सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
( ६२ ) सिंहासनबत्तीसी. चाहता है कि, तुझे अपने घर ले जाऊ. तब वह बोली—महाराज ! यह बात तो मेरेभी दिलमें आती है. पर क्योंकर जाऊं ! तुम्हारा नगर समुद्रके पार है. तब राजाने बचन दिया कि, मै तुझे ले चलूंगा. समुद्र लांघनेकी फिक्र अपने मनमें मतकर. इस तरह ले जाऊंगा कि, तुझे मालूमभी न होगा. यों दोनोंने आपसमे बातें कर रैन आनंदसे निकाल और सुबह होतेही राजाने पानी दूसरे कुएसे निकाल उसपर छिडक दिया कि, फिर वह बंदरिया हो कर दरख्तपर जा चढी और राजाभी वहीं छुप रहा. उसी दम योगी आन पहुँचा. वही यत्न योगीने कर छिन एक वहां सुरता खुशी की. जब योगी चलने लगा तब वह सुंदरी बोली—महाराज ! मेरी एक विनती सुनिये. कुछ प्रसाद मैं आपके पास मांगती हूं सो तुम मुझे कृपा कर दीजिये. यह सुन योगीने हँसकर एक कमलका फूल उसे दिया और कहा कि, एक लाल हररोज इस कमलसे पैदा होगा और कभी न कुम्हलायगा. इसे तू अच्छी तरहसे रखना. यह सुनकर उसने अपनी चोलीमे रखलिया. और दिल उसका खुश हुआ. योगी फिर उसे बंदरी बनाने आप चला गया. राजाने आकर फेर कुएसे पानी निकालकर उसे नारी बनायी. और उसने यह कमलका फूल राजाको दिखाया और कहा कि-महाराज ! एक अद्भुत चरित्र है कि इसमेंसे एक लाल हररोज निकलेगा
आठवी पुतली ८ ( ६३ )
आठवी पुतली ८ ( ६३ ) यह बात बुद्धिबाहर है. राजाने कहा अचरज नहीं. भगवान्को सब शक्ति है और वह क्या क्या नहीं करता ? ये बातें कर रात ऐशमें काटी और प्रभात होतेही उन कंगूरोसे एक लाल गिरा. दोनोंने यह तमाशा देखा तब राजाने कहा कि, चंचले ! अब यहां ठहरना उचित नहीं. बेहतर यह है कि, मेरे देशको चलो. यह बात राजाकी सुनकर वह बोली-सुनो महाराज ! एक मेरी अधीनी मैं पांव पडकर जो आपको कहतीहू सो सुनो महाराज ! आप बडे दानी हो. ऐसा दानी आजतक नहीं सुना ऐसा न हो कि, किसीको मुझे दान करदो. मैं दासी होकर आपकी हरव- खत सेवा करूंगी. तब राजा बोला-कि, यह नहीं होसक्ता कि, कोई अपनी नारी परपुरुषको देय यह काम तो धर्मविरुद्ध है और लोकविरुद्ध हे. इस तरह उसकी खातिर जमा कर दोनों बीरोंको बुलाया. वे आकर हाजिर हुए. उन्होंसे कहा कि, जल्दी हमारे देशको ले चलो. वे बीर उन दोनोंको तख्तपर बिठा हवाकी तरह लेकर उडे, वे तो यों अपने शहरकी तरफ गये. और योगी जो यहां आया और उस सुन्दरीको न पाया, तब पछता पछता मनमार मुंझाय रहा निदान राजा अपने नग- रके पास आया और सिंहासनमे उतर उस राजकन्याका हाथ पकड शहरको लेचला. रास्तेमें उसने देखा कि, किसीका एक खूबसूरत लडका दरवाजेपर खेल रहा है. राजास्त्रीके दायें
( ६४ ) सिंहासनबत्तीसी. कमलका फूल देखकर वह लडका रोने लगा. और विकल विकल बोला कि, मैं यह फूल लूंगा तब राजाने कमल रानीके हाथसे ले लडकेको दिया. लडका फल ले हंसता हुआ अपने घरमें गया. राजाभी अपने मंदिरमें जा विराजमान हुआ. जब सुबह हुआ तब उस कमलके फूलमेंसे एक लाल गिरा, लडकेके बापने उसे देख उठा लिया. और कमलको छिपा रक्खा. इसी रंगसे हररोज लाल निकलने लगे कि, एक दिन कितनेक लाल वह लेकर बाजारमें बेचनेको गया वह खबर कोतवालको हुई, तब कोतवालने उसे पकडवा मंगवाया और पूंछा कि-तू बनि- या हे और तूने इतने लाल कहां पाये ? तब वो कहने लगा कि, ये हमारेही घरके हैं. पर उसकी बात न सुन उसे बहुतसी सियासत कर लाल लेकर राजाके पास आया. और सब वह अहवाल बताया. तब राजाने कहा कि-उसको मिलादो. और उसे पूछा कि, तूने ये लाल कहां पाये ? राजाने उसे कहा कि, जो तू सच मुझसे कहेगा तो मैं तुझे औरभी दौलत दूंगा और झूठ कहेगा तो देशसे निकाल दूंगा. उसने अर्ज की सुनो भूपाल ! द्वार खेलता था मेरा बल, उसके हाथमें कोई कम- लका फूल दे गया. और उसने आन मुझे दिया. मैने रातभर उसे अपने पास रखलिया. सुबह होतेही उसमेंसे एक लाल गिरा और अब हररोज एक एक लाल योंही निकलता है. और
नववीं पुतली (६१)
नववीं पुतली (६१)
अबभी वह फल मेरे घरमें है. राजन कहा-वाह ! तूने सब अच्छी बातें कहीं. अब तू ये लाल लेकर अपने घरको जा. इस कोतवालने बहुत बुरा काम किया, जो बेतहकीक ही पकड़ लाया इनसे न्याय अब यह है कि, लाख रुपये कोतवाल तुझे दंड दे. यह कह कोतवालसे लाख रुपये दिलवाये और उसे घरको भेज दिया ये बातें कह फिर पुतली बोली-सुन राजा भोज ! वीर विक्रमादित्यके गुण और धर्म. तू मूर्ख है. कुछ उसकी हकीकत नहीं जानता. वैसे राजाको तू अपने आगे हीन कर मानता है. और अपने ताईं मनमें तू अधिक समझता है ये बातें पुतलीसे सुन राजा उस दिन योंही अउता पछता रहगया. वह साअतभी जाती रही. सुबहको दूसरे दिन राजा सिंहासनके पास खडा हुआ और पुतलीसे पूंछने लगा कि, तू खुश तो है ? तुम्हारे मुँहसे कथा सुनकर मुझे निहायत खुशी पैदा होती है. यह सुन मधुमालती-
नववीं पुतली ९- बोली-सुन राजा भोज ! यहां बैठकर, मैं एक दिनकी कथा राजा बीर विक्रमादित्यकी कहती हूं. एक दिन राजाने होम करनेका आरंभ किया. जहांतक देशके ब्रा- ह्मण थे, उन्होंको न्योता भेज बुलाया और जितने उसके देशके राजा और साहुकार थे वेभी हाजिर ५
( ६६ ) सिंहासनबत्तीसी.
हुए, भाट, भिकारी, सुनकर सब धाय धाय आए और, देश देशके राजा अपने सब लोगोंको ले ले आये, और जितने देवता थे वेभी सबके सब आये. राजा अपने आसनपर बैठा, यज्ञ होने लगी, कि, एक बूढा ब्राह्मण उस समय आया. राजा अपने यज्ञके मंत्र पढ़ता था. ब्राह्मणको दूरसे देखके मनमेही दंडवत् कि, उस पंडितको आगमविद्यासे मालूम होगया इसवास्ते हाथ बढ़ा- कर राजाको आसीस दी कि, चिरंजीव हो. जब राजाने मंत्रसे फुर्सत पाई तब उस ब्राह्मणसे कहा कि-महाराज ! आपने बहुत मंद काम किया कि, बिना प्रणाम मुझे आशीर्वाद दिया “ जबतक पांव न लागे कोई । वह आशीष पापसम होई ” तब ब्राह्मणने कहा-राजा ! जब तूने अपने मनमें दंडवत् की तभी मैंने आशीष दी. यह बात सुन राजाने लाख रुपये ब्राह्मणको दिये, तब ब्राह्मण हँसकर कहने लगा कि-महाराज ! इतने रुपयोंमें मेरा निर्वाह न होवेगा. ऐसा कुछ विचार कर दीजिये कि, जिसमें मेरा काम हो. तब राजाने पांच लाख रुपये उसे दिये. वह लेकर अपने घरको गया और जो जो ब्राह्मण उस यज्ञमें थे उनकोभी बहुत कुछ दिया. इसवास्ते राजा भोज ? मैंने तेरे आगे यह बात कही कि तू सिंहासनपर बैठनेके योग्य नहीं. सिंहकी बराबरी सियार नहीं कर सकता और हंसकी बराबरी कौवेसे नहीं होसक्ती
दशवीं पुतली १०. ( ६७ )
दशवीं पुतली १०. ( ६७ ) और बंदरके गलेमें मोतीकी माला नहीं शोभती और गधे- पर पाखर नहीं फबती, इसवास्ते मेरा कहा तू मान और इस ख्यालसे दर गुजर, नहीं तो नाहक किसीदिन मेरा प्राण जायगा. यह बात सुनकर राजा चुप रहा और वह दिनभी गुजर गया. जब रात हुई अंदेश कर सुबहको बदस्तूर सिंहा- सनके पास आया और चाहा कि, पाँव धरें, तब मेगावती- दशवीं पुतली- हँसकर बोली-हे राजा भोज ! पहले तुम मुझसे यह बात सुनलो. पीछे इस सिंहासनपर बैठो तब राजा बोला, तू कथा कह मेरा जीभी सुननेको चाहता है. राजा वहां आसन बिछाय बैठ गया. और पुतली कहने लगी-सुन राजा ! एकदिन वसंतऋतुमें टेसू फुला हुआथा. मोर मोराया हुआ कोयल कूक रहीथी. हवा चल रहीं थी. राजा वीर विक्रमादित्य अपने बागमें बैठा हुआ हिंडोल झूलताथा. इतनेमें एक वियोगी किसी देशसे भूला भटका आ निकला. राजाके पांवपर गिरपड़ा और कहने लगा कि,-स्वामी मैंने बहुत दुःख पाया और अब मैं आपकी शरण आया हूं, और उसकी सूरत बनगई थी कि तमाम लोहू बदनका सूख गया था और आँखसे कम
है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति
( ६८ ) सिंहासनबत्तीसी. सूझताथा, अन्नपाणी सब छोड दियाथा. किसी तरह धीरज नहीं धरता था. राजा ज्यों ज्यों समझाता था त्यों त्यों वह विरहसे व्याकुल हो हो रोता था. तब राजाने कहा-तू अपने जीको सँभाल और इतना दुःखी क्यो है ? और अब जो यहां आया है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति हुई है; और किसके गमसे तेरा यह शकल बन गई है ? तू किस देशसे आया है और क्या तेरा नाम है ? वह एक आह सर्द दिल पुर दर्दसे खैंचकर बोला-नगर कलंजर देश है मेरा. मैं मतिहीन ओर दुर्बुद्धि हूं. एक यतीने मेरे आगे यह बात कहीथी कि, एक खूब सूरत स्त्री एक जगह है, वैसी सुंदरी कोई जगहमें नहीं ! गोया कामदेवसे पैदा हुई है. बल्कि तीनों लोकोंमें वैसी न होगी. और लाखों राजा जी लगा उसके यहा आते हैं और जल जल जाते हैं पर, उसे नहीं पाते. राजाने पूछा-किसलिये ये जलते हैं. तब वह हकीकत कहने लगा कि-उसके बापने वहां एक आग भड़काई है, और एक कड़ाह भर घी चढ़ाकर रक्खा है. वह घी बडा खौलता है और यह उसकी शर्त है कि, जो उस कड़ाहमें स्नानकर जीता बच निकले उससे अपनी कन्याकी सादी करूंगा. यह बात उस योगीसे सुनकर मैंभी वहां गया था सो मैने अपनी आँखोंसे, वह तमाशा देख हैरान हुआ और वहां हजारों राजा देश देशके लाखों नौकर, चाकर, साथ लेकर
दसवीं पुतली १०. (६९)
दसवीं पुतली १०. (६९)
आते हैं और यह देख पछताकर जाते हैं. उनमेंसे जो इरादः कर्ता है सो उस कड़ाहमें गिरकर भुन जाता है. जब शक्ल उस राजकन्याकी नजर आई तब सुध बुध मैंने गँवाय अपनी हालत यह उसके इश्कमें बनाई है. यह बात उसके मुखसे सुनकर राजाने कहा-आज तुम यहांही रहो. कल तुम हम मिलकर वहा चलेंगे और उसे तुम्हे दिला देंगे. अपनी खातिर जमा रक्खो यह राजाकी बात सुन उसको समाधान हुआ. यह देख राजाने उसे स्नान करवा कुछ खिलाय अपनी सभामें बैठाकर यह हुकुम किया कि जितने संगीतविद्यावाले हैं सो सब तैयार हो हो आज यहां आकर हाजिर होवें और अपना अपना मुजरा बतलावें. राजाकी यह आज्ञा पायके सब आन हाजिर हुए. और अपना अपना गुण जाहिर करने लगे. राजाने उससे कहा कि-इनमेंसे जिस रंडीको तुम चाहो उस हम तुम्हें देंगे. तुम यहां बैठकर सुख भोग करो और उसका ख्याल दिलसे भुलदो. यह बात राजाकी सुनकर वह वियोगी बोला- महाराज ! सिंह अगर सात दिन उपवास करै तौभी घास न चरे. सिवाय उसके मुझे किसी औरकी इच्छा नहीं. इसी तरह तमाम रात बीत गई. जब सुबह हुवा तब राजाने स्नान पूजा कर उन बीरोंको याद किया. वे तुर्तही आन हाजिर हुआ. और अर्ज किया कि, महाराज ! हमको क्या हुकुम है ? हम
दशवीं पुतली १०. (७१)
दशवीं पुतली १०. (७१)
कूदतेही जलके राख हो गया बैतालने देखा और तुरंत अमृत ले आया और राजाके ऊपर डाला. अमृत पडतेही राजा 'राम राम' करके खड़ा हो गया. और जितने ब्राह्मण वहां थे सो सब जयजयकार करने लगे. वहां जो राजकन्या थी उसने आतेही फूलोंका हार राजाके गलेमें डाल दिया. वह जयमाला जब राजाको पहना दी तब सब लोग अचंभेमें रहगये कि, यह राजा कोई अजब तरहका आया है, जो जल गया फिर जीता उठा. यह काम मनुष्यका नहीं, यह कोई देवता है, जिसने ऐसा काम किया. राजाकी नियत पूरी है. तब उस कन्याके ब्याहकी तयारी हुई. राजाके मुल्कके जितने लोग वहां हाजिर थे वे सब खुश हुए. और मंदिरमेंभी रानियां मंगलाचार करने लगीं. इस तरह राजासे शादी कर दहेजमें " जवाहर जोड़े घोड़े, हाथी, पालकी और तमाम माल असबाब कई करोड़का दिया. यह देकर आधा राज्य संकल्प कर दिया. और दास दासीभी बहुतसे दिये. तब यह बिरही जो इसके साथ था सो देख देख बहुत खुश हुआ. जब ये सब दे ले चुके तब राजाने बिदा माँगी. उस राजाने सब असबाब और माल उस ब्याही हुई दुलहिन समेत साथ उसके कर रुखसत किया. और कहा- अपने देशको तुम जाओ. और हमपर दया माया राखियो. हमारा मुख इसलायक नहीं कि तुम्हारी कुछ तारीफ करें. जैसा साहस तुमने किया वैसा न हमने आँखोंसे देखा
[Page Header: ( ७२ ) सिंहासनबत्तीसी. ]
न कानोंसे सुना. इस कलियुगमें तुम कोई अवतार हो. एक जबानसे हमकहाँतलक तुम्हारी सिफत करसके ? एक शिर है हमारा हम तुझे क्या चढ़ावें? तुम्हारे पराक्रमपर करोड़ो शिर सदके हैं. जो नियत हमने कीथी सो तुमने पूरी कि; इसका भरोसा हमें न था कि यह इरादः हमारा पूरा होगा. राज्यकन्या हाथ जोड़कर राजासे कहने लगी-महाराज ! मेरा यह महा- दुःख आपने छुड़ाया. नहीं तो मेरे बाप ने ऐसा पाप किया था कि, आप तो नरक भोग करता और मैं सारी उमरभरही अन- ब्याही रहजाती. इतनी कथा कह पेमावती पुतली बोली की- सुन राजा भोज ? ऐसा पराक्रम करके उस कन्याको लाया और उस बिरहीको इसे देते बार न लाया. राजकन्या और सब माल असबाब बिरहीको दे दिया. और आप खाली हाथोंमे अपने मंदिरमें आ दाखिल हुआ और तू बिद्यार्थी है ऐसा साहस तुझसे न होसकेगा. यह सुनकर राजाने हैरान होकर शिर निचे कर लिया. वह साअतभी इसीतरह गुजरी. फिर दूसरे दिन राजा भोज जब सिंहासनके पास आया और चाहा कि बैठैं. तब पद्मावती --- ग्यारहवीं पुतली--- बोली-कि, हे राजा भोज ! पहले मुझसे कथा सुनले. पीछे
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७३ )
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७३ ) इस सिंहासनपर पांव दे. एक दिन राजा वीरविक्रमादित्य उज्जैन नाम नगरीको गया और अपने सब आदमियोंको बिदा कर आप वहां रातको रहा. सोता था, कि, उत्तर दिशाकी ओरसे एक रंडी हाय मार उठी और पुकार पुकार कहने लगी कि-कोई ऐसा है कि, मेरी आकर खबर ले. इस पापीसे मुझे बचावे और जीवनदान दे. दममें मरी मरी पुकार करती थी और दम चुप हो जाती थी. उसकी आवाज सुनकर राजा चौंक पड़ा. और ढाल तरवार हाथमें ले अँधेरी रातमें अकेला उठ चला. किसीको खबर न हुई. जब वनमें राजा पैठा वह सुंदरी फिर रो रो पुकार उठी, इतनेमें राजा वहां जा पहुँचा. और देखा कि वहां एक देव उस स्त्रीसे रति माँगता है और वह नहीं मानती. तब शिरके बाल पकड़ पकड़कर जमीनपर दे दे पटकता है तब राजाने कहा--अबे पापी ! तू इस स्त्रीको क्यों मारता है ? नरकसभी नहीं डरता ? राजाकी बात सुनकर फिर वह उसे मारने लगा. राजाने कहा- तू इसे छोड़दे नहीं तो अभी मैं तुझे मारताहूं. यह राजा विक्रमका वचन सुनकर वह सन्मुख होगया और गुस्सेसे घोरकर बोला--या तू भाग, नहीं तो मैं तुझे खाताहूं ? और तू कौन है ? जो यहां आकर बात करता है ? तब राजाने गजबमें आकर एक तलवार ऐसी मारी कि. शिर उसका
होतेही भाग गया, दैत्य जब भाग गया तब उस रंडीसे राजाने
( ७४ ) सिंहासनबत्तीसी.
धडसे जुदा होगया, रुड मुंडमे दो वीर निकले और राजाके दोनों हाथोंमें लिपट गये तब राजाने धीरज धर छल बलकर उनमेंसे एकको मारा, दूसरा रैन भर लडता रहा और भोर होतेही भाग गया, दैत्य जब भाग गया तब उस रंडीसे राजाने कहा-अब तू जल्दी मेरे साथ चल और कुछ जीमें अंदेसा मत कर, वह राक्षस मेरे डरसे भाग गया, फिर न आवेगा. तब वह सुंदरी बोली कि—सुनो भूपाल ! जो मैं सात द्वीप नौखंड पृथ्वीमें जहा भागकर छिप रहूंगी उससे बचने न पाऊँगी. वह आकर ले जायगा. उसके बिना मेरे जिंदगी न होगी. उसके पास एक मोहनी पुतली है वह उसके पेटमें रहती है. जहां मै छिपूंगी उसके बलसे वह ढूंढ निकालेगा. और उस पुतलीमें यह ताकत है कि, एक देव मरनेसे दूसरे चार देव बना सकती है, यह बात उसकी सुनकर राजा उसी बनमें छिपा रहा. रात होते वह देव आया उस औरतसे फिर ख्वाहिस करने लगा. जब उसने न माना और बाल शिरके पकड जमीनपर पकड़ने लगा तब वह धाड़ करने लगी. उसकी आवाज सुनतेही राजा निकट आया और उससे लड़नेको तैयार हुवा तब देवभी रंडीको छोड़ राजाके सामने होगया. चाहे कि, राजाको मारैं. इतनेमें राजाने ऐसा एक खांडा मारा कि, धडसे शिर अलग होगया. उसके धडसे वह मोहनी निकली और अमृत लेने
ग्यारहवीं पुतली ११. (७५)
ग्यारहवीं पुतली ११. (७५) चली, तब राजाने वीरोंको आज्ञा की कि वह कहीं जाने न पावे. तब वीरोंने दौड़कर उसकी चोटी पकड खैंच लिया. और राजाके सामने लाकर हाजिर किया. राजाने उससे पूछा कि तू चंपकबरनी, मृगनयनी, पिकवयनी, गजगामिनी, कटिकेहरी, चंद्रमुखी, नख- शिखसे ऐसी कि, हँसीसे तेरी फूल झडते हैं और सुगंधसे भौंरे मँडराते हैं. बतला कि, देवके पेटमें क्योंकर रहीथी ? तब वह बोली-सुन राजा ? पहले मैं शिवगण थी. पर एक आज्ञा शिवजीकी मैं चूक गई तिससे उन्होंने मुझे शाप दिया. और मैं मोहिनीरूप होगई. और इस दैत्यने महादेवकी बहुत तपस्या की, तब सदाशिवने मेरे तई उसको बकसीस दिया. फिर उस पापीने मुझे लेकर अपने पेटमें भर रक्खा. तबसे मैं मोहिनी कहलाई पर शिवकी आज्ञा थी कि इसकी सेवा कीजियो. और जो यह कहें सो मानियो. यों इसके बश होकर मैं रहतीहूं. मेरा माजरा जो था सो मैंने आपसे कहा. अब ये वीर मुझे काबू कर तुम्हारे पास लाये हैं. और आदमीको इतनी कुदरत नहीं थी बल्कि जो तुमभी बहुतेरा उपाय करते तोभी तुम्हारे हाथ न आती. अब राजा ! मैं तुम्हारे बशमें हूं और मैं मोहनी हूं इसवास्ते तेरे पास रहूंगी. ज्यो महादेवके पास पार्वती यह कहकर बचन दिया. एक वह मोहिनी और दूसरी वह रंडी, जिसे देवसे छुड़ाया था वे दोनों राजाके साथ हुईं. ये बातें कह पद्मावती पुतली
( ७६ ) सिंहासनबत्तीसी. बोली - सुन राजा भोज ! उस मोहनीसे राजा निक्रमादित्यने गांधवे विवाह किया. और जो कुछ आगे राजाके पराक्रम हैं सो मैं कहती हूं कान देकर सुन. वह रंडी दैत्यसे जो छुडायीथी उसे राजाने यों कहा-सुन सुंदरी ! मैं तुझे पूछताहूं कि, देवने तुझे कहां पाया था ? कौन द्वीप और कौन नगर तेरा ? और कौन बाप है तेरा ? नाम ले उसका, अपना सब ब्यौरा मुझसे कह और सब बातें तुर्त बताव ? अब देर मत कर सुनकर तेरी अवस्था जैसा तू कहेगी वैसाही मैं विचार करूंगा. वह नारी बोली-महाराज ! अब मेरी कथा सुनो, कि किस्मतका लिखा मिटता नहीं है और जो कुछ विधाताने कपालमें लिखा है वह इन्सानको भुगतना होता है. एक ब्रह्मपुरी है समुद्रके पास जिसे सिंहलद्वीप कहते हैं वहांके ब्राह्मणकी मैं बेटी हूं. एक दिन अपनी सखियोंके संग तालाबपर स्नान करनेको गई थी और वह तालाब ऐसा था कि, घने घने दरख्तोंसे सूर्य वहां नजर न आता था. वहां सखियोंके साथ मैं स्नान पूजा करके घरको आतीथी कि सामनेसे यह राक्षस नजर आया. और मुझे देखकर वहांही रति मांगने लगा ज्यों ज्यों मैं न मानती थी त्यों त्यों मुझे बहुत दुःख देता था. मैं अनब्याही अपना धर्म क्योंकर गँवाती ? कितनेक दिनोंसे मुझे सताताथा और नरकमें पडनेसे डरता न था. राजा ! अब तूने धर्म रखलिया, और
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७७ )
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७७ ) मेरे कुलकीभी लाज रक्खी तुझे संसारमें यश और कीर्ति होगी. जैसा तूने मुझपर उपकार किया, वैसाही मुझसे आशीष ले. हजार बरसतक जीता रह और किसीके वश न पड. दिन दिन तेरा सत और तेज बढते जायगा साहस तेरा ऐसा होवेगा कि तुझे कोई न जीते. इतनी आशीष जब वह दे चुकी तब उसे बेटी कह राजाने अपन पास तख्तपर बिठा लिया और मोहनीकोभी उठा बेतालको हुकुम किया कि, हमारे नगरको लेचलो. तब बेताल सबको लेकर उडे, पलक मारने महलमें ला दाखिल किया. राजाने आतेही दीवानको याद किया. वह मंत्री आकर हाजिर हुवा. राजाने कहा-कोई पंडित सुज्ञानी ब्राह्मण ढूंढकर ले आओ जलदी. प्रधानाने आज्ञा पाय नगर नगर ब्राह्मणोंको भेज एक ब्राह्मण सुंदर विद्वानको बुलाया. मार्कंडेय नाम वह ब्राह्मण जब आया, तब उसे ले मंत्रीने राज- सभामें लाया. राजाने उससे हाथ जोडकर कहा कि-महाराज ! एक ब्राह्मणकी कन्या हमारे यहां है, उससे हम तुमको दिया चाह- तेहैं. तुमभी यह बात कबूल करो. ब्राह्मण बोला-वह कन्या हमको दो और जगतमें तुम यश, धर्म और बडाई लो. राजाने यह बात सुनतेही ब्राह्मणको तिलक दे सादीके सामानका दान दहेज तैयार किया. फिर ब्राह्मण बुलाकर संकल्प कर उस कन्याका कन्यादान किया और उसको बहुत कुछ दिया.
इतनी बात कहकर पुतली कहने लगी कि-सुन राजा ! वीर
( ७८ ) सिंहासनबत्तीसी. इतनी बात कहकर पुतली कहने लगी कि-सुन राजा ! वीर विक्रमादित्यने सोच कुछ न किया और लाखों रुपयोंका दान दहेज दे एक पलमें ब्राह्मणके हवाले किया. तू इस लायक नहीं है इस सिंहासनपर बैठनेसे डर. ऐ राजा भोज ! तू गुण- ग्राहक है, दानी और साहसी नहीं, नाहक हिर्स कर्ता है. यह सुनकर राजा भोज मनमे पछताकर चुप हो रहगया. दूसरे दिन सुबह होतेही फिर सिंहासनके पास आया और बैठनेको तैयार हुवा. जब उसने पांव बढाया तब कीर्तिवती- बारहवीं पुतली- बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा वीरविक्रमा- दित्य अपनी मजलिसमें बैठकर कहने लगा कि, कलि- युगमें औरभी कहीं कोई दाता है ? ऐसी बात सुनतेही एक ब्राह्मण बोला कि-सुन राजा ! प्रजाके हितकारी तेरे बराबर साहसी और दानी कोई नहीं. पर एक बात मैं कहना चाहताहूं शर्मसे कह नहीं सक्ता. राजाने कहा कि-सत्य बात कहनेमें लाज काहेकी है? तुम हमारे आगे साफ कहो ? हम उस बातको बुरा न मानेंगे वह ब्राह्मण बोला-एक राजा समुद्रके किनारे रहता है और सदा धर्मकार्य कर्ता है. जब वह सबेरे स्नान किया चाहता है तब लाख रुपये दान देता है और जल पीता है यह तो मैंने एक उसके दानकी रीत कही
बारहवीं पुतली १२. (७९)
बारहवीं पुतली १२. (७९)
औरभी बहुत कुछ दान करता है. और ऐसा राजा धर्मात्मा उसके सिवाय दूसरा हमने कहीं नहीं देखा यह बात सुनकर राजाके जीमें इच्छा हुई कि, उस राजाको चलकर देखिये. यों अपने जीमें विचार कर बैतालोंको बुला तख्तपर सवार हो समुद्रके किनारे चला और जो उसके नगरके पास पहुँचा, सिंहासनसे उतर बैतालोंको कहा कि-अब तुम देशको जाओ और हम इस राजाकी सेवा करनेपर तैयार हुए. तुम वहांसे हमारी खबर लेते रहियो तब बैताल बोला-इसका विचार क्या है? राजाने कहा-तुम्हें इस बातसे क्या काम है? जो हम तुम्हें कहते हैं सो करो. यह बात सुनकर बैताल अपने नगरको आये और राजा पाँओ पाँओसे शहरमें दाखिल हुआ. नगरमें फिरता हुआ राजाके द्वारपर जाकर पहुँचा. और द्वारपालसे कहा-अपने स्वामीको समाचार दो कि, कोई विदेशी तुम्हारी सेवा करनेके लिये खड़ा है. इसकी बात डेवढीदारोंने सुनकर राजासे अर्ज की. महाराज सुनतेही हंसता हुआ आपही बाहर निकल आया. राजाको देखकर विक्रमाने जुहार किया. तब उसने पूछा कि- क्षेम कुशलसे हो? तब विक्रम बोला कि-आपके दयासे. फिर राजाने कहा, तुम किस देशसे आये हो? और तुम्हारा नाम क्या है? और तुम्हारा अर्थ क्या है? सो सब सुनाओ यह बोला,-सुनो महाराज ! मेरा नाम विक्रम है. राजा वीर विक्रमादित्यके
देशके मैं रहनेवाला हूं कुछ वैराग्य मेरे जीमें हुआ इससे मैं आपके दर्शनको आयाहूं, अब आपका दर्शन मैंने किया इससे सब मेरा सोच विचार गया. राजा बोला-तुझे हम क्या रोज करदें, और कितनेमें तुम्हारा निर्वाह होगा ? तब इसने कहा- चार हजार रुपयेमें मेरी गुजरान् होगी. यह सुनकर राजाने कहा-ऐसा क्या काम करते हो जो चार हजार रुपये रोजीना हम तुझे देवें ? फिर विक्रम बोला-जो काम हमसे कहोगे हम वह करेंगे. जिस राजाके पास मैं रहता हूं उसको गाढ़ी भीड़िमें काम आता हूं और इस तरहसे चार हजार रुपये लेकर राजा वहां रहने लगा. यह बात पुतलीने समझा राजा भोजसे कही. जब इसी तरहसे नौदस दिन गुजर गये तब राजा वीरविक्रमादित्यने अपने मनमें विचारा कि, जो लाख रुपये रोज दान करता है उसका नित्यनेम क्या है, इसे मालूम किया चाहिए. किस देवताका इसे बल है ? इसी सोचमें रहने लगा. एक दिन क्या देखना है कि, दोपहर रातके समय राजा अकेला बनको जाता है यह देखतेही उसके पीछे होलिया. आगे आगे राजा और पीछे पीछे विक्रमादित्य इस तरहसे शहरके बाहर निकल एक बनमें पहुँचे. वहां जाकर देखा तो एक देवीको मंदिर है. और उस मंदिरके बाहर कहाड चढ़ा है और उसमें ब्रह्मकी आगसे घी औटता है वह राजा तालाबमें,
बारहवीं पुतली १२. (८१)
बारहवीं पुतली १२. (८१)
स्नान करके देवीका दर्शन कर उस कड़ाहमें कूद पड़ा और पडतेही भून गया. वहां चौसठ योगिनियां आनेके राजाके उस। तलेहुए बदनको नोचकर खागईं. इतनेमें कंकालिन अमृत ले आई और उसके हाड़पंजरपर छिड़का तब वह राजा 'राम- राम, करके उठकर खडा हुआ. तब देवीने मंदिरमेंसे लाख रुपये दिये और वह लेकर अपने घरको आया. तब योगिनियाभी अपने धामको गईं. यह तमाशा देखकर राजा विक्रमादित्यभी, उसी कड़ाहमें कूद पड़ा और उसी तरह जल गया. फिर तुर्त योगिनियां दौड़ीं और उसकोभी खागईं और उसी तरह कंकालिनने अमृत ला उसपरभी छिड़क जिला दिया. मंदिर- मेंसे उसेभी लाख रुपये देवीने दिये रुपये ले दुबार फिर वह कड़ाहमें गिरा. योगिनिया फिर जला भूना गोस्त बदनका नोचकर खागईं और कंकालिनने अमृत छिड़क जिलादिया. फिर देवीने लाख रुपये दिये. गरज वह इसी तौर सातबेर गिरा. और लाख लाख रुपये हर बेर पाया जब आठवीं दफह इरादः गिरनेका किया तब देवीने आकर उसका कर पकड़ा और कहा कि-मांग जो तुझे चाहिे ? तब राजा विक्रम हाथ जोड़कर बोला कि-मैं मांगू, जो मांगा पाऊं देवीने कहा-जो तेरी इच्छांमें आवे सो तू मांगले. मैं तुझे दूंगी. राजाने कहा- देवी ! जिस थैलीमेंसे तुमने रुपये दिये हैं, वह थैली मुझे ६
( ८२ ) सिंहासनबत्तीसी. कृपा कर दीजिये. यह सुनतेही उसने वह थैली दी वह खुश हो उसी राजाके स्थानपर गया और दूसरे दिन रातको फिर वह राजा बनमें गया और वहां उसने देखा कि न देवीका मंदिर है और न कड़ाह है. स्थान भंग पड़ा है. यह दशा वहांकी देख सोचमें डूब गया. फिर जो होश आया तो हाय मारके रोने लगा, आखिरको लाचार हो उलटा फिर अपने मंदिरको आया उदास होकर सोरहा भोर हुवा जो सभाके लोग आया और राजाको देखा कि, विह्वल पड़ा है. न हँसता है, न किसीसे बोलता है, बल्कि जो कोई राज्यकी बात करता है, यह सुन- कर मुँह फेर लेता है. यह हालत राजाकी देख दीवानने विनत किया कि-महाराज ! आपका मन मलीन होनेसे सारी सभा उदास होरही है. राजाने यह जवाब दिया कि- आज तुम बैठकर दरबारका काम करो; मेरा शरीर माँदा है. तब प्रधान बैठ राजकाजकी बातें करने लगा. और जो कोई आताथा सो अपने मनमें जो चाहताथा सोई विचारताथा. कोई कहता था कि, राजा बीमार हो गया है, कोई कहता कि, राजाको कोई मोह गया है. और कोई कहताथा कि, राजा है नहीं. पर जो इसकी अवस्था थी वो किसीको मालूम न थी, इतनेमें अपने समयपर राजा बीर विक्रमादित्यभी गया और पूंछा कि-तुम्हारे मनमें क्या दुःख है ? क्योंकि मैंने