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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

३१८ | सौन्दर्य लहरी

समर्पण

[१०२]

निधेनित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघाटज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्यानिर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतपदे
निरातंके नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥

अर्थ:— हे सदा हंसमुखि असीमगुणनिधे, नीतिनिपुणे, निरतिशयज्ञानवति, नियम परायण भक्तों के चित्त में घर करने वाली, नियति से निर्मुक्त अर्थात् नियति से अतीते, सब शास्त्र उपनिषद् जिसके पदकी स्तुति करते हैं ऐसी अभये, सनातनी नित्ये ! मेरी भी इस स्तुति को स्वीकार करके अपने निगमों में स्थान दो ।


[१०३]

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैर्घ्य रचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधि सौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥

अर्थ:— हे जननि ! तेरी प्रदान की हुई वाक्शक्ति से की गई इस स्तुति के शब्द इस प्रकार हैं जैसे दीपक की ज्वालाओं से सूर्य की आरती उतारना, अथवा चन्द्रकान्त मणि से टपकते हुए जलकणों से चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करना, अथवा समुद्र का सत्कार उस ही के जल से करना ।

सौंदर्य लहरी ३१९


उपसंहार

शास्त्रों में कर्म, भक्ति, ध्यान और ज्ञान भेद से अध्यात्मसाधन के सोपानक्रम के तीन स्तर कहे गये हैं, इनकी साधन पद्धतियों में भिन्नता अवश्य है, परन्तु सब के आधार में एक ही मूल सिद्धान्त है, इसलिये परस्पर में एक दूसरे के विरोधी न होते हुए वे अधिकारी भेदसे सबको उत्तरोत्तर एकही लक्ष्य पर पहुंचाते हैं। श्रीकृष्ण भगवान् ने सब साधनों की उपयोगिता बताते हुए सब जिज्ञासुओं को तीन प्रकार का अधिकारी माना है। प्रथम श्रेणि के वे पुरुष हैं जिनको धनदारादि में दृढ आसक्ति है, वे कर्मयोग के अधिकारी होते हैं, दूसरी श्रेणि के वे पुरुष हैं जिनको संसार से तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया है वे ध्यान ज्ञान के अधिकारी होते हैं, तीसरे मध्यम श्रेणि के मनुष्य वे हैं जिनका चित्त संसार की आपत्तियों से व्याकुल रहता है परन्तु घर की आसक्ति का त्याग नहीं कर सकते, उनको भक्ति योग का अधिकारी समझना चाहिये, उनके लिये भक्ति उपासना का मार्ग ही श्रेयस्कर होता है। यद्यपि सब साधनों का लक्ष्य शुद्धचेतन स्वरूप परमात्मतत्त्व की प्राप्ति की ही ओर होता है, तो भी ऐहिक और पारलौकिक भोगों की प्रबल वासना उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अग्रसर होने में बाधा डालती रहती है। ज्यों २ अनेक दृष्ट और आनुश्रविक अर्थात् देखे और सुने विषयों की तृष्णा कम होती जाती है, चित्त की स्वस्थता उन्नत होती जाती है और वृत्तियां बाह्य विषयों का आश्रय त्याग कर अभ्यन्तर नित्य अखंड आनन्दमयी आत्मज्योति का अवलंबन पकडने लगती हैं। बाह्य विषयों से शनैः२ क्रमशः विरक्तिपूर्वक शुद्ध आत्मज्योति का प्रकाश एवं साक्षात्कार

३२० सौंदर्य लहरी


होने तक सारी साधन यात्रा को बाह्य, अभ्यन्तर और मिश्रित् उपासना भेद से तीन स्तरों पर बांटा जाता है। उनको बहिर्याग और अन्तर्याग अथवा अपरा और परा पूजा भी कहते हैं। शुद्ध सत्त्विक चेतन सत्ता एक परमात्मा की ही है और देहादि की उपाधियों के योग से प्रतिभासित होने वाली चेतना जीव कहलाती है। इसलिये चित्त की वृत्तियों को सब उपाधियों से हटाकर शुद्ध चेतन सत्ता पर लगाना ही सब साधनों का सार है, जिसका उपसंहार जिवाभिमान के सर्वथा नष्ट होने पर सब वृत्तियों का परमतत्त्व में विलीनीकरण द्वारा होता है। कर्मयोगी उसे स्थित प्रज्ञता कहता है, भक्त उसे जीव ब्रह्म का सायुज्य योग मानता है और ज्ञानी उसे ब्राह्मी स्थिति जानता है।

इसलिये उपासना सदा चेतनसत्ता की की जाती है, जड पदार्थों की नहीं। व्यवहार में भी सब मनुष्य पुत्र कलत्र मित्र बंधु राजा और राज्य कर्मचारियों के देह की सेवा द्वारा देही आत्मा की ही प्रसन्नता प्राप्त किया करते हैं। परन्तु परम चेतन तत्त्व जिसकी व्यापकता सर्वत्र है सामान्यतया मनबुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ग्रहणगम्य नहीं, उसकी सेवा उपासना 'ईशावास्यमिदँ सर्वं' इस श्रुति के अनुसार यत्र तत्र सर्वत्र भावना द्वारा ही प्रतिमादि जड प्रतीकों के सहारे आवाहन पूजन के उपचारों सहित की जानी संभव है। सर्वव्यापी परमेश्वर का आवाहन अर्चन करने का विनियोग यंत्र प्रतिमा अथवा प्रतीक विशेष में उसके अस्तित्व की धारणा को दृढ करानां मात्र है। इस प्रकार दृढ संकल्प और दृढ धारणा से सर्वव्यापी की चेतन सत्ता उन जड प्रतीकों में इस प्रकार प्रकट हो जाती है

सौंदर्य लहरी ३२१


जैसे ईंधन में अग्नि। बाह्य यागों में जैसे मूर्ति अथवा यंत्रों में देव का आवाहन प्राणप्रतिष्ठा और तदनन्तर पंचोपचार षोडशोपचार सहित अर्चन पूजन एवं ध्यान किया जाता है, वैसेही अन्तर्याग में भी, देहरूपी प्रतीक के अंग प्रत्यंगों में करन्यास अंगन्यासों द्वारा उसी देव की प्रत्येक अंग संबंधिनी शक्तियों का आवाहन, हृदय में प्राणप्रतिष्ठा और मानसिक पूजन ध्यानादि अनेक क्रियाओं का विधान है, जिनका तात्पर्य अपने देह रूपी प्रतीक में उस सर्वान्तर्यामी की जागृति करना है, जब उस देवात्मिका शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव अपने अन्तर में होने लगता है, तब बाह्य प्रतीकों की अपेक्षा नहीं रहती, तो भी वे मूर्तियां और यंत्रादि विशेष आदरणीय बने ही रहते हैं।

इसके पश्चात् उस मनुष्य की उपासना का स्तर सूक्ष्म हो जाता है और उपासना के पीठ स्थान स्थूल देहको छोड़कर सूक्ष्म देह के स्तरों पर उठने लगते हैं। पंचतन्मात्राओं पंचप्राणों और पंच कर्मेन्द्रियों का देहसे सुषुम्नागत मूलाधारादि चक्रोंद्वारा संबंध है और पंचज्ञानेन्द्रियों का आज्ञाचक्र द्वारा। साधक इस स्तरपर अपना भावनायुक्त ध्यान क्रमशः भिन्न-भिन्न चक्रों पर करता हुआ सहस्रार तक ऊपर उठाता है। प्रत्येक चक्र पर प्रत्यक्ष होने वाले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव प्रभृति सब शिव शक्ति भेद से एक ही परम चेतनतत्व के उस उस चक्र से संबंधित रूप हैं। इनसे ऊपर नाद, कला, ज्योति, शांति आदि भी उस ही परम चिति शक्ति की अभिव्यक्तियां प्रत्यक्ष रूप से अनुभव में आती हैं।

३२२ | सौंदर्य लहरी


एक ही निर्विशेष चिदात्मा ब्रह्म की सगुण निर्गुण भेद से उपासना की जाती है । सगुण ब्रह्म के दो भेद हैं, एक जगत् का नियन्ता और दूसरा जगदात्मक अर्थात् सबका अन्तरात्मा । ज्ञान क्रिया, गुणादि की उपाधि भेद से जैसे एक ही ईश्वर का अनेक रूपों से ध्यानार्चन किया जाता है, वैसे ही उसका स्मरण भी अनेक नामों द्वारा किया जाता है । विष्णु सहस्रनाम, गोपाल सहस्रनाम, शिवसहस्रनाम दुर्गासहस्रनाम, ललितासहस्रनाम, अनेक सहस्र-नामावलियां प्रसिद्ध हैं, जिनमें पुलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग पदों द्वारा ब्रह्मपद का गुणविशिष्ट निर्देश देखने में आता है, वास्तव में ब्रह्म को किसी लिंग वाच्य नहीं कहा जा सकता । भास्करराय अपनी ललितासहस्रनाम की व्याख्या में कहते हैं कि 'पदानुसारीण्येव हि लिंगानि, नतुवास्तविकं ब्रह्मण्येकमपि लिंगम् ।' अर्थात् ये लिंग पदानुसारी मात्र हैं, वास्तविकता यह है कि ब्रह्म में एक भी लिंग नहीं होता जैसा कि कहा है,

पुंरूपं वा स्मरेद्देवि स्त्रीरूपं वा चिन्तयेत् ।
अथवा निष्कलं ध्यायेत्सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥

अर्थः— हे देवी, चाहे पुंरूप से उसका स्मरण करो, चाहे स्त्रीरूप से चिन्तन करो, अथवा उस निष्कल ब्रह्म पद का ध्यान सत्चित् आनन्द लक्षण युक्त करो ।

बहिर्यागों में भक्त जिसका भगवान् अथवा भगवती पदों से संबोधन करता है, उसी को अन्तर्याग वाला साधक प्रज्ञानात्मा,

सौंदर्य लहरी ३२३

चिदात्मा, चिन्मय अन्तःपुरुष, चिन्मयी या चितिशक्ति कह कर ध्यान और निदिध्यासन करता है । जैसा कि श्रुति कहती है

एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा, एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यंति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतंनेतरेषाम् ॥

उसी परम तत्व को श्रीविद्या के उपासक ललिता महात्रिपुर सुन्दरी कहते हैं।

श्रीचक्रराजनिलया, श्रीमत्त्रिपुर सुंदरी ।
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका ॥
( ललिता सहस्त्रनाम )

अर्थात् श्रीचक्रराज में निवास करने वाली श्रीमत्त्रिपुर सुंदरी श्रीशिवा ललिता अंबिका शिवशक्ति के भेदरहित ऐक्यरूपा है

त्रिपुर सुंदरी का अर्थ भास्करराय इस प्रकार करते हैं:--अत्र त्रीणि पुराणि ब्रह्मविष्णुशिवशरीराणि यस्मिन् सः त्रिपुरः परशिवः, तस्य सुंदरी शक्तिः । वायुसंहिता में भी कहा है कि:—

शिवेच्छया पराशक्तिः शिवतत्त्वैकतां गता ।
ततः परिस्फुरत्यादौ सर्गे तैलंतिलादिव ॥

अर्थः—वह पराशक्ति सृष्टि के आदि में शिव की इच्छा (संकल्प) से, शिवतत्व की एकता रखने वाली उस ही (शिव से) परिस्फुरित होती है, जैसे तिलों से तेल । इसलिये यह ही भाव सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया गया है।

३२४ सौंदर्य लहरी


ब्रह्मणोऽभिन्नशक्तिस्तु ब्रह्मैव खलु नापरा । (सौर संहिता)

शक्ति ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण ब्रह्म ही है अन्य नहीं । जड़चेतन भेद से उसके दोनों ही रूप हैं कहा है:—

चिच्छक्ति श्चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका ।.

(ल० स०) देखे श्लोक ३, ५ सौ० ल०

सत्चित् आनन्द की अभिव्यक्ति अस्ति, भाति और प्रियता द्वारा सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रही है । अखिल ब्रह्मांड की भौतिक सत्ता सत् शक्ति का कार्य है, उसका ज्ञान प्राणिमात्र में प्रतिभासित् होने वाली चित् शक्ति का परिस्फुरण है, और उस बाह्य ज्ञान से उदय होने वाली प्रियता आनंद की प्रतिफलित क्रिया है । अर्थात् सत् शक्ति के आसन पर चिति शक्ति महात्रिपुर सुंदरी विराजमान है, जिस चिदानंद-लहरी से पिण्ड और ब्रह्मांड दोनों व्याप्त हैं और परब्रह्म उसकी आत्मा है, (श्लोक ३४) । विश्व उस विश्वरूपा षोडश-कलात्मिका का विराट्देह है इसलिये स्थूल शरीराभिमानी जागरित्-स्थानों बहिःप्रज्ञः एकोनविंशति-मुखः स्थूलभुकवैश्वानरोजीव उसी का अभिन्न स्वरूप है ।

ललिता सहस्रनाम में कहा है—

विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ।
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्यासर्वावस्थाविवर्जिता ॥

सौंदर्य लहरी ३२५

इसी प्रकार स्वप्नस्थानी अन्तःप्रज्ञ प्रविविक्तभुक् तैजस तैजसा- त्मिका से और सुषुप्तस्थानी एकीभूत प्रज्ञानघन आनंदमय आनंदभुक् चेतोमुख प्राज्ञ प्राज्ञात्मिका से अभिन्न एक ही रूप है, सर्व अवस्थाओं से वर्जित शुद्ध शान्त अद्वैत शिव चिन्मात्र आत्मा का स्वरूप तुर्यावस्था है।

जैसे जगत् नियन्त्रिणी विराट्रूपा विश्वतो मुखी भगवती का अनुग्रह प्रतिमा विशेष में अथवा ब्रह्माण्ड और पिण्ड के प्रतीक स्वरूप श्रीयंत्र में पूजन अर्चन करने से अनन्य भक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वैसे ही अध्यात्म योग विद्या के जानकार देह को ही श्रीयंत्र जान कर चिदात्मिका की अंतर्भावना द्वारा उपासना करते हैं। जैसा कि कहा है:-'अंतर्मुख समाराध्या बहिर्मुख सुदुर्लभा ।' (ल० स०) । योगीजन उस शक्ति की स्थिति प्राणिमात्र के देह में प्रसुप्त अवस्था में मानते हैं, जिसे कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं, जो भावना द्वारा जगाई जा सकती है।

मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी । आज्ञाचक्रान्तरास्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी । सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ॥ तडिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता । महासक्तिः कुण्डलिनी विसतन्तुतनीयसी ॥ भवानी भावना गम्या भवारण्यकुठारिका ॥ (ल० स०)

भावना दो प्रकार की होती है:-आर्थीभावना और शाब्दी भावना । आर्थी भावना प्रवृत्तिरूपा होती है, यह स्थूलरूप है जिसका

३२६ | सौंदर्य लहरी

सावयव अनुभव किया जा सकता है और शाब्दी सूक्ष्म मंत्रमयी है। योगिनी हृदय में भावना के तीन प्रकार इस प्रकार कहे गये हैं।

आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तं ततः सकलनिष्कलम् ।
उन्मन्यन्ते परे स्थाने निष्कलं च त्रिधास्थितम् ॥

अर्थः— मूलाधार से आज्ञाचक्र तक सगुण रूप कहा जाता है, उसके ऊपर उन्मनी तक सगुण निर्गुण, और उसके अंत में सहस्रारस्थ परम स्थान पर निष्कल निर्गुण की स्थिति है; इसलिये तीनों में वैसे ही भावना करना चाहिये। यह आर्थी भावना के भेद हैं।

शाब्दी भावना के अंतर्गत, मंत्रों का न्यास, प्राणप्रतिष्ठा और जप स्वाध्याय का समावेश है। वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक भेद से मंत्र अनेक हैं, परन्तु वे सब एक नादरूपा नामरूपविवर्जिता शक्ति के ही अनेक पदवाचक रूप हैं, जैसा कि कहा है

यदा भवति सा संवित् विगुणीकृतविग्रहा ।
सा प्रसूते कुंडलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ॥
शक्तिस्ततो ध्वनिस्तस्मान्नादस्तस्मान्निरोधिका ।
ततोऽर्धेन्दुस्ततो विन्दुस्तस्मादासीत्पराततः ॥
पश्यन्ति मध्यमा वाणी वैखरीसर्गजन्मभूः
इच्छाज्ञानक्रियात्मासौ तेजोरूपा गुणात्मिका ।
क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिन्यर्णमालिकाम् ।
विश्वात्मना प्रबुद्धा सा सूते मंत्रमयंजगत् ॥

सौंदर्य लहरी ३२७

**अर्थ:—**जब वह संवित् ज्ञानशक्ति विशेष गुणों से युक्त होकर वर्णपदमंत्रविग्रहा अर्थात् पदों का रूप धारण करती है, तब वह शब्द ब्रह्ममयी कुण्डलिनी व्यापिका (विभुः) रूप से शक्ति को जन्म देती है, फिर शक्ति से ध्वनि (महानाद), ध्वनि से नाद, नाद से निरोधिका, उससे अर्धेन्दु फिर बिन्दु, उससे परा, परा से पश्यन्ती मध्यमा एवं वैखरी वाणी का जन्म होता है। वह तेजोमयी त्रिगुणात्मिका कुण्डलिनी जो इच्छाज्ञानक्रिया स्वरूपा है क्रम से वर्णमाला की सृष्टि करती है। वह विश्वात्मिका जब प्रबुद्ध होती है तब समस्त मंत्रमय जगत् को जन्म देती है।

नादरूपा की व्याख्या करते हुए श्रीभास्करराय कहते हैं कि

ह्रींकारादिषु बिन्दोरुपर्यर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्ति व्यापिकाः समनोन्मन्याख्याः सूक्ष्मसूक्ष्मतरसूक्ष्मतमरूपा अष्टौवर्णा वर्तन्ते तेषुतृतीयो रूपो वर्णोनाद इत्युच्यते। नाद एव रूपं यस्याः सा नादरूपा।

ह्रीं आदि मंत्रों में बिन्दु के ऊपर अर्धचंद्रिका, रोधिनी, नाद, नादान्त (ध्वनि या महानाद), शक्ति व्यापिका समनी और उन्मनी नाम वाले सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम ८ वर्ण होते हैं, उनमें तीसरा वर्ण नाद कहलाता है। नाद है रूप जिसका वह नादरूपा।

शक्ति के सूक्ष्मरूप को भी सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम भेद से त्रिविध समझना चाहिये, उसका सूक्ष्म रूप पंचदशी विद्या है, सूक्ष्मतर रूप कामकला बीजाक्षर और सूक्ष्मतम रूप कुण्डलिनी है। प्रथम के तीन विभाग हैं जिनको क्रमशः वाग्भवकूट, कामराजकूट

३२८ सौंदर्य लहरी


और शक्तिकूट कहते हैं। पूरे मंत्र को मूल पंचदशाक्षरी विद्या कहते हैं। यह भगवती का सूक्ष्म शरीर है। जिसका स्वरूप श्लोक ३२, ३३ में दिया गया है और सूक्ष्मतर रूप कामकला का रूप श्लोक १९ में देखें (आनंद लहरी), कुण्डलिनी का वर्णन देखें श्लोक (९, १०) ।

श्रीभास्करराय ने अपने वरिवस्या रहस्य में तीनों त्रिकूटायुक्त पंचदशी मंत्र के गायत्र्यार्थ, भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महातत्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ और महावाक्यार्थ इन १५ प्रकार से अर्थ समझाकर भावनाकरने का उपदेश किया है। कहा भी है 'यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी' ।

पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थानादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥
\hfill (वरिवस्यारहस्य ५६)

अर्थ:— पुरुषार्थों की इच्छा रखने वाले पुरुषों को अर्थ जानने चाहिये, अर्थ का आदर न करने वालों को अर्थसिद्धि भी नहीं होती, प्रत्युत अनर्थ होता है

मंत्र की वर्ण संख्या, उनका उद्धार, उच्चारण का काल और मात्रा, उच्चारण, उत्पत्ति स्थान, आकार स्वरूप और अर्थयुक्तभावना ये विद्या के अंतरंग अवयव कहलाते हैं, और ऋषि, छंद, देवता, विनियोग, बीजशक्ति कीलक, न्यास, ध्यान नियम और पूजा अर्चनादि बहिरंग अवयव कहलाते हैं। प्रायः

सौंदर्य लहरी ३२९

का उन्हें प्रायः ज्ञान नहीं होता, जिनका ज्ञान मंत्र सिद्धि के लिये अत्यावश्यक है। क्योंकि उनके बिना उपासना को प्राणविहीन जानना चाहिये। जैसे बीज से जड और जड से भूमि के नीचे और उपर वृक्ष का फैलाव होता है, यद्यपि दोनों समान रूप से वृक्ष के अंग हैं परन्तु भूमि के नीचे का फैलाव उसकी जान होती है। इसी प्रकार मंत्र के अंतरंग अवयवों को मंत्र का प्राण समझना चाहिये।

हम ऊपर कह आये हैं कि पंचदशी के १५ अक्षरों का १५ तिथियों से संबंध है और षोडशी का १६ वां अक्षर चितिरूपा अमावस्या अर्थात् निर्विकल्प समाधि है। वहां यह भी बताया गया है कि एकादशी दशमीविद्धा उपोध्या नहीं मानी जाती, वरन् द्वादशी विद्धा होनी चाहिये, नहीं तो शुद्धा द्वादशी ही उपोध्या माननी चाहिये। इसी क्रम से मंत्र के जप और न्यास के समय ध्यान रखना जरूरी है। इसका अध्यात्मिक अर्थ यह है कि मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र के ऊपर निरोधिका तक दशमी रहती है, निरोधिका पर एकादशी आती है, उसके ऊपर नाद पर द्वादशी का स्थान है। इसका अर्थ यह है कि नीचे के चक्रों का संबंध ५ कर्मेन्द्रियों से है और आज्ञा से अर्धेन्दु तक ५ ज्ञानेन्द्रियों के स्थान हैं अर्थात् १० तिथियों एवं १० अक्षरों का संबंध दस इंद्रियों से रहता है। मन एकादशी है। उसका योग जब तक इंद्रियों से रहता है वह उपोध्या नहीं होती, अर्थात् वह बहिर्मुख रहती है। बुद्धि को द्वादशी, चित्त को त्रयोदशी, अहंकार को चतुर्दशी और महत्तत्व को पूर्णिमा समझना चाहिये। अमावस्या निर्विकल्प स्थिति है। अव्यक्त संचित् और प्रारब्ध संस्कारों के आशय को कहते हैं, वह कामेश्वरी है,

३३० | सौंदर्य लहरी

उसे चितिरूपाज्ञानाग्नि में शुद्ध कर लेना है, इसलिये उसकी यहां गणना नहीं की गई ।

जैसा कि श्रुति में कहा है कि

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः ।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परागतिः ॥ कठ (३, ११)

इसलिये

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥
कठ (३, १३)

अर्थात् महत्तत्व से सूक्ष्म अव्यक्त और अव्यक्त से सूक्ष्म परम पुरुष है वह अंतिम सीमा है उससे परे कुछ भी नहीं और वह ही परम गति का स्थान है, इसलिये बाणि आदि इंद्रियों को बुद्धिमान मन में ले जाकर (रोकदे), मन को ज्ञानात्मा बुद्धि में ले जावे और बुद्धि को महत् में और महत् को शांत आत्मा में ले जाय । इस क्रम में अव्यक्त को छोड़ दिया गया है ।

यदि एकादशी रूपी मन दशमी से बिंधा रहता है, तो द्वादशी रूपी बुद्धि को ही ग्रहण करना चाहिए, उस मन का त्याग कर देना चाहिये ।

क्योंकि

दृश्यतेत्वग्र्याबुद्ध्या सूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः । कठ (३, १२)

सौंदर्य लहरी
३३१

किसी मंत्र की सिद्धि प्राप्त करने के लिये, उस मंत्र को सिद्ध गुरु के मुख से ग्रहण करना चाहिये । गुरु की शक्ति मंत्र के साथ शिष्य में प्रविष्ट होकर बीज का कार्य करती है, जो शिष्य के अंतःकरण रूपी क्षेत्र में श्रद्धा की वर्षा से पोषण पाकर अंकुरित होती है और दीर्घकालनिरंतरसत्कारामेवित् होने पर पूर्ण प्रकाश पाती है । इसलिये गुरु, मंत्र, शक्ति, और शिव चारों की एकता समझनी चाहिये । द्वैत की भावना में शक्ति और गुरु अथवा शिव का प्रत्यक्ष भेद दृष्टिगोचर होता है और अद्वैत की सिद्धि के साथ शक्ति की अपने अन्तरात्मा के साथ एकता अनुभव होने लगती है । इस प्रकार गुरु ईश्वर और आत्मा तीनों का एकीकरण अनुभव में आता रहता है ।

कहा है

ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्ति भेद विभागिने ।
व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तयेनमः ॥

श्रीभगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में शिवशक्ति की अभिन्नता और दूसरे में सत् कारणवाद की पुष्टि करते हुए तीसरे श्लोक में तीनों धर्म अर्थ काम की सिद्धि सहित अज्ञान तिमिर के नाशार्थ उपासना द्वारा मोक्ष प्राप्ति की ओर लक्ष्य कराया है । ६टे ७वें श्लोकों में बहिर्ध्यान और ८वें में भगवती के अभ्यंतर चिति शक्ति के चिदानंद लहरी स्वरूप को इंगित करके ९वें १०वें श्लोकों में तांत्रिक योग पद्धति के अनुसार षट्चक्रवेध की ओर साधकों का ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि बहिर् उपासना का पूर्ण फल कुंड-

३३२ सौंदर्य लहरी

लिनी के जागरणोपरांत अन्तर्याग रूपी षड्चक्र बेध होकर परमतत्व के अनुभव प्राप्त करने पर होता है ।

११ से १३ श्लोकों में बहिरुपासना के लिये ब्रह्माण्ड के प्रतीक स्वरूप यंत्र का वर्णन और पश्चात् जगत् नियन्त्री का ध्यान एवं अर्चन का फल कहा है, फिर १४ से २१ तक अभ्यन्तर साधन के लिये षट्चक्रों का रहस्य और ध्यान बता कर मूलबीज मन्त्र स्वरूप कामकला की ओर लक्ष्य कराया गया है । इस प्रकार मन्त्रयोग द्वारा लय योग राजयोग के सोपान क्रम के पश्चात् भक्ति उपासना से महावाक्योत्थ ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान की उपलब्धि २२ से ३० श्लोक तक कही गई है। तत्पश्चात् श्रीविद्या की उत्कृष्टता ३१ वें श्लोक में बता कर ३२, ३३ श्लोकों में पचदशी का उद्धार और ३४, ३५ में समष्टि व्यष्टि गत शक्ति एवं उसके परिणामों द्वारा वाचारम्भण मात्र नामरूपात्मक व्यापारों में सूत्रात्मा शिव का अन्वय व्यतिरेक ज्ञान से विवेचन किया गया है। और ३६ से ४१ तक षट्चक्रों का विशेष विवरण दिया गया है। शेष ग्रन्थ में विराट्रूपा भगवती के ध्यानार्थ और अन्तर्यागार्थ मानसिक उपचारों का सुन्दर निरूपण किया गया है।

भगवती का वर्ण अरुण अर्थात् लाल माना जाता है, इसलिये उसका एक नाम अरुणा भी है। वेद और तन्त्र अग्नि को ही शक्ति का रूप मानते हैं, चिदग्नि, ब्रह्माग्नि, ज्ञानाग्नि पदों के प्रयोग इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं । अग्नि का भी वर्ण अरुण है । अग्नि जब शान्त हो जाती है, तब उसका अपने कारण स्वरूप ब्रह्म

सौंदर्य लहरी ३३३

में विलीनीकरण होता है, इसी अभिप्राय से हवन में आहुतियां देने से वे जिस जिस देवता को लक्ष्य करके दी जाती हैं, उसी देव को पहुंचती हैं, क्योंकि ब्रह्म में सब ही देवों का समावेश है । भगवान गीता में कहते हैं कि:—

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपिमामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ गीता (९,२३)
अहं हि सर्व यज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्तितॆ ॥
गीता ( ९,२४ )

अर्थात् जो लोग श्रद्धा से युक्त होकर किसी भी अन्य देवता का भजन करते हैं, वे मेरा ही भजन करते हैं । उनका वह भजन विधीपूर्वक नहीं होता; क्योंकि वास्तव में सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु मैं ही हूं, परन्तु वे मेरे तात्विक स्वरूप को नहीं जानते, इस लिये उनका उपास्यभाव परमतत्व से च्युत होकर नीचे के स्तरों पर रह जाता है ।

ऐतरेयब्राह्मण की श्रुति कहती है कि 'अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानाम्' ( १,४ ) । अर्थात् अग्नि सब देवताओं में प्रथम है, इसलिये सब का मुख है । शिव का प्रथम स्पन्द शक्ति के रूप में प्रकट होता है इसलिये शक्ति ही सर्व प्रथम देवता है और वह स्वयं अग्नि स्वरूप ही है । ललिता सहस्रनाम में भी भगवती को चिदग्निकुण्ड सम्भृता कहा गया है अर्थात् चिद्ब्रह्म वह अग्निकुण्ड है जिसमें से भगवती की उत्पत्ति होती है, इसीलिये महात्रिपुरसुन्दरी को चिति शक्ति कहते हैं । चित् और चित् से उत्पन्न होनेवाली चितिशक्ति

३३४ | सौन्दर्य लहरी

एक ही हैं। ज्ञानाग्नि अज्ञान रूपी सब कर्माडम्बर को भस्मसात् कर देती है, जैसे अग्नि सब इन्धन को भस्म कर देती है।

ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ।
( गीता ४,३७ )

अग्नि शान्त होजाने पर ईंधन की जो राख बचती है वह भी इतनी पवित्रता लिये होती है कि किसी भी अपवित्र एवं गन्दे पदार्थ पर डालने से उससे उत्पन्न होनेवाली घृणा को दूर कर देती है, और अग्नि में जलकर चन्दन और विष्ठा एक समान हो जाते हैं। इसलिये तान्त्रिक शक्ति उपासना को वैदिक अग्नि उपासना की आश्रयीभूता याज्ञिक पद्धति का ही उपासनापर साधनक्रम समझना चाहिये, जिस प्रकार उपनिषदों में भी अनेक उपासनाओं का उल्लेख मिलता है। परन्तु उन सब उपासनाओं का उपसंहार जैसे ब्रह्मात्मैक्य अनुभूति में किया गया है, वैसे ही यहां पर भी समझना चाहिये। वेदों में 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इत्यादि ऋचाओं द्वारा लक्ष्य करके जिस देवता का यज्ञों में आह्वान किया गया है, वह देवता सच्चिदानन्दरूपा ब्राह्मी शक्ति के सिवाय दूसरा कौन हो सकता है ? यास्काचार्य ने अग्नि का अर्थ अग्रणी भी किया है, इस अभिप्राय से भी स्थूल अग्नि द्वारा सर्वप्रथमकारणभूता चिदग्नि की ही उपासना ग्रहणीय युक्त है। उपनिषदों में अग्नि को ब्रह्म की एक कला कहा गया है जैसे

अग्निःकला सूर्यःकला चन्द्रःकला विद्युत्कलैष वै सौम्य
चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम । छ ० ( ४,७,३ )

वाक् को भी ब्रह्म मानकर उपासना करने की विधि बताई गई है। जैसे ' वाग्वै ब्रह्मेति ' बृ० ( ४, १, २ ) ' वाचं ब्रह्मेति उपास्ति '

सौंदर्य लहरी ३३५

छा० (७, २, २) इत्यादि । और वाक् को अग्नि का ही सूक्ष्म-रूप कहा गया है (तेजोमयी वाक्) इस प्रकार कारण, सूक्ष्म, और स्थूल भेद से चितिशक्ति, वाणि और स्थूल अग्नि की एकरूपता मानकर हवन में आहुति द्वारा मंत्र का जप पूर्वक चिन्मात्र की भावना करने से एकही ब्रह्म की सगुणोपासना की जाती है ।

वैदिक उपासना के इस सिद्धान्त के आधार पर चिदग्निकुण्ड-सम्भूता ब्रह्ममयी शक्ति को भगवती अरुणा महात्रिपुरसुन्दरी नाम देकर तान्त्रिक रूप दिया गया है, जो योग की एक पद्धति है और जिसका निर्माण दीर्घ अनुभूति की नींव पर किया गया है । श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने उसे उपासकों के लाभार्थ सौन्दर्य लहरी का सुन्दर रूप देकर वैदिक कर्मकाण्ड से अनभिज्ञ कलिकाल के जिज्ञासुओं पर परम अनुग्रह किया है ।

संक्षेप में सब साधन पद्धतियों का समावेश इन तीन मंत्रों में किया जाता है:—(१) 'ॐ तत् सत्' अर्थात् वह ॐ स्वरूप ब्रह्म सत् स्वरूप है, (२) 'सच्चिदेकं ब्रह्म' वह सत् चित्स्वरूप भी है और सारे चेतन जगत् में एक ही चित्सत्ता है जिसे ब्रह्म कहते हैं, (३) 'आनन्दं ब्रह्म' उस ब्रह्म की अनुभूति ब्रह्मानन्द के आवेश में होती है । निम्न कोटि के साधकों को सारे जगत् में ईश्वर की सत्ता की व्यापकता की कल्पना करने का उपदेश प्रथम मंत्र द्वारा किया गया है, दूसरे श्रेणि के साधकों को दूसरे मंत्र के द्वारा अपनी चेतना में ब्रह्मभावना करने का उपदेश है, जिसका अभ्यास महावाक्यों के मनन निदिध्यासन द्वारा किया जाता है और अपने अन्तर में आत्मानन्द के आवेश की जागृति होने पर उसकी आश्रयीभूता आत्मस्थिति द्वारा प्राप्त होने वाली ब्राह्मी स्थिति का साधन तीसरे भाव की प्रत्यक्ष अनुभूति है । यह अन्तिम साधन पद्धति शक्ति

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उपासना का मुख्य विषय है और भगवत्पाद ने उस चिदानन्द के सौन्दर्य का विषद् निरूपण सौन्दर्य लहरी के रहस्यपूर्ण पदों में किया है। अन्त में सब साधनों का उपसंहार 'तत् सत् सोहम्' में होता है। प्रथम दो साधन कल्पना के विषय हैं जो प्रत्येक नरनारी की कल्पना शक्ति पर निर्भर हैं, परन्तु अन्तिम साधन स्वात्मानुभूति का विषय वस्तुतन्त्र होने के कारण गुरुकृपा की ही सर्वथा अपेक्षा रखता है।

यह हम अनेक बार कह चुके हैं, कि गुरुजन शक्तिपात दीक्षा द्वारा शिष्यों पर अनुग्रह किया करते हैं। शिष्य की कुण्डलिनी शक्ति को जगा देने का ही नाम शक्तिपात है जैसा कि शक्तिरहस्य के निम्नोद्धृत श्लोकों से स्पष्ट है,

व्यापिनी परमाशक्तिः पतितेत्युच्यते कथं ?
उर्ध्वादधोगतिःपातो मूर्त्तस्यासर्वगतस्य च ॥
सत्यं सा व्यापिनी नित्या सहजा शिववत् स्थिता ।
किन्त्वियं मलकर्मादिपाशबद्धेषु संवृता ॥
पक्कदोषेषु सुव्यक्ता पतितेत्युपचर्यते ।

**अर्थः—**वह परमाशक्ति सर्वव्यापिनी है, फिर वह पतिता अर्थात् गिरती है ऐसा क्यों कहते हैं ? मूर्तिमान एक देशीय जो सर्व व्यापी नहीं उसी की ऊपर से नीचे गिरने की गति को पतन कह सकते हैं। सत्य, वह नित्य सर्वव्यापिनी है और स्वभाव से शिववत् स्थित है किन्तु वह कर्मों के मल के पाश से आवृत्त रहती है, जब दोषों के पक जाने पर वह सुव्यक्त होती है, तब उसे शक्तिपात कहते हैं।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

परिशिष्ट (१)

ऋग्वेदीयं नासदास्रीय सूक्तम् ।

अष्टक ८, अ० ७, मं० १०, सू. १२९

परमेष्ठी प्रजापति : ऋषिः, त्रिष्टुभ् छन्दः परमात्मा देवतः ।

नास॑दासी॒न्नोसदा॑सीत्त॒दानीं॑, नासी॒द्रजो॒नो व्यो॑मा परो॒यत् ।
किमाव॑रीवः॒ कुह॒: कस्य॒ शर्म॒न्नम्भः॒, किमा॑सी॒द्गह॑नं गभी॒रम् ॥१६॥

**अर्थ—**तब न असत् था, न सत् था, रज नहीं था और जो पराकाश है वह भी न था, क्या कोई आवरण था, (जैसे) कुहरा या अंधकार ? किसकी प्रधानता थी, जल की ? क्या था ? गहन गंभीर था । (१६).

न मृत्यु॑रासीदमृ॒तं न तर्हि॒, न रात्र्या॒ अह॑ आसीत्प्रके॒तः ।
आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒तदेकं॑^१, तस्मा॑द्धा॒न्यन्न परः किंच॒नास॑ ॥१७॥

न मृत्यु थी न अमृत था, रात्री और दिन के चिन्ह भी नहीं थे, वह बिना वायु प्राण लेता था, वह अकेला अपनी महिमा से पूर्ण था, और निश्चय उससे अन्य दूसरा कुछ न था । (१७)


^१ यह परं ब्रह्म ॐ का स्वरूप है ।