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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

वरुण और भृगु

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः तैत्तिरीयोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित सर्व्वाशाध्वान्तनिर्मुक्तं सर्व्वाशाभास्करं परम्। चिदाकाशावतंसं तं सद्गुरुं प्रणमाम्यहम्॥ शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

शिक्षावल्ली

शिक्षावल्ली —•1•|००|•1•— प्रथम अनुवाक सम्बन्ध-भाष्य यस्माज्जातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव प्रलीयते । येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ १ ॥ जिससे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें ही यह लीन होता है और जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है उस ज्ञानस्वरूपको मेरा नमस्कार है । यैरिमे गुरुभिः पूर्वं पदवाक्यप्रमाणतः । व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ पूर्वकालमें जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है उन्हें मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ । तैत्तिरीयकसारस्य मयाचार्यप्रसादतः । विस्पष्टार्थरुचीनां हि व्याख्येयं संप्रणीयते ॥ ३ ॥ जो स्पष्ट अर्थ जाननेके इच्छुक हैं उन पुरुषोंके लिये मैं श्रीआचार्यकी कृपासे तैत्तिरीयशाखाके सारभूत इस उपनिषद्की व्याख्या करता हूँ । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ नित्यान्यधिगतानि कर्माण्यु- | सञ्चित पापोंका क्षय ही जिनका उपक्रमः पात्तदुरितक्षयार्था- | मुख्य प्रयोजन है ऐसे नित्यकर्मोंका नि, काम्यानि च | तथा सकाम पुरुषोंके लिये विहित फलार्थिनां पूर्वस्मिन्ग्रन्थे । इदानीं | काम्यकर्मोंका इससे पूर्ववर्ती ग्रन्थमें [ अर्थात् कर्मकाण्डमें ] परिज्ञान हो कर्मोपादानहेतुपरिहाराय ब्रह्म- | चुका है । अब कर्मानुष्ठानके कारणकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मविद्याका विद्या प्रस्तूयते । | आरम्भ किया जाता है । कर्महेतुः कामः स्यात् । | कामना ही कर्मकी कारण हो आत्मविदेवाप्त- प्रवर्तकत्वात् । आ- | सकती है; क्योंकि वही उसकी कामो भवति प्रवर्तक है । जो लोग पूर्णकाम हैं सकामानां हि कामा- | उनकी कामनाओंका अभाव होनेपर भावे स्वात्मन्यवस्थानात् प्रवृत्त्य- | स्वरूपमें स्थिति हो जानेसे कर्ममें प्रवृत्ति होनी असम्भव है । आत्म- नुपपत्तिः । आत्मकामित्वे चाप्त- | दर्शनकी कामना पूर्ण होनेपर कामता; आत्मा हि ब्रह्म; | ही पूर्णकामता [ की सिद्धि ] होती है; क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है और तद्विदो हि परप्राप्तिं वक्ष्यति । | ब्रह्मवेत्ताको ही परमात्माकी प्राप्ति अतोऽविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्य- | होती है ऐसा आगे [ श्रुति ] वस्थानं परप्राप्तिः । “अभयं | बतलायेगी । अतः अविद्याकी निवृत्ति होनेपर अपने आत्मामें स्थित हो प्रतिष्ठां विन्दते” ( तै० उ० २ । | जाना ही परमात्माकी प्राप्ति है; ७ । १) “एतमानन्दमयमात्मा- | जैसा कि “अभय पद प्राप्त कर लेता है” “[ उस समय ] इस आनन्द- नमुपसंक्रामति” ( तै० उ० २ । | मय आत्माको प्राप्त हो जाता है” ८ । १२) इत्यादिश्रुतेः । | इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- | पूर्व०—काम्य और निषिद्ध कर्मों- (मीमांसकमत- दारब्धस्य चोप- | का आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मों- समीक्षा) भोगेन क्षयान्नित्या- | का भोगद्वारा क्षय हो जानेसे तथा | नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे प्रत्यवायका नुष्ठानेन प्रत्यवायाभावाद्यत्नत | अभाव हो जानेसे अनायास ही एव स्वात्मन्यवस्थानं मोक्षः । | अपने आत्मामें स्थित होनारूप मोक्ष | प्राप्त हो जायगा; अथवा 'स्वर्ग' अथवा निरतिशयायाः प्रीतेः | शब्दवाच्य आत्यन्तिक प्रीति कर्म- स्वर्गशब्दवाच्यायाः कर्महेतु- | जनित होनेके कारण कर्मसे ही | मोक्ष हो सकता है—यदि ऐसा माना त्वात्कर्मभ्य एव मोक्ष इति चेत् । | जाय तो ? न; कर्मानैकत्वात् । अने- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि कर्म कानि ह्यारब्धफलान्यनारब्ध- | तो बहुत-से हैं । अनेकों जन्मान्तरोंमें | किये हुए ऐसे अनेकों विरुद्ध फलवाले फलानि चानेकजन्मान्तरकृतानि | कर्म हो सकते हैं जिनमेंसे कुछ तो विरुद्धफलानि कर्माणि सम्भवन्ति। | फलोन्मुख हो गये हैं और कुछ अभी अतस्तेष्वनारब्धफलानामेकस्मि- | फलोन्मुख नहीं हुए हैं । अतः उनमें | जो कर्म अभी फलोन्मुख नहीं हुए ञ्जन्मन्युपभोगक्षयासम्भवाच्छेष- | हैं उनका एक जन्ममें ही क्षय होना कर्मनिमित्तशरीरारम्भोपपत्तिः । | असम्भव होनेके कारण उन अवशिष्ट | कर्मोंके कारण दूसरे शरीरका कर्मशेषसद्भावसिद्धिश्च "तद्य इह | आरम्भ होना सम्भव ही है । रमणीयचरणाः" ( छा० उ० | “इस लोकमें जो शुभ कर्म करनेवाले ५।१०।७) “ततः शेषेण” | हैं [ उन्हें शुभयोनि प्राप्त होती है ]” | “[ उपभोग किये कर्मोंसे ] बचे हुए (आ०ध० २।२।२।३, गो० | कर्मोंद्वारा [ जीवको आगेका शरीर

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अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १७ स्मृ० ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | प्राप्त होता है]" इत्यादि सैकड़ों शतेभ्यः । | श्रुति-स्मृतियोंसे अवशिष्ट कर्मके | सद्भावकी सिद्धि होती ही है । इष्टानिष्टफलानामनालब्धानां | पूर्व०-इष्ट और अनिष्ट दोनों | प्रकारके फल देनेवाले सञ्चित कर्मों- क्षयार्थानि नित्यानीति चेत् ? | का क्षय करनेके लिये ही नित्यकर्म | हैं-ऐसी बात हो तो ? न; अकरणे प्रत्यवायश्रव- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उन्हें | न करनेपर प्रत्यवाय होता है-ऐसा णात् । प्रत्यवायशब्दो ह्यनिष्ट- | सुना गया है। 'प्रत्यवाय' शब्द | अनिष्टका ही सूचक है। नित्य- विषयः । नित्याकरणनिमित्तस्य | कर्मोंके न करनेके कारण जो प्रत्यवायस्य दुःखरूपस्यागामिनः | आगामी दुःखरूप प्रत्यवाय होता है | उसका नाश करनेके लिये ही परिहारार्थानि नित्यानीत्यभ्युप- | नित्यकर्म हैं-ऐसा माना जानेके | कारण वे सञ्चित कर्मोंके क्षयके लिये गमान्नानारब्धफलकर्मक्षयार्थानि । | नहीं हो सकते। यदि ना़मानारब्धकर्मक्षया- | और यदि नित्यकर्म, जिनका | फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है उन र्थानि नित्यानि कर्माणि तथा- | कर्मोंके क्षयके लिये हों भी तो भी | वे अशुद्ध कर्मका ही क्षय करेंगे, प्यशुद्धमेव क्षपयेयुर्न शुद्धम् । | शुद्धका नहीं; क्योंकि उनसे तो विरोधाभावात् । न हीष्टफलस्य | उनका विरोध ही नहीं है। जिनका | फल इष्ट है उन कर्मोंका तो शुद्ध- कर्मणः शुद्धरूपत्वान्नित्यैर्विरोध | रूप होनेके कारण नित्यकर्मोंसे उपपद्यते । शुद्धाशुद्धयोर्हि विरो- | विरोध होना सम्भव ही नहीं है। | विरोध तो शुद्ध और अशुद्ध कर्मोंका धो युक्तः । | ही होना उचित है। तै० उ० ३-४- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

न च कर्महेतूनां कामानां │ इसके सिवा कर्मकी हेतुभूत ज्ञानाभावे निवृत्त्यसंभवादशेष- │ कामनाओंकी निवृत्ति भी ज्ञानके │ अभावमें असम्भव होनेके कारण कर्मक्षयोपपत्तिः । अनात्मविदो │ उन (नित्यकर्मों) के द्वारा सम्पूर्ण │ कर्मोंका क्षय होना सम्भव नहीं है; हि कामोऽनात्मफलविषयत्वात् । │ क्योंकि अनात्मफलविषयिणी होनेके │ कारण कामना अनात्मवेत्ताको ही स्वात्मनि च कामानुपपत्तिर्नित्य- │ हुआ करती है । आत्मामें तो कामना- │ का होना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि प्राप्तत्वात् । स्वयं चात्मा परं │ वह नित्यप्राप्त है । और यह तो कहा │ ही जा चुका है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्मेत्युक्तम् । │ परब्रह्म है । नित्यानां चाकरणमभावस्ततः │ तथा नित्यकर्मोंका न करना तो │ अभावरूप है, उससे प्रत्यवाय होना प्रत्यवायानुपपत्तिरिति । अतः │ असम्भव है । अतः नित्यकर्मोंका न पूर्वोपचितदुरितेभ्यः प्राप्यमाणा- │ करना यह पूर्वसञ्चित पापोंसे प्राप्त │ होनेवाली प्रत्यवायक्रियाका ही याः प्रत्यवायक्रियाया नित्याकरणं │ लक्षण है । इसलिये “अकुर्वन् लक्षणमिति “अकुर्वन्विहितं कर्म” │ विहितं कर्म” इस वाक्यके │ ‘अकुर्वन्’ पदमें ‘शतृ’ प्रत्ययका (मनु० ११।४४) इति शतृ- │ होना अनुचित नहीं है । अन्यथा │ अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध होने- र्नानुपपत्तिः । अन्यथाभावाद्भा- │ के कारण सभी प्रमाणोंसे विरोध हो वोत्पत्तिरिति सर्वप्रमाणव्याकोप │ जायगा । अतः ऐसा मानना सर्वथा │ अयुक्त है कि [ कर्मानुष्ठानसे ] इति । अतोऽयत्नतः स्वात्मन्य- │ अनायास ही आत्मस्वरूपमें स्थिति वस्थानमित्यनुपपन्नम् । │ हो जाती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९ यच्चोक्तं निरतिशयप्रीतेः स्वर्ग- शब्दवाच्यायाः कर्मनिमित्तत्वा- त्कर्मारब्ध एव मोक्ष इति, तन्न; नित्यत्वान्मोक्षस्य । न हि नित्यं किञ्चिदारभ्यते लोके यदारब्धं तदनित्यमिति । अतो न कर्मा- रब्धो मोक्षः । विद्यासहितानां कर्मणां नि- त्यारम्भसामर्थ्यमिति चेत् ? न; विरोधात् । नित्यं चा- रभ्यत इति विरुद्धम् । यद्विनष्टं तदेव नोत्पद्यत इति । प्रध्वंसाभाववन्नित्योऽपि मोक्ष आरभ्य एवेति चेत् ? न; मोक्षस्य भावरूपत्वात् । प्रध्वंसाभावोऽप्यारभ्यत इति न संभवति; अभावस्य विशेषाभावाद्विकल्पमात्रमेतत् । और यह जो कहा कि 'स्वर्ग' शब्दसे कही जानेवाली निरतिशय प्रीति कर्मनिमित्तक होनेके कारण मोक्ष कर्मसे ही आरम्भ होनेवाला है; सो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्य है और किसी भी नित्य वस्तुका आरम्भ नहीं किया जाता; लोकमें जिस वस्तुका भी आरम्भ होता है वह अनित्य हुआ करती है; इसलिये मोक्ष कर्मारब्ध नहीं है । पूर्व०-ज्ञानसहित कर्मोंमें तो नित्य मोक्षके आरम्भ करनेकी भी सामर्थ्य है ही ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे विरोध आता है, मोक्ष नित्य है और उसका आरम्भ किया जाता है-ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। पूर्व०-जो वस्तु नष्ट हो जाती है वही फिर उत्पन्न नहीं हुआ करती, अतः प्रध्वंसाभावके समान नित्य होनेपर भी मोक्षका आरम्भ किया ही जाता है। ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि मोक्ष तो भावरूप है । प्रध्वंसाभाव भी आरम्भ किया जाता है यह संभव नहीं; क्योंकि अभावमें कोई विशेषता न होनेके कारण यह तो केवल विकल्प ही है। भावका CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[Header] २० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत मूल एवं भाष्य]

भावप्रतियोगी ह्यभावः । यथा ह्यभिन्नोऽपि भावो घट- पटादिभिर्विशेष्यते भिन्न इव घटभावः पटभाव इति; एवं निर्विशेषोऽप्यभावः क्रिया- गुणयोगाद्द्रव्यादिवद्विकल्प्यते । न ह्यभाव उत्पलादिवद्विशेषण- सहभावी । विशेषणवत्त्वे भाव एव स्यात् । विद्याकर्मकर्तृनित्यत्वाद्विद्या- कर्मसन्तानजनितमोक्षनित्यत्व- मिति चेत् ? न; गङ्गास्रोतोवत्कर्तृत्वस्य दुःखरूपत्वात् । कर्तृत्वोपरमे च मोक्षविच्छेदात् । तस्मादविद्या- कामकर्मोपादानहेतुनिवृत्तौ स्वा- त्मन्यवस्थानं मोक्ष इति । स्वयं


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी अनुवाद]

प्रतियोगी ही 'अभाव' कहलाता है । जिस प्रकार भाव वस्तुतः अभिन्न होनेपर भी घट-पट आदि विशेषणोंसे भिन्नके समान घटभाव, पटभाव आदि रूपसे विशेषित किया जाता है इसी प्रकार अभाव निर्विशेष होनेपर भी क्रिया और गुणके योगसे द्रव्यादिके समान विकल्पित होता है । कमल आदि पदार्थोंके समान अभाव विशेषणके सहित रहनेवाला नहीं है । विशेषण- युक्त होनेपर तो वह भाव ही हो जायगा । पूर्व०-विद्या और कर्म इनका कर्ता नित्य होनेके कारण विद्या और कर्मके अविच्छिन्न प्रवाहसे होनेवाला मोक्ष नित्य ही होना चाहिये । ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, गङ्गाप्रवाहके समान जो कर्तृत्व है वह तो दुःख- रूप है । [अतः उससे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती, और यदि उसीसे मोक्ष माना जाय तो भी ] कर्तृत्वकी निवृत्ति होनेपर मोक्षका विच्छेद हो जायगा । अतः अविद्या, कामना और कर्म-इनके उपादान कारणकी निवृत्ति होनेपर आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही मोक्ष है-यह सिद्ध


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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१ चात्मा ब्रह्म । तद्विज्ञानादविद्या- | होता है । तथा स्वयं आत्मा ही ब्रह्म | है और उसके ज्ञानसे ही अविद्याकी निवृत्तिरिति ब्रह्मविद्यार्थोपनिष- | निवृत्ति होती है; अतः अब ब्रह्म- | ज्ञानके लिये उपनिषद्का आरम्भ दारभ्यते । | किया जाता है । उपनिषदिति विद्योच्यते; | अपना सेवन करनेवाले पुरुषोंके उपनिषच्छब्द- तच्छीलिनां गर्भज- | गर्भ, जन्म और जरा आदिका निशातन निरुक्तिः | ( उच्छेद ) करने या उनका अवसादन न्मजरादिनिशात- | ( नाश ) करनेके कारण 'उपनिषद्' नात्तदवसादनाद्वा ब्रह्मणो वोप- | शब्दसे विद्या ही कही जाती है । | अथवा ब्रह्मके समीप ले जानेवाली निगमयितृत्वादुपनिषण्णं वास्यां | होनेसे या इसमें परम श्रेय ब्रह्म | उपस्थित है इसलिये [ यह विद्या 'उप- परं श्रेय इति । तदर्थत्वाद्- | निषद्' है ] । उस विद्याके ही लिये ग्रन्थोऽप्युपनिषत् । | होनेके कारण ग्रन्थ भी 'उपनिषद्' है । शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥ [ प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी देवता ] मित्र ( सूर्यदेव ) हमारे लिये सुखकर हो । [ अपानवृत्ति और रात्रिका अभिमानी ] वरुण CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ हमारे लिये सुखावह हो । [ नेत्र और सूर्यका अभिमानी देवता ] अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । बलका अभिमानी इन्द्र तथा [ वाक् और बुद्धिका अभिमानी देवता ] बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हो । तथा जिसका पादविक्षेप ( डग ) बहुत विस्तृत है वह [ पादाभिमानी देवता ] विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत ( शास्त्रोक्त निश्चित अर्थ ) कहूँगा और [ क्योंकि वाक् और शरीरसे सम्पन्न होनेवाले कार्य भी तुम्हारे ही अधीन हैं इसलिये ] तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा । अतः तुम [ विद्यादानके द्वारा ] मेरी रक्षा करो तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले आचार्यकी भी [ उन्हें वक्तृत्व-सामर्थ्य देकर ] रक्षा करो । मेरी रक्षा करो और वक्ताकी रक्षा करो । आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकारके तापोंकी शान्ति हो ॥ १ ॥ शं सुखं प्राणवृत्तेरहश्चाभि- | प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी मानी देवतात्मा मित्रो नोऽस्माकं | देवता मित्र हमारे लिये शं सुखरूप भवतु । तथैवापानवृत्ते रात्रेश्चाभि- | हो । इसी प्रकार अपानवृत्ति और | रात्रिका अभिमानी देवता वरुण, मानी देवतात्मा वरुणः । चक्षु- | नेत्र और सूर्यमें अभिमान करनेवाला ष्यादित्ये चाभिमान्यर्थमा । | अर्यमा, बलमें अभिमान करनेवाला बल इन्द्रः । वाचि बुद्धौ च | इन्द्र, वाणी और बुद्धिका अभिमानी | बृहस्पति तथा उरुक्रम अर्थात् बृहस्पतिः । विष्णुरुरुक्रमो वि- | विस्तीर्ण पादविक्षेपवाला पादाभिमानी स्तीर्णक्रमः पादयोरभिमानी । | देवता विष्णु-इत्यादि सभी अध्यात्म- एवमाध्यात्मदेवताः शं नः । | देवता हमारे लिये सुखदायक हों । | 'भवतु' ( हों ) इस क्रियाका सभी भवत्विति सर्वत्रानुषङ्गः । | वाक्योंके साथ सम्बन्ध है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३


तासु हि सुखकृत्सु विद्या- | उनके सुखप्रद होनेपर ही ज्ञान- श्रवणधारणोपयोगा अप्रतिबन्धे- | के श्रवण, धारण और उपयोग | निर्विघ्नतासे हो सकेंगे—इसलिये ही न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा | उनकी सुखावहताके लिये प्रार्थना प्रार्थ्यते शं नो भवत्विति । | की जाती है । ब्रह्म विविदिषुणा नमस्कार- | अब ब्रह्मके जिज्ञासुद्वारा ब्रह्म- | विद्याके विघ्नोंकी शान्तिके लिये वन्दनक्रिये वायुविषये ब्रह्म- | वायुसम्बन्धी नमस्कार और वन्दन विद्योपसर्गशान्त्यर्थं क्रियेते । सर्व- | किये जाते हैं । समस्त कर्मोंका | फल वायुके ही अधीन होनेके क्रियाफलानां तदधीनत्वाद् | कारण ब्रह्म वायु है । उस ब्रह्म वायुस्तस्मै ब्रह्मणे नमः । | ब्रह्मको मैं नमस्कार अर्थात् प्रह्वीभाव | ( विनीतभाव ) करता हूँ । यहाँ प्रह्वीभावं करोमीति वाक्यशेषः । | 'करोमि' यह क्रिया वाक्यशेष है । नमस्ते तुभ्यं हे वायो नमस्क- | हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है—मैं | तुम्हें नमस्कार करता हूँ—इस प्रकार रोमीति । परोक्षप्रत्यक्षाभ्यां | यहाँ परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे वायु | ही कहा गया है । वायुरेवाभिधीयते । | किं च त्वमेव चक्षुराद्यपेक्ष्य | इसके सिवा क्योंकि बाह्य चक्षु | आदिकी अपेक्षा तुम्हीं समीपवर्ती— बाह्यं संनिकृष्टमव्यवहितं प्रत्यक्षं | अव्यवहित अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हो | इसलिये तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म ब्रह्मासि यस्मात्तस्मात्त्वामेव | कहूँगा । तुम्हींको ऋत अर्थात् शास्त्र | और अपने कर्त्तव्यानुसार बुद्धिमें प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं | सम्यक्रूपसे निश्चित किया हुआ यथाशास्त्रं यथाकर्तव्यं बुद्धौ | अर्थ कहूँगा; क्योंकि वह [ ऋत ] सुपरिनिश्चितमर्थं तदपि त्वद- |


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२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ धीनत्वात्त्वामेव वदिष्यामि । | तुम्हारे ही अधीन है । वाक् और सत्यमिति स एव वाक्कायाभ्यां | शरीरसे सम्पादन किया जानेवाला संपाद्यमानः, सोऽपि त्वदधीन | वह अर्थ ही सत्य कहलाता है, वह एव संपाद्य इति त्वामेव सत्यं | भी तुम्हारे ही अधीन सम्पादन किया वदिष्यामि । | जाता है; अतः तुम्हींको मैं सत्य | कहूँगा । तत्सर्वात्मकं वाय्वाख्यं ब्रह्म | वह वायुसंज्ञक सर्वात्मक ब्रह्म मयैवं स्तुतं सन्मां विद्यार्थिनम- | मेरेद्वारा इस प्रकार स्तुति किये वतु विद्यासंयोजनेन । तदेव | जानेपर मुझ विद्यार्थीको विद्यासे ब्रह्म वक्तारमाचार्यं वक्तृत्व- | युक्त करके रक्षा करे । वही ब्रह्म सामर्थ्यसंयोजनेनावतु । अवतु | वक्ता आचार्यको वक्तृत्वसामर्थ्यसे मामवतु वक्तारमिति पुनर्वचन- | युक्त करके उसकी रक्षा करे । मेरी | रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे-इस मादरार्थम् । ॐ शान्तिः शान्तिः | प्रकार दो बार कहना आदरके लिये शान्तिरिति त्रिवचनमाध्यात्म- | है । 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः'— काधिभौतिकाधिदैविकानां विद्या- | ऐसा तीन बार कहना विद्याप्राप्तिके | आध्यात्मिक, आधिभौतिक और प्राप्त्युपसर्गाणां प्रशमार्थम् ॥१॥ | आधिदैविक विघ्नोंकी शान्तिके | लिये है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

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द्वितीय अनुवाक शीक्षाकी व्याख्या अर्थज्ञानप्रधानत्वादुपनिषदो | उपनिषद् अर्थज्ञानप्रधान है [ अर्थात् अर्थज्ञान ही इसमें मुख्य है ], अतः इस ग्रन्थके अध्ययनका ग्रन्थपाठे यत्नोपरमो मा भूदिति प्रयत्न शिथिल न हो जाय— इसलिये पहले शीक्षाध्याय आरम्भ किया शीक्षाध्याय आरभ्यते— | जाता है— शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥ हम शीक्षाकी व्याख्या करते हैं । [ अकारादि ] वर्ण, [ उदात्तादि ] स्वर, [ ह्रस्वादि ] मात्रा, [ शब्दोच्चारणमें प्राणका प्रयत्नरूप ] बल, [ एक ही नियमसे उच्चारण करनारूप ] साम तथा सन्तान ( संहिता ) [ ये ही विषय इस अध्यायसे सीखे जाने योग्य हैं ] । इस प्रकार शीक्षाध्याय कहा गया ॥ १ ॥ शिक्षा शिक्ष्यतेऽनयेति वर्णा- | जिससे वर्णादिका उच्चारण सीखा जाय उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं अथवा द्युच्चारणलक्षणम् । शिक्ष्यन्त | जो सीखे जायें वे वर्ण आदि ही शिक्षा हैं । शिक्षाको ही ‘शीक्षा’ इति वा शिक्षा वर्णादयः । कहा गया है । [ शीक्षाशब्दमें शिक्षैव शीक्षा । दैर्घ्यं छान्दसम् । | ईकारका ] दीर्घत्व वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है । उस शीक्षाकी हम तां शीक्षां व्याख्यास्यामो विस्प- व्याख्या करते हैं अर्थात् उसका ष्टमा समन्तात्कथयिष्यामः । | सर्वतोभावसे स्पष्ट वर्णन करते हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[संस्कृत-भाष्यम्] चक्षिङो वा ख्याञादिष्टस्य व्याङ्पूर्वस्य व्यक्तवाक्कर्मण एत- द्रूपम् । तत्र वर्णोऽकारादिः, स्वर उदात्तादिः, मात्रा ह्रस्वाद्याः, बलं प्रयत्नविशेषः, साम वर्णानां मध्य- मवृत्त्योच्चारणं समता, सन्तानः सन्ततिः संहितेत्यर्थः । एष हि शिक्षितव्योऽर्थः । शिक्षा यस्मिन्न- ध्याये सोऽयं शीक्षाध्याय इत्येव- मुक्त उदितः । उक्त इत्युपसं- हारार्थः ॥ १ ॥


[हिन्दी-अनुवाद] 'व्याख्यास्यामः' यह पद 'वि' और 'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'चक्षिङ्' धातुके स्थानमें वैकल्पिक 'ख्याञ्' आदेश करनेसे निष्पन्न होता है । इसका अर्थ स्पष्ट उच्चारण है । तहाँ अकारादि वर्ण, उदात्तादि स्वर, ह्रस्वादि मात्राएँ, [ वर्णोंके उच्चारणमें ] प्रयत्नविशेषरूप बल, वर्णोंको मध्यम वृत्तिसे उच्चारण करनारूप साम अर्थात् समता तथा सन्तान—सन्तति अर्थात् संहिता—यही शिक्षणीय विषय है । शिक्षा जिस अध्यायमें है उस इस शिक्षा-अध्यायका इस प्रकार कथन यानी प्रकाशन कर दिया गया । यहाँ 'उक्तः' पद उपसंहारके लिये है ॥ १ ॥


इति शीक्षावल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक पाँच प्रकारकी संहितोपासना अधुना संहितोपनिषदुच्यते— | अब संहितासम्बन्धिनी उपनिषत् ( उपासना ) कही जाती है— सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासꣳहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः ॥ १ ॥ वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् । अथाधि- ज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथा- धिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ २ ॥ अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳ- संधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथाधिप्रजम् । माता पूर्व- रूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननꣳसंधानम् । इत्यधिप्रजम् ॥ ३ ॥ अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्य- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ध्यात्मम् । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसे- नान्‍नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४ ॥ हम [ शिष्य और आचार्य ] दोनोंको साथ-साथ यश प्राप्त हो और हमें साथ-साथ ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । [ क्योंकि जिन पुरुषोंकी बुद्धि शास्त्राध्ययनद्वारा परिमार्जित हो गयी है वे भी परमार्थतत्त्वको समझनेमें सहसा समर्थ नहीं होते, इसलिये ] अब हम पाँच अधिकरणोंमें संहिताकी * उपनिषद् [ अर्थात् संहितासम्बन्धिनी उपासना ] की व्याख्या करेंगे । अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म—ये ही पाँच अधिकरण हैं । पण्डितजन उन्हें महासंहिता कहकर पुकारते हैं । अब अधिलोक ( लोकसम्बन्धी ) दर्शन ( उपासना ) का वर्णन किया जाता है—संहिताका प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आकाश है ॥ १ ॥ और वायु सन्धान ( उनका परस्पर सम्बन्ध करनेवाला ) है [ अधिलोक-उपासकको संहितामें इस प्रकार दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिलोक दर्शन कहा गया । इसके अनन्तर अधिज्योतिष दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण अग्नि है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आप ( जल ) है और विद्युत् सन्धान है [ अधिज्योतिष-उपासकको संहितामें ऐसी दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिज्योतिष दर्शन कहा गया । इसके पश्चात् अधिविद्य दर्शन कहा जाता है—इसकी संहिताका प्रथम वर्ण आचार्य है ॥ २ ॥ अन्तिम वर्ण शिष्य है, विद्या सन्धि है और प्रवचन ( प्रश्नोत्तर- रूपसे निरूपण करना ) सन्धान है [—ऐसी अधिविद्य-उपासकको दृष्टि

  • 'संहिता' शब्दका अर्थ सन्धि या वर्णोंका सामीप्य है । भिन्न-भिन्न वर्णोंके मिलनेपर ही शब्द बनते हैं; उनमें जब एक वर्णका दूसरे वर्णसे योग होता है तो उन पूर्वोत्तर वर्णोंके योगको 'सन्धि' कहते हैं और जिस शब्दोच्चारण-सम्बन्धी प्रयत्नके योगसे सन्धि होती है उसे 'सन्धान' कहा जाता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९ करनी चाहिये ] । यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया । इससे आगे अधिप्रज दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण माता है, अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा ( सन्तान ) सन्धि है और प्रजनन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) सन्धान है [—अधिप्रज-उपासकको ऐसी दृष्टि करनी चाहिये ] । यह प्रजासम्बन्धी उपासनाका वर्णन किया गया ॥ ३ ॥ इसके पश्चात् अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—इसमें संहिताका प्रथम वर्ण नीचेका हनु ( नीचेके होठसे ठोडीतकका भाग ) है, अन्तिम वर्ण ऊपरका हनु ( ऊपरके होठसे नासिकातकका भाग ) है, वाणी सन्धि है और जिह्वा सन्धान है [—ऐसी अध्यात्म-उपासकको दृष्टि करनी चाहिये ] । यह अध्यात्मदर्शन कहा गया । इस प्रकार ये महासंहिताएँ कहलाती हैं । जो पुरुष इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओंको जानता है [ अर्थात् इस प्रकार उपासना करता है ] वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज, अन्न और स्वर्गलोकसे संयुक्त किया जाता है । [ अर्थात् उसे इन सबकी प्राप्ति होती है ] ॥ ४ ॥ तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञा- | उस संहितादि उपनिषद् [ अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी ननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्ना- | उपासना ] के परिज्ञानके कारण जिस यशकी याचना की जाती है वावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवा- | वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा स्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं | उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्य- | वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्य- वचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थ- | का वाक्य है; क्योंकि अकृतार्थ होनेके कारण शिष्यके लिये ही त्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । | प्रार्थना करना सम्भव भी है— आचार्यके लिये नहीं; क्योंकि वह कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो | कृतार्थ होता है । जो पुरुष कृतार्थ होता है वही आचार्य कहलाता है । नाम भवति । |

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३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[वाम स्तम्भ / मूल संस्कृत भाष्य]

अथानन्तरमध्ययनलक्षणवि- धानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थ- भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थ- ज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणे- ष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः । कानि तानीत्याह—अधिलोकं लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् । तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज- मध्यात्ममिति । ता एताः पञ्च- विषया उपनिषदो लोकादिमहा- वस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च महत्यश्च ताः संहिताश्च महा- संहिता इत्याचक्षते कथयन्ति वेदविदः । अथ तासां यथोपन्यस्ताना- मधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शन-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]

'अथ' अर्थात् पहले कहे हुए अध्ययनरूप विधानके अनन्तर, 'अतः'—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको सहसा अर्थज्ञान [ को ग्रहण करने ] में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता, इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी संहितोपनिषद् अर्थात् संहिता- सम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण —आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें व्याख्या करेंगे [ तात्पर्य यह कि वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके ज्ञान बतलावेंगे ] । वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं ? सो बतलाते हैं—'अधिलोक'—जो दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक कहते हैं । इसी प्रकार अधिद्यौतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषय- सम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महा- वस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती संहिता अर्थात् 'महासंहिता' कहकर पुकारते हैं । अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच प्रकारकी उपासनाओं) मेंसे पहले अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है ।


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