भारतकोश
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ सातवाँ सर्ग

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एक सौ सातवाँ सर्ग

श्रीराम और रावणका घोर युद्ध

तदनन्तर श्रीराम और रावणमें अत्यन्त क्रूरतापूर्वक महान् द्वैरथ युद्ध आरम्भ हुआ, जो समस्त लोकोंके लिये भयंकर था॥ १ ॥

उस समय राक्षसों और वानरोंकी विशाल सेनाएँ हाथमें हथियार लिये रहनेपर भी निश्चेष्ट खड़ी रहीं— कोई किसीपर प्रहार नहीं करता था॥ २ ॥

मनुष्य और निशाचर दोनों वीरोंको बलपूर्वक युद्ध करते देख सबके हृदय उन्हींकी ओर खिंच गये; अतः सभी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ३ ॥

दोनों ओरके सैनिकोंके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे और उनके हाथ युद्धके लिये व्यग्र थे, तथापि उस अद्भुत संग्रामको देखकर उनकी बुद्धि आश्चर्यचकित हो उठी थी; इसलिये वे चुपचाप खड़े थे। एक-दूसरेपर प्रहार नहीं करते थे॥ ४ ॥

राक्षस रावणकी ओर देख रहे थे और वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर। उन सबके नेत्र विस्मित थे; अतः निस्तब्ध खड़ी रहनेके कारण उभय पक्षकी सेनाएँ चित्रलिखित-सी जान पड़ती थीं॥ ५ ॥

श्रीराम और रावण दोनोंने वहाँ प्रकट होनेवाले निमित्तोंको देखकर उनके भावी फलका विचार करके युद्धविषयक विचारको स्थिर कर लिया था। उन दोनोंमेंसे एक-दूसरेके प्रति अमर्षका भाव दृढ़ हो गया था; इसलिये वे निर्भय-से होकर युद्ध करने लगे॥ ६ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास था कि मेरी ही जीत होगी और रावणको भी यह निश्चय हो गया था कि मुझे अवश्य ही मरना होगा; अतः वे दोनों युद्धमें अपना सारा पराक्रम प्रकट करके दिखाने लगे॥ ७ ॥

उस समय पराक्रमी दशाननने क्रोधपूर्वक बाणोंका संधान करके श्रीरघुनाथजीके रथपर फहराती हुई ध्वजाको निशाना बनाया और उन बाणोंको छोड़ दिया॥ ८ ॥

परंतु उसके चलाये हुए वे बाण इन्द्रके रथकी ध्वजातक न पहुँच सके, केवल रथशक्तिको* छूते हुए धरतीपर गिर पड़े॥ ९ ॥

तब महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी कुपित होकर अपने धनुषको खींचा और मन-ही-मन रावणके कृत्यका बदला चुकाने—उसके ध्वजको काट गिरानेका विचार किया॥ १०॥

रावणके ध्वजको लक्ष्य करके उन्होंने विशाल सर्पके समान असह्य और अपने तेजसे प्रज्वलित तीखा बाण छोड़ दिया॥ ११॥

तेजस्वी श्रीरामने उस ध्वजकी ओर निशाना साधकर अपना सायक चलाया और वह दशाननके उस ध्वजको काटकर पृथ्वीमें समा गया॥ १२॥

रावणके रथका वह ध्वज कटकर धरतीपर गिर पड़ा। अपने ध्वजका विध्वंस हुआ देख महाबली रावण क्रोधसे जल उठा और अमर्षके कारण विपक्षीको जलाता हुआ-सा जान पड़ा। वह रोषके वशीभूत होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ १३-१४॥

रावणने अपने तेजस्वी बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको घायल करना आरम्भ किया; परंतु वे घोड़े दिव्य थे, इसलिये न तो लड़खड़ाये और न अपने स्थानसे विचलित ही हुए। वे पूर्ववत् स्वस्थचित्त बने रहे, मानो उनपर कमलकी नालोंसे प्रहार किया गया हो॥ १५ १/२ ॥

उन घोड़ोंका घबराहटमें न पड़ना देख रावणका क्रोध और भी बढ़ गया। वह पुनः बाणोंकी वर्षा करने लगा। गदा, चक्र, परिघ, मूसल, पर्वत-शिखर, वृक्ष, शूल, फरसे तथा मायानिर्मित अन्यान्य शस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा। उसने हृदयमें थकावटका अनुभव न करके सहस्रों बाण छोड़े॥ १६—१८॥

युद्धस्थलमें अनेक शस्त्रोंकी वह विशाल वर्षा बड़ी भयानक, तुमुल, त्रासजनक और भयंकर कोलाहलसे पूर्ण थी॥ १९॥

वह शस्त्रवर्षा श्रीरामचन्द्रजीके रथको छोड़कर सब ओरसे वानर-सेनाके ऊपर पड़ने लगी। दशमुख रावणने प्राणोंका मोह छोड़कर बाणोंका प्रयोग किया और अपने सायकोंसे वहाँके आकाशको ठसाठस भर दिया॥ २० १/२ ॥

तदनन्तर रणभूमिमें रावणको बाण चलानेमें अधिक परिश्रम करते देख श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए-से तीखे बाणोंका संधान किया और उन्हें सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें छोड़ा॥ २१-२२॥

उन बाणोंको देखकर रावणने पुनः अपने बाण बरसाये और आकाशको इतना भर दिया कि उसमें तिल रखनेकी भी जगह नहीं रह गयी। उन दोनोंके द्वारा की गयी चमकीले बाणोंकी

वर्षासे वहाँका प्रकाशमान आकाश बाणोंसे बद्ध होकर किसी और ही आकाश-सा प्रतीत होता था॥ २३ १/२ ॥

उनका चलाया हुआ कोर्इ भी बाण लक्ष्यतक पहुँचे बिना नहीं रहता था, लक्ष्यको बेधे या विदीर्ण किये बिना नहीं रुकता था तथा निष्फल भी नहीं होता था। इस तरह युद्धमें शस्त्रवर्षा करते हुए श्रीराम और रावणके बाण जब आपसमें टकराते थे, तब नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर जाते थे॥ २४-२५ ॥

वे दोनों योद्धा दायें-बायें प्रहार करते हुए निरन्तर युद्धमें लगे रहे। उन्होंने अपने भयंकर बाणोंसे आकाशको इस तरह भर दिया कि मानो उसमें साँस लेनेकी भी जगह नहीं रह गयी॥ २६ ॥

श्रीरामने रावणके घोड़ोंको और रावणने श्रीरामके घोड़ोंको घायल कर दिया। वे दोनों एक-दूसरेके प्रहारका बदला चुकाते हुए परस्पर आघात करते रहे॥ २७ ॥

इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए उत्तम रीतिसे युद्ध करने लगे। दो घड़ीतक तो उन दोनोंमें ऐसा भयंकर संग्राम हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ २८ ॥

इस प्रकार युद्धमें लगे हुए श्रीराम तथा रावणको सम्पूर्ण प्राणी चकितचित्तसे निहारने लगे॥ २९ ॥

उन दोनोंके वे श्रेष्ठ रथ (तथा उसमें बैठे हुए रथी) समरभूमिमें अत्यन्त क्रोधपूर्वक एक-दूसरेको पीड़ा देने और परस्पर धावा करने लगे॥ ३० ॥

एक-दूसरेके वधके प्रयत्नमें लगे हुए वे दोनों वीर बड़े भयानक जान पड़ते थे। उन दोनोंके सारथि कभी रथको चक्कर काटते हुए ले जाते, कभी सीधे मार्गसे दौड़ाते और कभी आगेकी ओर बढ़ाकर पीछेकी ओर लौटाते थे। इस तरह वे दोनों अपने रथको हाँकनेमें विविध प्रकारके ज्ञानका परिचय देने लगे॥ ३१ १/२ ॥

श्रीराम रावणको पीड़ित करने लगे और रावण श्रीरामको पीड़ा देने लगा। इस प्रकार युद्धविषयक प्रवृत्ति और निवृत्तिमें वे दोनों तदनुरूप गतिवेगका आश्रय लेते थे॥ ३२ १/२ ॥

बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन दोनों वीरोंके वे श्रेष्ठ रथ जलकी धारा गिराते हुए दो जलधरोंके समान युद्धभूमिमें विचर रहे थे॥ ३३ १/२ ॥

वे दोनों रथ युद्धस्थलमें भाँति-भाँतिकी गतिका प्रदर्शन करनेके बाद फिर आमने-सामने आकर खड़े हो गये॥ ३४ १/२ ॥

उस समय वहाँ खड़े हुए उन दोनों रथोंके युगन्धर (हरसोंकी संधि) युगन्धरसे, घोड़ोंके मुख विपक्षी घोड़ोंके मुखसे तथा पताकाएँ पताकाओंसे मिल गयीं॥

तत्पश्चात् श्रीरामने अपने धनुषसे छूटे हुए चार पैने बाणोंद्वारा रावणके चारों तेजस्वी घोड़ोंको पीछे हटनेके लिये विवश कर दिया॥ ३६ १/२ ॥

घोड़ोंके पीछे हटनेपर दशमुख रावण क्रोधके वशीभूत हो गया और श्रीरामपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ३७ १/२ ॥

बलवान् दशाननके द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर भी श्रीरघुनाथजीके चेहरेपर शिकनतक न आयी और न उनके मनमें व्यथा ही हुई॥ ३८ १/२ ॥

तत्पश्चात् रावणने इन्द्रके सारथि मातलिको लक्ष्य करके वज्रके समान शब्द करनेवाले बाण छोड़े॥ ३९ १/२ ॥

वे महान् वेगशाली बाण युद्धस्थलमें मातलिके शरीरपर पड़कर उन्हें थोड़ा-सा भी मोह या व्यथा न दे सके॥ ४० १/२ ॥

रावणद्वारा मातलिके प्रति आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको जैसा क्रोध हुआ, वैसा अपनेपर किये गये आक्रमणसे नहीं हुआ था। अतः उन्होंने बाणोंका जाल-सा बिछाकर अपने शत्रुको युद्धसे विमुख कर दिया॥ ४१ १/२ ॥

वीर रघुनाथजीने शत्रुके रथपर बीस, तीस, साठ, सौ और हजार-हजार बाणोंकी वृष्टि की॥ ४२ १/२ ॥

तब रथपर बैठा हुआ राक्षसराज रावण भी कुपित हो उठा और गदा तथा मूसलोंकी वर्षासे रणभूमिमें श्रीरामको पीड़ा देने लगा॥ ४३ १/२ ॥

इस प्रकार उन दोनोंमें पुनः बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। गदाओं, मूसलों और परिघोंकी आवाजसे तथा बाणोंके पंखोंकी सनसनाती हुई हवासे सातों समुद्र विक्षुब्ध हो उठे॥ ४४-४५ ॥

उन विक्षुब्ध समुद्रोंके पातालतलमें निवास करनेवाले समस्त दानव और सहस्रों नाग व्यथित हो गये॥ ४६ ॥

पर्वतों, वनों और काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी, सूर्यकी प्रभा लुप्त हो गयी और वायुकी गति भी रुक गयी॥ ४७ ॥

देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, किन्नर और बड़े-बड़े नाग सभी चिन्तामें पड़ गये॥ ४८ ॥

सबके मुँहसे यही बात निकलने लगी— ‘गौ और ब्राह्मणोंका कल्याण हो, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले इन लोकोंकी रक्षा हो और श्रीरघुनाथजी युद्धमें राक्षसराज रावणपर विजय पावें,’॥ ४९ ॥

इस प्रकार कहते हुए ऋषियोंसहित वे देवगण श्रीराम और रावणके अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी युद्धको देखने लगे॥ ५० ॥

गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय उस अनुपम युद्धको देखकर कहने लगे— ‘आकाश आकाशके ही तुल्य है, समुद्र समुद्रके ही समान है तथा राम और रावणका युद्ध राम और रावणके युद्धके ही सदृश है’* ऐसा कहते हुए वे सब लोग राम-रावणका युद्ध देखने लगे॥

तदनन्तर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरामचन्द्रजीने कुपित होकर अपने धनुषपर एक विषधर सर्पके समान बाणका संधान किया और उसके द्वारा जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त रावणका एक सुन्दर मस्तक काट डाला। उसका वह कटा हुआ सिर उस समय पृथ्वीपर गिर पड़ा, जिसे तीनों लोकोंके प्राणियोंने देखा॥

उसकी जगह रावणके वैसा ही दूसरा नया सिर उत्पन्न हो गया। शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शीघ्रकारी श्रीरामने युद्धस्थलमें अपने सायकोंद्वारा रावणका वह दूसरा सिर भी शीघ्र ही काट डाला॥ ५५ १/२ ॥

उसके कटते ही पुनः नया सिर उत्पन्न दिखायी देने लगा, किंतु उसे भी श्रीरामके वज्रतुल्य सायकोंने काट डाला॥ ५६ १/२ ॥

इस प्रकार एक-से तेजवाले उसके सौ सिर काट डाले गये, तथापि उसके जीवनका नाश होनेके लिये उसके मस्तकोंका अन्त होता नहीं दिखायी देता था॥

तदनन्तर कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता वीर श्रीरामचन्द्रजी अनेक प्रकारके बाणोंसे युक्त होनेपर भी इस प्रकार चिन्ता करने लगे— ॥

‘अहो! मैंने जिन बाणोंसे मारीच, खर और दूषणको मारा, क्रौञ्चवनके गड्ढेमें विराधका वध किया, दण्डकारण्यमें कबन्धको मौतके घाट उतारा, सालवृक्ष और पर्वतोंको विदीर्ण किया, वालीके प्राण लिये और समुद्रको भी क्षुब्ध कर दिया, अनेक बारके संग्राममें परीक्षा करके जिनकी अमोघताका विश्वास कर लिया गया है, वे ही ये मेरे सब सायक आज रावणके ऊपर निस्तेज—कुण्ठित हो गये हैं; इसका क्या कारण हो सकता है?’॥

इस तरह चिन्तामें पड़े होनेपर भी श्रीरघुनाथजी युद्धस्थलमें सतत सावधान रहे। उन्होंने रावणकी छातीपर बाणोंकी झड़ी लगा दी॥ ६२ ॥

तब रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणने भी कुपित होकर रणभूमिमें श्रीरामको गदा और मूसलोंकी वर्षासे पीड़ित करना आरम्भ किया॥ ६३ ॥

उस महायुद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। वह युद्ध कभी आकाशमें, कभी भूतलपर और कभी-कभी पर्वतके शिखरपर होता था॥ ६४ ॥

देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग और राक्षसोंके देखते-देखते वह महान् संग्राम सारी रात चलता रहा॥

श्रीराम और रावणका वह युद्ध न रातमें बंद होता था और न दिनमें। दो घड़ी अथवा एक क्षणके लिये भी उसका विराम नहीं हुआ॥ ६६ ॥

एक ओर दशरथकुमार श्रीराम थे और दूसरी ओर राक्षसराज रावण। उन दोनोंमेंसे श्रीरघुनाथजीकी युद्धमें विजय होती न देख देवराजके सारथि महात्मा मातलिने युद्धपरायण श्रीरामसे शीघ्रतापूर्वक कहा— ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७ ॥


* रथकी कलशीपरका वह बाँस जिसमें लड़ाईके रथोंकी ध्वजाएँ लगायी जाती थीं। कुछ विद्वानोंने रथशक्तिका अर्थ—रथकी अद्भुत सामर्थ्य किया है। वैसा अर्थ माननेपर यह भाव निकलता है कि रथके अद्भुत प्रभावका अनुभव करके वे बाण ध्वजतक न पहुँचकर पृथ्वीपर ही गिर पड़े।
* ‘गगनं गगनाकारं’से ‘रामरावणयोरिव’ तकके श्लोकमें अनन्वयालङ्कार है। जहाँ एक ही वस्तु उपमान और उपमेयरूपसे कही जाय, दूसरी कोई उपमा न मिल सके, वहाँ अनन्वयालङ्कार होता है।

एक सौ आठवाँ सर्ग

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एक सौ आठवाँ सर्ग

श्रीरामके द्वारा रावणका वध

मातलिने श्रीरघुनाथजीको कुछ याद दिलाते हुए कहा— ‘वीरवर! आप अनजानकी तरह क्यों इस राक्षसका अनुसरण कर रहे हैं? (यह जो अस्त्र चलाता है, उसके निवारण करनेवाले अस्त्रका प्रयोगमात्र करके रह जाते हैं)॥ १ ॥

‘प्रभो! आप इसके वधके लिये ब्रह्माजीके अस्त्रका प्रयोग कीजिये। देवताओंने इसके विनाशका जो समय बताया है, वह अब आ पहुँचा है’॥ २ ॥

मातलिके इस वाक्यसे श्रीरामचन्द्रजीको उस अस्त्रका स्मरण हो आया। फिर तो उन्होंने फुफकारते हुए सर्पके समान एक तेजस्वी बाण हाथमें लिया॥ ३ ॥

यह वही बाण था, जिसे पहले शक्तिशाली भगवान् अगस्त्य ऋषिने रघुनाथजीको दिया था। वह विशाल बाण ब्रह्माजीका दिया हुआ था और युद्धमें अमोघ था॥

अमित तेजस्वी ब्रह्माजीने पहले इन्द्रके लिये उस बाणका निर्माण किया था और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले देवेन्द्रको ही पूर्वकालमें अर्पित किया था॥ ५ ॥

उस बाणके वेगमें वायुकी, धारमें अग्नि और सूर्यकी, शरीरमें आकाशकी तथा भारीपनमें मेरु और मन्दराचलकी प्रतिष्ठा की गयी थी॥ ६ ॥

वह सम्पूर्ण भूतोंके तेजसे बनाया गया था। उससे सूर्यके समान ज्योति निकलती रहती थी। वह सुवर्णसे भूषित, सुन्दर पंखसे युक्त, स्वरूपसे जाज्वल्यमान, प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निके समान भयंकर, दीप्तिमान्, विषधर सर्पके समान विषैला, मनुष्य, हाथी और घोड़ोंको विदीर्ण कर डालनेवाला तथा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यका भेदन करनेवाला था॥ ७-८ ॥

बड़े-बड़े दरवाजों, परिघों तथा पर्वतोंको भी तोड़-फोड़ देनेकी उसमें शक्ति थी। उसका सारा शरीर नाना प्रकारके रक्तमें नहाया और चर्बीसे परिपुष्ट हुआ था। देखनेमें भी वह बड़ा भयंकर था। वज्रके समान कठोर, महान् शब्दसे युक्त, अनेकानेक युद्धोंमें शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाला, सबको त्रास देनेवाला तथा फुफकारते हुए सर्पके समान भयंकर था। युद्धमें वह यमराजका भयावह रूप धारण कर लेता था। समरभूमिमें कौए, गीध, बगुले, गीदड़ तथा पिशाचोंको वह सदा भक्ष्य प्रदान करता था॥ ९—११ ॥

वह सायक वानर-यूथपतियोंको आनन्द देनेवाला तथा राक्षसोंको दुःखमें डालनेवाला था। गरुड़के सुन्दर विचित्र और नाना प्रकारके पंख लगाकर वह पंखयुक्त बना हुआ था॥ १२ ॥

वह उत्तम बाण समस्त लोकों तथा इक्ष्वाकुवंशियोंके भयका नाशक था, शत्रुओंकी कीर्तिका अपहरण तथा अपने हर्षकी वृद्धि करनेवाला था। उस महान् सायकको वेदोक्त विधिसे अभिमन्त्रित करके महाबली श्रीरामने अपने धनुषपर रखा॥ १३-१४ ॥

श्रीरघुनाथजी जब उस उत्तम बाणका संधान करने लगे, तब सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और धरती डोलने लगी॥ १५ ॥

श्रीरामने अत्यन्त कुपित हो बड़े यत्नके साथ धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर उस मर्मभेदी बाणको रावणपर चला दिया॥ १६ ॥

वज्रधारी इन्द्रके हाथोंसे छूटे हुए वज्रके समान दुर्धर्ष और कालके समान अनिवार्य वह बाण रावणकी छातीपर जा लगा॥ १७ ॥

शरीरका अन्त कर देनेवाले उस महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाणने छूटते ही दुरात्मा रावणके हृदयको विदीर्ण कर डाला॥ १८ ॥

शरीरका अन्त करके रावणके प्राण हर लेनेवाला वह बाण उसके खूनसे रँगकर वेगपूर्वक धरतीमें समा गया॥

इस प्रकार रावणका वध करके खूनसे रँगा हुआ वह शोभाशाली बाण अपना काम पूरा करनेके पश्चात् पुनः विनीत सेवककी भाँति श्रीरामचन्द्रजीके तरकसमें लौट आया॥ २० ॥

श्रीरामके बाणोंकी चोट खाकर रावण जीवनसे हाथ धो बैठा। उसके प्राण निकलनेके साथ ही हाथसे सायकसहित धनुष भी छूटकर गिर पड़ा॥ २१ ॥

वह भयानक वेगशाली महातेजस्वी राक्षसराज प्राणहीन हो वज्रके मारे हुए वृत्रासुरकी भाँति रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २२ ॥

रावणको पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए सम्पूर्ण निशाचर स्वामीके मारे जानेसे भयभीत हो सब ओर भाग गये॥ २३ ॥

दशमुख रावणका वध हुआ देख विजयसे सुशोभित होनेवाले वानर, जो वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले थे, गर्जना करते हुए उन राक्षसोंपर टूट पड़े॥ २४ ॥

उन हर्षोल्लासित वानरोंद्वारा पीड़ित किये जानेपर वे राक्षस भयके मारे लङ्कापुरीकी ओर भाग गये; क्योंकि उनका आश्रय नष्ट हो गया था। उनके मुखपर करुणायुक्त आँसुओंकी धारा बह रही थी॥ २५ ॥

उस समय वानर विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित हो अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा श्रीरघुनाथजीकी विजय और रावणके वधकी घोषणा करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ २६ ॥

इसी समय आकाशमें मधुर स्वरसे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। वायु दिव्य सुगन्ध बिखेरती हुई मन्द-मन्द गतिसे प्रवाहित होने लगी॥ २७ ॥

अन्तरिक्षसे भूतलपर श्रीरघुनाथजीके रथके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी, जो दुर्लभ तथा मनोहर थी॥

आकाशमें महामना देवताओंके मुखसे निकली हुई श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुतिसे युक्त साधुवादकी श्रेष्ठ वाणी सुनायी देने लगी॥ २९ ॥

सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले रौद्र राक्षस रावणके मारे जानेपर देवताओं और चारणोंको महान् हर्ष हुआ॥ ३० ॥

श्रीरघुनाथजीने राक्षसराजको मारकर सुग्रीव, अङ्गद तथा विभीषणको सफलमनोरथ किया और स्वयं भी उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् देवताओंको बड़ी शान्ति मिली, सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं—उनमें प्रकाश छा गया, आकाश निर्मल हो गया, पृथ्वीका काँपना बंद हुआ, हवा स्वाभाविक गतिसे चलने लगी तथा सूर्यकी प्रभा भी स्थिर हो गयी॥ ३२ ॥

सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा लक्ष्मण अपने सुहृदोंके साथ युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीकी विजयसे बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद उन सबने मिलकर नयनाभिराम श्रीरामकी विधिवत् पूजा की॥ ३३ ॥

शत्रुको मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करनेके पश्चात् स्वजनोंसहित सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी रघुकुलराजकुमार श्रीराम रणभूमिमें देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०८ ॥

एक सौ नवाँ सर्ग

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एक सौ नवाँ सर्ग

विभीषणका विलाप और श्रीरामका उन्हें समझाकर रावणके अन्त्येष्टि-संस्कारके लिये आदेश देना

पराजित हुए भाईको मरकर रणभूमिमें पड़ा देख विभीषणका हृदय शोकके वेगसे व्याकुल हो गया और वे विलाप करने लगे—॥ १ ॥

‘हा विख्यात पराक्रमी वीर भाई दशानन! हा कार्यकुशल नीतिज्ञ! तुम तो सदा बहुमूल्य बिछौनोंपर सोया करते थे, आज इस तरह मारे जाकर भूमिपर क्यों पड़े हो?॥

‘हे वीर! तुम्हारी ये बाजूबंदसे विभूषित दोनों विशाल भुजाएँ निश्चेष्ट हो गयी हैं। तुम इन्हें फैलाकर क्यों पड़े हुए हो? तुम्हारे माथेका मुकुट जो सूर्यके समान तेजस्वी है, यहाँ फेंका पड़ा है॥ ३ ॥

‘वीरवर! आज तुम्हारे ऊपर वही संकट आकर पड़ा है, जिसके लिये मैंने तुम्हें पहलेसे ही आगाह कर दिया था; किंतु उस समय काम और मोहके वशीभूत होनेके कारण तुम्हें मेरी बातें नहीं रुची थीं॥ ४ ॥

‘अहङ्कारके कारण न तो प्रहस्तने, न इन्द्रजित्ने, न दूसरे लोगोंने, न अतिरथी कुम्भकर्णने, न अतिकायने, न नरान्तकने और न स्वयं तुमने ही मेरी बातोंको अधिक महत्त्व दिया था, उसीका फल यह सामने आया है॥

‘आज शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ इस वीर रावणके धराशायी होनेसे सुन्दर नीतिपर चलनेवाले लोगोंकी मर्यादा टूट गयी, धर्मका मूर्तिमान् विग्रह चला गया, सत्त्व (बल)-के संग्रहका स्थान नष्ट हो गया, सुन्दर हाथ चलानेवाले वीरोंका सहारा चला गया, सूर्य पृथ्वीपर गिर पड़ा, चन्द्रमा अँधेरेमें डूब गया, प्रज्वलित आग बुझ गयी और सारा उत्साह निरर्थक हो गया॥ ६-७ ॥

‘रणभूमिकी धूलमें राक्षसशिरोमणि रावणके सो जानेसे इस लोकका आधार और बल समाप्त हो गया। अब यहाँ क्या शेष रह गया?॥ ८ ॥

‘हाय! धैर्य ही जिसके पत्ते थे, हठ ही सुन्दर फूल था, तपस्या ही बल और शौर्य ही मूल था, उस राक्षसराज रावणरूपी महान् वृक्षको आज रणभूमिमें श्रीराघवेन्द्ररूपी प्रचण्ड वायुने रौंद डाला!॥ ९ ॥

‘तेज ही जिसके दाँत थे, वंशपरम्परा ही पृष्ठभाग थी, क्रोध ही नीचेके (पैर आदि) अङ्ग थे और प्रसाद ही शुण्ड-दण्ड था, वह रावणरूपी गन्धहस्ती आज इक्ष्वाकुवंशी श्रीरामरूपी सिंहके द्वारा शरीरके विदीर्ण कर दिये जानेसे सदाके लिये पृथ्वीपर सो गया है!॥

‘पराक्रम और उत्साह जिसकी बढ़ती हुई ज्वालाओंके समान थे, निःश्वास ही धूम था और अपना बल ही प्रताप था, उस राक्षस रावणरूपी प्रतापी अग्निको इस समय युद्धस्थलमें श्रीरामरूपी मेघने बुझा दिया!॥ ११ ॥

‘राक्षस सैनिक जिसकी पूँछ, ककुद् और सींग थे, जो शत्रुओंपर विजय पानेवाला था तथा पराक्रम और उत्साह आदि प्रकट करनेमें जो वायुके समान था, चपलतारूपी आँख तथा कानसे युक्त वह राक्षसराज रावणरूपी साँड़ महाराज श्रीरामरूपी व्याघ्रद्वारा मारा जाकर नष्ट हो गया!’॥ १२ ॥

जिससे अर्थनिश्चय प्रकट हो रहा था, ऐसी युक्तिसंगत बात कहते हुए शोकमग्न विभीषणसे उस समय भगवान् श्रीरामने कहा— ॥ १३ ॥

‘विभीषण! यह रावण समराङ्गणमें असमर्थ होकर नहीं मारा गया है। इसने प्रचण्ड पराक्रम प्रकट किया है, इसका उत्साह बहुत बढ़ा हुआ था। इसे मृत्युसे कोई भय नहीं था। यह दैवात् रणभूमिमें धराशायी हुआ है॥ १४ ॥

‘जो लोग अपने अभ्युदयकी इच्छासे क्षत्रियधर्ममें स्थित हो समराङ्गणमें मारे जाते हैं, इस तरह नष्ट होनेवाले लोगोंके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये॥

‘जिस बुद्धिमान् वीरने इन्द्रसहित तीनों लोकोंको युद्धमें भयभीत कर रखा था, वही यदि इस समय कालके अधीन हो गया तो उसके लिये शोक करनेका अवसर नहीं है॥ १६ ॥

‘युद्धमें किसीको सदा विजय-ही-विजय मिले, ऐसा पहले भी कभी नहीं हुआ है। वीर पुरुष संग्राममें या तो शत्रुओंद्वारा मारा जाता है या स्वयं ही शत्रुओंको मार गिराता है॥ १७ ॥

‘आज रावणको जो गति प्राप्त हुई है, यह पूर्वकालके महापुरुषोंद्वारा बतायी गयी उत्तम गति है। क्षात्र-वृत्तिका आश्रय लेनेवाले वीरोंके लिये तो यह बड़े आदरकी वस्तु है। क्षत्रिय-वृत्तिसे रहनेवाला वीर पुरुष यदि युद्धमें मारा गया हो तो वह शोकके योग्य नहीं है; यही शास्त्रका सिद्धान्त है॥ १८ ॥

‘शास्त्रके इस निश्चयपर विचार करके सात्त्विक बुद्धिका आश्रय ले तुम निश्चिन्त हो जाओ और अब आगे जो कुछ (प्रेत-संस्कार आदि) कार्य करना हो, उसके सम्बन्धमें विचार करो’॥ १९

परम पराक्रमी राजकुमार श्रीरामके ऐसा कहनेपर शोकसंतप्त हुए विभीषणने उनसे अपने भाईके लिये हितकर बात कही—॥ २० ॥

‘भगवन्! पूर्वकालमें युद्धके अवसरोंपर समस्त देवताओं तथा इन्द्रने भी जिसे कभी पीछे नहीं हटाया था, वही रावण आज रणभूमिमें आपसे टक्कर लेकर उसी तरह शान्त हो गया, जैसे समुद्र अपनी तटभू-मितक जाकर शान्त हो जाता है॥ २१ ॥

‘इसने याचकोंको दान दिये, भोग भोगे और भृत्योंका भरण-पोषण किया है। मित्रोंको धन अर्पित किये और शत्रुओंसे वैरका बदला लिया॥ २२ ॥

‘यह रावण अग्निहोत्री, महातपस्वी, वेदान्तवेत्ता तथा यज्ञ-यागादि कर्मोंमें श्रेष्ठ शूर—परम कर्मठ रहा है। अब यह प्रेतभावको प्राप्त हुआ है, अतः अब मैं ही आपकी कृपासे इसका प्रेत-कृत्य करना चाहता हूँ’॥

विभीषणके करुणाजनक वचनोंद्वारा अच्छी तरह समझाये जानेपर उदारचेता राजकुमार महात्मा श्रीरामने उन्हें रावणके लिये स्वर्गादि उत्तम लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला अन्त्येष्टि-कर्म करनेकी आज्ञा दी॥ २४ ॥

वे बोले—‘विभीषण! वैर जीवन-कालतक ही रहता है। मरनेके बाद उस वैरका अन्त हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अतः अब तुम इसका संस्कार करो। इस समय यह जैसे तुम्हारे स्नेहका पात्र है, उसी तरह मेरा भी स्नेहभाजन है’॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०९ ॥

एक सौ दसवाँ सर्ग

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एक सौ दसवाँ सर्ग

रावणकी स्त्रियोंका विलाप

महात्मा श्रीरघुनाथजीके द्वारा रावणके मारे जानेका समाचार सुनकर शोकसे व्याकुल हुईं राक्षसियाँ अन्तःपुरसे निकल पड़ीं॥ १ ॥

लोगोंके बारम्बार मना करनेपर भी वे धरतीकी धूलमें लोटने लगती थीं। उनके केश खुले हुए थे और जिनके बछड़े मर गये हों, उन गौओंके समान वे शोकसे आतुर हो रही थीं॥ २ ॥

राक्षसोंके साथ लङ्काके उत्तर दरवाजेसे निकलकर भयंकर युद्धभूमिमें प्रवेश करके वे अपने मरे हुए पतिको खोजने लगीं॥ ३ ॥

‘हा आर्यपुत्र! हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुईं वे सब-की-सब उस रणभूमिमें जहाँ बिना मस्तकके लाशें बिछी हुईं थीं तथा रक्तकी कीच जम गयी थी, सब ओर गिरती-पड़ती भटकने लगीं॥ ४ ॥

उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे पतिके शोकसे बेसुध हो यूथपतिके मारे जानेपर हथिनियोंकी तरह करुण-क्रन्दन कर रही थीं॥ ५ ॥

उन्होंने महाकाय, महापराक्रमी और महातेजस्वी रावणको देखा, जो काले कोयलेके ढेर-सा पृथ्वीपर मरा पड़ा था॥ ६ ॥

रणभूमिकी धूलमें पड़े हुए अपने मृतक पतिपर सहसा दृष्टि पड़ते ही वे कटी हुईं वनकी लताओंके समान उसके अङ्गोंपर गिर पड़ीं॥ ७ ॥

उनमेंसे कोई तो बड़े आदरके साथ उसका आलिङ्गन करके, कोई पैर पकड़कर और कोई गलेसे लगकर रोने लगीं॥ ८ ॥

कोई स्त्री अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठा पछाड़ खाकर गिरी और धरतीपर लोटने लगी तथा कोई मरे हुए स्वामीका मुख देखकर मूर्च्छित हो गयी॥ ९ ॥

कोई पतिका मस्तक गोदमें लेकर उसका मुँह निहारती और ओसकणोंसे कमलकी भाँति अश्रुबिन्दुओंसे पतिके मुखारविन्दको नहलाती हुईं रोदन करने लगी॥ १० ॥

इस प्रकार अपने पतिदेवता रावणको धरतीपर मरकर गिरा देख वे सब-की-सब आर्तभावसे उसे पुकारने लगीं और शोकके कारण नाना प्रकारसे विलाप करने लगीं॥ ११ ॥

वे बोलीं—‘हाय! जिन्होंने यमराज और इन्द्रको भी भयभीत कर रखा था, राजाधिराज कुबेरका पुष्पक विमान छीन लिया था तथा गन्धर्वों, ऋषियों और महामनस्वी देवताओंको भी रणभूमिमें भय प्रदान किया था, वे ही हमारे प्राणनाथ आज इस समराङ्गणमें मारे जाकर सदाके लिये सो गये हैं॥ १२-१३ ॥

‘हाय! जो असुरों, देवताओं तथा नागोंसे भी भयभीत होना नहीं जानते थे, उन्हींको आज मनुष्यसे यह भय प्राप्त हो गया॥ १४ ॥

‘जिन्हें देवता, दानव और राक्षस भी नहीं मार सकते थे, वे ही आज एक पैदल मनुष्यके हाथसे मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं॥ १५ ॥

‘जो देवताओं, असुरों तथा यक्षोंके लिये भी अवध्य थे, वे ही किसी निर्बल प्राणीके समान एक मनुष्यके हाथसे मृत्युको प्राप्त हुए’॥ १६ ॥

इस तरहकी बातें कहती हुई रावणकी वे दुःखिनी स्त्रियाँ वहाँ फूट-फूटकर रोने लगीं तथा दुःखसे आतुर होकर पुनः बारम्बार विलाप करने लगीं॥ १७ ॥

वे बोलीं—‘प्राणनाथ! आपने सदा हितकी बात बतानेवाले सुहृदोंकी बातें अनसुनी कर दीं और अपनी मृत्युके लिये सीताका अपहरण किया। इसका फल यह हुआ कि ये राक्षस मार गिराये गये तथा आपने इस समय अपनेको रणभूमिमें और हमलोगोंको महान् दुःखके समुद्रमें गिरा दिया॥ १८ ॥

‘आपके प्रिय भाई विभीषण आपको हितकी बात बता रहे थे तो भी आपने अपने वधके लिये उन्हें मोहवश कटु वचन सुनाये। उसीका यह फल प्रत्यक्ष दिखायी दिया है॥ १९ ॥

‘यदि आपने मिथिलेशकुमारी सीताको श्रीरामके पास लौटा दिया होता तो जड़-मूलसहित हमारा विनाश करनेवाला यह महाघोर संकट हमपर न आता॥ २० ॥

‘सीताको लौटा देनेपर आपके भाई विभीषणका भी मनोरथ सफल हो जाता, श्रीराम हमारे मित्र-पक्षमें आ जाते, हम सबको विधवा नहीं होना पड़ता और हमारे शत्रुओंकी कामनाएँ पूरी नहीं होतीं॥ २१ ॥

‘परंतु आप ऐसे निष्ठुर निकले कि सीताको बलपूर्वक कैद कर लिया तथा राक्षसोंको, हम स्त्रियोंको और अपने-आपको—तीनोंको भी एक साथ नीचे गिरा दिया—विपत्तिमें डाल दिया॥ २२ ॥

‘राक्षसशिरोमणे! आपका स्वेच्छाचार ही हमारे विनाशमें कारण हुआ हो, ऐसी बात नहीं है। दैव ही सब कुछ कराता है। दैवका मारा हुआ ही मारा जाता या मरता है॥ २३ ॥

‘महाबाहो! इस युद्धमें वानरोंका, राक्षसोंका और आपका भी विनाश दैवयोगसे ही हुआ है॥ २४ ॥

‘संसारमें फल देनेके लिये उन्मुख हुए दैवके विधानको कोई धनसे, कामनासे, पराक्रमसे, आज्ञासे अथवा शक्तिसे भी नहीं पलट सकता’॥ २५ ॥

इस प्रकार राक्षसराजकी सभी स्त्रियाँ दुःखसे पीड़ित हो आँखोंमें आँसू भरकर दीनभावसे कुररीकी भाँति विलाप करने लगीं॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११० ॥

एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग

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एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग

मन्दोदरीका विलाप तथा रावणके शवका दाहसंस्कार

उस समय विलाप करती हुई उन राक्षसियोंमें जो रावणकी ज्येष्ठ एवं प्यारी पत्नी मन्दोदरी थी, उसने अचिन्त्यकर्मा भगवान् श्रीरामके द्वारा मारे गये अपने पति दशमुख रावणको देखा। पतिको उस अवस्थामें देखकर वह वहाँ अत्यन्त दीन एवं दुःखी हो गयी और इस प्रकार विलाप करने लगी— ॥ १-२ ॥

‘महाराज कुबेरके छोटे भाई! महाबाहु राक्षसराज! जब आप क्रोध करते थे, उस समय इन्द्र भी आपके सामने खड़े होनेमें भय खाते थे॥ ३ ॥

‘बड़े-बड़े ऋषि, यशस्वी गन्धर्व और चारण भी आपके डरसे चारों दिशाओंमें भाग गये थे॥ ४ ॥

‘वही आप आज युद्धमें एक मानवमात्र रामसे परास्त हो गये। राजन्! क्या आपको इससे लज्जा नहीं आती है? राक्षसेश्वर! बोलिये तो सही, यह क्या बात है?॥

‘आपने तीनों लोकोंको जीतकर अपनेको सम्पत्तिशाली और पराक्रमी बनाया था। आपके वेगको सह लेना किसीके लिये सम्भव नहीं था; फिर आप-जैसे वीरको एक वनवासी मनुष्यने कैसे मार डाला?॥ ६ ॥

‘आप ऐसे देशमें विचरते थे, जहाँ मनुष्योंकी पहुँच नहीं हो सकती थी। आप इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ थे तो भी युद्धमें रामके हाथसे आपका विनाश हुआ; यह सम्भव अथवा विश्वासके योग्य नहीं जान पड़ता॥

‘युद्धके मुहानेपर सब ओरसे विजय पानेवाले आपकी श्रीरामके द्वारा जो पराजय हुई, यह श्रीरामका काम है—ऐसा मुझे विश्वास नहीं होता (जब कि आप उन्हें निरा मनुष्य समझते रहे)॥ ८ ॥

‘अथवा साक्षात् काल ही अतर्कित माया रचकर आपके विनाशके लिये श्रीरामके रूपमें यहाँ आ पहुँचा था॥ ९ ॥

‘महाबली वीर! अथवा यह भी सम्भव है कि साक्षात् इन्द्रने आपपर आक्रमण किया हो; परंतु इन्द्रकी क्या शक्ति है जो युद्धमें वे आपकी ओर आँख उठाकर देख भी सकें; क्योंकि आप

महाबली, महापराक्रमी और महातेजस्वी देवशत्रु थे॥ १० १/२ ॥

‘निश्चय ही ये श्रीरामचन्द्रजी महान् योगी एवं सनातन परमात्मा हैं। इनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। ये महान्‌से भी महान्, अज्ञानान्धकारसे परे तथा सबको धारण करनेवाले परमेश्वर हैं, जो अपने हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करते हैं, जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है, भगवती लक्ष्मी जिनका कभी साथ नहीं छोड़तीं, जिन्हें परास्त करना सर्वथा असम्भव है तथा जो नित्य स्थिर एवं सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं, उन सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने ही समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे मनुष्यका रूप धारण करके वानररूपमें प्रकट हुए सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर राक्षसोंसहित आपका वध किया है; क्योंकि आप देवताओंके शत्रु और समस्त संसारके लिये भयंकर थे॥ ११—१४ १/२ ॥

‘नाथ! पहले आपने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी, उस वैरको याद रखती हुई-सी इन्द्रियोंने ही अब आपको परास्त किया है॥

‘जब मैंने सुना कि जनस्थानमें बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे होनेपर भी आपके भाई खरको श्रीरामने मार डाला है, तभी मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं॥ १६ १/२ ॥

‘जिस लङ्का नगरीमें देवताओंका भी प्रवेश होना कठिन था, वहीं जब हनुमान्जी बलपूर्वक घुस आये, उसी समय हमलोग भावी अनिष्टकी आशङ्कासे व्यथित हो उठी थीं॥ १७ १/२ ॥

‘मैंने बारम्बार कहा—प्राणनाथ! आप रघुनाथजीसे वैर-विरोध न कीजिये; परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी। उसीका आज यह फल मिला है॥ १८ १/२ ॥

‘राक्षसराज! आपने अपने ऐश्वर्यका, शरीरका तथा स्वजनोंका विनाश करनेके लिये ही अकस्मात् सीताकी कामना की थी॥ १९ १/२ ॥

‘दुर्मते! भगवती सीता अरुन्धती और रोहिणीसे भी बढ़कर पतिव्रता हैं। वे वसुधाकी भी वसुधा और श्रीकी भी श्री हैं। अपने स्वामीके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाली और सबकी पूजनीया उन सीतादेवीका तिरस्कार करके आपने बड़ा अनुचित कार्य किया था॥

‘मेरे प्राणनाथ! सर्वाङ्गसुन्दरी शुभलक्षणा सीता निर्जन वनमें निवास करती थीं। आप छलसे उन्हें दुःखमें डालकर यहाँ हर लाये। यह आपके लिये बड़े कलङ्ककी बात हुई। मिथिलेशकुमारीके साथ समागमके लिये जो आपके मनमें कामना थी, उसे तो आप पा नहीं

सके, उलटे उन पतिव्रता देवीकी तपस्यासे जलकर भस्म हो गये। अवश्य ऐसी ही बात हुई है॥ २२-२३ ॥

‘तन्वङ्गी सीताका अपहरण करते समय ही आप जलकर राख नहीं हो गये—यही आश्चर्यकी बात है। आपकी जिस महिमासे इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता आपसे डरते थे, उसीने उस समय आपको दग्ध नहीं होने दिया॥ २४ ॥

‘प्राणवल्लभ! इसमें कोई संदेह नहीं कि समय आनेपर कर्ताको उसके पाप-कर्मका फल अवश्य मिलता है॥ २५ ॥

‘शुभकर्म करनेवालेको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और पापीको पापका फल—दुःख भोगना पड़ता है। विभीषणको अपने शुभ कर्मोंके कारण ही सुख प्राप्त हुआ है और आपको ऐसा दुःख भोगना पड़ा है॥ २६ ॥

‘आपके घरमें सीतादेवीसे भी अधिक सुन्दर रूपवाली दूसरी युवतियाँ मौजूद हैं; परंतु आप कामके वशीभूत हो मोहवश इस बातको समझ नहीं पाते थे॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता न तो कुलमें, न रूपमें और न दाक्षिण्य आदि गुणोंमें ही मुझसे बढ़कर हैं। वे मेरे बराबर भी नहीं हैं; परंतु आप मोहवश इस बातकी ओर नहीं ध्यान देते थे॥ २८ ॥

‘संसारमें कभी किसी भी प्राणीकी मृत्यु अकारण नहीं होती है। इस नियमके अनुसार मिथिलेशकुमारी सीता आपकी मृत्युका कारण बन गयीं॥ २९ ॥

‘आपने सीताके कारण होनेवाली मृत्युको स्वयं ही दूरसे बुला लिया। मिथिलेशनन्दिनी सीता अब शोकरहित हो श्रीरामके साथ विहार करेंगी; परंतु मेरा पुण्य बहुत थोड़ा था, इसलिये वह जल्दी समाप्त हो गया और मैं शोकके घोर समुद्रमें गिर पड़ी॥ ३० १/२ ॥

‘वीर! जो मैं विचित्र वस्त्राभूषण धारण करके अनुपम शोभासे सम्पन्न हो मनके अनुरूप विमानद्वारा आपके साथ कैलास, मन्दराचल, मेरुपर्वत, चैत्ररथवन तथा सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें विहार करती हुई नाना प्रकारके देशोंको देखती फिरती थी, वही मैं आज आपका वध हो जानेसे समस्त कामभोगोंसे वञ्चित हो गयी॥ ३१—३३ ॥

‘मैं वही रानी मन्दोदरी हूँ, किंतु आज दूसरी स्त्रीके समान हो गयी हूँ। राजाओंकी चञ्चल राजलक्ष्मीको धिक्कार है! हा राजन्! आपका जो सुकुमार मुखमण्डल सुन्दर भौंहों, मनोहर त्वचा

और ऊँची नासिकासे युक्त था, कान्ति, शोभा और तेजके द्वारा जो क्रमशः चन्द्रमा, सूर्य और कमलको लज्जित करता था, किरीटोंके समूह जिसे जगमग बनाये रहते थे, जिसके अधर ताँबेके समान लाल थे, जिसमें दीप्तिमान् कुण्डल दमकते रहते थे, पान-भूमिमें जिसके नेत्र नशेसे व्याकुल और चञ्चल देखे जाते थे, जो नाना प्रकारके गजरे धारण करता था, मनोहर और सुन्दर था तथा मुसकराकर मीठी-मीठी बातें किया करता था, वही आपका मुखारविन्द आज शोभा नहीं पा रहा है। प्रभो! वह श्रीरामके सायकोंसे विदीर्ण हो खूनकी धारासे रँग गया है। इसका मेदा और मस्तिष्क छिन्न-भिन्न हो गया है तथा रथकी धूलोंसे इसमें रूक्षता आ गयी है॥ ३४—३७ १/२ ॥

‘हाय! मुझ मन्दभागिनीने कभी जिसके विषयमें सोचातक नहीं था, वही मुझे वैधव्यका दुःख प्रदान करनेवाली अन्तिम अवस्था (मृत्यु) आपको प्राप्त हो गयी॥ ३८ १/२ ॥

‘दानवराज मय मेरे पिता, राक्षसराज रावण मेरे पति और इन्द्रपर भी विजय प्राप्त करनेवाला इन्द्रजित् मेरा पुत्र है—यह सोचकर मैं अत्यन्त गर्वसे भरी रहती थी॥

‘मेरी यह दृढ़ धारणा बनी हुई थी कि मेरे रक्षक ऐसे लोग हैं जो दर्पसे भरे हुए शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, क्रूर, विख्यात बल और पौरुषसे सम्पन्न तथा किसीसे भी भयभीत नहीं होनेवाले हैं॥ ४० १/२ ॥

‘राक्षसशिरोमणियो! ऐसे प्रभावशाली तुमलोगोंको यह मनुष्यसे अज्ञात भय किस प्रकार प्राप्त हुआ?॥

‘जो चिकने इन्द्रनील-मणिके समान श्याम, ऊँचे शैल-शिखरके समान विशाल तथा केयूर, अङ्गद, नीलम और मोतियोंके हार एवं फूलोंकी मालाओंसे सुसज्जित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था, विहारस्थलोंमें अधिक कान्तिमान् तथा संग्राम-भूमियोंमें अतिशय दीप्तिमान् प्रतीत होता था और आभूषणोंकी प्रभासे जिसकी विद्युन्मालामण्डित मेघकी-सी शोभा होती थी, वही आपका शरीर आज अनेक तीखे बाणोंसे भरा हुआ है; अतः यद्यपि आजसे फिर इसका स्पर्श मेरे लिये दुर्लभ हो जायगा, तथापि इन बाणोंके कारण मैं इसका आलिङ्गन नहीं कर पाती हूँ॥ ४२—४४ १/२ ॥

‘राजन्! जैसे साहीकी देह काँटोंसे भरी होती है, उसी प्रकार आपके शरीरमें इतने बाण लगे हैं कि कहीं एक अंगुल भी जगह नहीं रह गयी है। वे सभी बाण मर्म-स्थानोंमें धँस गये हैं और उनसे शरीरका स्नायु-बन्धन छिन्न-भिन्न हो गया है। इस अवस्थामें पृथ्वीपर पड़ा हुआ आपका

यह श्याम शरीर, जिसपर रक्तकी अरुण छटा छा रही है, वज्रकी मारसे चूर-चूर होकर बिखरे हुए पर्वतके समान जान पड़ता है॥

‘नाथ! यह स्वप्न है या सत्य। हाय! आप श्रीरामके हाथसे कैसे मारे गये? आप तो मृत्युकी भी मृत्यु थे; फिर स्वयं ही मृत्युके अधीन कैसे हो गये?॥

‘आपने तीनों लोकोंकी सम्पत्तिका उपभोग किया और त्रिलोकीके प्राणियोंको महान् उद्वेगमें डाल दिया था। आप लोकपालोंपर भी विजय पा चुके थे। आपने कैलास-पर्वतके साथ ही भगवान् शङ्करको भी उठा लिया था तथा बड़े-बड़े अभिमानी वीरोंको युद्धमें बंदी बनाकर अपने पराक्रमको प्रकट किया था॥ ४८-४९॥

‘आपने समस्त संसारको क्षोभमें डाला, साधु पुरुषोंकी हिंसा की और शत्रुओंके समीप बलपूर्वक अहंकारपूर्ण बातें कहीं॥ ५०॥

‘भयानक पराक्रम करनेवाले विपक्षियोंको मारकर अपने पक्षके लोगों और सेवकोंकी रक्षा की। दानवोंके सरदारों और हजारों यक्षोंको भी मौतके घाट उतारा॥ ५१॥

‘आपने समराङ्गणमें निवातकवच नामक दानवोंका भी दमन किया, बहुत-से यज्ञ नष्ट कर डाले तथा आत्मीय जनोंकी सदा ही रक्षा की॥ ५२॥

‘आप धर्मकी व्यवस्थाको तोड़नेवाले तथा संग्राममें मायाकी सृष्टि करनेवाले थे। देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी कन्याओंको इधर-उधरसे हर लाते थे॥ ५३॥

‘आप शत्रुकी स्त्रियोंको शोक प्रदान करनेवाले, स्वजनोंके नेता, लङ्कापुरीके रक्षक, भयानक कर्म करनेवाले तथा हम सब लोगोंको कामोपभोगका सुख देनेवाले थे। ऐसे प्रभावशाली तथा रथियोंमें श्रेष्ठ अपने प्रियतम पतिको श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा धराशायी किया गया देखकर भी जो मैं अबतक इस शरीरको धारण कर रही हूँ, प्रियतमके मारे जानेपर भी जी रही हूँ—यह मेरी पाषाणहृदयताका परिचायक है॥ ५४-५५ १/२॥

‘राक्षसराज! आप तो बहुमूल्य पलंगोंपर शयन करते थे, फिर यहाँ धरतीपर धूलिमें लिपटे हुए क्यों सो रहे हैं?॥ ५६ १/२॥

‘जब लक्ष्मणने युद्धमें मेरे बेटे इन्द्रजित्‌को मारा था, उस समय मुझे गहरा आघात पहुँचा था और आज आपका वध होनेसे तो मैं मार ही डाली गयी॥ ५७ १/२॥