सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
[header] ( २० ) सिंहासनबत्तीसी. मैं हूं. और कौनसी बात मुझमें नहीं है? सो तुम कहो, तब वह बोला-वह जो नगर तुमने नजर भरके देखा है उसका में सब बयान करताहूं. राजा बाहुबल नाम वहांका कदीम राजा है. और गंधर्वसेन बाप तुम्हारा उसका दीवान था. राजाको उसकी तरफसे कुछ बेइतबारी हुई तब उसे छुड़ादिया. वह नगर अंबावतीमें आया और उस जगहका राजा हुआ. उसका बेटा तूं विक्रम है. तुझे जगमें कौन नहीं जानता? पर जबतक राजा बाहुबल तुझे राजतिलक न देगा तबतक तेरा राज अचल न होगा और वह जो यह तेरी ख़बर पावेगा तब वही तेरेपर चढ़कर दौड़ेगा और तुझे आकर एक घड़ीमें राखके बराबर करदेगा इस वास्ते तुझे जो मैं सलाह दूंगा उसे मान और किसी तरहसे उस राजाके पास जाकर राजाको मोहबत दिलाकर तिलक उससे ले, जिससे यहांका अचल राज तू करे. राजा विक्रम बड़ा अकलमंद था, इसवास्ते इस बातपर कायम रहा ऐसी बातें लतबरनसे सुनकर कुछ दिलमें न लाया और हँसकर कानदे सब सुनी. फिर लतबरनने कहा-जो तुम्हें चलना हो तो हमारे साथ चलो और पंडितोंसों अच्छी साअत दिखाकर चलनेकी तैयारी करो. दूसरे दिन सुबहके वक्त राजा लतबरन मंत्रीके साथ होकर चला और राजा बाहुबलके नगरमें जाकर पहुंचा तब उस दीवानने राजा विक्रमसों
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:
कहा-यहां बैठो और मैं अपने राजाको तुम्हारे आनेकी खबर दूं. यह बात राजासे कहकर लूनबरन अपने राजाके मंदिरमें गया उसको प्रणाम किया. और सब समाचार और अपनी हकीकतसमेत राजाका अहवाल कहने लगा-महाराज ? गंधर्व- सेनका बेटा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. यह बात बाहुबल राजाने सुनकर उसको तुरंत अंदर बुलाया. तब लूनब- रन राजा विक्रमको लाया और अपने राजासे मिलाया. राजा उससे उठकर मिला और आदर करके आधे आसनपर बिठाया और क्षेम कुशल पूछी बाद उसके रहनेके लिये मकान बताया राजा उठकर उस मकानमें आया, वहा रहने लगा. जब दस पांच दिन बीतगये तब दीवानसे राजा विक्रमने कहा-हमें तुम विदा करवा दो, तो हम अपने स्थानको जावें तब मंत्री कहने लगा-हमारे राजाका यह स्वभाव है कि जो उनसे मिलनेको आताहै उसे अपना रुखसत नहीं करते, तुम रुखसत मांगो और जिस बातकी ख्वाहिश हो सो कहो, अपने जीमें कुछ शर्म न करो. तब राजा बोला-मुझे कुछ नहीं चाहिये. जो कोई जो बर चाहे सो मुझसे ले. तब दीवान बोला-राजा ! यह हमारी बात सुनो. इस राजाके घरमें एक सिंहासन है सो वह सिंहासन पहले महादेवजीने राजा इंद्रको दियाथा और इंद्र राजाने इसको दिया. उस सिंहासनमें ऐसा गुण है कि, जो उसपर बैठे
( १२ ) सिंहासनबत्तीसी. सो सात द्वीप और नौ खंड पृथ्वीका अजीत होकर राज करे और बहुतसा जबाहिर उसमें जटा है. और उस सिंहासनमें बत्तीस पुतलियांभी बनी हैं. अमृत देकर उनको सांचेमें ढाला है. तुम रुखसत होते हुए वह सिंहासन राजाजी मांगो कि उसपर बैठकर आनंदसे राज करेंगे. यह रातको दीवाननें सलाह दी. और सुबहको राजाके दरबारमें दीवानने जाके खबर दी कि, महाराज ! विक्रम रुखसत होताहै और आपके पास आनेको बाहर खडा है. यह सुनकर राजा फिर फौरन दरवाजेपर आया ओर विक्रमने देखकर अपना माथा नवाया राजानें विक्रमसे कहा जो तुम्हारे जीमें आवे सो मांगो मैं खुश होकर तुमको वही दूंगा तब विक्रम बोला-महाराज ! जो आपने मुझपर दया की है, तो वह सिंहासन मुझे बकशो, जो इंद्रने आपको दिया है. यह बात सुनकर राजा बोला-अच्छा, सिंहासन तो हमने तुम्हें दिया, पर, यह काम मंत्रीका है, इसे तुम नहीं जानतेथे. यह कहकर सिंहासन मँगाया और पान तिलक देकर उस सिंहासनपर बिठाया और कहा कि-तुम अजीत हुए. अब किसी बातकी चिंता मनमे न करना, गंधर्वसेन मेरा बडा दोस्त था और तू उसके खान- दानमें बडा नामवर हुवा. इस तरहसे राजा विक्रमको आसीस देकर रुखसत किया. राजा वहांसे अपने घरमें आया.
पहली पुतली १. ( २३ )
पहली पुतली १. ( २३ )
और अपने जीमें बहुतसा खुश हुआ, और जितने उस राजाके दुश्मन थे उनके जीमें रंज हुआ राजाके देशके लोगोंने बहुत खुशीकी और सब द्वीपद्वीपके राजा खिदमतके वास्ते आये, और जो राजा गरूर था उसका वहां जाकर राज छीन लेलीया, और अपना राज करता, गरज उदयसे अस्ततक खूब उसने अपना राज किया, सब रैय्यत आनंदसो उस राजमें बसती थी, और जो क्षत्रिय थे सो सब उनको डरते थे और जो कोई देश विदेश जाता था सो वहां विक्रमका धर्म सुनता था, और सब मुल्क आबाद देखता था, कहीं दुःखी उसे नजर न आता था, डाड और बांध उसके राजभरमे किसीने कानसे न सुना, बल्कि घर घर आवाज वेद और पुराणकी आती थी, और जितने लोग थे वे सब स्नान ध्यान करके तीनो वख्त अपने भगवानकी यादमें रहते थे, अपने घरमें सब राजा किसी सभा करके खुश रहते थे, राजा राजप्रजा सुखी, इसके एक दिन राजा विक्रमादित्यने सभा की ओर सब पंडितोंको बुलाया, और पंडितोंसे राजाने पूँछा कि--मेरे जीमें है कि अब मै संवत बांधूं, सो तुमसो पूँछताहूँ कि, मै इसबातके लायक हूँ कि नहीं हूं ? सो तुम शास्त्र देखकर मुझसे विचारके कहो, सब पंडितोंने विचार करके राजासे कहा--महाराज ! अब जो तुम्हारा प्रताप है सो तीनो भुवनोमें छाय रहाहै, इस वास्ते जो
( २४ ) सिंहासनबत्तीसी.
कुछ तुम्हें करना है सो कीजिये. दुश्मन तुम्हारा कोई नहीं राजाने यह सुनकर पंडितोंसे कहा कि—अब तुम बताओ कि, किस बुद्धीसे संवत् बांधू ? जो कुछ शास्त्रकी रीतिमे मुनासिब हो तिस तरहसे हमें कहो ? तब पंडितोंने कहा—पहले तो तुम अजीतमाल पहनो, फिर उसके बाद देश देशके ब्राह्मण और जमीनदार, राजा और अपने सब कुटुंबके लोग बुलावो. सवालाख कन्यादान सवालाख ब्राह्मणोंको करो. और जितने ब्राह्मण तुम्हारे मुल्कके हैं उनकी वृत्ति करदो. एक बरसका खजाना जमीदारोंको माफ करो और जो भूखा, कंगाल इस बरसमें आवे उसको वृत्तिका हुक्म करो. इसी तौरसे राजाने सब काम किया. और सिवा इसके जो जो दान पुण्य किया उनका बयान किससे हो ? एक बरसतक राजा अपने घरमें बैठे पुराण सुनता रहा और इस तरहसे संवत् बांधा, कि तमाम दुनियाके लोक धन्य धन्य करतेथे. यह सब अहवाल राजाको रत्नमंजरीने सुनाया और राजा विक्रमादि- त्यका यश गाया. और कहा—राजा भोज ! जो तुम इतने हो तो इस सिंहासनपर बैठो. सुनके राजाने कहा सच है जो कुछ तूने कहा यह बात मुझेभी पसंद आई. इतना कहकर राजा अपनी सभामें जाकर बैठा. और दीवान मुसदियोंको बुलाया कि, तुम सब तैयारी संवत् बांधनेकी करो. इस दिनकी वह
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दूसरी पुतली २. ( २७ ) साअत यों टलगई दूसरे दिन फिर राजाने सिंहासनपर बैठनेकी तय्यारी फरमाई और दीवानको बुलाकर कहा कि-तुम सब तुरतही इसकी तैयारी करो. देर नहीं लगाना. यह बात सुनकर वररुचि पुरोहित बोला-राजा ! अभी क्यों घबराते हो? इस सिंहासनकी एक एक पुतली तुमसे बात करेगी. उन सबकी बातें सुनकर पीछे जो कुछ आपको करना होगा सो कीजिये. यह पुरोहितका बचन सुनकर राजाने उस सिंहासनके पास जाकर उसपर पांव बढ़ाकर रक्खा इतनेमें चित्ररेखा नामक- दूसरी पुतली २ बोली कि, राजा ! तेरे योग्य यह आसन नहीं, और ऐसी अनीति कोई करता नहीं जो तू करनेपर तैय्यार हुआ है. इस सिंहासनपर बैठ वह, जो विक्रमादित्यसा राजा हो. तब राजा बोला-विक्रममे क्या क्या गुण थे? सो मुझसे कहो. तब वह बोली-एक दिन राजा विक्रम कैलासको गया, और वहां एक यतीसे मुलाकात हुई तब उसने राजाको योगकी रीति सब बताई. राजाने अपने मनमें इरादा किया कि, अब योग कमावें. ऐसा बिचार कर योग करनेको तैयार हुआ और राजतिलक भर्तृ-
( २६ ) सिंहासनबत्तीसी. रिको दिया और राज पाटपर उसे बिठा आप राजकाज सब धन दौलत छोड कंथा पहन भस्म लगा संन्यासी बनकर जंग- लको निकल गया और उत्तरखंडमें जाकर योग साधने लगा. उस शहरके जंगलमे एक ब्राह्मण तपस्या करताथा. धुवा पीके रहता था और भूख प्यासके दुःख सहताथा. ब्राह्मणकी तपस्या देखके देवता खुश हुए. और उसको बर देने लगे और उसने न लिया तब आकाशवाणी हुई कि, हम अमृत भेजते हैं सो तू ले. एक देवता आदमीकी सूरतमें आकार उसे फल दे यह कहगया कि, जो इसको तू खावेगा, तो चिरंजीव होगा. फल लेकर वह तुरंत चला खुशी खुशीसे अपने घरको आया. और ब्राह्म णीके हाथमें वह फल दिया, और, कहा कि, आज देवताओने अमृतफल देकर कहा जो इसे खावेगा सो अमर हो जावेगा. यह बात सुनकर ब्राह्मणी व्याकुल हो रोने लगी. फिर बोली- यह अब दुःख आया. पाप हम किस तरहसे काटेंगे ? और हमेशह भीख क्यों कर माँगें ? खाल मास सब हाडमे मिल जायगा ऐसे जीनेसे मरजाना बेहतर है. मर जानेवालेको इतना दुःख नहीं होता, इस फलको वह खावेगा जो हमेशा उठावेगा इससे योग्य, यह है कि, तुम इस फलको ले जाकर राजाको दो; और उनसे कुछ धन लो. यह सुनकर ब्राह्मण अपने जीमें समझा, यह सच है, इस संसारमें इतना जंजाल कौन है इसी तरह आपसमें बाते सलाहकी करके ब्राह्मण वहांसे उठ
दूसरी पुतली २. ( २७ )
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राजाके पास चलागया. जब राजाके द्वारपर पहुँचा तब द्वार- पालसे कहा कि, राजाको खबर दो कि ब्राह्मण आपके लिए एक फल लाया है. दरवानने राजासे जाकर अर्ज की, कि महाराज ! एक ब्राह्मण फल आपके वास्ते लाया है और दरवाजेपर हाजिर हैं. जो कुछ हुक्म हो राजाने उसीवखत हुक्म किया कि उसे अभी लाओ. तब हरकारेने वहीं हाजिर किया. ब्राह्म- णने राजाको आकर आसीस दी कि, धर्मलाभ हो और यह फल राजाके हाथ दिया. राजाने उसको हाथमें लेकर पूँछा इसका सब वृत्तांत कहो ? तब ब्राह्मण कहने लगा-स्वामी ! मैने जो तपस्या की थी सो देखकर देवताओने उसका बर अमर- फल मुझको दिया. अब मै अमर होकर क्या करूँगा ? इस वास्ते इस फलको तुम खाओ और अमर हो; क्योंकि तुमसे लाखो जी जीते हैं. यह सुनकर राजा हँसा. और उसे लाख रुपये दिये और गांव वृत्ति करके बिदा कर दिया. फिर अपने जीमें विचार करने लगा कि, मैं तो पुरुष हूँ कमजोर न हूँगा. इसवास्ते यह फल रानीको दिया चाहिये, कारण वह मेरे प्राणका आधार है. वह जीती रहेगी तो मैं सुखभोग करूँगा. यह दिलमें ठानकर राजा महलमें दाखिल हुआ. फल रानीको दिखाया. रानी हँसकर पूँछने लगी. महाराज ! यह क्या चीज है ? जिसे बडे यत्नसे लिये हुये तुम यहा आये हो ? इसका ब्योरा कहो ? तब राजाने कहा-सुन सुंदरी ! तू जो इस फलको खायगी तो
( २८ ) सिंहासनबत्तीसी. सदा यौवनवती रहेगी. दिनादिन रूप बढ़ेगा और अमर होगी. यह अहवाल रानीने सुनकर फल राजाके हाथसे लेलिया. और कहा-महाराज ! मैं इसे खाऊंगी. राजा फल देकर बाहर गया. और रानीका जो एक मित्र कोतवाल था, रानीने उसे बुलाकर इसके हाथमें वह फल दिया और उसे कहा-यह हमें राजाने देकर कहा है, जो इसे खावेगा सो अमर होगा. इसवास्ते तुम मेरे दोस्त प्यारे हो, इसे खाओ और अमर हो; तो मुझे बडी खुशी हो. यह सुनतेही कोतवालने खुश होकर फल हाथमें लेलि- या और अपने मकानको गया एक कसबी उसकी आश्ना थी उसे वह फल देकर कहा यह अमरफल मैं तेरे वास्ते लायाहूं. तू इसे खा. यह सुनकर उसने हाथसे लेलिया, और उसे बिदा किया. फिर इसने अपने जीमें बिचारा कि, एक तो मैं कसबी हूँ, और अमर हूंगी तो कितना पाप मैं कमाऊंगी. इससे बेहतर है कि, यह फल राजाको जाकर दीजिये. जो राजा जियेगा तो मुझे याद करेगा. और पुण्य होवेगा, पाप सभी कटेंगे. यह मनमें सोचकर राजाके दरबारमें गई और वह फल राजाके हाथमें दिया. राजा फलको देखकर बेसुध हुआ, और अपने जीमें कहने लगा कि यह फल तो मैंने रानीको दियाथा. जीमें यह विचार अचंभा होरहा, और हँसकर उसे पूछने लगा कि, यह फल तुझे किसने दियाथा ? वह वे सब बातें जानतीथी, पर राजासे फकत यह
दूसरी पुतली ( २९ )
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कहा कि, मुझे कोतवालने दिया है. यह सुनकर उसने समझ लिया कि, रानीने बुरा काम किया उसे कुछ रुपये देकर बिदा किया और आप भौंचक रहगया. फिर समझकर कहने लगा-मैने तो मन अपना रानीको दिया और उसने अपना दिल कोतवालको. मनका भेदी कोई न मिला ऐसे जीनेको और मेरी बुद्धिको धिक्कार है, जो मैं फिर राज करूँ ! फिर उस रानीके ताई और लअनत उस कोतवालको और उस वेश्याको और कामदेवको धिक्कार है, जो यह मति संसारकी करता है कि, जिससे संसार अहमद हो जाता है. बाद उस फलको लिये हुये महलमें गया और अपने चित्तमें कहने लगा-यह तन, मन, धन, जी सब चंचल है. और यह संसार जानहार है. इसमें कोई कायम न होगा. जबहीं पैदा हुआ तबहीं कालने खाया और जब मरता है तो कुछ साथ नहीं लेजाता. और मेरा मेरा करके जन्म गँवाता है, सुखके सब साथी है. और दुःख कोई नहीं बांटता. यह संसार जो है सो समुद्र है और माया उसका जल है. ममता मछली है. ऐसा बधिक कोई न मिला कि जो इसको मारके खाय. यह विचार करता हुवा रानीके पास गया. और उसे पूछा तूने वह फल क्या किया ? तब वह बोली-महाराज ! मैंने खाया. सुनकर राजाने वही फल रानीको दिखाया तब वह देखकर जड हो गई. तब राजा उस फलको लेकर बाहर आया और धोकर
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खाया. तिस पीछे सोच उसको हुआ. निदान बनके जानेका सामान किया. गज, पाट, धन, दौलत और रानीकी मोहब्बत तजकर चला, न किसीसे पूछा न किसीको साथ लिया. ऐसा निर्मोही होकर निकला कि, किसीका ध्यान न किया. देश देश और नगर नगरमें चर्चा हुई कि राजा भर्तृहरि राज तजकर योगी हुआ. और वह बात उड़ती उड़ती राजा इंद्रके अखाड़ेमें पहुँची कि, राजा तो देश छोड़के चला गया, और उसके देशमें बड़ा हुल्लड़ हुआ, तब यह बात सुनकर सब देवताओंने मिल कर विचार किया कि, एक देवको रखवालीके वास्ते राजा भर्तृहरिके देशमें भेजदो, कि कोई बिदअत रैयतपर न करे. ऐसा ठहराय देवको बुलाकर वहां भेजदिया, और कहा वहांकी निगाहबानी कर. वहां तो वह रखवाली करता था, और यहां राजा विक्रमका योग पूरा हुआ, वह अपने मनमें मनसूबा करता था कि, मैं छोटे भाईको राज देकर आयाहूं इस वास्ते अब चल कर देखूं कि वह किसतरह राज करता है? यह अपने दिलमें कहके चला और रातको नगरके पास आन पहुँचा. देवने उसे आते देखा तब वह पुकारा-तू कौन है? जो इस वक्त शहरमें जाता है। या तो अपना नाम बता, नहीं तो मैं तुझे मार डालताहूं. तब उसने कहा-मैं राजा विक्रम हूं तू कौन है? जो मुझे रोकता है? तब देव बोला-मेरे तईं देवताओंने भर्तृहरिके
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दूसरी पुतली २. ( ३१ ) राज्यकी रखवाली करनेके वास्ते भेजा है. राजाने पूछा-भर्तृहरिको क्या हुआ ! उसने जवाब दिया भर्तृहरिको कोई यहांसे छलकर लेगया यह बात सुनकर राजा हँसा और उसे कहा-वह तो मेरा छोटा भाई है. फिर देव बोला, मैं नही जानताहूं कि तुम कौन हो और जो तुम निकम इस देशके राजा हो तो मुझसे लडो और मुझे मारकर जाओ बिना लडे मैं तुझे शहरमें पैठने न दूंगा. यह सुन राजा बिगडके बोला-तू मेरे तईं क्या डरता है ? और जो लडा चाहे तो मैं तय्यार हूं. इस तरह दोनों बातें कर तैयार हो लडने लगे और राजा उस देवको पछाड़कर छातीपर चढ़ बैठा. तब वह बोला-राजा ! तू मुझसे वर माँग, मैं तुझे दूंगा. यह बात उसकी सुनकर राजा हसकर बोला-मैने तुझे पछाड़ा है और चाहे तो तुझे मार डालूं-तू मुझे वरदान क्या देगा ? तब वह बोला-राजा ! तू मुझे छोड़दे मैं तेरे आगे इसका सब ब्यौरा कहताहूं. तेरे राज्यकी धूम सब देशमें है और सब राजा तुझसे डरतेहैं पर मैं जो बात कहूं सो तू कान देकर सुन. तेरे शहरमें एक तेली है और एक कुम्हार सो तुझको मारनेको फिक्रमं है पर तुम तीनोंमेंसे जो दोनोंको मारेगा वही अचल राज करेगा. तेली तो पातालका राज करताहै और वह कुम्हार योगी बना हुआ जंगलमें तपस्या अपने जीमें लाकर करताहै. दिल्लमें कहताहै कि, राजाको मारके तेलीको तेलके जलते कडाहमें
( ३२ ) सिंहासनबत्तीसी. डालूं, और देवीको बलि देकर मैं निश्चिंत राज्य करूं ओर तेली कहता है कि, राजा और योगीको मारके त्रिलोकीका राज्य मैं करूं और तू इस बातको न जानता था, मैंने इसवास्ते तुझे खबर- दार किया, तुम इनसे बचे रहना, ओर आगे जो मै कहताहूं सो तुम ध्यान लगाकर सुनो. योगीने आज उस तेलीको मारकर अपने बश किया है सो तेली एक सिरीसके वृक्षपर रहा है. अब वह योगी तुमको न्योता देनेको आवेगा. छल करके तुझे ले जायगा. तू न्योता लेकर वहां जाइयो. जब वह कहे कि, तू दंडवत् कर, तब तू कहियो-मैं दंडवत करना नहीं जानता. मेरैतईं एक जहान दंडवत् करता है. जो तुम गुरु हो और मैं चला तो मुझे दंडवत् करना बताओ और उसी तरहसे मैं दंडवत करूं ! जब वह शिर निहुरावे तब तू खांडा मार कि, उसका शिर जुदा हो जावे और वहां कडाह जो देवीके आगे तेलका खौलता होगा उसमें उसको और वृक्षसे तेलीको उतारके दोनोंको उसी कडाहमें डाल देना. यह मेरी बात तू गांठ बांध. इसे हर गिज कभी न भूलना. यह बात कहकर वह देव चलागया और राजा अपने महलमें आया भोर हुए सारे नगरमें खबर हुई कि, राजा विक्रमादित्य आए. दिवान मुत्तसदी और सब अह- लकार नजर लाए. तमाम शहरमें आनंद होगया. घर घर मंगलाचार होने लगे. यहां तो खुशीके नगारे बज रहेथे इतनेमें
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एक योगी आया. ओर राजाकी आदेश सुनाया. एक फल उसके हाथ दिया. उसने हँसकर वह फल हाथमें लिया. योगीने कहा- राजा ! हमारे यहां यज्ञ होता है. एक दिनका तुम्हारा न्योता है. तब राजाने कहा हम आवेंगे. तुम अपने मनमें चिंता मत करो. सांझ हुए. पहुँचेंगे. योगी यह सुनतेही ठिकाना बताकर अपनी मठीको गया जब सांझ हुई राजाभी खांडा फरसी ले तयार हुआ. और किसीसे न कहा. अकेला चलागया तुर्त योगीके पास पहुँचा. और आदेश कहा. योगी बोला कि-देवीके आगे जाकर दंडवत् कर, तो देवी तुझपर दया करे. राजा बोला- स्वामी ! मैं तो दंडवत् करना नहीं जानता कि, किसतरह करते हैं ? इसवास्ते आप मुझे बताओ तो मैं करूं. योगी बताने लगा, ज्योंही शिर झुकाया, राजाने देवकी नसीहत याद करके एक खांडा ऐसा मारा कि, शिर धड़से जुदा होगया. और उसे मारके खतराज किया और उस वृक्षसे तेलीको भी उतार दोनोंको तेलके कटाहमें डालदिया. तब देवी बोली-धन्य है विक्रम तेरे साहसको. मैं तुझसे प्रसन्न हूं. तू मुझसे चाहे सो वर मांग और धन्य है तेरे माता पिताको, जिनके घरमें तूने अवतार लिया. देवी जब यह कह चुकी तब वे बीर आकर हाजिर हुए और राजासे कहने लगे कि, हम आगिया और कोयला दो बीर तुम्हारी सेवाके लिये आये हैं जो तुम्हारी कामना हो सो हमसे कहो हम ३
An exact Devanagari transcription of the provided image:
( ३४ ) सिंहासनबत्तीसी. तुरंत पूरी करदें. सब जगह जानेकी हम सामर्थ्य रखते हैं. जल, थल, मही, आकाशमें पवनके रूप होकर जहां कहोगे वहां हम चले जावें. जैसे हनुमान तुरंत लंका पहुंचा वैसे हमभी जा सकते हैं. यह सुन खुश हो राजाने कहा--मुझे तो कुछ काम नहीं है. अगर मेरे ताईं बचन दो तो मैं देवीसे तुम्हे मांगलूूं. लेकिन ऐ वीरो ! जो तुमसे बचन देकर निर्वाह किया जाय तो बचन दो. तब उन बैतालोंने कहा कि--अच्छा. तब राजाने उनको बचनबद्ध कर मांगलिया. और कहा-जिस जगह मैं याद करूं तुम उस जगह मेरेपास पहुँचना. तब वीर बोले कि-राजा ! तुम जिस जगहमें हमें याद करोगे, वहां हम पवनरूप होकर पहुँचेंगे .वह बात उनसे कहके राजा घरको गया. ये बातें चित्ररेखा पुतलीने राजासे कहीं कि, राजा ! विक्रमें ये काम थे. इतने योग्य तू नहीं है. फिर वे वीर राजाके साथ हुए और आगे बहुतसे काम किये. जहां विक्रमके गाढ़ पड़ा तहां ये दोनों आकर हाजिर हुए. जो कोई ऐसा काम करे तो सिद्ध हो. राजा ! तू अपने जोरपर गरूर मत कर. तुझ जैसे पृथिवीमें करोडो होगये हैं. इतनी बात जब पुतलीने कही तब राजाकी बहभी साअत टलगई. तब दूसरे दिन सुबहको राजाने फिर पाट बैठनेकी तैयारी की, ओर चाहा कि, सिंहासनपर पाँव धरौं, तब सत्यभामा नाम--
तीसरी पुतली ३० ( ३५ )
तीसरी पुतली ३० ( ३५ )
तीसरी पुतली-
बोली:-यह काम नहीं जो इसपर बैठो, पहिले मुझसे एक नई कथा सुनलो. एक दिन राजाबीर विक्रमादित्य दरिया किनारेपर महलमें खिलवत करते बैठेथे, राग हो रहाथा, और हरएक रंगकी चुहल मच रहीथी कि, दिल फरेफ्ता होजावे. और एकसे एक सहेली खूबसूरत पास बैठी थीं राजाका दिल वहां बेइख्तियार लग रहाथा कि, एक पंथी त्रिया संग लिये हुए और उस त्रियाकी गोदमें एक बालक घरसे खफा होकर निकले थे. दरियाके पास आकर गुस्सेके मारे कूदपडे. मर्दके एक हाथमें रंडी और एक हाथमें वह लड़केका हाथ ये तीनों डूबने लगे. तब पुकारकर बोले कि-ऐसा धर्मात्मा कौन है, जो इन तीनों आदमियोंकी जान बचावे ? उनमेंसे वह मर्द हाथ करके पुकारा जो कोई गुस्सा मार न सके तो इसी तरह हो बेअजल मर जाता है. और गिरके बहुत पछताता है. उसकी आवाज राजा विक्रमादित्यने सुनतेही पासके लोगोंसे कहा कि- यह कौन दुःखी पुकारता है ? तब हरकारोंने खबर दी कि, महाराज ! एक मर्द और एक रंडी लड़केके समेत पानीमें डूबते हैं. उनमेंसे वह मर्द चिल्ला रहा है कोई ऐसा उपकारी हो कि, इस डूबोंको निकाले. यह हरकारा कहताही था कि, वह फिर पुकारा- हम तीन जान डूबते हैं. कोई हमें भगवानका
( ३६ ) सिंहासनबत्तीसी.
बंदा पार लगावे, यह सुनकर राजा वहांसे धाया और आकर उस दरियामें कूद पडा, जाकर एक हाथमे रंडी और दूसरे हाथमें लड़केको पकडलिया, वह मर्दभी राजासे लिपटगया, तब राजा घबराया और आपभी डूबने लगा. इतनेमें ईश्वरको याद किया और कहा कि—हे नाथ! मैं धर्मके वास्ते आया था और इसमें मेरा जीवनभी जाता है, धर्म करते अधर्म होवेगा. राजा यह कहकर बहुत जोर करने लगा, और उस बखत जोर उसका कुछ काम न आया. तब उसने आगिया और कोयला दोनों बीरोंको याद किया, याद करतेही दोनों बीर आकर हाजिर हुए और चारोंको उठा किनारेपर रख दिया. तब वह विदेशी राजाके पांवोंपर गिरपड़ा और बोला कि, महाराज ! तुमने हम तीनोंको जीवदान दिया, तुम्हीं हमारे भगवान् हो; क्योंकि जीवदान इस वक्त तुमसे पाया राजा हाथ पकड़कर उन तीनोंको रंगमहलमें ले आया, और बिठाकर कहा, जो तुम्हें चाहिये सो माँगो तब वह बोला—महाराज ! हमको हुक्म करो तो हम घरको जायें, और जबतलक जियेंगे तबतलक आपको आशिष दिया करेंगे. ऐसाही कुछ तुमने हमें दिया है. तब राजाने अपनी तरफसे लाख रुपये देकर उनको घर भिजवा दिया. इतनी बात कहकर पुतली फिर बोली- राजा, इतने लायक जो तुम हो तो इस सिंहासनपर बैठो, नहीं
चौथी पुतली ४ ( ३७ )
चौथी पुतली ४ ( ३७ )
तो तमाम लोग हँसेंगे, यह अहवाल सुनतेही यहभी मुहूर्त राजाका टलगया. दूसरे दिन फिर राजा दिलमे सोच करता हुआ सिंहासन- पर बैठनेको आया. तब चंद्रकला नामवाली—
चौथी पुतली-
बोली:—सुनो राजा ! तुम मन मलीन क्यों बैठे हो ? और सुनो जो मैं कथा कहूं. एकरोज एक पंडित कहींसे फिरते फिरते राजा बीर विक्रमादित्यके पास आया. और उसने आकर बयान किया कि जो कोई एक महल मेरे कहे मुआफिक बनाके घरे, चैन उठावे. और बडा नाम पावे. तब राजाने कहा, अच्छा जाहिर करो. ब्राह्मण कहने लगा-तुला लग्न जब आवे तो उसमे मंदिर उठावे, जबतलक वह लग्न रहे तब तलक काम जारी रक्खे. और जब तुला लग्न होचुके तब उसका काम मौकूफ करे. इसी तरह तुला लग्नहीमें वह सारा मकान तैयार कर राखे तो उसका अटूट भंडार होजावे. और लक्ष्मी उसके यहांसे कभी न जाय. यह सुनकर राजा मनमें खुश हुआ. और दीवानको बुलाकर मन्दिर उठानेकी इजाजत, दी, कि—तुम अच्छी जगह ढूंढकर महल बनाओ. इतनेमें तुला लग्नभी आन पहुंचा. उस मंदिरके नींवकी देश देशमें यह हवाई हुई कि राजा बिक्रम तुला लग्न साधकर महल बनाता है. जितने कारीगर उसमें काम करतेथे वे उठकर तुला लग्न
( ३८ ) सिंहासनबत्तीसी मनातेथे. जब लय आती थी, खुश हो हो बनातेथे, कही उसमें काम सोनेका और कही रूपेका ओर कही लोहेका और कहीं काठका, नई नई तरहसे बनताथा. चुनांचे दरयाके किनारेपर वह हवेली बनाई चार दरवाजे और सात खण्ड उसमें रक्खे. और जगह जगह जवाहिर अनमोलके उसमें जड़े और दरवाजेपर दो नीलमके बडे नगीने लगाये कि, किसीकी नजर न लगे, वह जडाउ महल कितनेक बरसोंमें ऐसा तैयार हुआ कि, दुनियाँके परदेपर कीसीने दूसरा न आँखोंसे देखा और न कानोंसे सुना तब दीवानने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! आपके हुक्म मुआफिक मंदिर तैयार होगया है. आप चलकर उसे देखिये. जो कोई उस महलको देखताथा सो मोहित हो रहताथा. ऐसा सुन राजा वहांरो मकान देखनेको गया. एकबार राजाके साथ एक ब्राह्मणभी गया. महलको जब राजाने मुलाजहा किया तब ब्राह्मण देखकर और हँसकर कहने लगा-ऐ राजा ! ऐसा घर जो मैं पाऊं, तो बैठ यहां सुखसे समय विताऊं. यह बात सुनकर राजाने कुछ मनमें साच न कि- या. गंगाजल और तुलसीदल लेकर वह घर उस ब्राह्मणको संकल्प कर दिया. यह घर पाकर ब्राह्मणको ऐसा आनंद हुआ कि, जैसे चकोर रातको चन्द्र पाता है, तुर्त वह अपने कुटुंबको ले आया और वहां आकर आनंदसे रहा. और रातको खुशीसे पलंगपर सोताथा कि, पहर रात गये लक्ष्मी वहां आई और कहने लगी-
चौथी पुतली ४. ( ३९ )
चौथी पुतली ४. ( ३९ )
बेटा ! हुक्म दे तो मैं गिरू और घर बाहर संपूर्ण भरूं. खौफसे उसने कुछ जवाब न दिया तब वह दोपहर रातको फिर गई ओर कहा कि, ऐ ब्राह्मण ! अज्ञानी ! मुझे आज्ञा दे. उन्होंने चिंता करके रात गंवाई और सुबह हुए राजा वीर विक्रमादित्यके पास आया. मन मलीन और रातके अहवालमे डरा हुवा रंग जर्द चिहेरेका ओर डरसे कुम्हलाया हुआ इस शक्लसे देख राजा उसे हँसने लगा. फिर कहने लगा कि, कलकीसी खुशी हमने आज न देखी, ऐ ब्राह्मण ! यह अचंभेकी बात है. तब ब्राह्मण बोला कि-सुन स्वामी ! मेरे दुःखके तुम दाता हो, प्रजाके सुख देनेवाले और तुम शकबंधी नरेश हो. जैसे राजा कर्ण और इंद्र अपने समयमें दानी थे वैसेही इस समयमें तुम हो. आपने जो मंदिर मेरे तई दिया है उसकी हकीकत में कहताहूं. मालूम नहीं कि, इस मंदिरमें भूत है ! या पिशाच ! मेरे तई उसने सारी रात सोने नहीं दिया. आपकी कृपासे और इन लडकोंके भाग्यसे जीता बचा. इसवास्ते अब मैं यहां आया हूं. इससे भीख मांगना मुझे बेहतर है. पर उस महलमें न रहूंगा यह बात सुन राजाने प्रधानको बुलाया और ऐसा कहा कि, जो इन मकानमें लगा है, सो हिसाब करके इस ब्राह्मणको दो. राजाकी आज्ञा पाय दीवा- नने हिसाब कर तोड़े रुपयोंके लदवाकर ब्राह्मणके साथ कर दिये और वह अपने घरको गया. एक दिन साअत देख उस