सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
ॐ
सुश्रुतसंहिता
अनुवादक
अत्रिदेव
भूमिका लेखक
डाक्टर श्रीभास्कर गोविन्दजी घाणेकर
बी. एस. सी., एम. बी. बी. एस., आयुर्वेदाचार्य
विशेष मन्तव्य
पं० श्री लालचन्द्र जी वैद्य
भूतपूर्व प्रधानाचार्य-अर्जुन आयुर्वेद विद्यालय, काशी
प्रकाशक
मोतीलाल बनारसीदास
वाराणसी दिल्ली पटना
तृतीय संस्करण ]
सन् १९६०
[ मूल्य १५ )
प्रकाशक : सुन्दरलाल जैन मैनेजिंग प्रोप्राइटर, मोतीलाल बनारसीदास, पो० नं० ७५, नेपाली खपरा, वाराणसी ।
मुद्रक : मन्नीलाल रस्तोगी प्रेस, मध्यमेश्वर, वाराणसी ।
( सर्वाधिकार सुरक्षित हैं )
सर्व प्रकार की पुस्तकें निम्नलिखित स्थानों से मिलती हैं—
मोतीलाल बनारसीदास हिन्दी-संस्कृत-पुस्तक विक्रेता बंग्लोरोड जवाहर नगर दिल्ली-६
मोतीलाल बनारसीदास बाँकीपुर, पटना ।
मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशक तथा पुस्तक-विक्रेता पो० नं० ७५, नेपाली खपरा, वाराणसी
चिकित्सा शास्त्र अगाध है
“नास्ति आयुर्वेदस्य पारम्”
समुद्र इव गम्भीरं
नैव शक्यं चिकित्सितम् ।
वक्तुं निरवशेषेण
श्लोकानामयुतैरपि ॥
चिकित्सा शास्त्र समुद्र की तरह अगाध है। लाखों श्लोकों से भी उसको कहा नहीं जा सकता ।
स्मृति में
माननीय श्रीयादवजी विक्रमजी आचार्यजी की
आयुर्वेद के विषय में आप से बराबर प्रेरणायें मिलीं, आपके ही अनुग्रह का यह फल है कि अनुवाद का कार्य कर सका, आपकी कृपा दृष्टि आगे भी इसी प्रकार बनी रहे—यही भगवान् से प्रार्थना है।
श्रुतिदेव
भूमिका
प्राचीन काल में आयुर्वेद बहुत ही उन्नत और विस्तारशील था। उस समय उसके कायचिकित्सादि अष्टांग स्वतन्त्र हो चुके थे, प्रत्येक अंग पर स्वतन्त्र संहिताएँ रची गयी थीं, प्रत्येक अंग की स्वतन्त्र परम्परा स्थापित हो चुकी थी और उसके विशेषज्ञ प्रतिष्ठा के साथ अपना स्वतन्त्र व्यवसाय किया करते थे। आगे चलकर कालचक्र में ये सब परम्पराएँ बहुत कुछ खण्डित या लुप्त हो गयी थीं। शताब्दियों के पश्चात् ऋषितुल्य कुछ धुरंधर विद्वानों ने अविश्रान्त परिश्रम, तत्त्वान्वेषण और परम्पराप्राप्त ज्ञान के आधार पर आयुर्वेद की मुख्य २ शाखाओं की संहिताओं का प्रतिसंस्करण करके वैद्यों के उपयोग के लिए उनको प्रचलित किया। आज हमारे सामने आयुर्वेद की जो संहिताएँ उपलब्ध हैं उनमें कुछ प्रतिसंस्कृत हैं, कुछ खण्डित हैं और कुछ संगृहीत हैं। प्रतिसंस्कृत संहिताओं में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता, खण्डित संहिताओं में मेड संहिता और काश्यप संहिता तथा संगृहीत संहिताओं में अष्टांग हृदय और अष्टांग संग्रह प्रसिद्ध हैं।
उत्तर काल में उपलब्ध होनेवाली सब संहिताओं में चरक और सुश्रुत की संहिताएँ प्राचीन काल से वैद्यकीय दृष्ट्या सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं और वैद्यों का वैद्यत्व इतर संहिताओं की अपेक्षा इन संहिताओं के अनुसार पठन-पाठन-कर्मभ्यास करने के ऊपर अधिष्ठित रहा है। इस कथन की पुष्टि निम्नलिखित वाग्भट और हर्ष के वचनों से हो जाती है—
ऋषिप्रणीते प्रीतिश्चैन्मुखत्वा चरकसुश्रुतौ ।
मेडाद्याः किं न पठ्यन्ते तस्माद् प्राह्य सुभाषितम् ॥ अष्टांगहृदय ॥
कन्यान्तः पुरबाधनाय यदधीकाराच्च दोषा नृपं
द्वौ सन्निप्रवरश्च तुल्यमगदङ्कारश्च तावृचतुः ।
देवाकर्ण्य सुश्रुतेन चरकस्योक्तेन जानेऽखिलं
स्यादस्यानलदं बिता न दलने तापस्य कोऽपि क्षमः ॥ नषधचरित ।
चरक की मूल संहिता अग्निवेश प्रणीत कायचिकित्सा की और सुश्रुत की मूल संहिता भगवान् धन्वन्तरि प्रणीत शल्यतन्त्र की थी। परन्तु शताब्दियों से उपलब्ध इन प्रतिसंस्कृत संहिताओं में आयुर्वेद के आठों अंगों का न्यूनाधिक अंश में समावेश किया हुआ दिखाई देता है। फिर भी सूक्ष्म अभ्यास करने पर इन संहिताओं के मूल संहिताकारों के 'बुद्धैर्विशेषः' का तथा मूल संहिताओं के 'विषय विशेष' का अच्छा परिचय मिल जाता है।
यद्यपि ये दोनों संहिताएँ आयुर्वेद का अभ्यास करने की दृष्टि से शताब्दियों से अधिमान्य हो चुकी हैं तथापि दोनों का तुलनात्मक परिशीलन करने पर मेरा यह मत हो गया है कि चिकित्सा के सिद्धान्तों की दृष्टि से चरक और 'प्रक्रिया' अर्थात् व्यवहार की दृष्टि से सुश्रुत श्रेष्ठ है। चरक में स्वास्थ्यरक्षा, व्याधिपरिमोक्ष, वैद्यकीय सद्बुद्धि इनका प्रतिपादन बहुत ही युक्तियुक्त, रोचक और विशद पद्धति से किया गया है और उसमें उन विषयों के सम्बन्ध में ऐसे दिनकालाबाधित सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं कि जो मृत, वर्तमान तथा भविष्य कालीन संसार की सब चिकित्सा पद्धतियों (व्याधियों) के लिये सदैव मार्ग दर्शन कर सकते हैं। 'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्' यह हृदयल का चरक सम्बन्धी वचन अन्य बातों के लिए भले ही सही न हो, परन्तु चिकित्सा सिद्धान्तों की दृष्टि से सोलहों आने सत्य है ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास हो गया है। सुश्रुत में सैद्धान्तिक विषयों के अतिरिक्त आयुर्वेद के आठों अंगों का विवरण शल्य कर्म को प्राधान्य देकर नातिसंक्षेप-विस्तार से सरल भाषा से व्यावहारिक बातों पर ध्यान देकर बहुत ही अच्छी तरह किया गया है। मेरे इस मत की कुछ झलक वाग्भट के निम्न वचन में मिल जाती है—
यदि चरकभधीते तद् ध्रुवं सुश्रुतादि-
प्रणिगदितगदानी नाममात्रेऽपि बाह्यः ।
अथ चरमविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः
किमिह खलु करोतु व्याधिज्ञातां नराकः ॥ अष्टांगहृदय ॥
( २ )
इसलिए मैं यह उचित समझता हूँ कि इन दोनों संहिताओं का विशेष करके उनके सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक उपयुक्त अंशों का अध्ययन केवल आयुर्वेद के विद्यालयों तक ही सीमित न रख करके इतर चिकित्सा पद्धतियों के विद्यालयों में भी जारी करना चाहिये। इससे वहाँ के विद्यार्थियों और डाक्टरों को अपना शास्त्र पढ़ने और पढ़ाने में अधिक सहायता मिलेगी तथा केवल अपना ही शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने के कारण जो अवैज्ञानिक, अनुदार तथा अव्यापक दृष्टि उत्पन्न होती है वह दूर होकर वे जनता के सच्चे सेवक बनेंगे।
आयुर्वेद की ये संहिताएँ तथा उनकी टीकाएँ संस्कृत में होने के कारण संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान इनके अध्ययनार्थ आवश्यक होता है। परन्तु आजकल आयुर्वेद महाविद्यालयों में भी जहाँ पर प्रवेश के लिए संस्कृत-प्रावीण्य की अत्यन्त आवश्यकता होती है, संस्कृत की अपेक्षा अंग्रेजी को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि अच्छे संस्कृतज्ञ विद्यार्थियों की संख्या घटने लगी। इतर वैद्यक महाविद्यालयों में भरती के लिये संस्कृत की आवश्यकता ही न होने के कारण वहाँ पर संस्कृतज्ञ विद्यार्थी नगण्य होते हैं। ऐसी अवस्था में आयुर्वेद की प्रतिष्ठा बढ़ाने की दृष्टि से तथा उसके दिक्कलावाधित सुन्दर सिद्धान्तों के द्वारा सब पद्धतियों के चिकित्सकों को चारित्र्य और शील की शिक्षा प्रदान करने की दृष्टि से इन संहिताओं के प्रचलित भाषाओं में अच्छे अच्छे अनुवाद करके प्रकाशित करना प्रत्येक आयुर्वेद प्रेमी का एक परम कर्तव्य हो जाता है।
प्राचीन संहिताओं के अनुवाद अनेक पद्धतियों से किये जाते हैं। प्रथम पद्धति में मूल-संहिता न देकर केवल उसका अनुवाद सरल भाषा में दिया जाता है। इस पद्धति के अनुवाद शास्त्राध्ययन करनेवालों की दृष्टि से अच्छे नहीं हो सकते हैं, परन्तु संहिताओं का भावार्थ मालूम करने की दृष्टि से पर्याप्त होने के कारण सामान्य जनता को शास्त्र का परिचय कराने के लिए उपयोगी होते हैं। दूसरी पद्धति में ऊपर मूलसंहिता देकर उसके नीचे उसका सरल भाषानुवाद दिया जाता है। इस पद्धति के अनुवाद सामान्य जनता के लिए जितने उपयोगी होते हैं उतने ही शास्त्रज्ञासु के लिए भी उपकारक होते हैं, क्योंकि इसमें पाठक के सामने मूलसंहिता भी रहती है और वह अनुवाद के अर्थ की यथार्थता स्वयं देख सकता है। तीसरी पद्धति में मूल और उसके अनुवाद के अतिरिक्त मूल की टीकोपटीकाएँ तथा उनके भी सरल अनुवाद दिये हुए रहते हैं। सामान्य जनता के लिए ये अनुवाद विशेष उपयोगी नहीं होते, परन्तु शास्त्राध्ययन की दृष्टि से दूसरी पद्धति के अनुवादों को अपेक्षा अधिक उपयोगी होते हैं। इसका कारण यह है कि टीकोपटीकाओं में मूल के अतिरिक्त शास्त्र की काफों चर्चा रहती है, जिससे शास्त्र का आकलन होने में सहायता होती है। चतुर्थ पद्धति में मूल संहिता और उसके सरल अनुवाद के पश्चात् अनुवादक स्वयं अपना वक्तव्य प्रकट करता है। इसमें कठिन तथा गूढ़ शब्दों और भावों पर उचित प्रकाश डाला जाता है, मतमतान्तरों का उल्लेख किया जाता है, जहाँ दोनों का समन्वय हो सकता है वहाँ समन्वय करने की चेष्टा की जाती है, जहाँ पर वास्तविक विरोध होता है वहाँ पर पक्षपातविरहित होकर विरोध प्रदर्शित किया जाता है, प्राचीन वृट्टियों की पूर्ति आधुनिक ज्ञान विज्ञान से की जाती है और इसके लिए श्रुति-स्मृति-पुराण उपनिषद्-इतिहास इत्यादि प्राचीन शास्त्र उनकी टीकाएँ, आधुनिक पाश्चात्य तथा पौर्वात्य विद्वानों के लेख, ग्रन्थ, संशोध-नात्मक टिप्पणी इत्यादि का उचित परामर्श लिया जाता है। संक्षेप में मूल का उचित अर्थ करने के लिए प्राचीन तथा अर्वाचीन सब साधन सामग्री रखकर दोनों का सुन्दर सम्मेलन करने का प्रयत्न किया जाता है। अनुवाद को यह पद्धति सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इससे मूल का आकलन इतर पद्धतियों को अपेक्षा आसानो से होता है और इसके अतिरिक्त जहाँ मतभेद का अवसर होता है वहाँ पर सामने रखी हुई सब साधन सामग्री के आधार पर पाठक स्वयं अपना मत बना सकता है।
सुश्रुतसंहिता के आज तक अनेक अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें निर्देश करने योग्य प्रथम पद्धति का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में है। दूसरी पद्धति के अनेक अनुवाद हिन्दी तथा इतर सब भारतीय भाषाओं में हुए हैं। तीसरी पद्धति का एक भी अनुवाद नहीं हुआ है। इस प्रकार का सुश्रुत का एकाध अनुवाद होना जरूरी है। चौथी पद्धति के अनुवाद अधिक उपयोगी होने के कारण उस प्रकार के जितने भी अनुवाद प्रकाशित हो सकते हैं उतने होने चाहिए। मैंने इस पद्धति का 'आयुर्वेदरहस्यदीपिका' नामक सुश्रुत का अनुवाद करने का बृहत्पयास किया था और उसके परिणाम स्वरूप सूत्र-निदान-शारीर के दो विभाग प्रकाशित हो चुके थे। परन्तु अभ्यास में उसको पूरा न कर सका और मेरा वह प्रयास अपूर्ण ही रह गया।
( ३ )
अत्रिदेवजी आयुर्वेद संहिता के प्रसिद्ध अनुवादक हैं। आपने आयुर्वेद की सब संहिताओं का हिन्दी में अनुवाद किया है। सुश्रुत का यह अनुवाद दूसरी पद्धति का है। इसमें प्रथम ऊपर मूल देकर उसके बाद उसका सरल भाषा में अनुवाद दिया है। कहीं कहीं उसका विस्तार भी किया है। इसके अतिरिक्त पादटिप्पणी में मूल-संहिता के अनेक कठिन शब्दों और कल्पनाओं का विवरण इतर संहिता ग्रन्थों के उद्धरणों से किया गया है। इससे ग्रन्थ की उपयोगिता बहुत बढ़ गयी है। इस समय सम्पूर्ण सुश्रुत का एक भी अच्छा अनुवाद उपलब्ध नहीं था, जिससे विद्यार्थियों को सुश्रुत के अध्ययन में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता था। इस अनुवाद से विद्यार्थियों का बहुत उपकार हो गया है। आशा है कि आयुर्वेद के छात्र तथा आयुर्वेदानुरागी इतर चिकित्सा पद्धतियों के छात्र तथा चिकित्सक अत्रिदेवजी के इस परिश्रम का हृदय से स्वागत करेंगे।
महाशिवरात्रि संवत् २००६ काशी हिन्दू-विश्वविद्यालय }
भास्कर गोविन्द घाणेकर
अनुवाद के विषय में
“भिषगः बुभ्रुषः शास्त्रमेवादितः परीक्षेत ।
विविधानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके ॥” चरक
सबसे प्रथम शास्त्र की परीक्षा करे, वैद्यों के बहुत से शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। सुश्रुत के भी बहुत से अनुवाद बाजार में प्रचलित हैं। इनमें कुछ पूर्ण हैं, और कुछ अपूर्ण हैं। कोई अनुवाद इतने अधिक विस्तृत हैं कि साधारण बुद्धि का मनुष्य उनको पढ़ भी नहीं सकता, (इसी से चरक में कहा—त्रिविधशिष्यबुद्धिहितम्)। विद्यार्थी जीवन में कुछ तो बाल्यन तथा कुछ दूसरे विषयों के बोझ से कुछ थोड़े से विद्यार्थी ही इन विस्तृत व्याख्याओं का उपयोग करते हैं। इन व्याख्याओं का मुख्य आधार पाश्चात्यज्ञान रहता है। आयुर्वेद को स्पष्ट करने के लिये इनका सहारा प्रायः लिया जाता है, जो कि इनको बहुत विस्तृत कर देता है। यही विस्तार साधारण विद्यार्थी जीवन में रुचिकर नहीं होता। इसलिये इस अनुवाद में मैंने इन दोनों बातों से यथासम्भव बचने का प्रयत्न किया है। मैंने अनुवाद की विद्यार्थी की दृष्टि से न तो विस्तृत और न संक्षिप्त किया है। विषय को स्पष्ट करने या पृष्ठ करने के लिये आयुर्वेद के ही उद्धरण लिये हैं। जिस देश में आप हैं, उस देश के ज्ञान को उसी देश की आंखों से देखने से सत्य ज्ञान मिलता है। भारत का रसोई घर, उसके साधन इस देश की दृष्टि से विचारने होंगे। रसोई घर में टेबल-कुर्सी न देखकर उसे हीन कल्पना करना सत्यता नहीं होगी। बस, इसी दृष्टि से मैंने इस अनुवाद को लिखने का यत्न किया।
इस अनुवाद का एक खासा इतिहास भी है—जो कि प्लासी के युद्ध के इतिहास की तरह रुचिकर तथा हल्दी घाटी के युद्ध की तरह महत्वपूर्ण है। चरक संहिता का अनुवाद समाप्त करके सन् ३६ से सुश्रुत का अनुवाद शुरू किया था। उस समय यह शारीरस्थान तक ही लिखा था। बस, यह यहीं पड़ा रहा। फिर सन् ४७ में श्री सुन्दरलालजी, अध्यक्ष-मोतीलाल बनारसी दास-फर्म लाहौर वालों ने इसका प्रकाशन आरम्भ किया था। उसके लिये इसे फिर देखा और शेष अनुवाद पूरा किया। उन्होंने छापना भी शुरू किया। चिकित्सास्थान से आगे तक छप गया था। भारत का विभाजन हुआ। लाहौर पाकिस्तान में गया। सब वहाँ नष्ट हो गया। केवल निदान तक के प्रूफ मेरे पास आये थे, वह बचे, बस, उसके आगे सारा लिखना था।
यह लिखना पहाड़ या महाभारत था—दिल टूट गया था—प्रकाशक आर्थिक दृष्टि से किसी प्रकार की मदद देने में लज्जा अनुभव करते थे—उनकी भी कमर टूट गई थी। इस समय जीवन की साधिन शान्ति ने दाहस दिया, उसी की यह प्रोत्साहना थी कि इसको समाप्त कर सका। उसका यह बार-बार कहना कि लोग कहेंगे कि तुमने सुश्रुत नहीं लिखा, एक घन्ना रहेगा, जब चरक संहिता लिखी, अर्घांग संग्रह लिखा, अर्घांग हृदय लिखा, इसे भी पूरा कर दो। माननीय डाक्टर बालकृष्ण पाठक एम० बी० एस्० प्रिन्सिपल आयुर्वेदिक कालेज, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और आदरणीय डाक्टर प्राणजीवन मेहता एम० डी० एम० एस्० की कही एवं लिखी बात पूरी कर दी—कि अत्रिदेव ने बृद्धवयी का अनुवाद किया।
इस अनुवाद में तथा दूसरे अनुवादों में मुख्य प्रेरणा—बड़ा हाथ श्री यादवजी त्रिकमजी महाराज बम्बई का है। उनका यह कहना कि “लिखो, अपनी तरफ से शुद्ध लिखने का यत्न करो, परन्तु अशुद्धि के डर से न लिखना, यह ठीक नहीं। तुम सर्वश्रेष्ठ नहीं। गलती दूसरे सुधार लेंगे—ऐसे भी आदमी हैं, जो सुधार ही सकते हैं, लिख नहीं सकते। आज की ‘प्रेएनोटमी’ आज से तीस साल पहली ग्रे की एनोटमी से बहुत बड़ी है, उसमें संशोधनों से बढ़ती होती रही। इसी प्रकार तुम्हारे अनुवाद में भी संशोधन हो जायेगा। लिखो, मेहनत करो।” ये वाक्य थे, ये शब्द थे, जो सदा जामनगर के गैस्ट हाऊस में रात दिन कानों में पड़ते रहते थे—बस, इन शब्दों से बाहर में मिली प्रेरणा, घर में शान्ति का आग्रह, इन दो पाटों के बीच में पड़ने पर मुझसे यह कार्य हो गया है। कैसे हुआ यह मुझे स्वयं भी पता नहीं। सुश्रुत जैसी बड़ी पुस्तक का अनुवाद दो-तीन बार करना पड़े इसमें अर्वाचि, अनिच्छा, विमनस्कता अवश्य आ जायेगी। विशेषकर मुझ जैसे को जिसने एकबार प्रश्न पत्रों
( ५ )
का उत्तर लिखकर कभी भी दुबारा देखने का साहस नहीं किया। अस्तु, भगवान् की इच्छा गुरुजनों का आशीर्वाद, शान्ति का स्नेह भरा आग्रह, इन सबोंसे यह इच्छा भी पूर्ण हो गई, कि मुझे आयुर्वेद की बुद्धचयी का अनुवाद पूरा करना है।
अशुद्धि या शुद्धि के लिये मुझे कोई चिन्ता नहीं, अशुद्धियाँ तो होनी ही चाहिये, क्योंकि मैं मनुष्य हूँ। भूल होना ही मनुष्य की पहचान है। रामजी ने हिरण्य के भुग में भूल की, इसीसे हम लोग उनको मनुष्य मानते हैं। इसलिये अशुद्धियों को मनुष्य ही शुद्ध भी कर लेंगे। सोना तो अग्नि में ही शुद्ध होता है। यह अनुवाद भी विद्वानों की ज्ञानाग्नि में तपकर कुछ समय पीछे अवश्य कुन्दन बन जायेगा, इसका मुझे विश्वास है१।
अन्त में इसके प्रकाशक श्रीसुन्दरलालजी को धन्यवाद देता हूँ कि जिन्होंने फिर उसी उत्साह से इसका प्रकाशन इस संकटमय जीवन में शुरू किया है। और इसको पुनः नये खिरे से छापकर जनता के सामने उपस्थित किया।
इसके सिवाय इसके भूमिका लेखक डाक्टर श्री भास्कर गोविन्द जी घाणेकर का मैं बहुत कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार कर मुझे कृतार्थ किया। श्री घाणेकर जी सुश्रुत के अच्छे परखनेवाले हैं। उन्होंने स्वयं सुश्रुत की टीका हिन्दी में लिखी है, उसका सबसे अधिक प्रचार हुआ, विद्यार्थियों तथा वैद्य समाज में बहुत सम्मान उसने पाया है। वे भूमिका लिखें—यह वास्तव में अनुवादक और प्रकाशक दोनों के लिये गौरव की बात है, साथ ही भूमिका लेखन कार्य सबसे प्रथम इसी अनुवाद को उनकी लेखनी से प्राप्त हुआ है, यह तो वास्तव में सौभाग्य की बात है। हृदय से उनका धन्यवाद करके विदा लेता हूँ।
अन्तिम
१ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुर्वतेऽर्जुन ॥
न हि ज्ञातेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ॥ भगवद्गीता ।
2
सुश्रुतसंहिता के विषय में
वर्तमान समय में जो सुश्रुतसंहिता उपलब्ध है, उस पर केवल श्रीडल्हणाचार्य की टीका मिलती है। उस टीका में उन्होंने अपना सब परिचय दिया है। उसी में उन्होंने जेज्जट, गयदास, भास्कर आदि विद्वानों की टीका पंजिका का नाम कीर्तन किया है, स्थान-स्थान पर दूसरे आचार्यों के पाठ भी दिये हैं।
इसी प्रसंग में उन्होंने प्रतिसंस्कृता रूप में नागार्जुन का नाम भी दिया है; यथा:—“यत्र तत्र परोक्षे लिट् प्रयोगस्तत्र तत्रैव प्रतिसंस्कृत् सूत्रं ज्ञातव्यमिति। प्रतिसंस्कृत्ताऽपीह नागार्जुन एव।”
बस, इस एक स्थान के सिवाय और प्रमाण नागार्जुन के प्रतिसंस्कृता होने का नहीं मिलता। साथ ही नागार्जुन बौद्ध था। सब इतिहासकार इस बात को बिना विरोध के मानते हैं। इसके विपरीत सुश्रुत में स्थान स्थान पर ब्राह्मणों के लिये विशेष उपचार, ब्रह्मभोज आदि का वर्णन मिलता है।
ब्रह्मभोज की प्रथा आज भी इस देश में है, किसी भी पवित्र कार्य में वास्तु संस्कार या कोई मांगलिक कार्य होने पर ब्राह्मणों को भोज दिया जाता है, इसी प्रकार सुश्रुत में भी वर्णित है।
“छत्रं धारयेद् बालव्यजनैश्च वीजयेत्, ब्राह्मणसहस्रं भोजयेत् ॥” चि० अ० ४।२६
चरक में भी छत्र धारण, पंखा करना, उत्तम बस्तियों के सिद्ध करने में है, परन्तु वहाँ ब्रह्मभोज नहीं है। इसके सिवाय सुश्रुत में ब्राह्मण के लिये दूसरे वर्णों से चिकित्सा में तथा दूसरे कार्यों में भेद बताया है।
यथा—
(१) ब्राह्मणो वा शिलोऽञ्चवृत्तिभूत्वा ब्रह्मरथमुद्भरेत्, कृषेत् सततमितरः, खनेद्वा कूपम् ॥
(२) ‘तत्रारिष्टं ब्राह्मणश्चित्रियवेश्यशुद्राणां श्वेततरूपीतकृष्णेषु भूमिप्रदेशेषु बिल्वन्यग्रोधतिन्दुकभरुलातकनिर्मितसर्वागारं यथासंख्यं तन्मयपर्यङ्कम् ॥’ शा० अ० १०।
चरक में इस प्रकार का भेद चिकित्सा में नहीं है। वहाँ पर जातिस्त्रीय विधि में आसन का भेद वर्ण के अनुसार अवश्य है, यह प्रथा स्मृति काल से चालू है, परन्तु वर्णभेद से भूमिभेद नहीं है, अपि तु इसके विपरीत चरक में—
विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया जातिरुच्यते। अस्तुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना। विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सर्वस्वार्थमथापि वा, ध्रुवमाविशति ज्ञानात्समाद् वैद्यक्षिजः स्मृतः ॥
(*त्रिजः के स्थान पर द्विजः भी पाठ है)। चरक चि० अ० १।४।५२-५३
इससे स्पष्ट है कि चरक के पीछे सुश्रुत बना है, और सुश्रुत आज कल के रीतिरिवाजों से अधिक परिचित था।
सुश्रुत में बौद्ध समय के शब्दों का भी उल्लेख है, यथा—
विशिखा—“अथातो विशिखानुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।” विशिखा का अर्थ कर्म मार्ग या रथा दिया है। परन्तु जैन ग्रन्थों में (उत्तराध्ययनसूत्र में चूर्णिटीका) विशिखा शब्द मल्ल लोगों को आराम करने के स्थान के लिये आया है। कुश्ती करते-करते जब मल्ल थक जाता है, तब वह आराम लेने के लिये जिस स्थान पर जाता है, उस स्थान को विशिखा कहते हैं। आजकल भी बौक्स में ऐसा स्थान निश्चित होता है। वहाँ पर खड़े हुये व्यक्ति पर चोट नहीं की जा सकती। उत्तराध्ययन सूत्र में यह विशिखा शब्द दो मल्लों की कुश्ती के प्रसंग में ही आया है।१
१ तृतीया के स्थान पर द्वितीया भी पाठ है।
२ चरक में भी विशिखा शब्द है—वहाँ पर रथा बर्थ ठोक है, परन्तु सुश्रुत में कर्म मार्ग या घर बर्थ ठोक है।
( ७ )
भिल्लुसंधाटी१—यह दूसरा शब्द है। यथा—“जोगीं च भिल्लुसंधाटी धूपनायोपकल्पयेत् ॥” पुरानी भिल्लुसंधाटी (कन्या गुदडिया) का धुवाँ दे। जिन वस्तुओं के साथ इसको पढ़ा है उनको देख लीजिये, यथा—
“पुरीषं कौकुरुटं केशाश्चर्मसर्पत्वचं तथा” मुरे की बीठ, बाल, खाल, सर्प की केंचुली इनके साथ जोगी वस्त्र का धुवाँ देना कहा है। ये सब चीजें घृणित-निन्दित हैं। इन निन्दित वस्तुओं के साथ भिल्लुसंधाटी को भी गिना है, इससे स्पष्ट है कि यह कोई पवित्र वस्तु नहीं, अपितु घृणित वस्तु है। जब कि प्रब्राजित साधु सबसे बड़े—मान्य-पूज्य माने हैं। इसलिये टीकाकारों ने भिल्लुसंधाटी से शाक्यभिल्लु बौद्ध का ग्रहण किया है (यथा—भिल्लुरव शाक्यभिल्लुः बौद्धाख्यः—डल्हण)। नहीं तो अपने पूज्य आचार्य को प्रत्येक वस्तु को शिष्य महत्त्व की मानते हैं, जैसे लोग गांधी जी के चप्पल, फाउन्टेनपेन, उनके वस्त्र पूज्य समझते हैं। परन्तु सुश्रुत के समय बौद्धभिल्लु घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे, इसी से उनका जोगी वस्त्र घृणित मानकर घृणित वस्तुओं के साथ धूप कार्य में लिया गया है। ब्राह्मणों का और बौद्धों का परस्पर विरोध रहा, इसका साक्षी इतिहास आज भी है।
इसलिये वर्तमान सुश्रुत बौद्धकाल के उदय काल के पीछे जब पुनः पुष्यसिन्ध ने ब्राह्मणों का राज्य स्थापित किया, तब का बना होना चाहिये। चूँकि इसमें ब्राह्मणों की प्रधानता है।
इसके सिवाय ज्वर की चिकित्सा में रोगी को सम्पूर्ण विश्राम देने का इस सुश्रुत में विशेष विधान है। टाई फाईड रोगी को बिल्कुल हिलने-जुलने से मना करते हैं, सुश्रुत भी ऐसा ही बताते हैं, यथा—“ज्वरे प्रमोहो भवति स्वल्पैरप्यवचेष्टितैः। निषण्णं भोजयेत्समात् मूत्रोच्चारो च कारयेत् ॥ निषण्णम्—शय्याथामेव आसीनमुपविष्टम् ॥”
चरक में इस प्रकार का स्पष्ट वचन रोगी के लिये नहीं मिलता। बौद्धकाल में आयुर्वेद की उन्नति विशेष रूप में हुई। तक्षशिला का विश्वविद्यालय आयुर्वेद के लिये प्रसिद्ध था। जीवक ने यहाँ शिक्षा ली। जीवक—बौद्धग्रन्थों में प्रसिद्ध चिकित्सक रहा२। इसलिये सुश्रुत में ज्वर के इस मुख्य अङ्ग को स्पष्ट किया है। ज्वर में—विश्राम मुख्य वस्तु है।
इन सबके सिवाय उत्तरकुरु शब्द का सुश्रुत में आना है। यह उत्तरकुरु शब्द सुश्रुत के सिवाय और किसी आयुर्वेद-ग्रन्थ में नहीं है।
“वाह्निकाः शाद्वलाश्रीनाः मूलीका यवनाः शकाः। मांसगोधूममाध्वीकशन्त्रवैश्रनारोचिताः ॥
मत्स्यसात्यसत्था प्रान्याः क्षीरसात्यश्च सैन्धवाः। अश्मकावन्तिकानां तु तैलाम्लं सात्यमुच्यते ॥
कन्दमूलफलं सात्यं विद्यानमल्यवासिनाम्। सात्यं दक्षिणतः पेया मन्यश्चोत्तरपश्चिमे ॥
मध्यदेशे भवेत्सात्यं यवगोधूमगोरसाः ॥” चरक चि० अ० ३०-३१६-३१६ ॥
ये देश भारत के हैं, या उसके पास हैं। इनमें उत्तरकुरु का वर्णन नहीं है। सुश्रुत में उत्तरकुरु का वर्णन ऐसे स्थान पर है, जहाँ पर कि जाना सुगम नहीं, वहाँ पर रसायनसेवी ही जा सकता है, यथा—
“क्षीरोदं शकषदनमुत्तरांश्च कुरुनपि। यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥” सु० चि० अ० २६-१७
उत्तरकुरु शब्द महाभारत में भी नहीं आया, परन्तु किरातार्जुनीय में अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—
विजित्य यः प्राञ्चमयन्च्छदुत्तरान् कुरुनकुप्यं वसु वासवोपमः।
सवल्कवासिंसि तवाधुना हरन् करोति मन्युं न कथं धनञ्जयः ॥भारवि
अर्जुन ने उत्तरकुरुओं को जीतकर बहुत सा सोना युधिष्ठिर को लाकर दिया था।
यह उत्तरकुरु—शकषदन—स्वर्ग के बराबर का स्थान है। प्राचीनकाल में जब-जब भी रावण या किसी राजा को (रघु आदि को) धन की जरूरत हुई, उन्होंने स्वर्गपर चढ़ाई की—ऐसी कयायें इस भारत देश में बहुत सी हैं। कुछ भी हो उत्तरकुरु स्थान-स्वर्ग के समान साधारण मनुष्यों से अगम्य था। उत्तरकुरु को वर्तमान ऐतिहासिक “थ्यन शान” कहते हैं। यह चीनी शब्द है, जिसका अर्थ देवताओं का पहाड़ है। जो ठीक भी
१ संधाटी—बौद्ध साधुओं का कटि से ऊपर का उत्तरीय वस्त्र है।
२ मेरा शल्यतंत्र इस विषय में सहायक होगा।
( ८ )
लगता है, इसका स्थान मध्य एशिया में मानते हैं। जब कि हम लोग स्वर्ग-त्रिविष्टप को वर्तमान तिब्बत कहते हैं। इसलिये उत्तरकुश-वर्तमान तिब्बत के पास का ध्यान शान पर्वत ही हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं।
इन सब से अधिक वर्तमान सुश्रुत में राम-कृष्ण का नाम भी आता है। राम और कृष्ण इस देशवासियों के पूज्य हैं। उनका सुश्रुत में नाम कथन होना—इसको ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में प्रबल युक्ति है। यथा—
“महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि। तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ॥ सु० चि० अ० ३०।२७
राम, कृष्ण का नाम होना, उत्तरकुश कथन, विशिखा, भिल्लुसंघाटी शब्दों का आना, ब्रह्मभोज आदि बातों का वर्णन—सुश्रुत संहिता को ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में पर्याप्त है। साथ ही इसका संस्कृत्ता नागार्जुन-बौद्ध हो, इसमें सन्देह उत्पन्न करता है। बौद्ध संस्कृत्ता-बौद्धों के लिये एक भी प्रतिपादक पंक्ति या उसकी झलक किसी रूप में न देवे, यह मुश्किल है, खासकर जब हम देखते हैं, कि अहिंसा के कारण हमारा शल्यशास्त्र (सर्जरी) पर्याप्त अधोगति में उतरा है, उसमें शल्यशास्त्र के इस प्रधान ग्रंथ का संस्कृत्ता बौद्ध हो, इसके मानने में सन्देह रहता है। यदि संस्कृत्ता नागार्जुन है तो वह बौद्ध नहीं था, और यदि बौद्ध नागार्जुन के सिवाय दूसरा कोई नागार्जुन नहीं मिलता तो इस सुश्रुत का प्रतिसंस्कृत्ता नागार्जुन नहीं है, कोई दूसरा होगा।
इसलिये डल्हन के वचन पर आँखें बन्द करके बैठने में सन्देह रहता है।
वर्तमान सुश्रुत में चरक संहिता के वाक्य बहुत से एक जैसे ही आते हैं। यथा—
सुश्रुत में
(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान् सु० चि० अ० ३६।१५०
(२) गुरुकावस्थिरावूरु न स्वाविव च मन्यते ॥
(३) गोधूमवेणुयवानुपयुञ्जति।
(४) मधु मधुरमामलकरसेन हरिद्रायुतं,
(५) स्थितं दशाहत्रयमेतदञ्जनम् कृष्णोरगास्यै कुशसंप्रवेष्टिते।
तन्मालतीकोरकसैनधवायुतं
सदाऽञ्जनं स्यात् तिमिरेऽथ रागिणे ॥
(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते।
अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्रादेककालं प्रवर्त्तते ॥
(७) मिथ्याचारेण यः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।
जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणुताः पुष्क ॥
उ० अ० ३८।५
(८) वातिकं बस्तिमिश्रापि पैत्तिकं तु विरेचनैः।
कफजं वमनैर्ध्यानपस्मारमुपाचरेत् ॥
(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते शुष्यति
चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्ये- तमपीनसेन ॥ सु० अ० २२।६
चरक में
(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान्। चरक० चि० अ० ३।१६
(२) अन्यनेयौ हि संमग्नावूरुपादौ च मन्यते ॥
(३) देयास्तथा वेणुयवा यवानां कल्पेन गोधूममयाश्च मद्याः ॥
(४) क्षौद्रेण युक्तामयवा हरिद्रां पिबेद् रसेनामलकीफ- लानाम्।
(५) वदने कृष्णसर्पस्य निहितं भासमञ्जनम्।
ततस्तस्मात्समुद्भूत्य सुशुष्कं चूर्णयैद् बुधः ॥
सुमनःकोरकैः शुष्कैरधीशैः सैन्यवेन च।
एतन्नेत्राञ्जनं कार्यं तिमिरन्मनुत्तमम् ॥
(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते ॥
चि० अ० ३।६३
(७) मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।
जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणु ताः पुष्क ॥
चि० अ० १३०
(८) वातिकं बस्तिभृषिष्ठैः पैत्तां प्रायो विरेचनैः।
शलैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ॥
(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते धूप्यति
चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्येतमपीनसेन ॥ चरक चि० अ० २६।११४
अत्रिदेव
१ ‘पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थांयामसंज्ञायाम्’ पाणिनि के इस सूत्र को व्याख्या में ‘उत्तराः कुशरः’ यह उदाहरण है। इससे स्पष्ट है कि पाणिनि से पूर्व उत्तरकुश शब्द प्रसिद्ध था।
* सुश्रुतविषयानुक्रमणिका *
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| सूत्रस्थान | २ वारीरिक रोग ✓ | ६ | पांचों स्थानों के अध्यायों की संख्या | ११ | |
| प्रथमोऽध्यायः | ३ मानसिक रोग ✓ | ६ | सूत्रस्थान के अध्यायों के नाम | ११ | |
| वेदोत्पत्ति अध्याय की व्याख्या | १ | ४ स्वाभाविक रोग ✓ | ६ | निदानस्थान | ११ |
| औपधेनव आदि ऋषियोंका धन्वन्तरि भगवान् के पास आयुर्वेद-अध्ययन के लिये आना | १ | रोगों का आश्रय ✓ | ६ | शारीरस्थान | १२ |
| धन्वन्तरि भगवान् द्वारा औपधेनव आदि ऋषियों का स्वागत | २ | रोगों का निग्रह ✓ | ७ | चिकित्सास्थान | १२ |
| आयुर्वेद अथर्व वेद का उपांग है | २ | रोगों का संशोधन ✓ | ७ | कल्पस्थान | १३ |
| आयुर्वेद के शल्य आदि ८ अङ्ग | ३ | संशमन के दो प्रकार ✓ | ७ | उत्तरस्थान | १३ |
| १ शल्य का लक्षण | ३ | चार प्रकार का आहार आचार | ७ | शालाक्यतंत्र | १३ |
| २ शालाक्य का लक्षण | ३ | औषधियों के दो प्रकार | ७ | कुमारतंत्र | १३ |
| ३ कायचिकित्सा का लक्षण | ३ | स्थावर औषधियों के चार प्रकार | ७ | कायचिकित्सा | १३ |
| ४ भूतविद्या का लक्षण | ३ | जंगम औषधियों के चार प्रकार | ७ | भूतविद्या | १३ |
| ५ कौमारभृत्य का लक्षण | ३ | स्थावर औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयव | ७ | तन्त्रभूषण | १४ |
| ६ अगदतंत्र का लक्षण | ३ | जंगम औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयव | ७ | उत्तरतंत्र के नाम का कारण | १४ |
| ७ रसायनतंत्र का लक्षण | ३ | पार्थिव औषधियां | ८ | आयुर्वेद के आठ अङ्ग | १४ |
| ८ वाजीकरण का लक्षण | ३ | कालकृत औषधनिरूपण | ८ | वैद्यों का राजा से पूजित होने का कारण | १४ |
| शल्यशान को मुख्य रखते हुए सारे आयुर्वेद के उपदेश के लिये प्रार्थना | ४ | कालकृत औषधप्रयोजन | ८ | वैद्यों का राजा से वध किये जाने का कारण | १४ |
| औपधेनव आदि का सुश्रुत को प्रश्न करने का अधिकारादेश | ४ | शारीरिक रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के कारण | ८ | शास्त्र को न जाननेवाला वैद्य | १४ |
| आयुर्वेदशास्त्र का प्रयोजन ✓ | ४ | आगन्तुक रोगों के दो प्रकार | ८ | आयुर्वेद किस प्रकार पढ़ना चाहिये | १५ |
| आयुर्वेद निरुक्ति ✓ | ४ | पुरुष, व्याधि, औषध, क्रियाकाल की संक्षिप्त व्याख्या | ९ | पाठ करने की विधि | १५ |
| शल्यतंत्र का प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से अविरोध | ५ | चिकित्सा शास्त्र का बीज | ९ | अध्ययन के समय शिष्य का कर्तव्य | १५ |
| शल्यतंत्र का आदि रूप | ५ | सुश्रुतके १२० अध्याय और ५ स्थान | ९ | चतुर्थोऽध्यायः | |
| आयुर्वेदतन्त्रों में शल्यतंत्र सर्व श्रेष्ठ | ५ | सुश्रुत से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार का सुख मिलता है | ९ | प्रभाषण नामक अध्याय की व्याख्या | १५ |
| शल्यतंत्र की प्रशंसा | ५ | द्वितीयोऽध्यायः | व्याख्या का प्रयोजन | १५ | |
| आयुर्वेद की गुरुपरम्परा ✓ | ५ | शिष्योपनयनीय अध्याय का अवतरण | ९ | व्याख्या की आवश्यकता | १५ |
| भगवान् धन्वन्तरि का आत्मपरिचय | ५ | शिष्य परीक्षा | ९ | आयुर्वेद से अतिरिक्त अन्य शास्त्रों को जानने का उपाय | १६ |
| आयुर्वेद के अधिष्ठानभूत पुरुष का निरूपण | ५ | शिष्य की दीक्षा विधि | ९ | वैद्य शब्द का अधिकारी | १६ |
| व्याधियों का साधारण रूप | ६ | आयुर्वेद अध्ययन के अधिकारी | १० | अन्य शब्दतंत्र | १६ |
| व्याधियाँ चार प्रकार की हैं ✓ | ६ | शिष्य का कर्तव्य | १० | पंचमोऽध्यायः | |
| १ आगन्तुक रोग ✓ | ६ | रोगी परिचर्या के लिये उपदेश | ११ | अग्निपहरणीय अध्याय की व्याख्या | १६ |
| ६ | अनध्याय काल | ११ | कर्म के तीन प्रकार | १६ | |
| ६ | तृतीयोऽध्यायः | शस्त्रकर्म के आठ प्रकार | १६ | ||
| ६ | अध्ययन सम्प्रदातीय अध्याय की व्याख्या | ११ | शस्त्रकर्म के पूर्व तैयार रखने योग्य उपकरण | १७ | |
| ६ | ११ |
२
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| शस्त्रक्रिया का उपदेश | १७ |
| शस्त्रकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति | १७ |
| शस्त्रकर्म करनेवाले वैद्य के गुण | १८ |
| एक व्रण से घाव पूरा साफ न होने से अन्य व्रण बनाने चाहिए | १८ |
| व्रण में जहाँ भी पूय की गति देखे अथवा पूय संचय हो गया हो व्रण कर देना चाहिये | १८ |
| तिरछा छेदन कहाँ करना चाहिये | १८ |
| अर्धचन्द्राकार छेदन कहाँ करना चाहिये | १८ |
| उपर्युक्त विधि से छेदन न करने पर दोष | १८ |
| किन रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये | १८ |
| शस्त्रकर्म के पश्चात् कर्म ✓ | १८ |
| व्रण का धूपन | १८ |
| धूपन द्रव्य | १८ |
| राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म | १८ |
| आहार विहार का उपदेश | २० |
| व्रण को खोलने का समय | २० |
| कषाय, लेपन, वन्धन आहार-विहार की विधि | २० |
| व्रण का रोपण कब करना चाहिये ✓ | २० |
| ऋतु के अनुसार पट्टी करनी चाहिये ✓ | २० |
| इसमें अपवाद | २० |
| शस्त्र क्रिया के कारण उत्पन्न हुई तीव्र वेदना को शान्त करने का उपाय | २० |
पष्टोऽध्यायः
| ऋतुओं में किस प्रकार का आचरण करना चाहिये | २० |
|---|---|
| काल की व्याख्या | २० |
| संवत्सर रूपी धीरीर वाले काल का विभाग | २१ |
| छः ऋतुओं का विभाग | २१ |
| दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन विभाग | २१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| चन्द्र सूर्य का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है | २२ |
| युग का वर्णन | २२ |
| ऋतुयें वातादि दोषों के संचित प्रकोप प्रशमन में कारण हैं | २३ |
| प्रकुपित हुए दोषों को दूर करने का उपदेश | २३ |
| कालस्वभाव के कारण वातपित्तादि दोषों की शान्ति कब होती है | २३ |
| सांवत्सरिक विधि को दिन रात में भी कहते हैं | २३ |
| अदूषित ऋतुओं में गेहूँ चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं | २३ |
| इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है | २४ |
| दूषित अन्न पान से महासारी आदि फैलती है | २४ |
| अन्य कारण जिनसे जनपद नष्ट होते हैं | २४ |
| इनकी सामान्य चिकित्सा | २४ |
| अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण | २४ |
| ऋतुओं के स्वभाविक गुणों में अत्यधिकता के कारण अथवा स्वभाविक गुणों में विपरीतता के कारण प्राणियों के वातादि दोष कुपित हो जाते हैं | २५ |
| रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये | २५ |
सप्तमोऽध्यायः ✓
| यंत्रविधि अध्याय का वर्णन | २६ |
|---|---|
| यंत्रों की संख्या | २६ |
| यंत्र कैसे कहते हैं | २६ |
| यंत्रों के भेद | २६ |
| यंत्र किसके बनते हैं | २६ |
| यंत्रों की बनावट | २६ |
| उपसंहार | २६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्वस्तिक यंत्रों का प्रमाण तथा आकार | २६ |
| संदेश यंत्र | २७ |
| ताल यंत्र | २७ |
| नाड़ी यंत्र | २७ |
| शलाका यंत्र | २८ |
| उपयन्त्र | २८ |
| यंत्रों के उपयोग | २८ |
| यंत्रों के कर्म | २९ |
| उपसंहार | २९ |
| यन्त्र दोष | २९ |
| कैसे यंत्र बरतने चाहियें | ३० |
| भिन्न भिन्न यंत्रों से क्या काम लेना चाहिये | ३० |
| कंकमुख यंत्र सब में प्रधान है | ३० |
अष्टमोऽध्यायः ✓
| शस्त्रावचारणीय अध्याय की व्याख्या | ३० |
|---|---|
| शस्त्रों की संख्या—(आकार नाम से स्पष्ट है) | ३० |
| शस्त्रों का उपयोग | ३० |
| शस्त्रों को पकड़ने की विधि | ३१ |
| शस्त्रों के गुण | ३१ |
| शस्त्रों के दोष | ३१ |
| अधविध कार्य में धारका निश्चय | ३२ |
| बद्धिश तथा एषणी यंत्र की धार | ३२ |
| पायना कैसे कहते हैं और उसके प्रकार | ३२ |
| शस्त्रों की तेज कैसे करना चाहिये | ३२ |
| धार की पहिचान | ३३ |
| अनुग्रन्थ और उनका उपयोग | ३३ |
| शस्त्रों का परिचय अत्यावश्यक | ३३ |
| नवमोऽध्यायः | |
| योग्यास्त्रीय अध्याय की व्याख्या | ३३ |
विषयानुक्रमणिका
३
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| संपूर्ण शास्त्र पढ़े हुए को भी कर्माभ्यास करना चाहिये | ३४ |
| छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये | ३४ |
| उपसंहार | ३४ |
| दशमोऽध्यायः | |
| विशिखानुप्रवेशनीय अध्याय की व्याख्या | ३४ |
| शास्त्रकर्म के लिये वैद्य को किस प्रकार घर में प्रवेश करना चाहिये | ३५ |
| रोग को जानने के लै प्रकार | ३५ |
| रोग विज्ञान के उपाय | ३५ |
| रोगों की परीक्षा कर लेने पर साधु रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये | ३६ |
| किन व्यक्तियों में साधु रोग भी प्रायः करके अति कष्टसाध्य होते हैं | ३६ |
| चिकित्सा के समय वैद्य के लिये नियम | ३६ |
| एकादशोऽध्यायः ✓ | |
| क्षारपाकविधि की व्याख्या | ३६ |
| शास्त्र तथा अनुशास्त्रों में क्षार ही प्रधान है | ३६ |
| क्षारनियुक्ति | ३६ |
| क्षार के गुण कर्म | ३७ |
| क्षार के दो प्रकार | ३७ |
| प्रतिसारणीय क्षार का विषय | ३७ |
| पानीयक्षार | ३७ |
| जिन रोगों में क्षार निषिद्ध है | ३७ |
| पानीयक्षारपाक विधि | ३७ |
| प्रतिसारणीय क्षारनिर्माण विधि | ३७ |
| मृदु मध्यम तथा तीक्ष्ण क्षार | ३८ |
| इन तीनों का व्याधि के अनुसार प्रयोग होना चाहिये | ३९ |
| क्षार के गुण दोष | ३९ |
| क्षारप्रतिसारण विधि | ३९ |
| सम्यग दग्ध होने के लक्षण तथा उसके पश्चात् कृत्य | ४० |
| अग्न से क्षार की शान्ति के लिये प्रकार | ४० |
| सम्यक प्रकार से जलने पर | ४० |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कम जलने पर | ४० |
| अति जलने पर | ४० |
| किन के लिये क्षार कर्म उपयुक्त नहीं | ४० |
| प्रदेश विशेष से निषेध | ४१ |
| साध्यरोगों में किन अवस्थाओं में क्षारकर्म सफल नहीं होता | ४१ |
| द्वादशोऽध्यायः ✓ | |
| अग्निकर्म की व्याख्या | ४१ |
| क्षार से अग्नि श्रेष्ठ है | ४१ |
| दहन कार्य के साधन | ४१ |
| शरद तथा ग्रीष्म ऋतु को छोड़ | ४१ |
| अग्निकर्म करना चाहिये | ४२ |
| अग्निकर्म के दो प्रकार | ४२ |
| स्वच्छा के जलने पर | ४२ |
| शिर के रोगों तथा अधिमन्य | ४२ |
| किनमें अग्निकर्म करना चाहिये | ४२ |
| रोग के आश्रयभेद से अग्निकर्म चार प्रकार का है | ४३ |
| अग्निकर्म में प्रवृत्ति निवृत्ति का निश्चय | ४३ |
| किन पुरुषों में अग्निकर्म नहीं करना चाहिये | ४३ |
| अन्य प्रकार से जले हुए व्यक्तियों के लक्षण | ४३ |
| आग से जले हुये के ४ प्रकार | ४४ |
| आग से जले हुये के चिकित्सा कर्म | ४४ |
| धूम से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षण | ४४ |
| वमन के लिये | ४४ |
| उष्णवात | ४४ |
| त्रयोदशोऽध्यायः ✓ | |
| जलौकावचरणीय अध्याय की व्याख्या | ४५ |
| जौक का उपयोग | ४५ |
| विद्याम्य रक्त को निकालने के तीन तरीके—गाय का सींग, जौक, तथा तुम्बी कौन सा रक्त निकालने के लिये उपयुक्त है | ४५ |
| जलायुका शब्द की नियुक्ति | ४६ |
| जलायु के प्रकार | ४६ |
| विषयुक्त जौके | ४७ |
| निर्विषा जौके | ४७ |
| निर्विष जलौकाओं के प्रशस्तक्षेत्र | ४७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| जौकों को क्षेत्त्र भेद से विष युक्त तथा निर्विष जौके | ४७ |
| जौक को ग्रहण करने के उपाय | ४७ |
| जौक को पालने के उपाय | ४८ |
| यह जौके जिनका उपयोग नहीं करना चाहिये | ४८ |
| जौकों को किस तरह लगाना चाहिये | ४८ |
| जौक रक्त ले रही है अथवा नहीं यह जानना | ४८ |
| जौक को विशुद्ध रक्त पीने न देने का उपाय | ४८ |
| जौक के गिरने पर उसके रक्त को निकालने का उपाय | ४८ |
| शोणितवासेचन होने पर ब्रणों को चिकित्सा | ४८ |
| चतुर्दशोऽध्यायः | |
| शोणितवर्णनीय अध्याय की व्याख्या | ४९ |
| रस का वर्णन | ४९ |
| रक्त तथा आर्तव की उत्पत्ति वर्णन | ४९ |
| रक्त तथा आर्तव भेद | ४९ |
| शोणित के स्वभाव में मतान्तररक्त पांचभौतिक है | ४९ |
| शुक्र की उत्पत्ति तथा भाग | ४९ |
| अन्नपान का सारभाग रस है | ४९ |
| रस शब्द की निरुक्ति | ४९ |
| एक धातु में रस का अवस्थानकाल | ५० |
| शरीर में रस की तीन प्रकार की गति | ५० |
| वाजीकरण औषधियों का शीघ्र शुक्र विरेचन | ५१ |
| बालकों की शुक्र अदर्शन में युक्ति | ५१ |
| अन्न रस का बुढ़ापे में पुष्ट न करना | ५२ |
| धातुशब्दनिरुक्ति | ५२ |
| विकृत शोणित का दोषभेद से लक्षण | ५२ |
| शुद्ध शोणित का वर्णन | ५२ |
| विद्याम्य रक्तों की व्याख्या | ५२ |
| रक्तमोक्षण के अयोग्य रोगी | ५३ |
| शास्त्रविद्यावण के प्रकार | ५३ |
| रक्तखाव के अयोग्य हेतु | ५३ |
| दुष्टरक्त के बाहर न निकलने से खाव से दोष | ५३ |
४
सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
रक्त के अतियोग और उसके उपद्रव ५३
रक्तविखावण योग्य काल ५३
रक्तशुद्धि के लक्षण ५३
रक्तके सम्यक् प्रवाह के उपाय ५४
रक्तके अधिक प्रवाह रोकने के योग्य ५४
रक्तखावनिवारण के चार उपाय ५५
पंचदशोऽध्यायः
दोष धातु मलक्षय बुद्धि विज्ञानीय
अध्याय की व्याख्या ५५
स्वस्थों के वातादि का कर्म ५५
धातु रक्षा के उपदेश ५६
दोषों के क्षय की चिकित्सा रसक्षय ५६
मलक्षय ५७
आर्तव क्षय ५७
बढ़े हुए दोष धातु मलों के लक्षण और उनकी चिकित्सा ५७-५८
बल और बलक्षय के लक्षण ५८
ओज का क्षय ५८
ओज के तीन दोष और चिकित्सा ५८
स्थूलता और कृशता की
चिकित्सा ५९-६१
मध्य की श्रेष्ठता ६२
षोडशोऽध्यायः
कर्ण वेधन विधि की व्याख्या ६२
कर्ण वेधन विधि ६२
सिराओं के वेधन से क्या दोष होते हैं ६३
इन दोषों की चिकित्सा ६४
वेधन के पश्चात्कर्म ६५
दोष के शान्त होने पर कानों को लम्बा करना ६५
कानों के दो मार्ग हो जाने पर उनको जोड़ने की विधि ६६
पन्द्रह कर्णबन्धाकृतियाँ ६६
कपाट सन्धि तथा अर्ध कपाट सन्धिक बन्धन ६६
कर्ण पाली को बनाना ६६
कर्ण सन्धि ६६
कर्णबन्ध के समय परित्याग करने योग्य बातें ६६
विषय पृष्ठ
सन्धान न करने के कारण ६७
अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग ६७
उद्बर्तन ६७
असंख्य कर्ण बन्धन ६७
पाली के उपद्रवों के नाम और लक्षण ६७
उत्पाटक रोग में ६७
श्याम रोग में ६७
नासिका का शल्यकर्म ६७
ओष्ठ सन्धानविधि ६७
सप्तदशोऽध्यायः
आमपक्ववेणीय अध्याय की व्याख्या ६८
ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि रोगों का प्रधान कारण शोथ ६८
शोथ का लक्षण ६८
शोथ छे प्रकार का है ६८
आम शोथ के पकने के लक्षण ६९
शस्त्रकर्म से पूर्व कर्म ७०
कष्टसाध्य शोथ ७०
बाहर न निकली हुई पूय, मांस, शिरा स्नायुओं का भक्षण करता है ७०
अष्टादशोऽध्यायः
त्रणलेपनबन्धविधि की व्याख्या ७१
आलेप ही सब उपायों में प्रधानतम है ७१
आलेप को लोमों के अधिमुख लगाना चाहिये ७१
सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करनेवाला होता है ७१
आलेप तीन प्रकार का है ७१
आलेप का प्रमाण ७१
रात्रि को आलेप नहीं करना चाहिये ७२
प्रदेह साध्य व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है ७२
त्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या ७३
पट्टियाँ ७३
शरीर के भिन्न २ प्रदेशों में कौन सी पट्टी बाँधना चाहिये ७३
औषधकल्क ७४
विषय पृष्ठ
त्रणके स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार का है
दोष विशेष से बन्ध ७४
कालविशेष से बन्ध विशेष ७४
क्षिथिलबन्ध के स्थान पर गाढ बन्ध नहीं बाँधना चाहिये ७४
त्रण पर पट्टी न बाँधने से त्रण जल्दी कैसे भरता है ७५
किन अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिये ७५
उपसंहार-यंत्रणा तीन प्रकार की है ७६
किन में बन्धन बाँधना आवश्यक है ७६
एकोनविंशोऽध्यायः
त्रणितोपासन्य की व्याख्या ७६
त्रणी पुरुष के लिए सबसे पहले क्या व्यवस्था करनी चाहिये ७६
प्रशस्त प्रदेश में बने घर से लाभ ७६
शय्या पर सोने से लाभ ७६
त्रणी पुरुष को कभी दिन में न सोना चाहिए ७६
त्रणी की चेष्टाएँ किस प्रकार होनी चाहिए ७६
गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों से दूर बचना चाहिए ७७
किस आहार का परित्याग करना चाहिये ७७
बाह्य आहार-विहार-जिनसे बचना चाहिये ७७
आधिदैविक रक्षा ७७
धूप कैसी देनी चाहिये ७८
किन औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये ७८
सेवन विधि ७८
विशतितमोऽध्यायः
हिताहितौय नामक अध्याय की व्याख्या ७९
द्रव्य स्वभाव से, संयोग से, पूर्णरूप में हित या अहित दोनों करने-वाले होते हैं ७९
विषयानुक्रमणिका
५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पूर्णरूप में हितकारी द्रव्य | ८० |
| प्राणियों का पथ्य-आहार | ८० |
| विहार | ८० |
| अन्य द्रव्य संयोग के आहार | |
| विषवत् अतिकारी हो जाते हैं | ८० |
| अग्नि आदि पदार्थों को देखकर | |
| एकान्त अहित पदार्थों का भी | |
| उपयोग करें | ८० |
| अन्यसंयोगरूपी अहितकारी | |
| द्रव्य | ८० |
| कर्मविरुद्धद्रव्य | ८१ |
| मानविरुद्ध द्रव्य | ८१ |
| रस, वीर्य और विपाक में विरुद्ध | |
| द्रव्य | ८१ |
| कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक और | |
| कोई द्रव्य दोष की शान्ति | |
| करता है | ८१ |
| रस आदि धातुओं में विकार | |
| कैसे होता है | ८२ |
| चिकित्सासूत्र | ८२ |
| किन अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन | |
| निष्फल हो जाता है | ८२ |
| दिशा के योग से वायु की हित् | |
| कारिता और अहित कारिता | ८३ |
| एकविंशतितमोऽध्यायः | |
| व्रण प्रश्न नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ८३ |
| शरीर की उत्पत्ति में कारण | ८३ |
| निरुक्ति | ८३ |
| दोषों के स्थान | ८४ |
| इनके पांचविभाग | ८४ |
| पित्त के अतिरिक्त क्या कोई | |
| और अग्नि शरीर में है | ८४ |
| शरीर में पित्त के कार्य | ८४ |
| पित्त के लक्षण | ८५ |
| कफ के स्थान | ८५ |
| कफ के गुण | ८५ |
| दोषों के प्रकोपक कारण | ८६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| दोषों का प्रसार | ८६ |
| रोग की उपलब्धि | ८८ |
| व्रण शब्द की निरुक्ति | ८६ |
| द्वविंशतितमोऽध्यायः | |
| व्रणस्त्रावविज्ञानीय अध्याय की | |
| व्याख्या | ९० |
| व्रण के आठ अधिष्ठान | ९० |
| त्वचा में स्थित व्रण सुख | |
| साध्य है | ९० |
| व्रण की चार आकृतियाँ | ९० |
| दुष्ट व्रण के लक्षण | ९० |
| सब प्रकार के स्त्राव | ९१ |
| वायु के कारण | ९१ |
| असाध्य स्त्राव | ९१ |
| सब व्रणों की वेदना | ९१ |
| पैतिक व्रणों के लक्षण | ९१ |
| कफजन्य व्रण के लक्षण | ९२ |
| व्रण के रङ्ग | ९२ |
| त्रयोविंशतितमोऽध्यायः | |
| कृत्याकृत्य नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ९२ |
| अतिशय सुखसाध्यव्रण | ९३ |
| कृच्छ्र साध्य व्रण | ९३ |
| व्रण जो सुखपूर्वक रोहण हो जाते हैं | ९३ |
| साध्य के भेद कृच्छ्रसाध्य व्रण | ९३ |
| याप्य व्रण | ९३ |
| याप्य का लक्षण | ९३ |
| असाध्य रोग | ९३ |
| शुद्धव्रण के लक्षण | ९४ |
| रोहण होते हुये व्रण के लक्षण | ९४ |
| सम्यग् रुद्ध के लक्षण | ९४ |
| चतुर्विंशतितमोऽध्यायः | |
| व्यापिसमुद्देशीय नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ९५ |
| रोग दो प्रकार के हैं | ९५ |
| तीन प्रकार का दुःख | ९५ |
| सात प्रकार की व्याधियाँ | ९५ |
| दुष्ट शोणित बलजाता | ९५ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रहार शक्ति से उत्पन्न आगन्तु- | |
| जरोग | ९५ |
| कालवृल प्रवृत्ता | ९५ |
| रसादि धातुओं के विकार | ९६ |
| वात आदि दोषों का ज्वर आदि | |
| रोगों के साथ सम्बन्ध सदा बना | |
| रहता है अथवा नहीं | ९७ |
| पञ्चविंशतितमोऽध्यायः | |
| अष्टविध शस्त्रकर्मोपध्याय की | |
| व्याख्या | ९७ |
| छेदन करने योग्य रोग | ९७ |
| भेदन करने योग्य रोग | ९८ |
| लेखन करने योग्य रोग | ९८ |
| वेधन करने योग्य रोग | ९८ |
| शलाका द्वारा एषण करने | |
| योग्य | ९८ |
| स्त्रावण करने योग्य रोग | ९८ |
| सीने योग्य रोग | ९८ |
| किन अवस्थाओं में सीना नहीं | |
| चाहिये | ९९ |
| संशोधन करने योग्य | ९९ |
| सीने की विधि | ९९ |
| सीने के चार प्रकार | ९९ |
| सूई के भेद | ९९ |
| सीने के पश्चात् कर्म | ९९ |
| आठ प्रकार के शस्त्र कर्म में चार | |
| प्रकार की व्यापद है | ९९ |
| किस वैद्य का परित्याग करना | |
| चाहिये | १०० |
| शस्त्र के अतियोग से होनेवाले | |
| लक्षण | १०० |
| सर्म्पविद्धशिशा आदि के | |
| लक्षण | १०० |
| स्नायु के विद्ध होने पर | १०० |
| सन्धि के विद्ध होने पर | १०० |
| अस्थि के विद्ध होने पर | १०० |
| बिरादि सर्म्प के विद्ध होने पर | १०१ |
६
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वैद्य को रोगी की रक्षा कैसे करनी चाहिये और उसका फल | १०१ |
| षड्विंशतितमोऽध्यायः | |
| प्रनष्टशल्यविज्ञानीय अध्याय की व्याख्या | १०१ |
| शल्य के प्रकार | १०१ |
| शारीरिक शल्य | १०१ |
| शल्य के प्रसिद्ध भेद | १०१ |
| छोटे बड़े शल्यों की पाँच प्रकार की गति | १०२ |
| शल्य का लक्षण | १०२ |
| वात आदि दोषों से अदूषित | १०२ |
| त्वचा में शल्य छिप जाने पर | १०२ |
| सामान्य विज्ञानीय उपाय | १०३ |
| निःशल्य के लक्षण | १०३ |
| अस्थि रूप शल्य | १०४ |
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
| शल्योपनयनीय अध्याय की व्याख्या | १०४ |
|---|---|
| शल्य के दो प्रकार | १०४ |
| अनवबद्ध शल्य को निकालने के १५ उपाय | १०४ |
| सब प्रकार के शल्य निकालने की दो विधियाँ | १०५ |
| अर्वाचीन शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| पराचीन शल्य निकालने का उपाय | १०५ |
| उत्तुषित मुखवाले शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| कुखि, वक्ष आदि के शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| शल्य को निकालने के पश्चात् कर्म | १०५ |
| हृदय के समीप शल्य निकालने का उपाय | १०६ |
| अस्थि छिद्र में प्रविष्ट को निकालने के उपाय | १०६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कर्णवाले शल्य को निकालने का उपाय | १०६ |
| लाख आदि वस्तु के गले में फँस जाने से उसे निकालने का उपाय | १०७ |
| मछली का शल्य आदि निकालने का उपाय | १०७ |
| पानी में डूबे हुए मनुष्य के पेट में से जल निकालना | १०७ |
| भोजन का प्राप्त गले में फँस जाने से निकालने का उपाय | १०७ |
| गला घोटने पर | १०७ |
| अष्टविंशतितमोऽध्यायः | |
| विपरीत व्रण विज्ञानीय अध्याय | १०८ |
| रिष्टलक्षण मृत्यु को बता देता है | १०८ |
| किन अवस्थाओं में रिष्टलक्षण नहीं पता चलते | १०८ |
| रिष्टलक्षणों के निवारण के उपाय | १०८ |
| प्राकृतिक गन्ध | १०८ |
| वैकृतगन्ध | १०८ |
| किन व्रणों का परित्याग करना चाहिये | १०८ |
| शब्द वैकृत | १०९ |
| स्पर्श वैकृत | १०९ |
| आकृति विशेष वैकृत | १०९ |
| उपद्रव | १०९ |
एकौनत्रिंशत्तमोऽध्यायः
| विपरीताविपरीत-दूत-शकुन-स्वप्न निदर्शनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १०९ |
|---|---|
| वैद्य की मानसिक चेष्टाओं से रोगी के शुभ अशुभ भाव पता लग जाते हैं | १०९ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| निन्दित दूत के लक्षण | ११० |
| चेष्टायेँ | ११० |
| वेला | ११० |
| नक्षत्र | ११० |
| तिथि | ११० |
| शुभ-अशुभ शकुन | १११ |
| शुभ तथा निन्दित वायु | १११ |
| वैद्य को इनकी निश्चित रूप से परीक्षा करनी चाहिये | १११ |
| स्वप्न | ११३ |
| विफल स्वप्न | ११३ |
| उत्तरतंत्र में पढ़े हुये रोगों के लिये अन्य स्वप्न | ११४ |
| अशुभ स्वप्न में चिकित्सा | ११४ |
| शुभ स्वप्न | ११४ |
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
| पंचेन्द्रियार्थ विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या | ११४ |
|---|---|
| अरिष्ट के लक्षण | ११५ |
| न बचनेवाले रोगी के लक्षण | ११५ |
एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः
| छाया विप्रतिपत्ति अध्याय की व्याख्या | ११६ |
|---|---|
| निश्चयात्मक मरनेवालों के लक्षण | ११६ |
| मृत्यु के कारण | ११७ |
द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
| स्वभाव विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या | ११८ |
|---|
| प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है | ११८ |
|---|---|
| असाध्य के लक्षण | ११८ |
त्रयत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अवार्णीय नामक अध्याय की | ---|---
विषयानुक्रमणिका
9
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| व्याख्या | १२० |
| आठ महारोग | १२१ |
| वैद्य को किन रोगियों का परित्याग करना चाहिये | १२२ |
| चतुर्विंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| युक्तसेनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १२२ |
| राजा की रक्षा वैद्य को किस प्रकार करनी चाहिये | १२३ |
| १०१ साल की काल मृत्यु | १२३ |
| पुरोहित वैद्य से श्रेष्ठ है | १२४ |
| राजा के व्यसनों में फँसने के कारण | १२४ |
| चिकित्सा कर्म की सफलता में चार कारण वस्तुएँ | १२४ |
| वैद्य के गुण | १२४ |
| रोगी मनुष्य के गुण | १२४ |
| क्षेपज के गुण | १२४ |
| परिचारक के गुण | १२४ |
| पञ्चत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| आतुरोपक्रमणीय अध्याय की व्याख्या | १२४ |
| चिकित्सा से पहले रोगी की आयु परीक्षा | १२४ |
| दीर्घायु के लक्षण | १२५ |
| मध्यमायु पुरुष के लक्षण | १२६ |
| जघन्य आयु के लक्षण | १२६ |
| आयु के विज्ञान के लिये अङ्ग प्रत्यंग का ज्ञान, प्रमाण एवं सार | १२६ |
| क्रिया का लक्षण | १२८ |
| अग्नि के चार प्रकार | १२९ |
| विषमार्गिन | १२९ |
| तीक्ष्णार्गिन | १२९ |
| समार्गिन | १२९ |
| जाठराग्नि | १३० |
| वय तीन प्रकार की है | १३० |
| बृद्धावस्था में बाल्यावस्था के समान औषध मात्रा | १३० |
| देह परीक्षा | १३१ |
| देश तीन प्रकार का है | १३१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| मुख साध्य रोग | १३१ |
| षट्त्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| भूमिप्रविभागीय नामक अध्याय की व्याख्या | १३२ |
| भूमि का दो प्रकार का विभाग | १३२ |
| विशेष भूमि परीक्षा | १३२ |
| गन्ध, वर्ण एवं रस से उक्त भूमि का प्रकार की है | १३३ |
| औषधियों को रखने का स्थान | १३३ |
| सप्तत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| मिश्रक अध्याय की व्याख्या | १३४ |
| सन्निपातजन्य शोथ को नष्ट करने के प्रलेप | १३४ |
| लेप का संस्कार | १३४ |
| पाचन द्रव्य | १३४ |
| दारण द्रव्य | १३४ |
| पीडन द्रव्य | १३४ |
| शोथन द्रव्य | १३४ |
| वर्ति | १३५ |
| कल्क | १३५ |
| संशोधनघृत | १३५ |
| तैल | १३५ |
| शोथन चूर्ण | १३५ |
| शोथनी रसक्रिया | १३५ |
| धूपन | १३५ |
| रोपणकषाय | १३५ |
| रोपणवर्ति | १३५ |
| व्रण के संरोहण के लिये कल्क | १३५ |
| सिद्ध घृत | १३५ |
| रोपण तैल | १३५ |
| रोपणचूर्ण | १३६ |
| रोपण कार्य के लिए रस क्रिया | १३६ |
| मांसवर्धन कार्य में प्रशस्त औषधियाँ | १३६ |
| उभरे हुए मांस को काटने के लिये | १३६ |
| अष्टत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| द्रव्यसंप्रहणीय अध्याय की व्याख्या | १३६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| सैतीस द्रव्य समूह के नाम आरग्वधादिगण | १३६ |
| सालसारदिगण | १३६ |
| वीरतर्वादिगण | १३७ |
| लोब्रादिगण | १३७ |
| अर्कादिगण | १३७ |
| सुरसादिगण | १३७ |
| मुष्कादिगण | १३७ |
| पित्तक्यादिगण | १३७ |
| एलादिगण | १३७ |
| वचादि तथा हरिद्रादिगण | १३८ |
| श्यामादिगण | १३८ |
| बृहत्यादिगण | १३८ |
| पटोलादिगण | १३८ |
| काकोल्यादिगण | १३९ |
| ऊषकादिगण | १३९ |
| सारिवादिगण | १३९ |
| अञ्जनादिगण | १३९ |
| पुरुषादिगण | १३९ |
| अम्बुघादिगण | १३९ |
| न्यम्रोघादिगण | १३९ |
| गुड्द्यादिगण | १३९ |
| उत्पलादिगण | १३९ |
| मुस्तादिगण | १३९ |
| त्रिफला | १३९ |
| त्रिकटु | १३९ |
| आमलक्यादिगण | १३९ |
| त्रप्वादिगण | १३९ |
| पञ्चमूल | १३९ |
| महापञ्चमूल | १३९ |
| वक्षमूल | १३९ |
| वल्लीपञ्चमूल | १४० |
| कण्टकपञ्चमूल | १४० |
| तुष्ट्यपञ्चकमूल | १४० |
| एकोनचत्वारिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| संशोधनसंशमनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १४१ |
| दो प्रकार के संशोधन | १४१ |
| शिरीरविरचन द्रव्य | १४२ |
| संशमनद्रव्य | १४२ |
८
सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
उचित मात्रा में न दी हुई औषध क्या दोष करती है १४३
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक विज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४३
द्रव्य ही प्रधान है ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं १४४
द्रव्य का लक्षण १४४
रस ही प्रधान है ऐसा दूसरे आचार्य कहते हैं १४४
वीर्य ही प्रधान है ऐसा तीसरे आचार्य का मत १४४
विपाक ही प्रधान है ऐसा चौथे आचार्यों का मत है १४५
पाक भी दो प्रकार का है १४५
विपाक के दो भेद १४६
रस, वीर्य, विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना १४६
शास्त्र की प्रधानता १४६
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्यविशेष विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १४७
द्रव्य की उत्पत्ति १४७
पार्ष्व द्रव्य १४७
आप्य द्रव्य १४७
वायवीय द्रव्य १४७
आकाशीय द्रव्य १४७
द्रव्य की कार्यशीलता, काल तथा कर्म १४७
द्रव्य के दो भेद (अधोमार्गी, ऊर्ध्वमार्गी) १४७
संशमनगुणवाले द्रव्य संग्राहक, दीपन, आग्नेय, लेखन, बुद्धि १४७
वीर्यसंज्ञक गुण १४८
पंचमहामृतों के समान गुण- वाले द्रव्यों में रस की विलक्षणता १४८
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
रसविशेषविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४९
विषय पृष्ठ
सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध बृद्धि तथा ह्राससे जाना जाता है १४९
जलीयरस के छ प्रकार १४९
परस्पर एक दूसरे से मिलने पर ६३ प्रकार १४९
कई आचार्यों के मत से रसों के दो भेद १४९
पित्त १५०
कफ १५०
रस के लक्षण १५०
रस के गुण १५०
अम्ल रस १५१
लवण रस १५१
कटु रस १५१
तिक्त रस १५१
कषाय रस १५१
मधुरवर्ग १५१
अम्लवर्ग १५१
लवणवर्ग १५१
कटुवर्ग १५१
तिक्तवर्ग १५१
कषायवर्ग १५१
छः रसों के परस्पर संयोग से ६३ भेद १५१
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १५३
मैनफलकल्प १५३
जीमूतकल्प १५३
कुटजकल्प १५३
कृतवेधनकल्प १५५
इन्द्राकुल्प १५५
धामागविकल्प १५५
वमन औषधियों का योजना प्रकार १५५
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
विरेचन द्रव्यविकल्प विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १५५
विरेचन में प्रधान द्रव्य १५५
त्रिदूतकल्प १५५
पित्तजन्य तथा कफजन्य रोग १५५
वातकफजरोग १५५
विषय पृष्ठ
मोदक १५६
वैरेचनीयद्रव्य चूर्ण १५६
यूषविधि १५६
पुटपाक रूपत्रिदूतकल्प १५६
वैरेचन लेह १५६
वैरेचन मोदक १५६
वैरेचन लेह गुटिका प्रयोग १५७
वैरेचन चूर्ण १५७
वैरेचन आसव १५७
वैरेचन पैष्टी सुरा १५७
वैरेचन सौवीर (कांजी) १५७
वैरेचन तुषोदक १५७
वैरेचन त्रिदूतमूलविधि १५८
दन्ती द्रवन्ती कल्प १५८
दन्ती द्रवन्ती स्नेहयोग १५८
दन्त्यादिमोदक १५८
व्योषादिविरेचन १५८
तिलककल्प १५८
हरीतकीकल्प १५९
त्रिफलकल्प १५९
हरीतकी विधान १६०
चतुरङ्गुलकल्प १६०
ऐरण्डतैलकल्प १६०
स्तुहीक्षीरकल्प १६०
त्रिदूतमोदक १६१
औषधकल्पनाविधि १६१
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
द्रव्यविधि की व्याख्या १६१
आन्तरिक्ष जल के गुण १६१
पानी के गिरने से स्थान विशेष के कारण भिन्न भिन्न रस को प्राप्त करता है १६१
लोहित, कपिल आदि भूमि में मधुर अम्ल आदि रस युक्त जल होते हैं १६२
अन्तरिक्ष जल के अभाव में आकाश गुण बहुल १६२
अन्तरिक्ष जल के चार प्रकार १६२
भूमि के पानी के सात प्रकार १६२
हर-श्रुतु में कौन सा जल लेना चाहिये १६३
न बरतने योग्य जल १६४