श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२२ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३१ १९३
२२ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३१ १९३
पुकारते हैं, कितना प्यार करते है, तुम लोग इसी भाव को लो, मूर्ति को न भी मानो तो कोई बात नहीं है।
ब्राह्मभक्त – वैराग्य कैसे होता है? और सभी को क्यों नहीं होता?
श्रीरामकृष्ण – भोग की शान्ति हुए बिना वैराग्य नहीं होता। छोटे बच्चे को खाना और खिलौना देकर अच्छी तरह से भुलाया जा सकता है, परन्तु जब खाना हो गया और खिलौने के साथ खेल भी समाप्त हो गया तब वह कहता है, 'माँ के पास जाऊँगा।' माँ के पास न ले जाने पर खिलौना पटक देता है और चिल्लाकर रोता है।
सच्चिदानन्द ही गुरु है – ईश्वरलाभ के बाद सन्ध्यादि कर्मों का त्याग
ब्राह्मभक्तगण गुरुवाद के विरोधी हैं। इसीलिए ब्राह्मभक्त इस सम्बन्ध में चर्चा कर रहे हैं।
ब्राह्मभक्त – महाराज, गुरु न होने पर क्या ज्ञान न होगा?
श्रीरामकृष्ण – सच्चिदानन्द ही गुरु हैं। यदि कोई मनुष्य गुरु के रूप में तुम्हारा चैतन्य जागृत कर दे तो जानो कि सच्चिदानन्द ने ही उस रूप को धारण किया है। गुरु मानो सखा हैं। हाथ पकड़कर ले जाते हैं। भगवान् का दर्शन होने पर फिर गुरु-शिष्य का ज्ञान नहीं रह जाता। 'वह बड़ा कठिन स्थान है, वहाँ पर गुरु-शिष्यों में साक्षात्कार नहीं होता।' इसीलिए जनक ने शुकदेव से कहा था, 'यदि ब्रह्मज्ञान चाहते हो तो पहले दक्षिणा दो;' क्योंकि ब्रह्मज्ञान हो जाने पर गुरु-शिष्यों में भेदबुद्धि नहीं रहेगी। जब तक ईश्वर का दर्शन नहीं होता, तभी तक गुरु-शिष्य का सम्बन्ध रहता है।
थोड़ी देर में सन्ध्या हुई। ब्राह्मभक्तों में से कोई कोई श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “शायद अब आपको सन्ध्या करनी होगी।”
श्रीरामकृष्ण – नहीं, ऐसा कुछ नहीं। यह सब पहले-पहल एक एक बार कर लेना पड़ता है। उसके बाद फिर अर्घ्यपात्र या नियम आदि की आवश्यकता नहीं रहती।
(२)
श्रीरामकृष्ण तथा आचार्य बेचाराम; वेदान्त और ब्रह्मतत्त्व के प्रसंग में
सन्ध्या के बाद आदि-समाज के आचार्य श्री बेचाराम ने वेदी पर बैठकर उपासना की। बीच बीच में ब्राह्मसंगीत और उपनिषद् का पाठ होने लगा।
उपासना के बाद श्रीरामकृष्ण के साथ बैठकर आचार्यजी अनेक प्रकार के वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, निराकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है। आपका क्या मत है?
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
१९४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ अप्रैल, १८८३
आचार्य – जी, निराकार मानो electric current (बिजली का प्रवाह) है; आँखों से देखा नहीं जाता, परन्तु अनुभव किया जाता है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, दोनों ही सत्य हैं। साकार-निराकार दोनों सत्य हैं। केवल निराकार कहना कैसा है जानते हो? जैसे शहनाई में सात छेद रहते हुए भी एक व्यक्ति केवल ‘पों’ करता रहता है, परन्तु दूसरे को देखो, कितनी ही रागरागिनियाँ बजाता है। उसी प्रकार देखो, साकारवादी ईश्वर का कितने भावों से आस्वाद लेता है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर – अनेक भावों से।
“असली बात क्या है जानते हो? किसी भी प्रकार से अमृत के कुण्ड* में गिरना है। चाहे स्तव करके गिरो अथवा कोई धक्का दे दे और तुम जाकर कुण्ड में गिर पड़ो। परिणाम एक ही होगा। दोनों ही अमर होंगे।
“ब्राह्मों के लिए जल और बरफकी उपमा ठीक है। सच्चिदानन्द मानो अनन्त जलराशि हैं। महासागर का जल ठण्डे देश में स्थान स्थान पर जिस प्रकार बरफ का आकार धारण कर लेता है, उसी प्रकार भक्तिरूपी ठण्ड से वे सच्चिदानन्द भक्त के लिए साकार रूप धारण करते हैं। ऋषियों ने उस अतीन्द्रिय, चिन्मय रूप का दर्शन किया था और उनके साथ वार्तालाप किया था। भक्त के प्रेम के शरीर – भागवती तनु † द्वारा इस चिन्मय रूप का दर्शन होता है।
“फिर है ब्रह्म ‘अवाङ्मनसगोचरम्’ ज्ञानरूपी सूर्य के ताप से साकार बरफ गल जाती है; ब्रह्मज्ञान के बाद, निर्विकल्प समाधि के बाद फिर वही अनन्त, वाक्य-मन के अतीत, अरूप, निराकार ब्रह्म।
“उसका स्वरूप मुख से नहीं कहा जाता, चुप हो जाना पड़ता है। मुख से कहकर अनन्त को कौन समझाएगा? पक्षी जितना ही ऊपर उठता है, उसके ऊपर और भी है। आप क्या कहते हैं?”
आचार्य – जी हाँ, वेदान्त में इसी प्रकार की बातें हैं।
श्रीरामकृष्ण – नमक का पुतला समुद्र नापने गया था। लौटकर फिर उसने खबर न दी। एक मत में है, शुकदेव आदि ने दर्शन-स्पर्शन किया था, डुबकी नहीं लगायी थी।
“मैंने विद्यासागर से कहा था, ‘सब चीजें उच्छिष्ट हो गयी हैं, परन्तु ब्रह्म उच्छिष्ट
* अमृतकुण्ड :- आनन्दरूपम् अमृतं यद् विभाति। ब्रह्म एव इदम् अमृतम्, पुरस्ताद् ब्रह्म, पश्चाद् ब्रह्म, दक्षिणतश्चोत्तरेण, अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्म। – मुण्डक उपनिषद् २। २। ११
† नारद ने कहा था – “मुझे शुद्धा, सर्वमयी, भागवती तनु प्राप्त हो गयी।”
प्रयुज्यमाने मयि तां शुद्धां भागवतीं तनुम्।
आरब्धकर्मनिर्वाणो न्यपतत् पांचभौतिकः॥ – श्रीमद्भागवत १। ६। २९ ·
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
.२२ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३१ १९५
नहीं हुआ।* अर्थात् ब्रह्म क्या है, कोई मुँह से कह नहीं सका। मुख से बोलने से ही चीज उच्छिष्ट हो जाती है।' विद्यासागर विद्वान् हैं, यह सुनकर बहुत खुश हुए।
“सुना है, केदार के उस तरफ बरफ से ढका पहाड़ है। अधिक ऊँचाई पर उठने से फिर लौटना नहीं होता। जो लोग यह जानने के लिए गए है कि अधिक ऊँचाई पर क्या है तथा वहाँ जाने पर कैसी स्थिति होती है, उन्होने फिर लौटकर खबर नहीं दी।
उठने से फिर लौटना नहीं होता। जो लोग यह जानने के लिए गए है कि अधिक ऊँचाई पर क्या है तथा वहाँ जाने पर कैसी स्थिति होती है, उन्होने फिर लौटकर खबर नहीं दी।
“उनका दर्शन होने पर मनुष्य आनन्द से विह्वल हो जाता है, चुप हो जाता है। खबर कौन देगा? समझाएगा कौन?
“सात फाटकों से परे राजा है। प्रत्येक फाटक पर एक एक महा ऐश्वर्यवान पुरुष बैठे है। प्रत्येक फाटक में शिष्य पूछ रहा है, ‘क्या यही राजा है?’ गुरु भी कह रहे हैं नहीं;’ नेति नेति। सातवें फाटक पर जाकर जो कुछ देखा, एकदम अवाक् रह गए! आनन्द से विह्वल हो गए। फिर यह पूछना न पडा कि क्या यही राजा है? देखते ही सब सन्देह मिट गये।†
आचार्य – जी हाँ, वेदान्त में इसी प्रकार सब लिखा है।
•श्रीरामकृष्ण – जब वे सृष्टि, स्थिति, प्रलय करते हैं, तब हम उन्हें सगुण ब्रह्म, आद्याशक्ति कहते हैं। जब वे तीनों गुणों से अतीत हैं, तब उन्हें निर्गुण ब्रह्म, वाक्य-मन के अतीत परब्रह्म कहा जाता है।
“मनुष्य उनकी माया में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है। इस बात को भूल जाता है कि वह अपने पिता के अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी है। उनकी माया त्रिगुणमयी है। ये तीनों ही गुण डाकू हैं। सब कुछ हर लेते हैं, हमारे स्वरूप को भुला देते हैं। सत्त्व, रज, तम तीन गुण हैं। इनमें से केवल सत्त्वगुण ही ईश्वर का रास्ता बताता है; परन्तु ईश्वर के पास सत्त्वगुण भी नहीं ले जा सकता।
“एक धनी जंगल के बीच में से जा रहा था। ऐसे समय तीन डाकुओं ने आकर उसे घेर लिया और उसका सब कुछ छीन लिया। सब कुछ छीनकर एक डाकू ने कहा, ‘अब इसे रखकर क्या करोगे! इसे मार डालो।’ ऐसा कहकर वह उसे काटने गया। दूसरा डाकू बोला, ‘जान से मत मारो; हाथ-पैर बाँधकर इसे यहीं पर छोड दिया जाय, तो फिर यह पुलिस को खबर नहीं दे सकेगा।’ यह कहकर उसे बाँधकर डाकू लोग वहीं छोड़कर चले
* अचिन्त्यम् अव्यपदेश्यम् अद्वैतम्। – माण्डूक्य उपनिषद्, ७
† यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहं। – तैत्तिरीय उपनिषद् २। ९। १
१९६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ अप्रैल, १८८३
गए।
“थोड़ी देर के बाद तीसरा डाकू लौट आया। आकर बोला, 'खेद है; तुमको बहुत कष्ट हुआ? मैं तुम्हारा बन्धन खोले देता हूँ।' बन्धन खोलने के बाद उस व्यक्ति को साथ लेकर डाकू रास्ता दिखाता हुआ चलने लगा। सरकारी रास्ते के पास आकर उसने कहा, 'इस रास्ते से चले जाओ; अब तुम सहज ही अपने घर जा सकोगे।' उस व्यक्ति ने कहा, 'यह क्या महाशय? आप भी चलिए! आपने मेरा कितना उपकार किया! हमारे घर पर चलने से हम कितने आनन्दित होंगे!' डाकू ने कहा, 'नहीं, मेरे वहाँ जाने पर छुटकारे का उपाय नहीं, पुलिस पकड़ लेगी।' यह कहकर रास्ता बताकर वह लौट गया।
“पहला डाकू तमोगुण है, जिसने कहा था, 'इसे रखकर क्या करोगे, मार डालो।' तमोगुण से विनाश होता है। दूसरा डाकू रजोगुण है; रजोगुण से मनुष्य संसार में आबद्ध होता है; अनेकानेक कार्यों में जकड़ जाता है। रजोगुण ईश्वर को भुला देता है। सत्त्वगुण ही केवल ईश्वर का रास्ता बताता है। दया, धर्म, भक्ति यह सब सत्त्वगुण से उत्पन्न होते हैं। सत्त्वगुण मानो अन्तिम सीढ़ी है। उसके बाद ही है छत। मनुष्य का धाम है परब्रह्म। त्रिगुणातीत न होने पर ब्रह्मज्ञान नहीं होता।”
आचार्य – अच्छा हुआ, ये सब बड़ी अच्छी बातें हुईं।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – भक्त का स्वभाव क्या है, जानते हो? मैं कहूँ, तुम सुनो; तुम कहो, मैं सुनूँ। तुम लोग आचार्य हो, कितने लोगों को शिक्षा दे रहे हो। तुम लोग जहाज हो, हम तो हैं मछुओं की छोटी नैया। (सभी हँस पड़े।)
□ □ □
परिच्छेद ३२
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ३२
नन्दनबागान के ब्राह्मसमाज में भक्तों के साथ
(१)
श्रीमन्दिर-दर्शन और उद्दीपन। श्रीराधा का प्रेमोन्माद
श्रीरामकृष्ण नन्दनबागान के ब्राह्मसमाज-मन्दिर में भक्तों के साथ बैठे हैं। ब्राह्मभक्तों से बातचीत कर रहे हैं। साथ में राखाल, मास्टर आदि हैं। शाम के पाँच बजे होंगे।
काशीश्वर मित्र का मकान नन्दनबागान में है। वे पहले सबजज थे। वे आदिब्राह्मसमाजवाले ब्राह्म थे। अपने ही घर पर ईश्वर की उपासना किया करते थे, और बीच बीच में भक्तों को निमन्त्रण देकर उत्सव मनाते थे। उनके देहान्त के बाद श्रीनाथ, यज्ञनाथ आदि उनके पुत्रों ने कुछ दिन तक उसी तरह उत्सव मनाए थे। वे ही श्रीरामकृष्ण को बड़े आदर से आमन्त्रित कर लाए हैं।
श्रीरामकृष्ण आकर पहले नीचे के एक कमरे में बैठे, जहाँ धीरे धीरे बहुतसे ब्राह्मभक्त सम्मिलित हुए। रवीन्द्रबाबू आदि ठाकुर-परिवार के भक्त भी इस उत्सव में सम्मिलित हुए थे।
बुलाए जाने पर श्रीरामकृष्ण ऊपरी मँजले के उपासना-मन्दिर में जा विराजे। कमरे के पूर्व की ओर वेदी रची गयी है। नैऋत्य कोने में एक पियानो है। कमरे के उत्तरी हिस्से में कुछ कुर्सियाँ रखी हुई हैं। उसी के पूर्व की ओर अन्तःपुर में जाने का दरवाजा है।
शाम को उत्सव के निमित्त उपासना होगी। आदि ब्राह्मसमाज के श्री भैरव बन्द्योपाध्याय और एक-दो भक्त मिलकर वेदी पर उपासना का अनुष्ठान करेंगे।
गर्मी का मौसम है। आज बुधवार चैत्र की कृष्णा दशमी है। २ मई, १८८३। अनेक ब्राह्मभक्त नीचे के बड़े आँगन या बरामदे में इधर-उधर घूम रहे हैं। श्री जानकी घोषाल आदि दो-चार सज्जन उपासनागृह में आकर श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हैं। -वे उनके श्रीमुख से ईश्वरी प्रसंग सुनेंगे। कमरे में प्रवेश करते ही श्रीरामकृष्ण ने वेदी के सम्मुख प्रणाम किया। फिर बैठकर राखाल मास्टर आदि से कहने लगे-
"नरेन्द्र ने मुझसे कहा था, 'समाज-मन्दिर को प्रणाम करने से क्या होता है?'
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
१९८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ मई, १८८३
मन्दिर देखने से ईश्वर ही की याद आती है – उद्दीपना होती है। जहाँ उनकी चर्चा होती है, वहाँ उनका आविर्भाव होता है, और सारे तीर्थ वहाँ आ जाते हैं। ऐसे स्थानों के देखने से भगवान् की ही याद होती है।
"एक भक्त बबूल का पेड़ देखकर भावाविष्ट हुआ था। यही सोचकर कि इसी लकड़ी से श्रीराधाकान्त के बगीचे के लिए कुल्हाड़ी का बेट बनता है।
"किसी और भक्त की ऐसी गुरुभक्ति थी कि गुरुजी के मुहल्ले के एक आदमी को ही देखकर भावों से तर हो गया!
"मेघ देखकर, नील वस्त्र देखकर अथवा एक चित्र देखकर श्रीराधा को श्रीकृष्ण की उद्दीपना हो जाती थी! ये सब चीजें देखकर वे 'कृष्ण कहाँ हैं?' कहकर बावली-सी हो जाती!"
घोषाल – उन्माद तो अच्छा नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – यह तुम क्या कह रहे हो? यह उन्माद विषयचिन्ता का फल थोड़े ही है कि उससे बेहोशी आ जाएगी! यह अवस्था तो ईश्वर-चिन्तन से उत्पन्न होती है! क्या तुमने प्रेमोन्माद, ज्ञानोन्माद की बात नहीं सुनी?
उपाय – ईश्वर पर प्रेम तथा षड्रिपुओ की गति बदलना
एक ब्राह्मभक्त – किस उपाय से ईश्वर मिल सकता है?
श्रीरामकृष्ण – उस पर प्रेम हो, और सदा यह विचार रहे कि ईश्वर ही सत्य है, और जगत् अनित्य।
"पीपल का पेड़ ही सत्य है – फल तो दो ही दिन के लिए हैं।"
ब्राह्मभक्त – काम, क्रोध आदि रिपु हैं – क्या किया जाय?
श्रीरामकृष्ण – छः रिपुओं को ईश्वर की ओर मोड़ दो। आत्मा के साथ रमण करने की कामना हो। जो ईश्वर की राह पर बाधा पहुँचाते हैं उन पर क्रोध हो। उसे ही पाने के लिए लोभ। यदि ममता है तो उसी के लिए हो। जैसे 'मेरे राम' 'मेरे कृष्ण'। यदि अहंकार करना है तो विभीषण की तरह – 'मैंने श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम किया, फिर यह सिर किसी दूसरे के सामने नहीं नवाऊँगा!'
ब्राह्मभक्त – यदि ईश्वर ही सब कुछ करा रहा है तो मैं पापों के लिए उत्तरदायी नहीं हूँ?
पापकर्मों का उत्तरदायित्व
श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – दुर्योधन ने वही बात कही थी – 'त्वया हृषीकेश हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।'*
* 'हे हृषिकेश, तुम हृदय में बैठकर जैसा करा रहे हो, वैसा ही मैं करता हूँ।'
२ मई, १८८३ परिच्छेद ३२ १९९
"जिसको ठीक विश्वास है कि ईश्वर ही कर्ता हैं और मैं अकर्ता हूँ, वह पाप नहीं कर सकता। जिसने नाचना सीख लिया है उसके पैर ताल के विरुद्ध नहीं पड़ते।
"मन शुद्ध न होने से यह विश्वास ही नहीं होता कि ईश्वर है!"
श्रीरामकृष्ण उपासना-मन्दिर में एकत्रित भक्तों को देख रहे हैं और कहते हैं, "बीच बीच में इस तरह एक साथ मिलकर ईश्वर-चिन्तन करना और उनके नामगुण गाना बहुत अच्छा है।
"परन्तु संसारी लोगों का ईश्वरानुराग क्षणिक है – वह उतनी ही देर तक ठहरता है जितना तपाये हुए लोहे पर पानी का छिड़काव।"
ब्रह्मोपासना तथा श्रीरामकृष्ण
अब सन्ध्या की उपासना होगी। वह बड़ा कमरा भक्तों से भर गया। कुछ ब्राह्म महिलाएँ हाथों में संगीत-पुस्तक लिए कुर्सियों पर आ बैठीं।
पियानो और हारमोनियम के सहारे ब्रह्मसंगीत होने लगा। गाना सुनकर श्रीरामकृष्ण के आनन्द की सीमा न रही। क्रमशः उद्बोधन, प्रार्थना और उपासना हुई। आचार्य वेदी पर बैठ वेदों से मन्त्रपाठ करने लगे।
"ॐ पिता नोऽसि, पिता नो बोधि। नमस्तेऽस्तु मा मा हिंसीः। – तुम हमारे पिता हो, हमें सद्बुद्धि दो। तुम्हें नमस्कार है। हमें नष्ट न करो।"
ब्राह्मभक्त उनसे स्वर मिलाकर कहते हैं –
"ॐ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। आनन्दरूपममृतं यद्विभाति। शान्तं शिवमद्वैतम्। शुद्धमपापविद्धम्।"
फिर आचार्यों ने स्तवपाठ किया। –
"ॐ नमस्ते सते ते जगत्कारणाय। नमस्ते चिते सर्वलोकाश्रयाय।।" इत्यादि।
तदन्तर उन्होंने प्रार्थना की –
"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय। आविराविर्म एधि। रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम्।*
स्तोत्रादि का पाठ सुनकर श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हो रहे हैं। अब आचार्य निबन्ध पढ़ते हैं।
अहेतुक कृपासिन्धु श्रीरामकृष्ण
उपासना समाप्त हो गयी। भक्तों को खिलाने का प्रबन्ध हो रहा है। अधिकांश
* "मुझे अनित्य से नित्य को, अन्धकार से ज्योति को और मृत्यु से अमरत्व को पहुँचाओ। मेरे पास आविर्भूत होओ। हे रुद्र, अपने कारुण्यपूर्ण मुख से सदा मेरी रक्षा करो।"
२०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ मई, १८८३
ब्राह्मभक्त नीचे आँगन और बरामदे में टहल रहे हैं।
रात के नौ बज गए। श्रीरामकृष्ण को दक्षिणेश्वर लौट जाना है। घर के मालिक निमन्त्रित गृही भक्तों की संवर्धना में इतने व्यस्त हैं कि श्रीरामकृष्ण की कोई खबर ही नहीं ले सकते।
श्रीरामकृष्ण (राखाल आदि से) – अरे, कोई बुलाता भी तो नहीं।
राखाल – (क्रोध में) – महाराज, आइए, हम दक्षिणेश्वर चलें।
श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – अरे ठहर। गाड़ी का किराया – तीन रुपये – दो आने – कौन देगा? चिढ़ने से ही काम न चलेगा! पैसे का नाम नहीं, और थोथी झाँझ! फिर इतनी रात को खाऊँ कहाँ?
बड़ी देर में सुना गया कि पत्तलें बिछी हैं। सब भक्त एक साथ बुलाए गए। उस भीड़ में श्रीरामकृष्ण भी राखाल आदि के साथ दूसरे मंजले में भोजन करने चले। भीड़ में बैठने की जगह नहीं मिलती थी। बड़ी मुश्किल से श्रीरामकृष्ण एक तरफ बैठाये गए। स्थान भद्दा था। एक रसोइया ठकुराइन ने भाजी परोसी। श्रीरामकृष्ण को उसे खाने की रुचि नहीं हुई। उन्होंने नमक के सहारे एक आध पूड़ी और थोड़ीसी मिठाई खायी।
आप दयासागर हैं। गृहस्वामी लड़के हैं। वे आपकी पूजा करना नहीं जानते तो क्या आप उनसे नाराज होंगे? अगर आप बिना खाए चले जायें तो उनका अमंगल होगा। फिर उन्होंने तो ईश्वर के ही उद्देश्य से इतना आयोजन किया।
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। गाड़ी का किराया कौन दे? उस भीड़ में गृहस्वामियों का पता ही नहीं चलता था। इस किराये के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण ने बाद में विनोद करते हुए भक्तों से कहा था –
“गाड़ी का किराया माँगने गया! पहले तो उसे भगा ही दिया। फिर बड़ी कोशिश से तीन रुपये मिले, पर दो आने नहीं दिए। कहा कि उसी से हो जायगा!”
परिच्छेद ३३
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ३३
भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में
(१)
श्रीरामकृष्ण ने कलकत्ता कँसारीपाड़ा की हरिभक्ति-प्रदायिनी सभा में शुभागमन किया है। रविवार, वैशाख शुक्ला सप्तमी, संक्रान्ति, १३ मई १८८३ ई.। आज सभा में वार्षिकोत्सव हो रहा है। मनोहर साँई का कीर्तन हो रहा है।
श्रीराधाकृष्ण-प्रेम का गाना हो रहा है। सखियाँ श्रीमती राधिका से कह रही हैं, 'तूने मान (प्रणयकोप) क्यों किया? तो क्या तू कृष्ण का सुख नहीं चाहती?' श्रीमती कहती हैं, 'उनके चन्द्रावली के कुंज में जाने के लिए मैंने कोप नहीं किया। वहाँ उन्हें क्यों जाना चाहिए? चन्द्रावली तो सेवा नहीं जानती।'
(२)
दूसरे रविवार को (२०-५-८३) रामचन्द्र के मकान पर फिर कीर्तन हो रहा है। श्रीरामकृष्ण आए हैं। वैशाख शुक्ला चतुर्दशी। श्रीमती राधिका श्रीकृष्ण के विरह में बहुत-कुछ कह रही हैं - “जब मैं बालिका थी उसी समय से श्याम को देखना चाहती थी। सखि, दिन गिनते गिनते नाखून घिस गये। देखो, उन्होंने जो माला दी थी वह सूख गयी है, फिर भी मैंने उसे नहीं फेंका। कृष्णचन्द्र का उदय कहाँ हुआ? वह चन्द्र मान (प्रणयकोप ) रूपी राहू के भय से कहीं चला तो नहीं गया! हाय! उस कृष्णमेघ का कब दर्शन होगा? क्या फिर दर्शन होगा! प्रिय, प्राण खोलकर तुम्हें कभी भी न देख सकी! एक तो कुल दो ही आँखें, उसमें फिर पलक, उसमें फिर आँसुओं की धारा। उनके सिर पर मोर का पंख मानो स्थिर बिजली के समान है। मोरगण उस मेघ को देख पंख खोलकर नृत्य करते थे।
“सखि! यह प्राण तो नहीं रहेगा – मेरी देह तमाल वृक्ष की शाखा पर रख देना और मेरे शरीर पर कृष्णनाम लिख देना।”
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “वे और उनका नाम अभिन्न हैं। इसीलिए श्रीमती राधिका इस प्रकार कह रही हैं। जो राम वही नाम है।”
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२०२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १३/२० मई, १८८३
श्रीरामकृष्ण भावमग्न होकर यह कीर्तन का गाना सुन रहे हैं। गोस्वामी कीर्तनिया इन गानों को गा रहे हैं। अगले रविवार को फिर दक्षिणेश्वर मन्दिर में वही गाना होगा। उसके बाद के शनिवार को फिर अधर के मकान पर वही कीर्तन होगा।
□ □ □
परिच्छेद ३४
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ३४
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में खड़े खड़े भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। रविवार, वैशाख कृष्णा पंचमी, २७ मई १८८३ ई.। दिन के नौ बजे का समय होगा। भक्तगण धीरे धीरे आकर उपस्थित हो रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि भक्तों के प्रति) – विद्वेषभाव अच्छा नहीं, – शाक्त, वैष्णव, वेदान्ती ये सब झगड़ा करते हैं, यह ठीक नहीं। पद्मलोचन बर्दवान के सभापण्डित थे। सभा में विचार हो रहा था – ‘शिव बड़े हैं या ब्रह्मा।’ पद्मलोचन ने बहुत सुन्दर बात कही थी, – ‘मैं नहीं जानता, मुझसे न शिव का परिचय है, और न ब्रह्मा का!’ (सभी हँसने लगे।)
“व्याकुलता रहने पर सभी पथों से उन्हें प्राप्त किया जाता है, परन्तु निष्ठा रहनी चाहिए। निष्ठा-भक्ति का दूसरा नाम है अव्यभिचारिणी भक्ति, – जिस प्रकार एक शाखावाला वृक्ष सीधा ऊपर की और जाता है। व्यभिचारिणी भक्ति – जैसे पाच शाखावाला वृक्ष। गोपियों की ऐसी निष्ठा थी कि वृन्दावन के पीताम्बर और ‘मोहनचूड़ावाले गोपालकृष्ण के अतिरिक्त और किसी से प्रेम न करेंगी। मथुरा में जब राजवेष में सिर पर पगड़ी पहने कृष्ण को देखा तो उन्होंने घूँघट की आड़ में मुँह छिपा लिया और कहा, ‘वह कौन है? क्या इसके साथ बात करके हम द्विचारिणी बनेंगी?’
“स्त्री जो स्वामी की सेवा करती है वह भी निष्ठा-भक्ति है। देवर, जेठ को खिलाती है, पैर धोने को जल देती है, परन्तु स्वामी के साथ दूसरा ही सम्बन्ध रहता है। इसी प्रकार अपने धर्म में भी निष्ठा हो सकती है। इसीलिए दूसरे धर्म से घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके साथ मीठा व्यवहार करना चाहिए।”
श्रीरामकृष्ण द्वारा जगन्माता की पूजा तथा आत्मपूजा
श्रीरामकृष्ण गंगास्नान करके काली के दर्शन करने गए हैं। साथ में मास्टर हैं। श्रीरामकृष्ण पूजा के आसन पर बैठकर माँ के चरणकमलों पर फूल चढ़ा रहे हैं; बीच बीच में अपने सिर पर भी चढ़ा रहे हैं और ध्यान कर रहे हैं।
बहुत समय के बाद श्रीरामकृष्ण आसन से उठे। भाव में विभोर होकर नृत्य कर रहे हैं और मुँह से माँ का नाम ले रहे हैं। कह रहे हैं, ‘माँ विपदनाशिनी।’ देह धारण करने से
`CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
| २०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २७ मई, १८८३ |
|---|
ही दुःख, विपदाएँ होती हैं, सम्भव है इसीलिए जीव को इस 'विपद्नाशिनी' महामन्त्र का उच्चारण कर कातर होकर पुकारना सिखा रहे हैं।
अब श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के पश्चिमवाले बरामदे में आकर बैठे हैं। अभी तक भाव का आवेश है। पास हैं राखाल, मास्टर, नकुड़ वैष्णव आदि। नकुड़ वैष्णव को श्रीरामकृष्ण अट्ठाईस-उनतीस वर्षों से जानते हैं। जिस समय वे पहले-पहल कलकत्ते में आकर झामापुकुर में रहे थे और घर घर में जाकर पूजा करते थे, उस समय कभी कभी नकुड़ वैष्णव की दुकान में जाकर बैठते थे और आनन्द मनाते थे। आजकल पानिहाटी में राघव पण्डित के महोत्सव के उपलक्ष्य में नकुड़ बाबाजी आकर प्रायः प्रतिवर्ष श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते हैं। नकुड़ वैष्णव भक्त थे। कभी कभी वे भी महोत्सव का भण्डारा देते थे। नकुड़ मास्टर के पड़ोसी थे।
श्रीरामकृष्ण जिस समय झामापुकुर में थे, उस समय गोविन्द चटर्जी के मकान में रहते थे। नकुड़ ने मास्टर को वह पुराना मकान दिखाया था।
जगन्माता के नामकीर्तन के आनन्द में श्रीरामकृष्ण
श्रीरामकृष्ण भाव के आवेश में गीत गा रहे हैं, जिनका भावार्थ यह है :-
(१) "हे महाकाल की मनोमोहिनी सदानन्दमयी काली, माँ, तुम अपने आनन्द में आप ही नाचती हो और आप ही ताली बजाती हो। हे आदिभूते सनातनि, शून्यरूपे शशिभालिके, जिस समय ब्रह्माण्ड न था, उस समय तुझे मुण्डमाला कहाँ मिली? एकमात्र तुम यन्त्री हो, हम सब तुम्हारे निर्देश पर चलते हैं। माँ, तुम जैसा कराती हो, वैसा ही करते हैं, जैसा कहलाती हो वैसा ही कहते हैं। हे निर्गुणे, माँ, कमलाकान्त गाली देकर कहता है कि तुझ सर्वनाशिनी ने खड्ग धारण करके धर्म और अधर्म दोनों को नष्ट कर दिया है!"
(२) "हे तारा, तुम ही मेरी माँ हो। तुम त्रिगुणधरा परात्परा हो। मैं जानता हूँ, माँ, कि तुम दीनों पर दया करनेवाली और विपत्ति में दुःख को हरण करनेवाली हो। तुम सन्ध्या, तुम गायत्री, तुम जगद्धात्री हो। माँ, तुम असहाय को बचानेवाली तथा सदाशिव के मन को हरनेवाली हो। माँ, तुम जल में, थल में और आदिमूल में विराजमान हो। तुम साकार रूप में सर्व घट में विद्यमान होते हुए भी निराकार हो।"
श्रीरामकृष्ण ने 'माँ' के और भी कुछ गीत गाये। फिर भक्तों से कह रहे हैं, "संसारियों के सामने केवल दुःख की बात ठीक नहीं। आनन्द चाहिए। जिनको अन्न का अभाव है, वे दो दिन उपवास भी कर सकते हैं, परन्तु खाने में थोड़ा विलम्ब होने पर जिन्हें दुःख होता है उनके पास केवल रोने की बातें, दुःख की बातें करना ठीक नहीं।
"वैष्णवचरण कहा करता था, 'केवल, पाप, पाप यह सब क्या है? आनन्द करो।'"
२७ मई, १८८३ | परिच्छेद ३४ | २०५
| २७ मई, १८८३ | परिच्छेद ३४ | २०५ |
|---|
श्रीरामकृष्ण भोजन के बाद विश्राम भी न कर सके थे कि मनोहर साँई गोस्वामी आ पधारे।
श्रीराधा के भाव में महाभावमय श्रीरामकृष्ण। क्या श्रीरामकृष्ण गौरांग हैं?
गोस्वामी पूर्वराग का कीर्तन गा रहे हैं। थोड़ा सुनकर ही श्रीरामकृष्ण राधा के भाव में भावाविष्ट हो गए।
पहले ही गौरचन्द्रिका-कीर्तन। “हथेली पर हाथ – चिन्तित गोरा – आज क्यों चिन्तित हैं? सम्भवतः राधा के भाव में भावित हुए हैं।”
गोस्वामी फिर गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “घड़ी में सौ बार, पल पल में घर से बाहर आती और फिर भीतर जाती है। कहीं पर भी मन नहीं लग रहा है, जोर जोर से श्वास चल रहा है, बार बार कदम्ब-कानन की ओर ताकती है। राधे, ऐसा क्यों हुआ?”
संगीत की इसी पंक्ति को सुन श्रीरामकृष्ण की महाभाव की स्थिति हुई है! उन्होंने अपनी कमीज को फाड़कर फेंक दिया।
कीर्तनकार फिर गा रहे हैं – ‘तेरा अंग शीतल है...’
कीर्तनकार का संगीत सुनते सुनते महाभाव में श्रीरामकृष्ण काँप रहे हैं! केदार को देख वे कीर्तन के स्वर में कह रहे हैं, “प्राणनाथ, हृदयवल्लभ, तुम लोग मुझे कृष्ण ला दो; यही तो मित्रता का काम है; या तो उन्हें ला दो और नहीं तो मुझे ले चलो; तुम लोगों की मैं चिरकाल के लिए दासी बनी रहूँगी।”
गोस्वामी कीर्तनिया श्रीरामकृष्ण के महाभाव की स्थिति को देखकर मुग्ध हुए हैं। वे हाथ जोड़कर कह रहे हैं, “मेरी विषयबुद्धि मिटा दीजिए।”
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – तुम उस साधु के सदृश हो जिसने पहले रहने की जगह ठीक कर, फिर शहर देखना शुरू किया। तुम इतने बड़े रसिक हो, तुम्हारे भीतर से इतना मीठा रस निकल रहा है।
गोस्वामी – प्रभो, मैं चीनी का बोझ ढोनेवाला बैल हूँ, चीनी का आस्वादन कहाँ कर सका?
फिर कीर्तन होने लगा। कीर्तनकार श्रीमती राधिका की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं – “कोकिलकुल कुर्वति कलनादम्।”
कोकिल का कलनाद श्रीमती को वज्रध्वनि जैसा लग रहा है। इसलिए वे जैमिनी का नाम उच्चारण कर रही हैं और कह रही हैं, ‘सखि, कृष्ण के विरह में यह प्राण नहीं रहेगा; इस देह को तमाल वृक्ष की शाखा पर रख देना।’
गोस्वामी ने राधाश्याम का मिलन गाकर कीर्तन समाप्त किया।
परिच्छेद ३५
परिच्छेद ३५
भक्तों के मकान पर
(१)
बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण। नरलीला का दर्शन और आस्वादन
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर से कलकत्ता आ रहे हैं। बलराम के मकान से होकर अधर के मकान पर और उसके बाद राम के मकान पर जाएँगे। अधर के मकान में मनोहर साँई का कीर्तन होगा। राम के घर पर कथा होगी। शनिवार, वैशाख कृष्णा द्वादशी, २ जून १८८३ ई.।
श्रीरामकृष्ण गाड़ी में आते आते राखाल, मास्टर आदि भक्तों से कह रहे हैं, “देखो, उन पर प्रेम हो जाने पर पाप आदि सब भाग जाते हैं, जैसे धूप से मैदान के तालाब का जल सूख जाता है।
संन्यासी और गृहस्थ - दोनों को विषयासक्ति छोड़नी होगी।
“विषय की वासना तथा कामिनी-कांचन पर मोह रखने से कुछ नहीं होता। यदि विषयासक्ति रहे तो संन्यास लेने पर भी कुछ नहीं होता - जैसे थूक को फेंककर फिर चाट लेना।”
थोड़ी देर बाद गाड़ी में श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, “ब्राह्मसमाजी लोग साकार को नहीं मानते। (हँसकर) नरेन्द्र कहता है, 'पुत्तलिका!' फिर कहता है, 'वे अभी तक कालीमन्दिर में जाते हैं।'”
श्रीरामकृष्ण बलराम के घर पर आए हैं। वे एकाएक भावाविष्ट हो गए हैं। सम्भव हैं, देख रहे हैं, ईश्वर ही जीव तथा जगत् बने हुए हैं, ईश्वर ही मनुष्य बनकर घूम रहे हैं। जगन्माता से कह रहे हैं, “माँ, यह क्या दिखा रही हो? रुक जाओ; यह सब क्या दिखा रही हो? राखाल आदि के द्वारा क्या क्या दिखा रही हो, माँ! रूप आदि सब उड़ गया। अच्छा माँ, मनुष्य तो केवल ऊपर का ढाँचा ही है न? चैतन्य तुम्हारा ही है।
“माँ, आजकल के ब्राह्मसमाजी मीठा रस नहीं पाते! आँखें सूखी, मुँह सूखा! प्रेमभक्ति न होने से कुछ न हुआ!
२ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २०७
| २ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २०७ |
|---|
“माँ, तुमसे कहा था, एक व्यक्ति को साथी बना दो, मेरे जैसे किसी को! इसीलिए राखाल को दिया है न?”
अधर के मकान पर हरिसंकीर्तन में
श्रीरामकृष्ण अधर के मकान पर आए हैं। मनोहर साँई के कीर्तन की तैयारी हो रही है।
श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए अधर के बैठकघर में अनेक भक्त तथा पड़ोसी आए हैं। सभी की इच्छा है कि श्रीरामकृष्ण कुछ कहें।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – संसार और मुक्ति दोनों ही ईश्वर की इच्छा पर निर्भर हैं। उन्होंने ही संसार में अज्ञान बनाकर रखा है। फिर जिस समय वे अपनी इच्छा से पुकारेंगे, उसी समय मुक्ति होगी। लड़का खेलने गया है, खाने के समय माँ बुला लेती है।
“जिस समय वे मुक्ति देंगे उस समय वे साधुसंग करा देते हैं और फिर अपने को पाने के लिए व्याकुलता उत्पन्न कर देते हैं।”
पड़ोसी – महाराज, किस प्रकार व्याकुलता होती है?
श्रीरामकृष्ण – नौकरी छूट जाने पर किरानी को जिस प्रकार व्याकुलता होती है! वह जिस प्रकार रोज आफिस आफिस में घूमता है और पूछता रहता है, ‘साहब, कोई नौकरी की जगह खाली हुई?’ व्याकुलता होने पर मनुष्य छटपटाता है – कैसे ईश्वर को पाऊँ!
“और यदि मूँछों पर हाथ फेरते हुए पैर पर पैर धरकर बैठे बैठे पान चबा रहा है – कोई चिन्ता नहीं, तो ऐसी स्थिति में ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती!”
पड़ोसी – साधुसंग होने पर क्या व्याकुलता हो सकती है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, हो सकती है; परन्तु पाखण्डियों को नहीं होती। साधु का कमण्डल चारों धाम होकर आने पर भी कडुए का कड़ुआ ही रह जाता है!
अब कीर्तन शुरू हुआ है; गोस्वामीजी कलह-संवाद गा रहे हैं –
“श्रीमती कह रही हैं, ‘सखि! प्राण जाता है, कृष्ण को ला दे!’
“सखी – ‘राधे, कृष्णरूपी मेघ बरसता ही था; परन्तु तूने मान (प्रेमकोप –) रूपी आँधी से उस मेघ को उड़ा दिया। तू कृष्ण के सुख में सुखी नहीं है; नहीं तो मान क्यों करती?’
“श्रीमती – ‘सखि, मान तो मेरा नहीं है। जिसका मान है उसी के साथ चला गया है।’
“ललिता श्रीमती की ओर से कुछ कह रही है।” ‘सबने मिलकर प्रीत की ...
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
२०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत – १ २ जून, १८८३
अब कीर्तन में गोस्वामी कह रहे हैं कि सखियाँ राधाकुण्ड के पास श्रीकृष्ण की खोज करने लगीं। उसके बाद यमुनातट पर श्रीकृष्ण का दर्शन, साथ में श्रीदाम, सुदाम, मधुमंगल। वृन्दा के साथ श्रीकृष्ण का वार्तालाप, श्रीकृष्ण का योगी का-सा भेस, जटिला-संवाद, राधा का भिक्षादान, राधा का हाथ देख योगी द्वारा गणना तथा संकट की भविष्यवाणी। कात्यायनी की पूजा में जाने की तैयारी।
कीर्तन समाप्त हुआ। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – गोपियों ने कात्यायनी की पूजा की थी। सभी उस महामाया आद्याशक्ति के अधीन हैं। अवतार आदि तक उस माया का आश्रय लेकर ही लीला करते हैं; इसीलिए वे आद्याशक्ति की पूजा करते हैं। देखो न, राम सीता के लिए कितने रोये हैं। पंचभूतों के फन्दे में पड़कर ब्रह्म रोते हैं।
“हिरण्याक्ष का वध कर वराह-अवतार कच्चे-बच्चे लेकर रह रहे थे। आत्मविस्मृत होकर उन्हें स्तनपान करा रहे थे! देवताओ ने परामर्श करके शिवजी को भेज दिया। शिवजी ने त्रिशूल के आघात से वराह का शरीर विनष्ट कर दिया; तब वे स्वधाम में पधारे। शिवजी ने पूछा था, ‘तुम आत्मविस्मृत क्यों हो गये हो?’ इस पर उन्होंने कहा था, ‘मैं बहुत अच्छा हूँ’!”
अधर के मकान से होकर अब श्रीरामकृष्ण राम के मकान पर जा रहे हैं।
(२)
रामचन्द्र दत्त के मकान पर
श्रीरामकृष्णदेव सिमुलिया मुहल्ले की मधु राय की गली में रामबाबू का मकान है। रामचन्द्र दत्त श्री रामकृष्णदेव के विशिष्ट भक्त हैं। वे डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त कर मेडिकल कालेज में रसायनशास्त्र के सहकारी परीक्षक नियुक्त हुए थे और ‘साइन्स असोसिएशन’ में रसायनशास्त्र के अध्यापक भी थे। उन्होंने स्वोपार्जित धन से यह मकान बनवाया था। इस मकान में श्रीरामकृष्णदेव कुछ एक बार आये थे, इसीलिए यह मकान भक्तों के लिए आज तीर्थ के समान महान् पवित्र है। रामचन्द्र गुरुदेव की कृपा लाभ कर ज्ञानपूर्वक संसारधर्म पालन करने की चेष्टा करते थे। श्रीरामकृष्णदेव मुक्तकण्ठ से रामबाबू की प्रशंसा करते और कहते थे, – ‘राम अपने मकान में भक्तों को स्थान देता है, कितनी सेवा करता है, उसका मकान भक्तों का एक अड्डा है।’ नित्यगोपाल, लाटू, तारक आदि एक प्रकार से रामचन्द्र के घर के आदमी हो गये थे। इन्होंने उनके साथ बहुत दिनों तक एकत्र वास किया था। इसके सिवाय उनके मकान में प्रतिदिन नारायण की पूजा और सेवा होती थी।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २०९
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
| २ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २०९ |
|---|
रामचन्द्र श्रीरामकृष्ण को वैशाख की पूर्णिमा को, जिस समय हिण्डोले का श्रृंगार होता है, इस मकान में उनकी पूजा करने के लिए सर्वप्रथम ले आये थे। प्रायः प्रतिवर्ष आज के दिन वे उनको ले जाकर भक्तों से सम्मिलित हो महोत्सव मनाया करते थे। रामचन्द्र के प्यारे शिष्यवृन्द अब भी उस दिन उत्सव मनाते हैं।
आज रामचन्द्र के मकान में उत्सव है! श्रीरामकृष्ण आयेंगे। आपके लिए रामचन्द्र ने श्रीमद्भागवत की कथा का प्रबन्ध किया है। छोटासा आँगन है, परन्तु उसी में कैसा सुन्दर सजाया है! वेदी तैयार हुई है, उस पर कथक महोदय बैठे हैं। राजा हरिश्चन्द्र की कथा हो रही है। इसी समय बलराम और अधर के मकान से होकर श्रीरामकृष्ण यहाँ आ पहुँचे। रामचन्द्र ने आगे बढ़कर उनकी चरणरज को मस्तक में धारण किया और वेदी के संम्मुख उनके लिए निर्दिष्ट आसन पर उन्हें लाकर बैठाया। चारों ओर भक्त और पास ही मास्टर बैठे हैं।
राजा हरिश्चन्द्र की कथा होने लगी —
“विश्वामित्र बोले, ‘महाराज! तुमने मुझे ससागर पृथ्वी दान कर दी है, इसलिए अब इसके भीतर तुम्हारा स्थान नहीं है; किन्तु तुम काशीधाम में रह सकते हो, वह महादेव का स्थान है। चलो, तुम्हें और तुम्हारी सहधर्मिणी शैब्या और तुम्हारे पुत्र को वहाँ पहुँचा दें। वहीं पर जाकर तुम प्रबन्ध करके मुझे दक्षिणा दे देना।’ यह कहकर राजा को साथ ले विश्वामित्र काशीधाम की ओर चले। काशी में आकर उन लोगों ने विश्वेश्वर के दर्शन किये।”
विश्वेश्वर-दर्शन की बात होते ही श्रीरामकृष्ण एकदम भावाविष्ट हो अस्पष्ट रूप से ‘शिव’ ‘शिव’ उच्चारण कर रहे हैं।
कथक महोदय कथा कहते गए —
“राजा हरिश्चन्द्र दक्षिणा नहीं दे पाए, इसलिए उन्होंने रानी शैब्या को बेच दिया। पुत्र रोहिताश्व भी शैब्या के साथ चला गया।”
कथक महोदय ने शैव्या के ब्राह्मण मालिक के यहाँ रोहिताश्व के फूल तोड़ने और उसे साँप के द्वारा काटे जाने की कथा कही। —
“उस अन्धकाराच्छन्न कालरात्रि में सन्तान की मृत्यु हो गयी। उसका अन्तिम संस्कार करने के लिए कोई नहीं था। गृहस्वामी वृद्ध ब्राह्मण शय्या त्यागकर नहीं उठे। पुत्र के शव को गोद में लिए शैब्या अकेली ही श्मशान की ओर चल पड़ी। बीच बीच में बादल गरज रहे थे और बिजली कड़क रही थी। एक एक बार घोर अन्धकार को चीरती हुई बिजली चमक दिखा जाती थी। भयभीत, शोकाकुल शैब्या रोती हुई चली जा रही थी।”
“पत्नी और पुत्र को बेचने पर भी दक्षिणा की राशि पूरी न होने पायी; इसलिए हरिश्चन्द्र ने स्वयं को एक चाण्डाल को बेच डाला था। वे श्मशान में चाण्डाल बने बैठे
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२१० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ जून, १८८३
हैं - कर वसूल करने पर ही अग्निसंस्कार करने देंगे। कितने ही शव जल रहे हैं, कितने जलकर भस्मीभूत हो गए हैं। घोर अँधेरी रात में श्मशान कितना भयावना दिखायी दे रहा है! शैब्या उस स्थान पर आकर विलाप करने लगी।”
उस करुण क्रन्दन को सुनकर, ऐसा कौन है जो व्याकुल न हो, जिसका हृदय विदीर्ण न हो? सभी श्रोतागण रो पड़े।
श्रीरामकृष्ण क्या कर रहे हैं? वे स्थिर होकर कथा सुन रहे हैं - बिलकुल स्थिर हैं! केवल एक बार आँख के कोने में एक बूँद आँसू छलक उठा पर आपने उसे पोंछ डाला। आपने अधीर होकर रुदन क्यों नहीं किया?
अन्त में रोहिताश्व को जीवनदान, सब लोगों का विश्वेश्वरदर्शन और हरिश्चन्द्र का पुनः राज्यलाभ वर्णन कर कथक महोदय ने कथा समाप्त की। श्रीरामकृष्ण बहुत समय तक वेदी के सम्मुख बैठकर कथा सुनते रहे। कथा समाप्त होने पर बाहर के कमरे में जाकर बैठे। चारों ओर भक्तमण्डली बैठी है, कथक भी पास आकर बैठ गये। श्रीरामकृष्ण कथक से बोले, “कुछ उद्धवसंवाद कहो।”
मुक्ति और भक्ति – गोपीप्रेम
कथक कहने लगे, “जब उद्धव वृन्दावन आए, गोपियाँ और ग्वालबाल उनके दर्शन के लिए व्याकुल हो दौड़कर उनके पास गए। सभी पूछने लगे, 'श्रीकृष्ण कैसे हैं? क्या वे हम लोगों को भूल गए? क्या वे कभी हम लोगों का स्मरण करते हैं?' यह कहकर कोई रोने लगा, कोई उन्हें साथ ले वृन्दावन के अनेक स्थानों को दिखलाने और कहने लगा, 'इस स्थान में श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण किया था; यहाँ पर धेनुकासुर और वहाँ पर शकटासुर का वध किया था; इस मैदान में गौओं को चराते थे; इसी यमुना के तट पर वे विहार करते थे; यहाँ पर ग्वालबालों सहित क्रीड़ा करते थे; इस कुंज में गोपियों के साथ वार्तालाप करते थे।' उद्धव बोले, 'आप लोग कृष्ण के लिए इतने व्याकुल क्यों हो रहे हैं? वे तो सर्वभूतों में व्याप्त हैं। वे साक्षात् नारायण हैं! उनके सिवाय और कुछ नहीं है।' गोपियों ने कहा, 'हम यह सब नहीं समझ सकतीं। लिखना पढ़ना हमें नहीं मालूम। हम तो केवल अपने वृन्दावनविहारी कृष्ण को जानती हैं, जो यहाँ बहुत-कुछ लीला कर गए हैं।' उद्धव फिर बोले, 'वे साक्षात् नारायण हैं, उनकी चिन्ता करने से पुनः संसार में नहीं आना पड़ता, जीव मुक्त हो जाता है।' गोपियों ने कहा, 'हम मुक्ति आदि - ये सब बातें नहीं समझतीं। हम तो अपने प्राणवल्लभ कृष्ण को देखना चाहती हैं।'”
श्रीरामकृष्णदेव यह सब ध्यान से सुनते रहे और भाव में मग्न हो बोले, “गोपियों का कहना सत्य है।” यह कहकर वे अपने मधुर कण्ठ से गाने लगे। गाने का आशय यह है :-
२ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २११
| २ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २११ |
|---|
“मैं मुक्ति देने में कातर नहीं होता, पर शुद्धा भक्ति देने में कातर होता हूँ। जो शुद्धा भक्ति प्राप्त कर लेते हैं वे सब से आगे हैं। वे पूज्य होकर त्रिलोकजयी होते हैं। सुनो चन्द्रावलि, भक्ति की बात करता हूँ – मुक्ति तो मिलती है, पर भक्ति कहाँ मिलती है? भक्ति के कारण मैं पाताल में बलिराजा का द्वारपाल होकर रहता हूँ। शुद्धा भक्ति एक वृन्दावन में है जिसे गोप-गोपियों के सिवाय दूसरा कोई नहीं जानता। भक्ति के कारण मैं नन्द के भवन में उन्हें पिता जानकर उनके जूते सिर पर ले चलता हूँ।”
श्रीरामकृष्ण (कथक के प्रति) – गोपियों की भक्ति थी प्रेमाभक्ति – अव्यभिचारिणी भक्ति – निष्ठा-भक्ति। व्यभिचारिणी भक्ति किसे कहते हैं, जानते हो? ज्ञानमिश्रित भक्ति। जैसे कृष्ण ही सब हुए हैं – वे ही परब्रह्म हैं, वे ही राम, वे ही शिव, वे ही शक्ति हैं। पर प्रेमाभक्ति में उस ज्ञान का संयोग नहीं है। द्वारका में आकर हनुमान ने कहा, ‘सीताराम के दर्शन करूँगा।’ भगवान् रुक्मिणी से बोले, ‘तुम सीता बनकर बैठो, अन्यथा हनुमान से रक्षा नहीं है।’ पाण्डवों ने जब राजसूय यज्ञ किया, उस समय देश देश के नरेश युधिष्ठिर को सिंहासन पर बिठाकर प्रणाम करने लगे। विभीषण बोले, ‘मैं एक नारायण को प्रणाम करूँगा, और दूसरे को नहीं!’ यह सुनते ही भगवान् स्वयं भूमिष्ठ होकर युधिष्ठिर को प्रणाम करने लगे। तब विभीषण ने राजमुकुट धारण किए हुए भी युधिष्ठिर को साष्टांग प्रणाम किया।
“किस प्रकार, जानते हो? – जैसे घर की बहू अपने देवर, जेठ, ससुर और स्वामी सब की सेवा करती है। पैर धोने के लिए जल देती है, अँगोछा देती है, पौढ़ा रख देती है, परन्तु दूसरी तरह का सम्बन्ध एकमात्र स्वामी ही के साथ रहता है।
“इस प्रेमाभक्ति में दो चीजें हैं। ‘अहंता’ और ‘ममता’। यशोदा सोचती थीं, ‘गोपाल को मैं न देखूँगी तो और कौन देखेगा? मेरे देखभाल न करने पर उसे रोग-व्याधि हो सकती है।’ यशोदा नहीं जानती थीं कि कृष्ण स्वयं भगवान् हैं। और ‘ममता’ – ‘मेरा कृष्ण, मेरा गोपाल’। उद्धव बोले, ‘माँ, तुम्हारे कृष्ण साक्षात् नारायण हैं, वे संसार के चिन्तामणि हैं। वे सामान्य वस्तु नहीं हैं।’ यशोदा कहने लगीं, ‘अरे तुम्हारे चिन्तामणि कौन! मेरा गोपाल कैसा है, मैं पूछती हूँ। चिन्तामणि नहीं, मेरा गोपाल।’
“गोपियों की निष्ठा कैसी थी! मथुरा में द्वारपाल से अनुनयविनय कर वे सभा में आयीं। द्वारपाल उन लोगों को कृष्ण के पास ले गया। कृष्ण को देख गोपियाँ मुख नीचा कर परस्पर कहने लगीं, ‘यह पगड़ी बाँधे राजवेश में कौन है? इसके साथ वार्तालाप कर क्या अन्त में हम द्विचारिणी बनेंगी? हमारे मोहन मोरमुकुट-पीताम्बरधारी प्राणवल्लभ कहाँ हैं?’ देखते हो इन लोगों की निष्ठा कैसी है! वृन्दावन का भाव ही दूसरा है। सुना है, द्वारका की तरफ लोग पार्थसखा श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं – वे राधा को नहीं चाहते!”
२१२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जून, १८८३
गोपियों की निष्ठा-ज्ञानभक्ति और प्रेमाभक्ति
भक्त – कौन श्रेष्ठ है, ज्ञानमिश्रित भक्ति या प्रेमाभक्ति?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के प्रति एकान्त अनुराग हुए बिना प्रेमाभक्ति का उदय नहीं होता। और ‘ममत्व’-ज्ञान अर्थात् भगवान् मेरे अपने हैं, यह ज्ञान। तीन मित्र जंगल में जा रहे थे, सहसा एक बाघ सामने आ खड़ा हुआ! एक आदमी बोला, ‘भाई, हम सब आज मरे।’ दूसरा आदमी बोला, ‘क्यों, मरेंगे क्यों? आओ, ईश्वर का स्मरण करें।’ तीसरा आदमी बोला, ‘नहीं, ईश्वर को कष्ट देकर क्या होगा? आओ, इसी पेड़ पर चढ़कर बैठें।’
“जिस आदमी ने कहा, ‘हम लोग मरे’ वह नहीं जानता था कि ईश्वर रक्षा करनेवाले हैं। जिसने कहा, ‘आओ, ईश्वर का स्मरण करें’ वह ज्ञानी था, वह जानता था कि ईश्वर सृष्टि, स्थिति, प्रलय के मूल कारण हैं। और जिसने कहा, ‘भगवान् को कष्ट देकर क्या होगा, आओ, पेड़ पर चढ़ बैठें’, उसके भीतर प्रेम उत्पन्न हुआ था – स्नेह-ममत्व का भाव आया था। तो प्रेम का स्वभाव ही यह है कि प्रेमी अपने को बड़ा समझता है और प्रेमास्पद को छोटा। वह देखता है, कहीं उसे कोई कष्ट न हो। उसकी यही इच्छा होती है कि जिससे प्रेम करें उसके पैर में एक काँटा भी न चुभे।”
श्रीरामकृष्णदेव तथा भक्तों को ऊपर ले जाकर अनेक प्रकार के मिष्टान्न आदि से रामबाबू ने उनकी सेवा की। भक्तों ने बड़े आनन्द से प्रसाद पाया।