सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
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सुभाषितरत्नभाण्डागारस्य
| विषया | पृष्ठे | श्लोक | विषया | पृष्ठे | श्लोक | विषया | पृष्ठे | श्लोक |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रत्नानि | २१७ | ४७-६३ | (शेष) | २३५ | १६५-१६५ | पलाण्डु | २४३ | १९३ |
| (वज्रमणि) | २१८ | ६४ | जलचरान्योक्तय | २३५ | १-५ | तृणानि | २४४ | १९४-१९४ |
| (कौस्तुभमणि) | २१८ | ६५ | मत्स्य | २३५ | १ | कल्मा | २४३ | १९६-१९७ |
| (सोमकान्त-सूर्यकान्तौ) | २१८ | ६६ | (रोहित) | २३५ | २ | ताम्बूलम् | २४३ | १९८-१९९ |
| (चन्द्रकान्त) | २१८ | ६७ | (राघव) | २३५ | ३ | तुम्बी | २४३ | २००-२०१ |
| (स्फटिक) | २१८ | ६८ | कूर्म | २३५ | ४-५ | वंश | २४३ | २०२ |
| (मरकत) | २१८ | ६९-७१ | वृक्षान्योक्तयः | २३६ | १-२४३ | कुन्द | २४३ | २०३-२०४ |
| (माणिक्यम्) | २१८ | ७२ | कल्पद्रुम | २३७ | ३१-३७ | कमलानि | २४३ | २०५-२४२ |
| काच | २१८ | ३३ | पारिजात | २३७ | ३८-३९ | लता | २४५ | २४३ |
| शङ्ख | २१८ | ७४-८० | चन्दन | २३७ | ४०-६१ | संकीर्णान्योक्तयः | २४५ | १-१०४ |
| (पाञ्चजन्य) | २१८ | ८१-८२ | अगह | २३८ | ६२-६३ | शिवः | २४५ | १-६ |
| नद्यन्योक्तय | २१८ | १-११ | चम्पक | २३८ | ६४-७१ | परशुराम. | २४५ | ७ |
| गङ्गा | २१९ | ९-१० | बकुल | २३८ | ७२-७३ | रामचन्द्र | २४५ | ८ |
| शोण. | २१९ | ११ | अशोक | २३८ | ७४-७७ | सीता | २४५ | ९ |
| तडागान्योक्तय | २१९ | १-१९ | यूथी | २३८ | ७८ | इन्द्र | २४५ | १० |
| मानसम् | २२० | २० | मालती | २३८ | ७९-८८ | स्मर | २४५ | ११ |
| कूपान्योक्तय | २२० | १-९ | मल्लिका | २३९ | ८९ | आकाशम् | २४५ | १२ |
| मरुस्थलान्योक्तय | २२० | १-६ | दमनक | २३९ | ९० | पृथ्वी | २४५ | १३ |
| दावानलान्योक्तय | २२० | १-९ | केतकी | २३९ | ९१-९६ | जलम् | २४५ | १-१५ |
| वाडवानल | २२० | ९ | पाटला | २३९ | ९७ | मारुत | २४५ | १६ |
| व्योमचरान्योक्तय | २२१ | १-२३९ | सहकार | २३९ | ९८-१३२ | मृगतृष्णिका | २४५ | १७ |
| गरुड | २२१ | १-२ | पनस | २४० | १३३ | सुवर्णम् | २४८ | १८-१९ |
| हंस | २२१ | ३-४० | तमाल | २४१ | १३४ | मौक्तिकम् | २४५ | २०-२२ |
| मधुकर | २२२ | ४१-११४ | कदली | २४१ | १३५ | सुवर्णकार | २४६ | २३ |
| कोकिल | २२५ | ११५-१४७ | द्राक्षा | २४१ | १३६-१३७ | हार | २४६ | २४-२९ |
| चातक | २२६ | १४८-१६८ | दाडिम | २४१ | १३८-१३९ | कञ्चुक | २४६ | ३० |
| मयूर | २२६ | १६९-१७८ | नालिकेर | २४१ | १४० | कुण्डलम् | २४६ | ३१ |
| चक्रवाक | २२६ | १७९-१८० | ताल | २४१ | १४१-१४२ | नासाभूषणम् | २४६ | ३२ |
| शुक | २२७ | १८१-२०३ | भूर्ज | २४१ | १४३-१४४ | वलय | २४६ | ३३ |
| काक | २२८ | २०४-२२५ | अश्वत्थ | २४१ | १४५ | रत्न | २४६ | ३४ |
| बक | २२९ | २२६-२३२ | न्यग्रोध | २४१ | १४६-१४८ | वीणादण्ड | २४६ | ३५ |
| घूक | २२९ | २३३ | मधूक | २४१ | १४९-१५० | मुरली | २४६ | ३६-३७ |
| खद्योत | २२९ | २३४-२३९ | शाल्मलि | २४१ | १५१-१५४ | कुविन्द | २४६ | ३८ |
| स्थलचरान्योक्तय | २२९ | १-१६५ | निम्ब | २४१ | १५५-१५९ | लाङ्गलिक | २४६ | ३९ |
| सिंह. | २२९ | १-५४ | बब्बुल | २४२ | १६०-१६३ | कर्णधार | २४६ | ४०-४१ |
| गज | २३१ | ५५-९८ | खदिर. | २४२ | १६४-१६६ | तैलक | २४६ | ४२ |
| मृग | २३३ | ९९-१२३ | किंशुक | २४२ | १६७-१६९ | पञ्जरलावक. | २४६ | ४३ |
| करभ | २३४ | १२४-१३७ | शाखोट | २४२ | १७०-१७१ | व्याध | २४६ | ४४-४५ |
| रासभ | २३४ | १३८ | पीलुः | २४२ | १७२ | विषममन्त्री | २४७ | ४६ |
| वृषभ | २३४ | १३९-१४९ | करीर | २४२ | १७३-१७४ | मालाकार | २४७ | ४७ |
| कपि | २३५ | १५०-१५२ | बिल्व | २४२ | १७५ | कायस्थ | २४७ | ४८ |
| वराह | २३५ | १५३-१५४ | शालि | २४२ | १७६ | कवि. | २४७ | ४९ |
| (आदिवराह) | २३५ | १५५ | कुटज | २४२ | १७७ | बाला | २४७ | ५० |
| श्वा | २३५ | १५६ | इक्षु | २४२ | १७८-१८० | शैलूष | २४७ | ५१ |
| वृश्चिक | २३५ | १५७ | लवङ्गी | २४८ | १८१-१८३ | कुशीलवा | २४७ | ५२ |
| भेक | २३५ | १५८-१५९ | कार्पास | २४२ | १८४-१८६ | बाला | २४७ | ५३ |
| जम्बुक | २३५ | १६० | शण | २४३ | १८७ | पल्लीपतिपुत्री | २४७ | ५४ |
| सर्पः | २३५ | १६१-१६२ | कण्टकारिका | २४३ | १८८ | पान्थ | २४७ | ५५-५६ |
| धत्तुर. | २४३ | १८९-१९२ | कस्तूरिका | २४७ | ५७-६१ |
विषयानुक्रमकोशः ५
| विषया | पृष्ठे | श्लोका | विषया | पृष्ठे | श्लोका | विषया | पृष्ठे | श्लोकाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दीप .. | २४७ | ६२-६७ | शरः | २४८ | ७५ | नन्दनवनम् | २४८ | ८१ |
| तुला | २४७ | ६८-६९ | लम्पार्क | २४८ | ७६ | वसन्त | २४८ | ८२ |
| कुम्भ | २४८ | ७०-७१ | खल | २४८ | ७७ | मुसल | २४८ | ८३ |
| कलशः . | २४८ | ७२ | कण्टक | २४८ | ७८ | सकीर्णा | २४८ | ८४-१०४ |
| दुग्धम् | २४८ | ७३ | कालकूटम् | २४८ | ७९ | |||
| बडिशदण्ड .. | २४८ | ७४ | जिह्वा | २४८ | ८० |
६. नवरसप्रकरणम्
| विषया | पृष्ठे | श्लोका | विषया | पृष्ठे | श्लोका | विषया | पृष्ठे | श्लोकाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शृङ्गाररसनिर्देशः | २५० | वलित्रयम् | २६७ | ३२८-३३८ | मयूरविषयकोक्ति | २८३ | १६६ | |
| मनसिजप्रशंसा | २५० | १-२२ | रोमावली | २६७ | ३३९-३६९ | मुक्ताकलाप प्रत्युक्ति | २८३ | १६७ |
| स्त्रीप्रशंसा | २५० | १-६१ | पृष्ठभाग | २६८ | ३७० | वियोगिन्या विप्रलापा | २८३ | २-४९ |
| युववर्णनम् | २५२ | १-९ | नितम्ब | २६८ | ३७१-३७९ | मदन प्रत्युक्तय | २८५ | ४३-४५ |
| बालात्ववर्णनम् | २५३ | १-४८ | (काञ्ची) | २६८ | ३८०-३८१ | चन्द्रं प्रत्युक्तय | २८५ | ४६-४८ |
| वयःसंधिवर्णनम् | २५४ | १-६० | जघनम् | २६८ | ३८२-३८५ | रोहिणी प्रत्युक्ति | २८५ | ४९ |
| तरुणीपृथगवयववर्णनं | २५७ | १-४३२ | मदनमन्दिरम् | २६८ | ३८६-३८७ | नायिका प्रति सखी-वचनम् | २८५ | १-३३ |
| केशपाश | २५७ | १-२६ | ऊरु | २६८ | ३८८-३९८ | दूती प्रति स्वावस्था-कथनम् | २८७ | १-१० |
| (अभ्यङ्गारम्भ ) | २५७ | २७-२९ | जङ्घे | २६९ | ३९९-४०२ | नायक प्रति दूतीप्रेषणम् | १-९ | |
| (सीमन्तरचनम्) | २५८ | ३०-३७ | चरणौ | २६९ | ४०३-४१६ | नायकस्याग्रे दूत्युक्तय | २८७ | १-९७ |
| (सीमन्तसिन्दूरम्) | २५८ | ३८-३९ | गुल्फौ | २६९ | ४१७ | नायकं प्रति नायिका-संदेश | २९१ | १-४ |
| ललाट | २५८ | ४० | पादाङ्गुल्य | २६९ | ४१८ | नायिका प्रति संदेश-प्रेपणम् | २९१ | १ |
| (तिलकः) | २५८ | ४१-५१ | नाखाः | २६९ | ४१९-४२१ | नायिका प्रति नायक-संदेश | २९१ | १-३६ |
| भ्रुवौ | २५८ | ५२-५९ | (गमनम्) | २६९ | ४२२-४२५ | दूतीं प्रति नायिका-प्रश्ना | २९२ | १-३ |
| नेत्रे | २५९ | ६०-९६ | (जृम्भा) | २६९ | ४२६-४२७ | दूत्युपहासप्रश्ना | २९३ | १-१२ |
| (कटाक्ष ) | २६० | ९७-११२ | (निद्रा) | २७० | ४२८-४३० | नायिका प्रति नायका-वस्थाकथनम् | २९३ | १-५ |
| (अश्रूणि ) | २६० | ११३ | (कान्ति ) | २७० | ४३१-४३२ | सूर्यास्तमनसमयवर्ण-नम् | २९३ | १-७३ |
| नासा | २६० | ११४-११७ | समग्रस्त्रीस्वरूपवर्णनम् | २७० | १-७७ | चक्रवाकावस्थाख्यानम् | २९६ | १-१३ |
| (नासाभूषणम् ) | २६० | ११८-१२२ | परस्परदर्शनम् | २७३ | १-२ | संध्यावर्णनम् | २९६ | १-६ |
| कर्णौ | २६० | १२३-१३० | नायकदर्शनम् | २७३ | १-६ | रजनिवर्णनम् | २९६ | १-६ |
| (कर्णभूषणम्) | २६१ | १३१-१३३ | नायिकादर्शनम् | २७३ | १-३४ | तमोवर्णनम् | २९६ | १-४० |
| कपोलौ | २६१ | १३४-१३६ | विरह | २७४ | १ | अभिसारिकासंचार-कथनम् | २९८ | १-२३ |
| अधर | २६१ | १३७-१५४ | वियोगिनोऽवस्था-वर्णनम् | २७४ | १-९ | नक्षत्रोदयवर्णनम् | २९९ | १-२ |
| दन्ता | २६१ | १५५-१५८ | वियोगिन्या अवस्था-वर्णनम् | २७५ | १-६५ | चन्द्रोदयवर्णनम् | २९९ | १-१६४ |
| चिबुकः | २६१ | १५९ | वियोगिनो विप्रलापा | २७७ | १-१६७ | चन्द्रकलावर्णनम् | ३०३ | १२३ |
| मुखम् | २६२ | १६०-२०६ | मदनं प्रत्युक्तय | २८२ | १२३-१४३ | ज्योत्स्नावर्णनम् | ३०३ | १२४-१३८ |
| (स्मितम्) | २६३ | २०७-११० | चन्द्रं प्रत्युक्तय | २८२ | १४४-१४८ | सकलद्विचन्द्रवर्णनम् | ३०३ | १३९-१६४ |
| कण्ठ | २६३ | २११-२१७ | पवनं प्रत्युक्तय | २८३ | १४९-१५० | नायकागमनावस्था-वर्णनम् | ३०४ | १-६ |
| (वाणी) | २६३ | २१८-२२३ | मेघं प्रत्युक्तय | २८३ | १५१-१५३ | |||
| बाहू | २६४ | २२४-२२९ | अशोकं प्रत्युक्ति | २८३ | १५४-१५५ | |||
| करौ | २६४ | २३०-२३५ | तमालं प्रत्युक्ति | २८३ | १५६ | |||
| (कङ्कणम्) | २६४ | २३६-२४२ | मृणालाहारं प्रत्युक्ति | २८३ | १५७ | |||
| (हस्तरङ्गा) | २६४ | २४३ | मधुकरं प्रत्युक्तय | २८३ | १५८-१६१ | |||
| अङ्गुष्ट्य | २६४ | २४४-२४५ | हंसं प्रत्युक्ति | २८३ | १६२ | |||
| (मुद्रिका) | २६४ | २४६ | चकोरं प्रत्युक्ति | २८३ | १६३ | |||
| स्तनौ | २६४ | २४७-२९८ | कृष्णसारं प्रत्युक्ति | २८३ | १६४ | |||
| कञ्चुकी | २६६ | २९९ | सारङ्गं प्रत्युक्ति | २८३ | १६५ | |||
| (हारः) | २६६ | ३००-३११ | ||||||
| मध्यदेश | २६६ | ३१२-३२३ | ||||||
| नाभि | २६७ | ३२४-३२७ |
६
सुभाषितरत्नभाण्डागारस्य
| विषया | पृष्ठे | श्लोका | विषया | पृष्ठे | श्लोका | विषया | पृष्ठे | श्लोका |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नायकागमने नायिका प्रति सखीवचनम् | ३०४ | १-४ | नायकं प्रति नायिकोक्तय | ३३० | १-८ | कन्दुकक्रीडा | ३४६ | ३४-४३ |
| नायकातिथ्यवर्णनम् | ३०५ | १-४ | नाथिक प्रति सखीवाक्यम् | ३३० | १-४ | हेमन्तवायव | ३४७ | ४४-४ |
| नायकस्य नायिका प्रति प्रश्न | ३०५ | १-३ | ससाय प्रति नायकोक्ति | ३३० | १ | हेमन्तपथिक | ३४७ | ४५-५२ |
| प्रणयकलहे नायिकानुनय | ३०५ | १-७० | नाथिका प्रति सखीवाक्यम् | ३३० | १ | शिशिरवर्णनम् | ३४७ | १-२२ |
| सख्यनुनय | ३०७ | १-२३ | देशान्तरोपगतो नायक | ३३० | १-३ | शिशिरसमयस्वभावाख्यानम् | ३४७ | २-१५ |
| कलहान्तरिताप्रलापाख्यानम् | ३०८ | १-१६ | वसन्तवर्णनम् | ३३० | १-१८४ | हज्जोलनक्रीडा | ३४८ | १६-६७ |
| नायिकानुनय | ३०९ | १-४ | वसन्तसमयस्वभावाख्यानम् | ३३१ | ४-१०१ | शिशिरवायव | ३४८ | १८-१९ |
| नायकयोरुक्तिप्रत्युक्तय | ३०९ | १-१२ | मदनपूजा | ३३३ | १०२ | शिशिरपथिक | ३४८ | २०-२२ |
| नायिकाशिक्षा | ३१० | १-८ | कुसुमावचय | ३३४ | १०३-११९ | स्त्रीस्वभावानिन्दा | ३४८ | १-८३ |
| नायिकाप्रसाद | ३१० | १-५ | वसन्तवायव | ३३४ | १२०-१३७ | सतीवर्णनम् | ३५० | १-४१ |
| परस्परप्रसाद | ३१० | १-३२ | वसन्तपथिका | ३३५ | १३८-१८४ | असतीचरितम् | ३५१ | १-६३ |
| प्रियचाटूक्तय | ३१२ | १-७९ | ग्रीष्मववर्णनम् | ३३५ | १-१३० | पान्थसकेत | ३५४ | ६७-८८ |
| पानगोष्ठीवर्णनम् | ३१४ | १-६७ | ग्रीष्मगमयस्वभावाख्यानम् | ३३५ | ३-३२ | वेश्यागर्हणम् | ३५५ | १-५१ |
| द्यूतक्रीडावर्णनम् | ३१६ | १-६ | मध्याह्न | ३३६ | ३३-५८ | अष्टनायिका | ३५५ | १-१०३ |
| बाह्यरतक्रीडावर्णनम् | ३१६ | १-२८ | जलकेलिः | ३३७ | ५९-११६ | स्वाधीनपतिका | ३५५ | १-९ |
| आलिङ्गनम् | ३१६ | १-११ | प्रपापालिका | ३३९ | ११७-१२३ | खण्डिता | ३५५ | १०-२१ |
| चुम्बनम् | ३१६ | १२-१६ | ग्रीष्मवायव | ३३९ | १२४-१२६ | अभिसारिका | ३५६ | २२-४० |
| विहार | ३१७ | १७-२८ | ग्रीष्मपथिका | ३३९ | १२७-१३० | कलहान्तरिता | ३५७ | ४१-६८ |
| सुरतप्रशंसा | ३१७ | १-९ | वर्षावर्णनम् | ३४० | १-१११ | विप्रलब्धा | ३५८ | ६९-७९ |
| नववधूसंगमे सखीवाक्यम् | ३१७ | १-४ | वर्षासमयस्वभावाख्यानम् | ३४० | ५-७२ | प्रोषितभर्तृका | ३५५ | ८०-८७ |
| नववधूसंगम | ३१७ | १-१९ | दोलाकेलि | ३४२ | ७३-७७ | वासकसज्जा | ३५९ | ८८-९६ |
| सुरतकेलिकथनम् | ३१८ | १-५१ | वर्षावायव | ३४२ | ७८-८० | उत्का | ३५९ | ९७-१०३ |
| विपरीतरतकिया | ३२० | १-२१ | वर्षापथिका | ३४२ | ८१-९६ | वीररसनिर्देशः | ३६० | १-५१ |
| सुरतनिवृत्ति | ३२१ | १-३४ | वर्षापथिककामिनी | ३४३ | ९७-१०९ | करुणरसनिर्देशः | ३६१ | १-४१ |
| चन्द्रास्तसमयवर्णनम् | ३२२ | १-१४ | खद्योत | ३४३ | ११० | अद्भुतरसनिर्देशः | ३६३ | १-२३ |
| मध्यरात्रक्रीडावर्णनम् | ३२३ | १-५ | हंस | ३४४ | १११ | हास्यरसनिर्देशः | ३६३ | १-५६ |
| प्रभातवर्णनम् | ३२३ | १-६८ | शरद्वर्णनम् | ३४४ | १-५८ | भयानकरसनिर्देशः | ३६४ | १-१४ |
| प्रभातवायुवर्णनम् | ३२५ | १-४१ | शरत्समयस्वभावाख्यानम् | ३४४ | ४-४७ | बीभत्सरसनिर्देशः | ३६६ | १-२ |
| सूर्योदयवर्णनम् | ३२७ | १-२५ | भ्रमरक्रीडा | ३४५ | ४८-५४ | रौद्ररसनिर्देशः | ३६६ | १-५६ |
| नायिकानिर्गमनम् | ३२८ | १-६ | शरद्वायव | ३४५ | ५५-५६ | शान्तरसनिर्देशः | ३६७ | १-२६० |
| सभोगाविष्करणम् | ३२८ | १-२३ | शरत्पथिक | ३४५ | ५७-५८ | वैराग्यम् | ३६७ | १-११४ |
| प्रियप्रस्थानावस्थाकथनम् | ३२९ | १-२४ | हेमन्तवर्णनम् | ३४५ | १-५२ | विषयोपहाम | ३७१ | ११५-१३७ |
| सखीं प्रति नायिकावाक्यम् | ३३० | १-२ | हेमन्तसमयस्वभावाख्यानम् | ३४५ | ४-३३ | गर्भवासप्रयुक्तं दुःखम् | ३७२ | १३८-१४३ |
| अनित्यता निरूपणम् | ३७२ | १४४-१८८ | ||||||
| कालाचरितम् | ३७३ | १८९-२०४ | ||||||
| पश्चात्ताप | ३७४ | २०५-२३० | ||||||
| विचार | ३७५ | २३१-२६३ |
७. संकीर्णप्रकरणम्
संकीर्णश्लोका ३७७ | १-७०६
ABBREVIATIONS AND SOURCES
[ THE EDITOR EXPRESSES HIS GRATITUDE TO DR V RAGHAVAN FOR THE HELP AND CO-OPERATION KINDLY EXTENDED BY HIM ]
N. B.—NSP refers to a publication of the Nirnaya Sagar Press, by year, KM denotes a volume of the NSP Kāvyamālā Series, by number.
अनर्घ. रा = अनर्घराघवम् of Murāri, styled Bālavālmīki, son of Vardhamāna, 9th c A. D., probably patronised by a Kalacūri King of Māhiṣmatī NSP 1908
अमरु = अमरुशतकम् (also called Śṛṅgāraśataka) of Amaruka, 8th cent A D NSP 1929
अरसी = अरसीठाकुर probably Arisiṃha, teacher and associate of Amaracandra, of the time of Vastupāla, first half of the 13th cent A D
अलं कौ. = अलंकारकौस्तुभ of Viśveśvara Paṇḍita (Pāṇḍeya) of Almora, son of Lakṣmīdhara, beginning of the 18th cent NSP 1898
अलं स. = अलंकारसर्वस्वम् of Rājānaka Ruyyaka of Kashmīr, son of Tilaka, guru of Maṅkhuka, c 1150 A D NSP 1893
अ. शा , अ. शाकुं. = अभिज्ञानशाकुन्तलम् of Kālidāsa NSP 1947.
अष्ट. रत्न. = अष्टरत्नम् Ptd HAEBERLIN’s Anthology and Jīvananda’s Kāvyasaṁgraha
आनन्द (देवीश ) = देवीशतकम् of Ānandavardhana of Kashmīr, son of Nona, end of the 9th cent K M ix
आसी. प्र. = आसीननगरप्राकारप्रशस्ति quoted in the Śārṅgadharapaddhati
उत्तर. ; उत्तर. रा = उत्तररामचरितम् of Bhavabhūti, son of Nīlakaṇṭha and Jātūkarṇī He was a contemporary of Vākpatirāja and lived under Yaśovarman of Kanauj, beginning of the 8th cent A. D. NSP 1949.
औचित्य. = औचित्यविचारचर्चा of Kṣemendra of Kashmīr, styled Vyāsadāsa, pupil of Abhinavagupta, son of Prakāśendra, guru of Bhatta Udayasiṃha and prince Lakṣmaṇāditya, wrote under the Kashmīrian kings Ananta and Kalaśa, first half of 11th cent, K. M. i
कथार्ण. = कथार्णव of Śivadāsa, a late work
• कथास. = कथासरित्सागर of Somadeva of Kashmīr, son of Rāma,, written for Sūryamatī, queen of King Ananta (1028–1063 A. D.) NSP 1930 and also of Hermann Brockhaus
कवि. क. = कविकण्ठाभरणम् of Kṣemendra. K M iv, written under King Ananta See also above.
कविता. = कवितामृतकूप. A choice collection of Sanskrit couplets compiled and published in Calcutta, 1826
कवीन्द्र. = कवीन्द्रकण्ठाभरणम् of Viśveśvara Paṇḍita (Pāṇḍeya) K. M. viii. See above under Alaṅkāra Kaustubha
का. द ; काव्या. = काव्यादर्श of Daṇḍin, 7th cent. ed पं प्रेमचन्द्र तर्कवागीश, Bibl. Indica 1863 and also of Pt Rangacharya Reddy 1938.
का. नीति., कामं नी. = कामन्दकीयनीति: c. 700 A. D.; ed. Triv. Skt. Ser no xiv.
2
का प्र ; काव्य प्र = काव्यप्रकाशः of Mammaṭa Bhaṭṭa and Allaṭa (Alaka) (1050–1100 A D) Ed Vāmanācārya Jhalakīkar 1917.
काव्यप्र = काव्यप्रदीप of Govinda Bhaṭṭa (Ṭhakkura) of Mithilā, son of Keśava, c end of 15th cent NSP 1933.
काव्यालं = काव्यालंकार of Rudraṭa surnamed शतानन्द, son of Vāmuka (850 A D) NSP 1886
काव्यालं सू = काव्यालंकारसूत्राणि of Vāmana, minister under Jayāpīḍa of Kashmīr (779–813 A. D.) NSP 1926
काशीखं = काशीखण्ड from Skandapurāṇa
किरात = किरातार्जुनीयम् of Bhāravi, first mentioned in the Aihole inscription (634 A D), c 550 A. D NSP 1942.
कुट्टनीमत. = कुट्टनीमतम् of Dāmodaragupta, of the court of Jayāpīḍa of Kashmīr (779–813 A D) KM III, edited also with commentary by T. M. Tripathi, Gujarati Printing Press, Bombay, 1924
कुमार = कुमारसम्भवम् of Kālidāsa NSP 1946
कुव = कुवलयानन्द of Appayya Dīkṣita of Tamil country, author of 104 works, patronised by Cinna Bomma of Vellore and Venkatapatirāya of Vijayanagar, flourished between 1552 and 1624 or 1520 and 1593. NSP 1942
कृष्ण कर्ण = कृष्णकर्णामृतम् of Līlāśuka-Bilvamaṅgala, son of Dāmodara and Nīlī, pupil of Īśānadeva, 11th cent
क्षेमेन्द्र = See above under Aucityavicāracarcā and Kavikaṇṭhābharaṇa, author also of Kavikaṇikā, Suvṛttatilaka, Rāmāyaṇamañjarī, Bhāratamañjarī, Bṛhatkathāmañjarī, Lāvaṇyavatī, Nītilatā, Munimatamīmāṃsā Caturvarga saṅgraha, Bauddhāvadāna-kalpalatā, Avasarasāra, Lalitaratnamālā, Citrabhāratanāṭaka, Vātsyāyanasūtrasāra, Samayamātṛkā, Pavanapañcāśikā, Sevyasevakopadeśa, Cārucaryā, Kalāvilāsa, Padya-Kādambarī, Śaśivaṃśa, Kanakajānakī, Deśopadeśa, Narmamālā, Muktāvalī, Amṛtataraṅgakāvya, Darpadalana, Daśāvatāracarita, Rājāvalī, Lokaprakāśa, Vinayavallī and Vyāsāṣṭaka
खण्डप्र , खण्डप्रशस्ति = खण्डप्रशस्तिकाव्यम् attributed to Hanūmat Kavi, a Ms
गरुड = गरुडपुराणम् NSP 1938.
गीत = गीतगोविन्दम् or अष्टपदी of Jayadeva Miśra of Kindubilva in Orissa, son of Bhojadeva, flourished in the court of Lakṣmaṇasena of Bengal, 12th cent. A D. NSP 1949
गुण., गुण. रत्न. = गुणरत्नम् Subhāṣita, ascribed to Bhavabhūti Ptd Haberlin's Anthology and Jīvananda's Kāvyasaṃgraha
गोभट्ट = गोभट्ट or गोपभट्ट Styled Sūci-Gobhaṭa, quoted in Saduktikarṇāmṛta and Sūktimuktāvalī.
घट. ख = घटखर्परकाव्यम् of Ghaṭakharpara (also called यमककाव्यम्), of ten attributed to Kālidāsa. Ptd. in the Kashmir Text Series with Abhinavagupta's commentary
चाणक्य = चाणक्यनीतिसार of Cāṇakya ed Haberlin
3
चातका. = चातकाष्टकम् Ptd. in Hæberlin's Anthology
चा. नी. = (लघु) चाणक्यशतकम् of Cāṇakya, a Ms.
चोर. पं = चौरपञ्चाशिका of Bilhaṇa of Kashmīr, came south to the Cālukya court of Vikramāditya VI (1076–1127 A. D.) ed Bohlen
छलित = छलितरामनाटकम् quoted in Daśarūpa, Sarasvatīkaṇṭhābharaṇa, Śṛṅgāraprakāśa, Nāṭyadarpaṇa, etc
ज्योतिस्तत्त्व = of Raghunandana Bhaṭṭācārya (A. D. 1490–1570), quoted in the Nirṇayasindhu (1612)
दंपती., दं. = दम्पतीशिक्षा of Nīlaratnaśarma ed श्रीरामपुर सन् १२४० (A. D. 1813) (Bengali and Sanskrit)
दर्प द = दर्पदलनम् of Kṣemendra. See above. KM vi
दश, दशरू = दशरूपकम् of Dhanañjaya, son of Viṣṇu, of the court of king Muñja-Vākpatirāja of Dhārā (974 A. D), brother of Dhanika, author of Daśarūpāvaloka. NSP 1941
दशकु = दशकुमारचरितम् of Daṇḍin. See above under Kāvyādarśa NSP 1951
दृ श., दृष्टांत. = दृष्टान्तकलिकाशतकम् or दृष्टान्तशतकम् of Kusumadeva, quoted by Vallabhadeva, in his Subhāṣitāvali. KM xiv and also cf Haeberlin's Anth
धनंजय = धनञ्जयविजयव्यायोग of Kāñcana, son of Nārāyaṇa Vāgīśvara, wrote by the order of King Jayadeva, in his court, presided over by Gadādhara, quoted by Siṃhabhūpāla (Rasārṇavasudhākara c 400)
धर्म.; धर्मवि. = धर्मविवेक of Halāyudha (1000–1100 A. D.) Haeberlin Anth
धूर्तस. = धूर्तसमागम of Jyotirīśvara Kaviśekhara of Mithilā 14th cent. A. D. Ed. CAPPELLER and LASSEN
ध्वन्या = ध्वन्यालोक of Ānandavardhana. See above under Devīśataka. NSP 1935.
नकुल. = Mentioned in Brahmavaivaswatapurāṇa
न. र. = नवरत्नस्तोत्रम् Ptd HABERLIN
नल. चं = नलचम्पू or दमयन्तीकथा of Trivikrama Bhaṭṭa, of Śāṇḍilya gotra, son of Nemāditya and grandson of Śrīdhara, composed the Nausari inscription of Rāṣṭrakūṭa Indra III in 915 A D NSP 1931.
नव साहसाङ्क. = नवसाहसाङ्कचरितम् of Padmagupta alias Parimala, c 1005 A D, celebrates Sindhurāja of Malwa
नागा. = नागानन्दम् of King Harṣavardhana, 7th century A. D. Triv. Skt. Series no. LIX
नीतित. = नीतितरङ्ग of Viśveśvaradatta
नीति. स. = नीतिसंकल्प Ed Gildemeister lib.
नीतिम. = नीतिप्रदीप of Vetāla Bhaṭṭa, Ptd HABERLIN and JIVANANDA.
नै.; नैषध = नैषधीयचरितम् of Śrīharṣa, son of Hīra and Māmalladevī; wrote under Vijayacandra and Jayacandra of Kanauj, 2nd half of the 12th century A. D. NSP 1952 and Calcutta 1836
पंच. रत्न. = पंचरत्नस्तोत्रम् Ptd HABERLIN.
प. त., पंच. = पञ्चतन्त्रम् of Viṣṇuśarman with Saralā Comm. NSP 1950 and also cf. Kosegarten.
4
पद्यवेणी = पद्यवेणी of Venīdatta, son of Jagajjīvana, composed in 1644 A. D. Ptd. Calcutta.
पद्य. सं. = पद्यसंग्रह of Kavībhatta. Ptd. Haeberlin.
पार्वती. प = पार्वतीपरिणयम् of Vāmanabhaṭṭa-bāṇa, son of Komatīyajvan and pupil of Vidyāraṇya, patronised by Komati Vemabhūpāla of Koṇḍavīḍu, beginning of the 15th cent. NSP 1923.
पुष्प. मा = पुष्पमालाकाव्यम् of Candraśekhara, the father of Viśvanātha author of the Sāhityadarpaṇa (1300–1384 A. D.)
पूर्वचातका = पूर्वचातकाष्टकम् Ptd. Jīvānanda, Kāvyasaṁgraha and also edited by Śrī Dīnānātha Nyāyaratna, 1869.
प्रदीप. = प्रक्षेप
प्रबो , प्रबोध चं = प्रबोधचन्द्रोदयम् of Kṛṣṇamiśra, written for the Candella King Kīrtivarman, 2nd half of the 11th, cent. A. D. NSP 1985.
प्र. भ , प्रसंगाभ. = प्रसंगाभरणम् an anthology, Ptd. Grantharatnamālā IV. nos. 10, 11 Bombay.
प्र. रा. , प्र. राघव = प्रसन्नराघवम् of Jayadeva poet and logician, son of Mahādeva and Sumitrā known also as Pakṣadharamiśra and Pīyūṣavarṣa, author of Candrāloka etc., 13th cent. A. D. NSP 1922.
बाल रा = बालरामायणम् Nāṭaka of Rājaśekhara, author of Kāvyamīmāṁsā, Haravilāsa etc., son of Durduka and Śīlavatī, flourished in the courts of Mahendrapāla and Mahīpāla of Kanauj, beginning of the 10th cent. A. D.
बिल्हण = See above under Corapañcāśikā. Author also of Vikramāṅkadevacarita, and Karṇasundarī, from Kashmir migrated to the court of Karṇa of Dāhala, Cālukya Karṇadeva of Aṇhilvaḍ (1064–94) and Cālukya Vikramāditya of Kalyāṇ (1076–1127).
बृह. नीति. = बृहस्पतिनीतिसार (गरुडपुराण)
ब्रह्मांड. = ब्रह्माण्डपुराणम् Bombay edn.
भट्टि = भट्टिकाव्यम् of Bhaṭṭi or Bhaṭṭisvāmin, written in Valabhī under Śrīdharasena, 7th cent. A. D. NSP 1934.
भर्तृ. = भर्तृहरिशतकत्रयम् of Bhartṛhari ed. Bohlen. See below under Bhartṛhari Subhāṣita Saṁgraha.
भर्तृ. सं = भर्तृहरिसुभाषितसंग्रह a collection of couplets generally attributed to Bhartṛhari. Critical edn. by Prof. D. D. Kosambi.
भल्लट. = भल्लटशतकम् of poet Bhallaṭa, wrote in the reign of Śaṅkaravarman of Kashmir (883–902). K. M. IV.
भविष्य - भविष्यपुराणम् Bombay edn.
भा , भार = महाभारतम् Calcutta ed. 1834–39, also Bombay edn. with Nīlakaṇṭhī commentary.
भाग. = भागवतपुराणम् NSP 1950 and also ed. Burnouf.
भामिनी. = भामिनीविलास of Jagannātha Paṇḍitarāja, a Tailaṅga brahmin, son of Perubhaṭṭa, pupil of his father and Śeṣa Vīreśvara at Benares, flourished in the court of Shah Jehan (1628–1658 A. D.), patronised also by Asaf Khan of the same court (died 1641 A. D.), and prince Dara Shikoh and King Prāṇanārāyaṇa of Assam. NSP 1928.
5
भाव. = भावशतकम् of Bhāvamiśra, a Ms
भोज , भोजप्र = भोजप्रबन्ध of Ballāla, 16th cent A. D. NSP 1932.
अमरा = अमराष्टकम् Ptd Jīvānanda, Kāvyasaṁgraha.
म , मनु. = मनुस्मृति of Manu with comm of Kullūkabhaṭṭa NSP 1946.
म. वी. च , महावीर = महावीरचरितम् of Bhavabhūti. See above under Uttararāma-carita. NSP 1926.
महा. ना = महानाटकम् of Hanūmat Kavi, 11th cent. A. D. Gildemeister's Lib
मात्स्य पु = मात्स्यपुराणम् Bombay edn
मा. मा ; मालती. = मालतीमाधवम् of Bhavabhūti. See above under U. R. Carita. NSP 1937.
मालवि = मालविकाग्निमित्रम् of Kālidāsa. NSP 1935.
मुकुंद. = मुकुन्दमाला of Kulaśekhara, traditionally identified with the Tamil Vaiṣṇava Saint, the Cera king of that name, hymn earlier than the 10th cent A D NSP 1952.
मुद्रा. रा. = मुद्राराक्षसम् of Viśākhadatta, 9th cent A. D NSP 1935.
मुरा. ; मुरारि = See above under Anargharāghava.
मृच्छ. = मृच्छकटिकम् of Śūdraka NSP 1950
मेघ. = मेघदूतम् of Kālidāsa. NSP 1935.
मोहमुद्ग. = मोहमुद्गरम् Ascribed to Śaṅkarācārya Haberlin's Anth.
याज्ञ. = याज्ञवल्क्यस्मृति of Yājñavalkya Muni NSP 1926
योगयात्रा. = योगयात्रा of Varāhamihira, died 586 A D
रघु. = रघुवंशम् of Kālidāsa with comm of Mallinātha and extracts from 5 comm. NSP 1948
रत्ना. = रत्नावली Nāṭikā of Harṣavardhana See above under Nāgānanda. NSP 1938
र. ; रामायण. = रामायणम् of Vālmīki NSP 1930 and also ed. Schlegel.
रवि = (भदन्त) रविगुप्त author of the Candraprabhāvijaya, quoted in the Jaya-maṅgalā on the Kāmasūtras.
रसगं. = रसगंगाधर of Jagannātha Paṇḍitarāja. See above under Bhāminīvilāsa. NSP 1947
राज. त. ; राज = राजतरंगिणी of Kalhaṇa of Kashmīr, son of Campaka, minister of Harṣa, written in 1149–50 A. D under Jayasiṁha Ptd. Calcutta 1835.
राजेन्द्र. = राजेन्द्रकर्णपूर of Śambhu Kavi of Kashmir, written in praise of King Harṣa of Kashmīr (1089–1101), Śambhu wrote also Anyoktimuktālatā (KM III) and is mentioned by Maṅkhuka (SKC XXV. 96–97) as the father of the celebrated vaidya Ānanda.
राघव. = राघवदेव. father of Gopāla, Dāmodara and Devadāsa, grandfather of Śār-ngadhara (au. of Śārṅgadharapaddhati), flourished in the court of Hammīra (died 1295 A. D.).
†
6
राघवचैतन्य = Au of Mahāganapatistotra (K M I) and Kavikalpalatā (?), quoted in Sārṅgadharapaddhati.
राघववि. = राघवविलासकाव्यम् of Viśvanātha Kavirāja, quoted in साहित्यदर्पण.
राघवा. = राघवानन्द quoted in साहित्यदर्पण.
रामरक्षा = of Valmīki
लक्ष्मणसेन = King of Bengal, son of Ballāla Sena and patron of Jayadeva, Umāpatidhara, Dhoyī and Govardhana, completed the Adbhutasāgara begun in 1168 A. D. by his father
लटक = लटकमेलकप्रहसनम् of Śaṅkhadhara au. of Kavikarpaṭikā, written under Govindacandra of Kanauj in the beginning of the 12th cent. NSP 1900
वराह. = वराहपुराणम् Bombay edn
वाक्यप. जोन. = जोनराज's commentary on वाक्यपदीय a work on the philosophy of grammar, by Bhartṛhari.
वानरा. = वानराष्टकम् Ptd. Haberlin and Jivananda.
वानर्य. = वानर्यष्टकम् Ptd. Haberlin and Jivananda
वामन सू = काव्यालंकारसूत्राणि See above under Kāvyālaṅkārasūtrāṇi.
वायु. = वायुपुराणम् Bombay edn
वाल्मी. = वाल्मीकिः
वासवदत्ता. = वासवदत्ता of Subandhu, middle of 7th cent. A. D. ed. Fitz Edward Hall in Bibl Ind.
वासिष्ठ. = योगवासिष्ठम् attributed to Vālmīki, 11th century (?) NSP 1937.
विक्रम ; विक्रमच. = विक्रमचरितम् or Lekhārambha, a Ms
विक्रम. उ., विक्रमो = विक्रमोर्वशीय of Kālidāsa NSP 1942.
विक्रमाङ्क. दे = विक्रमाङ्कदेवचरितम् of Bilhaṇa, historical poem on Cālukya Vikramāditya VI Tribhuvanamalla (1076–1127 A. D.) of Kalyāṇ See above under Corapañcāśikā and Bilhaṇa
विदग्ध मु. = विदग्धमुखमण्डनम् enigmatology of the Buddhist Dharmadāsa. NSP 1926.
विद्ध. शा., विद्ध. = विद्धशालभञ्जिका नाटिका of Rājaśekhara. See above under Bālarāmāyaṇa Ed. K. R. Godbole, Poona 1886 and also a Ms
विष्णु. पुराण. = विष्णुपुराणम् Bombay edn.
वृ. चा., वृ. चाणक्य. = (वृद्ध) चाणक्यशतकम् of Cāṇakya. Ed. Bombay संवत् १९१५.
वे. = वेतालपंचविंशतिका a Ms
वेणीदत्त = author of Padyaveṇī and Pañcatattvaprakāśikā (Lex); son of Jagajjīvana grandson of Lakṣmaṇa See above under पद्यवेणी
वेणी , वे. सं = वेणीसंहारम् of Bhaṭṭa Nārāyaṇa, before 800 A. D. NSP 1905
शशि. वं = शशिवंश of Kṣemendra See above under Aucityavicāracarcā and Kṣemendra.
शां श ; शांतिश. = शान्तिशतकम् of Śilhana, before 1205 A. D. Ptd. HABERLIN and JIVANANDA.
7
शा. प. = शार्ङ्गधरपद्धति of Śārṅgadhara. See above under Rāghavadeva, compiled in 1363 A. D Ed. Dr P. Peterson 1888
शार्ङ्गधर. = author of the Śārṅgadharapaddhati. See above
शिशु. = शिशुपालवधम् (also called माघकाव्यम्) of Māgha son of Dattaka Sarvāśraya, and grandson of Suprabhadeva minister of Varmalāta, 7th century A. D. NSP 1933.
शुक. = शुकसप्तति ed Lassen, also some Mss.
शं., शं. ति. = शृङ्गारतिलकम् of Rudra Bhatta, KM III 9th-10th century A. D., au. also of a work Tripuravadha
शृंगारति. ; शृंगार. = शृङ्गारतिलकम् attributed to Kālidāsa NSP 1952
शृंगारश. = शृङ्गारशतकम् of Amaruka See above under Amaru
शौनकी. नी. = शौनकीयनीतिसार (गरुडपुराण)
श्रीकंठ. च. = श्रीकण्ठचरितम् of Mankhaka, son of Viśvāvarta, author of Mankhakośa etc., 1135–45 A D. NSP 1900.
सं. पाठोप. = संस्कृतपाठोपकारकत्तत्त्वबोधिनी
स. कं. = सरस्वतीकण्ठाभरणम् of Bhoja (1005–1055 A. D.), NSP 1934.
सप्त. रत्न. = सप्तरत्नम् Ptd Jivananda's Kāvyasaṁgraha
सहृदया. = सहृदयानन्दम् of Kṛṣṇānanda of Kapiñjala race, quoted in साहित्यदर्पण. NSP 1910.
साहि. कौ. = साहित्यकौमुदी of Baladeva Vidyābhūṣaṇa, of the Caitanya School, wrote his Utkalikāvallarī in 1765 A D, refers to Pratāparudra Gajapati of Orissa. NSP 1897
सा. द. = साहित्यदर्पणम् of Viśvanātha Kavirāja, son of Candraśekhara, great grandson of Nārāyaṇa He quotes his works Candrakalā, Kuvalayāśvacarita, Prabhāvatī–pariṇaya, Praśastiratnāvalī and Rāghavavilāsa in his सा. द (c 1300–1380 A. D) NSP 1931.
साधन. = साधनपञ्चकम् of Śaṅkarācārya NSP 1952
सु. = सुभाषितावलि: of Vallabhadeva of Kashmir, quoted by Sarvānanda in his commentary on the Amarakośa (1160 A. D.), text inflated later. Ed Dr Peterson 1886
सुवृत्त. ति. = सुवृत्ततिलकम् of Kṣemendra, see above under Aucityavicāracarcā and Kṣemendra KM II
सुश्रु. = सुश्रुतसंहिता of Suśruta NSP 1938
सूक्ति. = सूक्तिमुक्तावलि of Jalhaṇa, surnamed Ārohaka-Bhagadatta, edn. GOS, no. 82 Compiled for him by Vaidya Bhānu Paṇḍita in A. D 1257, during the reign of the Yādava King Kṛṣṇa of Devagiri.
सूक्ति. स. = सूक्तिसहस्रम् a collection of thousand elegant verses.
सूर्य. श. = सूर्यशतकम् or मयूरशतकम् of Mayūra, 7th century NSP 1927.
स्कान्द. = स्कन्दपुराणम् Bombay edn
8
हनु. ; हनु. ना = हनुमन्नाटकम् of Hanūmat Kavi See above under Mahānāṭaka. Ptd. Sanskrit Book Depot, Benaras, 1934
हरवि = हरविजय of Ratnākara, of Kashmī, styled Vāgīśvara Ja, flourished under Jayāpīda and Avantivarman, middle of 11th cent NSP 1914
हरि , हरिवं. = हरिवंशम् ed Calcutta also Bombay शके 1783.
हर्ष = श्रीहर्ष
हि. = हितोपदेश of Nārāyaṇa Paṇḍita, c 10th-14th A. D. NSP 1947.
श्रीः
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
●
प्रथमं मङ्गलाचरणप्रकरणम्
परब्रह्म
अथ स्वस्थाय देवाय नित्याय हतपाप्मने । त्यक्तक्रम-
विभागाय चैतन्यज्योतिषे नमः ॥ १ ॥ दिक्कालाद्यनव-
च्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये । स्वानुभूत्येकमानाय नमः शा-
न्ताय तेजसे ॥ २ ॥ अनन्तनामधेयाय सर्वाकारविधायिने ।
समस्तमन्त्रवाच्याय विश्वैकपतये नमः ॥ ३ ॥ कर्णिकादि-
ष्विव स्वर्णमर्णवादिष्विवोदकम् । भेदिश्वभेदि यत्तस्मै परस्मै
महसे नमः ॥ ४ ॥ नमो वाङ्मनसातीतमहिम्ने परमेष्ठिने ।
त्रिगुणाष्टगुणानन्तगुणनिर्गुणमूर्तये ॥ ५ ॥ यथा तथापि यः
पूज्यो यत्र तत्रापि योऽर्चितः । योऽपि वा सोऽपि वा
योऽसौ देवस्तस्मै नमोऽस्तु मे ॥ ६ ॥ नमः स्वतन्त्रचिच्छक्ति-
मुद्रितस्वविभूतये । अव्यक्तव्यक्तरूपाय कस्मैचिन्मन्त्रमूर्तये
॥ ७ ॥ चराचरजगत्स्फारस्फुरत्तामात्रधर्मिणे । दुर्विज्ञेय-
रहस्याय युक्तैरप्यात्मने नमः ॥ ८ ॥ भवबीजाङ्कुरजलदा
रागाद्याः क्षयमुपागता यस्य । ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो
जिनो वा नमस्तस्मै ॥ ९ ॥ नित्यं निरावृति निजानुभवैक-
मानमानन्दधाम जगदङ्कुरबीजमेकम् । दिग्देशकालक-
लनादिसमस्तहस्तमर्दासद्दिशतु शर्म महन्महो वः
॥ १० ॥ लोकत्रयस्थितिलयोदयकेलिकारः कायेण यो
हरिहरद्रुहिणत्वमेति । देवः स विश्वजनवाङ्मनसातिवृत्त-
शक्तिः शिव दिशतु शश्वदनश्वरं वः ॥ ११ ॥ सर्वः
किलायमवशः पुरुषाणुकर्मकायादिकारणगणो यदनु-
ग्रहेण । विश्वप्रपञ्चरचनाचतुरत्वमेति स त्रायता त्रि-
भुवनैकमहेश्वरो वः ॥ १२ ॥ मध्याह्नार्कमरीचिकास्विव
पयःपूरो यदज्ञानतः खं वायुर्ज्वलनो जलं क्षितिरिति त्रैलो-
क्यमुन्मीलति । यत्तत्त्व विदुषा निमीलति पुनः स्रग्भोगि-
भोगोपमं सान्द्रानन्दमुपासहे तदमलं स्वात्मावबोधं महः
॥ १३ ॥ यस्माद्विश्वमुदेति यत्र रमते यस्मिन्पुनर्लीयते
भासा यस्य जगद्विभाति सहजानन्दोज्ज्वलं यन्महः ।
शान्तं शाश्वतमक्रियं यमपुनर्भावाय भूतेश्वरं द्वैतध्वान्तम-
पास्य यान्ति कृतिनः प्रस्तौमि तं पूरुषम् ॥ १४ ॥ यः
सृष्टिस्थितिसंहृतीर्वितनुते ब्रह्मादिमूर्तिन्त्रिकैर्यस्याधीनतया
स्थितानि सदसत्कर्माण्यपि प्राणिनाम् । नित्येच्छाकृतिबुद्धि-
मानथ परो जीवात्परात्मा स्वय सोऽयं वो विदधातु पूर्ण-
मचिराच्चेतोगतं यद्भवेत् ॥ १५ ॥ शक्यं यन्न विशेषतो
निगदितुं प्रेम्णैव यच्चिन्तितं मृद्गङ्गीवदनेन्दुमण्डलमिव
स्वान्ते विधत्ते मुदम् । यन्मुग्धानयनान्तचेष्टितमिवीध्यक्षे-
ऽपि नो लक्षितं तत्तेजो विनयादमेन्दहृदयानन्दाय वन्दा-
महे ॥ १६ ॥ विष्णुर्वा त्रिपुरान्तको भवतु वा ब्रह्मा सुरे-
न्द्रोऽथवा भानुर्वा शशलक्षणोऽथ भगवान्बुद्धोऽथ सिद्धो-
ऽथवा । रागद्वेषविषार्तिमोहरहितः सत्त्वानुकम्पोद्यतो यः
सर्वैः सह संस्मृतो गुणगणैस्तस्मै नमः सर्वदा ॥ १७ ॥
विश्वेशो वः स पायात्त्रिगुणैरुसचितवता योऽवलम्ब्यौऽनुवारं
विश्वैन्द्रीचीनसृष्टिस्थितिविलयमजः स्वच्छया निर्मितीते ।
यस्यैर्यत्तामतीत्य प्रभवति महिमा कोऽपि लोकव्यतीतस्त्यक्तो
यश्चश्वुरौरैरपि निपुणतमैर्वीक्षणादिक्रियासु ॥ १८ ॥ ब्रह्मा
दक्ष कुवेरो यमवरुणमरुद्वह्निश्चन्द्रेन्द्ररुद्राः शैला नद्यः
टिप्पणी (Footnotes)
| १ नाशितकिल्विषाय | १ ब्रह्माभिन्नतया तत्त्वेन अभावेषयीभर्वात |
| २ विधि | २ खवाय्वादि-रूपतद्विन्नत्वेन भ्रमाविषयीभवति. |
| ३ अविषयीकृता | ३ भ्रमेण गृहीतो मालया सर्पकाय इव. |
| ४ प्रमाणम् | ४ निर्विनानन्दस्वरूपम् |
| ५ आकाशे दृश्यमानगलजलायमानरश्मिसमूह, मृगतृष्णेति यावत् | ५ ब्रह्मात्मकज्ञानस्वरूपम् |
| ६ तेज | |
| ७ निश्चलम् | |
| ८ पुनरुत्पत्यभावाय. | |
| ९ आनन्दम् | |
| १० समीपेऽस्सेऽपि | |
| ११ बहु | |
| १२ सत्त्वरजस्तमःसहायताम् | |
| १३ वारंवारम्. | |
| १४ चराचरनिष्ठम् | |
| १५ सीमाम्. | |
| १६ सकललोकातीतः |
| २ | सुभाषितरत्नभाण्डागारम् | [ १ प्रकरणम् |
|---|
समुद्रा ग्रहगणमनुजा दैत्यगन्धर्वनागाः। द्वीपा नक्षत्र-
ताराविबवसुमनयो व्योम भूरश्विनौ च सलीना यस्य सर्वे
वपुषि स भगवान् पातु वो विश्वरूपः ॥ १९ ॥
गणेशः
वन्दे वेन्दारुमन्दार$^{१}$मिन्दुभूषणनन्दनम् । अमन्दान-
न्दसन्दोहबन्धुरं$^{२}$ सिन्धुराननम्$^{३}$ ॥ १ ॥ आलम्बे जगदा-
लम्बे$^{४}$ हेरम्बचरणाम्बुजे । शुष्यन्ति यद्रजःस्पर्शात्सद्यः
प्रत्यूहवार्धयः$^{५}$ ॥ २ ॥ गजाननाय महसे प्रत्यूहतिमिर-
च्छिदे । अपारकरुणापूरतरङ्गितदृशे नमः ॥ ३ ॥ नमस्त-
स्मै गणेशाय यत्कण्ठः पुष्करायते$^{६}$ । मदामोघघनध्वानो$^{७}$
नीलकण्ठस्य ताण्डवे ॥ ४ ॥ अगजाननपद्मार्कं$^{८}$ गजाननम-
हर्निशम् । अनेकदं तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे$^{९}$ ॥ ५ ॥
चलत्कर्णानिलोद्भूतसिन्दूरारुणिताम्बरः । जयत्यकालेऽपि
सृजन्सन्ध्यामिव गजाननः ॥ ६ ॥ एकदन्तद्युतिसितः शम्भोः
सूनुः श्रियेऽस्तु वः । विद्याकन्द इवोद्भिन्नवाङ्मनो-
हरः ॥ ७ ॥ अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।
सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ ८ ॥ दुरितस-
मूहबलाहकपटलिसंहरणपवमानम् । शिवयोरङ्गाभरणं वन्दे
कचिद्गजाननं तेजः ॥ ९ ॥ अविरलविगलन्मदजलकपोल-
पालिनीलिनमधुपकुलः । उद्भिन्ननवश्मश्रुरणिरिव द्विपमुखो
जयति ॥ १० ॥ एकरद द्वैमातुर निस्त्रिगुण चतुर्भुजोऽपि
पञ्चकर$^{१०}$ । जय षण्मुखनुत सचन्द्रगन्धमदौघतनुतनय$^{११}$
॥ ११ ॥ मङ्गलकलशद्वयमयकुम्भमदम्भेन भजत गजवद-
नम् । यद्दानतोयतरलैस्तिलतुलनालम्बि रोलम्बैः ॥ १२ ॥
शिवयोः सुधाहारिद्रादीप्तिमतः सारभुजगत्यित्रोः । त्रिभुवन-
विघ्नध्वंसी करिकल्पः कश्चिदरुणिमा जयति ॥ १३ ॥
युगपत्स्वगण्डचुम्बनलोलौ$^{१२}$ पितरौ निरीक्ष्य हेरम्बः । तन्मु-
खमेलनकुतुकी स्वाननमपनीय परिहसन्नपायात् ॥ १४ ॥
हस्तपङ्कजनिविष्टमोदकव्याजसञ्च्रदशेषपुमर्थम् । नौमि
किंचिदवधूतितशुण्डादण्डकुण्डलितमण्डितगण्डम् ॥ १५ ॥
अन्तरायतिमिरोपशान्तये शान्तपावनमचिन्त्यवैभवम् । त-
न्नरं$^{१३}$ वपुषि कुञ्जरं मुखे मन्महे किमपि तुन्दिलं महः ॥ १६ ॥
अशेषविघ्नप्रतिषेधदक्षमन्त्राक्षतानामिव दिक्मुखेषु । विक्षेप-
लीला करशीकराणां करोतु वः प्रीतिमभाननस्य ॥ १७ ॥
दन्ताग्रनिर्भिन्नहिमाचलोर्वीरन्ध्रोत्थिताहीन्द्रमणिप्रमौघे$^{१}$ ।
नागाननं स्तम्भधिया कपोलौ घर्षन्पितुर्भया हसितः पुनातु$^{२}$
॥ १८ ॥ दन्ताञ्चलेन धरणीतलमुन्नमय्य पातालकेलिषु
धुतादिवराहलीलम् । उल्लाघनोत्फणफणाधरगीयमानक्रीडा-
वदानमभिरराजमुखं नमामः ॥ १९ ॥ आनन्दमात्रमकरन्द-
मनन्तगन्धं योगीन्द्रसुस्थिरमिलिन्दमपास्तबन्धम् । वेदान्त-
सूर्यकिरणैकविकासशीलं हेरम्बपादशरदम्बुजमानतोऽस्मि
॥ २० ॥ गण्डस्थलीगलदमन्दमदप्रवाहमाह्याङ्गिरेफमधुरस्वर-
दत्तकर्णः । हर्षादिवालसनिमीलितनेत्रयुग्मो विघ्नच्छिदे
भवतु भूतपतिर्गणेशः ॥ २१ ॥ लक्ष्मीं तनोतु सुतरा-
मितरानपेक्षमङ्घिद्वयं निगमशाखिशिखाप्रवालम् । हैरम्बम-
म्बुरुहडम्बरचौर्यनिघ्नं$^{३}$ विघ्नाद्रिभेदशतधार$^{४}$धुरंधरं नः ॥ २२ ॥
पायाद्गजेन्द्रवदनः स इमां त्रिलोकीं यस्योद्गतेन गगने महता
करेण । मूलावलग्नसितदन्तबिसार्ङ्कुरेण नालायितं तपनबिम्ब-
सरोरुहस्य ॥ २३ ॥ अविरलमदधाराधौतकुम्भः शरण्यः फणि-
वरवृतगात्रः सिद्धसाध्यादिवन्द्यः । त्रिभुवनजनविघ्नध्वान्त-
विध्वंसदक्षो वितरतु गजवक्त्रः सततं मङ्गलं वः ॥ २४ ॥
जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजाद्वलिं बघ्नता स्रष्टुं वारि-
भवोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तुं धराम् । पार्वत्या महिषासुर-
प्रमथने सिद्धाधिपैः सिद्धये ध्यातः पञ्चशरेण विश्वजितये
पायात्स नागाननः ॥ २५ ॥ विध्वध्वान्तनिवारणैकतरणि-
र्विघ्नाटवीहव्यवाड्डिघ्न्यालकुलाभिमानगरुडो$^{५}$ विघ्नेभपञ्चा-
ननः । विघ्नोत्तुङ्गगिरिप्रभेदनपविर्विघ्नाम्बुधौ वाडवो विघ्ना-
घौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु वः ॥ २६ ॥ उच्चैर्ब्र-
ह्माण्डखण्डद्वितयसहचरं कुम्भयुग्मं दधानः प्रेङ्खच्छृंगारिप-
क्षेप्रैतिभटविकटश्रोत्रतालाभिरामः$^{६}$ । देवः शभोरपत्यं भुजग-
पतितनुस्पर्धिवर्धिष्णुहस्तँस्त्रैलोक्याश्चर्यमूर्तिः$^{७}$ स जयति
जगतामीश्वरः कुञ्जरास्यः ॥ २७ ॥ दोर्योतद्दन्तखण्डः
सकलसुरगणाडम्बरेषु प्रचण्डः सिन्दूराकीर्णगण्डः प्रक-
टितविलसच्चारुचान्द्रीवखण्डः$^{८}$ । गण्डस्यान्तर्तैघेण्डः$^{९}$ खरहर-
तनयः कुण्डलीभूतशुण्डो$^{१०}$ विन्नानां कालदण्डः स भवतु
भवतां भूतये वक्रतुण्डः ॥ २८ ॥ विघ्नेशो वः स पाया-
द्विहतिषु जलधीन्पुष्कराग्रेण पीत्वा यस्मिंश्चुदृत्य तोयं व-
मति तदखिलं दृश्यते व्योम्नि देवैः । क्वाप्यम्भः क्वापि
विष्णुः क्वचन कमलभूः क्वाप्यनन्तः क्वचिच्छ्रीः क्वाप्यौर्वः$^{११}$
पादटिप्पण्यः (Left Footnotes):
१ भक्तजनकल्पवृक्षम् २ सुन्दरम् ३ गजाननम् ४ जगदाधारभूते ५ विघ्नसमुदा ६ मृदङ्गवदाचरति ७ निबिडध्वनि ८ पार्वती. ९ मोक्षभानेनवस्तुदातारम् १० गणेशम् ११ पार्वती गङ्गारूपमातृद्वयवत्वादित्यर्थ १२ शुण्डामदाय पञ्चकरत्वमित्यर्थ १३ अष्टमूर्तिर्महादेव १४ अमरै १५ चूर्णम् १६ हस्तितुल्य १७ कुम्भौ १८ विघ्न
पादटिप्पण्यः (Right Footnotes):
१ दन्ताग्रेण. २ हर्षितं ३ अधीनम् ४ वज्रम् ५ मङ्गणा. ६ मदेनेन. ७ अग्नि ८ तुल्यम् ९ आधुन्वन् १० गरुड ११ प्रतिस्पर्धी १२ शुण्डादण्ड. १३ अमरः १४ शुण्डाग्रेण १५ शेष १६ वाडवः.
गणेशः, सरस्वती, शिवः ३
[गणेशः]
कापि शैलाः क्वचन मणिगणाः कापि नक्रादिसत्त्वाः ॥२९॥
विघ्नेशःस्र्वैविघ्नान्परिहरतु स यत्कर्णतालादुदञ्चद्वायुध्याधूत-
कण्ठस्थल्युगलगलद्गूरिसिन्दूरपूरैः । आरुण्याद्वैतभावं
गतवति जगति कापि नो भाति भानुर्नैवासौ शीतभानु
क्वचिदपि नितरां भासते वा कृशानु ॥ ३० ॥ क्रोडं ता-
तस्य गच्छन्विशदबिसधिया शावकं शीतभानोराकर्षन्भाल-
वैश्वानरनिशितशिखारोचिषा तप्यमानः । गङ्गाम्भः पातु-
मिच्छुर्भुजगपतिफणात्फूत्कृतैर्दह्यमानो मात्रा संबोध्य नीतो
दुरितमपनयेद्धालवेषो गणेशः ॥ ३१ ॥ उच्चैरुत्ताण्ड
स्थल बहुलगलद्दानप्रमत्त-<sup>१</sup>फीतालीभ्रातगीतिश्रुतिविधृतिक-
लोन्मीलितार्थाक्षिपक्ष्मा । भक्तप्रत्यूहपृथ्वीरुहनि वहसमु-
न्मूलनोच्चैरुदञ्चच्छुण्डादण्डाय उग्रार्भक इभवदनो वः स
पायादपायात् ॥ ३२ ॥ कल्याणं वो विधत्तां करटमदधुनी-
लोलकल्लोलमालाखेलल्लोलम्बकोलाहलमुखरितदिक्कक्रवालान्तरालम् ।
म्ल वेतण्डरल सततमरिचलत्कर्णतालप्ररोह-
द्वाताङ्कराजिहीर्षार्दरविवृतफणाशृङ्गमूषाभुजङ्गम् ॥ ३३ ॥
यः सिन्धौ फेनराशिर्भुवि कुमुदवनं व्योम्नि नक्षत्रलक्ष्मीरथ्र्यो
मुक्तासमूहस्तुरुषु सुमनसो मानसे हंससङ्घः । श्रीकण्ठे
भूतिक्लेशः शिखरिषु मणयो दिक्षु नीहारपातः पाण्डुः शु-
ण्डाग्रजन्मा जयति गणपतेः शीकराणां विलासः ॥ ३४ ॥
सानन्दं नन्दिहस्ताहतमुरजरवाहूतकौमारेर्बर्हिभ्रासैंन्नासा-
ग्ररन्ध्रं विशति फणिपतौ भोगसंकोचभाजि । गण्डोड्डीना-
लिमालासुखरितककुभैस्ताण्डवे शूलपाणेर्वैनायक्यश्चिरं वो
वदनविधूर्तयः पान्तु चीत्कारवत्यः ॥ ३५ ॥
सरस्वती
धातृश्रुत्युं<sup>१</sup>मुखीकण्ठरङ्गे<sup>२</sup>नाटकविहारिणीम् । नित्यं प्रगल्भ-
वाचालामुपतिष्ठे सरस्वतीम् ॥ १ ॥ सूक्ष्माय शुचये तस्मै
नमन्ने वाक्तत्त्वतन्तवे । विचित्रो यस्य विन्यासो विदधाति
जगत्पटम् ॥ २ ॥ तद्दिव्यमव्ययं धाम साग्स्वतमुपासहे ।
यत्प्रसादात्प्रलीयन्ते मोहान्धतमस<sup>९</sup>च्छटाः ॥ ३ ॥ पातु वो
निकष<sup>१९</sup>ग्रावा मतिहेम्नः सरस्वती । प्रां<sup>१०</sup>ज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव
करोति या ॥ ४ ॥ शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा<sup>२१</sup> सर्वदास्माकं संनिधिं संन्निधिं<sup>२२</sup> क्रियात् ॥ ५ ॥
करबदरसदृशमखिलं भुवनतलं यत्प्रसाद्तः<sup>१</sup> कवयः ।
पश्यन्ति सूक्ष्ममतयः सा जयति सरस्वती देवी ॥ ६ ॥
शरणं करवाणि शर्मदे ते चरणं वाणि चराचरोपजीव्यम् ।
करुणामैसृणै<sup>२</sup> कटाक्षपातैः कुरु मामम्ब कृतार्थसार्थवाहम्
॥ ७ ॥ आशासु राशीभवदङ्गवल्लीभासैव दासीकृतदुग्ध-
सिन्धुम् । मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देऽरविन्दासन-
सुन्दरि त्वाम् ॥ ८ ॥ वचांसि वाचस्पतिमत्सरेण माराणि
लब्धुं ग्रहमण्डलीव । मुक्ताक्षमूत्रत्वमुपैति यस्याः सा
सप्रमादास्तु सरस्वती वः ॥ ९ ॥ ज्योतिसामो<sup>३</sup>रमलोच-
नगोचरं तज्जिह्वाङ्गुसद्गस मधुनः प्रवाहम् । दूरे त्वथ
पुलकबन्धि परं प्रपद्ये सास्वतं किमपि कामदुघं रहस्यम्
॥ १० ॥ तव करकमलस्था स्फाटिकीर्मे<sup>३</sup>क्षमाला<sup>४</sup> नखकिरण-
विभिन्ना दाडिमीबीजबुद्ध्या । प्रतिकलमनुकर्षन्<sup>५</sup> येन कीरो<sup>६</sup>
निषिद्धः स भवतु मम भूत्यै वाणि ते मन्दहासः ॥ ११ ॥
तमोगुणविनाशिनी सकलकालमुद्द्योतिनी धरातलविहारिणी
जैडसमाजविद्वेषिणी । केलानिधिसहायिनी लसदलोल-
सौदामिनी मदन्तरवलम्बिनी भवतु कापि कौदम्बिनी<sup>१२</sup>
॥ १२ ॥ या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्मा-
च्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मा पातु सर-
स्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ १३ ॥
शिवः
नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरार-
म्भमूलस्तम्भाय शंभवे ॥ १ ॥ वामाङ्गीकृते<sup>१</sup>वैमाङ्गि
कुण्डलीकृतेैकुण्डलि । आविर्स्तु पुरो वस्तु भूतिभूत्येम्ब-
राम्बरम् ॥ २ ॥ निर्र्उपादानसंभारं<sup>१६</sup>मभित्तावेव तन्वते ।
जैर्गच्चित्रं<sup>१७</sup> नमस्तस्मै कलाश्लाघ्याय शूलिने ॥ ३ ॥ चन्द्रा-
ननार्धदेहाय चन्द्रांशुसितमूर्तये । चन्द्रार्कानलनेत्राय च-
न्द्रार्धशिरसे नमः ॥ ४ ॥ भुजङ्गकुण्डली व्यक्तशशिशुभ्रांशु-
शीतगुः । जगन्त्यपि सदाऽपायाद्व्याख्यातैहोरः शिवः ॥ ५ ॥
पिनाकफणिबालेन्दुभस्ममन्दाकिनीयुता । पवर्ग रचिता
मूर्तिरपंवर्गप्रदास्तु वः ॥ ६ ॥ दिगम्बरनितम्बिन्याः किम-
[पादटिप्पण्यः]
१ बहु
२ भ्रमरसमुदाय
३ वृक्ष
४ गण्डस्थलम्
५ मदोदकस्रित्
६ पुरातनम्
७ गजश्रेष्ठ
८ ईषत्
९ अग्रभाग
१० हिमपातम्
११ शृङ्ग
१२ मयूर
१३ भयात
१४ फणा
१५ नृत्ये
१६ चालनम्
१७ चतुष्पथम्
१८ समूहा
१९ स्वर्णादिपरीक्षणशिला
२० पण्डितमूर्खयोर्भेदम्
२१ सर्वदात्री
२२ उत्तमनिधिम्
१ कुशाग्रबुद्धय
२ स्निग्धै
३ स्फटिकमयीम्
४ जपमालाम्
५ मिश्राम
६ प्रतिक्षणम्
७ शुक
८ समृद्धै
९ अज्ञानम्; पक्षे,-अन्धकार
१० मन्दबुद्धिः; पक्षे,-डल्योः सावर्ण्यात् जलम्
११ विद्वज्जन, पक्षे,-चन्द्र
१२ सरस्वती; पक्षे,-मेघमाला
१३ स्त्री
१४ सर्प
१५ दिगम्बरम्
१६ उपकरणम्; पक्षे,-तूलिकादिकम्
१७ संत्तिः; पक्षे,-समूह
१८ नानाकारम्, पक्षे,-आलेख्यम्
१९ चन्द्रकला; पक्षे,-आलेख्यक्रियाकौशलम्
२० मोक्ष-
४ सुभाषितरत्नभाण्डागारम् [ १ प्रकरणम्
म्बरविभूषणम् । इत्यम्बरहरः पायात्परीरम्भरः परो ॥ ७ ॥ ॐ नमः परमार्थैकरूपाय परमात्मने । स्वेच्छाव- भासितासत्यभेदभिन्नाय शंभवे ॥ ८ ॥ नमः शिवाय निः- शेषक्लेशप्रशमशालिने । त्रिगुणग्रन्थिदुर्भेदभवबन्धविभेदिने ॥ ९ ॥ समस्तलक्षणाद्योग एव यस्योपलक्षणम् । तस्मै नमोऽस्तु देवाय कस्मैचिदपि शंभवे ॥ १० ॥ ससारैकनि- मित्ताय ससारैकविरोधिने । नमः ससाररूपाय निःससाराय शंभवे ॥ ११ ॥ सदसत्त्वेन भावाना युक्ता या द्वितीयी स्थितिः । तामुलङ्घ्य तृतीयस्मै नमस्त्रिचाय शभवे ॥ १२ ॥ आसन्नाय सुदूराय गुह्याय प्रकटात्मनं । मुलमायातिदुर्गाय नमस्त्रिचाय शभवे ॥ १३ ॥ ससेवितभृगुतुङ्गं विद्योतित- वेदवेदाङ्गम् । परिनर्तितभवरङ्ग ममसिजमङ्गं समाश्रये लिङ्गम् ॥ १४ ॥ स जयति हिमकरलेखा चकास्ति य- स्योमयोत्सुकास्निहिता । नयनप्रदीपकज्जलजिघृक्षया रजत- शुक्तिरिव ॥ १५ ॥ पौ१णिग्रहे पुल२कितं वपुरैशं भूति३भू- षितं जयति । अङ्कुरित इव मनो४भूर्यस्मिन् भस्मावशेषोऽपि ॥ १६ ॥ मा वम सृणृणु विषमिदमिति सातङ्क पितामहे- नोक्तः । प्रातर्जयति सलज्जः कजलमलिनाधरः शभुः ॥ १७ ॥ जयति प्रियापदान्ते गरलमवै५र्यैकः खरारातिः । विषम६विशिखे विशन्चिव शरण गलबद्धकरवालः ॥ १८ ॥ संध्यासलिलाञ्जलिमपि कङ्कणफणिपीयमानमविजानन् । गौरीमुखार्पितमना विजयाहसितः शिवो जयति ॥ १९ ॥ प्रणयकुपितप्रियापदलाक्षासन्धानबन्धमधुरेन्दुः । तद्धलय- कनकनिकषग्रावग्रीवः शिवो जयति ॥ २० ॥ अहिभू- षणोऽप्यभयदः सुकलितहालाहलोऽपि यो नित्यः । दिग्वा सनोऽप्यखिलेशतं शशधरशेखर वन्दे ॥ २१ ॥ जयति जटाकिर्ञ्जल्कं गङ्गामधु मुण्डवलयबीजमयम । गलगर्लप- ङ्कसभवमम्भोरुहमानन शभोः ॥ २२ ॥ प्रतिबिम्बितगौरी- मुखविलोकोत्कम्पशिथिलकरगलितः । स्वेदभरपूर्यमाणः शंभोः सलिलाञ्जलिर्जयति ॥ २३ ॥ औदाय१० चापमंचलं कृत्वो११हीन गुण विषमै१२दृष्टिः । यश्चित्रे१३मैच्युतशरो र्लक्ष्य१४-
१मैभाङ्गीन्नमस्तस्मै ॥ २४ ॥ उप२हरण विमवाना सहरणं सकलदुरितजालस्य । उद्धरणं ससाराच्चरण वः श्रेयसेऽस्तु विश्वपतेः ॥ २५ ॥ आहतकुपितभवानीकृतकरमालादिब- न्धनव्यसनः । केलिकलाकल्हादौ देवो वः शकरः पायात् ॥ २६ ॥ मिक्षुकोऽपि सकलेप्सितदाता प्रेतभूमिनिलयोऽपि पवित्रः । भूतचित्रमपि योऽभयसत्री तं विचित्रचरितं शिव- मीडे ॥ २७ ॥ पाणिग्रहे पर्वतराजपुत्र्याः पादाम्बुज पाणि- सरोरुहाभ्याम् । अश्मानमारोपयतः स्मरारेर्मन्दस्मितं मङ्गलमातनोतु ॥ २८ ॥ पार्थस्थपृध्वीधरराजकन्याप्रकोप- विस्फूर्जुथु३कातस्स । नमोऽस्तु ते मातरिति प्रणामाः शि- वस्य सध्याविषया जयन्ति ॥ २९ ॥ क्व तिष्ठतस्ते पितरौ ममेवेत्यपर्णयोक्ते परिहासपूर्वम् । क वा ममेव श्वशुरौ तवेति तामीरयन् सस्मितमीश्वरोऽव्यात् ॥ ३० ॥ स पातु वो यस्य जटाकलापे स्थित. शशाङ्कः स्फुटहारगौरः । नीलोत्पला- नामिव नालपुञ्जे निद्रायमाणः शरदीव हसः ॥ ३१ ॥ जगत्सिसृक्षाप्रलयक्रियाविधौ प्रयत्नमुन्मेषनिमेषविभ्रमम् । वदन्ति यस्येक्षणलोलपक्ष्मणा पराय तस्मै परमेष्ठिने नमः ॥ ३२ ॥ वक्राणि पञ्च कुचयोः प्रतिबिम्बितानि दृष्ट्वा दशाननसमागमनभ्रमेण । भूयोऽपि शैलपरिवृत्तिभयेन गाढ- मालिङ्गितो गिरिजया गिरिशः पुनातु ॥ ३३ ॥ संध्या- नतौ नरपुरश्चितनोः सरोषमुत्सारिते गिरिजया निजपाणि- पद्मे । उत्सर्पिकङ्कणफणीन्द्रफणार्पणेन पूर्णोऽञ्जलिर्जयति बालमृगाङ्कमौलेः ॥ ३४ ॥ यस्याङ्कुरुगमविदः परिपूर्ण- शक्तेरशो कियत्यपि निविष्टममुं प्रपञ्चम् । तस्मै तमालरुचि- भासुरकंधरायं नारायणौसहचराय नमः शिवाय ॥ ३५ ॥ व्योम्नीव नीरदभरः सरसीव वीचिन्यूह. सहस्रमहसीव सुधांशुधाम । यस्मिन्निद जगदुदेति च लीयते च तच्छा- म्वं भवतु वैमवमृद्धये वः ॥ ३६ ॥ यः कन्दुकैरिव पुरं- दरपदसद्मपद्मापतिप्रभृतिभिः प्रचुरप्रमेयः । खेलत्यलङ्घ्य- महिमा स हिमाद्रिकन्याकान्तः कृतान्तदलनो लघयत्वघ वः ॥ ३७ ॥ मुक्तिर्हि नाम परमः पुरुषार्थ एकस्तामन्त- रायमययन्ति यदन्तरङ्गाः । कि भूयसा भवतु सैव सुधाम- यूखलेखाशिखामरणभक्तिरमङ्गुरा वः ॥ ३८ ॥ दिश्यात्स शीतकिरणाभरणः शिवं वो यस्योत्तमाङ्गम्रुवि विस्फुरदूर्मि- पक्षा । हंसीव निर्मलशशाङ्ककलामृणालकन्दार्थिनी सुर- सरिन्नभसः पपात ॥ ३९ ॥ श्रेयांसि वो दिशतु यस्य सि- ताभ्रशुभ्रा विभ्राजते सुरसरिद्वरमौलिमाला । ऊर्ध्वेक्षण- ज्वलनतापविलीयमानचन्द्रामृतप्रविततामृतवाहिनीव ॥४०॥
१ परिणये २ सजातपुलकम् ३ भस्मना शोभितम् ४ मदन ५ कण्ठाभूषणम् ६ मदने ७ आरम्भः ८ केसरः ९ त्रिलोचनो हिमाचल धनु, वासुकिं ज्याम्, विष्णु शर च विधाय त्रिपुरसुरं अघानेति प्रकृतोऽर्थ . चलनशून्यं धनु अहीनो धनुर्दण्डादन्यूनो गुण, विषमा लक्ष्यादन्यत्र निहिता दृष्टि न च्युतः शरो यस्य तथाविध', तथापि लक्ष्यमङ्ग इति विरोधाभास १० स्थिरम्, पक्षे,-पर्वतम् ११ गुणरहितम्; पक्षे,-अहीनमिति पदच्छेदे सर्पराज गुण कृत्वेत्यर्थ १२ असमदृक्; पक्षे,-त्रिलोचनत्वाद्दि-षमदृष्टिः १३ न च्युतः शरो यस्य; पक्षे,-अच्युतो विष्णुः स एव शरो यस्य १४ शरव्यम्; त्रिपुरमिरत्यर्थे..
१ बभञ्ज २ दातारम् ३ वज्रनिघोषः.
कुसुमशराविरासे शम्भुमध्याद्रिप्रीतिकृतवलयस्य क्षभाग- तस्यार्धमेकम् । निजमित्र शशिखण्ड याचमानस्य शम्भोर्भवतु सह विवाद कान्तया कौतुकाय ॥ ४१ ॥ कथयन् कथमेषा मेनया विप्रदत्ता शिव शिव गिरि- पुत्री त्र्यम्बकारातिकाय । इति वदति पुरभीमण्डले सिद्धिलौकन्यगकन्वग्देश पातु वः श्रीमहेशः ॥ ४२ ॥ प्ररूननयन मश्नमद् दुरफुरिताधर मुतनु शशिन. क्रिद्धा । कान्ति करोतु तनाननम् । कृतमननयै कोपोऽय ते मनस्बिनि वर्धतामिति गदितयाश्लिष्टो दे या शिवाय शिवो- ऽस्तु ।.॥ ४३ ॥ प्रणयकुपिता दृष्ट्वा देवीं ससभ्रमविस्मि- तस्त्रिभुवनगुरुर्भीत्या सद्यः प्रणामपरोऽभवत् । नमितशि- रसो गङ्गातोके तया चरणाहताववतु भवतरुक्षसैतद्विल- क्षमवस्थितम् ॥ ४४ ॥ कस्त्वं शूली^१ मृगय भिषजं^२ नील- कण्ठः प्रियेऽहं केकामेकां कुरु पशुपतिर्नैव दृश्ये विषाणे^५ । स्थाणुर्मुग्धे न वदति तरुर्जीवितेशः शिवाया^७ गच्छाटव्या- मिति हतरचाः पातु वश्चन्द्रचूडः ॥ ४५ ॥ वन्दे देवं जलधिशरधिं देवनामार्थभौमं व्यासप्रष्टा भुवनविदिता यस्य वाहाधिवाहाः । मेघापेटी मुवनमेधरं पुँर्द्धकर पुँष्पवाटी शांटी- पालाः शंतमम्बुम्माश्र्चन्दतुदुर्मनोभूः ॥ ४६ ॥ दीव्य- न्मौलिन्त्रिदशपरिवृजीवनीयेन धाम्ना पश्यद्वाल वलभितकर प्राणता कङ्कणेन । वामार्डेन स्फुटमभिदधन्मान्मथी ब्रह्म- विद्यां जीयादोजस्त्रिपुरयुवतीपत्रवल्लीववित्रम् ॥ ४७ ॥ च्युताम्बिन्दोर्लेखा रतिकलहभग्नं च वलयं द्वयं चक्रीकृत्य प्रहसितमुखी शैरुतनया । अवोचद्य पश्येत्यवतु स शिवः सा च गिरिजा स च क्रीडाचन्द्रो दशनकिरणापूरिततनुः ॥ ४८ ॥ नमस्तुभ्य देवासुरमुकुटमाणिक्यकिरणप्रणाली- सभेदश्चञ्चितचरणाय स्मरजिते । महाकल्पस्वाहाकृतभुवन- चक्रेऽपि नयने निरोद्धु भूयस्तत्वसरमिव कामं हुतवते ॥ ४९ ॥ असोढा तत्कालोलसदसहभावस्य तपसः कथानां विश्रम्मेष्वपि च रसिकः शैलदुहितुः । प्रमोद वो दिश्यात्क- पटबटुवेषापनयने त्वराशैथिल्याभ्या युगपदभियुक्तः स्मरहरः ॥ ५० ॥ सहस्रास्यो नागः प्रभुरपि मतः पञ्चवदनः षडास्यो हन्तैकस्तनय इतरो वारणमुखः । सदा भैक्ष्य शश्व- त्प्रभवतु कथ वर्तनमिति श्वसन्त्या पार्वत्यामथ जयति शंभुः स्मितमुर ॥ ५१ ॥ मौनादस्तमितैव चाटुभणितिः स्रस्तै- कहस्ताद्व्रत दूरेऽप्यञ्जलिबन्धन प्रणमन स्तब्धार्धमूर्ध्नः कृतः । इत्थ सघटिनैकविभ्रंमहतया व्यंग्रो गिरिग्रामणी- र्जाया जातकृप जयत्यनु नयन्देवरिलोकीगुरु. ॥ ५२ ॥ यस्मिन्बुद्धुदसकरा इय बहुब्रह्माण्डखण्डा कचिद्भ्रान्ति कापि च सीकग इव विरिञ्चाद्याः स्फुरन्ति भ्रमात् । चिद्रूपा लहरीव विश्वजननी शक्तिः कचिद्द्योतते स्वान- न्दामृतनिर्भरं शिवमद्दापाथोनिधि त नुमः ॥ ५३ ॥ कल्पान्ते शमितत्रिविक्रैममँहाकङ्ङ्गालबद्धस्फुरच्छेषस्यूततृत्साँ- हपाणिनखरग्रोतादिकोलामिष । विश्वैकार्णवताविशेषसु- दितो तौ मत्स्यकूर्मावुभौ कर्षन्धीवरता गतः स्तुतु सँता मोह महाभैरव. ॥ ५४ ॥ भीतिर्नास्ति भुजगपुगवविषा- त्मीतिर्न चन्द्राभृतान्नाशौच हि कपालदामलुलनाच्छौचं न गङ्गाजलात् । नोद्वेगश्चितिमस्मना न च सुखं गौरीस्तना- लिङ्गनादात्मारामतया हिताहितसम. स्वस्थो हरः पातु व. ॥ ५५ ॥ वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुष व्याप्य स्थित रोदँसी यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाक्षरः । अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते स स्थाणु स्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायास्तु वः ॥ ५६ ॥ आनन्दश्लथिताः समाधिषु मुखे^८ गौर्या विलासोल्लसा- सम्रान्ता क्षणमुद्गता क्षणमथ खैरा निजे वैकृते । कूर्ग- कृष्टशरासने मनसिजे दग्धे धृणाकूणितास्तत्कान्तारुदिते- ऽश्रूपूरतरलाः शंभोर्दश. पान्तु व. ॥ ५७ ॥ स्वैर्मानुः सुरवर्त्मनानुसरति त्रासाभिलाषादसाविन्दोरिन्दुमुखि प्रसेत किमुत श्रान्त्या भवत्या सुखम् । इत्थ नाथगिरा नभोर्पित- दृशो वक्त्रे भवान्या भृश मानिन्याः कृतचुम्बनस्स्निनयन- स्तादिष्टसिद्धये सताम् ॥ ५८ ॥ विष्णोरागमन निशम्य सहसा कृत्वा फणीन्द्रं गुँणं कौपीनं परिधाय चर्म करिणः शंभौ पुरो धावति । दृष्ट्वा विष्णुरथं सकम्पहृदयः सर्पो- ऽपतद्भुतले कैत्तिर्विस्खलिता हियानतमुखो नम्रो हरः पातु वः ॥ ५९ ॥ भक्षान्योरगफूत्कृतिस्फुटभवद्वालस्थवैश्वानर- ज्वालास्विन्नसुधांशुमण्डलगलत्पीयूषधारारस्रैः । संजिव- द्विपचर्मगर्जतमयभ्राम्यद्वृषाकर्षणव्यासक्तः सहसाद्रिजोपह- सितो नग्नो हर. पातु वः ॥ ६० ॥ एकोऽन्ते द्विसमन्नि-
१ त्रिशूली, पक्षे,-शूलरोगवान्
२ वैद्यम्
३ शिव., पक्षे,-मयूर..
४ मयूरवाणी
५ शृङ्गे
६ शिव, पक्षे,-छिन्नवृक्षप्रकाण्डम्
७ पार्वत्याः; पक्षे कोष्ट्याः
८ त्रिपुरसंहारे शरीकृतस्य विष्णोर्विभ्रान्तिस्थानत्वात्.
९ व्यासप्रमुखा.-
१० वाहनानाम्, वेदानामित्यर्थः. अधिवाहा वाहनाधिकृताः
११ सर्वभूषणत्वादित्यर्थः
१२ पातालम्
१३ आकाशम्
१४ पुष्पस्थानीयचन्द्रोद्गमाधारत्वात्.
१५ दिगम्बरत्वेन दिशामेव शाटीरूपत्वात्
१६ इन्द्रादयो दिक्पाला इत्यर्थं
१७ चन्दनस्थानीयमन्मसमन्वित्वात् मदनभस्मना शिवास्याङ्गानामनुलेपनस्य प्रसिद्धेः
१८ ओधः
१ शरीरम्
२ आकुल
३ वामन
४ अस्थिपञ्जर
५ वराह..
६ सता मोह स्तुतु खण्डयतु
७ द्यावापृथिव्यौ.
८ विकारे.
९ दयासकुञ्चिता
१० राहु
११ सूत्रम्
१२ गरुडम्.
१३ गजचर्म.
द्वादशात्माशुभिः ॥ ६१ ॥ लीलाद्यूतजिता कलाधर-
६ सुभाषितरत्नभाण्डागारम् [ १ प्रकरणम्
लोचन इति ख्यातश्रुतिभिः स्तुतो वेदैः पञ्चमुखः षडानन- पिता सप्तर्षिभिर्वन्दितः । अष्टाङ्गो नवतुल्य आमरणे वासो दशाशा दधत्स्वैश्चैकादश सोऽवतान्न विजितो यो द्वादशात्माशुभिः ॥ ६१ ॥ लीलाद्यूतजिता कलाधर- कला मौलौ दृढं कीलिता स्वीकर्तुं युगमुन्नमय्य भुजयोर्वि- श्लेषमन्यस्तदा । पार्वत्याः कुचकुम्भपार्श्वयुगले सप्रेमदत्ते- क्षणः कालक्षेपणिमिन्दुमोचनविधौ देव स नो रक्षतु ॥ ६२ ॥ मृत्यालेपनभूषित प्रविलसन्नेत्राग्निदीपाङ्कुर कण्ठे पन्नगपुष्पदामसुभगो गङ्गाजलैः पूरित । ईषत्ताम्रज- टाग्रपल्लवयुतो न्यस्तो जगन्मण्डपे शम्भुर्मङ्गलकुम्भतामु- पगतो भूयात्सता श्रेयसे ॥ ६३॥ मल्लीमाल्यधिया सुधाकर- कला कण्ठश्रिय कजलभ्रान्त्या मालविलोचनानलशिखा सिन्दूरपूराशया । कैलासे प्रतिबिम्बितात्मवपुषो गृह्णन्ह- सन्त्या मुहुः पार्वत्या प्रतिकर्मकर्मणि चिर मुग्धो हरः पातु वः ॥ ६४ ॥ दास्येऽह परिंरम्भणानि कितव द्यूते जितानि त्वया वैर्य वेहि यतः कृतः शतमहोरात्राणि तत्रावधिः । इत्युक्तः शिवया निशादिवसकृज्ज्योतिर्मयाक्षिक्षयद्रागुन्मेष- निमेषकोटिघटनाव्यग्रो हर पातु वः॥ ६५॥ मौलौ कि नु महेश मानिनि जल कि वक्रमम्भोरुह कि नीलाळ कवेणिका मधुकरी की भ्रूलता वीचिका । कि नेत्रे शफरौ किमु स्तनयुग प्रेङ्खद्र्थाङ्कद्वय साशङ्कामिति वञ्चयन्गिरिसुता गङ्गाधरः पातु वः ॥ ६६ ॥ देव्याः प्रारिरम्भणे किल करौ द्वौ द्वौ पुनस्तत्करौ रोढुं तन्मुखमुन्मुख रचयितु द्वौ चाधरास्वादने । द्वौ नेत्रान्तपलालकापनयने मोक्तु च नीवी दृढा द्रावित्य मफलीकृताखिलकरः पायात्स वः श- करः ॥ ६७ ॥ न क्रोधः क्रियता प्रिये स तु भवन्मौलिस्य- गङ्गोदरे मुग्धे मानमपूजित त्यज कृत युष्मन्नियोगद्वयम् । वक्रे श्लेषमसु निराकुरु कदाश्लिष्टोऽसि वक्रे मया वामा- ञ्चेति हतोत्तरः स्मरहरः खेरानन पातु वः ॥ ६८ ॥ अङ्ग येन रथीकृत नयनयोर्युग्म रथाङ्गीकृत पत्र म्व रथ- कर्मसारथिकृत श्वासास्तुरगीकृताः । कोदण्डीकृतमात्मवीर्य- मचिरान्मौर्वीकृतं भूषण वामाङ्ग विशिखीकृत दिशतु नः क्षेम स धन्वी पुमान् ॥ ६९ ॥ नृत्यारम्भरसत्रसद्गिरिसुतारिक्तार्थ- संपूर्तये निर्व्युढभ्रमिविभ्रमाय जगतामीशाय तुभ्यं नमः । यच्चण्डामुनुजेश्वरप्रभृतिम्रिस्तादृग्भ्रमन्तीर्दिशः पश्यद्भिर्धन- घूर्णमाननयनैः शान्तोऽपि न श्रद्दधे ॥ ७० ॥ उद्दामभ्रमिवेग- विस्तृतजटावल्लीप्रणालीपतत्स्वर्गङ्गाजलैर्दण्डिकावलयित नि-
र्माय तत्पञ्जरम् । सन्नाम्यद्भुजदण्डपक्षपटलद्वन्द्वेन हुसायि- तस्त्रैलोक्यव्ययनाटिकानयनटः स्वामी जगन्नायताम् ॥ ७१ ॥ यन्नाट्यभ्रमिघूर्णमानवसुधाचक्राधिरूढे भृश मेरौ पार्श्वनिवा- सिवासरनिशाचित्रे परिभ्राम्यति । तैजस्यसदितो भवन्तु शतशो दृष्टा हि तास्ताः कथ तामसोऽपि स वः पुनातु जगतामन्त्येष्टियज्वा विभुः ॥ ७२ ॥ तत्कालौग्मटीविजृम्भ णपरिवासादिव भ्व्य्रता वामार्धेन तदैकशेषकरण बिभ्रद्वपु भैरवम् । तुल्य चास्थिभुजङ्गभूषणमसौ भोगीन्द्रकङ्कालकै- र्बिभ्राणः परमेश्वरो विजयते कल्पान्तकर्मान्तिकः ॥ ७३ ॥ चञ्चच्चन्द्रिकचन्द्रचारुकुसुभो माय्य जटापटवो टप्यत्तारुण- दन्दशूकमणिमास्तत्यक्षशाखालयः (१) । स्थाणुर्मे फलदो भव- त्वतितरा गोरीमुखेन्दुद्रवत्पीयूषद्रवदोहदादिव ढंप्रहेवद्रुमत्व सदा ॥ ७४ ॥ वक्राम्भोरुहि विस्मिता सवकिता वक्षो रुहि स्फारिताः श्रोणीसीमनि गुम्फिताश्चरणयोरक्ष्णोः पुननि स्रुता । पार्वत्या प्रतिगात्रचित्रगतयस्तन्वन्तु भद्राणि वो विद्बसान्तिकपुष्पसायकशरैरीशस्य दृग्भङ्गय ॥ ७५ ॥ शैलेन्द्रप्रतिपाद्यमानगिरिजाहस्तोपगूढोल्लसद्रोमाञ्चाविविसष्ठु लाखिलविविव्यासङ्गमङ्गाकुल । आ शेत्य तुहिनाच- लस्य करयोरित्युच्चिवान्सस्मित शैलान्त.पुरमत्रिमण्डल- गणैर्दृष्टोऽवताद्वः शिवः ॥ ७६ ॥ दिक्कालात्मसमैव यस्य विभुता यंस्तत्र विद्योतते येनामुष्य युधीभवन्ति किरणा राशेः ^१सें यैर्यामभूत् । ^२यैस्तैैर्वतैरैत्तैमुपु सु ^७योऽस्यै हविषे येय्स्यैस्य जीवांतवे वोढा यैहूर्णमेर्षै मन्मथरिपोस्ताः पान्तु नो मूर्तयः ॥ ७७ ॥ जीर्णेऽप्युत्कटकूटकालकूटगरले पुष्टे तथा मन्मथे नीते भासुरभालनेत्रनुता कल्पान्तदावानले । यः शक्त्या समलकृतोऽपि शशिन शैलात्मजा मूर्धनी धत्ते कौतुकराजनीतिनिपुण. पायात्स व. शकरः ॥ ७८ ॥ कि गोत्र किमु जीवन किमु धन का जन्मभूः कि वयः कि चारित्रममुष्य के सहचराः के वशजाः प्राक्तनाः । का माता जनकः शिवस्स क इति ^२१प्रैहेण पृथ्वीभृता पृष्टाः सस्मितनम्रमूकवदनाः सप्तर्षयः पान्तु वः ॥ ७९ ॥ तादृक्सप्तसमुद्रमुद्रितमहीभूभृद्भिरभ्रकषैः स्रोतोभि. परिवा- रिता दिशि दिशि द्वीपः समन्तादयम् । यस्य स्फारफणा- वलीमणिचये मज्जत्कलङ्काकृतिः शेष. सोऽयगमद्यदङ्गनपद तस्मै नमः शभवे ॥ ८० ॥ तारानायकशेखराय जगदा-
१ कुर्वन्निति शेषः २ अक्षद्यूतैः ३ चक्रवाक ४ आलिङ्गने ५ सर्पं ६ बाणीकृतम् ७ समाप्त ८ भ्रमणम् ९ जलस्य निर्गमनमार्गे मकरमुखादिरूपा १० दण्ड १ कर्बुरवर्ण २ तमोमया ३ नाश्यभेद ४ सर्व ५ दीयमानम् ६ आकाशस्य ७ सूर्ये. ८ चन्द्रे ९ सूर्यस्य १० चन्द्र ११ अपाम् १२ अनि . १३ अपाम् १४ शुचि रुदकम् १५ यजमान १६ अग्रे . १७ वायु . १८ यजमानस्य १९ पृथिव्या २० वायु २१ नभ्रेण २२ ईश्वराय
शिवः ७
धाराय धाराधरच्छायाधारकन्धराय गिरिजासङ्गैकभृङ्गा- रिणे । नद्या शेखरिणे दृशा तिलकिने नारायणेनाश्विने नागैः कङ्कणिने नगेन गृहिणे नाथाय नित्यं नतिः ॥ ८१ ॥
केयूरीकृतकङ्कणीकृतजटाजूटावतंसीकृतज्यावल्लीकृतकुण्डली- कृतकटीसूत्रीकृताहीश्वरः । पायाद्वस्त्रिलकीकृतप्रियतमाद्- र्शीकृताक्षीकृतचूतारम्भपणीकृतेन्दुशकलः कात्यायनीकामुकः ॥ ८२ ॥
कान्ता कामपि कामयत्यनुदिनं ध्यानापदेशादयं येनामु मुनयोऽप्यनादिनिधन ध्यायन्ति धौतस्पृहाः । इत्यङ्कात्स्वकरे हृते गिरिजया पादे च पद्मासनाद्विश्वं पातु पुरारिभद्रवपुषः शम्भोः समाधिव्ययः ॥ ८३ ॥
स्नात. स्वर्गतरङ्गिणीजलभरैर्नेत्रोत्पलेनाञ्चितः पार्वत्याः सितभूति- चन्दनचयैरालिप्तगात्रोज्ज्वलः । देवश्चन्द्रकलासितश्रुतिलको गौरीविवाहोत्सवारम्भे शैलकृतार्हणस्त्रिजगतामर्च्यो हरः पातु वः ॥ ८४ ॥
उत्सृष्ट्वा दिशमम्बर वरतर वासो वसानश्चिर हित्वा वासरस पुनः पितृवने कैलासहम्यश्रिय । त्यक्त्वा भस्म कृताङ्गरागनिश्चयः श्रीखण्डसारद्रवैर्देव पातु हिमाद्रिजापरिणय कृत्वा गृहस्थः शिवः ॥ ८५ ॥
क्रीडन्मन्दरकन्दरोदरज्वलन्मन्दारवृन्दावने क्रोधान्थान्ध- कटातटासुहरणे जृम्भत्त्रिशूलोद्गमः । त्रैलोक्याखिलसकटो- त्कटभयोद्वेलान्धकाराशुमान् पायाद्वस्त्रिपुरप्रमाथनपटुर्देवो हि पञ्चाननः ॥ ८६ ॥
गर्जद्भीमभुजङ्गभीषणफणाफूत्कारभी- तिप्रदः क्रीडत्प्रेतपिशाचराक्षसगणः प्रत्यक्षतः प्रान्ततः । भालस्थलप्रयानलोद्धटशिखः सक्रान्तसर्वास्पद. शार्दूलाजिन- भृद्भयानकभयो भूयाद्भवो भूतये ॥ ८७ ॥
गौरीचुम्बनच- ञ्चल परिचलद्गण्डप्रभामण्डल व्यावलग्गफणिकुण्डल रतिरस- प्रखिन्नगण्डस्थलम् । प्रौढप्रेमपरम्परापरिचयप्रोत्फुल्लनेत्राञ्चल शंभोरस्तु विभूतये हि भवतामुन्मत्तगङ्गं शिरः ॥ ८८ ॥
पाणौ कङ्कणमुत्फण फणिपतिर्नेत्रं लसत्यावकं कण्ठः कुण्ठित- कालकूटविषमो वस्त्र गजेन्द्राजिनम् । गौरीलोचनलो- भनाय सुभगो वेषो वरस्यास्ति मे गण्डोल्लासविभावितः पशुपतेर्हासोद्रमः पातु वः ॥ ८९ ॥
दिव्यं वारि कथं यतः सुरधुनी मौलौ कथ पावको दिव्य तद्धि विलोचनं कथम- हिर्दिव्यं स चाङ्गे तव । तस्माद्यूतविधौ त्वयाद्य मुषितो हारः परित्यज्यतामित्थं शैलभुवा विहस्य लपितः शम्भु. शिवायास्तु वः ॥ ९० ॥
श्रीकण्ठस्य सकृत्तिकात॑भरणी मूर्तिः सदारोहिणी ज्येष्ठा भद्रपदा पुनर्वसुयुता चित्रा वि- शाखान्विता । दिश्यादक्षतहस्तमूलघटिताषाढा मघालं- कृता श्रेयो वैश्रवणान्विता भगवतो नक्षत्रपालीव वः ॥ ९१ ॥
त्राता भीतिभृतां पतिश्श्रिदचिता क्लेश सतां शं- सता हन्ता भक्तिमता सतां स्वसमता कर्तापकर्ताऽसताम् । देवः सेवकभुक्तिमुक्तिरचनाभूर्भूभुवःस्वस्त्रयीनिर्माणस्थिति- संहृतिप्रकटितक्रीडो मृड. पातु वः ॥ ९२ ॥
एषा ते हर का सुगात्रि कतमा मूर्ध्नि स्थिता कि जटा हसः कि भजते जटां नहि शशी चन्द्रो जल सेवते । मुग्धे भूरिरिय कु- तोऽत्र सलिल भूतिस्तरंगायते यश्चैव विनिगृह्ते त्रिपथगां पायात्स व. शकर ॥ ९३ ॥
मातर्जीव किमेतदङ्गुलिपुटे तातेन गोपाय्यते वत्स स्वादु फलं प्रयच्छति न मे गत्वा गृहाण स्वयम् । मात्रैव प्रहिते गुहे विघटयत्याकृष्य स- ध्याञ्जलि शभोर्विन्नममाधिरुद्धरभसो हासोद्गम पातु वः ॥ ९४ ॥
सध्या यद्यनिपत्य लोकपुरतो बद्धाञ्जलिर्याचसे धत्से यच्च नदीं विलज्ज शिरसा तन्नाम सोढं मया । श्रीर्या तामृतमन्थने यदि हरि कस्माद्विषं भक्षित मा स्त्रीलंपट मा स्पृशेति गदितो गौर्या हरः पातु वः ॥ ९५ ॥
तावत्सप्त- समुद्रमुद्रितमही भूभृद्विरञ्चत्रपैलैस्तावाद्भिः परिवारिता पृथुतरैद्वीपैः समन्तादियम् । यस्य स्फारफणामणौ निल- यिनी तिर्यक्फणालकृतिः शेषः सोऽप्यगमद्वडङ्गदपदं रुद्राय तस्मै नमः ॥ ९६ ॥
चिन्ताचक्रिणि हन्त चक्रिणि भिया कुब्जासनेऽब्जासने नश्यद्धामनि तिग्मधामनि धृताशङ्के शशाङ्के भृगम् । अभ्यञ्चेतसि च प्रचेतसि शुचा तान्ते कृतान्ते च यो व्यग्रोऽभूत्कदुकालकूटकवलीकाराय पा- यात्स वः ॥ ९७ ॥
तात त्ताततात कथय हरकुलेऽलंकृते सप्रदाने तच्छ्रुत्वा चन्द्रमौलिनर्तमुखकमलो जातलज्जो ब- भूव । ब्रह्मावादीत्तदानी शृणुत हरकुल वेदकण्ठोय्रकण्ठो श्रीकण्ठान्नीलकण्ठः प्रहसितवदनः पातु वश्चन्द्रचूडः ॥९८॥
या¹ सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं² या हविर्या च होत्री³ ये द्वे⁴ काल विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम् । याँ⁵- माहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यँ⁶या प्राणिनः प्राणवन्तः प्रत्यक्षोभिः⁷ प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीश. ॥ ९९ ॥
एकैश्वर्यस्थि- तोऽपि प्रणतबहुफलो यः स्वय कृत्तिवासाः कान्तासंस्रिश्र- देहोऽप्यविषयमनसा यः पुरस्ताद्यतीनाम् । अष्टाभिर्यस्य कृत्स्नं जगदपि तनुभिर्विभ्रतो नाभिमानः सन्मार्गालोकनाय व्यपन- यतु म नस्तामसी वृत्तिमीशः ॥ १०० ॥
कैलामाद्रावुर्दस्ते⁸ परिचलति गणेशूल्लसत्कौतुकेषु क्रोड⁹ मातुः कुमारे विशति विष॑¹⁰र्मुचि प्रेक्षमाणे सरोषम् । पादावष्टम्भसीदद्वपुषि दशमुखे
१ पद्यविशेष
१ उदकरूपा २ अग्निरूपा ३ यजमानरूपा. ४ सूर्यचन्द्ररूपे ५ आकाशरूपा ६ पृथ्वोरूपा ७ वायुरूपा ८ उच्छिष्टे ९ भुजान्तरे. १० मर्षे
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
[ १ प्रकरणम्
याति पातालमूलं क्रुद्धोऽप्याश्लिष्टमूर्तिर्भयघनसुभया पातु दृष्टः शिवो नः ॥ १०१ ॥
क्रोधोद्दैर्दृष्टिपातैस्त्रिभिरुपशमिता वह्रयोऽमी त्रयोऽपि त्रासातर्ता ऋत्विजोऽधःश्वपलगणहतोष्णीषपट्टाः पतन्ति । दक्षः स्तौत्यस्य पत्नी विलपति कृपणं विद्रुत चापि देवैः शसन्नित्यात्तहासो मखमथनविधौ पातु देव्यै शिवो वः ॥ १०२ ॥
आसीने पूष्णि तूष्णीं व्यसनििन शशिनि व्योम्नि कृष्णे सतृष्णे दैत्येन्द्रे जातनिद्रे द्रवति मघवति क्लान्तकान्तौ कृतान्ते । अब्रह्मण्यं ब्रुवाणे कमलपुटकुटीश्रोत्रिये शान्त्युपाये पायाद्वः कालकूटं झटिति कवलयल्लीलया नीलकण्ठः ॥ १०३ ॥
केयं मूर्ध्न्यन्धकारे तिमिरमिह कुतः सुभ्रु कान्तेन्दुयुक्ते कान्ताप्यत्रास्ति काचिन्ननु भवतु मया पृष्टमेतावदेव । नाहं द्वन्द्वं करोमीत्यपनय शिरसस्तूर्णमेनामिदानीमित्थं प्रोक्तो भवान्या प्रतिवचनजितः पातु वश्चन्द्रचूडः ॥ १०४ ॥
धन्या केयं स्थिता ते शिरसि शशिकला किं नु नामैतदस्या नामैवास्यास्तदेतत्परिचितमपि ते विस्मृतं कस्य हेतोः । नारी पृच्छामि नेन्दुं कथयतु विजया न प्रमाणं यदीन्दुर्दैव्या निह्नोतुमिच्छोरिति सुरसरित शाठ्यमव्याद्विभोर्वः ॥ १०५ ॥
हर्षादम्भोजनन्मप्रभृतिदिविषदां संसदि प्रीतिमत्या श्वश्र्वा मौलौ पुरारेर्दुहितुपरिणये साक्षत चुम्ब्यमाने । तद्वक्त्रं मौलिवक्त्रे मिलितमिति भृशं वीक्ष्य चन्द्रः सहासो दृष्ट्वा तद्वृत्तमाशु स्मितसुभगमुखः पातु वः पञ्चवक्त्रः॥ १०६ ॥
कल्पान्तक्रूरकेलिः कृतकदनकरः कुन्दकर्पूरकान्तिः क्रीडन्कैलासकूटे कलितकुमुदिनीकामुकः कान्तकायः । कङ्कालक्रीडनोक्तः कलितकलकलः कालकालीकलत्रः कालिन्दीकालकण्ठः कलयतु कुशलं कोऽपि कापालिको नः ॥१०७॥
दृष्टः सप्रेम देव्या किमिदमिति भयात्सभ्रमाच्चासुरीभिः शान्तान्तस्तत्त्वसारैः सकरुणमृषिभिर्विष्णुना सस्मितेन । आदायास्त्रं सगर्वैरुपशमितवधूसंम्रमैर्दैत्यवीरै सानन्दं देवताभिर्मयपुरदहने धूर्जटिः पातु युष्मान् ॥१०८॥
क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोऽशुकान्तं गृह्णन् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षितः संभ्रमेण । आलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शांभवो वः शराग्निः ॥१०९॥
कल्याणं वः क्रियासुर्मिलदैंटनियुगस्थार्णुगीर्वाणभोगिस्त्रणव्यत्यस्तकल्पद्रुमनवसुमनोनागहारावलीनि । नालीकाश्रिष्टलक्ष्मीकरतलकमलोद्वान्तमाँध्वीकधारातिम्यत्फौलेखनानि त्रिपुरहरधनुर्ज्यालताकर्षणानि ॥ ११० ॥
कल्पान्ते क्रोधनस त्रिपुरविजयिन क्रीडया संचरिष्णोः कृत्वापि प्राणिजातैर्निजमुखकुहरातिथ्यमप्राप्ततृप्तेः । दिग्भित्तीः प्रेक्ष्य शून्याः प्रलयजलनिधिप्रेक्षितात्मीयमूर्तिर्ग्रासन्यासक्तमोचश्रमजनितरुषः पान्तु वो गर्जितानि ॥ १११ ॥
पर्यङ्कग्रन्थिबन्धेस्त्रिगुणितभुजगाश्लेषसंवीतजानोरन्तरप्राणावरोधव्युपरतसकलज्ञानरुद्धेन्द्रियस्य । आत्मन्यात्मानमेव व्यपगतकरणं पश्यतस्तत्त्वदृष्ट्या शंभोर्वः पातु शून्येक्षणघटितलॅयब्रह्मलक्ष्म्यः समाधिः ॥ ११२ ॥
वृत्ताभिरूया हतार्या श्रितविविधगणा छन्दसा वर्णनीया याता सर्वादिमत्त्व सुरगणकलिता भासमत्त्वं दधानाम् । युक्तं स्थान नयन्ती लघुमपि सकल बिभ्रती मालयायान्त्यन्दे वार्धीभवर्णा धृतमुनियितिका स्रग्धरा शंभुमूर्तिम् ॥ ११३ ॥
देहार्धानङ्ककान्ताकचकसुमचयो भालनेत्रानलार्चिः पीनोष्मामौलिखेलन्मुखरसुरनदीनीररम्यो जगन्ति । स्फीतोत्तंसेन्दुकान्तिर्दरदहतिदढाच्छादनव्यक्तशीतः शंभूर्भूयात्त्रिकुन्दप्रकरपरिहृतः पातु सर्वर्तुमूर्तिः ॥ ११४ ॥
हेयोपादेयशून्यं मुनिगणमनसामद्वयानन्दहेतुः सेतुः संसारवारानिधिसुखतरणे श्रीमदीशमानसज्ञम् । प्रालेय ज्योतिरन्तःपरिणततिमिरव्यूहविच्छेददक्षं किंचिद्वाचामधीशं स्फुरतु मम हृदि त्र्यक्षरं विश्वसाक्षि ॥ ११५ ॥
शुद्धान्ते सीधुपानोन्मदमदनमदोन्मादमत्तालिकालीतालीसाड्यामानोद्भटरुजरवराडम्बरोल्लासिताङ्गः । नृत्यन्नग्रो विलजश्वलविकटतटैः संख्यैर्लोचनाधैर्र्धृष्टः स्त्रीभिः सहास प्रहसनमुदितः पातु वो वामदेवः ॥ ११६ ॥
बिभ्रत्पाथः कपर्दे सुरनगरनरीमिन्दुलेखा ललाटे नेत्रान्तः कालवह्नि गरलमपि गले व्याघ्रचर्माङ्गभागे । पश्चात्सो वै त्रिनेत्रो वृषभगतिरतिर्वामभागाधवामः सदिश्यात्संपद वः सह सकलगुणैरुद्धताकार ईशः ॥ ११७ ॥
राजा राजाचिताङ्गेर्रनुपचितकलो यस्य चूडामणित्वं नागा नागात्मजार्ध न भसितधवल यद्वपुर्भूषयन्ति । मा रामारागिणी भून्मतिरिरिति यमिना येन वोऽदाहि मारः सप्ताः सप्ताश्वनुन्नारुणकिरणनिभाः पातु बिभ्रत्त्रिनेत्रः ॥ ११८ ॥
एक दन्तच्छदस्य स्फुरति जयवशादर्थमन्यत्प्रकोपादेकः पाणिः प्रणन्तुः शिरसि कृतपदः क्षेसुमन्यस्तमेव । एक ध्यानान्निमीलत्यपरमविघहं वीक्षितु चक्षुरित्थ तुल्यानिच्छापि वामा तनुग्वतु स वो यस्य सध्यावसाने ॥ ११९ ॥
पादटिप्पणी (Footnotes)
[वामभागः / Left Column]: १ दक्षिणाग्निगाहैपत्याहवनीयाख्या. २ दीनस्वरेण ३ सर्वै ४ ब्रह्मणि ५ अन्धकरिपौ, पक्षे,-तमसि ६ ब्रह्मा ७ धनुष्कोटि ८ स्थिरतरम् ९ विष्णुरूप शर १० पुष्पस्रज ११ वह्नयात्मक तृतीयलोचनम्
[दक्षिणभागः / Right Column]: १ योगशास्त्रप्रसिद्धासनविशेष २ संधि ३ आवृत ४ निवृत्त ५ चक्षुरादीन्येकादशेन्द्रियाणि बुद्धिरहंकारश्चेति त्रयोदशविधम्. ६ प्रपञ्चाभाव ७ चित्तैकाग्रता
शिवः ९
जटाजूटः
स धूर्जटिजटाजूतो जायतां विजयाय वः। यत्रैकैकपलिताभ्रान्तिं करोत्यद्यापि जाह्नवी ॥१२०॥ चूड़ोपीडकपालसङ्कुलगलन्मन्दाकिनीवारयो विद्युत्प्रायललाटलोचनपुटज्योतिर्विमिश्रत्विषः। पान्तु त्वामकठोरकेतकशिखासंदिग्धमुग्धेन्दवो भूतैशस्य भुजगवल्लिवलयसङ्नद्धजूटा जटाः ॥१२१॥ गङ्गावारिभिरुक्षिताः फणिफणैरूत्पल्लवास्तच्छिखारत्नैः कोरकिताः सितांंशुकलया स्वैरैकपुष्पश्रियः । आनन्दाश्रुपरिप्लुताक्षितुमुगूधूमैर्मिलद्दोहदा नाल्प कल्पलताः फलं ददतु वोऽभीष्टं जटा धूर्जटेः ॥१२२॥
गङ्गा
पर्वतभेदि पवित्रं जैत्रं नरकस्य बहुमतज्ञ्जननम् । हरिमिव हरिमिव हरिमिव सुरसरिदम्भः पतन्नमत ॥१२३॥ इय चिद्रूपापि प्रकटजडरूपा भगवती यदीयाम्भोबिन्दुर्वितरतिच शंभोरपि पदम् । पुनाना धुन्वाना निखिलमपि नानाविधमघं जगत्कृत्स्नं पायादनुदिनमपायात् सुरधुनी ॥१२४॥ चूडाशीतकरस्तनंधयसुधानीरैन्ध्रगन्यस्पृशः क्रीडाकङ्कणपन्नगेश्वरफणापीतावशिष्टा सुहुः। अङ्कासीनगिरीन्द्रजास्तनतटीहारावलीलोलनाः संतापं शमयन्तु वो हरजटागङ्गातुरङ्गानिलाः ॥१२५॥ वाते वाति यदङ्गसङ्गमवशाच्छ्रीशमुरूपप्रदे गौरी रुष्यति तुष्यति त्वहिपतिर्विन्ध्याटवी शोचति । चन्द्रश्चम्यति कुप्यते हरिरपि ब्रह्मा परं कम्पते सा गङ्गा निखिलं कलङ्कनिचय भङ्गं तरङ्गैर्र्नयेत् ॥१२६॥ शार्ङ्गी ब्रह्मकमण्डलोदधिगतैर्यैः प्रापि तीर्थाङ्गिता यैर्मृत्युंजयतामनायि गरलमस्तो जटाजूटगैः । येभ्योऽशिक्षित माधुरी मृदुजटाजूटे मठे चन्द्रमास्तानीमानि पयांसि गौतमि तव श्रेयांसि यच्छन्तु नः ॥१२७॥ यन्नाम्नः प्रथमाक्षरं विजयते मानौ द्वितीयाक्षरं नित्यं नृत्यति सत्कवीन्द्रवदने भूत्वान्त्यवर्णद्वयम् । रामो रावणमाजघान समरे शंभोः शिरःशालिनी सा सर्वाक्षरमालिनी भवतु मे भाग्याय भागीरथी ॥१२८॥ सुक्तम्भा नृकपालशुक्तिषु जटावल्लीषु मल्लीनिभा वह्नौ लाजनिभा दृशोर्मणिनिभा भोगोत्तरे भोगिनाम् । नृत्यावर्तविवर्तनेरितपयःसम्पूर्च्छनोच्छालिताः खेलन्तो हरमूर्ध्नि पान्तु भवतो गङ्गापयोबिन्दवः ॥ १२९ ॥ एषा धर्मपताकिनी तटसुधासेवावसन्नाकिनी शुष्यत्पातकिनी भगीरथतपःसाफल्यहेवाकिनी । प्रेमारूढपिनाकिनी गिरिसुतासाकेर्केरालोकिनी पापाडम्बरडाकिनी त्रिभुवनानन्दाय मन्दाकिनी ॥१३०॥ स्वच्छन्दोच्छलदच्छकच्छकुहरच्छातेतराम्चुच्छटामूर्च्छन्मोहमहर्षिहर्षविहितस्नानाह्निकाहाय वः । भिन्द्या-
दुंंयदुदारदर्दुरदरीदीर्घादरिद्रद्रुमद्रोहोद्रेकमहोर्मिमेदुरमदा मन्दाकिनी मन्दताम् ॥ १३१ ॥ शैवालश्रेणिशोभां दधति हरजटावल्ल्यो हन्त यस्यास्तद्वासोल्लासवेल्लद्धरशफरतुला यत्र धत्ते कलावान् । उन्मीलद्द्रोगिभोगावनिसुभगसिताम्भोजसभाविताम्भा गङ्गानद्दारिसङ्गा महति तव विधौ मङ्गलांन्यातनोतु ॥ १३२ ॥ दृष्टासकृद्दाहाः श्रवणपथगताः पुण्यपुञ्जावगाहाः स्पृष्टाः संसारपाथोनिधिपतितधरोद्धारधुर्या वराहाः । पीतास्तापोपशान्तिप्रजननपटवस्ते सुधावारिवाहाः कल्याणं कल्पयन्ता कलिकलुषहरा विष्णुभक्त्याः प्रवाहाः ॥ १३३ ॥ तावत्कर्णांध्वयाता जनघनकलुषाधूनने गन्धवाहा दृष्टाः किं हन्यवाहाः सकृद्दघदहने स्वर्गंतौ पुण्यवाहाः । स्पृष्टाः संसारहाहाहवरकढुकमहाम्भोधिमध्ये वराहाः पीताः पीयूषधाराधिकतरमधुराः पान्तु गोदोदवाहाः ॥ १३४ ॥
शशिलेखा
पूर्णनखेन्दुद्विगुणितमञ्जीरा प्रेमशृङ्खला जयति । हरशशिलेखा गौरीचरणाङ्गुलिमध्यगुलफेषु ॥ १३५ ॥ जयति परिमृषितलक्ष्मा भयादनुपसर्पतेव हरिणेन । इह केसरिकरजाङ्कुरकुटिला हरमौलिविधुलेखा ॥१३६॥ श्रीकण्ठस्य कपर्दबन्धनपरिश्रान्तोरगग्रामणीसदृष्टा मुकुटावतंसककिका वन्दे कलामैन्यवीम् । या बिम्बप्रतिपूरणाय परितो निष्पीड्य ९सद्शिकायग्रेणेव ललाटलोचनशिखिज्वालाभिरावर्त्यते ॥१३७॥
लोचनम्
जयति ललाटकटाक्षः शशिमौलैः पक्ष्मलः प्रियाप्रणतौ । धनुषि शरेण निहितः सकण्टकः केतकेषुरिव ॥ १३८ ॥ अन्तर्नाडीनियमितमरुल्लङ्घितब्रह्मरन्ध्र स्वान्ते शान्तिप्रणयिनि समुन्मीलदानन्दसान्द्रम् । प्रेत्यग्ज्योतिर्जयति यमिनः स्पष्टलालाटनेत्रव्याजव्यक्तीकृतमिव जगद्व्यापि चन्द्रार्धमौलेः ॥ १३९ ॥ सानन्दा गणनायके सपुलका गौरीमुखाम्भोरुहे सक्रोधाः कुसुमायुधे सकरुणाः पादानते वज्रिणि । सस्मेरा गिरिजासखीषु सनयाः शैलाधिनाथे वह्नभूमीन्द्र प्रदिशन्तु शर्म विपुलं शम्भोः कटाक्षच्छटाः ॥ १४० ॥ एकं ध्याननिमीलनान्मुकुलितं चक्षुर्द्वितीयं पुनः पार्वत्या वदनाम्बुजस्तनतटे शृङ्गारमारालसम् । अन्यद्दूरविकृष्टचापमदनक्रोधाम्लोदीपितां शभोर्भिन्नरस समाधिसमये नेत्रत्रय पातु वः ॥ १४१ ॥ पक्ष्मालीपिङ्गलिख्नः कण इव तदिता यस्य कृत्स्नः समूहो यस्मिन्ब्रह्माण्डमीषद्विघटितमुकुले काल्यज्व्या जुहाव । अर्चिर्निष्टसच्चूडा-
पादटिप्पण्यः (Left Footnotes):
१ केशादौ जरसा यच्छौक्ल्यं तत्
२ तिर्यङ्नद्धमाला
३ निबिड
४ तिर्यग्दृष्ट्या
५ अनुपसदृश कश्चिन्नवादेरुपान्तदेशः
६ बलवान्
७ पङ्कि
८ नश्यत्
९ झटिति
२ सु. र. भा.
पादटिप्पण्यः (Right Footnotes):
१ व्यक्तीभवन्
२ अक्षीणाम्; महतामित्यर्थ
३ सान्द्रस्निग्ध
४ मान्यम्
५ जटाजूट..
६ कर्तरीका
७ शान्तिमति
८ व्याप्तम्
९ अधोगामि