श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ४१
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परिच्छेद ४१
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
(१)
तान्त्रिक भक्त तथा संसार। निर्लिप्त को भी भय है
श्रीरामकृष्ण भोजन के बाद दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। अधर तथा मास्टर ने आकर प्रणाम किया। एक तान्त्रिक भक्त भी आए हैं। राखाल, हाजरा, रामलाल आदि आजकल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। आज रविवार है, १७ जून १८८३ ई.।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – गृहस्थाश्रम में होगा क्यों नहीं? परन्तु बहुत कठिन है। जनक आदि ज्ञान प्राप्त करने के बाद गृहस्थाश्रम में आए थे। परन्तु फिर भी भय है! निष्काम गृहस्थ को भी भय है! भैरवी को देखकर जनक ने मुँह नीचा कर लिया। स्त्री के दर्शन से संकोच हुआ था। भैरवी ने कहाँ, 'जनक! मैं देखती हूँ कि तुम्हें अभी ज्ञान नहीं हुआ। तुममें अभी भी स्त्रीपुरुष-बुद्धि विद्यमान है।'
"कितना ही सयाना क्यों न हो, काजल की कोठरी में रहने पर शरीर पर कुछ न कुछ काला दाग लगेगा ही।
"मैंने देखा है, गृहस्थ भक्त जिस समय शुद्धवस्त्र पहनकर पूजा करते हैं उस समय उनका अच्छा भाव रहता है। यहाँ तक कि जलपान करने तक वही भाव रहता है। उसके बाद अपनी वही मूर्ति; फिर से रज, तम।
"सत्त्वगुण से भक्ति होती है। किन्तु भक्ति का सत्त्व, भक्ति का रज, भक्ति का तम है। भक्ति का सत्त्व विशुद्ध है; इसकी प्राप्ति होने पर, ईश्वर को छोड़ और किसी में भी मन नहीं लगता। देह की रक्षा हो सके, केवल इतना ही शरीर की ओर ध्यान रहता है।
परमहंस त्रिगुणातीत होते हैं
"परमहंस तीनों गुणों से अतीत होते हैं।* उनमें तीन गुण हैं और फिर नहीं भी हैं।
* मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते।। - गीता, १४। २६
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२४४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १७ जून, १८८३
ठीक बालक जैसा, किसी गुण के अधीन नहीं है। इसलिए परमहंस छोटे छोटे बच्चों को अपने पास आने देते हैं, जिससे उनके स्वभाव को अपना सकें।
“परमहंस संचय नहीं कर सकते। यह अवस्था गृहस्थों के लिए नहीं है। उन्हें अपने घरवालों के लिए संचय करना पड़ता है।”
तान्त्रिक भक्त – क्या परमहंस को पाप-पुण्य का बोध रहता है?
श्रीरामकृष्ण – केशव सेन ने यह बात पूछी थी। मैंने कहा, ‘और अधिक कहने पर तुम्हारा दल-बल नहीं रहेगा।’ केशव ने कहा, ‘तो फिर रहने दीजिए, महाराज।’
“पाप-पुण्य क्या है, जानते हो? परमहंस-अवस्था में अनुभव होता है कि वे ही सुबुद्धि देते हैं, वे ही कुबुद्धि देते हैं। फल क्या मीठे, कडुए नहीं होते? किसी पेड़ में मीठा फल, किसी में कडुआ या खट्टा फल। उन्होंने मीठे आम का वृक्ष भी बनाया है और फिर खट्टे फल का वृक्ष भी!”
तान्त्रिक भक्त – जी हाँ, पहाड़ पर गुलाब की खेती दिखायी देती है। जहाँ तक दृष्टि जाती है केवल गुलाब ही गुलाब का खेत!
श्रीरामकृष्ण – परमहंस देखता है, यह सब उनकी माया का ऐश्वर्य है, सत्-असत्, भला-बुरा, पाप-पुण्य यह सब समझना बहुत दूर की बात है। उस अवस्था में दल-बल नहीं रहता।
कर्मफल। पाप-पुण्य
तान्त्रिक भक्त – तो फिर कर्मफल है?
श्रीरामकृष्ण – वह भी है। अच्छा कर्म करने पर सुफल और बुरा कर्म करने पर कुफल मिलता है। मिर्च खाने पर तीखा तो लगेगा ही! यह सब उनकी लीला है, खेल है।
तान्त्रिक भक्त – हमारे लिए क्या उपाय है? कर्म का फल तो है न?
श्रीरामकृष्ण – होने दो, परन्तु उनके भक्तों की बात अलग है।
यह कहकर आप गाने लगे –
(भावार्थ) – “रे मन! तुम खेती का काम नहीं जानते हो! ऐसी मनुष्यदेहरूपी जमीन पड़ी ही रह गयी! यदि तुम खेती करते तो इसमें सोना फल सकता था। पहले तुम कालीनाम का घेरा लगा लो, फसल नष्ट न होगी। वह तो मुक्तकेशी का पक्का घेरा है, उसके पास यम भी नहीं आता। गुरु का दिया हुआ बीज बोकर भक्ति का जल सींच देना। हे मन, यदि तुम अकेले न कर सको, तो रामप्रसाद को साथ ले लेना।”
फिर गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “ ‘यम के आने का रास्ता बन्द हो गया। मेरे मन का सन्देह मिट गया। मेरे घर के नौ दरवाजों पर चार शिव पहरेदार हैं। एक ही स्तम्भ पर घर है, जो तीन रस्सियों
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से बँधा हुआ है। सहस्रदल-कमल पर श्रीनाथ अभय देते हुए बैठे हैं।'
"काशी में ब्राह्मण मरे या वेश्या – सभी शिव होंगे।
-"जब हरिनाम से, कालीनाम से, रामनाम से, आँखों में आँसू भर आते हैं, तब सन्ध्या-कवच आदि की कुछ भी आवश्यकता नहीं रह जाती। कर्म का त्याग हो जाता है। कर्म का फल स्पर्श नहीं करता।"
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "चिन्तन करने पर भाव का उदय होता है। जैसा भाव, वैसी ही प्राप्ति होती है – विश्वास ही मूल बात है। यदि चित्त काली के चरणरूपी अमृत-सरोवर में डूबा रहता है, तो फिर पूजा-होम, यज्ञ आदि का कुछ भी महत्त्व नहीं है।"
श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "'जो त्रिसन्ध्या में काली का नाम लेता है, क्या वह पूजा-सन्ध्यादि चाहता है? सन्ध्या स्वयं उसकी खोज में फिरती रहती है, पर उससे मिल नहीं पाती! यदि 'काली काली' कहते हुए मेरे प्राण निकल जाए, तो फिर गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची आदि की कौन परवाह करता है!'
"ईश्वर में मग्न हो जाने पर फिर असद्बुद्धि, पापबुद्धि नहीं रह जाती।"
तान्त्रिक भक्त – आपने कहा है 'विद्या का मैं' रहता है।
श्रीरामकृष्ण – 'विद्या का मैं', 'भक्त मैं', 'दास मैं', 'भला मैं' रहता है। 'बदमाश मैं' चला जाता है। (हँसी)
तान्त्रिक भक्त – जी महाराज, हमारे अनेक सन्देह मिट गए।
श्रीरामकृष्ण – आत्मा का साक्षात्कार होने पर सब सन्देह मिट जाते हैं।*
भक्ति का तम। सन्देह। अष्टसिद्धि
"भक्ति का तम लाओ। कहो, – जब मैंने राम का नाम लिया, काली का नाम लिया, तब यह कैसे सम्भव है कि मेरा बन्धन रहे, मेरा कर्मफल रहे?"
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) – "माँ, यदि मैं 'दुर्गा दुर्गा' कहता हुआ मरूँ, तो हे शंकरी, देखूँगा कि अन्त में इस दीन का तुम कैसे उद्धार नहीं करतीं! माँ! गो-ब्राह्मण की, भ्रूण की तथा नारी की हत्या, सुरापान आदि पापों की रत्तीभर परवाह न कर मैं ब्रह्मपद प्राप्त कर सकता हूँ।"
श्रीरामकृष्ण फिर कहते हैं – "विश्वास, विश्वास, विश्वास! गुरु ने कह दिया है, 'राम ही सब कुछ बनकर विराजमान हैं। वही राम घट-घट में लेटा।' कुत्ता रोटी खाता जा
* भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।। – मुण्डक उपनिषद, २।२।८
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रहा है। भक्त कहता है, 'राम! ठहरो, ठहरो, रोटी में घी लगा दूँ।' गुरुवाक्य में ऐसा विश्वास!
“भुक्कड़ों को विश्वास नहीं होता। सदा ही सन्देह! आत्मा का साक्षात्कार हुए बिना सब सन्देह दूर नहीं होते।
“शुद्ध भक्ति, जिसमें कोई कामना न हो, ऐसी भक्ति द्वारा उन्हें शीघ्र प्राप्त किया जा सकता है।
“अणिमा आदि सिद्धियाँ – ये सब कामनाएँ हैं। कृष्ण ने अर्जुन से कहा है, 'भाई, अणिमा आदि सिद्धियों में से एक के भी रहते ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। शक्ति को थोड़ा बढ़ा भर सकती हैं वे।'"
तान्त्रिक भक्त – महाराज, तान्त्रिक क्रिया आजकल सफल क्यों नहीं होती?
श्रीरामकृष्ण – सर्वांगीण नहीं होती और भक्तिपूर्वक भी नहीं की जाती, इसीलिए सफल नहीं होती।
अब श्रीरामकृष्ण उपदेश समाप्त कर रहे हैं। कह रहे हैं – “भक्ति ही सार है। सच्चे भक्त को कोई भय, कोई चिन्ता नहीं। माँ सब कुछ जानती है। बिल्ली चूहा पकड़ती है एक प्रकार से, परन्तु अपने बच्चे को पकड़ती है दूसरे प्रकार से।”
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पानीहाटी महोत्सव में
(१)
कीर्तनानन्द में
श्रीरामकृष्ण पानीहाटी के महोत्सव में राजपथ पर बहुत लोगों से घिरे हुए संकीर्तनदल के बीच में नृत्य कर रहे हैं। दिन का एक बजा है। आज सोमवार, ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी तिथि है। तारीख १८ जून १८८३ ई.।
संकीर्तन के बीच में श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए चारों ओर लोग कतार बाँधकर खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण प्रेम में मतवाले हो नाच रहे हैं। कोई कोई सोच रहे हैं कि क्या श्रीगौरांग फिर प्रकट हुए हैं! चारों ओर हरि-ध्वनि सागर की तरंगों के समान उमड़ रही है। चारों ओर से लोग फूल बरसा रहे हैं और बतासे लुटा रहे हैं।
श्री नवद्वीप गोस्वामी संकीर्तन करते हुए राघव पण्डित के मन्दिर की ओर आ रहे थे कि एकाएक श्रीरामकृष्ण दौड़कर उनसे आ मिले और नाचने लगे।
यह राघव पण्डित का 'चिउड़े का महोत्सव' है। शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रतिवर्ष महोत्सव होता है। इस महोत्सव को पहले दास रघुनाथ ने किया था। उसके बाद राघव पण्डित प्रतिवर्ष करते थे। दास रघुनाथ से नित्यानन्द ने कहा था, "अरे, तू घर से केवल भाग-भागकर आता है, और हमसे छिपाकर प्रेम का स्वाद लेता रहता है! हमें पता तक नहीं लगने देता! आज तुझे दण्ड दूँगा; तू चिउड़े का महोत्सव करके भक्तों की सेवा कर।" श्रीरामकृष्ण प्रायः प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं, आज भी यहाँ राम आदि भक्तों के साथ आनेवाले थे। राम सबेरे मास्टर के साथ कलकत्ते से दक्षिणेश्वर आये। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर वहीं उत्तरवाले बरामदे में उन्होंने प्रसाद पाया। राम कलकत्ते से जिस गाड़ी पर आये थे, उसी पर श्रीरामकृष्ण पानीहाटी आये। राखाल, मास्टर, राम, भवनाथ तथा और भी दो-एक भक्त उनके साथ थे।
गाड़ी मैगजीन रोड से होकर चानक के बड़े रास्ते पर आयी। जाते जाते श्रीरामकृष्ण बालक भक्तों से विनोद करने लगे।
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पानीहाटी के महोत्सव-स्थल पर गाड़ी पहुँचते ही राम आदि भक्त यह देखकर विस्मित हुए कि श्रीरामकृष्ण जो अभी गाड़ी में विनोद कर रहे थे, एकाएक अकेले ही उतरकर बड़े वेग से दौड़ रहे हैं। बहुत ढूँढ़ने पर उन्होंने देखा कि वे नवद्वीप गोस्वामी के संकीर्तन के दल में नृत्य कर रहे हैं और बीच बीच में समाधिस्थ भी हो रहे हैं। समाधि की दशा में कहीं वे गिर न पड़ें, इसलिए नवद्वीप गोस्वामी उन्हें बड़े यत्न से सम्हाल रहे हैं। चारों ओर भक्तगण हरि-ध्वनि कर उनके चरणों पर फूल और बतासे चढ़ा रहे हैं और एक बार उनके दर्शन पाने के लिए धक्कमधक्का कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण अर्धबाह्य दशा में नृत्य कर रहे हैं। फिर बाह्य दशा में आकर वे गाने लगे -
(भावार्थ) - “हरि का नाम लेते ही जिनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग जाती है, वे दोनों भाई आये हैं; जो स्वयं नाचकर जगत् को नचाते हैं, वे दोनों भाई आये हैं जो स्वयं रोकर जगत् को रुलाते हैं, और जो मार खाकर भी प्रेम की याचना करते हैं, वे आये हैं”!
श्रीरामकृष्ण के साथ सब उन्मत्त हो नाच रहे हैं, और अनुभव कर रहे हैं कि गौरांग और निताई हमारे सामने नाच रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे -
(भावार्थ) - “गौरांग के प्रेम के हिलोरों से नवद्वीप डाँवाडोल हो रहा है।”
संकीर्तन की तरंग राघव के मन्दिर की ओर बढ़ रही है। वहाँ परिक्रमा और नृत्य आदि करने के बाद श्रीविग्रह को प्रणाम कर वह तरंगायित जनसंघ गंगातट पर अवस्थित श्रीराधाकृष्ण के मन्दिर की ओर बढ़ रहा है।
संकीर्तनकारों में से कुछ ही लोग श्रीराधाकृष्ण के मन्दिर में घुस पाये हैं। अधिकांश लोग दरवाजे से ही एक दूसरे को ढकेलते हुए झाँक रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण श्रीराधाकृष्ण के आँगन में फिर नाच रहे हैं। कीर्तनानन्द में बिलकुल मस्त हैं! बीच बीच में समाधिस्थ हो रहे हैं और चारों ओर से फूल-बतासे चरणों पर पड़ रहे हैं। आँगन के भीतर बारम्बार हरि-ध्वनि हो रही है। वही ध्वनि सड़क पर आते ही हजारों कण्ठों से उच्चारित होने लगी। गंगा पर नावों से आने-जानेवाले लोग चकित होकर इस सागर-गर्जन के समान उठती हुई ध्वनि को सुनने लगे और वे स्वयं भी ‘हरिबोल’ ‘हरिबोल’ कहने लगे।
पानीहाटी के महोत्सव में एकत्रित हजारों नर-नारी सोच रहे हैं कि इन महापुरुष के भीतर निश्चित ही श्रीगौरांग का आविर्भाव हुआ है। दो-एक आदमी यह विचार कर रहे हैं कि शायद ये ही साक्षात् गौरांग हों।
छोटेसे आँगन में बहुतसे लोग एकत्रित हुए हैं। भक्तगण बड़े यत्न से श्रीरामकृष्ण
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को बाहर लाये।
श्रीरामकृष्ण श्री मणि सेन की बैठक में आकर बैठे। इन्हीं सेन परिवारवालों की ओर से पानीहाटी में श्रीराधाकृष्ण की सेवा होती है। वे ही प्रतिवर्ष महोत्सव का आयोजन करते हैं और श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण देते हैं।
श्रीरामकृष्ण के कुछ विश्राम करने के बाद मणि सेन और उनके गुरुदेव नवद्वीप गोस्वामी ने उनको अलग ले जाकर प्रसाद लाकर भोजन कराया। कुछ देर बाद राम, राखाल, मास्टर, भवनाथ आदि भक्त एक दूसरे कमरे में बिठाये गये। भक्तवत्सल श्रीरामकृष्ण स्वयं खड़े हो आनन्द करते हुए उनको खिला रहे हैं।
(२)
श्रीगौरांग का महाभाव, प्रेम और तीन अवस्थाएँ।
दोपहर का समय है। राखाल, राम आदि भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण मणि सेन की बैठक में विराजमान हैं। नवद्वीप गोस्वामी भोजन करके श्रीरामकृष्ण के पास आ बैठे हैं।
मणि सेन ने श्रीरामकृष्ण को गाड़ी का किराया देना चाहा। श्रीरामकृष्ण बैठक में एक कोच पर बैठे हैं, "और कहते हैं गाड़ी का किराया वे लोग (राम आदि) क्यों लेंगे? वे तो पैसा कमाते हैं।"
अब श्रीरामकृष्ण नवद्वीप गोस्वामी से ईश्वरी प्रसंग करने लगे।
श्रीरामकृष्ण (नवद्वीप से) – भक्ति के परिपक्व होने पर भाव होता है, फिर महाभाव, फिर प्रेम, फिर वस्तु (ईश्वर) का लाभ होता है।
"गौरांग को महाभाव और प्रेम हुआ था।
"इस प्रेम के होने पर मनुष्य जगत् को तो भूल ही जाता है, बल्कि अपना शरीर, जो इतना प्रिय है, उसकी भी सुधि नहीं रहती। गौरांग को यह प्रेम हुआ था। समुद्र को देखते ही यमुना समझकर वे उसमें कूद पड़े!
"जीवों को महाभाव या प्रेम नहीं होता, उनको भाव तक ही होता है। फिर गौरांग को तीन अवस्थाएँ होती थीं।"
नवद्वीप – जी हाँ। अन्तर्दशा, अर्धबाह्य दशा और बाह्य दशा।
श्रीरामकृष्ण – अन्तर्दशा में वे समाधिस्थ रहते थे, अर्धबाह्य दशा में केवल नृत्य कर सकते थे, और बाह्य दशा में नामसंकीर्तन करते थे।
नवद्वीप ने अपने लड़के को लाकर श्रीरामकृष्ण से परिचित करा दिया। वे तरुण हैं – शास्त्र का अध्ययन करते हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।
नवद्वीप – यह घर में शास्त्र पढ़ता है। इस देश में वेद एक प्रकार से अप्राप्य ही थे। मैक्समूलर ने उन्हें छपवाया, इसी से तो लोग अब उनको पढ़ सकते हैं।
२५० श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ जून, १८८३
पाण्डित्य और शास्त्र
श्रीरामकृष्ण – अधिक शास्त्र पढ़ने से और भी हानि होती है।
“शास्त्र का सार जान लेना चाहिए। फिर ग्रन्थ की क्या आवश्यकता है?
“शास्त्र का सार जान लेने पर डुबकी लगानी चाहिए – ईश्वर का लाभ करने के लिए।
“मुझे माँ ने बतला दिया है कि वेदान्त का सार है – ‘ब्रह्म सत्य और जगत् मिथ्या।’ गीता का सार क्या है? दस बार ‘गीता’ शब्द कहने से जो हो वही – अर्थात् त्यागी, त्यागी।
नवद्वीप – ठीक ‘त्यागी’ नहीं बनता, ‘तागी’ होता है। फिर उसका भी अर्थ वही है। ‘तग्’ धातु और ‘घञ्’ प्रत्यय= ताग उस पर ‘इन्’ प्रत्यय लगाने पर ‘तागी’ बनता है। ‘त्यागी’ का अर्थ जो है, ‘तागी’ का भी वही है।
श्रीरामकृष्ण – गीता का सार यही है कि हे जीव, सब त्यागकर भगवान का लाभ करने के लिए साधना करो।
नवद्वीप – त्याग की ओर तो मन नहीं जाता!
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग गोस्वामी हो, तुम्हारे यहाँ देवसेवा होती है, – तुम्हारे संसार-त्याग करने पर काम नहीं चलेगा। ऐसा करने से देवसेवा कौन करेगा? तुम लोग मन से त्याग करना।
“ईश्वर ही ने लोकशिक्षा के लिए तुम लोगों को संसार में रखा है। तुम हजार संकल्प करो, त्याग नहीं कर सकोगे। उन्होंने तुम्हें ऐसी प्रकृति दी है कि तुम्हें संसार का कामकाज करना ही पड़ेगा।
“श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा – ‘युद्ध नहीं करूँगा’ यह तुम क्या कह रहे हो? इच्छा करने ही से तुम युद्ध से निवृत्त न हो सकोगे। तुम्हारी प्रकृति तुमसे युद्ध करायेगी।”
श्रीकृष्ण अर्जुन से बातें कर रहे हैं – यह कहते ही श्रीरामकृष्ण फिर समाधिस्थ हो रहे हैं। बात ही बात में सब अंग स्थिर हो गये। आँखें एकटक हो गयीं। साँस चल रही है कि नहीं – जान नहीं पड़ता।
नवद्वीप गोस्वामी, उनके लड़के और भक्तगण निर्वाक् हो यह दृश्य देख रहे हैं।
कुछ प्रकृतिस्थ हो श्रीरामकृष्ण नवद्वीप से कहते हैं –
“योग और भोग। तुम लोग गोस्वामी वंश के हो, तुम लोगों के लिए दोनों हैं।
“अब केवल प्रार्थना, हार्दिक प्रार्थना करो कि हे ईश्वर, तुम्हारी इस भुवनमोहिनी माया के ऐश्वर्य को मैं नहीं चाहता, – मैं तुम्हें चाहता हूँ।
“ईश्वर तो सब प्राणियों में हैं। फिर भक्त किसे कहते हैं? जो ईश्वर में रहता है, जिसका मन, प्राण, अन्तरात्मा – सब कुछ उसमें लीन हो गया है।”
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अब श्रीरामकृष्ण सहज दशा में आ गये हैं। नवद्वीप से कहते हैं -
"मुझे यह जो अवस्था (समाधि-अवस्था) होती है, इसे कोई कोई रोग कहते हैं। इस पर मेरा कहना यह है कि जिसके चैतन्य से जगत् चैतन्यमय है उसकी चिन्ता कर कोई अचैतन्य कैसे हो सकता है?"
मणि सेन अभ्यागत ब्राह्मणों और वैष्णवों को बिदा कर रहे हैं - उनकी मर्यादा के अनुसार किसी को एक रुपया, किसी को दो रुपये बिदाई देते हैं। श्रीरामकृष्ण को पाँच रुपये देने आये। आप बोले, "मुझे रुपये न लेने चाहिए।" तो भी मणि सेन नहीं मानते। तब श्रीरामकृष्ण ने कहा, "यदि रुपये दोगे तो तुम्हें तुम्हारे गुरु की शपथ है।" मणि सेन इतने पर भी देने आये। तब श्रीरामकृष्ण ने अधीर होकर मास्टर से कहा, "क्यों जी, लेना चाहिए?" मास्टर ने बड़ी आपत्ति करते हुए कहा, "जी नहीं! किसी हालत में न लें!"
मणि सेन के घरवालों ने तब आम और मिठाई खरीदने के नाम पर राखाल के हाथ में रुपये दिए।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - मैंने गुरु की शपथ दी है - मैं अब मुक्त हूँ। राखाल ने रुपये लिए हैं - अब वह जाने!
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ गाड़ी पर बैठे - दक्षिणेश्वर लौट जाएँगे।
निराकार ध्यान और श्रीरामकृष्ण
मार्ग में मोती शील का मन्दिर है। श्रीरामकृष्ण बहुत दिनों से मास्टर से कहते आए हैं कि एक साथ आकर इस मन्दिर की झील को देखेंगे - यह सिखलाने के लिए कि निराकार ध्यान कैसे करना चाहिए।
श्रीरामकृष्ण को खूब सर्दी हुई है, तथापि भक्तों के साथ मन्दिर देखने के लिए गाड़ी से उतरे।
मन्दिर में श्रीगौरांग की पूजा होती है। अभी सन्ध्या होने में कुछ देर है। श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ गौरांग-मूर्ति के सम्मुख भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया।
अब मन्दिर के पूर्व की ओर जो झील है, उसके घाट पर आकर झील का पानी और मछलियों को देख रहे हैं। कोई इन मछलियों की हिंसा नहीं करता। कुछ चारा फेंकने पर बड़ी बड़ी मछलियाँ झुण्ड के झुण्ड सामने आकर खाने लगती हैं - फिर निर्भय होकर आनन्द से पानी में घूमती-फिरती हैं।
श्रीरामकृष्ण मास्टर से कहते हैं, "यह देखो कैसी मछलियाँ हैं! चिदानन्द-सागर में इन मछलियों की तरह आनन्द से विचरण करो।"
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<div align="center">□ □ □</div>परिच्छेद ४३
परिच्छेद ४३
बलराम के मकान पर
आत्मदर्शन का उपाय। नित्यलीला-योग
श्रीरामकृष्ण ने आज कलकत्ते में बलराम के मकान पर शुभागमन किया है। मास्टर पास बैठे हैं, राखाल भी हैं। श्रीरामकृष्ण भावमग्न हुए हैं। आज ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी, सोमवार, २५ जून १८८३, ई.। समय दिन के पाँच बजे का होगा।
श्रीरामकृष्ण (भाव के आवेश में) – देखो, अन्तर से पुकारने पर अपने स्वरूप को देखा जाता है, परन्तु विषयभोग की वासना जितनी रहती है, उतनी ही बाधा होती है।
मास्टर – जी, आप जैसा कहते हैं, डुबकी लगाना पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण (आनन्दित होकर) – बहुत ठीक।
सभी चुप हैं; श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – देखो सभी को आत्मदर्शन हो सकता है।
मास्टर – जी, परन्तु ईश्वर कर्ता हैं; वे अपनी इच्छानुसार भिन्न भिन्न प्रकार से लीला कर रहे हैं। किसी को चैतन्य दे रहे हैं, किसी को अज्ञानी बनाकर रखा है।
श्रीरामकृष्ण – नहीं, उनसे व्याकुल होकर प्रार्थना करनी पड़ती है। आन्तरिक होने पर वे प्रार्थना अवश्य सुनेंगे।
एक भक्त – जी हाँ, 'मैं' है, इसलिए प्रार्थना करनी होगी।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – लीला के सहारे नित्य में जाना होता है – जिस प्रकार सीढ़ी पकड़-पकड़कर छत पर चढ़ना होता है। नित्यदर्शन के बाद नित्य से लीला में आकर रहना होता है, भक्ति-भक्त लेकर। यही मेरा परिपक्व मत है।
“उनके अनेक रूप, अनेक लीलाएँ हैं। ईश्वर-लीला, देव-लीला, नर-लीला, जगत्-लीला। वे मानव बनकर, अवतार होकर युग युग में आते हैं – प्रेम-भक्ति सिखाने के लिए। देखो न चैतन्यदेव को। अवतार द्वारा ही उनके प्रेम तथा भक्ति का आस्वादन किया जा सकता है। उनकी अनन्त लीलाएँ हैं – परन्तु मुझे आवश्यकता है प्रेम तथा भक्ति की। मुझे तो सिर्फ दूध चाहिए। गाय के स्तनों से ही दूध आता है। अवतार गाय के स्तन हैं।”
२५ जून, १८८३ | परिच्छेद ४३ | २५३
२५ जून, १८८३ | परिच्छेद ४३ | २५३
क्या श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं कि वे अवतीर्ण हुए हैं, उनका दर्शन करने से ही ईश्वर का दर्शन होता है? चैतन्यदेव का उल्लेख कर क्या श्रीरामकृष्ण अपनी ओर संकेत कर रहे हैं?
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परिच्छेद ४४
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परिच्छेद ४४
दक्षिणेश्वर में
जे. एस. मिल और श्रीरामकृष्ण। मानव की सीमाबद्धता
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में शिवमन्दिर की सीढ़ी पर बैठे हैं। ज्येष्ठ मास, १८८३, ई. (जून, १८८३)। खूब गर्मी पड़ रही है। थोड़ी देर बाद सन्ध्या होगी। बर्फ आदि लेकर मास्टर आए और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर उनके चरणों के पास शिवमन्दिर की सीढ़ी पर बैठे।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – मणि मल्लिक की नातिन का स्वामी आया था। उसने किसी पुस्तक* में पढ़ा है, ईश्वर वैसे ज्ञानी, सर्वज्ञ नहीं जान पड़ते। नहीं तो इतना दुःख क्यों? और यह जो जीव की मौत होती है, उन्हें एक बार में मार डालना ही अच्छा होता, धीरे धीरे अनेक कष्ट देकर मारना क्यों? जिसने पुस्तक लिखी है, उसने कहा है कि यदि वह होता तो इससे बढ़िया सृष्टि कर सकता था!
मास्टर विस्मित होकर श्रीरामकृष्ण की बातें सुन रहे हैं और चुप बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं –
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – उन्हें क्या समझा जा सकता है जी? मैं भी कभी उन्हें अच्छा मानता हूँ और कभी बुरा। अपनी महामाया के भीतर हमें रखा है। कभी वह होश में लाते हैं, तो कभी बेहोश कर देते हैं। एक बार अज्ञान दूर हो जाता है, दूसरी बार फिर आकर घेर लेता है। तालाब का जल काई से ढँका हुआ है। पत्थर फेंकने पर कुछ जल दिखायी देता है, फिर थोड़ी देर बाद काई नाचते नाचते आकर उस जल को भी ढँक लेती है।
“जब तक देहबुद्धि है, तभी तक सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, रोग-शोक हैं। ये सब देह के हैं, आत्मा के नहीं। देह की मृत्यु के बाद सम्भव है वे अच्छे स्थान पर ले जायें – जिस प्रकार प्रसव-वेदना के बाद सन्तान की प्राप्ति! आत्मज्ञान होने पर सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु स्वप्न जैसे लगते हैं।
“हम क्या समझेंगे? क्या एक सेर के लोटे में दस सेर दूध आ सकता है? नमक
* John Stuart Mill's Autobiography.
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जून, १८८३ परिच्छेद ४४ २५५
का पुतला समुद्र नापने जाकर फिर खबर नहीं देता। गलकर उसी में मिल जाता है।”
सन्ध्या हुई, मन्दिरों में आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठकर जगज्जननी का चिन्तन कर रहे हैं। राखाल, लाटू, रामलाल, किशोरी गुप्त आदि भक्तगण उपस्थित हैं। मास्टर आज रात को ठहरेंगे। कमरे के उत्तर की ओर एक छोटे बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक भक्त के साथ एकान्त में बातें कर रहे हैं। कह रहे हैं, “भोर में तथा उत्तर-रात्रि में ध्यान करना अच्छा है और प्रतिदिन सन्ध्या के बाद।” किस प्रकार ध्यान करना चाहिए, साकार ध्यान, अरूप ध्यान, यह सब बता रहे हैं।
थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे में बैठ गए। रात के नौ बजे का समय होगा। मास्टर पास बैठे हैं, राखाल आदि बीच बीच में कमरे के भीतर आ-जा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – देखो, यहाँ पर जो लोग आएँगे, उन सभी का सन्देह मिट जाएगा; क्या कहते हो?
मास्टर – जी हाँ।
उसी समय गंगा में काफी दूरी पर माँझी अपनी नाव खेता हुआ गाना गा रहा था। गीत की वह ध्वनि मधुर अनाहत ध्वनि की तरह अनन्त आकाश के बीच में से होकर मानो गंगा के विशाल वक्ष को स्पर्श करती हुई श्रीरामकृष्ण के कानों में प्रविष्ट हुई। श्रीरामकृष्ण उसी समय भावाविष्ट हो गए! सारे शरीर के रोंगटे खड़े हो उठे। श्रीरामकृष्ण मास्टर का हाथ पकड़कर कह रहे हैं, “देखो, देखो, मुझे रोमांच हो रहा है। मेरे शरीर पर हाथ रखकर देखो।” प्रेम से आविष्ट उनके उस रोमांचपूर्ण शरीर को छूकर वे विस्मित हो गये। 'पुलकपूरित अंग!' उपनिषद् में कहा गया है कि वे विश्व में आकाश में 'ओतप्रोत' होकर विद्यमान हैं। क्या वे ही शब्द के रूप में श्रीरामकृष्ण को स्पर्श कर रहे हैं? क्या यही शब्दब्रह्म है?*
थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – जो लोग यहाँ पर आते हैं, उनके शुभ संस्कार हैं; क्या कहते हो?
मास्टर – जी, हाँ।
श्रीरामकृष्ण – अधर के वैसे संस्कार थे।
मास्टर – इसमें क्या कहना है!
श्रीरामकृष्ण – सरल होने पर ईश्वर शीघ्र प्राप्त होते हैं। फिर दो पथ हैं, – सत् और असत्, सत् पथ से जाना चाहिए।
मास्टर – जी हाँ, धागे में यदि रेशा निकला हो तो वह सुई के भीतर नहीं जा
* एतस्मिन् नु खलु अक्षरे गार्गि आकाश ओतश्च प्रोतश्च। – बृहदारण्यक उपनिषद्, ३-८-११
शब्दः खे पौरुषं नृषु। – गीता, ७।८
२५६ श्रीरामकृष्णवचनामृत जून, १८८३
सकता।
श्रीरामकृष्ण – कौर के साथ मुँह में केश चले जाने पर सब का सब थूककर फेंक देना पड़ता है।
मास्टर – परन्तु जैसे आप कहते हैं, जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है, असत्-संग उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता; प्रखर अग्नि में केले का पेड तक जल जाता है!
☐ ☐ ☐
परिच्छेद ४५
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परिच्छेद ४५
अधर के मकान पर
श्रीरामकृष्ण कलकत्ते के बेनेटोला में अधर के मकान पर पधारे हैं। आषाढ़ शुक्ला दशमी, १४ जुलाई १८८३, शनिवार। अधर श्रीरामकृष्ण को राजनारायण का चण्डी-संगीत सुनाएँगे। राखाल, मास्टर आदि साथ हैं। मन्दिर के बरामदे में गाना हो रहा है। राजनारायण गाने लगे –
(भावार्थ) – “अभय पद में प्राणों को सौंप दिया है, फिर मुझे यम का क्या भय है? अपने सिर की शिखा में कालीनाम का महामन्त्र बाँध लिया है। मैं इस संसाररूपी बाजार में अपने शरीर को बेचकर श्रीदुर्गानाम खरीद लाया हूँ। काली-नामरूपी कल्पतरु को हृदय में बो दिया है। अब यम के आने पर हृदय खोलकर दिखाऊँगा, इसलिए बैठा हूँ। देह में छः दुर्जन हैं, उन्हें भगा दिया है। मैं जय दुर्गा, श्रीदुर्गा कहकर रवाना होने के लिए बैठा हूँ।”
श्रीरामकृष्ण थोड़ा सुनकर भावाविष्ट हो खड़े हो गए और मण्डली के साथ सम्मिलित होकर गाने लगे।
श्रीरामकृष्ण पद जोड़ रहे हैं – “ओ माँ, रखो माँ!” पद जोड़ते जोड़ते एकदम समाधिस्थ! बाह्यज्ञानशून्य, निस्पन्द होकर खड़े हैं। गायक फिर गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “यह किसकी कामिनी रणांगण को आलोकित कर रही है? मानो इसकी देहकान्ति के सामने जलधर बादल हार मानता है और दन्तपंक्ति मानो बिजली की चमक है!”
श्रीरामकृष्ण फिर समाधिस्थ हुए।
गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण अधर के बैठकघर में जाकर भक्तों के साथ बैठ गए। ईश्वरीय चर्चा हो रही है। इस प्रकार भी वार्तालाप हो रहा है कि कोई कोई भक्त मानो ‘अन्तःसार फल्गु नदी’ है, ऊपर भाव का कोई प्रकाश नहीं!
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परिच्छेद ४६
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परिच्छेद ४६
भक्तों के साथ
(१)
कलकत्ते की राह पर
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर से गाड़ी पर कलकत्ते की ओर जा रहे हैं। साथ में रामलाल और दो-एक भक्त हैं। फाटक से निकलते ही आपने देखा कि मणि हाथ में चार फजली आम लिए हुए पैदल आ रहे हैं। मणि को देखकर गाड़ी को रोकने के लिए कहा। मणि ने गाड़ी पर सिर टेककर प्रणाम किया।
आज शनिवार, २१ जुलाई १८८३ ई., आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा है। दिन के चार बजे हैं। श्रीरामकृष्ण अधर के मकान पर जाएँगे, उसके बाद यदु मल्लिक के घर और फिर खेलात घोष के यहाँ जाएँगे।
श्रीरामकृष्ण (मणि से हँसते हुए) – तुम भी आओ न, हम अधर के यहाँ जा रहे हैं।
मणि – 'जैसी आपकी आज्ञा' कहकर गाड़ी पर बैठ गये।
मणि – अंग्रेजी पढ़े-लिखे हैं, इसी से संस्कार नहीं मानते थे पर कुछ दिन हुए श्रीरामकृष्ण के पास यह स्वीकार कर गए थे कि अधर के संस्कार थे, इसी से वे उनकी इतनी भक्ति करते हैं। घर लौटकर विचार करने पर मास्टर ने देखा कि संस्कार के बारे में अभी तक उनको पूर्ण विश्वास नहीं हुआ। यही कहने के लिए आज श्रीरामकृष्ण से मिलने आए हैं। श्रीरामकृष्ण बातें करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, अधर को तुम कैसा समझते हो?
मणि – उनमें बहुत अनुराग है।
श्रीरामकृष्ण – अधर भी तुम्हारी बड़ी प्रशंसा करता है।
मणि – कुछ देर तक चुप रहे, फिर पूर्वजन्म के संस्कार की बात उठायी।
ईश्वर के कार्य समझना असम्भव है
मणि – मुझे 'पूर्वजन्म' और 'संस्कार' आदि पर उतना विश्वास नहीं है; क्या इससे मेरी भक्ति में कोई बाधा आएगी?
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२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २५९
२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २५९
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर की सृष्टि में सब कुछ हो सकता है – यह विश्वास ही पर्याप्त है। मैं जो सोचता हूँ वही सत्य है, और सब का मत मिथ्या है – ऐसा भाव मन में न आने देना। बाकी ईश्वर ही समझा देंगे।
“ईश्वर के कार्यों को मनुष्य क्या समझेगा? उनके कार्य अनन्त हैं! इसलिए मैं इनको समझने का थोड़ा भी प्रयत्न नहीं करता। मैंने सुन रखा है कि उनकी सृष्टि में सब कुछ हो सकता है। इसीलिए मैं इन सब बातों की चिन्ता न कर केवल ईश्वर ही की चिन्ता करता हूँ। हनुमान से पूछा गया था, आज कौनसी तिथि है; हनुमान ने कहा था, मैं तिथि, नक्षत्र आदि नहीं जानता, केवल एक राम की चिन्ता करता हूँ।
“ईश्वर के कार्य क्या समझ में आ सकते हैं? वे तो पास ही हैं – पर यह समझना कितना कठिन है! बलराम कृष्ण को भगवान् नहीं जानते थे।”
मणि – जी हाँ! जैसे आपने भीष्मदेव की बात कही थी।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, हाँ! क्या कहा था, कहो तो!
मणि – भीष्मदेव शरशय्या पर पड़े रो रहे थे। पाण्डवों ने श्रीकृष्ण से कहा, ‘भाई, यह कैसा आश्चर्य है! पितामह इतने ज्ञानी होकर भी मृत्यु का विचार कर रो रहे हैं!’ श्रीकृष्ण ने कहा, ‘उनसे पूछो न, क्यों रोते हैं।’ भीष्मदेव बोले, ‘मैं यह विचार कर रोता हूँ कि भगवान् के कार्य को कुछ भी न समझ सका। हे कृष्ण, तुम इन पाण्डवों के साथ साथ फिरते हो, पग पग पर इनकी रक्षा करते हो, फिर भी इनकी विपद् का अन्त नहीं!’
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर ने अपनी माया से सब कुछ ढक रखा है – कुछ जानने नहीं देते। कामिनी और कांचन ही माया है। इस माया को हटाकर जो ईश्वर के दर्शन करता है, वही उन्हें देख पाता है। एक आदमी को समझाते समय मुझे ईश्वर ने एक अद्भुत दृश्य दिखलाया। अचानक सामने देखा उस देश का एक तालाब, और एक आदमी ने काई हटाकर उससे जल पी लिया। जल स्फटिक की तरह साफ था। इससे यह सूचित हुआ कि वह सच्चिदानन्द मायारूपी काई से ढका हुआ है, – जो काई हटाकर जल पीता है, वही पाता है।
“सुनो, तुमसे बड़ी गूढ़ बातें कहता हूँ। झाउओ के तले बैठे हुए देखा कि चोर दरवाजे का-सा एक दरवाजा सामने है। कोठरी के अन्दर क्या है, यह मुझे दिखायी नहीं पड़ा। मैं एक नहेरनी से छेद करने लगा, पर कर न सका। मैं छेदता रहा, पर वह बार बार भर जाता था। परन्तु एक बार इतना बड़ा छेद बना!”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण चुप रहे। फिर बोलने लगे – “ये सब बड़ी ऊँची बातें हैं। यह देखो, कोई मानो मेरा मुँह दबा देता है।
“योनि में ईश्वर का वास प्रत्यक्ष देखा था! – कुत्ता और कुतिया के समागम के समय देखा था।
३६० श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ जुलाई, १८८३
“ईश्वर के चैतन्य से जगत् चैतन्यमय है। कभी कभी देखता हूँ कि छोटी छोटी मछलियों में वही चैतन्य खेल रहा है।”
गाड़ी शोभाबाजार के चौराहे पर से दरमाहट्टा के निकट पहुँची। श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं –
“कभी कभी देखता हूँ कि वर्षा में जिस प्रकार पृथ्वी जल से ओतप्रोत रहती है, उसी प्रकार इस चैतन्य से जगत् ओतप्रोत है।
“इतना सब दिखलायी तो पड़ता है, पर मुझे अभिमान नहीं होता।”
मणि (सहास्य) – आपका अभिमान कैसा!
श्रीरामकृष्ण – शपथ खाकर कहता हूँ, थोड़ा भी अभिमान नहीं होता।
मणि – ग्रीस देश में सुकरात नाम का एक आदमी था। यह दैववाणी हुई थी कि सब लोगों में वही ज्ञानी है। उसे आश्चर्य हुआ। बहुत देर तक निर्जन में चिन्ता करने पर उसे भेद मालूम हुआ। तब उसने अपने मित्रों से कहा, ‘केवल मुझे ही मालूम हुआ है कि मैं कुछ नहीं जानता; पर दूसरे सब लोग कहते हैं कि हमें खूब ज्ञान हुआ है। परन्तु वास्तव में सभी अज्ञान हैं।’
श्रीरामकृष्ण – मैं कभी कभी सोचता हूँ कि मैं जानता ही क्या हूँ कि इतने लोग यहाँ आते हैं! वैष्णवचरण बड़ा पण्डित था। वह कहता था कि तुम जो कुछ कहते हो वह सब शास्त्रों में पाया जाता है। तो फिर तुम्हारे पास क्यों आता हूँ? तुम्हारे मुँह से वही सब सुनने के लिए।
मणि – आपकी सब बातें शास्त्र से मिलती हैं। नवद्वीप गोस्वामी भी उस दिन पानीहाटी में यही बात कहते थे। आपने कहा कि ‘गीता’ ‘गीता’ बार बार कहने से ‘त्यागी’ ‘त्यागी’ हो जाता है। वास्तव में ‘तागी’ होता है, परन्तु नवद्वीप गोस्वामी ने कहा कि ‘तागी’ और ‘त्यागी’ दोनों का एक ही अर्थ है; ‘तग्’ एक धातु है, उसी से ‘तागी’ बनता है।
श्रीरामकृष्ण – मेरे साथ क्या दूसरों का कुछ मिलता-जुलता है? किसी पण्डित या साधु का?
मणि – आपको ईश्वर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया है। और दूसरों को मशीन में डालकर। – जैसे नियम के अनुसार सृष्टि होती है।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य, रामलाल आदि से) – अरे, कहता क्या है!
श्रीरामकृष्ण की हँसी रुकती ही नहीं। अन्त में उन्होंने कहा, “शपथ खाता हूँ, मुझे तनिक भी अभिमान नहीं होता।”
मणि – विद्या से एक लाभ होता है। उससे यह मालूम हो जाता है कि मैं कुछ नहीं जानता, और मैं कुछ नहीं हूँ।
श्रीरामकृष्ण – ठीक है, ठीक है। मैं कुछ नहीं हूँ मैं कुछ नहीं हूँ! अच्छा, अंग्रेजी
२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २६१
२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २६१
ज्योतिष पर तुम्हें विश्वास है?
मणि – उन लोगों के नियम के अनुसार नये आविष्कार हो सकते हैं; यूरेनस (Uranus) ग्रह की अनियमित चाल देखकर उन्होंने दूरबीन से पता लगाकर देखा कि एक नया ग्रह (Neptune) चमक रहा है। फिर उससे ग्रहण की गणना भी हो सकती है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, सो तो होती है।
गाड़ी चल रही है – प्रायः अधर के मकान के पास आ गयी है। श्रीरामकृष्ण मणि से कहते हैं, “सत्य में रहना, तभी ईश्वर मिलेंगे।”
मणि – एक और बात आपने नवद्वीप गोस्वामी से कही थी – 'हे ईश्वर, मैं तुम्हीं को चाहता हूँ। देखना, अपनी भुवनमोहिनी माया के ऐश्वर्य से मुझे मुग्ध न करना। मैं तुम्हीं को चाहता हूँ।'
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह दिल से कहना होगा।
(२)
अधर सेन के मकान पर, कीर्तनानन्द में
श्रीरामकृष्ण अधर के मकान पर आए हैं। बैठकखाने में रामलाल, मास्टर, अधर तथा कुछ और भक्त आपके पास बैठे हुए हैं। मुहल्ले के दो-चार लोग श्रीरामकृष्ण को देखने आए हैं। राखाल के पिता कलकत्ते में रहते हैं – राखाल वहीं हैं।
श्रीरामकृष्ण (अधर के प्रति) – क्यों, राखाल को खबर नहीं दी?
अधर – जी, उन्हें खबर दी है।
राखाल के लिए श्रीरामकृष्ण को व्यग्र देखकर अधर ने राखाल को लिवा लाने के लिए एक आदमी के साथ अपनी गाड़ी भिजवा दी।
अधर श्रीरामकृष्ण के पास आ बैठे। आप के दर्शन के लिए अधर आज व्याकुल हो रहे थे। आज आपके यहाँ आने के बारे में पहले से कुछ निश्चित नहीं था। ईश्वर की इच्छा से ही आप आ पहुँचे हैं।
अधर – बहुत दिन हुए आप नहीं आए थे। मैंने आज आपको पुकारा था, – यहाँ तक कि आँखों से आँसू भी गिरे थे।
श्रीरामकृष्ण (प्रसन्न होकर हँसते हुए) – क्या कहते हो!
शाम हुई। बैठकखाने में बत्ती जलायी गयी। श्रीरामकृष्ण ने हाथ जोड़कर जगज्जननी को प्रणाम कर मन ही मन शायद मूलमन्त्र का जाप किया। अब मधुर स्वर से नाम-उच्चारण कर रहे हैं – 'गोविन्द! गोविन्द! सच्चिदानन्द! हरि बोल! हरि बोल!' आप इतना मधुर नाम-उच्चारण कर रहे हैं कि मानो मधु बरस रहा है! भक्तगण निर्वाक् होकर उस नामसुधा का पान कर रहे हैं।
२६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ जुलाई, १८८३
रामलाल गाना गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “हे माँ हरमोहिनी, तूने संसार को भुलावे में डाल रखा है। मूलाधार महाकमल में तू वीणावादन करती हुई चित्तविनोदन करती है। महामन्त्र का अवलम्बन कर तू शरीररूपी यन्त्र के सुषुम्नादि तीन तारों में तीन गुणों के अनुसार तीन ग्रामों में संचरण करती है। मूलाधारचक्र में तू भैरव राग के रूप में अवस्थित है; स्वाधिष्ठानचक्र के षड्दल कमल में तू श्री राग तथा मणिपूरचक्र में मल्हार राग है। तू वसन्त राग के रूप में हृदयस्थ अनाहतचक्र में प्रकाशित होती है। तू विशुद्धचक्र में हिण्डोल तथा आज्ञाचक्र में कर्णाटक राग है। तान-मान-लय-सुर के सहित तू मन्द्र-मध्य-तार इन तीन सप्तकों का भेदन करती है। हे महामाया, तूने मोहपाश के द्वारा सब को अनायास बाँध लिया है। तत्त्वाकाश में तू मानो स्थिर सौदामिनी की तरह विराजमान है। 'नन्दकुमार' कहता है कि तेरे तत्त्व का निश्चय नहीं किया जा सकता। तीन गुणों के द्वारा तूने जीव की दृष्टि को आच्छादित कर रखा है।”
रामलाल ने फिर गाया –
(भावार्थ) – “हे भवानी, मैंने तुम्हारा भयहर नाम सुना है, इसीलिए तो अब मैंने तुम पर अपना भार सौंप दिया है। अब तुम मुझे तारो या न तारो! माँ, तुम ब्रह्माण्डजननी हो, ब्रह्माण्डव्यापिनी हो। तुम काली हो या राधिका – यह कौन जाने! हे जननी, तुम घट घट में विराजमान हो। मूलाधारचक्र के चतुर्दल कमल में तुम कुलकुण्डलिनी के रूप में विद्यमान हो। तुम्हीं सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठती हुई स्वाधिष्ठानचक्र के षड्दल तथा मणिपूरचक्र के दशदल कमल में पहुँचती हो। हे कमलकामिनी, तुम ऊर्ध्वोर्ध्व कमलों में निवास करती हो। हृदयस्थित अनाहतचक्र के द्वादशदल कमल को अपने पादपद्म के द्वारा प्रस्फुटित कर तुम हृदय के अज्ञानतिमिर का विनाश करती हो। इसके ऊपर कण्ठस्थित विशुद्धचक्र में धूम्रवर्ण षोडशदल कमल है। इस कमल के मध्यभाग में जो आकाश है, वह यदि अवरुद्ध हो जाय तो सर्वत्र आकाश ही रह जाता है। इसके ऊपर ललाट में अवस्थित आज्ञाचक्र के द्विदल कमल में पहुँचकर मन आबद्ध हो जाता है – वह वहीं रहकर मजा देखना चाहता है, और ऊपर नहीं उठना चाहता। इससे ऊपर मस्तक में सहस्रारचक्र है। वहाँ अत्यन्त मनोहर सहस्रदल कमल है, जिसमें परमशिव स्वयं विराजमान हैं। हे शिवानी, तुम वहीं शिव के निकट जा विराजो! हे माँ, तुम आद्याशक्ति हो। योगी तथा मुनिगण तुम्हारा नगेन्द्रनन्दिनी उमा के रूप में ध्यान करते हैं। तुम शिव की शक्ति हो। तुम मेरी वासनाओं का हरण करो ताकि मुझे फिर इस भवसागर में पतित न होना पड़े। माँ, तुम्हीं पंचतत्त्व हो, फिर तुम तत्त्वों के अतीत हो। तुम्हें कौन जान सकता है! हे माँ, संसार में भक्तों के हेतु तुम साकार बनी हो, परन्तु पंचेन्द्रियाँ पंचतत्त्व में विलीन हो जाने पर तुम्हारे निराकार स्वरूप का ही अनुभव होता है।”