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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

( १६२ ) सिंहासनबत्तीसी.

तब राजाने छहोंका शिर काट उस गुंफामें डाला और उसका मुँह बंद कर चला २ मंदिरमें आया. और आतेही नगरमें ढँढोरा फिरा दिया कि जितने ब्राह्मण और ब्राह्मणियां और ब्राह्म- णोंकी कन्या हैं वे सब यहां आनकर हाजिर होवें. यह सुनकर सब हाजिर हुई जितने रानियोंके गहने और वस्त्र थे सब ब्राह्मणियोंको पहनाये. और एक एक ब्राह्मणको एक एक गांव वृत्ति करदिया. और जितनी कन्या थीं उनको दान दहेज़ दे व्याह कर दिया. और आप राजकाज करने लगा. इतनी बात कह पुतली समझाने लगी कि, सुन राजा भोज ! तू बड़ा पंडित है पर इस आसनपर वह बैठेगा, जो विक्रमादित्यके समान होगा. तब वह साअत गुजर गई. राजाभी वहांसे उठकर अपने मकानको गया. रातको इसी सोचमें पडा रहा. दूसरे दिन सुबहको फिर सिंहासनके पास आकर चढ़नेके तयार हुआ तब जयलक्ष्मी-

पचीसवीं पुतली-

बोली-सुन, राजा भोज ! एक दिनकी बात मैं तेरे आगे कहतीहूं एक भाट निपट दरिद्री खररावहक था. सब पृथ्वीके राजाओंके पास फिर आयाथा. और एक कौ-

पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ )

[header] पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ ) [/header]

डेका किसीसे उसने फायदा न पाया था. जब अपने घरमें आया तो देखा कि बेटी जवान व्याहनेके लायक हुई है. यह अपने जीमें चिंताही करताथा कि, उसकी भाटिन बोल उठी कि, तमाम देश तुम फिर आये पर जो कमाई कर लाये सो कहो. तब उसने जवाब दिया कि, मेरे प्रारब्धमें धन नहीं. मैं इस लिये कि. तमाम राजाओंके पास गया. और शिष्टाचार उन्होंने सब किया; पर एक दाम न हाथ आया. अब मेरे जीमें एक बात आती है. राजा बीरविक्रमादित्य बाकी रहगया है उसके पासभी जाकर माँगूं जो मेरे जीका संदेह मिटे. फिर वह भाटिन बोली-अब तुम कहीं मत जाओ और संतोषकर रहो. कर्मका लिखा फल यहीं बैठे पाओगे. फिर भाटने कहा कि, राजा वीरविक्रमादित्य सुनते है कि बड़ा दानी है, उसके पास अपनी कामनों जो ले गया है वह खाली हाथ नहीं फिरा और अपने मकसदको पहुँचा है. ये बाते कर वह राजाके पास चला और गणेशजीको मनाय राजाके सन्मुख जा खडा रहा. तब राजाने दंडवत् की और वह आशीष देकर बोला कि-हे राजा ! बहुत भूमि पै फिर आया हूं और आपका यश मुझे यहां ले आया है. आप इस मर्त्यलोकमें इंद्रका अवतार हो. आपकी बराबर दानी इस संसारमें कोई नहीं. इस समयमें आप दान देनेमें राजा हरिश्चंद्र हो और तमाम पृथ्वीमें आपकाही यश छाय रहा है. और स्वामी मैं कालिकासुत हूं. भाटवंशमें आनकर अवतार लिया है और

यहाँ पृष्ठ पर दिए गए पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

( १६४ ) सिंहासनबत्तीसी. अब तुम्हें याचने आयाहूं, मेरा मनोरथ पूर्ण करदो. मैंने संसारमें फिरकर खूब देखा कि, सिवाय तुम्हारे मेरी आशाका पुजानेवाला और और कोई नहीं. तब हँसकर राजाने कहा कि, तू अपना मतलब सब मेरे आगे प्रकाश करके कह तो मैं तेरी कामना पूरी करूं. भाटने कहा-यों मुझे अपने कर्मका भरोसा नहीं आप बचन दीजिये तो मैं खातिरजमासे कहूं. तब राजाने बचन दिया. भाट बोला-महाराज ! मुझे मुंहमांगा दान दीजिये, मेरी पुत्रीकी शादी करदो बारह बरसकी कन्या मेरे घरमें बैठी है, इस लिये मैं आपके पारा याचने आया हूं, यह सुन राजाने हँसकर मंत्रीसे कहा कि, जो यह मांगे वह इसे दो. फिर भाटने कहा-महाराज ! जो कुछ आपको देना है सो अपने सम्मुख मँगा- कर दीजिये मुझे इस संसारमें अब किसीका इतबार नही. राजाने दश लाख रुपये रोक और हीरे, लाल, मोती, सोने, रूपेके गहने था ल भरकर दिये. और वह ले आशीश दे अपने घरमें गया. जो कुछ लाया था सो सब ब्याहमें लगाया और राजाने उसके पीछे जासूद कर दिये थे कि तुम देखो कि, 'यह धनको लेजाकर क्या करता है,' ? इसकी खबर ठीक मुझे लाकर दो. जब शादी कर चुका और उसके पास एक दिनेके खानेको कुछ न रहा तब उन हलकारोंने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! उस भाटने ऐसा ब्याह बेटीका किया कि इस कलियुगमें कोई और करसकता नहीं. जो कुछ वो आपके पाससे धन दौलत लेगया

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ )

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ ) सो सब क्षणभरमें बेटीको दे ब्याह दिया. यह सुन राजाने और कई लाखैं रुपये उसके घर भेज दिये. और अपने चित्तमें बहुत प्रसन्न हुआ कि, धन्य भाग्य मेरा है जो मेरे राजमे ऐसे हिम्मत- वाले लोग हैं. इतनी बात कह पुतली बोली कि सुन राजा भोज ! इतना.धन देकरभी राजाने उसका खर्च सुन और दौलत भेज दी ऐसा दानी तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो मनके लड्डू खानेसे कुछ हाँसिल नहीं है. यह सुनकर राज अपने महलमें आया. फिर सुबह हुआ तो स्नान पूजा कर वहीं आन पहुंचा इतनेमें विद्यावती नाम— छब्बीसवीं पुतली— कहने लगी कि, सुन राजा भोज ! मैं तेरे आगे ज्ञानकी बात कहती हूं और तू मन देकर कान रख जब आदमी जन्मता है तो कुछ नहीं संग लाता और मरता है तो कुछ नहीं लेजाता. इस जीवितका फल यही है कि, संसारमें आकर कुछ करनी करे, और जैसी करनी करेगा वैसाही फल पावेगा. और संसारमें जीवन थोडा है इससे ऐसा यश करो कि, जानेपरभी जगमें नाम ठहरा रहे. दोनों लोकोंमें सुख पावे. यह मनुष्यजन्म बारंबार नहीं पाता देह पाता है. और लक्ष्मी दान कर कुछ सोच मत कर. यही अपने

बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा

( १६६ ) सिंहासनबत्तीसी. जीमें सदा रख कि, दान हमेशा किया कीजिये यह भयरूप जो संसारसागर है इसके तरनेको सिवाय दान, उपकार और हरि- भजनके चौथा उपाय नहीं. मैंने तुझे कहा कि, साथ कोई कुछ ले नहीं जाता. मैं तेरे आगे सब कहतीहूं कि, राजा हरिश्चंद्र, राजा कर्ण, राजा बीरविक्रमादित्य क्या ले गये ! और जिन्होंने दान उपकार हरिभजन किया उनका जगमे नाम रहा और अंतसमय बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा विक्रमादित्यने क्या किया है ! वह कह. तब विद्यामती पुतली बो- ली कि, एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य राजसभामें बैठा था तब एक दासीने आकर अरज किया कि, महाराज ! उठिये पूजाका समय जाता है. यह सुनकर राजाने विचार कि, इसने सच कहा मेरी उमर चली जाती है और मुझसे ज्ञान, धर्म, पूजा बन नहीं आई इससे उत्तम यही है कि, इस राजकाजकी माया भुलाय आप योग कमाइये जो कि और जन्ममें काम आवे. यह राजाने अपने जीमें विचार और राजपाट, धन जन मिथ्या समझकर तपश्या करनेको एक बनको चला ओर यह विचार करता जाताथा कि, इस संसारमें जीना सबेरेकी ओसकी समान है और जिसके भरोसेमें मैंने अपना काम अकारण गवाँया. यह विचार करता हुआ पूर्वजन्ममें दान, व्रत, तपश्या बहुत कर आता है तो यह नर- हुआ राजा एक महाबनमें जा पहुँचा वहां जाकर देखे तो

छब्बीसवीं पुतली २६. (१६७)

छब्बीसवीं पुतली २६. (१६७) एक मंडली तपस्वियोंकी बैठी हुई है. धुनी एक एकके आगे जागे रही है, आसन मारमार अपने अपने ध्यानमें लीन हो रहे हैं. कोई ऊर्ध्वबाहु, कोई कपाली आसन मार, कोई पचाग्नि, इस रीतिसे अनेक अनेक प्रकारकी साधना कर रहे हैं और कोई कोई उनमें बैठ शरीरसे मास काट काट होम कर रहा है. इस तरहसे उनकी तपस्या देख राजाभी तपस्या करने लगा. आपभी तपश्या कर- ताथा और कईएक दिनमें तपस्वियोंने अपना शरीर होमने लगा- कर दिया. उनकी देखादेखी राजाभी अपना शरीर सब होम कई महीनोमें राजाने एक दिन शिरभी अपना काट होम कर- दिया. वहां जो एक शिवका मंदिर था उसमेंसे एक शिवगण निकला और निकलकर सब तपस्वियोंकी धुनीमेंसे राख समेट कर जुदी जुदी ढेरी की और फिर जा शिवको खबर दी कि, महाराज ! आपने कहाथा सो मैंने किया तब शिवने आज्ञा दी कि, यह अमृत तू लेजा और उनके ऊपर छिड़क आ. यह आज्ञा पाय अमृत ला ज्यों ज्यों छिड़कताथा त्यों त्यों उनमें एक २ आदमी शिव शिव रामराम कहकर खडा रहताथा. सब पर तो उसने छिडक दिया पर राजाकी धुनी भूल गया और सब तपस्वी मिलकर शिवकी स्तुति करने लगे कि, महाराज ! आपका भक्त राजाभी है आप अनाथके नाथ हो जिसने आपका स्मरण किया तिसको तभी तुमने फल दिया और जहां जहां सेवकोंक

( १६८ ) सिंहासनबत्तीसी.

संकट हुआ है तहां तहां उसका सहाय किया है. यह स्तुति करके उन तपस्वियोंने कहा कि, महाराज ! एक नृपतिभी हमारे साथ तपस्या करता था, मालूम नहीं कि, उसको उठानेकी आपकी आज्ञा हुई कि नहीं यह सुन महादेवने उस गणके तरफ देखा. देख- तेही उसने अमृत ले जाकर जो धुनी बाकी रहीथी उसपर छिड़- का राजाभी हरिहर कहता उठ खडा हुआ और हाथ जोड स्तुति करने लगा कि, महाराज ! संसारके सब जीवोंकी आप सहाय करते हैं और पालते हैं आप बिना इस संसारसागरसे कौन पार उतारे ? जिसने जगमें आपको नहीं पहुँचाना उसने अपना जन्म निष्फल खोया. फिर जितने तपस्वी वहां थे उनको शिवजीने मुंह मांगा वर दिया. और सबको बिदा किया. सबके पीछे जब राजा अकेला रहगया तो उसे कहा कि, हे राजा वीरविक्रमादित्य ! अब जो तेरी इच्छामें आवे सोही वह मुझसे मांग मैं तुझे दूंगा. यह सुन राजाने कहा-महाराज ! आपकी दयासे सब कुछ है पर एक यह मांगता हूँ कि-संसारके जन्ममरणसे मेरा निबेडा करो. जैसे और भक्तोंका निबेडा किया तैसे मुझ परमपापी आधीन दीनही- नको तारो. यह राजाकी विनती सुन दयाकर शिवजीने हँसकर कहा कि, तेरे समान कर्मी इस कलियुगमें कोई नहीं है. ओर तू ज्ञानी, भोगी, दानी, साहसी, तपस्वी है, कलिके राजाओंका उद्धार कर-

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )

नेवाला है और मैं तुझसे कहताहूं कि, तू जाकर अपना राज कर, तेरा काल निकट आवेगा तब तू मेरेपास आइयो, मैंने तुझे बचन दिया है कि, अंतसमयमें मैं तुझे मोक्षपद दूंगा. इससे तू अब जाकर मर्त्यलोकमें आनंदसे राज कर. फिर राजा करुणा करके बोला कि, महाराज ! संसारमें तुम्हारे प्रपंच कुछ जाने नहीं जाते या तो मुझे इस समय तारो नहीं तो मैं अपना जी देताहूं. तब हँसकर शंकरजीने कहा कि, जो तू जी देगा तो मृत्युबिना यम तुझे हाथसे भी न छुएगा. और फिर आयुर्बलके दिन भरने पड़ेंगे इसवास्ते तू जा उठ मेरा वचन जीमें रख इतना कह शिवजी तो कैलासको गये, और राजाके हाथमे कमलका फूल दे यह कह गये कि जब यह कमल मुर्झायगा तब तू जानियो कि अब छ महीनेमें मैं मरूंगा. फूल ले राजा अपने नगरको आया और अपने मनका विचार किसीके न कहा. कितनेएक बरस पीछे वह कमलका फूल मुर्झा गया. तब राजाने समझा कि, मैं अबसे छ महीनेमें मरूंगा. जितनी कुछ धन और दौलत थी सो सब ब्राह्म- णोंको संकल्प करदी. स्त्री और पुत्रके खानेको कुछ धन दिया बाकी सब पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान करदी. इस तरह राजा ज्ञान पुण्यकर सदेह कैलासको चला गया. इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! विक्रमा दित्यने इतना काम किया और जीवन मरण दोनों चीन्हा. इससे मैं तुझसे कहती हूं कि, जीनेका

( १७० ) सिंहासनबत्तीसी.

कुछ भरोसा नहीं और मरण साथ लग रहा है. दुःख सुखभी मनुष्यके साथ हैं और पापपुण्यभी रहते हैं. नि- र्गुण और सगुण ज्ञानभी घटमें रहता है पर एक ब्रह्मही अलग है. इस वास्ते मैं तुझसे कहतीहूं-ऐ भूपाल ! संसारमे जिसकी कीर्ति रह जाती है सोही अमर है. जो मैंने तुझे कहा कि, मन वचन कर्म कर तू सच जान. वह दिन तो यों गुजर गया, राजा नाउ- म्मेद होकर अपने मकानको फिर गया. सुबह होतेही हाथ, मुंह धो, स्नान पूजा कर फिर वहीं आन मौजूद हुआ और जितने राजाके सभामें लोग थे वे भी सब हाजिर हुए राजाने अपने लोगों कहा कि-पुतलिया तो बाते झूठ झूठ बना मेरे आगे कहती है अब मैं इनकी बाते न सुनूंगा और इस सिंहासनपर बैठूंगा. यह अपने लोगोंसे बाते करता था कि-जगज्ज्योति नामावाली -- सताईसवीं पुतली- बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य अपनी सभामें बैठा था कि, उसमें प्रसंग निकला. उसमे- कोई बोल उठा कि, आज राजा इंद्रके बराबर कोई राजा नहीं है, क्योंकि वह देवलोकका राज करता है ! यह बात राजाने सुन किसीसे कुछ न कहा और बैतालोंको बुलाकर कहा कि, मुझे इंद्रपुरीको ले चलो. बैताल तुरंत के उडे और एकदममें के

सत्ताईसवीं पुतली २७. ( १७१ )

[Page Header] सत्ताईसवीं पुतली २७. ( १७१ )

जाकर इंद्रकी सभामे पहुंचा दिया. राजाने जातेही वहां इंद्रको दंड- वत् की और हाथ जोड़ खड़ाहुआ. तब इंद्रने बैठनेको आज्ञा दी वह हुकुम पाकर बैठगया तब इंद्रने कहा तुम कहांसे आये हो । और तुम्हारा नाम क्या है ? देश तुम्हारा कौनसा है ! किस अर्थको यहां आये हो ! सो तुम कहो. तब राजा बोला कि-स्वामी ! अंबा- वती नगरीका मैं राजा हूं. मेरा नाम विक्रम है, और आपके पद पंकजके दर्शनके अर्थ आया हूं. तब प्रसन्न हो इंद्र बोला कि- हमनेभी तुम्हारा नाम सुनाथा. और मिलनेकी इच्छा थी सो तु- मने आके यहा उलटी रीत की अब जो कुछ तुम्हारा मनोरथ हो सो हमसे कहो और जो कुछ तुम्हें चाहिये सो मांगो हम तुम्हें देंगे. राजाने कहा-स्वामी ! आपकी कृपा और धर्मसे सब कुछ है और जो कुछ न हो तो मैं आपसे मागूं. आपका दिया हुआ सब कुछ तेरेपास है. राजाकी ये बातें सुनकर इंद्रने प्रसन्न हो अपना मुकुट और एक विमान दे यह आशीष दिया कि, जो तेरे सिंहासनको बुरी दृष्टिसे देखेगा वह तुर्त अंधा होगा. राजा वहांसे बिदा हो फिर अपने नगरमे आया और बधाई बजने लगी. इतनी बात पुतलीसे सुनकर राजा भोज सिंहासनपर हाथ धरकर एक अपने पावको ऊपर रख खडा होकर कहने लगा कि आसन मार गद्दीपर जा बैठूं. इतनेमें आँखोंसे अंधा होगया और दिवानी दिवानी बातें करने लगा. चाहता था कि हाथ उसपरसे उठावें पर जुदा न होता था. यह हालत देख

लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी

( १७२ ) सिंहासनबत्तीसी. पुतलियां खिल २ हँसने लगीं. और सब सभा भौंचक होगई. और जीमें सब लोग कहने लगे कि, राजाने क्या यह अपन किया कि, बिना बात सुन सिंहासनपर पांव धर दिया. यह अपनी दशा देख राजा भोज बहुत पछताकर लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी बात न सुनकर यह फल पाया. अब तू ऐसा ही रह. यह सुन राजा निराश होकर बोला-इसका उपाय बताओ. पुतली बोली-राजा विक्रमका नाम ले तब तू इस दुःखसे छूटेगा. जब विक्रमका यश राजा भोजने बखान किया तब हाथ छूट गया और आँखसेभी सूझने लगा. फिर नीचे उतर खड़ा हुआ. देखकर सब लोग भयमान होंगये और राजाभी अपने चित्तमें डरा. सभाके सब लोग बोले कि, राजा विक्रमके समान होना इस कलियुगमे बड़ा कठिन है. फिर पुतली बोली कि, राजा ! इसीवास्ते मैंने कहा था और तू मेरी बात झूठ मत मान, तू मूर्ख है. कुछभी तुझे ज्ञान नहीं. जो तू विद्या पढ़ा है इससे कुछ होता नहीं. ज्ञान हे सो औरही चीज है अपने बराबर राजा बीरविक्रमादित्यको मत समझ. वह देवता- ओंके समान था. और उसके बराबर ज्ञान ध्यान तेरा नहीं. अ- पने जीमें इस सिंहासनकी आश छोड़. वह सिंहासन तुझे नहीं साजेगा और संसारमें बहुत बातें हैं वे कर, जिसमें तेरा राज

आठईसवीं पुतली २८. ( १७३ )

आठईसवीं पुतली २८. ( १७३ ) स्थिर होजाय. प्रताप बढ़े, कीर्ति रहे वह दिनभी गुजर गया. राजा फिर अपने महलमें गया. रात ज्यों त्यों बीती. सुबह होतेही फिर उसी मकानपर आन खडा होगया तब मनमोहिनी नामक— अठाईसवीं पुतली— बोली—सुन राजा भोज ! बीरविक्रमादित्यके समान बली, साहसी और ज्ञानी कलिमें दूसरा कोई हुआ हो तो तू मुझे बतादे. औरजो मै कहती हूं सो सचकर जान. एक दिन- मैने राजा बीरविक्रमादित्यसे हँसकर कहा कि, स्वामी ! पातालमें राजा बालि बडा राजा है, जिसके दाससमानभी तू नहीं हो सकता है और जो अपना राजा तू स्थीर किया चाहे तो एकबार राजा बालिके पास तू जाकर आ. यह बात सुनतेही बैतालोंको बुला आज्ञा दी कि, पातालमें राजा बालिके पास मुझे ले चलो. यह सुनतेही बै- ताल तुर्त के उडे और दमभरमें पातालमें पहुँचा दिया. राजा वह नगर देख भौचक हुआ. और अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा नगर मैने आजतक कहीं नही देखा. आनंद कैलासके समान हो रहा है. धन्य राजा बालिको जो इस नगरका राज करता है. इस तरहसे नगर देखता हुआ राजाके सिंहपौरपर जा खडा हुआ और हाथ जोड बिनती कर द्वारपालोंसे कहा कि, अपने राजाको मेरे

( १७४ ) सिंहासनबत्तीसी.

आनेका समाचार कहो कि, मर्त्यलोकसे राजा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. सुनतेही डेवढीदारोंने अपने राजाके पास जा विक्रमकी खबर दी. सुनकर राजा बालिने कहा नरको मैं अपना मुँह न दिखाऊंगा. यह सुनकर दरवानने आ राजासे कहा कि, तुम्हें दर्शन न पाऊंगा तब तलक यहांसे मैं न हलूंगा. यह बात दरवानने जाकर राजा बालिसे कही. तब उसने कहा कि, विक्रम तो कौन है ! जो राजा इंद्रभी आवे तो मै अपना दर्शन दूंगा नहीं. फिर कोई मनमें बिचार न आया फिर एक दिन राजाने दुःख पाके अपना शिर काट डाला ओर बलिकी तमाम सभामें रोला मचा कि, बडा अयुक्त काम इस प्राणीने किया. राजाने यह बात सुन हंसकर आज्ञा दी कि, अमृत लेजाकर उसे जिलाओ और कहा कि, तुझे राजाका दर्शन होगा तू अपने जीमें मत घबरा इस वख्त तूं जा और अपना राजकाज कर जब शिवरात्रि आवेगी तब आइयो तुझे दर्शन मिलेगा, यह सुन एक दास राजाका अमृत ले गया. और राजा बीरविक्रमादित्यर छिडककर जियाला, जब राजा सावधान होकर बैठा तब उसने राजा बालिका संदेश सब कहा. यह सुनकर विक्रम बोला कि, तुम यह बात कहकर मुझे क्यों बहँकाते हो ? मैं तुम्हारा कहा नहीं मानूंगा. इससे उत्तम यह है कि, तुर्त महाराजाका दर्शन करूं. वह सुन लोगोंने राजाके पास जाकर कहा कि, महाराज ! वह नहीं मानता और

अठाईसवीं पुतली २८. ( १७५ )

अठाईसवीं पुतली २८. ( १७५ )

जाताभी नहीं. जब इस जबाब सवाल कहनेका कुछ देर हुई तब फिर राजा बीरविक्रमादित्यने अपना शिर काट डाला. द्वारपालने राजासे कहा कि, महाराज फिर इस मनुष्यने जी दिया. राजाने फिर अमृत भेज दिया और कहा कि, उसे जिला समझाकर उसके नगरको पठा दो. एक दूतने आकर राजापर अमृत छिड़क जिलाया. और कहा कि तू अपने जीमे धीरज रख अब तुझे दर्शन होगा और जितनी राजाकी सभाके लोग थे उन्होंने एक मताकर राजासे कहा कि, महाराज ! विक्रमकी आशको निराश मत करो, क्योंकि उसने बड़ा साहस किया है. उनकी बातें सुन राजा बलि उठकर द्वारपर आगया और विक्र- मने दर्शन पाया. तब दंडवत् कर हाथ जोड कहा कि, महाराज धन्य है भाग्य मेरा जो मैंने आपका दर्शन पाया. और जन्म जन्मका दुःख गँवाया. फिर कहने लगा-महाराज ! क्या मेरा अपराध था जो आप मुझे दर्शन न देते थे ? क्या मैं साहसी नहीं हूं या मुझे लोकके लोग नहीं जानते ! वह कौनसा पाप था जो मैं आपके द्वारेपर आनेसे आपने बुरा माना ? सो मुझे कृपा- करके कहो. तब राजा बलि हंसकर बोला कि, सुन विक्रम कुलनायक ! तेरे समान और कोई राजा नहीं अब, कान देकर सुन कि, तेरे आगे इसका ब्यौरा कहता हूं. पहले राजा हरि- श्चंद्र बडा दानी, साहसी, यशी हो गया है और एक राजा जग- देव बडा प्रतापी और दानी हो गया है. उन दोनोंने भी बडा

( १७६ ) सिंहासनबत्तीसी. दान और साहस किया था. पर तेरासा उनका न था और उन्होंनेभी मेरे दर्शनकी बहुत अभिलाषा की थी. पर मैंने दर्शन किसीको न दिया. तू एक द्वीपका राजा किस गिनतीमें है ? पर तपस्या बडी जोरावर है जो तुझे मेरा दर्शन मिला. तब राजा विक्रम फिर हाथ जोडकर कहने लगा कि, हे महा- राज ! जो आपने कहा सो सब सच है. और मैंने निश्चयकर अपने जीमें माना कि, आपने मुझपर बडी कृपा कर दर्शन दिया. और दया कर इस भवसागरसे पार किया. फिर राजा बलिने कहा कि, राजा विक्रम ! तू अब यहांसे विदा हो और जाकर अपना राज कर. विदाका नाम विक्रमने सुनकर बडा खेद किया. इतनेमें राजा बलिने एक अच्छा लाल मँगवाकर राजा विक्रमको प्रसाद दिया. और उसका जो गुण था सो बताया कि, जो तू इससे मांगेगा वह सब यह देगा. विक्रमने हाथ जोड लिया और राजा बलिको दंडवत् कर वहांसे निकला, और बैतालोंको बुलाकर सवार हो अपने नग- रको आया. जब नगरके निकट आन पहुँचा तब एक नदीके किनारे देखे तो एक स्त्रीका खाविंद मर गया है उसे जलाकर खडीहुई वह डकरा डकरा रोती है और कहती है कि, अब इस संसारमें मेरा मालिक कोई नहीं है और न मेरेपास कुछ माया है अब किस तरहसे तेरा श्राद्ध करूंगी और पंचोंको क्या दूंगी. ? इसका कूक मार मार रोनेका अवाज राजाने सुना

अट्ठाईसवीं पुतली २९. ( १७७ )

अट्ठाईसवीं पुतली २९. ( १७७ ) और वहां जाकर देखा, तो इसका ऐसा हाल हो रहा है सो देखकर वह रत्न यानी लाल उस स्त्रीको दिया और कहा कि जो तू इससे मांगेगी सो यह लाल तेरी आशा तुरंत ही पूरी करेगा. उसको ले वह नारी अपने धामको गई और राजा वीरविक्रमादित्यभी अपने महलमें आ दाखिल हुवा इतनी बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! ये गुण विक्रममें थे. वह ऐसा साहसी था और प्रजाका हितकारी. जो तू सात स्वर्ग फिर आवेगा तो भी उसके समान कोई न हो सकेगा. इससे अब तू अपने मनके ख्यालसें बाज आ. और जो राजाने काम किये हैं सोही तुझसे कहूंगी. वहभी दिन उसी तरहसे टल गया. रात ज्यों त्यों बीत गई. दूसरे दिन सुबह होतेही राजा भोज अपने दीवानको साथ ले आया. और फिर सिंहा- सनके पास जाकर खडा हुआ. इतनेमें वैदेही नाम --

उन्तीसवीं पुतली-

( १७८ ) सिंहासनबत्तीसी.

उन्तीसवीं पुतली-

कहने लगी-कि, हे राजा भोज ! तू किस बातपर भूला है ? सब सखियोंने तुझे राजा विक्रमकी कथा सुनाई तब भी तू पत्थर न पसीजा. अभी पहले मुझसे बात सुनले और पीछेसे सिंहासनपर पाँव दे. राजाने कहा कि-अच्छा कह, मैं सुनूंगा पुतली बोली- एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य रातको अपने मंदिरमे सोताथा कि, एक ख्वान देखा. वह मैं तेरे आगे कहती हूं क्या देखता है कि, एक सोनेका महल है, और उसमें अनेक अनेक प्रका- रके रत्न जड़े हैं और तरह तरहके पाक पकवान और सुगन्धे भरीहुई हैं और एक तरफ एक अच्छी फूलोकी सेज बिछी हुई हैं. एक तरफ फूलोंके गहने चंगेरोंमें भरेहुए हैं, अतरदान, पान दान, गुलाबपाश भरे धरे हैं ओर मकानकी चारों ओर फूलवारी खिली हुई है. बाहर उस मकानकी भीतोंपर रंग रंगके चित्र बने हुए, कि जिनके देखनेसे तुर्त आदमी मोहित हो और उस मंदिरके भीतर खूबसूरत स्त्रियां अच्छे साज मिलाये मीठे मीठे राग सुनता है. यह देख राजाने अपने जीमें कहा कि, यह तपस्वी इन नारीयोंके योग्य नहीं है, इतनेमें आंख खुल गइ और सुबह हुआ; तब राजा स्नान ध्यान कर बीरोंको बुलाकर

उन्तीसवीं पुतली २९. ( १७९

उन्तीसवीं पुतली २९. ( १७९

बोला कि, मैने जिस जगहको स्वप्नमें देखा है तुम मुझे वहां ले चलो. राजाकी यह बात सुनतेही वीर उठाकर ले उडे और पलक मारते वहा जाकर पहुंचे. राजाने वहांसे नीचे उतर वीरोंको रुखसत किया. और आप उस बगीचेमें जा उस मकानकी तैयारी देखतेही मनमें भौचक हो अपने मनमें कहने लगा कि, यह मकान किसने बनाया है ? आदमीका तो मगदूर नहीं चाहिये तो ब्रह्माने अपने हाथसे चित्त देके रचा है. फिर उस मंदिरके अंदर जा राजा खडा हुआ इतनेमें वहां जो रंडिया बैठी गाय रहींथी सो राजाको देख अपने मनमें डर चुप हो रहीं और उस सिद्धका स्मरण किया उसने तुर्त आके दर्शन दिया. और वह विक्रमको देख क्रोध कर बोला कि, अभी मैं तुझे शाप देता हू कि, तू जलकर भस्म. होजाय किस लिये मेरे स्थानपर आया है ? सुखसे ये स्त्रियां बैठी राग आलाप कर रहींथीं. इतनेमे तूने आकर उनका रंग भंग किया---यह सुन- कर राजा हाथ जोड बिनती करके बोला कि ? महाराज मैं अनजान यहां आया हूं तुम्हारे दर्शनकी इच्छा थी पर तुम्हारे क्रोधकी आंचको कौन सह करता है ? मैं आपका दास हूं चुक मेरी माफ काजिये. यह सुन वह योगी बोला कि, सुन बिक्रम ! तूने सच कहा. मुझे बडा क्रोध हुआ था. पर जो तू मेरे सम्मुख न होता तो मैं तुझे शाप देता और अब मैं तेरी बात सुन प्रसन्न हुआ तू मुझसे मांग जो चाहिये. राजाने कहा कि-महाराज ! मैं क्या मांगू आपके प्रसादसे मेरे यह

१८० सिंघासनबत्तीसी. सब कुछ है. अन्न, धन, हाथी, घोडे किसी चीजकी कमताई नहीं. पर एक वस्तु मात्र मांगनेके लिये मैं आपके पास आया हूं जो कृपाकर दीजिये तो मैं मांगूं. यह सुन योगीने कहा कि, राजा ! जो तू मांगेगा सो मैं दूंगा. यह बात सुनतेही विक्रमने कहा-महाराज ! यह मंदिर मुझे दीजिये. योगीने सुन कुछ बिलंब न किया. तुर्त वह मंदिर राजाको दिया. और अपना योगरूप धर वहांसे तीर्थब्रत करनेको गया. राजाने जब वह महल पाया तब प्रसन्न हो गद्दीपर जाकर बैठा और वे सब रंडियां जैसे योगीके आगे गातीथी वैसेही तहासे राजाके पास गाने लगी राजाभी उस मंदिरमें खुशीसे रहने लगा. वहा अनेक अनेक प्रकारके संभोग करने लगा. इतनी बात कह वैदेही नाम पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! इस रीतिसे राजा विक्रमादित्य तो वहा बैठकर आनंद करने लगा और योगी तीर्थ तीर्थ फिरकर रहता था. और जो कोई सिद्ध मिलता था उससे अपना दुःख कहता था- इस तरहसे किसी और तीर्थमें जाकर पहुंचा आर वहां एक यतीसे अपने जीके दुःखका ब्योरा सब कहने लगा. उसने उसको कहा कि तू अपने स्थानको जा और भेष धरके राजा विक्रमसे जाकर सवाल कर वह तो बडा धर्मात्मा है. जभी तू वह मकान मांगेगा तभी तुझे हवा ले कर देगा. तू आपके मनमें चिंता मत कर. यहु योगी उसकी सीख मान एक अति बूढे ब्राह्मणका भेष धर उस मंदिरके निकट आन पहुँचा. और उसके द्वारपर जा ताली दी. तालीकी

तीसवीं पुतली ३०. ( १८४ )

तीसवीं पुतली ३०. ( १८४ ) आवाज सुनतेही राजा बाहर निकल आया और उसे कहा कि, तू क्योंकर यहां आया है ? इस वक्त जो तेरी इच्छा होय सो मुझसे मांग. यह बात राजाके मुंहसे सुन ब्राह्मणने कहा कि, महाराज ! मैं तमाम पृथ्वी फिर आया हूं पर अपनी इच्छाका स्थान नहीं पाया कि, जहां मैं बैठकर आराम करूं. यह सुन राजा हँसकर बोला कि, यह ठांव तुम्हारे माफिक हो तो लो. यह सुन ब्राह्मणने आशीष दी. और राजा उसे उस जगहपर बिठा अपने घरको आया. इतनी बात कह पुतली बोलि कि, सुन राजा भोज ! तू ऐसा धर्मात्मा नहीं इसवास्ते इस सिंहासनपर मत बैठ. तू अपने मनमें यह विचारता तो बिना समझे ऐसा इरादा न करता. जो उसकी बराबर हो वह सिंहासनपर बैठेगा. वह रोजभी इस रीतिमें बीत गया. राजा पछता पछता अपने मंदिरमें गया. रात तो ज्यों त्यों कटगई सुबह स्नान पूजाकर फिर वहीं आकर मौजूद हुआ और सिंहासनपर बैठनेको पांव बढ़ाया इतनेमें रूपवती नाम - तीसवीं पुतली- बोली-सुन राजा ! बावले अज्ञानी ऐसा पु नूने कब किया ? जो सिंहासनपर बैठनेको तैयार होकर आ अब एक दिनकी बात राजा वीर विक्रमादित्यका मैं तुझे कि