥ १७ ॥

उस समय कुपित हो गर्जना करते हुए उन आक्रमणकारी राक्षसोंका शब्द प्रलयके समय सातों समुद्रोंके महान् कोलाहल-सा जान पड़ता था॥ १८ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने पलक मारते-मारते अग्निज्वालाके समान छः भयानक बाणोंसे निम्नाङ्कित छः निशाचरोंको घायल कर दिया॥ १९ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—दुर्धर्ष वीर यज्ञशत्रु, महापार्श्व, महोदर, महाकाय, वज्रदंष्ट्र तथा वे दोनों शुक और सारण॥ २० ॥

श्रीरामके बाणसमूहोंसे सारे मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचनेके कारण वे छहों राक्षस युद्ध छोड़कर भाग गये; इसीलिये उनकी आयु शेष रह गयी—जान बच गयी॥ २१ ॥

महारथी श्रीरामने अग्निशिखाके समान प्रज्वलित भयंकर बाणोंद्वारा पलक मारते-मारते सम्पूर्ण दिशाओं और उनके कोणोंको निर्मल (प्रकाशपूर्ण) कर दिया॥ २२ ॥

दूसरे भी जो-जो राक्षसवीर श्रीरामके सामने खड़े थे, वे भी उसी प्रकार नष्ट हो गये, जैसे आगमें पड़कर पतिंगे जल जाते हैं॥ २३ ॥

चारों ओर सुवर्णमय पङ्खवाले बाण गिर रहे थे। उनकी प्रभासे वह रजनी जुगुनुओंसे विचित्र दिखायी देनेवाली शरद् ऋतुकी रात्रिके समान अद्भुत प्रतीत होती थी॥ २४ ॥

राक्षसोंके सिंहनादों और भेरियोंकी आवाजोंसे वह भयानक रात्रि और भी भयंकर हो उठी थी॥ २५ ॥

सब ओर फैले हुए उस महान् शब्दसे प्रतिध्वनित हो कन्दराओंसे व्याप्त त्रिकूट पर्वत मानो किसीकी बातका उत्तर देता-सा जान पड़ता था॥ २६ ॥

लंगूर जातिके विशालकाय वानर जो अन्धकारके समान काले थे, निशाचरोंको दोनों भुजाओंमें कसकर मार डालते और उन्हें कुत्ते आदिको खिला देते थे॥

दूसरी ओर अङ्गद रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करनेके लिये आगे बढ़े। उन्होंने रावणपुत्र इन्द्रजित्को घायल कर दिया तथा उसके सारथि और घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया॥ २८ ॥

अङ्गदके द्वारा घोड़े और सारथिके मारे जानेपर महान् कष्टमें पड़ा हुआ इन्द्रजित् रथको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया॥ २९ ॥

प्रशंसाके योग्य वालिकुमार अङ्गदके उस पराक्रमकी ऋषियोंसहित देवताओं तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ ३० ॥

सम्पूर्ण प्राणी युद्धमें इन्द्रजित्के प्रभावको जानते थे; अतः अङ्गदके द्वारा उसको पराजित हुआ देख उन महात्मा अंगदपर दृष्टिपात करके सबको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३१ ॥

शत्रुको पराजित हुआ देख सुग्रीव और विभीषण-सहित सब वानर बड़े प्रसन्न हुए और अङ्गदको साधुवाद देने लगे॥ ३२ ॥

युद्धस्थलमें भयानक कर्म करनेवाले वालिपुत्र अङ्गदसे पराजित होकर इन्द्रजित्ने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया॥ ३३ ॥

रावणकुमार वीर इन्द्रजित् ब्रह्माजीसे वर प्राप्त कर चुका था। युद्धमें अधिक कष्ट पानेके कारण वह पापी रावणपुत्र क्रोधसे अचेत-सा हो रहा था; अतः अन्तर्धानविद्याका आश्रय ले अदृश्य हो उसने वज्रके समान तेजस्वी और तीखे बाण बरसाने आरम्भ किये॥ ३४ १/२ ॥

समराङ्गणमें कुपित हुए इन्द्रजित्ने घोर सर्पमय बाणोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको घायल कर दिया। वे दोनों रघुवंशी बन्धु अपने सभी अङ्गोंमें चोट खाकर ८३९
क्षत-विक्षत हो रहे थे॥ ३५ १/२ ॥

मायासे आवृत हो समस्त प्राणियोंके लिये अदृश्य होकर वहाँ कूटयुद्ध करनेवाले उस निशाचरने युद्धस्थलमें दोनों रघुवंशी बन्धु श्रीराम और लक्ष्मणको मोहमें डालते हुए उन्हें सर्पाकार बाणोंके बन्धनमें बाँध लिया॥ ३६-३७ ॥

इस प्रकार क्रोधसे भरे हुए इन्द्रजित्ने उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको सहसा सर्पाकार बाणोंद्वारा बाँध लिया। उस समय वानरोंने उन्हें नागपाशमें बद्ध देखा॥ ३८ ॥

प्रकटरूपसे युद्ध करते समय जब राक्षस-राजकुमार इन्द्रजित् उन दोनों राजकुमारोंको बाधा देनेमें समर्थ न हो सका, तब उनपर मायाका प्रयोग करनेको उतारू हो गया और उन दोनों भाइयोंको उस दुरात्माने बाँध लिया॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४ ॥

पैंतालीसवाँ सर्ग

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पैंतालीसवाँ सर्ग

इन्द्रजित्के बाणोंसे श्रीराम और लक्ष्मणका अचेत होना और वानरोंका शोक करना

तदनन्तर अत्यन्त बलशाली प्रतापी राजकुमार श्रीरामने इन्द्रजित्का पता लगानेके लिये दस वानरयूथ पतियोंको आज्ञा दी॥ १ ॥

उनमें दो तो सुषेणके पुत्र थे और शेष आठ वानरराज नील, वालिपुत्र अङ्गद, वेगशाली वानर शरभ, द्विविद, हनुमान्, महाबली सानुप्रस्थ, ऋषभ तथा ऋषभस्कन्ध थे। शत्रुओंको संताप देनेवाले इन दसोंको उसका अनुसंधान करनेके लिये आज्ञा दी॥ २-३ ॥

तब वे सभी वानर भयंकर वृक्ष उठाकर दसों दिशाओंमें खोजते हुए बड़े हर्षके साथ आकाशमार्गसे चले॥ ४ ॥

किंतु अस्त्रोंके ज्ञाता रावणकुमार इन्द्रजित्ने अत्यन्त वेगशाली बाणोंकी वर्षा करके अपने उत्तम अस्त्रोंद्वारा उन वेगवान् वानरोंके वेगको रोक दिया॥ ५ ॥

बाणोंसे क्षत-विक्षत हो जानेपर भी वे भयानक वेगशाली वानर अन्धकारमें मेघोंसे ढके हुए सूर्यकी भाँति इन्द्रजित्को न देख सके॥ ६ ॥

तत्पश्चात् युद्धविजयी रावणपुत्र इन्द्रजित् फिर श्रीराम और लक्ष्मणपर ही उनके सम्पूर्ण अङ्गोंको विदीर्ण करनेवाले बाणोंकी बारम्बार वर्षा करने लगा॥ ७ ॥

कुपित हुए इन्द्रजित्ने उन दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मणको बाणरूपधारी सर्पोंद्वारा इस तरह बींधा कि उनके शरीरमें थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ बाण न लगे हों॥ ८ ॥

उन दोनोंके अङ्गोंमें जो घाव हो गये थे, उनके मार्गसे बहुत रक्त बहने लगा। उस समय वे दोनों भाँड़ खिले हुए दो पलाश-वृक्षोंके समान प्रकाशित हो रहे थे॥

इसी समय जिसके नेत्रप्रान्त कुछ लाल थे और शरीर खानसे काटकर निकाले गये कोयलोंके ढेरकी भाँति काला था, वह रावणकुमार इन्द्रजित् अन्तर्धान-अवस्थामें ही उन दोनों भाइयोंसे इस प्रकार बोला— ॥ १० ॥

‘युद्धके समय अलक्ष्य हो जानेपर तो मुझे देवराज इन्द्र भी नहीं देख या पा सकता; फिर तुम दोनोंकी क्या बिसात है?॥ ११ ॥

‘मैंने तुम दोनों रघुवंशियोंको कंकपत्रयुक्त बाणके जालमें फँसा लिया है। अब रोषसे भरकर मैं अभी तुम दोनोंको यमलोक भेज देता हूँ’॥ १२ ॥

ऐसा कहकर वह धर्मके ज्ञाता दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको पैने बाणोंसे बींधने लगा और हर्षका अनुभव करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ १३ ॥

कटे-छटे कोयलेकी राशिके समान काला इन्द्रजित् फिर अपने विशाल धनुषको फैलाकर उस महासमरमें घोर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ १४ ॥

मर्मस्थलको जाननेवाला वह वीर श्रीराम और लक्ष्मणके मर्मस्थानोंमें अपने पैने बाणोंको डुबोता हुआ बारम्बार गर्जना करने लगा॥ १५ ॥

युद्धके मुहानेपर बाणके बन्धनसे बँधे हुए वे दोनों बन्धु पलक मारते-मारते ऐसी दशाको पहुँच गये कि उनमें आँख उठाकर देखनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी (वास्तवमें यह उनकी मनुष्यताका नाट्य करनेवाली लीलामात्र थी। वे तो कालके भी काल हैं। उन्हें कौन बाँध सकता था?)॥ १६ ॥

इस प्रकार उनके सारे अङ्ग बिंध गये थे। बाणोंसे व्याप्त हो गये थे। वे रस्सीसे मुक्त हुए देवराज इन्द्रके दो ध्वजोंके समान कम्पित होने लगे॥ १७ ॥

वे महान् धनुर्धर वीर भूपाल मर्मस्थलके भेदनसे विचलित एवं कृशकाय हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १८ ॥

युद्धभूमिमें वीरशय्यापर सोये हुए वे दोनों वीर रक्तसे नहा उठे थे। उनके सारे अङ्गोंमें बाणरूपधारी नाग लिपटे हुए थे तथा वे अत्यन्त पीड़ित एवं व्यथित हो रहे थे॥ १९ ॥

उनके शरीरमें एक अङ्गुल भी जगह ऐसी नहीं थी, जो बाणोंसे बिंधी न हो तथा हाथोंके अग्रभागतक कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं था, जो बाणोंसे विदीर्ण अथवा क्षुब्ध न हुआ हो॥ २० ॥

जैसे झरने जल गिराते रहते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस क्रूर राक्षसके बाणोंसे घायल हो तीव्र वेगसे रक्तकी धारा बहा रहे थे॥ २१ ॥

जिसने पूर्वकालमें इन्द्रको परास्त किया था, उस इन्द्रजित्के क्रोधपूर्वक चलाये हुए बाणोंद्वारा मर्मस्थलमें आहत होनेके कारण पहले श्रीराम ही धराशायी हुए॥ २२ ॥

इन्द्रजित्ने उन्हें सोनेके पंख, स्वच्छ अग्रभाग और धूलके समान गतिवाले (अर्थात् धूलकी भाँति छिद्ररहित स्थानमें भी प्रवेश करनेवाले) शीघ्रगामी नाराच¹, अर्धनाराच², भल्ल³,

अञ्जलिक⁴, वत्सदन्त ५, सिंहदंष्ट्र⁶ और क्षुर⁷ जातिके बाणोंद्वारा घायल कर दिया था॥ २३ ॥

जिसकी प्रत्यञ्चा चढ़ी हुई थी, किंतु मुट्ठीका बन्धन ढीला पड़ गया था, जो दोनों पार्श्वभाग और मध्यभाग तीनों स्थानोंमें झुका हुआ तथा सुवर्णसे भूषित था, उस धनुषको त्यागकर भगवान् श्रीराम वीरशय्यापर सोये हुए थे॥ २४ ॥

फेंरुका हुआ बाण जितनी दूरीपर गिरता है, अपनेसे उतनी ही दूरीपर धरतीपर पड़े हुए पुरुषप्रवर श्रीरामको देखकर लक्ष्मण वहाँ अपने जीवनसे निराश हो गये॥ २५ ॥

सबको शरण देनेवाले और युद्धसे संतुष्ट होनेवाले अपने भाई कमलनयन श्रीरामको पृथ्वीपर पड़ा देख लक्ष्मणको बड़ा शोक हुआ॥ २६ ॥

उन्हें उस अवस्थामें देखकर वानरोंको भी बड़ा संताप हुआ। वे शोकसे आतुर हो नेत्रोंमें आँसू भरकर घोर आर्तनाद करने लगे॥ २७ ॥

नागपाशमें बँधकर वीरशय्यापर सोये हुए उन दोनों भाइयोंको चारों ओरसे घेरकर सब वानर खड़े हो गये। वहाँ आये हुए हनुमान् आदि मुख्य-मुख्य वानर व्यथित हो बड़े विषादमें पड़ गये॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५ ॥


१. जिसका अग्रभाग सीधा और गोल हो, उस बाणको ‘नाराच’ कहते हैं।
२. अर्ध भागमें नाराचकी समानता रखनेवाले बाण ‘अर्धनाराच’ कहलाते हैं।
३. जिनका अग्रभाग फरसेके समान हो, उस बाणकी ‘भल्ल’ संज्ञा है। आधुनिक भालेको भी भल्ल कहते हैं।
४. जिसका मुखभाग दोनों हाथोंकी अञ्जलिके समान हो, वह बाण ‘अञ्जलिक’ कहा गया है।
५. जिसका अग्रभाग बछड़ेके दाँतोंके समान दिखायी देता हो, उस बाणकी ‘वत्सदन्त’ संज्ञा होती है।
६. सिंहकी दाढ़के समान अग्रभागवाला बाण।
७. जिसका अग्रभाग क्षुरेकी धारके समान हो, उस बाणको ‘क्षुर’ कहते हैं।