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सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
पृष्ठ 509स्थायी लिंक
| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्याना | |||||
|---|---|---|---|---|---|
| ७८ | |||||
| समरविहरदसङ्क | ३६०।२९ | सरसपरिपत्करणे | २५।३५ | सर्वस्य जन्तोर्भवति | १८२।३१ |
| समरशिरसि सैन्यं | २०३।९७ | सरसापि कवेर्वाणी | ३०।७ | सर्वस्य द्वे (भोजप्र ३०७) | १८२।४७ |
| समरे हेमरेखाङ्कं वाण | १८६।६ | सरसा सालंकारा | ३०।१७ | सर्वस्य सर्वदापि | ४८।१३४ |
| मर्मार्पना कस्य न (सु ४२५) | ६०।२२६ | सरसि बहुशस्ता(हि ४ १०२) | १७७।९९५ | सर्वस्य हि परीक्ष्यन्ते (हि १ २०) | ८३।१ |
| समर्प्य हृदि दारुणा | ३५९।८५ | सरसीतोय | १९४।३४ | सर्वस्यैव हि (सु १५०९) | २६१।१३९ |
| समवलोक्य विलास | ३३५।१३९ | सरस्वति प्रसा(दवी शत आनन्द) | २०५।५ | सर्वस्वापहरो न दस्यु | १८५।२७ |
| समस्तवनीति (चाणक्य १०५) | १४३।३३ | सरस्वतीपवित्राणा (सूक्ति ८ ६९) | ३५।२१ | सर्वस्वापहरो न | १८६।३८ |
| समस्तलक्षणाद्योग एव (सु १७) | ४।१० | सरखनीमातुर (श्रीकण्ठ च २ २७) | ४०।३८ | सर्वहिंसानिवृत्ता (हि १ ६४) | १६५।५४७ |
| समस्तावनीनाथमौले | १३१।१० | सरस्वतीय कर्णा (सूक्ति ४ ९३) | ३६।५३ | सर्वाङ्गमर्पयन्ती | ९१।४३ |
| समस्तस्वीकृत (शिशु १७ ६६) | १२७।१५ | सरस्वती स्थिता (सु २४४३) | १३४।३ | सर्वांलंकारयुक्तापि न | ८४।७ |
| समाकृष्टं वास (शा प ३६७७) | ३१८।१० | सरोरुह तस्य दृगैव | २५२।५ | सर्वांशापरिपूरि (सु ९१८) | २१८।८१ |
| समागमिष्यता (शा प ८६३) | २१।१८ | सरोषदृष्टावर | ३६६।१ | सर्वांशास्त्रधि (स क २ २१४) | ३३९।१२७ |
| समाजे सम्राजा | १०६।१५२ | सरोषयुद्धाङ्कन | १२८।३४ | सर्वाशुचिनि (नागा ४ ७) | ३७१।१२४ |
| समानकुलशील्यो | २७४।१ | सर्प क्रूर (भर्तृ स ७८५) | ५४।३३ | सर्वोत्तुम्बय सम | २४३।२०० |
| समायाति यदालक्ष्मी (नीति प्र १६) | ६२।८ | सर्पस्तारिण वा(सूक्ति ६० २३) | ३२७।४५ | सर्वे क्ष्यान्ता (भा ११ ४८) | ३७२।१६२ |
| समारम्भा भग्ना (भर्तृ स ७८१) | ७७।४६ | सर्पदुर्जनयोर्मध्ये (भर्तृ ७८४) | ५४।३० | सर्व ध्वान्तमिद | २९८।३६ |
| समाश्लिष्टा समा (शा द ३ ९७) | २५१।१३ | सर्पस्य रने | १७३।८५४ | सर्वेन्द्रिया (चाणक्य ६८) | १६२।३९९ |
| समाश्लिष्य (शांति श १ २९) | ३७०।१३४ | सर्पा पिवन्ति (पच २ १५९) | ७५।१४ | सर्वेऽपि विस्मृ (रसग विप्र) | ३६२।२८ |
| समिति पतिनिपाता | १३६।३७ | सर्पाणा च (पच ५ ४४) | १६४।५०९ | सर्वे यत्र (शा प १४६७) | १५०।३४० |
| समाचीना चीनांशुक | २१४।३१ | सर्पान्न्याघ्रा (पंच १ ४१) | १४८।२५१ | सर्वेषामेव (मनु ५ १०६) | ३९१।५६० |
| समुत्कीर्ण तन्व्या | २८०।७९ | सर्पावेषा कृपाणी | १२४।१६ | सर्वेद्विगकर मृगादन | २४७।४५ |
| समुत्पत्ति स्वच्छ | २४४।२३५ | सर्वं लुण्ठितमुद्धटे | १०८।२०५ | सर्वोपमाद्रव्यसमु | २७०।२२ |
| समुदितकुचकुम्भ | २८७।३५७ | सर्वं वन तृणाल्या | २१२।२० | सर्वोषधीना (वृ चा ९ ४) | ३९२।५९४ |
| समुद्विग्नस्ति (शा प ८२९) | २२५।११५ | सर्वमहा ये (शा प १४५१) | १६५।५५७ | सल्ललितमलकाना | ३२६।१७ |
| समुद्दीपितकंदर्पा कृत | ३५।१० | सर्व कल्ये वयसि यतते | १३९।६ | सल्ललितमव (शिशु ७ ४७) | ३३४।१११ |
| समुद्यते कुत्र न | २०४।८२ | सर्व किलाय (सु ९२) | १।१२ | सलील मिय (सूक्ति ५३ ८८) | २६९।४२२ |
| समुद्रवीचाव (मृच्छ ८ १५) | २४९।६३ | सर्व एव जन (हि ३ ४१) | १५०।३३५ | सलीलयातानि (शिशु १ ५२) | ३६०।२३ |
| समुद्रस्यापत्य (शा प १६६७) | ६३।३१ | सर्वज्ञ संवदसि | १९१।८५ | स विकचोत्पल (शिशु ६ ४२) | ३४४।३० |
| समुद्वानरणा भूमि | १६२।४०७ | सर्वज्ञ इति लोको (भोजप्र ३१२) | ९९।२७ | सविता (का प्र १० ४०५) | १७१।८०० |
| समुद्रेणान्तस्थस्तट | २१७।५६ | सर्वज्ञेन त्वया | १९५।४१ | सविप्रपादोदककर्द | ८९।३ |
| समुन्नतस्तन (भोजप्र २६४) | १३५।२६ | सर्वत्र गुणवान्देशे | ८२।३१ | सव्यदक्षिगयो (पच १ ८२) | १४८।२७२ |
| समुपागतवति | २४२।१७७ | सर्वत्र गुणवानव (वृ श ७९) | ८१।२७ | सव्यलीक्ष्मव (किरात ९ ४५) | ३५६।१२ |
| समुल्लसत्पङ्कजलो • | ३४४।१४ | सर्वत्र संपदस्तस्य (सूक्ति १२८ ५) | ७५।८ | सव्याजं तिलकाल | २८१।१९२ |
| समुल्लसद्दिनकर (शिशु १७ ६१) | १२७।१० | सर्वत्रोद्गत रुन्दला | ३४२।६९ | सव्यावे (शा प ३८२२) | ३३५।१४६ |
| समुल्लासो वाचा | ३५।३८ | सर्वथा व्यवहर्त (उत्तर राम १ ५) | ५५।६६ | सन्यासव्योरुबाहु | ३२२।३३ |
| स मूर्ख कालम (हि ३ १७) | १८८।३३३ | सर्वथा सत्यजेद्दाद | १५४।३७ | सम्ब्रीडा दयिता (का प्र ७ ३२१) | १२।४१ |
| समूलघातममृन्न (शिशु २ ४७) | ७९।० | सर्वथा स्वहित (सु २१०५) | १७१।८०७ | सम्ब्रीडार्वनिनरी (शा प ३७८०) | ३५३।८८ |
| सम्यगनिष्टन्न | १७१।७८ | सर्वदा सर्वदो (भोजप्र ३१३) | १०१।३ | स श्रीकण्ठ (अनर्घ रा ७ ६१) | ३०२।११५ |
| सरजसमप (किरात १० २६) | ३४०।२८ | सर्वदेवमयस्यापि (पच १ १३१) | १४२।७ | ससत्वरमितस्तत | १९४।४९ |
| सरजस्का पाण्डु | २२२।४१ | सर्वदेवमयो (पच १ १३१) | १४२।६ | ससार साक (काव्याल ३ ३५) | २०५।६ |
| सरलप्रिय (नल च २ १५) | १०३।६८ | सर्वद्रव्येषु (मात्स्य पु १८९) | २९।३ | स सुहृद्वसने (पच २ २६७) | १६४।११५ |
| सरला बहुलारम्भ (काव्यालं) | २०५।९ | सर्वनाशे (पच ४ २८) | १५५।९० | सान्धवो (हि २ १८१) | १७९।१०२२ |
| सरले एव दो (विक्रमांक ८ ६४) | २६४।२२६ | सर्वनाशे च (पच ४ २०) | ३१०।५२९ | सस्यानि स्वय | १८०।१०४६ |
| सरले साहसरा (मालती १०) | ३०५।१० | सर्वलोकपरितोष | २५१।१२ | सहकारकुसुम (भर्तृ स ३४०) | ३३१।९ |
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संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| पाद/प्रतीक | संदर्भ | पाद/प्रतीक | संदर्भ | पाद/प्रतीक | संदर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| सहकारे चिरं (भोजप्र २८६) | २२५।१२३ | साधनं सुमहद्य (का प्र ७ १५१) | ७९।१२ | सा मे यद्यपि | २८१।१०३ |
| सह कुमुदकदम्बै | ३०३।१२८ | साधर्म्येण कथं | १२०।१४९ | सामैव हि | १४९।३१२ |
| सहचरी शपथ | २८५।५ | साधयति (सु ४०१) | ५८।१७६ | मामोपायनय (सु २२८५) | ७८।१२ |
| सहजमलिनवक्र (प्रबोध १२) | १७५।९४० | सावारणतहू(सूक्ति ३३ ३०) | २३८।६४ | सान्ना दानेन (मनु ) | १४८।२३१ |
| सहजानघदृश.(शिशु १६.२९) | ५९।१९८ | सा वारयत्य | २६४।२६२ | साम्नैव यत्र (पच १ ४०९) | ३९१।५६४ |
| सहजोऽपि (दृ श २६) | १६८।६८२ | साधु चन्द्रम (सूक्ति ५३ ३५) | २६२।१७८ | साम्य (विद्ध शा १ २५) | ३३३।१०० |
| सह तया स्मर | २८२।१३३ | साधुरेव (दृ श २) | ४६।५४ | सायं चन्द्रकला | २७४।३१ |
| सह परिजनेन | ७७।५ | साधुरेवार्थिभि (भर्तृ स ७९२) | ७३।४ | साय दामग्रथन | २८६।१८ |
| सह वसतामप्य (सु ३९९) | ५८।१७५ | साधु व्याकरण | ४३।९ | सायं नायमुदेति | ३०२।११७ |
| सहसा विद (किरात २ ३०) | १७५।९३५ | साधुष्वेवातित (सु ४०८) | ५८।१८४२ | सायं स्नानमुपा (का प्र ८ ७९) | २९३।१२ |
| सहसा हृदये | २८५।४ | साधूना दर्शनं पुण्य (शुक ६८ १) | ८६।७ | सायक्रसहायबाहो (काव्यप्र ७ ४) | १८४।५५ |
| सहसिद्धमिदं (सु २४८) | ४८।१४६ | साधो कुण्डलघट | २४८।८८ | सा यावन्ति (शा प ३५८०) | ३११।२० |
| सहस्रकरपूरणा | १०६। ७० | साधो प्रकोपि (हि १ ८६) | ४५।२३ | सारङ्गाक्ष्या कुच | २६६।३१० |
| सहस्रशीर्षा पुरुष (शा प ४९४) | १८१।१ | साध्वी मा वी (गीत १२ २४ १) | ३५।१७ | मारङ्गो न लता (सु ६१८) | २३३।१९५ |
| सहस्रास्यो नाग | ५५।१ | साध्वीव भारती (सु १४५) | ३२।१७ | सारसवत्तावि (शा.प ४००१) | १२२।१७९ |
| सहायबन्ध (मा ५ १३७१) | ३९१।५७१ | साध्वीत्रीणा (नीतिरत १५) | १७८।१००२ | सारखते स्रोतसि | १०१।८ |
| स हि गगन (हि १ २१) | ९३।८३ | सानन्द नन्दिहस्ता (सु ८१) | ३।३५ | सा राजहंसैरिव | २६९।२४४ |
| सहिष्ये विरह (काव्या २ १५१) | ३३०।३ | सानन्दं सदनं (चाणक्य १२ १) | ८९।४ | सा रामणी (अल कौस्तु अ १) | २७१।३४ |
| सहृदया कवि (सु १५९) | ३३।२८ | सानन्दरुन्दुक | ३४६।३६ | सारासारपरि (सु २८२०) | १४४।१०२ |
| सहैमकटकं वत्ते | २६४।२३९ | सानन्दप्रमदाकटाक्ष(शृ ति १ ४) | ३२।४९ | सा रोमाञ्चति (गीत ४ ९ ९) | २९०।८८ |
| सहोदरा कुङ्कुमकेस | ३१।२९ | सानन्दमेष (अल कौस्तु वि १) | २२३।८३ | सार्थकानर्थकपदं | २७०।४२८ |
| स ह्यामलय (हि २ ९२) | १४२।२२ | सानन्दा गणनायके | ९।१४० | सार्थ मनोरथ (शृगार ति १२०) | ३०६।१ |
| सासारिकसुखासक्तं | १५७।१८२ | सा न भ्राति न | २९०।८७ | सार्वभौमभवनं (शाति श २ २६) | ३६७।३० |
| साक कुरग (का प्र ५ १२१) | १०५।१४२ | सानुज काननं | १९९।२८ | सालकाननयुक्ता (शा प १२७५) | १३९।१ |
| साक्र प्रावगणैर्लु | २१७।४१ | सान्त्वप्रायै | ३२९।१३ | सालक्तकं (अमरु १२८) | ३१०।४ |
| सा कविता सा (प्रसगा भ १३) | ३०।१८ | सान्द्रा मुद | २६१।२०१ | सालक्तकेन (अमरु ११६) | ३१०।३ |
| साकारो (पच ३ ८६) | १४४।७२ | सान्द्रानन्दजुर (गीत ९ १८ ३) | २५१।४७ | सालस मुखर (शा प १३१९) | १४४।९८ |
| साकृत निजसविदे (सु ११७) | ४१।७४ | सान्द्रामोदवती | २३२।९२ | सावलेपमुपलि (किरात १३ ८६) | ५९।१५८ |
| साकूतमधुरकोमल | ३५।६ | सान्द्राम्भोद (शिशु १८ ३६) | १२९।७५ | सावशेषपदमूक्त(शिशु १० १६) | ३१५।१९ |
| साकूतस्मितमा (गीत २ ६ १२) | २४१।६९ | सान्ध्यमस्तमित | २९४।२० | सावित्रीमात्र | १६७।१६३ |
| साक्षर पुरुषं | १५६।१५५ | सान्ध्यरागरु (भट्टोपमन्यु ) | २९३।९ | सा विद्याधर | २८१।१०६ |
| साक्षरा विपरीता | १५८।२०३ | सा पत्यु (अमरु २९) | ३५८।६४ | सा विरहदहनदूता | २८८।१० |
| साक्षात्किलाष्ट (महावीरच ७ ९) | १४०।१ | साप्तपदीन (सु २४५) | ४८।१४३ | साशङ्कस्य (सु २५६७) | १०८।१९५ |
| साक्षात्प्रेमाव (शा प ४११९) | ३७३।३८७ | सा बाढ भवते (शृगार ति १२२) | ३१०।६ | साश्चर्यं युवि (सु ३६२) | ६२।२७५ |
| साक्षादभूत्क्षय | ३२०।४ | सा बाला वय (अमरु ३४) | २८०।९२ | सा श्रीर्या न (गरुड पुराण ) | १५७।१७१ |
| साक्षान्मघवत (शा प ४००७) | ३६१।२ | सा भार्या या (भा १ ३०२७) | १५४।६१ | सा सचराचम | २८१।१०४ |
| सागसि प्रियतमे (सु २०१४) | ३१४।२ | साभिमानम (सु ३१०) | ४७।८५ | सा सर्वथैव रक्ता | २८८।८ |
| सागसेऽपि न (सु ३२३) | ४७।८४ | सामगायनपूतं मे (शा प ४०६२) | ३६४।७ | सा सा सपद्यते बु (विक्रमच ५३) | ९१।३४ |
| साग्रयोऽपि किल | १०१।११ | सामदाने भेद | १५०।३२० | सा सुन्दर तव (काव्याल ६ १०) | २८०।४ |
| साटोपव्योमहट्टोषित | २७।१३ | सामवादा (शिशु २ ५५) | ३९१।५६६ | सा सेवा या (पच १ ४७) | १४८।२५५ |
| सा तन्वीति (सूक्ति ४२ १) | ३३५।१४२ | सा मा द्रक्ष्यति(गीत ११ २० १) | २९३।४ | सा सौन्दर्यनिधि | २८१।१९६ |
| सा तोरणान्ति (सूक्ति.३८ ३) | २७५।१९ | सामादित्सञ्जि (पच १ १६८) | १४९।२८७ | सा स्तनाञ्जलि | २६४।२५७ |
| सा दुग्ध्व (विद्ध शा १ ३८) | २७१।३६ | सामुद्रास्तिम (राजत ४ ६२९) | ३८६।३८० | साङ्गे मा कुरु | ३५८।७६ |
| सा दृष्टा येर्न (सु १२५४) | २७०।१ | साहजिकरूपवत्या | ३१२।२१ |
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| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | ||
|---|---|---|
| ८० |
| साहारं वचन ३१०।९ | सुखं दु खान्तं (मा १२ ८३०) ३८२।२१९ | सुभगे कोटिसख्यत्व ३३१।७ |
| साहित्यपाथो (कुव ७३) ३८।१८ | सुख हि (मृच्छ १ १०) १७५।९१८ | सुभाषितं हारि विश २९।१७ |
| साहित्यसङ्गीत (भर्तृ स ७९६) ४०।३० | सुख ह्यवमत (मनु २ १६३) ३९१।५६२ | सुभाषितज्ञेन जनेन १७३।८६७ |
| साहित्ये सुकुमार (सूक्ति ४ १०४) ३४।५९ | सुखदु खा(मा १२ १२५१८) ३८२।२१० | सुभाषितमयैर्द्रव्यै (पच २ १७४) २९।३ |
| सिंह शिशु (भर्तृ स ७५) ७९।१४ | सुखदु खे (दृ ग ४७) ३८२।२१३ | सुभाषितरमा (शा प १५६) १५९।२९४ |
| सिंहक्षुण्णकरीन्द्रा (नीतिप्र ८) ८६।१४ | सुखदु खे हि (वृ चा ४ २३) ३८२।२१६ | सुभाषितरसास्वाद (पच २ १७३) २९।५ |
| सिंहादेकं (चाणक्य ६६) १६२।३९७ | सुखमापतितं(मा ३ १५३८४) ३८२।२२२ | सुभाषितस्याध्ययने २२७।१८६ |
| सिंहो बली गिरि (भर्तृ म ७०७) ९२।८० | सुखमेव हि (मा १२ ७५५) ३८२।२०४ | सुभाषितेन गीतेन २९।२ |
| सिंहो व्याकरण (पच २ ३६) १७९।१०२५ | सुखयतिितरा न ८५।१० | सुभाषिते प्रीतिरनु (सु २६९) ५०।१८७ |
| सिक्त स्फटिककुम्भा (कुव १७१) १३४।५ | सुखलवदशा हर्ष ५१।२२८ | सुभिन्नं (चाणक्य ९०) १६२।४१७ |
| सिक्ताया वीर (शा प १२३४) १२४।१५ | सुखशय्या ताम्बूल(शा प ३७८१) ३५२।६ | सुभ्रु त्वं कुपिते (चोरपचाशिका) ३०७।६५ |
| सिक्तानैर्मञ्जरीति ११४।२५ | सुखस्य दु खस्य न ९२।५७ | सुभ्रु त्व नवनीतकल्प ३०७।७० |
| सित वसनम (शा प ३०९७) ३५६।२७ | सुखाद्बहुनर (मा १२ ७४६५) ३८६।३७९ | सुभ्रुवामधिपयो(शिशु १० ८७) ३२१।१३ |
| सितकिरणकपोली ३०३।१२६ | सुखार्थी त्यजते १५८।२१६ | सुम ये वाग्भङ्गैर्वचन २९२।१७ |
| सितांशुवर्णैर्वियति १०५।१२६ | सुखार्थी ना (राजन ३ २१५) ३८२।२०७ | सुमनोवररत्नाना १४५।१०८ |
| सिद्ध मन्त्रौ (वृ चा १४ १७) १६८।६५६ | सुग्वास्वादपरो (हि ४ ७७) ३७८।५० | सुमन्त्रिते सुवि (शा प १४३१) १५३।९ |
| सिद्धिं वाञ्छ (पव ३ २२४) १७९।१०२७ | सुगन्ध कतकीपुष्प १४६।१७६ | सुमहन्त्यपि (हि १ २६) १६३।४४० |
| सिद्ध्यन्ति कर्मसु(अ शाकु ७ ४) १५२।४०६ | सुगृहीतमालिन (कवित्तामृत १४) ५७।१४५ | सुमुखेन वदन्ति (पच २ १९९) ३४९।६० |
| सिन्दूरं रवि ३२०।४५ | सुजन व्यजनं (प्रमगा ३) ४५।१८ | सुमुखोऽपि सुवृत्तो (शाम ३५८) २४८।७८ |
| सिन्दूर सीमन्ता(शा प १२४०) १३९।३ | सुजनानामपि हृदयं ५६।१२२ | सुमेरुशिखरप्रान्त १८१।१३ |
| सिन्दूरद्युतिमुग्ध (नैषध १२ ३६) १२३।२ | सुजनो न याति (भर्तृ २ ६२) ४७।११० | सुरतमरखिन्नपद्म(विद्ध शा १ २८) ३२५।३ |
| सिन्दूरस्पृहया (नल च ३ ७) २७।९ | सुजीर्णमन्नं (वानर्यष्टक ७) १७४।९०६ | सुरतविरत (शा प ३७०७) ३२१।१८ |
| सिन्दूराणीव २८।१९ | सुतं पतन्त प्रस (भोजप्र २९२) १८२।३६ | सुरते च समाप्ते च ३१७।१ |
| सिन्धुष्वङ्गावगाह १९।३९ | सुतनु जहिहि (अमरु ३९) ३११।१३ | सुरमन्दिरतरुमूल (मोहमुद्गर) ३६७।२६ |
| सिन्धूत्तरं (शा प १११३) २१७।५३ | सुतनु जहिहि (शा प.३५७७) ३०६।३० | सुराणा (अल कोस्तु व्य १) १०६।१५८ |
| सिन्धो सुधांशुश २९७।२५ | सुतनु श्रुतिसेवनतो ३२१।२ | सुरासुरशिरोरत्नकान्ति (सु ६) १९।४१ |
| सिन्धोजैत्रमय ११०।२३८ | सुतनु हृदया (अ शाकु ७ २४) ३०६।४८ | सुरूपं पुरुष दृष्ट्वा ३४९।४० |
| सीतासमागमोत्कण्ठा १८९।९ | सुतन्प्रत्य (शा प १४१९) १५०।३४७ | सुलभ वस्तु सर्वस्य (दृ श ५७) १५७।१७२ |
| सीत्कार शिक्षयति (शा प ५२४) १८६।३ | सुदीर्घा रागशा(शा प ३३३५) २६४।२८४ | सुलभा (मा ५ १३४८) १४५।११५ |
| सीत्कृतानि (शिशु १० ७५) ३१९।१८ | सुधाशोजर्जितं क्व (पच म २०) ९३।९० | सुवदनावदना ३३२।४३ |
| सीदन्ति चामि ९८।२ | सुधाकरकर (शा प ११०२) २१८।६७ | सुवर्णतुषणा (मा ५ १२५५) १४८।२५४ |
| सीदन्ति सन्तो ९९।१० | सुधावान्त कान्ति २६।२०० | सुवर्णवर्णललितापद १०१।४ |
| सीमन्तिनीषु का १९६।३ | सुधाबद्धग्रासै (विद्ध १ ३१) २६३।१९८ | सुवर्णस्य सुवर्णस्य १८६।८ |
| सीमा वृद्धि (पच १ १०१) १४४।९४ | सुधामयोऽपि (शा प ३३०५) २६०।१२० | सुवर्णालंकृता कन्या १८७।२१ |
| सीमा सङ्कोच (पच १ १०२) १४४।९५ | सुधारश्मि सद्यस्तिमिर ३०१।८३ | सुवर्णे पद्मे (भोजप्र १२६) १४७।२०० |
| सुकपरिविन्द २००।४९ | सुधाशुभ्र (भर्तृ १ ४०) ३७८।५२ | सुविरलमोक्ति (रमंग २ रूप) २६२।१७३ |
| सुकविद्वितय मन्ये (भोजप्र १९१) ३६।३१ | सुदारी सा (शा प ३३६६) २७०।४३१ | सुवृत्तस्यैकरूपस्य पर (सु २१९) ४६।७१ |
| सुकर सर्वथा (रा ४ ३२ ७) ३८२।२२५ | सुपर्णपरिसवितस्तदनु १०१।५ | सुव्यवमायिनि शूरे ६२।१८ |
| सुकवे शब्द (भोजप्र ८०) ३२।३ | सुपर्णे खर्णाङ्गारचित २३१।३९ | सुशील खर्णगौराङ्ग १९६।८ |
| सुकुमारमहो (शिशु १६ २१) ५९।१९९ | सुपात्रदानाच्च भवेद्ध १७३।८४९ | सुश्यामा चन्दनवती १९५।३ |
| सुकुलजन्म १७५।९३८ | सुपूरा स्यात्कृ (पच १ २६) १८४।५०१ | सुषमाविषये परी २६२।१७६ |
| सुकुले योजये (चाणक्य ३ ३) १६०।३४१ | सुभग वदति जनम्त ३५२।१२ | सुसदिग्धस्य भक्तस्य १६८।६५४ |
| सुख च दुख (मा ५ १३०६) ८६।३८१ | सुभग तवाननपङ्क १९४।२७ | सुसङ्गत्तैर्जिविनवन्सु (सु १८९) ७२।५२ |
| सुखं जीवन्ति (काव्या.२ ३४१) ८०।२३ | सुभग त्वत्कथारम्भे २८७।१ | सुसहदैर्दैवदपि (शिशु १७ १९) १२७।८ |
| सुभगसलिलाव (अ शाकु १ ३) ३८५।४ |
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संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
८१
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| सुसितवसनालंकां(काव्यप्र ७ ९) १३६।३८ | सोऽपूर्वो रसना (मङ्कट १८) २२४।१९१० | स्तनयुगमुक्ताभरणा १०३।८१ |
| सुहृदस्तरुणीनखश्च ३३२।७१ | सोम शौचं ददौ (याज्ञ १ ७१) २५०।३ | स्तनयोर्जघ (काव्य २ २१७) ३८०।१३६ |
| सुहृदा हितकामा (हि १ ७४) १६३।४४६ | सोमकान्तो (सूक्ति २८ ४) २१८।६६ | स्तनावटे चन्दन (नैषध ७ ८०)२६६।३०७ |
| सुहृदा हि धनं (सु ३१७०) ६६।२६ | सोमार्थायितनिष्पिवान १९।५२ | स्तानान्ते नो हारो १९१।८३ |
| सुहृदामुपकार (पच १ २२) १५१।३८४ | सोष्मण. स्वन(शिशु १० ५८) ३१०।१९ | स्तनाभोगे पत (रसग २ उ) २५७।३ |
| सुहृदि निरन्तर(पच.१ ११०)१७०।७३९ | सौकर्यमिन्दीवरलोच ३४२।७३ | स्तनौ तुङ्गौ समा २६७।२२६ |
| सुहृदो ज्ञातय पुत्रा ९१।१६ | सौगन्ध्यं दध (शिशु ८ ४८) ३३९।१०५ | स्तनौ भारार्पणव्यग्रौ २६६।३१३ |
| सूक्तिं कर्णसुधां (शांति श ३ ७) ३७०।९६ | सौजन्यधन्यजनुष ५०।२०४ | स्तनौ माम्र (भर्तृ म १५०) ३७१।१३० |
| सूक्ष्माय शुचये तस्मै (सूक्ति.१ ४६) ३।२ | सौजन्यामृतसिन्धव (प्रसगा ९)५३।२६३ | स्तब्धस्य नश्यति(वानराष्टक ५)१७५।९४५ |
| सूक्ष्मेभ्योऽपि (मनु.९ ५) १४४।८१ | सौजन्याम्बु (सा द १० ३४) ३७०।८९ | स्तुम कं (काव्यप्र / १३) ३१३।६४ |
| सूचीमात्रविभेद १५३।४१७ | सौधादुद्विजते (विद्ध शा ३ २) २९०।८६ | स्तुवद्भावनिवर्तके मति ३८।२५ |
| सूचीमुखेन (सहृदया ३.५२) २८३।१६७ | सौन्दर्यं (प्रस.रा ४ १४) १०९।२२७ | स्तुवन्ति गुर्वी (किरात.१८५) ८५।११ |
| सूतिर्दुग्धसमुद्रतो २८२।१४८ | सौन्दर्यपात्रे (विक्रमाक ८.७५)२६०।१२३ | स्तोकाम्बि परि (शा प ११३०) २१९।३० |
| सूते सूकरगृहिणी २३१।६६ | सौन्दर्यस्य (का.प्र १०.०८२५) २५४।४६ | स्तोकाक्षसावनवता २५०।१४ |
| सूत्रधारकृतारम्भैर्ना(सूक्ति ४ ४७)३६।३४ | सौन्दर्यस्य मनो २६८।३६९ | स्तोकोनोन्नति (पच १ १६१) ५४।२३ |
| सूत्रं पाणिनिबद्ध कलय ४२।४ | सौभाग्यं विर (शा प ४८४) १५५।१९८ | स्तोकोच्छ्विनि (अनर्घ रा ४ १) ३२५।६० |
| सूत्रे पाणिनिनिर्मितैर्बहु ४२।२ | सौमित्रे ननु (प्र.राघव ६.०१) २८१।१२० | स्तोत्रं चैतद्गु (सूक्ति ८२ १८) ३३३।३६६ |
| सूदारा उलपाडि १९३।९३ | सौरभमम्भो (सा द १० १६) २७०।१८ | स्त्रिय पवित्र (शा प ३०८४) २५१।४ |
| सूनु सच्चरि(भर्तृ स ८०७) १७९।१०२० | सौरभ्यं भुव (भामिनी प्रा ३६) २३८।५८ | स्त्रियस्तु य (भा १३ १२१६) ३४८।११ |
| सूच्रत सर्वशास्त्रार्थं (प्रसगा १५) ८३।१ | सौरभ्यं मृग (शा प.३३७४) २७१।५२ | स्त्रियोऽव (शा प १५६९) १४३।४२ |
| सूर्यस्य का तिमिर २०२।९२ | सौरभ्यगर्भमकरन्द २४०।१९५ | स्त्रियो हि नाम (मृच्छ ४ १९) ३४८।३ |
| सूर्येऽस्ताचलमौलि ३०७।५४ | सौरभ्ये चलिते रसे ३२५।६४ | स्त्रियो हि मूल ३४९।६४ |
| सृजति च जग(काव्यप्र १० २५)९१।४५ | सौरभ्येन त्रिभुवन २३३।११३ | स्त्रियो ह्यक (भाग ९ १४ ३७) ३४८।२ |
| सृजति तावदशेष (भर्तृ स ३४२) ९२।६७ | सौरभ्येन समावृणोषि २४२।१८४ | स्त्रीणा यौवन (नवरत्न ७) १८०।१०४१ |
| सेतुं संभेदय (शा प १५७२) १४३।४८ | सौवर्णं कमला (सूक्ति ३१ ६) २१९।३७ | स्त्रीणा हि साहच (दृ श ६०) १७१।७८२ |
| सेतूपक्रमकौ (अनर्घ रा ७ ८४) ५३।२७० | सौवर्णकङ्कणश्रेण्या २६४।२३८ | स्त्रीणां द्विगुण (वृ चा १ १७) ३४८।६ |
| सेयं ममान्नेषु सुधा(काव्यप्र.४ ५)२७।३१६ | सौवर्णाङ्कितपत्रमारुत १६।४८ | स्त्रीणामशिक्षिश्रि (अ शाकु ५ २२) ३५०।७० |
| सेयं मृदु कौसु (नैषध ७ २८) २५९।८१ | सौवर्णानि सरो १५६।१५८ | स्त्रीबालस्वामि (विष्णु पुराण) १५४।४८ |
| सेयं शीधुमयी वा सुधा २७।३।३ | सौहार्द शशशृङ्गवत्सु ९९।२२ | स्त्रीमुद्रा कुसु (भर्तृ स ११३) २५२।५४ |
| सेयं स्थली वनतु(सूक्ति २६ ६)२३२।१०५ | सौहार्दखण्रैरखाणा (कुव ६६) १६८।५५८ | स्त्रीरूपं मोहकं (शा प ४१९२) ६४।६ |
| सेवक. स्वामिनं (पच १ ५१) १४८।२५९ | सौहृदेन परित्यक्त (सु २७०७) १५३।३० | स्त्री विनश्यति (शा प.१४४४) १५३।१९ |
| सेवया धनमिच्छ (पच.२ २८७) ९७।४ | स्कन्वानिसिन्धुरयूथ ३३७।५३ | स्त्रीषु न रागः (मृच्छ ४ १३) ३४९।५८ |
| सेवा श्ववृत्तिर्यैरूक्ता (पच.२ २९१) ९७।३ | स्कन्धे विन्यस्य २७४।३४ | स्त्रीषु प्रवीर (अनर्घेरा ४ ३३) ३६०।२५ |
| सेवितव्यो (चाणक्य १२) १६४।४९६ | स्खलदंशुकमन्यवस्थ २७८।२९ | स्थगयति तमः (भर्तृ.स ८१०) ३२०।६ |
| सेवेव मानमखिलं (हि १ १३९) ७३।२० | स्तनं धयन्तं जननी २२१।१६ | स्थगयति नयनास्त्रं २७५।२६ |
| सैन्योत्तारणतो (शा प.१५७५) १४३।४५ | स्तनं धयन्तं तनयं १२६।३७ | स्थगिताम्बर (शिशु ९ २१) २९७।१७ |
| सैरन्ध्रीकरकृष्ट (विद्ध शा २ २३)२९५।६० | स्तनकलशस्खलदम्बर २५३।१२ | स्थलकमलतरुणा ३३३।८४ |
| सैष पर न विनश्यति(सूक्ति ६.१४)७०।२२ | स्तनतटमिदमु (सूक्ति ५३ ९६)३८०।१३३ | स्थलीना दग्वाना (सु ६५०) २२३।११० |
| सैष सा०वी सुभक्तश्च ३५०।४ | स्तनन्यस्तोशीर (अ शाकु ३ ६) २७६।३२ | स्थाणु खय (सूक्ति १३३.१८) ३६३।१३ |
| सैव सैव सरसी रम २२१।११ | स्तनपरिसर (शा प ३७३०) ३२६।१५ | स्थान एव (हि २ ७१) १६४।४८० |
| सोढुमलमस्मि नाहं ३०५।६ | स्तनभाराय मध्येन २६७।३२९ | स्थान नास्ति (हि १ ११६) ३४८।१२ |
| सोन्मेषो न सखीजन २७७।६३ | स्तनभारोऽत्र वक्रेन्दु २६९।८०५ | स्थानभ्रष्टा न (हि.१ १७३) ८६।६ |
| सोपचारमुपशान्त (शिशु.१०.२) ३१४।५ | स्तनमण्डलमाश्रित्य १८७।१८ | स्थानमाहिक्कम २९३।१२ |
| सोपानानि तिरोहितानि २१९।१४ | स्तनयुगमश्रु (औचित्य १०) १०३।७० | स्थानमुत्सृज्य (हि १ १७४) ३८०।३३६ |
११ सुभा०अनु०
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८२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| स्थानान्निर्गत्य (सु १३७९) २९२।३६ | स्पृष्ट्वा येन शिरोरुहे ३६६।१० | स्मेरराजीवनयने (सा द १० ७) ३०८।३ |
| स्थानेषु शिष्य (अनर्घ २ ९) १७६।५५३ | स्पृष्टोल्लसत्किरण २५५।५३ | स्मेरा सन्तु सभा २३१।५२ |
| स्थाने स्थाने (सूक्ति ५९ १४) ३२३।८९ | स्पृहणीया कस्य न (सु ९४६) ४८।१४४ | स्मेरा दिश कुमुद २१०।३० |
| स्थायिनोऽर्थे (शिशु २ ८७) १४७।१८९ | स्पृहयति भुजयो (भर्तृ म ३४६) ७८।५ | स्मेराननेन हरिणा सस्पृह १६।५ |
| स्थाल्यां (भर्तृ स ३४३) ९५।१२७ | स्फटिकमरकतश्रीहा (शा प ११०) १४।६ | स्यादत्यन्तानिरक्षर १८०।१०४४ |
| स्थिति नो रे (भामिनी प्रा ५०) २३०।३५ | स्फटिकस्य गुणे (सु ८९४) २१८।६८ | स्यादेव तोयममृत १४०।५ |
| स्थितिर्गेहोपान्ते ३५३।३६ | स्फारेण सौरभभरेण (सु १८९) ३३।४२ | स्रंसमानमुपयन्त (शिशु १० ४६) ३१६।५ |
| स्थितो न खादामि १७४।८९१ | स्फीतं शीतं (शा प ३८३०) ३३६।३२ | स्रग्दाम मूर्धनि (शा प ११९२) २४७।५३ |
| स्थित्यतिक्रान्ति (किरात ११.५४) ७९।८ | स्फुट स्फुटपलाश ३४५।४३ | स्रस्ता नित (कुमार ३ ५५) २६८।३८१ |
| स्थित्वा क्षणं (शा प ८००) २२१।१७ | स्फुटतरमटवीना १३२।१५ | स्रक्कपोलेन प्रकटीकृतं ५७।१४६ |
| स्थित्वा वैर्या (शा प ५७१) २०८।२४ | स्फुटतु हृदयं (अमरू ७३) ३५७।५१ | स्रक्कान्तदवकान्तारो १३१।३ |
| स्थिरत्वमचिरद्युतौ २५६।३८ | स्फुटमसद्ववमम (कुव १७१) २६६।३२० | स्वकीयं हृदयं (कुव १२०) २६५।२६४ |
| स्थिरापाय (शांति श २ ११) ३७६।२५१ | स्फुटमिदमभि (शिशु ७ ५८) ३३४।१२२ | स्वकेलिलेशस्मित (नैषध १.२३) २५२।४ |
| स्थिरा शैली गुण (कुव ५१) ३८।११ | स्फुटमिवोज्वल (शिशु ५ ६) ३३२।६० | स्वगर्भशुक्तिनिर्मिचं सुवृत्त ८।१३ |
| स्थूलप्रावरणे (शांति श २ २७) ९६।१७ | स्फुरद्बृहतह (का प्र १० ५६१) १०४।८९ | स्वगुणानिव परदोषान्(सु ८१०)५८।१८४ |
| स्नातं खर्गतराङ्गिणी ७।८४ | स्फुरदधीरत्तडिञ्ज (शिशु ६.२५)३४१।३१ | स्वचित्तपरिचिन्त (भर्तृ म ८१२) ७०।३९ |
| स्नातस्त्वाद्विपुरुत्पथासि ११६।५३ | स्फुरदुरसिजभार २९८।१२ | स्वच्छन्द (सु ६५७) २३३।११७ |
| स्नाता प्रावृषि (शा प १२८०) १३२।३३ | स्फुरदनुनिस्वन (नैषध १ ९) १०५।१२४ | स्वच्छन्दं दलदर २४४।२२५ |
| स्नाता तिष्ठति (भोज प्र ३०२) २८१।१९५ | स्फुरद्रोमोद्भेदस्तर ३१८।१२ | स्वच्छन्दवनज तेन(हि.१ ६८)१६५।५५० |
| स्नातुं वाञ्छसि किं १२७।७४ | स्फुरन्त पिङ्गला (सु १७२१) ३४०।६ | स्वच्छन्दैकस्तनश्रीरु १११।६७ |
| स्नान वारिवारि ३५९।१०३ | स्फुरन्नानारत्नारुणित २५४।३२ | स्वच्छन्दोच्छलद (का प्र १४) ९।१३१ |
| स्नानं नाम (शा प १४१५) १४४।१०३ | स्फुरसि बाहुलते (सु १५७३) ३०८।४ | स्वजन स्वात्म (वृ श ७६) १६९।७०७ |
| स्नानाम्भो बहु(शा प ३७५१) ३५१।३९ | स्फुरिते जठरे (शा प ५०७) १८१।१८ | स्वजातीयं विना (वृ श ११) १५०।३५६ |
| स्नानार्द्रमुक्तेष्वनु (रघु १६ ५०) २५७।११ | स्फूर्जद्ब्रह्माण्डशुक्तौ १३८।९१ | स्वजातीयविघाताय(वृ श ९२)१६९।७१३ |
| स्नान्तीना ब्रूह (शिशु ८.५२) ३३९।११० | स्यमानमयाय (शा प ३३१७) २६३।२०८ | स्वत प्रकाशो १०४।१०० |
| स्निग्धं यद्यपि वीक्षितं ३०७।६१ | स्मरकलपद्रुमो बाले २५८।५४ | स्वेदशोजनयन्ति (नैषध २ ६१) २५९।९० |
| स्निग्धमपाल सुरूक्षमेव २९।१९ | स्परतोरभिलाषकल्पिता २७३।१ | स्वेदशजं कुला (हि ३ १६) १४२।२५ |
| स्निग्धस्मेरविलोले २७२।५८ | स्मरदवथुनिमित्तं (द रू २ ४०) २८९।४६ | स्वेदशजातस्य नरस्य १७३।८५२ |
| स्निग्धच्छाया फलिनो २४०।१२९ | स्पर नृशंसतमस्त्व २८२।१३० | स्वपक्षच्छेदं वा समु (सु ४५०) ६०।२५२ |
| स्निग्धेन्दोपलसुन्दर २७२।५९ | स्मरमानसिक्त २६६।३१५ | स्वपरप्रतारकोऽसौ (भर्तृ स १२०) २५१।२७ |
| स्निग्धे यत्परु (शा प ३५४८) ३०८।१८ | स्मरशरधिनि (विद्ध शा २.१०) ३४६।३७ | स्वप्रासादितदर्शनाम २५५।८९ |
| स्नेह स्वीकुरु कृष्ण २८३।१६४ | स्मरशरशतावि (सा द १० ६५) २८८।२४ | स्वप्ने दृष्टा किमपि २७९।६७ |
| स्नेहच्छेदेऽपि (हि १.४६) ४५।२५ | स्मरहुताशनमुर्मुख (शिशु ६.६) ३३२।६१ | स्वप्नेऽपि क्षितिपाव १३३।३९ |
| स्नेहनिर्भरमधत्त (शिशु १० ४९) ३१६।९ | स्मर्तव्या वय (शा प ३३९२) ३५५।८५ | स्वप्नेऽपि देवि रमसे २९१।१० |
| स्नेहसंवर्धिताम्बाला २५८।३० | स्मर्तव्योऽह त्वया (सु १०४४) २९१।२ | स्वप्नेऽपि समरेषु (अल कोस्तु ) १०२।३७ |
| स्नेहेन भूतिदानेन (शा.प ३७१) ५४।२० | स्मार धनुर्यद्विधुनो २५९।६९ | स्वप्रज्ञया कुञ्जिकयेव (सु १९३) ३३।३६ |
| स्नेहोपपन्न इति पूर्णे ६९।१० | स्मारस्मेरमदोन्नम ३७०।८२ | स्वफलनिचय (सु २८३) १७७।९९६ |
| स्नेहो हि वरम (भोज प्र १३७) १७१।७८९ | स्मितं किंचिद्वके (भर्तृ स ९३) २५५।२९ | स्वबालभारस्य तदुत्तमा २५३।६ |
| स्पर्धन्ता सुखमेव २३२।९४ | स्मितज्योत्स्नाग्ना २६३।२०१ | स्वभावं न जहात्ये (वृ श ४०) ४६।५९ |
| स्पर्श स्तनतटस्पर्शो २७७।३६ | स्मितज्योत्स्नाभि (द रू ४ २४) ३१३।६३ | स्वभावं नैव मुञ्चन्ति (वृ श २९) ४६।५७ |
| स्पृष्टास्ते तिग्मरुचौ (हरवि ३) ३३६।३८ | स्मितपुष्पोद्गमोऽय (नागा २ १२) ३१२।३ | स्वभावकठिनस्यास्य (कविता ११) ५४।१६ |
| स्पृशन्नपि गजो (सु २७५०) १५३।२२ | स्मितेन भावेन च (भर्तृ स ७९) २५५।३७ | स्वभावरूर मङ्गजमवि (हि ३ ८७)१४३।६१ |
| स्पृष्टरतवैद्य (रत्ना १.२१) २६४।२३२ | स्मितेनोपायनं (मा द १० ३५) २१५।१ | स्वभावसुन्दर वस्तु (वृ.श.४९) १६८।६९२ |
| स्पृष्टाकृष्टासि पिष्ठे ११७।९४ | स्मेर निवाय (सा द.१०.२४) २७८।२२ | स्वभावारक्तश्रीनखर १२३।८ |
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स्थाननिर्देशानुक्रमकोशः
<div align="right">८३</div>| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| स्वभावेन हि (वृ चा १३ ३) १५५।२७८ | स्वादनेन सुतनो (शिशु १० ७) ३१४।१० | हंसा पद्मवना (शा प १०३८) २४५।१५३ |
| स्वभावेनैव निशित (सु ३८६) ५६।११३ | स्वादित स्वयम (किरात ९ ५५) ३१५।४७ | हंसी वेत्ति परागपिञ्जर २२२।३४ |
| स्वमस्तक समारूढं ३७५।२३४ | स्वाधीना दयिता १७९।१०४० | हंसे शैवलमञ्जरीति ३५४।५९ |
| स्वय कर्म करो (वृ चा ६ ९) १५५।२८३ | स्वाधीनेऽपि (भर्तृ स ८१६) १७०।७५१ | हंसैलैब्धप्रशं (शा प ११२६) २२०।१९ |
| स्वय जहाति सेवक ९७।१३ | स्वाधीनैन समृद्धिज॑नो ४८।१३३ | हंसोऽध्वग श्रममपो ८८।१३ |
| स्वयं तथा न कर्तव्यं स्व ८३।३ | स्वाधीनो रसनाञ्चल. ३८।२८ | हसो न भाति बलिभो १७६।९६४ |
| स्वयं पद्ममुख ३६४।१६ | स्वान्ते वैभबमस्ति ११२।२७५ | हंसो यथा राज (शा प ३६२५) २९९।१२ |
| स्वयं प्रणमते (शिशु २ ५०) ७८।५ | स्वाभाविकं तु (हि १ २०९) ८८।१२ | हंसो विभाति नलिनी १७६।९६३ |
| स्वयंभू शभुर २६४।२५० | स्वाभिप्रायपरोक्षस्य (प्रसगाभ १६) ९७।९ | हंहो दग्धसमीर (शा.प.७९५) २१४।११ |
| स्वयं महेश श्वशुरो ९२।५२ | स्वामिन्प्रभो (सु २०९६) ३१९।२६ | हंहो धीर समीर (सा द.१०.५) २१४।१२ |
| स्वय सरा (किरात १० ६३) १८२।४४ | स्वामिन्मङ्गुरयाल(शृ ति १ ४२) ३२२।३१ | हंहो मीनतनो हरे किमु १७७।११ |
| स्वय स्वमुखविस्तारा ८१।१४ | स्वामिनि गुणा (पञ्च १ २२०) ३८५।३२४ | हंहो वारिनिधे विधे २१७।३८ |
| स्वयमपि भूरिच्छिद्र ५८।१६१ | स्वामी कुप्यति कुप्यता २८७।८ | हठादाकृष्टाना (भोज.प्र २४८) ३८।२४ |
| स्वयमप्राप्त (सु ११०९) २८२।१२३ | स्वामी नि श्वसि (शा प ३६९१) ३५३।४६ | हतं ज्ञानं क्रिया (वृ चा ८ ८) १६६।५७० |
| स्वरसेन बन्नता ५७।१५५ | स्वामी मुग्धतरो (सा द ३ २६६) २३।१५१ | हतमश्रोत्रियं (चाणक्य १००) १६२।४२५ |
| स्वरेण तस्या (कुमार १ ४५) २६३।२१९ | स्वामी सन्भुवनत्रयस्य (सु ५६) २०।६५ | हतेऽभिमन्यौ (शा.प ३९८२) ३६०।५ |
| स्वर्गच्युताना (वृ चा ७ १६) १७३।८५८ | स्वामोदवासित (सु ७३८) २४४।२३० | हत्वा पति नृप (भर्तृ.स ८१८) ३६२।२४ |
| स्वर्गाद्रोपाल कुत्र(भोज प.८५) ११७।९७ | स्वाम्यमाल्यश्च (शा प १४०७) १५०।३१७ | हत्वा लोचनविशिखै २६०।१०२ |
| स्वर्गानर्गलनिर्गल ३८।२९ | स्वाम्यादिष्टस्तु (पञ्च १ १२१) १४४।९६ | हनूमति हुतारा मे १८७।१३ |
| स्वर्गे वास (शिशु १८ ६२) १३०।९२ | स्वाम्यादेशात्तु (पञ्च १ २०) १४४।९७ | हन्त कान्तमपि त २८७।२ |
| स्वर्गे कल्पद्रुमाद्य १३८।८७ | स्वाम्युक्ते यो न (भो जय २७) १४४।९९ | हन्तालि सतापनिवृत्तये २८४।११ |
| स्वर्गौकोभिरदोनवासि २८।१ | स्वाम्ये पेशलता गुणे (सु २६६) ५३।२७४ | हन्तुं मेषो (शा प.१४०२) १६६।५७७ |
| स्वर्णच्छवीनाम २६१।१३५ | स्वायत्तमेकान्तगुणं (भर्तृ स ६८) ८६।३ | हन्तुर्बन्धुजनानन्धनार्थम ६३।३९ |
| स्वर्णविदातद्युति २६७।३५४ | स्वार्थ धनानि (भामिनी प्रा ९६) ७३।३२ | हरः क्षयी तापकर १९६।१० |
| स्वर्णै स्कन्धपरि (शा प ९८८) २३७।३४ | स्वार्थनिरपेक्ष एव हि (सु ४१९) ५८।१९० | हरकण्ठग्रहानन्द (शा प.६८) ११।१ |
| स्वर्गेणाजिनशयनेो २०।७७ | खिन्नं केन मुख दिवा २९३।११ | हरक्रोधज्वालावलिभि २६८।३६४ |
| स्वर्भानु सुरवर्त्मनानु ५।५८ | खिन्नं मण्डलम्रै (भोज प्र २५२) ३१९।४२ | हरनयनहुताशज्वालया २०६।२ |
| स्वर्भानुप्रतिवारपार २८।३ | खिन्नौ गण्डौ स्फुरित २७६।४१ | हरन्ति हृदयानि (विद्ध शा ४ ४) ३३६।२४ |
| स्वर्भानुराकलपितुं २५७।२२ | स्वीया सन्ति गृहे गृहे ३५६।६ | हरसुकुटे सुरतटिनी (शा प.७५१) २०९।७ |
| स्वर्लोकस्य (भामिनी प्रा ५५) २४८।८१ | स्वीयोद्यानप्रगन्धप्रकुपित १२३।४ | हरवञ्च विष (का.प्र.१० ४६८) १०३।८० |
| स्वर्वामामृतपान ३०२।१०८ | स्वेच्छाभङ्गुर भाग्यमेघ (सु १६६) ३४।५६ | हरशिरसि शिरासि यानि ९२।६३ |
| स्वल्पं ब्रूम किमपि १३२।२४ | स्वेदक्रेदितकङ्कणा २०८।३८ | हरिणचरण (शांति.श २.१६) १४०।२ |
| स्वल्पम्नायुवसाव (भर्तृ स ३५०) ७९।२२ | स्वेदस्ते कथमीदृश (शा प १०४) १२।३५ | हरिणप्रेक्षणा यत्र (रसग.प्र १) २५१।८ |
| स्वल्पा इति राम १६९।७३७ | स्वेदस्यन्दितसान्द्रचन्दन १२।३४ | हरिणापि हरेणापि (विक्रमचं.२३०) ९१।१५ |
| स्वल्पापि साधु सप (सु २३५) ४८।१३७ | स्वेदाम्भ कण (द रू २.१७) १२०।१४५ | हरिद्राया राहुप्रसर १९१।८१ |
| स्ववश करोति (शा प ४३९) १७१।८०५ | स्वेदाईवामकुचमण्डन १११।६४ | हरिभामिनि सिन्धुसभवे ६२।२० |
| स्वसुखनिर (अ शाकु ५ ७) १०६।१६६ | स्वे स्वे कर्मणि सनि ३३७।५० | हरिरलसवि (शा प ९०४) २३०।२५ |
| स्वस्तिक्षत्रियदे (शा प ५०१) १८१।१७ | स्वैरं कैरवकोर (प्र रात्रव ७ ६१) ३०१।९३ | हरिवैदति का तवास्त्यरिषु २०३।१०४ |
| स्वस्ति स्वागतमर्थ्यह(सु ८६) २०।६४ | स्वैर सस्मितमीक्षते २७४।२९ | हरिष्यमाणो बहुधा ३७३।१६८ |
| स्वस्त्यस्तु विद्रुमवना (सु ८९०) २१६।१६ | ह | हरे. पदाहति श्लाघ्या ४५।२२ |
| स्वस्थानादपि विचलति ४८।१२८ | हंस श्वेतो बक श्वेत. २२।१६ | हरेर्लीलावराइस्य (भर्तृ.सं.८२०) १८।२५ |
| स्वस्वव्यावृति (भामिनी प्रा ५६) २२८।२०२ | हंस प्रयच्छ (विक्रमोर्व ४ ३३) २८३।१६२ | हर्तुनं गोचरं याति दत्ता २९।४ |
| स्वातन्त्र्यं पितृम (हि १ ११४) ३५०।७५ | हंसः प्रयाति (शा प.११८२) २२१।२२ | हर्तुर्याति न गोचरं. (भर्तृ सं.१५) ३९।२८ |
| स्वात्मन्येव लयं याति (सु.२१७) ४६।७४ | हंसश्चन्द्र इवाभाति ३४४।९ | हर्म्यस्थानमधर्मकर्मनित ९९।२७ |
पृष्ठ 515स्थायी लिंक
८४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| हर्षक्रोधौ समौ (हि ३.१३२) १४८।२४३ | हा हा देवि (उत्तर राम ३ १९) २७९।६३ | हेतुप्रमाण (शा प ३३५) ६५।८ |
| हर्ष वर्षान्विधत्से चिर २१४।८४ | हिसकान्यपि (पञ्च ३ १ ६) ३७८।४९ | हेतुर्नैसर्गिक १६८।६६७ |
| हर्षादम्भोजनन्मप्रभृति ८।१०६ | हिंसाशून्यमय (भर्तृ स ३५२) ९७।१३ | हेतो कुतोऽप्य (सु २७९) ५१।२१५ |
| हसति लसति हर्षा (सु ३२३२) ६०।२४८ | हितोपदेशं (शा प १५२३) १५४।७६ | हे दारिद्र्य (शा प ४०२) ६५।२ |
| हसन्तीं प्रह (मा १३.२२३८) ३४८।११ | हित्वा त्वामुपरो (कुट्टनी म) ११२।२६९ | हे दावानल (शा प ११५६) २२०।१ |
| हसन्तीं वा हसन्ती वा ३४५।५ | हित्वा दैत्यरिपोरुर. ११०।२३७ | हे पक्षिन्ना (शा प ८०८) ६२।२८२ |
| हस्तं कम्पवती रुणद्धि ३१८।१६ | हित्वा मदं ६०।२३६ | हे पाथोड (भोज प्र २१४) २१४।७६ |
| हस्त इव भूतिम (वासवदत्ता ७) ५७।१५३ | हिमऋतावपि (शिशु ६ ६१) ३४६।२२ | हे पान्थ (शा प ३९३१) ३४७।५० |
| हस्तन्यस्तकुशो (सु १४०५) १०७।१८२ | हिमकर परभागं २१०।३१ | हेमकुम्भमिव ३१८।९ |
| हस्तपङ्कजनिविष्टयो २।१५ | हिमधवल (शा प ३९१९) ३४५।८ | हेमन्तहिम ३४५।१ |
| हस्तस्य भूषणं १५९।२९१ | हिमलवसद्दश (शिशु ७ ७३) ३३४।१२४ | हेमन्ते दधि (भर्तृ स १४४) ३४६।३१ |
| हस्तस्वेदस्रपित इव ३१३।६१ | हिमव्यपाया (कुमार ३ ३३) ३३१।३० | हेमन्ते ३४७।४८ |
| हस्तादपि (शा प ४८५) १५५।१९९ | हिमशिशिर १०६।१४९ | हेमन्ते बहु ३४५।३ |
| हस्ताम्भोजालिमाला ११३।१ | हिमसमयो २३६।९ | हेमन्ते हिमकर ३४७।४९ |
| हस्ताम्भोजे २८९।५२ | हिमाशुखण्ड २०२।७८ | हेममञ्जीर (शा प ३३५९) २६९।४०० |
| हस्ती चाङ्कुश (वृ चा ७८) १६७।६३८ | हिमाशुखण्डा (प्र राघव ६.४३) २९२।२१ | हे मल्लि हे २४८।९० |
| हस्ती वन्य (शा प १२५०) १२२।१८० | हिमानीस्थगिरौ १९९।१७ | हे मातङ्ग २३०।४४ |
| हस्ती स्थूल (वृ चा ११ ३) ७९।२० | हिरण्य (का नी १३ २६) १४५।१२९ | हेमाम्भोरुहप (भर्तृ स ८२३) ३३४।१३३ |
| हस्ती हस्तस (चाणक्य.२८) १६१।३४७ | हीनसेवा न (हि ३ ११) १६४।४९७ | हेम्न कार्यं ३६९।६८ |
| हस्ते चकास्ति २६४।२४० | हीनहृदया दधात्येव १८१।४ | हेयं हर्म्यमिदं ३७१।१०९ |
| हस्तेनाग्रे वीत (शिशु १८ ४८) १३०।८३ | हीयते हि (हि प्र ४३) ८६।९ | हेयोपादेय ८।११५ |
| हस्ते शस्त्रकिणाङ्कितो २०।६३ | हुंकारैर्ददता (नागा ३ ५) ३१४।७६ | हे रङ्ग हेमतुलया २४६।३४ |
| हा तात (शा प ३९७०) ३६०।१८ | हुतमिष्टं च १०२।३४ | हे राजानस्त्यज (सु १६७) ३३।५० |
| हा धिक् सा (विक्रमोर्व.१) २८१।११४ | हुतहुताशनदीप्ति (रघु ९ ४०) ३३२।५० | हे लक्ष्मि क्षणिके ६३।२७ |
| हा मातस्त्वरि (नारायणभट्ट) ३६२।३७ | हूनीसीमन्त (शा प ३९३०) ३४७।४५ | हेलाप्रस्थान ११३।२९१ |
| हारं वक्षसि (भामिनी प्रा ९४) २३५।१५० | हृतोऽङ्गराग (शा प ३८४९) ३३८।७० | हेलाविदलित २३०।१९ |
| हार कुरङ्गशा २६६।३०१ | हत्वा पञ्चवन २८१।१०७ | हेला स्यात्कार्य १६२।४१८ |
| हार प्रलम्बित १७६।६६७ | हृदयं कौस्तुभ (शा प.११९) २२।१०३ | हे हर्यक्ष २३१।५३ |
| हार गुम्फति ३५९।९५ | हृदयं हरन्ति ३४९।५९ | हे हेमकार २४६।२३ |
| हारयिष्यति ३१९।४४ | हृदयतृणकुटीरे २५०।१७ | हे हेमकेतकि २३९।९५ |
| हारस्यातिदुराप २४६।३२ | हृदयमाश्रयसे (नैषध ४ ७५) २८५।४३ | हे हेमन्त (शा प ३९२३) ३४५।४ |
| हारहीरकरिरम्य ३५५।७ | हृदयमिषुभि (विक्रमोर्व २ १०) २७९।७१ | हे हे मित्र जिता ४३।३० |
| हारानाहर देव (शा प १२३६) १०८।१९८ | हृदयानि सता (शा प २३४) ४६।४१ | हे हेरम्ब १२।३० |
| हारावशेषा ननु २८८।३९ | हृदये कुरु २४६।२१ | हे हेला (वाक्यप पुञ्ज २ २४९) २१७।३५ |
| हारीता (शा प.८७१) २२७।१७६ | हृदि बिस (साहित्य कौ ११ ५) २८२।१३७ | हेषन्ते यज्जित १०७।१७७ |
| हारो जलार्द्रव (अमरु.९८) २५०।१५ | हृदि लमेन (शा.प १८४६) ३५।२५ | ह्रेषाघोषैर्हरीणा १२७।२३ |
| हारो नारोपित (हनु.ना.५ २४) २८३।१ | हृदि लज्जोदरे ७३।१९ | ह्रदाम्भसि (किरात ८ ४३) ३३८।८६ |
| हारो भाति कुच १८२।४९ | हृदि विद्ध (काम नी ३ २४) ३९१।५७३ | ह्रीतया गतनिवि ३१६।१ |
| हारोऽयं (साहित्य कौ ११ ८) २६६।३०४ | हृष्यति देवता (चाणक्य ५१) ३८६।३५३ | ह्रीभरादवनत (शिशु.१०.५२) ३१७।१४ |
| हालाहलं खलु (भामिनी प्रा.९०) ६०।२३३ | हे कीर २२७।१८८ | ह्रीविमोह (शिशु १० ५२) ३१५।२५ |
| हालाहलो (कुव २७) ६३।२६ | हे कूप त्वं २२०।९ | ह्रेपयति (सु ४३४) ५८।१९४ |
| हावहारि (शिशु १० १३) ३१५।१६ | हे कोकिला (भर्तृ स ८ २२) २२५।१३७ | ह्लादनताप २५५।३० |
| हासस्तूतकणिका ३५०।८१ | हे गङ्गाधरपत्ति १२।४३ | |
| हा हन्त मानस २२१।२० | हेतु कोऽपि ४३।८ |
समाप्तोऽयं सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानुक्रमकोशः
पृष्ठ 516स्थायी लिंक
शुद्धिपत्रम्
| अशुद्धम् | शुद्धम् | पृ. | श्लो. |
|---|---|---|---|
| यन्नन्त्र | यन्नमन्त्र | ३७७ | १५ |
| मूल | मूल | ,, | २५ |
| यलन | यत्नेन | ,, | २६ |
| पूजयि वा | पूजयित्वा | ,, | ३० |
| प्रतिष्ठे । | प्रतिष्ठेता | ,, | ३१ |
| क्लैव्य | क्लैव्यं | ३७८ | ६७ |
| दारुभ्य | दारुभ्यो | ३८० | १११ |
| जयेत्क्रुद्दो | जयेत्क्रुद्धो | ,, | १२० |
| श्मश्रुद्रोध | श्मश्रूद्बोध | ,, | १३० |
| मयं गच्छल्यसुत्र | मर्य सह गच्छत्य | ३८२ | १९४ |
| अभिमान | अभिमान् | ,, | २२३ |
| हन्या पूर्वा | हन्यात्पूर्वां | ,, | २३० |
| मूर्ख विचारणैषा | मूर्खविचारणैषा | ३८३ | २७० |
| वपुमृग | वपुर्मृग | ३८४ | २७६ |
| सजयाते | सजायते | ,, | २८१ |
| जलाकाना | जलौकाना | ,, | २८४ |
| ऐण | ऐणे | ,, | २९० |
| खभवो | स्वभावो | ,, | २९६ |
| जीन्मिवेतैन | जीवेन्मितेन | ,, | २९८ |
| मेत्री | मैत्री | ,, | ३०० |
| निकामकमा | निकामकाम | ,, | ३०६ |
| क्रुद्धत्य | क्रुद्धस्य | ३८६ | ३४५ |
| स्तत्त्व | सत्त्वं | ३८७ | ४०५ |
| भक्त | भक्ते | ३८८ | ४५० |
| समार्जनी रज | समार्जनीरजो | ३८९ | ४८५ |
| भा नाश्नति | भार्याजितस्य नाश्नन्ति | ,, | ४८६ |
| यत्त | यत्तु | ३९० | ५१४ |
| मुनिहित | सुनिहित | ३९१ | ५६७ |
| त्प्रमाणक स्तस्य | त्प्रमाण कस्तस्य | ,, | ५७० |
| भोजने | भोजने जने | ,, | ५७५ |
| कर्तव्योऽध्यैन | कर्तव्योऽध्ययने | ,, | ,, |
| बह्लैका | ब्रह्मैका | ३९१ | ५८४ |
| श्लाध्य | श्लाघ्य | ,, | ६१२ |
| भायया भता | भार्यया भर्ता | ,, | ६१९ |
| कायास्तते | कायास्तटे | ३९३ | ६४२ |
| जलाद्युतिमतो | जलाद्ध्रुतिमतो | ,, | ६४२ |
| दोग्धव्यं | द्रोग्धव्यं | ३९४ | ६९२ |
| धार्मात्मन | धर्मात्मानः | ,, | ६९४ |