सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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“सौन्दर्य लहरी” का “सौन्दर्य-माधुर्य”
“सौन्दर्य लहरी” श्री भगवत्पाद आद्य शङ्कराचार्य द्वारा रचित एक प्रासादिक स्तोत्र है जिसके पाठ से अनेक साधकों का महान कल्याण हुआ है। श्री जगज्जननी आदिशक्ति महात्रिपुर सुन्दरी के प्रकाश से यह सकल चर अचर प्रकाशित है। माँ की इस स्तुति से साधक शिशुओं के हृदय में अपार शान्ति एवं अपूर्व तेज और ओज का दिव्य समावेश होता है—यह अनेकों का अनुभव है। उसी महान मंगलमय स्तोत्र की श्रीमत्स्वामीजी श्री विष्णुतीर्थजी महाराज ने योगपरक अपूर्व व्याख्या की है जो ज्ञान-विज्ञान एवं व्यक्तिगत यौगिक अनुभूतियों से समवेत होने के कारण योगसाधकों के लिए अनमोल बन गयी है। वेद, उपनिषद, गीता, सप्तशति आदि ग्रंथों के प्रचुर उद्धरण एवं प्रमाण से ग्रंथ का एक-एक पृष्ठ परिपुष्ट है। पूर्वानुक्रमणिका के कारण यह अत्यन्त गहन एवं रहस्यपूर्ण विषय बहुत ही सरलता से संग्राह्य हो गया है। क्लिष्ट शब्दों के अर्थ, भावार्थ एवं संक्षिप्त टिप्पणी तथा विषय-विवेचन के विवरण से संपूर्ण ग्रंथ अपने आन्तरिक सौन्दर्य-माधुर्य के साथ आस्वाद्य हो गया है। लेखक ‘अनुभवी’ व्यक्ति मालूम होते हैं, साधना के गुह्य पथ का आपको अनुभव है, वे उसके रहस्य और मर्म को भली भांति जानते-समझते हैं और समझाने की भाषा इतनी प्राञ्जल, मधुर एवं मोहक है
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Author
प्राक्-कथन
सनातन वैदिक धर्म में ब्रह्मोपासना की विधि के निर्गुण सगुण भेद से दो क्रम कहे जा सकते हैं । निर्गुण ब्रह्म सत् असत् से परे अक्षर अबिनाशी अनिर्देश्य अचिन्त्य अव्यक्त स्वरूप है । वह सर्व व्यापक होने पर भी कूटस्थ स्पन्दरहित अचल है, इन्द्रियों का वह विषय नहीं, मन की उस तक गति नहीं और बुद्धि की विवेक शक्ति वहां तक पहुंचते २ थक जाती है । एक मात्र निर्विकल्पावस्था में ही उसकी उपलब्धि होना संभव है । कहा है ‘एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्’ (पञ्चशिखाचार्य) । अव्यक्त स्वरूपा प्रकृति से भी अतीत वह परम अव्यक्त है,
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
गीता (८, २०)
चेतन आत्मा की भी पराकाष्ठा अर्थात् अन्तिम सीमा होने के कारण उसको परमात्मा कहते हैं । उसी को सर्व व्यापक होने से महा विष्णु, सर्व कल्याणमय होने से पर शिव, सर्वशक्तिमान होने से शक्ति का ईश्वर, निरतिशय सर्वज्ञ होने से प्रज्ञान घन, परं सत्य होने से सत्यनारायण, सुख राशी होने से आनन्दकंद, सत्तात्म होने से सद्ब्रह्म, चेतन होने से चिद्ब्रह्म या चिन्मात्र चिति शक्ति कहते हैं । उसकी परम अव्यक्तता के कारण ही उसे बौद्धों ने शून्य निर्वाण पद कहा है ।
२
श्री मद्भागवत् में भगवान वासुदेव का परं सूक्ष्मरूप समझने के लिये उसकी शून्यवत् कल्पना करने का निर्देश किया गया है, यथा:—
यत्तद्ब्रह्म परं सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितं ।
भगवान् वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वताः ॥(९, ९, ३०)
इंद्रियों एवं मन के संचालक, बुद्धि के प्रज्ञात्म प्रकाश, प्राणों के प्राण और प्रकाश को भी प्रकाश देने वाले ऐसे परम तत्त्व का ध्यान कैसे किया जा सकता है ? सामान्य जन की स्थूल चंचल बुद्धि वहां काम नहीं करती, इसलिये उसके व्यक्त होने वाले गुणों का ही ध्यानार्चन करना पडता है । वह ऐसा सूर्य है, जिसको दृष्टि नहीं देख सकती, उसके तेज का ही ध्यान संभव होने के कारण, उस तेज के विभिन्न स्तरों पर चमकने वाली उसकी विभूतियों द्वारा ही उसका चिन्तन किया जाता है, यह ही सगुण उपासना कहलाती है । उससे उद्भूत तेजोमयी भ्राजमान शक्ति की व्यक्तता में ही उस सत्य को देखा जा सकता है । उसकी श्री को कोई प्रकृति, कोई माया, कोई उमा, कोई लक्ष्मी, कोई शक्ति, कोई प्रकृति कहते हैं । वह वैष्णवी माया चेतन प्राणियों की चेतना है, विश्व की कान्तिमयी श्री है, जगत् की धात्री और प्रतिष्ठा है । बुद्धि वह है तो निद्रा भी वह ही है, तृषा है तो तृष्टि भी वह ही है । प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, दया के सात्विक भाव उसी की मंद मुस्कान से विभूषित होने के कारण सदा विश्व का कल्याण करने के निमित्त अनुग्रह की वर्षा किया करते हैं ।
इसलिये सगुण उपासना में शक्ति रूप से ब्रह्म की उपासना करने की प्रधानता सनातन धर्म में विशेष रूप से पाई जाती है । नास्तिक
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जड भौतिक-वादी जन तो सब शक्ति की ही उपासना करते हैं, परंतु उनकी उपासना अचेतनता के स्तर पर है, उसमें देव भाव न होने के कारण वह प्राणहीन उपासना है । सनातन धर्मावलंबी भक्तगण चिति शक्ति के उपासक होते हैं और उनकी वह उपासना परम ब्रह्मतत्त्व की ही उपासना है । वैष्णवों के वृन्दावन की श्री राधा रानी, राम के मन्दिरों में सीता माता, शैवों की उपासना में उमा और शाक्तों की मां दुर्गा, काली, शक्ति उपासना की प्रथम प्रधानता के द्योतक हैं । शंकर भगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी में जगज्जननी उमा पार्वती की प्रार्थना के मिस सनातन धर्म के अतिरहस्यमय गूढ और प्रभाव शाली शक्ति उपासना के एक उस साधन क्रम की विशद व्याख्या की है, जो श्रीविद्या के नाम से प्रसिद्ध है । श्रीविद्या की उपासना पद्धति तंत्रों की आधारभूत पद्धति है, जो योगियों में श्री रूपा कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिये गुरु परंपरा से गुरु की शक्तिपात दीक्षा द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है । यह उपासना वैदिक काल से चली आ रही है, इस बात का अकाट्य प्रमाण यह है कि तैत्तिरीय अरण्यक की एक आख्यायिका में देखने को मिलता है कि पृश्नी नाम के ऋषियों ने श्रीचक्र के अर्चन द्वारा कुण्डलिनी शक्ति का मूलाधार से सहस्रार में उत्थान करके योग सिद्धि प्राप्त की थी, और भास्करराय भी कादि विद्या की प्रधानता सिद्ध करने के प्रमाण में ‘चत्वार ईं बिभर्ति क्षेमयन्तः’ इस शाङ्खायन श्रुति को उद्धृत करके अपने वरिवस्या रहस्य नामक ग्रंथ में कहते हैं कि इस ऋचा में चार ‘ईं’ से कादि पंचदशी मंत्र की ओर संकेत है । त्रिपुरा तापनी उपनिषद् में कादि पंचदशी का उद्धार गायत्री मंत्र, ‘जातवेदसे सुनवाम’ और
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‘त्र्यंबकंयजामहे’ इत्यादि वेदमंत्रों के आधार पर किया गया हैं, अपिच त्रिपुरोपनिषद् में दोनों कादि हादि विद्याओं का स्पष्ट उल्लेख है। श्रीमच्छंकराचार्य को श्रीविद्या की दीक्षा योगीन्द्र श्रीमद्गोविंद पादाचार्य से मिली थी, श्री श्री गोविंदपादाचार्य को इस विद्या की दीक्षा श्री श्री गौडपादाचार्य से मिली थी। श्री श्री गोडपादाचार्य का लिखित सुभगोदय नामक ग्रंथ जो श्रीविद्या का ग्रंथ है, इस बात की पुष्टि करता है। श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने सुभगोदय की छाया पर ही सौंदर्य लहरी के प्रथम ४१ श्लोकों की रचना की है।
प्रत्येक उपासना के बहिर और अन्तरंग दो भेद होते हैं। बहिर्पूजा की उपयोगिता उस समय तक ही रहती है जब तक कुण्डलिनी शक्ति का जागरण नहीं होता, तत्पश्चात् अन्तःसाधना का आरंभ होता है। इस ही नियम के अनुसार श्रीविद्या की बहिरुपासना श्रीचक्र पर की जाती है और अन्तरुपासना के लिये देह में ही श्रीचक्र की भावना करने का विधान है। देखें भावनोपनिषद् परिशिष्ट नं. (३)। देह में सुषुम्ना पथ द्वारा कुण्डलिनी का उसके जागरणोपरान्त आरोह अवरोह होने लगता है। श्री चक्र पर अन्तर्भावना युक्त बहिरुपासना करने से शक्ति के जागरण में सहायता मिलती है। श्रीचक्र का अर्चन पूजन सब उपासना का कर्मकाण्ड रुपी स्थूल अंग है और शक्ति जागरण के पश्चात षट् चक्र वेध की क्रियाओं का योग परक साधन धारणा ध्यान समाधि के अंतरंग साधनों युक्त उसका सूक्ष्म अंग है। स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण तक पहुंचा जाता है।
यद्यपि सौन्दर्य लहरी एक तांत्रिक ग्रंथ है, तो भी वह श्रीमद्-भगवत्पाद शंकराचार्य का विरचित है इस बात पर पराचीन और
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अर्वाचीन सब विद्वानों का एक मत होने से, यह विषय अधिक विवादास्पद नहीं है; श्रीमच्छङ्कर भगवत्पाद के लिखित अनेक देवी देवताओं के स्तोत्र प्रसिद्ध हैं, परन्तु विद्वत्समाज का जितना ध्यान सौन्दर्य लहरी ने आकर्षित किया है और अब भी वह जितने मान से देखी जाती है, उतना दूसरा स्तोत्र नहीं है। सौन्दर्य लहरी पर श्री अच्युतानन्द, पंडित अनन्त कृष्ण शास्त्री और लक्ष्मीधर जैसे विद्वानों की टीकाएं संस्कृत साहित्य में बडे आदर से देखी जाती हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रमुख न्यायाधीश सर जोन् वुड्रफ महोदय ने भी, जो तांत्रिक संसार में आर्थर अवैलन के नाम से प्रसिद्ध हैं और तांत्रिक साहित्य का अन्वेषण, अध्ययन और प्रकाशन करके पाश्चात्य जगत् का ध्यान इस ओर खेंचने का श्रेय जिनको प्राप्त है, सौंदर्य लहरी के पूर्व भाग आनन्द लहरी पर एक संक्षिप्त अंग्रेजी टीका लिखी है। उक्त टीका के प्राक् कथन (preface) में जो मत प्रकट किया गया है, वह हम पाठकों की जानकारी के लिये यहां नीचे देते हैं। तदनुसार बंगाल के प्रसन्नकुमार शास्त्री की ई. सन १९०८ में प्रकाशित श्री शङ्कराचार्य ग्रंथावलि में सौन्दर्य लहरी को भी स्थान दिया गया है। और वहां पाठकों का लक्ष्य महामहोपाध्याय सतीशचन्द्र विद्याभूषण के कलकत्ता रिव्यू के १९१५ जूलाई मास के अंक में प्रकाशित एक लेख की ओर भी कराया गया है। आप का कहना है कि सौन्दर्य लहरी की प्राचीनता तो इस बात से काफ़ी निश्चय के साथ प्रमाणित है कि इस पर स्तोत्र साहित्य में सब से अधिक टीकायें मिलती हैं, यद्यपि यह बात उसके भगवत्पाद का लेख होने का तो प्रमाण नहीं कही जा सकती; परन्तु सारे भारतवर्ष में
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जो लगभग ३५ टीकायें इस स्तोत्र पर लिखी जा चुकी हैं, इस स्तोत्र के शंकर भगवत्पाद का विरचित होने का बहुत बडा प्रमाण हैं, क्योंकि प्रायः सब ही टीकाकारों का इस बात पर एक मत है, कि यह स्तोत्र भगवत्पाद श्री शंकराचार्य का ही विरचित है । इन टीकाकारों में से जो प्राचीन तम हैं असंदिग्ध रूप से सौन्दर्य लहरी को भगवत्पाद की कृति ही सिद्ध करते हैं । कैवल्य शर्मा, जो उडीसा के नरेश प्रतापरुद्रदेव के राज्यकाल १५०४ से १५३२ तक में हुए कहे जाते हैं अपनी टीका के प्रारम्भ में स्पष्ट लिखते हैं:—भगवान् परमकारुणिकः शंकरावतारः श्री शंकराचार्यः शिवशक्त्योरभेदं ज्ञापयितुं सकलप्रपंचसाक्षिण्याः ब्रह्माविनाभूतं चिच्छक्तेः स्तुतिद्वारा इत्यादि । कैवल्य शर्मा और उनके समकालीन लक्ष्मीधर एक मनोरमा संज्ञक ग्रंथ का उल्लेख करते हैं जो श्री शिवादि गुरुपारम्पर्य्य सत्सम्प्रदायानुसारि मुनीन्द्र श्री सच्चिदानन्दनाथ के शिष्य सहजानन्दनाथ विरचित है और श्री सच्चिदानन्दनाथ स्वामी का नाम शृंगेरीमठ के आचार्यों की नामावलि में मिलता है ( Vide Descriptive catalogue of Madras Mss., vol. XIX P. 7606 ) और एक ऐसे व्यक्ति की टीका जो आदि शंकराचार्य के संप्रदाय से सम्बन्ध रखता है, सौन्दर्य लहरी के भगवत्पाद की कृति होने का अच्छा प्रमाण है । लक्ष्मीधर ने सुभगोदय व्याख्यान नाम के श्री शंकराचार्य विरचित एक ग्रंथ का भी उल्लेख किया है, जो श्री गौडपादाचार्य विरचित सुभगोदय की टीका मालूम होती है । इस से यह स्पष्ट है कि शिवागम का तांत्रिक साहित्य श्री गौडपादाचार्य के काल में भी बहुत प्रचलित था, और श्री शंकराचार्य को गुरुपरम्परागत संप्रदायानुसार शक्तिदीक्षा
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मिली थी। सुभगोदय का अर्थ 'सुभगा का उदय' अर्थात् 'कुण्डलिनी शक्ति का जागरण' किया जा सकता है। श्री शंकराचार्य विरचित प्रपंचसार संग्रह तंत्र भी इस बात की पुष्टि करता है, जिस पर भगवत्पाद के शिष्य श्री पद्मपादाचार्य ने टीका लिखी है। शार्दा-तिलक के टीकाकार राघवभट्ट ने अपनी ई. १४९३ में लिखित टीका में उसका उल्लेख किया है। इन प्रमाणों के होते हुए सब शंकाएं निरर्थक हैं। वेदोंके भाष्यकार सायनाचार्य ने भी प्रपंचसार संग्रह पर एक टीका लिखी है, और वेदान्त कल्पतरु अध्याय १ पाद ३ अधिकरण ८ सूत्र ३३ में भी प्रपंचसार संग्रह का उल्लेख मिलता है और वहां वह तंत्र शारीरकभाष्यकार श्री शंकर भगवत्पाद का लिखा हुआ बताया जाता है।
हमारी तो इन ऐतिहासिक समस्याओं से अधिक दिलचस्पी नहीं है; इसलिये इतना ही लिखना पर्याप्त समझते हैं, कि शारीरकमीमांसाभाष्य के पढने से यह बात स्पष्ट है कि शंकर भगवत्पाद ने वेद वेदान्तानुकूल स्मृत्युक्त सब योग और उपासनाओं को अंगीकार किया है और वेदवेदान्त विरुद्ध सिद्धान्तों का परिहार किया है, इसलिये तांत्रिक योग पद्धतियों और उपासनाओं को भी अपनाने में उनको आपत्ति नहीं हो सकती थी, जहां तक कि वे वेदवेदान्त का समर्थन करने वाली हैं, और प्रपंचसार संग्रह एवं सौंदर्य लहरी की सैद्धांतिक भूमिका श्रौत मार्ग के विपरीत नहीं है अपितु श्रौत सिद्धान्तों का समर्थन करती है। और जबकि सब ही पराचीन और अर्वाचीन विद्वानों का बहुमत इस बात के पक्ष में है कि सौंदर्य लहरी भगवत्पाद की ही रचना है तो उसके विरुद्ध शंका उठाकर वादविवाद में पडना वांछनीय नहीं।
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इस संबंध में एक शंका बहुदा यह भी उठाई जाती है कि शंकर भगवत्पाद विवर्तवाद के प्रवर्तक थे वे परिणामवाद के कदापि समर्थक नहीं बन सकते थे, परन्तु सौंदर्य लहरी में स्पष्ट रूप से परिणामवाद का समर्थन किया गया है, देखें श्लोक १ और ३५ । इस शंका का उत्तर स्वयं भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (२, १, १४) के भाष्य की अंतिम पंक्ति में इन शब्दों में देते हैं:—'अप्रत्याख्यायैव कार्य-प्रपंचं परिणाम प्रक्रियां चाश्रयति सगुणेषु उपासनेषूपयोक्ष्यते इति ।' अर्थात् कार्य प्रपंच को सिद्ध करने के लिये नही वरन् सगुण उपासना के उपयोग के लिये परिणामवाद का सूत्रकार ने आश्रय लिया है । भगवत्पाद ने ब्रह्म सूत्रों में सर्वत्र सत्कारणवाद को सिद्ध करते समय जगत् को सत्शक्ति का परिणाम ही सिद्ध किया है । आगे चलकर ब्रह्म सूत्र (२,१,२४) के भाष्य की अन्तिम पंक्ति में भी वे इन शब्दों में उपसंहार करते हैं:—'तस्मादेकस्यापि ब्रह्मणो विचित्रशक्तियोगात्क्षीरादिवत् विचित्र परिणाम उपपद्यते' ।
श्रीविद्या का प्रचार मद्रास प्रान्त में अधिक है, उत्तर भारत में उसका सर्वथा अभाव-सा प्रतीत होता है, यहां तक कि उत्तर भारत का विद्वत्समाज इस विद्या से अनभिज्ञ दिख पडता है । इसलिये हमने सौंदर्य लहरी पर यह व्याख्या हिंदी जानने वालों के लाभार्थ हिंदी में लिखने का साहस किया है । यद्यपि यह विषय प्रधानतया तान्त्रिक है, परन्तु हमने अपने विचारों की पुष्टि में उपनिषद् गीता जैसे सर्वमान्य शास्त्रों का ही उद्धरण इस दृष्टि से किया है कि तंत्रों का साहित्य वाममार्ग की कुत्सित प्रथाओं के कारण सामान्य जनता में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता । परन्तु हम साथ ही पाठकों को यह भी बता-
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देना उचित समझते हैं कि तंत्रोक्त समयाचार शुद्ध सात्विक उपासना का मार्ग है और श्रीमच्छंकर भगवत्पाद की लेखनी से निकला हुआ यह स्तोत्र इस बात का सर्वोपरि प्रमाण है । श्रीभगवत्पाद का लिखित एक प्रपंचसार तंत्र भी मिलता है जिसे सैट् अवैलन महोदय ने अपनी तंत्रागम ग्रंथावलि में प्रकाशित किया है ।
श्रीविद्या पर परशुराम कल्पसूत्र, और उसके आधार पर संग्रहीत नित्योत्सव एवं भास्करराय का समस्त साहित्य पढने योग्य है । कैवल्य शर्मा ने सौंदर्य लहरी पर भाष्य लिखा है । संस्कृत जानने वाले विद्वानों को श्रीविद्या के रहस्यों को जानने के लिये उपरोक्त ग्रंथ अवश्य पढने चाहिये । श्रीविद्या के जिज्ञासुओं को त्रिपुरातापिनी, देवी, त्रिपुरा और भावनोपनिषदें भी देखने योग्य हैं । त्रिपुरा और भावनोपनिषदों को हम परिशिष्ट में दे रहे हैं ।
अंग्रेजी में सौंदर्य लहरी पर कई ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, ३ ग्रंथ हमारे देखने में आये हैं । दि थियोसोफिकल पब्लिशिंग हाउस, अडयर का प्रकाशित और पंडित स० सुब्रह्मण्य शास्त्री (F. T. S.) और ट. र. श्रीनिवास अयंगार (B A. L. T.) की लिखित अंग्रेजी प्रति हमारे सामने है, जिसको पढकर हमें यह ग्रंथ हिंदी में लिखने की प्रेरणा मिली । हम उक्त दोनों सज्जनों के अनुगृहीत हैं क्योंकि उनके ग्रंथ से अनेक विषयों पर हमें पर्याप्त सहायता मिली है ।
साथ ही मैं श्री स्वामी शंकरानन्द भारतीजी, जिनको साहित्य-संसार महामहोपाध्याय वेदान्त वागीश श्री श्रीधर शास्त्री पाठक प्रोफेसर डेक्कन कालेज पूना के नाम से परिचित हैं, डॉ. दुर्गाशंकर
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नागरजी (कल्पवृक्ष के संस्थापक उज्जयनी, और श्री विनायकराव बापू वैशंपायनजी देवास का भी अनुग्रह प्रकट करना जरूरी समझता हूं जिनने अपना बहुमूल्य समय प्रदान करके ग्रंथ पर अपनी सहानुभूति एवं संम्मति प्रदान की है, जो ग्रंथ के पूर्व भाग में प्रकाशित की जाती हैं ।
परिशिष्ट मे नासदासीय ऋग्वेदीय सूक्त भी हिंदी अनुवाद सहित दिया जा रहा है ।
देवास-मध्यभारत }
सं० २००५ }
विष्णुतीर्थ
सांकेतिक चिन्ह
| संकेत | विवरण / ग्रन्थ |
|---|---|
| गी, गीता | श्री मद्भगवत् गीता |
| यो० द० | योगदर्शन |
| बृ०, बृह० | बृहदारण्यक उपनिषद् |
| क, कठ० | कठोपनिषद् |
| प्र०, प्रश्न० | प्रश्नोपनिषद् |
| दु० स० | दुर्गा सप्तशती |
| मु० | मुण्डकोपनिषद् |
| छा० | छान्दोग्य उपनिषद् |
| ऐत० | ऐतरेय उपनिषद् |
| श्वे० | श्वेताश्वतर उपनिषद् |
| ब्र०, ब्र० सू० | ब्रह्म सूत्र |
| ऐ० आ० | ऐत्तरीय अरण्यक |
| यो० शि० | योग शिखोपनिषद् |
| शा० ति० | शारदा तिलक |
| ऋक् | ऋग्वेद |
| तै० | तैत्तिरीयोपनिषद् |
| ना० | नारायणोपनिषद् |
| ल० स० | ललिता सहस्रनाम |
| सौ० ल० | सौन्दर्य लहरी |
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विषय सूची
प्रस्तावना
आनन्द लहरी
उपोद्घात पृष्ठ १–२८, शिवशक्ति पृष्ठ २, प्रयोजन पृ. ४, दीक्षा पृ. ७, शक्तिपात पृ. ७, ५ प्रकार का भ्रम और ३ प्रकार का मल पृ. ९, तत्त्वशुद्धि पृ. १०, ज्ञान के पूर्व योग और उपासना की आवश्यकता पृ. १४, उपासना का योग से सम्बन्ध पृ. २४, शिवशक्ति उपासना पृ २५, श्लो. १ पृ. २९–६० संक्षिप्त टिप्पणी पृ. २९, ब्रह्मकारणवाद पृ. ३०, ऋग्वेद में ब्रह्म का स्वरूप और सृष्टिक्रम पृ. ३१, शैवशक्ति दर्शनों के अनुसार सृष्टिक्रम और स्पन्दवाद पृ. ३४, बीजमंत्र द्वारा ब्रह्मोपासना पृ. ४२ स्पन्द ही शक्ति है पृ. ४४, प्राणतत्त्व और अध्यात्म तथा अधिभूत भाव पृ. ४७, हिरण्यगर्भ, प्राणतत्त्व और हिरण्यगर्भ पृ. ४९ अकृतपुण्य भजन नहीं कर सकते पृ. ५१, दीक्षा का शक्ति से सम्बन्ध पृ. ५२ श्री विद्या पृ. ५३, श्री विद्या का आधार वेद वेदान्त पृ. ५४, श्री चक्र पृ. ६०, श्लो. २ पृ. ६०, अणुकारणवाद पृ. ६१, शेष और कुण्डलिनी पृ. ६३, श्लो. ३ पृ. ६५, विद्या और अविद्या पृ. ६६, मुररिपुवराहस्य दंष्ट्रा पृ. ७३, श्लो. ४ पृ. ७५ वर अभिनय पृ. ७५, भय का मूल कारण पृ. ७७, बाला मंत्र पृ. ७७ श्लो. ५ पृ. ७८, साध्यसिद्ध विद्या पृ. ८३, श्लो. ६ पृ. ८४, काम दहन आख्यान पृ. ८५, श्लो. ७ पृ. ८७, माया का बन्धन पृ. ८९, श्लो. ८ पृ. ९२, श्लो. ९ पृ. ९५, षट्चक्र वेध अर्थात् अन्वेय भूमिका पृ. ९५, श्लो. १० पृ. १०१, श्री चक्र पृ. ९५, अवसरण अर्थात् अन्वय भूमिका पृ. १०१, श्लो. ११ पृ. १०५,
श्री चक्र निर्माण की विधि पृ. १०७, श्लो. १२ पृ. १११, भगवती का सौन्दर्य कल्पनातीत है पृ. ११०, श्लो १३ पृ. ११३. काय सम्पत् सिद्धि, श्लो. १४ पृ. ११५, तत्त्वों की किरणें ११५, किरणों का तत्त्वों से सम्बन्ध ११७, किरणों का वर्णमाला से सम्बन्ध ११८, किरणों की अधिष्ठातृ शक्तियां १२१, श्लो. १५ पृ. १२५, वाक् सिद्धि, श्लो. १६ पृ. १२७, श्लो. १७ पृ. १२९, श्लो. १८ पृ. १३०, मधुमती भूमिका की सिद्धि श्लो १९ पृ. १३२, काम कला का ध्यान, श्लो. २० शक्तिपात करने की सिद्धि, पृ. १३५, श्लो. २१ पृ. १३७, चक्रों और सहस्रार का सविस्तार वर्णन, पृ. १३९, चन्द्र सूर्य पृ. १४४ तत्त्वों और चक्रों के अधिदेवों की कलाओं के नाम १४७ आक्त के ऊपर ९ स्तर १४९, श्लो. २२ पृ. १५३, अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान का उदय १५३, श्लो. २३ अर्ध-नारीश्वर सदाख्यतत्त्व का ध्यान, पृ. १५६, श्लो. २४ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव, पृ. १५७, श्लो. २५, पृ १५९, श्लो. २६ पृ. १६०, तीन प्रकार का पूजन १६१, श्लो. २७ पृ. १६२, श्लो. २८ पृ. १६४, श्लो २९ पृ. १६५, कैटभ भिद् १६६, श्लो. ३० पृ. ब्रह्मभाव १६८, श्लो. ३१ पृ. ६४ तंत्रों से भगवती का तंत्र स्वतंत्र है, १६०, श्लो ३२, ३३, १७५, हादिकादि विद्याओं के रूप पंचदशी और उसके आधार पर अन्य विद्यायें १८०, माला का विधान १८०, षोडशी विज्ञान १८१ नाद, बिन्दु और कला १८७, श्लो. ३४, शिव शक्ति का अंगी अंगवत् सम्बन्ध, पृ. १९०, श्लो. ३५, सारा विश्व शक्ति का परिभास है, १९३, श्लो. ३६ आज्ञा चक्र, १९६, श्लो. ३७ विशुद्ध चक्र, पृ. १९९.
३
श्लो. ३८ हृदय कमल, पृ. २०२, श्लो. ३९ स्वाधिष्ठान पृ. २०७, चक्र, विभिन्न स्तरों पर शक्ति के विभिन्न रूप २१० ग्रंथि त्रय और अध्यास २१३, बिन्दु त्रय पंचाग्नि विद्या और ब्रह्मचर्य २१५ श्रद्धा का ब्रह्मचर्य से सम्बन्ध २२४ गुरु शिष्य का सम्बन्ध और श्रद्धा २२४, श्लो. ४० मणिपूरक चक्र, पृ. २२७, श्लो. ४१ मूलाधार, पृ. २२८, शिवताण्डव पृ. २३१
सौन्दर्य लहरी (उत्तरार्ध)
उपोद्घात पृ. २३७, मुकुट का ध्यान श्लो. ४२ पृ. २४१, केशों का ध्यान श्लो. ४३ पृ. २४२, श्लो. ४४ पृ. २४३, अलकों का ध्यान श्लो. ४५ पृ. २४४, ललाट का ध्यान श्लो. ४६ पृ. २४५, भृकुटि का ध्यान श्लो. ४७ पृ. २४६, तीन नेत्रों का ध्यान श्लो. ४८ पृ. २४८, श्लो. ४९ पृ. २४९ श्लो. ५० पृ. २५२, श्लो. ५१ पृ. २५३, श्लो. ५२ पृ. २५४, श्लो. ५३ पृ. २५५, श्लो. ५४ पृ. २५७, श्लो. ५५ पृ. २५८, श्लो. ५६ पृ. २५९, श्लो. ५७ पृ. २६०, कनपटियों का ध्यान श्लो. ५८ पृ. २६०, मुख का ध्यान श्लो. ५९ पृ. २६१, श्लो. ६० पृ. २६२, नासिका का ध्यान श्लो. ६१ पृ. २६३, ओष्ठों का ध्यान श्लो. ६२ पृ. २६७ मुस्कान का ध्यान श्लो. ६३ पृ. २६८, जिव्हा का ध्यान श्लो. ६४ पृ. २६९, श्लो. ६५ पृ. २७०, बाणि का ध्यान श्लो. ६६ पृ. २७१, चिबुक का ध्यान श्लो. ६७ पृ. २७२, ग्रीवा का ध्यान श्लो. ६८ पृ. २७३, गले का ध्यान श्लो. ६९ पृ. २७३, चारों भुजाओं का ध्यान श्लो. ७० पृ. २७५