वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२३ प्रशस्तपादभाष्यम् विशेषदर्शनजमवधारणज्ञानं संशयविरोधी निर्णयः । एतदेव प्रत्यक्षमनुमानं वा । यद् विशेषदर्शनात् संशयविरोध्युत्पद्यते । विशेषविषयक ज्ञान से उत्पन्न एवं संशय का विरोधी 'अवधारण' रूप ज्ञान ही 'निर्णय' है। प्रत्यक्ष और अनुमिति दोनों निर्णय रूप ही न्यायकन्दली प्रमाणेतरसामान्यास्थितेरन्यधियो गतेः । प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचित् ॥ इति । प्रमाणतदभावसामान्यव्यवस्थापनात्, परबुद्धेरधिगमात्, कस्यचिद्धर्मस्य प्रतिषेधाच्च प्रत्य- क्षात् प्रमाणान्तरस्य स्वभावकार्यानुपलब्धिलिङ्गस्यानुमानस्य सद्भाव इति वार्तिकार्थ इति । निर्णयं केचित् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रमाणान्तरमिच्छन्ति, तान् प्रत्याह-विशेषदर्श- नजमित्यादि । यत्र विशेषानुपलम्भात् संशयः सञ्जातः, तत्र विशेषदर्शनाज्जायमानमव- धारणज्ञानं निर्णयः । स च संशयविरोधी, तस्मिन्नुपजायमाने संशयस्योच्छेदात् । यथाह मण्डनो विभ्रमविवेके- निश्चिते न खलु स्थाणावूर्ध्वत्वेन विशेरते ॥ इति । संशेरत इत्यर्थः । यद्यपि सर्वमेव निश्चयात्मकं ज्ञानं निर्णयः, तथापि संशयोत्तरकालभावित्वेन प्रसिद्धिप्राबल्यात् संशयविरोधीत्युक्तम्-त्योक्तं 'प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, अनुमानादि नहीं' इस प्रकार प्रत्यक्ष के प्रामाण्य की सत्ता से एवं अनुमानादि के प्रामाण्य की असत्ता से, दूसरे पुरुष में रहनेवाली बुद्धियों को समझने से एवं घटादि किसी भी विषय के प्रतिषेध से यह समझते हैं कि 'प्रत्यक्ष से भिन्न और भी प्रमाण हैं' । उक्त वार्त्तिक का अभिप्राय है कि प्रमाण और प्रमाणाभाव की व्यवस्था से, दूसरे पुरुष की बुद्धि को समझने से एवं किसी वस्तु के प्रतिषेध से समझते हैं कि प्रत्यक्ष से भिन्न कोई दूसरा प्रमाण अर्थात् स्वभावलिङ्गक, कार्यलिङ्गक एवं अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमान प्रमाण भी अवश्य है । किसी सम्प्रदाय के लोग प्रत्यक्ष और अनुमान से भिन्न एक 'निर्णय' नाम का अलग प्रमाण मानने की अभिलाषा रखते हैं । उन्हीं लोगों के मत का खण्डन करने के लिए 'विशेषदर्शनजम्' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । जहाँ असाधारण धर्म की अनुपलब्धि से संशय हो चुका है, वहाँ विशेषधर्म (असाधारण धर्म) की उपलब्धि से उत्पन्न होनेवाला अवधारणात्मक ज्ञान ही 'निर्णय' है । यह संशय का प्रतिबन्धक है; क्योंकि इसके उत्पन्न होते ही संशय छूट जाता है । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने विभ्रमविवेक नामक ग्रन्थ में कहा है कि- (पुरोवर्त्ति पदार्थ का) जब 'यह स्थाणु है' इस आकार से निश्चय हो जाता है, तब फिर उसकी उँचाई (साधारण धर्म ) के ज्ञान से "यह स्थाणु है ? या पुरुष ?" इस आकार का संशय किसी को भी नहीं होता । (उक्त आधे श्लोक में
६२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे निर्णय- प्रशस्तपादभाष्यम् स प्रत्यक्षनिर्णयः । यथा स्थाणुपुरुषयोरूर्ध्वतामात्रसादृश्यालोचनाद् विशेषेष्व- प्रत्यक्षेष्ूभयविशेषांनुस्मरणात्, किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशयोत्पत्तौ शिरःपाण्यादिदर्शनात् पुरुष एवायमित्यवधारणज्ञानं प्रत्यक्षनिर्णयः । विषाणमात्रदर्शनाद् गौर्गवयो वेति संशयोत्पत्तौ सास्नामात्रादर्शनाद् गौरेवाय- मित्यवधारणज्ञानमनुमाननिर्णय इति । होते हैं। अतः १. प्रत्यक्षनिर्णय और २. अनुमाननिर्णय भेद से निर्णय दो प्रकार का है । १. (धर्मी के असाधारण धर्मरूप) विशेष के प्रत्यक्ष से जो संशय का विरोधी ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'प्रत्यक्षनिर्णय' कहते हैं । जैसे कि स्थाणु और पुरुष दोनों में साधारणरूप से रहनेवाली उच्चता (ऊँचाई) रूप सादृश्य के आलोचन (साधारण) ज्ञान से एवं स्थाणु और पुरुष दोनों के असाधारण धर्मों के ज्ञात न रहने के कारण केवल उन दोनों के असाधारण धर्मरूप विशेषों के स्मरण से, यह स्थाणु है ? या पुरुष ?' इस आकार के संशय की उत्पत्ति होती है । इसके बाद (केवल पुरुष में ही रहनेवाले शिर, पैर प्रभृति) पुरुष के असाधारण धर्मों के देखने से 'यह पुरुष ही है' इस आकार का जो निश्चयरूप ज्ञान उत्पन्न होता है, वही 'प्रत्यक्षनिर्णय' है । २. केवल सींग के देखने के कारण यह संशय होता है कि 'यह गो है या गवय ?' (इसके बाद केवल गाय में ही रहनेवाली) सास्ना के देखने से जो 'यह गाय ही है' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वही 'अनुमाननिर्णय' है । न्यायकन्दली सङ्ग्रहवाक्यं विवृण्वन्निर्णयस्य प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भावं दर्शयति-एतदेवेत्यादि । प्रत्यक्षविषये यदवधारणात्मकं ज्ञानं स प्रत्यक्षनिर्णयः । यच्चानुमानविषयेऽवधारणज्ञानं सोऽनुमाननिर्णय इति उपरितनेन ग्रन्थसन्दर्भेण कथयति । प्रयुक्त) 'विशेरते' इस पद का अर्थ है 'संशेरते' अर्थात् संशय का होना । यद्यपि सभी प्रकार के निश्चयात्मक ज्ञान निर्णय हैं, फिर भी संशय के बाद होनेवाले निश्चयात्मक ज्ञान में ही 'निर्णय' शब्द का अधिकतर प्रयोग होता है, अतः निर्णय के लक्षणवाक्य में 'संशयविरोधि' पद का प्रयोग किया गया है । 'एतदेव' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अपने ही संक्षिप्त लक्षणवाक्य की व्याख्या करते हुए भाष्यकार ने 'निर्णय' का प्रत्यक्ष और अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है। ऊपर कहे हुए सन्दर्भ का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का अवधारणात्मक ज्ञान 'प्रत्यक्षनिर्णय' है एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का जो अवधारणात्मक ज्ञान वह 'अनुमाननिर्णय' है ।
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ६२५
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ६२५ प्रशस्तपादभाष्यम् लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरणायपेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषात् पट्वभ्यासादरप्रत्ययजनिताच्च संस्काराद् दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु लिङ्ग (हेतु) के दर्शन एवं इच्छा, स्मृति प्रभृति (उद्बोधकों) से साहाय्य- प्राप्त आत्मा और मन के विशेष प्रकार के संयोग और संस्कार इन दोनों से उत्पन्न ज्ञान ही स्मृति है । यह प्रत्यक्ष, अनुमिति एवं शाब्द- बोध के द्वारा ज्ञात विषयों की होती है, अतः स्मृति अतीतविषयक ही न्यायकन्दली स्मृतिक्षणां विद्यामाचष्टे - लिङ्गदर्शनेच्छेत्यादिना । लिङ्गदर्शनं चेच्छानुस्मरणं च । आदिशब्देन न्यायसूत्रोक्तानि प्रणिधानादीनि संगृह्यन्ते, तान्यपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगवि- शेषादिति स्मृतिकारणकथनम् । आत्ममनःसंयोगस्य च लिङ्गदर्शनादिसहकारितैव विशेषः, केवलादस्मात् स्मरणानुत्पत्तेः । लिङ्गदर्शनवत् संस्कारोऽपि स्मृतेर्निमित्तकारणमित्याह- पट्वभ्यासादरप्रत्ययजनितात् संस्काराज्जायते पटुप्रत्ययः स्फुटतरप्रत्ययस्तस्मात् संस्कारो जायते । तेन गच्छतृणसंस्पर्शज्ञानात् क्वचित् पटुप्रत्ययोत्पादेऽपि ग्रहणयोग्यः संस्कारो न भवति । यथा साक्षात् पठितेऽनुवाके । तेन गृहीतस्यावृत्त्या पुनःपुनर्ग्रहणलक्षणोऽभ्यासः संस्कारकारणम्, तस्मिन् सत्यनुवाकस्य ग्रहणदर्शनात् । 'लिङ्गदर्शनेच्छा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'स्मृति' रूप विद्या (प्रमा) का निरूपण करते हैं । (उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरण' शब्द से) 'लिङ्गदर्शनञ्च, इच्छा च, अनुस्मरणञ्च' इस व्युत्पत्ति के अनुसार, लिङ्गज्ञान, इच्छा और बार-बार स्मरण को एवं उक्त वाक्य में ही प्रयुक्त 'आदि' शब्द से न्यायसूत्र (अ. ३, आ. २, सू. ४४) में कथित स्मृति के प्रणिधानादि कारणों को संगृहीत समझना चाहिए । 'तान्यपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगविशेषात्' इस पूर्वानुवृत्तिवाक्य से स्मृति का कारण प्रदर्शित हुआ है। आत्मा और मन के संयोग को स्मृति के उत्पादन में जो कथित 'प्रणिधानादि' सहायकों की अपेक्षा होती है, वही उस संयोग का 'विशेष' है (जो प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त 'संयोगविशेष' शब्द के द्वारा व्यक्त किया गया है ); क्योंकि (प्रणिधानादि के न रहने पर) केवल आत्मा और मन के संयोग से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती है । 'पट्वभ्यासादरप्रत्ययजनितात् संस्कारात्' इस वाक्य के द्वारा लिङ्गदर्शन की तरह संस्कार में भी स्मृति की निमित्तकारणता कही गयी है । 'पटुप्रत्यय' शब्द का अर्थ है स्फुटतर (उपेक्षान्य) प्रत्यय, उससे ही संस्कार की उत्पत्ति होती है । 'पटुप्रत्यय' शब्द का स्फुटतर प्रत्यय रूप अर्थ इसलिए कर दिया गया है कि राह चलते हुए पुरुष को किसी तृण के स्पर्श का यद्यपि पटुप्रत्यय होता है, फिर भी उससे स्मृति के उत्पादन में क्षम
६२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्मृति- प्रशस्तपादभाष्यम् शेषानुव्यवसायेच्छानुस्मरणद्वेषहेतुरतीतविषया स्मृतिरिति । होती है । (स्मृतिजनक) उक्त संस्कार अत्यन्त स्फुटज्ञान, अभ्यास और आदर से उत्पन्न होता है । वह (स्मृतिरूप ज्ञान) अनुमिति, इच्छा, स्मृति और द्वेष का (उत्पादक) कारण है । न्यायकन्दली क्वचिच्चात्यन्ताश्चर्यतरे वस्तुनि सकृदुपलब्धे कालान्तरे स्मृतिदर्शनादादरग्रहणमपि संस्कार- निमित्तम् । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विषयसङ्कीर्तनं कृतम् । दृष्टेष्विति प्रत्यक्षीकृतेषु, श्रुतेष्विति शब्दावगतेषु, अनुभूतेष्व नुमितेष्वित्यर्थः । शेषानुव्य- वसायेच्छास्मरणद्वेषहेतुरिति कार्यनिरूपणम्। शिष्यते परिशिष्यते इति 'शेषः'। 'अनु' पश्चा- द्व्यवसितिः व्यवसायः । शेषश्चासावनुव्यवसायश्चेति शेषानुव्यवसायः, प्रथमोपजातलिङ्गज्ञाना- पेक्षया तदनन्तर्भाव्यनुमेयज्ञानम्,तस्य हेतुर्व्याप्तिस्मरणम्। सुखसाधनत्वस्मृतिरिच्छाहेतुः । प्रथम- संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती है । जैसे कि पढ़े हुए भी अनुवाक के अध्ययन से स्मृतिक्षम संस्कार की उत्पत्ति होती है । इसकी पदप्रत्यय की 'आवृत्ति' अर्थात् बारबार ग्रहणरूप 'अभ्यास' भी संस्कार का कारण है; क्योंकि अभ्यास के रहने पर ही अनुवाक का स्मरण होता है । किसी अत्यन्त अद्भुत वस्तु को एक बार देखने पर बहुत समय बाद भी उसकी स्मृति होती है, अतः 'आदरपूर्वक ग्रहण' भी संस्कार का कारण है । किन प्रकार की वस्तुओं की स्मृति होती है ? इस प्रश्न का उत्तर 'दृष्टानुभूतेषु' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । 'दृष्टेषु' अर्थात् प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात वस्तुओं की, 'श्रुतेषु' अर्थात् शब्द प्रमाण के द्वारा ज्ञात विषयों की, 'अनुभूतेषु' अर्थात् अनुमान प्रमाण के द्वारा ज्ञात विषयों की, स्मृति उत्पन्न होती है । 'शेषानुव्यवसायेच्छास्मरणद्वेषहेतुः' इस वाक्य के द्वारा स्मृति से होनेवाले कार्य दिखलाये गये हैं । प्रकृत 'शेष' शब्द 'शिष्यते परिशिष्यते इति शेषः' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है । एवं प्रकृत 'अनुव्यवसाय' शब्द 'अनु पश्चात् व्यवसितिरनुव्यवसायः' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । एवं 'शेषानुव्यवसाय' शब्द 'शेषश्चानुव्यवसायश्च' इस (कर्म- धारय) समास से बना है । फलतः प्रकृत में 'शेष' और 'अनुव्यवसाय' ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं । (वह अर्थ है) अनुमेय का ज्ञान (अनुमिति); क्योंकि (अनुमिति के लिए प्रथम लिङ्गदर्शन से जो ज्ञानों की परम्परा है उसमें) उक्त प्रथम लिङ्ग की अपेक्षा अनुमेय ज्ञान अर्थात् साध्य का ज्ञान ही 'शेष' है अर्थात् अन्तिम है, एवं वह 'अनुव्यवसाय' भी है; क्योंकि लिङ्गज्ञान-रूप व्यवसाय के बाद उत्पन्न होता है । इस प्रकार शेषानुव्यवसाय भी अर्थात् अनुमिति भी स्मृति का कार्य है; क्योंकि उक्त शेषानुव्यवसाय की उत्पत्ति व्याप्ति की स्मृति से होती है । किसी भी वस्तु में 'इससे सुख होगा' इस प्रकार की स्मृति के रहने पर उस विषय की इच्छा उत्पन्न होती है, अतः स्मृति इच्छा का भी कारण है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२७ प्रशस्तपादभाष्यम् आम्नायविधातॄणामृषीणाम् अतीतानागतवर्तमानैष्वतीन्द्रियेष्वर्थेषु वेदों की रचना करनेवाले महर्षियों को उनके विशेष प्रकार के पुण्य से आगमग्रन्थों में कहे हुए या उनमें न कहे हुए भूत, भविष्य न्यायकन्दली पदस्मृतिर्द्वितीयपदानुस्मरणहेतुः । दुःखसाधकस्मरणं द्वेषहेतुः । तदित्येव स्मृतेराकारः, तत्र चार्थस्यातीतत्वं पूर्वानुभूतत्वं प्रतीयत इत्यतीतविषया स्मृतिः । अत एव न प्रमाणम्, तस्याः पूर्वानुभवविषयस्योपदर्शनेनार्थं निश्चिन्वत्या अर्थपरिच्छेदे पूर्वानुभवपारतन्त्र्यात् । अनुमानज्ञानं तूत्पत्तौ परापेक्षम्, स्वविषये स्वतन्त्रमेव, स्मृतिरिव । तस्मात् पूर्वानुभ- वानुसन्धानेनार्थप्रतीत्यभावात् । यथाहूस्तन्त्रटीकायां सर्वोत्तरबुद्धयो गुरवः - पूर्वविज्ञानविषयं विज्ञानं स्मृतिरुच्यते । पूर्वज्ञानाद् विना तस्याः प्रामाण्यं नावगम्यते ॥ इति । यथा चेदमाहुः कारिकायाम्- तत्र यत् पूर्वविज्ञानं तस्य प्रामाण्यमिष्यते । तदुपस्थानमात्रेण स्मृतेश्च चरितार्थता ॥ इति । एक वाक्य में प्रयुक्त एक पद की स्मृति से उसी वाक्य में प्रयुक्त दूसरे पद की 'पश्चात्स्मृति' की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार स्मृति 'अनुस्मरण' का भी कारण है । दुःख देनेवाली किसी वस्तु का स्मरण उस वस्तु में 'द्वेष' का भी कारण है । 'वह था' स्मृति का यही आकार होता है । इस आकार से स्मृति के विषय का अतीत होना और पहले से अनुभूत होना लक्षित होता है, अतः भाष्यकार ने स्मृति को 'अतीतविषया' कहा है । यही कारण है कि स्मृति को प्रमाण नहीं माना जाता; क्योंकि वह पूर्व में अनुभूत विषय को ही पुनः निश्चित करती है, अतः स्मृति अपने विषय को निश्चित करने में अपने कारण पूर्वानुभव के अधीन है । यद्यपि अनुमिति भी अपनी उत्पत्ति के लिए परामर्शादि दूसरे ज्ञानों के अधीन है; किन्तु साध्यरूप अपने असाधारण विषय के ज्ञापन में उसे किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं है (अतः अनुमान उत्पत्ति में परापेक्ष होने पर भी ज्ञप्ति में परापेक्ष नहीं है, अतः वह प्रमाण है); क्योंकि अनुमिति से साध्य की प्रतीति में स्मृति की तरह किसी (स्वविषयविषयक) पूर्वानुभव की अपेक्षा नहीं है । जैसा कि तन्त्रटीका में लोकोत्तर बुद्धिमान् गुरु ने कहा है कि- जिस विज्ञान में पूर्वानुभव का विषय ही विषय हो उसी विज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं, उस पहले ज्ञान के प्रामाण्य के बिना स्मृति प्रमाण नहीं होती । उन्होंने ही (श्लोकवार्तिक में इस प्रसङ्ग में) कहा है कि 'कारणीभूत पूर्वानुभव में जो प्रामाण्य है, उसी का व्यवहार स्मृति से होता है, स्मृति का इतना ही काम है कि अपने कारणीभूत पूर्व विज्ञान के विषय को उपस्थित कर दे ।
६२८ न्यायकन्दलीसम्बलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे आर्षज्ञान- प्रशस्तपादभाष्यम् धर्मादिषु ग्रन्थोपनिबद्वेष्वनुपनिबद्धेषु चात्ममनसोः संयोगाद् धर्मविशेषाच्च यत् प्रातिभं यथार्थनिवेदनं ज्ञानमुत्पद्यते तदार्षमित्याचक्षते । तत् तु प्रस्तारेण देवर्षीणाम्, कदाचिदेव लौकिकानाम्, यथा कन्यका ब्रवीति 'श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयति' इति । और वर्त्तमान (तीनों कालों में से किसी में भी रहनेवाले) अतीन्द्रिय धर्मादिविषयक एवं उनके स्वरूप का परिचायक जो 'प्रातिभ' ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'आर्ष' कहते हैं । यह प्रायः देवताओं और महर्षियों को ही होता है । कदाचित् ही साधारण जन को यह ज्ञान होता है । जैसे कि बालिका कहती है कि, 'मेरा मन कहता है कि कल मेरे भाई आयेंगे' । न्यायकन्दली ये त्वनर्थजत्वात् स्मृतेरप्रामाण्यमाहुः, तेषामतीतानागतविषयस्यानुमानस्याप्रामाण्यं स्या- दिति दूषणम् । आर्षं व्याचष्टे—आम्नायविधातॄणामिति । आम्नायो वेदस्तस्य विधातारः कर्तारो ये ऋषयस्तेषामतीतेष्वनागतेषु वर्तमानेष्वतीन्द्रियेषु धर्माधर्मदिक्कालप्रभृतिषु ग्रन्थोपनिबद्वेष्वा- गमप्रतिपादितेष्वनुपनिबद्धेष्वगामप्रतिपादितेषुचात्ममनसोः संयोगाद्यत् प्रातिभं ज्ञानं यथार्थ- निवेदनं यथास्वरूपसंवेदनं संशयविपर्ययरहितं ज्ञानमुत्पद्यते तदार्षमित्याचक्षते विद्वांसः । इन्द्रियलिङ्गाद्यभावे यदर्थप्रतिभानं सा प्रतिभा, प्रतिभैव प्रातिभमित्युच्यते तत्रभवद्भिः । जो सम्प्रदाय स्मृति को इस हेतु से अप्रमाण मानते हैं कि वह अर्थजनित नहीं है (अर्थात् उसके अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय की सत्ता नहीं रहती है, अतः वह प्रमाण नहीं है) उनके मत में भूत और भविष्यविषयक अनुमान में अप्रामाण्य रूप दोष होगा । 'आम्नायविधातॄणाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'आर्ष' विद्या की व्याख्या करते हैं । वेदों को 'आम्नाय' कहते हैं । उसके जो 'विधातागण' अर्थात् रचना करनेवाले ऋषि लोग, उन्हें अतीत, अनागत और वर्त्तमान काल की 'अतीन्द्रिय' वस्तुओं का अर्थात् धर्म, अधर्म एवं दिशा और काल प्रभृति पदार्थों का, एवं 'ग्रन्थोपनिबद्ध' अर्थात् आगमों के द्वारा कथित, एवं 'ग्रन्थानुपनिबद्ध' अर्थात् आगम के द्वारा अप्रतिपादित अर्थों का जो आत्मा और मन के संयोग से 'प्रातिभ' 'यथार्थनिवेदन' रूप अर्थात् संशय और विपर्यय से भिन्न विषयानुGeneric ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे विद्वान् लोग 'आर्ष' कहते हैं । इन्द्रिय एवं हेतु प्रभृति यथार्थज्ञान के साधनों के न रहते हुए भी जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'प्रतिभा' कहते हैं । इस 'प्रतिभा' को ही आदरणीय विद्वद्गण 'प्रातिभ'
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२९ प्रशस्तपादभाष्यम् सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम्, कस्मात् ? प्रयत्नपूर्वकमञ्जन- पादलेपखड्गगुलिकादिसिद्धानां दृश्यद्रष्टॄणां सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टे- ष्वर्थेषु यद् दर्शनं तत् प्रत्यक्षमेव । अथ दिव्यान्तरिक्षभौमानां प्राणिनां (सिद्धजनों के अस्मदादि से विलक्षण ज्ञानरूप) 'सिद्धदर्शन' नाम का कोई (प्रत्यक्ष और अनुमिति से) भिन्न ज्ञान नहीं है; क्योंकि यत्नपूर्वक (विशेष प्रकार के) अञ्जन, पैर में विशेष प्रकार के लेप, खड्ग, गुलिका (आदि पद से मण्डूकवसाञ्जन) से (विशेषदर्शन का सामर्थ्यरूप) सिद्धि से युक्त पुरुषों को सूक्ष्म, व्यवहित एवं अत्यन्त दूर की वस्तुओं का जो (अस्मदादिविलक्षण) ज्ञान उत्पन्न होता है, वह प्रत्यक्ष ही है । दिव्यलोक, न्यायकन्दली तस्योत्पत्तिरनुपपन्ना कारणाभावादित्यनु(प)योगे सति इदमुक्तम्-धर्मविशेषादिति । विशिष्यत इति विशेषः, धर्म एव विशेषो धर्मविशेषः, विद्यातपःसमाधिजः प्रकृष्टो धर्मस्तस्मात् प्रतिभोदयः । तत्तु प्रस्तारेण बाहुल्येन देवर्षीणां भवति, कदाचिदेव लौकिकानामपि । यथा कन्यका ब्रवीति-श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयतीति । न चेदं संशयः, उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । न च विपर्ययः, संवादादतः प्रमाणमेव । सिद्धदर्शनमपि विद्यान्तरमिति केचिदिच्छन्ति तन्निवृत्त्यर्थमाह-सिद्ध- दर्शनं न ज्ञानान्तरम् । एतदेवोपपादयति-कस्मादित्यादिना । प्रयत्नपूर्वक- कहते हैं । इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप कर सकता है कि (यदि इन्द्रिय या लिङ्ग उसका कारण नहीं है तो फिर) कारण के न रहने से उसकी आपत्ति ही सम्भव नहीं है ? इसी आक्षेप का समाधान 'धर्मविशेषात्' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । 'विशिष्यत इति विशेषः, धर्म एव विशेषः धर्मविशेषः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विद्या, तपस्या और समाधि से उत्पन्न प्रकृष्टधर्म ही उक्त 'धर्मविशेष' शब्द का अर्थ है । इस प्रकृष्टधर्म से ही प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । 'तत्तु प्रस्तारेण' अर्थात् यह प्रातिभ ज्ञान 'प्रस्तार' से अर्थात् अधिकतर देवर्षियों को ही होता है । लौकिक व्यक्तियों (साधारण मनुष्यों) को कदाचित् ही होता है । जैसे कि कभी कोई बालिका कहती है कि 'मेरा मन कहता है, कल मेरे भैया आयेंगे' यह ज्ञान संशयरूप नहीं है; क्योंकि इसमें उभय कोटि का सम्बन्ध नहीं है । यह विपर्यय भी नहीं है; क्योंकि इस ज्ञान के अनुसार काम देखा जाता है । किसी सम्प्रदाय के लोग 'सिद्धदर्शन' नाम का एक अलग प्रमाज्ञान मानते हैं, उन लोगों के मत का खण्डन ही 'सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम्' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । 'कस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं । 'प्रयत्न-
पादलेपादि के द्वारा) विशेष सामर्थ्यरूप 'सिद्धि' को प्राप्त करते हैं, तो वे
६३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे सिद्धदर्शन- प्रशस्तपादभाष्यम् ग्रहनक्षत्रसञ्चारादिनिमित्तं धर्माधर्मविपाकदर्शनमिष्टम्, तदप्यनुमानमेव । अथ लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तदपि प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतमित्येवं बुद्धिरिति । अनुग्रहलक्षणं सुखम् । स्रगाद्यभिप्रेतविषयसान्निध्ये सतीष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् धर्माद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद- अन्तरिक्षलोक तथा भूलोक में रहनेवाले प्राणियों को ग्रहों और नक्षत्रों की विशेष प्रकार की गति देखकर जो धर्म, अधर्म और उनके परिणामों का (अस्मदादि से विलक्षण) ज्ञान होता है, उसे भी यदि सिद्धदर्शन कहना इष्ट हो तो वह भी वस्तुतः अनुमान ही है । यदि हेतु की अपेक्षा के बिना ही धर्म (अधर्म एवं इनके परिणामों) का ज्ञान मानें (तो वे यह अनुमान नहीं होंगे), फिर भी प्रत्यक्ष या आर्षज्ञान में अन्तर्भूत हो जायेंगे । इस प्रकार विद्यारूप बुद्धि (मूलतः चार प्रकार की ही) है । जिसका अनुभव अनुकूल जान पड़े वही 'सुख' है । (विशदार्थ यह है कि) माला प्रभृति अभिप्रेत विषयों का सान्निध्य होने पर (मालादि उन) न्यायकन्दली मञ्जनपादलेपादिसिद्धानां दृश्यानां दर्शनयोग्यानां स्वरूपवतां पदार्थानां द्रष्टारो ये ते 'सिद्धाः' उच्यन्ते । तेषां दृश्यद्रष्टृणामञ्जनादिसिद्धानां सूक्ष्मेषु व्यवहितेषु विप्रकृष्टेषु यद् दर्शनमिन्द्रिया- धीनानुभवस्तत् प्रत्यक्षमेव । अथ दिव्यान्तरिक्षभौमानां प्राणिनां ग्रहनक्षत्रसञ्चारनिमित्तं धर्माधर्मविपाकदर्शनं सिद्धज्ञानमिष्टं तदप्यनुमानमेव, ग्रहसञ्चारादीनां लिङ्गत्वात् । अथ लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तत् प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतम् । यदि धर्मादिदर्शन- पूर्वकमञ्जनपादलेपादिसिद्धानाम्' इत्यादि सन्दर्भ में प्रयुक्त 'दृश्यद्रष्टृणाम्' इस पद की यह व्युत्पत्ति है कि 'दृश्यानां ये द्रष्टारः, तेषां दृश्यद्रष्टृणाम्' । इस व्युत्पत्ति के अनुसार देखने योग्य (घटादि स्थूल) वस्तुओं के देखनेवाले पुरुष ही उक्त 'दृश्यद्रष्टृ' शब्द से अभिप्रेत हैं । वे ही जब प्रयत्नपूर्वक (मण्डूकवसाञ्जन, पादलेपादि के द्वारा) विशेष सामर्थ्यरूप 'सिद्धि' को प्राप्त करते हैं, तो वे 'सिद्ध' कहलाते हैं । उन्हें भी जो अत्यन्त सूक्ष्म या दीवाल प्रभृति से घिरे हुए या अतिदूर की वस्तुओं का इन्द्रियों से अनुभव होता है, वह तो 'प्रत्यक्ष' ही है, यदि 'सिद्धदर्शन' शब्द से धर्म, अधर्म और उनके विपाकों के वे ज्ञान ही अभीष्ट हों, जो दिव्यलोक में, अन्तरिक्षलोक में या भूमि में रहनेवाले सिद्धों को ग्रहसञ्चारादि को समझकर होता है, तो फिर ये सिद्धदर्शनरूप सभी ज्ञान अनुमान ही हैं; क्योंकि इनकी उत्पत्ति ग्रहसञ्चारादि लिङ्गों से
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६३१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६३१ प्रशस्तपादभाष्यम् नुग्रहाभिष्यङ्गनयनादिप्रसादजनकमुत्पद्यते तत् सुखम् । अतीतेषु विषयेषु स्मृतिजम् । अनागतेषु सङ्कल्पजम् । यत्तु विदुषामसत्सु इष्ट विषयों का ज्ञान , उन विषयों के साथ (त्वक्, घ्राणादि) इन्द्रियों के सन्निकर्ष, एवं धर्म से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग इन सबों से सुख की उत्पत्ति होती है। यह (सुख स्वविषयक ज्ञान रूप) अनुग्रह, अनुराग एवं नयन (मुख) प्रभृति की विमलता इन सबों का कारण है। बीते हुए विषयों का सुख उन विषयों की स्मृति से उत्पन्न होता है एवं होनेवाले न्यायकन्दली मिन्द्रियजं तदा प्रत्यक्षम् । अथेन्द्रियानपेक्षं तदार्षमित्यर्थः । उपसंहरति- एवं बुद्धिरिति । एवमन्तरोक्तेन क्रमेण । बुद्धिरिति बुद्धिव्याख्यातेत्यर्थः । इतिशब्दः परिसमाप्तिं सूचयति । बुद्धिकार्यत्वात् सुखं बुद्धयनन्तरं व्याचष्टे-अनुग्रहलक्षणं सुखमिति । अनुगृह्यतेऽनेनेत्यनुग्रहः, अनुग्रहलक्षणमनुग्रहस्वभावमित्यर्थः । सुखं ह्यनुकूल- स्वभावतया स्वविषयमनुभवं कुर्वन् पुरुषान्तरमनुगृह्णाति । एतदेव व्याचष्टे- स्रगादीति । स्रक्चन्दनवनितादयो येऽभिप्रेता विषयास्तेषां सन्निध्ये सति होती है । (अतः धर्मादि के उक्त ज्ञान अनुमान में अन्तर्भूत हो जाते हैं) । 'अर्थलिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनामष्टं तत्प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतम्' अर्थात् यदि धर्माधर्मादि के उक्त ज्ञान इन्द्रियों से होते हैं, तो वे प्रत्यक्ष ही हैं। यदि उन ज्ञानों को इन्द्रियों की अपेक्षा नहीं है,तो फिर वे 'आर्षज्ञान' ही हैं। 'एवं बुद्धिः' इस वाक्य के द्वारा बुद्धि-निरूपण का उपसंहार करते हैं । 'एवम्' अर्थात् कथित क्रम से 'बुद्धिः' अर्थात् बुद्धि की व्याख्या की गयी है । उक्त वाक्य का 'इति' शब्द प्रकरण-समाप्ति का सूचक है । सुख यतः बुद्धि से उत्पन्न होता है, अतः बुद्धि-निरूपण के बाद 'अनुग्रहलक्षणं सुखम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सुख का निरूपण करते हैं । (प्रकृत) सन्दर्भ का 'अनुग्रह' पद 'अनुगृह्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । तदनुसार 'अनुग्रहलक्षण' शब्द का अर्थ है 'अनुग्रहस्वभाव' । सुख स्वभावतः (जीव को प्रिय होने के कारण उसके) अनुकूल है । अतः सुख अपने अनुभव के द्वारा पुरुष को अनुगृहीत करता है। 'स्रगादि' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा इसी की व्याख्या करते हैं । माला, चन्दन, स्त्री प्रभृति जितने भी प्रिय विषय हैं, उनका सान्निध्य रहने पर अर्थात् उनका सम्बन्ध रहने पर, उन अभिप्रेत विषयों की उपलब्धि एवं इन्द्रियों का उन अर्थों के साथ सम्बन्ध प्रभृति कारणों के द्वारा धर्म के साहाय्य से जिसकी उत्पत्ति होती है वही 'सुख' है। विषय अभिप्रेत भी हो उसका सन्निध्य भी हो; किन्तु भोक्ता का चित्त यदि दूसरे विषय
६३२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे सुख- प्रशस्तपादभाष्यम् विषयानुस्मरणेच्छासङ्कल्पेष्वविर्भवति तद् विद्याशमसन्तोषधर्मविशेषनिमित्तमिति । विषयों से यह उन विषयों के संकल्प से उत्पन्न होता है । आत्म- तत्त्वज्ञानियों को जो सुख बिना विषयों के, विषयों के स्मरण के न रहने पर भी बिना इच्छा और बिना संकल्प के ही उत्पन्न होता है, उस पुरुष का आत्मतत्त्वज्ञान, शम, सन्तोष एवं विशेष प्रकार के धर्म उस सुख के कारण हैं । न्यायकन्दली सन्निकर्षे सतीष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् धर्माद्यपेक्षादि यदुत्पद्यते तत्सुखम् । सन्नि- हितेऽप्यभिभतेऽर्थे विषयान्तरव्यासक्तस्य सुखानुत्पादादिष्टोपलब्धेः कारणत्वं गम्यते । वियुक्तस्य सुखाभावाद् विषयसन्निकर्षस्यापि कारणत्वावगमः । धर्मादीत्यादिपदेन स्वस्थता- दिपरिग्रहः । अनुग्रहाभिव्यञ्जनयनादिप्रसादनजनकमिति कार्योपवर्णनम् । अनुग्रहः सुखविषयं संवेदनम् । अभिव्यङ्गोऽनुरागः, नयनादिप्रसादो वैमल्यम् । आदिशब्दाद् मुखप्रसादस्य ग्रहणम् । एतेषां सुखं जनकम् । सुखोत्पन्नेन स्वानुभवो जन्यते, स एवात्मनोऽनुग्रहः, सुखे चोपजाते मुखादीनां प्रसन्नता स्यात् । सुखसाधनेष्वनुरागः सुखाद् भवति । अतीतेषु स्मृतिजम् अतीतेषु सुखसाधनेष्वनुभूतेषु सुखं पूर्वानुस्मरणाद् भवति । अनागतेष्विदं मे भविष्यतीति- में लगा रहे तो उसे विषय से उत्पन्न होनेवाला सुख नहीं मिलता, अतः सुख के प्रति इष्ट विषय की उपलब्धि को भी कारण माना गया है । और सभी कारणों के रहने पर भी यदि स्रगादि विषयों के साथ पुरुष का सम्बन्ध नहीं है, तो फिर विषय से वियुक्त उस पुरुष को सुख नहीं मिलता, अतः सुख के प्रति भोक्ता और विषय के सन्निकर्ष को भी कारण मानना पड़ेगा । कथित 'धर्मादि' पद में प्रयुक्त 'आदि' पद से स्वास्थ्य प्रभृति सहायकों को समझना चाहिए । 'अनुग्रहाभिष्वङ्ग- नयनादिप्रसादनजनकम्' इस वाक्य के द्वारा सुख से होने वाले कार्यों का वर्णन किया गया है । सुख का प्रत्यक्ष ही प्रकृत 'अनुग्रह' शब्द का अर्थ है । 'अभिष्वङ्ग' शब्द से अनुराग अभिप्रेत है । 'नयनादिप्रसाद' शब्द से आँखों की विमलता को समझना चाहिए । 'नयनादिप्रसाद' शब्द में प्रयुक्त 'आदि' शब्द से मुँह की प्रसन्नता प्रभृति को समझना चाहिए । इन सबों का कारण सुख है । सुख उत्पन्न होकर अपने आश्रयीभूत आत्मा में जो अपने अनुभव का उत्पादन करता है, वही आत्मा के साथ सुख का अनुग्रह है । सुख के उत्पन्न होने पर मुख पर प्रसन्नता छा जाती है । सुख के कारणों में जो अनुराग उत्पन्न होता है, उसका कारण भी सुख ही है । 'अतीतेषु स्मृतिजम्' अर्थात् पूर्व में
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३३ प्रशस्तपादभाष्यम् उपघातलक्षणं दुःखम् । विषाद्यनभिप्रेतविषयसान्निध्ये सत्यनिष्टोपलब्धी- न्द्रियार्थसन्निकर्षादधर्माद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद् यदमर्षोपघातदैन्यनिमित्त- मुत्पद्यते तद् दुःखम् । अतीतेषु सर्पव्याघ्रचौरादिषु स्मृतिजम् । अनागतेषु सङ्कल्पजमिति । उपघातस्वभाव अर्थात् प्रतिकूलवेदनीय ही दुःख है । वह विष प्रभृति अनभिप्रेत विषयों के सामीप्य, उनके साथ इन्द्रियों का संयोग एवं अधर्मसहकृत आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । वह असहिष्णुता, दुःख का अनुभव एवं दीनता का कारण है । अतीत सर्प, व्याघ्र एवं चोर इत्यादि से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण उनकी स्मृतियाँ हैं । एवं भविष्य में आनेवाले विषयों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण उन (अनभिप्रेत) विषयों का सङ्कल्प है । न्यायकन्दली सङ्कल्पाज्जायते । यत्तु विदुषामात्मज्ञानवतामसत्सु विषयानुस्मरणसङ्कल्पेष्वसति विषयेऽसति चानुस्मरणे असति च सङ्कल्पे चाविर्भवति तद्विद्याशमसन्तोषधर्म विशेष- निमित्तमिति । विद्या आत्मज्ञानम्, शमो जितेन्द्रियत्वम्, सन्तोषो देहस्थितिहेतुमात्रातिरि- क्तानभिकाङ्क्षितत्वम्, धर्मविशेषः प्रकृष्टो धर्मो निवर्तकलक्षणः, एतच्चतुष्टयनिमित्तम् । ये तु दुःखाभावमेव सुखमाहुस्तेषामानन्दात्मानुभवविरोधः, हितमाप्स्यामि, अहितं हास्यामीति प्रवृत्तिद्वैविध्यानुपपत्तिश्च । सुखप्रत्यनीकतया तदनन्तरं दुःखं व्याचष्टे—उपघातलक्षणं दुःखम् । अनुभूत अतीत के साधनों में सुख की स्मृति से अनुराग उत्पन्न होता है । 'यह मुझे मिलेगा' इस आकार के संकल्प से सुख के भविष्य साधनों में अनुराग उत्पन्न होता है । 'विदुषाम्' अर्थात् आत्मज्ञानी विद्वानों में 'असद्विषयानुस्मरणसङ्कल्पेषु' अर्थात् विषयों के न रहने पर, अनुस्मरण के न रहने पर एवं सङ्कल्प के न रहने पर भी जो दिव्य सुख का आविर्भाव होता है, वह 'विद्याशमसन्तोषधर्मविशेषनिमित्तम्' अर्थात् विद्या, शम, सन्तोष और प्रकृष्ट धर्म ये सब उसके कारण हैं । 'विद्या' है तत्त्वज्ञान, 'शम' है इन्द्रियों का जय करना, जितने धन से शरीरयात्रा चले उससे अधिक धन की आकाङ्क्षा न करना ही 'सन्तोष' है । 'धर्मविशेष' शब्द से निवृत्तिरूप प्रकृष्टधर्म अभीष्ट है । इन चारों कारणों से आत्मज्ञानियों में उक्त सुख की उत्पत्ति होती है । जो सम्प्रदाय दुःखाभाव को ही सुख मानते हैं, उनके मत में इन दोषों की आपत्ति होगी । एक तो आनन्द का सभी जनों को जो अनुभव होता है, वह विरुद्ध होगा । एवं 'मैं हित को प्राप्त करूँ एवं अहित को छोड़ूँ' ये दो प्रकार की जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, वे अनुपपन्न हो जायेंगी । दुःख सुख का विरोधी है, अतः सुख के निरूपण के बाद 'उपघातलक्षणं दुःखम्'
६३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे इच्छा- प्रशस्तपादभाष्यम् स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा । सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः । अपने लिए या दूसरों के लिए अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना ही 'इच्छा' है । यह (इच्छा) सुख अथवा स्मृति से साहाय्यप्राप्त आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है । वह प्रयत्न, स्मृति, धर्म और अधर्म का कारण है । न्यायकन्दली उपहन्यतेऽनेनेत्युपघातः, उपघातलक्षणम् उपघातस्वभावम् । दुःखमुपजातं प्रतिकूलस्य- भावतया स्वात्मविषयमनुभवं कुर्वदात्मानमुपहन्ति । एतद् विवृणोति-अनिष्टोपलब्धी- त्यादिना । अमर्षोऽसहिष्णुता द्वेष इति यावत् । उपघातो दुःखानुभवः, दैन्यं विच्छायता, तेषां निमित्तम् । दुःखे सति तदनुभवलक्षण आत्मोपघातः स्यात् । अतीतेषु सर्पादिषु स्मृतिजम्, अनागतेषु सङ्कल्पजमिति पूर्ववद् व्याख्यानम् । स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा । अप्राप्तस्य वस्तुनः स्वार्थं प्रति या प्रार्थना इदं मे भूयादिति, परार्थं वा प्रार्थना अस्येदं भवत्विति सेच्छा । सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अनागते इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दुःख की व्याख्या करते हैं । प्रकृत में 'उपघात' शब्द 'उपहन्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के द्वारा सिद्ध है । 'उपघातलक्षण' अर्थात् दुःख उपघातस्वभाव का है । दुःख की उत्पत्ति ही अपने आश्रयीभूत आत्मा की इच्छा के प्रतिकूल होती है, अतः वह अपनी उत्पत्ति के द्वारा आत्मा का 'उपहनन' करती है । 'अनिष्टोपलब्धि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसी का विवरण देते हैं । 'अमर्ष' शब्द का अर्थ है असहिष्णुता, फलतः द्वेष । 'उपघात' शब्द का अर्थ है दुःख का अनुभव । दैन्य शब्द का अर्थ है दीनता । दुःख इन सबों का कारण है । दुःख के रहने पर आत्मा का दुःखानुभवरूप उपघात होता है । अतीत साँप प्रभृति वस्तुओं से उनकी स्मृति के द्वारा दुःख उत्पन्न होता है । अनागत अनिष्ट वस्तुओं के संकल्प से दुःख उत्पन्न होता है । इस प्रकार सुख प्रकरण में कथित रीति से यहाँ भी व्याख्या करनी चाहिए । 'स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा' अर्थात् अपने लिए या दूसरों के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की जो 'प्रार्थना' अर्थात् 'यह मुझे मिले' या 'यह इस व्यक्ति को मिले' इस प्रकार की जो प्रार्थना वही 'इच्छा' है।'सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वोत्पद्यते' सुख के साधनीभूत भविष्य वस्तु की इच्छा होती है, अतः उस विषय से होनेवाला सुख
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६३५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६३५ प्रशस्तपादभाष्यम् कामोऽभिलाषः, रागः सङ्कल्पः, कारुण्यम्, वैराग्यमुपधा- भाव इत्येवमादय इच्छाभेदाः । मैथुनेच्छा कामः । अभ्यवहारेच्छाऽ- भिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरानेच्छा रागः । अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्ष्य परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् । दोषदर्शनाद् काम, अभिलाषा, राग, संकल्प, वैराग्य, उपधा एवं भाव प्रभृति इच्छा के ही भेद हैं । (जैसे कि) मैथुन की इच्छा ही 'काम' है । भोजन करने की इच्छा ही 'अभिलाषा' है । बार-बार विषयों को भोगने की इच्छा ही 'राग' है । शीघ्र किसी काम को करने की इच्छा ही 'संकल्प' है । अपने कुछ स्वार्थ के बिना दूसरों के दुःख को छुड़ाने की इच्छा ही 'कारुण्य' है । दोष के ज्ञान से विषय को छोड़ने की इच्छा ही 'वैराग्य' है । दूसरे न्यायकन्दली सुखसाधने वस्तुनीच्छा उपजायते, तदुत्पत्तौ च तद्विषयसाध्यं सुखमनागतमपि बुद्धिसिद्ध- त्वान्निमित्तकारणम् । यदाह न्यायवार्त्तिककारः--"फलस्य प्रयोजकत्वात्" इति । अतिक्रान्ते सुखहेताविच्छोत्पत्तेः स्मृतिः कारणम् । प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः । उपादाने- च्छायास्तदनुगुणः प्रयत्नो भवति, स्मरणेच्छातः स्मरणम्, विहितेषु ज्योतिष्टोमादिषु फलेच्छया प्रवृत्तस्य धर्मो जायते । प्रतिषिद्धेषु रागात् प्रवृत्तरयाधर्मः । कामादयोऽपि सन्ति ते कस्मान्नोक्ताः ? अत आह-काम इत्यादि । कामादय इच्छाप्रभेदाः, न तत्त्वान्तरमिति यदुक्तं तदेव दर्शयति-- भी अनागत ही रहता है (वर्त्तमान नहीं), फिर भी वह भविष्य सुख भी बुद्धि के द्वारा सिद्ध होने के कारण इच्छा का निमित्तकारण होता है । जैसा कि न्यायवार्तिककार ने 'फलस्य प्रयोजकत्वात्' इत्यादि ग्रन्थ से कहा है कि सुख के कारणीभूत विषयों के नष्ट हो जाने पर भी जो उन विषयों की इच्छा होती है, उस इच्छा के प्रति उन विषयों की स्मृति कारण है । 'प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः' विषयीभूत वस्तु की इच्छा से उसे प्राप्त करने या त्याग करने के उपयुक्त प्रयत्न की उत्पत्ति होती है (इस प्रकार इच्छा प्रयत्न की भी कारण है) । स्मरण की इच्छा से भी स्मृति होती है । स्वर्गादि के लिए वेदों से निर्दिष्ट ज्योतिष्टोमादि यागों में स्वर्गादि फलों की इच्छा से जो प्रवृत्ति होती है, उस इच्छा से धर्म होता है । एवं राग से जो प्रतिषिद्ध हिंसादि में किसी की प्रवृत्ति होती है, उससे अधर्म की उत्पत्ति होती है, उस अधर्म के प्रति उक्त रागरूप इच्छा कारण है (इस प्रकार इच्छा प्रयत्नादि का हेतु है) । काम प्रभृति गुण भी तो हैं, वे क्यों नहीं कहे गए ? इसी प्रश्न का उत्तर 'कामः' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । यह जो कहा है कि "कामादि इच्छा के ही
६३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे इच्छा- प्रशस्तपादभाष्यम् विषयत्यागेच्छा वैराग्यम् । परवञ्चनेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढेच्छा भावः । चिकीर्षाजिहीर्षेत्यादिक्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति । को ठगने की इच्छा ही 'उपधा' है। भीतर छिपी हुई इच्छा ही 'भाव' है । (इसी प्रकार) चिकीर्षा (कुछ करने की इच्छा), जिहीर्षा (छोड़ने की इच्छा) इत्यादि भी (अपने अन्तर्गत) क्रियाओं के भेद के रहने पर भी (वस्तुतः) इच्छा के ही प्रभेद हैं । न्यायकन्दली मैथुनेच्छा काम इति । निरुपपदः कामशब्दो मैथुनेच्छायामेव प्रवर्तते, अन्यत्र तस्य पदान्तरसमभिव्याहारात् प्रवृत्तिः, यथा स्वर्गकामो यजेत इति । अभ्यवहारेच्छा अभिलाषः । अभ्यवहारो भोजनम्, तत्रेच्छा अभिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः । पुनर्विषयाणां भोगेच्छा राग इत्यर्थः । अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः । अनागतस्यार्थस्य करणेच्छा सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्ष्य परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् । स्वार्थप्रयोजनं किमप्यनभिसन्धाय या परदुःखप्रहाणे अपनयने इच्छा सा कारुण्यम् । दोषदर्शनाद् दुःखहेतुत्यागयमे विषयाणां परित्यागे इच्छा वैराग्यम् । परवञ्चनेच्छा परप्रतारणेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढेच्छा लिङ्गैरविभाविता येच्छा सा भावः । चिकीर्षा जिहीर्षा इत्यादिक्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति । करणेच्छा चिकीर्षा, हरणेच्छा जिहीर्षा गमनेच्छा जिगमिषेत्येवमादय इच्छाभेदाः क्रियाभेदाद् भवन्ति । प्रभेद हैं, स्वतन्त्र गुण नहीं'', उसी का उपपादन "मैथुनेच्छा कामः" इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । बिना विशेषण का केवल 'काम' शब्द मैथुन की इच्छा में ही प्रयुक्त होता है, दूसरी तरह की इच्छाओं में 'काम' शब्द की प्रवृत्ति दूसरे पदों के साथ रहने से ही होती है । जैसे कि 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि । 'अभ्यवहारेच्छा अभिलाषः' इस वाक्य के 'अभ्यवहार' शब्द का अर्थ है भोजन, उसकी इच्छा ही 'अभिलाष' शब्द से कही जाती है । 'पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः' अर्थात् विषयों को बार-बार भोगने की इच्छा ही 'राग' है । 'अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः' अर्थात् भविष्य काम को करने की इच्छा ही 'संकल्प' है । 'स्वार्थमनपेक्ष्य दुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम्' अपने किसी प्रयोजन के साधन की अभिसन्धि के बिना जो दूसरों को दुःख से छुड़ाने की इच्छा, उसे ही 'कारुण्य' कहते हैं । 'दोषदर्शनात्' अर्थात् दुःख के कारणों को अनिष्ट समझने पर विषयों को छोड़ने की इच्छा ही 'वैराग्य' है । 'परवञ्चनेच्छा' दूसरों को ठगने की इच्छा को ही 'उपधा' कहते हैं । 'अन्तर्निगूढेच्छा' अर्थात् लिङ्गों से ही ज्ञात होनेवाली इच्छा को 'भाव' कहते हैं । 'चिकीर्षा', 'जिहीर्षा' इत्यादि 'क्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति' । काम करने की इच्छा को ही 'चिकीर्षा' कहते हैं । किसी की वस्तु का अपहरण करने की इच्छा को ही 'जिहीर्षा' कहते हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३७ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रज्वलनात्मको द्वेषः । यस्मिन् सति प्रज्वलितमिवात्मानं मन्यते स द्वेषः । स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । यत्न- स्मृतिधर्माधर्मस्मृतिहेतुः । क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमाऽमर्ष इति द्वेषभेदाः । द्वेष प्रज्वलन रूप है । (अर्थात्) जिसके रहते हुए प्राणी अपने को जलता हुआ सा अनुभव करे, वही 'द्वेष' है । दुःख या स्मृति से सापेक्ष आत्मा और मन के संयोग से यह उत्पन्न होता है । प्रयत्न, स्मृति, धर्म और अधर्म का यह कारण है । क्रोध, द्रोह, मन्यु, अक्षमा और अमर्ष ये (पाँच) द्वेष के प्रभेद हैं । न्यायकन्दली प्रज्वलनात्मको द्वेषः । एतद् विवृणोति—यस्मिन् सतीत्यादिना । तद् व्यक्तम् । स चात्म- मनसोः संयोगाद् दुःखपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अतीते दुःखहेतौ तज्जदुःखस्मृतिजो द्वेषः । प्रयत्नधर्माधर्मस्मृतिहेतुः । एनमहं हन्मीति प्रयत्नो द्वेषात्, वेदार्थविप्लवकारिषु द्वेषाद् धर्मः, तदर्थपरिपालनपरेषु द्वेषादधर्मः । स्मृतिरपि द्वेषादुपजायते, यो यं द्वेष्टि स तं सततं स्मरति । क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमाऽमर्ष इति द्वेषभेदाः । शरीरेन्द्रियादिविकार- हेतुः क्षणमात्रभावी द्वेषः क्रोधः । अलक्षितविकारश्चिरानुबद्धोऽपकारावसानो द्वेषो द्रोहः । जाने की इच्छा ही 'जिगमिषा' है । क्रियाओं की इस विभिन्नता से ही ये इच्छायें विभिन्न होती हैं । 'प्रज्वलनात्मको द्वेषः' इस लक्षणवाक्य की ही व्याख्या 'यस्मिन् सति' इत्यादि से की गयी है । 'स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वा उत्पद्यते' । जहाँ दुःख के कारणों का नाश हो गया रहता है, ऐसे स्थलों में उन कारणों से उत्पन्न दुःख की स्मृति से ही उन कारणों में द्वेष उत्पन्न होता है । 'प्रयत्नधर्माधर्मस्मृतिहेतुः' 'मैं इसे मारता हूँ' इस प्रकार का प्रयत्न द्वेष से उत्पन्न होता है । वेदों से प्रतिपादित अर्थों को विपरीत दिशा में ले जानेवाले के ऊपर किये गये द्वेष से धर्म उत्पन्न होता है । वेदों की आज्ञा पालनेवाले के ऊपर द्वेष करने से अधर्म उत्पन्न होता है । द्वेष से स्मृति भी उत्पन्न होती है; क्योंकि जिसके ऊपर जिसे द्वेष रहता है, उसे उसका सदा स्मरण होता रहता है । "क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमामर्ष इति द्वेषभेदाः" एक क्षण मात्र रहनेवाले 'द्वेष' का नाम ही 'क्रोध' है, जिससे शरीर एवं इन्द्रियादि अपने स्वरूप से च्युत दीख पड़ते हैं । जिससे शरीरादि में विकार परिलक्षित न हो; किन्तु जिसका बहुत दिनों के बाद अपकार में पर्यवसान हो, उस द्वेष को ही 'द्रोह' कहते हैं । 'मन्यु' उस 'द्वेष'
६३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे प्रयत्न- प्रशस्तपादभाष्यम् प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधः - जीवनपूर्वकः, इच्छा- द्वेषपूर्वकश्च । तत्र जीवनपूर्वकः सुप्तस्य प्राणापानसन्तानप्रेरकः, प्रबोधकाले चान्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुः । अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः । इतरस्तु हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छापेक्षाद् द्वेषापेक्षाद् वोत्पद्यते । प्रयत्न, संरम्भ, उत्साह ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं । यह (प्रयत्न) १. जीवनपूर्वक (जीवनयोनि) और २. इच्छाद्वेषपूर्वक भेद से दो प्रकार का है । प्राणियों की सुप्तावस्था में प्राणवायु, अपानवायु प्रभृति (शरीरान्तर्वर्ती) वायु समूह को (उचित रूप से) प्रेरित करनेवाला एवं अन्तःकरण (मन) को दूसरी इन्द्रियों से सम्बद्ध करनेवाला प्रयत्न ही जीवनपूर्वक प्रयत्न है । धर्म और अधर्म से साहाय्यप्राप्त आत्मा और मन के संयोग से इस (जीवनपूर्वक प्रयत्न) की उत्पत्ति होती है । दूसरा (इच्छा-द्वेषमूलक) प्रयत्न हितों की प्राप्ति एवं अहितों का परिहार इन दोनों की उपयुक्त क्रिया एवं शरीर की स्थिति इन दोनों का कारण है । यह (इच्छाद्वेषमूलक प्रयत्न) इच्छा या द्वेष से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । न्यायकन्दली अपकृतस्य प्रत्यपकारासमर्थस्यान्तर्निगूढो द्वेषो मन्युः । परगुणद्वेषोऽक्षमा । स्वगुणपरिभव- समुत्थो द्वेषोऽमर्षः । प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि । सदेहस्यात्मनो विपच्यमानकर्माशयसहितस्य मनसा सह संयोगः सम्बन्धो जीवनम्, तत्पूर्वकः प्रयत्नः कामर्थक्रियां करोति ? इत्यत आह-तत्र का नाम है, जो प्रतीकार करने में असमर्थ व्यक्ति में अत्यन्त गूढ़ रूप से रहता है । दूसरे के गुण के प्रति द्वेष को ही 'अक्षमा' कहते हैं । अपने गुण के पराजय से जो द्वेष उत्पन्न होता है, उसे 'अमर्ष' कहते हैं । 'प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः, स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि' देहसम्बद्ध आत्मा का मन के साथ उस अवस्था का संयोग अर्थात् सम्बन्ध ही 'जीवन' है, जिस अवस्था में वर्तमानकालिक विपाक से युक्त कर्माशय की सत्ता उसमें रहे । जीवनपूर्वक प्रयत्न से कौन-सा विशेष कार्य होता है ? इसी प्रश्न का समाधान 'तत्र जीवनपूर्वकः' इत्यादि से किया गया है । (जीवनपूर्वक प्रयत्न का साधक यह अनुमान है कि) सोते
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ६३९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ६३९ न्यायकन्दली जीवनपूर्वक इति । सुप्तस्य प्राणापानक्रिया प्रयत्नकार्या क्रियात्वात् । न च तदानी- मिच्छाद्वेषौ प्रयत्नहेतू सम्भवतः, तस्माज्जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापानप्रेरको गम्यते । न केवलं जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापानप्रेरकः; किन्तु प्रबोधकालेऽन्तःकरण- स्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुश्च। विषयोपलम्भानुमितान्तःकरणेन्द्रियसंयोगः प्रयत्नपूर्वकान्तःकरण- क्रियाजन्यः, अन्तःकरणेन्द्रियसंयोगत्वात्, जाग्ररान्तःकरणेन्द्रियसंयोगवदिति। प्रयत्न- पूर्वकतासिद्धिः । अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः, धर्माधर्मपेक्ष आत्ममनसोः संयोगो जीवनम्, तस्मादस्योत्पत्तिरित्यर्थः । इतरस्तु इच्छाद्वेषपूर्वकश्च हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यायामस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च । गुरुत्वे सत्यपतः शरीरस्येच्छापूर्वकः प्रयत्नो विधारकः । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छाद्वेषापेक्षादुत्पद्यते । हितसाधनोपादानेषु प्रयत्न इच्छापूर्वकः, दुःखसाधनपरित्यागे प्रयत्नो द्वेषपूर्वकः । हुए पुरुष की प्राणक्रिया और अपानक्रिया भी यतः क्रिया हैं, अतः वे भी प्रयत्न से ही उत्पन्न होती हैं । सोते समय की उन क्रियाओं की उत्पत्ति इच्छा और द्वेष से नहीं हो सकती, अतः यह सिद्ध होता है कि जीवनपूर्वक यत्न ही उन क्रियाओं का कारण है । जीवनपूर्वक प्रयत्न से केवल उक्त प्राणापानादि को प्रेरणा देनेवाली क्रियायें ही नहीं होती हैं; किन्तु उससे सोकर उठते समय मन का और इन्द्रिय का संयोग भी उत्पन्न होता है । विषय की उपलब्धि से अन्तःकरण का अन्य इन्द्रियों के साथ संयोग का अनुमान होता है । यह अन्तःकरण एवं अन्य इन्द्रियों का अनुमित संयोग भी जाग्रत् अवस्था के अन्तःकरण एवं इन्द्रियसंयोग की तरह अन्तःकरण और इन्द्रिय का संयोग ही है । अतः इसकी उत्पत्ति भी प्रयत्न से उत्पन्न अन्तःकरण की क्रिया से ही होती है । अतः प्रबोधकालिक अन्तःकरण और इन्द्रियों के प्रबोधकालिक संयोग का भी प्रयत्न से उत्पन्न होना सिद्ध होता है । 'अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः' अर्थात् धर्म और अधर्म से उत्पन्न आत्मा और मन का संयोग ही जीवन है । इस जीवन से ही उक्त प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । 'इतरस्तु' अर्थात् (जीवनयोनि यत्न से भिन्न) इच्छा और द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न 'हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः, शरीरविधारकश्च' । शरीर में (पतन के कारण) गुरुत्व के रहने पर भी जो शरीर का पतन नहीं होता है, उसमें इच्छाजनित प्रयत्न ही कारण है (इस प्रकार इच्छापूर्वक प्रयत्न विधारक है) । 'स चात्ममनसोः संयोगादिच्छाद्वेषापेक्षादुत्पद्यते' इनमें हित को साधन करनेवाली वस्तुओं के ग्रहण का इच्छा-जनित प्रयत्न कारण है एवं दुःख के कारणों को हटाने में द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न कारण है ।
६४० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे गुरुत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् गुरुत्वं जलभूम्योः पतनकर्मकारणम् । अप्रत्यक्षं पतनकर्मानुमेयं संयोग- प्रयत्नसंस्कारविरोधि । अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यत्वानित्यत्वनिष्पत्तयः । जिससे पृथिवी और जल में पतनक्रिया की उत्पत्ति हो, वही गुरुत्व है । पतन क्रिया रूप हेतु से इसका अनुमान ही होता है, इसका प्रत्यक्ष नहीं होता । यह संयोग, प्रयत्न और संस्कार का प्रतिरोधक है । जलादि के परमाणु और जलादि कार्यद्रव्य में रहनेवाले रूपादि के नित्यत्व और अनित्यत्व की तरह गुरुत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व की स्थिति समझनी चाहिए । न्यायकन्दली गुरुत्वं जलभूम्योरित्याश्रयकथनम् । पतनकर्मकारणमिति तस्य कार्यनिरूपणम् । अप्रत्यक्षमिति स्वभावोपवर्णनम्, न केनचिदिन्द्रियेण गुरुत्वं गृह्यत इत्यर्थः । ये तु त्वगिन्द्रियग्राह्यं गुरुत्वमाहुः, तेषामधःस्थितस्य द्रव्यस्य स्पर्शोपलम्भवद् गुरुत्वोपलम्भ- प्रसङ्गः, त्वगिन्द्रियस्यार्थोपलम्भे स्वसन्निकर्षव्यतिरेकेणान्यापेक्षासम्भवात् । यत्तूपरिस्थितस्य गुरुत्वं प्रतीयते, तद्धस्तादीनामधोगमनानुमानात् । अतीन्द्रियं चेत् कथमस्य प्रतीतिः ? इत्यत आह-पतनकर्मानुमेयमिति । यद्यवयविद्रव्यस्य पतनं तेन यदेकार्थसमवेतासमवायिकारणं तदेव 'गुरुत्वं जलभूम्योः' इस वाक्य में प्रयुक्त 'जलभूम्योः' इस पद से गुरुत्व के आश्रय दिखलाये गये हैं । 'पतनकर्मकारणम्' इस वाक्य से गुरुत्व के द्वारा होनेवाले कार्यों को दिखलाया गया है । 'अप्रत्यक्षम्' इस पद से गुरुत्व का (अतीन्द्रियत्व रूप) स्वभाव दिखलाया गया है । अर्थात् गुरुत्व का ग्रहण किसी भी इन्द्रिय से नहीं होता । जिस सम्प्रदाय के लोग त्वगिन्द्रिय से गुरुत्व का प्रत्यक्ष मानते हैं, उनके मत में जिस प्रकार नीचे रक्खे हुए द्रव्य के स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है, उसी प्रकार उस द्रव्य के गुरुत्वविषयक स्पार्शन प्रत्यक्ष की आपत्ति होगी; क्योंकि त्वगिन्द्रिय से प्रत्यक्ष के लिए उसके त्वगिन्द्रिय के साथ सम्बन्ध को छोड़कर और किसी के साहाय्य की अपेक्षा मानना सम्भव नहीं है । (तब रहा यह प्रश्न कि उसी द्रव्य को ऊपर उठाने पर गुरुत्व की उपलब्धि किस प्रमाण से होती है ? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि) द्रव्य उठानेवाले हाथ प्रभृति द्रव्यों का (उस अवस्था में) नीचे की तरफ जाने से उस द्रव्य के गुरुत्व का अनुमान होता है । जिस अवयवी रूप द्रव्य का पतन होता है, उस पतन के साथ एक अर्थ (उसी अवयवी द्रव्य) में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले (पतन का) असमवायिकारण ही 'गुरुत्व' है । किसी सम्प्रदाय के लोग अवयवी में गुरुत्व नहीं मानते हैं;
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१ प्रशस्तपादभाष्यम् द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । त्रिद्रव्यवृत्ति । तत्तु द्विविधम् - जिस गुण से स्यन्दन (अर्थात् फैलने की) क्रिया उत्पन्न हो, वही 'द्रवत्व' है । यह १. सांसिद्धिक (स्वाभाविक) और २. नैमित्तिक न्यायकन्दली हि नो गुरुत्वम् । एतेनैतत् प्रत्युक्तं यदुक्तमपरैः- "अवयविगुरुत्वकार्यस्य न्नतिविशेष- स्यानुपलम्भादवयविनि गुरुत्वाभावः" इति, अवयविनः पतनाभावप्रसङ्गात् । अथावयवानां गुरुत्वादेव तस्य पतनम् ? तदावयवानामपि स्वावयवगुरुत्वात् पतनमिति सर्वत्र कार्ये तदुच्छेदः । अथ व्यधिकरणेभ्यः स्वावयवगुरुत्वेभ्योऽवयवानां पतनासम्भवात् तेषु गुरुत्वं कल्प्यते, तदा अवयविन्यपि कल्पनीयम्, न्यायस्य समानत्वात् । यत् पुनरवयविगुरुत्वस्य कार्यातिरेको न गृह्यते, तदवयवावयविगुरुत्वभेदस्याल्पान्तरत्वात् । यथा महति द्रव्ये उन्मीयमाने तत्पतितसूक्ष्मद्रव्यान्तरगुरुत्वकार्याग्रहणम् । क्योंकि अवयवों के गुरुत्व से जितनी अवनति होती है, उन अवयवों से बने अवयवी के द्वारा उससे अधिक अवनति नहीं देखी जाती है, अतः अवयवों में ही गुरुत्व है, अवयवी में नहीं । गुरुत्व के उक्त लक्षण से उनके उक्त मत का भी खण्डन हो जाता है (क्योंकि उस लक्षण में गुरुत्व को अवयवी में रहना मान लिया गया है); क्योंकि अवयवी में गुरुत्व यदि न मानें तो अवयवी का पतन न हो सकेगा । यदि अवयवों के गुरुत्व से ही अवयवी का पतन मानें, तो फिर उन अवयवों का पतन भी उनके अवयवों से ही होगा । उनमें भी गुरुत्व का मानना व्यर्थ होगा । फलतः किसी भी कार्य द्रव्य में गुरुत्व का मानना सम्भव न होगा । यदि यह कहें कि एक अधिकरण में रहनेवाले गुरुत्व से उससे भिन्न द्रव्य में पतन का होना सम्भव नहीं है, अतः अवयवों में गुरुत्व मानते हैं (क्योंकि अवयवों से उसके अवयव भिन्न हैं), तो फिर इसी युक्ति से अवयवी में भी गुरुत्व का मानना अनिवार्य है; क्योंकि अवयवों के अवयव भी तो अपने अवयवी से भिन्न हैं, अतः अवयवों में रहनेवाला गुरुत्व अवयवों से भिन्न अवयवी में पतन का उत्पादन कैसे कर सकता है ? यह जो आक्षेप किया गया है कि अवयवों के गुरुत्व कार्य अवनति-विशेष से अवयवी के कार्य अवनतिविशेष में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता (अतः अवयवों में ही गुरुत्व है अवयवी में नहीं), इस आक्षेप के उत्तर में कहना है कि अवयवी के गुरुत्व से अवयवों के गुरुत्व में अत्यन्त अल्प अन्तर है, अतः दोनों से होनेवाले कार्यों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता । जैसे किसी भारी द्रव्य को दूसरी बार तौलने पर उससे कुछ कणों के झड़ जाने के बाद भी उसके गुरुत्व के कार्य अवनतियों में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता है ।
६४२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् सांसिद्धिकम्, नैमित्तिकं च । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः । सांसिद्धिकस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयः । सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकमयुक्तमिति चेत्, न, दिव्येन तेजसा संयुक्तानामाप्यानां परमाणूनां परस्परं संयोगो द्रव्यारम्भकः सङ्घा- भेद से दो प्रकार का है । इनमें सांसिद्धिक द्रवत्व जल का विशेषगुण है और नैमित्तिक द्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्यगुण है । द्रवत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय गुरुत्व की तरह समझना चाहिए । (प्र.) (जल में भी) सङ्घात अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः यह कहना अयुक्त है कि जल का द्रवत्व सांसिद्धिक है । न्यायकन्दली संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधि । गुरुत्वस्य संयोगेन प्रयत्नेन वेगाख्येन च संस्कारेण सह विरोधो विद्यते, तैः प्रतिबद्धस्य स्वकार्याकरणात् । तथा च दोलारूढस्य संयोगेन प्रतिबन्धादपतनम्, प्रयत्नेन प्रतिबन्धादपतनं च शरीरस्य, वेगेन प्रतिबन्धादपतनं बहिः- क्षिप्तस्य शरशलाकादेः । अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथाप्यपरमाणुरूपादयो नित्या- स्तथा पार्थिवाप्यपरमाणुष्वपि गुरुत्वम् । यथा चाबादिकार्यद्रव्ये कारणगुणपूर्वकप्रक्रमेण रूपादयो जायन्ते, आश्रयविनाशाच्च विनश्यन्ति, तथा गुरुत्वमपि । 'संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधी' । गुरुत्व का विरोध (अर्थात् अपने आश्रय के अधःपतन रूप कार्य में अक्षमता) संयोग, प्रयत्न और वेगाख्य संस्कार इन तीन गुणों से होता है; क्योंकि इनमें से किसी के साथ भी सम्बन्ध रहने पर गुरुत्व से पतन की उत्पत्ति नहीं होती है । संयोग से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही पालकी पर चढ़े हुए मनुष्य का पतन नहीं होता है । प्रयत्नरूप प्रतिबन्धक से ही शरीर का पतन नहीं होता है । केवल वेग के ही कारण बाहर फेंका हुआ तीर (कुछ देर तक) रुका रहता है । 'अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् जिस प्रकार जलीय परमाणुओं के रूपादि नित्य होते हैं, उसी प्रकार पार्थिव परमाणु और जलीय परमाणु का गुरुत्व भी नित्य है । जैसे कार्यरूप जल में कारणगुणक्रम से रूपादि की उत्पत्ति होती है एवं आश्रय के विनाश से उनका विनाश होता है, उसी प्रकार कार्यरूप पार्थिव द्रव्य और जलीय द्रव्य इन दोनों के गुरुत्व भी कारणगुणक्रम से ही उत्पन्न होते हैं और आश्रय के विनाश से ही विनष्ट होते हैं ।