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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

भूमिका ६१ चित्र-१ [ब्रह्म] शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान से आवृत्त | मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान │ ┌─ आनन्दमय कोष <──────────────┐ (ब्रह्म) ↓ │ ├─ कारण शरीर <──────────────┤ जीव ईश्वर ─┼─ सुषुप्ति अवस्था <─────────────┤ (1) └─ लय स्थान <───────────────┘ (2) (ब) सूक्ष्मशरीर—इसका केवल अनुमानप्रमाण द्वारा ही ज्ञान होता है। हम इसे किसी भी प्रकार देख अथवा छू नहीं सकते हैं। इसीकारण इसे सूक्ष्मशरीर कहा जाता है। इसका दूसरा नाम 'लिङ्गशरीर' भी है। स्वामी रामतीर्थ ने इसकी व्युत्पत्ति इसप्रकार की है— “लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, लिङ्गानि च शरीराणि चेति लिङ्गशरीराणि" (वेदान्तसार-विद्वन्मनोरञ्जनी-पृ. 100) इसी के माध्यम से जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार इसमें सत्रह अवयव होते हैं—पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ, पञ्चवायु तथा बुद्धि एवं मन। पञ्चदशीकार के अनुसार— बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशाभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते।। (1/23) जीव के पापपुण्यों (धर्म-अधर्म) का लेखा-जोखा इसीकारणशरीर में विद्यमान रहता है। यही जीवात्मा का एक प्रकार से घर अथवा निवास स्थान है। कठोपनिषद्कार ने इसे 'रथ' की संज्ञा भी दी है। इसका रथी आत्मा है, क्योंकि एक स्थूलशरीर से दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करने के लिए यह सूक्ष्मशरीर आश्रय अथवा माध्यम का कार्य करता है। इसी प्रसङ्ग में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सांख्यदर्शन भी सूक्ष्मशरीर के अस्तित्व को स्वीकार करता है। उसने इसके अट्ठारह तत्त्वों को मान्यता प्रदान की है—महत् (बुद्धि), अहङ्कार, मन, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण। अतः स्पष्ट है कि सांख्यदर्शन 'अहङ्कार' को सूक्ष्मशरीर में अधिक तत्त्व के रूप में स्वीकार करता है। जबकि वेदान्तसार के टीकाकार

६२ वेदान्तसार स्वामी रामतीर्थ अहङ्कार का अन्तर्भाव मन में करते हैं। उनके अनुसार अहङ्कार भी सङ्कल्पात्मक ही होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार सूक्ष्मशरीर को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२ सूक्ष्म शरीर (17 अवयव) 5 5 5 1 1 पञ्च ज्ञानेन्द्रिय पञ्च कर्मेन्द्रिय पञ्च वायु बुद्धि मन श्रोत्र त्वक् चक्षु रसना घ्राण प्राण अपान व्यान समान उदान (जिह्वा) वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ (वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (मूत्रेन्द्रिय) इसी प्रसङ्ग में इनका पृथक्-पृथक् परिचय देना उपयुक्त होगा। (क) पञ्चज्ञानेन्द्रिय-श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना और घ्राण इन्हें ज्ञानेन्द्रियों की श्रेणी में रखा गया है। इनकी उत्पत्ति आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से पृथक्-पृथक् रूप में मानी गयी है। ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। एतान्याकाशादिनां सात्त्विकां- शेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक्-पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते (वेदान्तसार)। अर्थात् आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है। इसका कार्य श्रवण करना है, क्योंकि शब्द आकाश का गुण है। अतः यह शब्द की ग्राहक है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत वायु के सात्त्विक अंश से त्वक् नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई, क्योंकि स्पर्श वायु का गुण है। अतः त्वगेन्द्रिय शीतल या उष्ण स्पर्श का ज्ञान कराती है। इसके अतिरिक्त अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत अग्नि के सात्त्विक अंश से चक्षु नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई और अग्नि का गुण है, रूप। इसलिए चक्षु नामक इन्द्रिय दर्शन कराती है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत 'जल' के

भूमिका ६३ सात्त्विक अंश से रसना (जिह्वा) नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि जल का गुण रस है। अतः रसना ज्ञानेन्द्रिय द्वारा हमें रस अर्थात् स्वाद की प्रतीति होती है। साथ ही अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत पृथिवी के सात्त्विक अंश से घ्राण नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि पृथिवी का गुण है, गन्ध। इसीलिए घ्राणेन्द्रिय द्वारा हम गन्ध को ग्रहण करते हैं। ज्ञान को ग्रहण करने के कारण इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। चित्र-३ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत ┌─────────────┐ │ सात्त्विक अंशों │ ↗ आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी │ से पञ्च │    │     │     │     │     │ │ ज्ञानेन्द्रियों की │ ↗ श्रोत्र त्वक् चक्षुष् रसना घ्राण │ उत्पत्ति │    │     │     │     │     │ └─────────────┘ ↘ शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध (ग्रहण करना) (ख) पञ्चकर्मेन्द्रिय- कर्म को सम्पादित करने के कारण इन्हें कर्मेन्द्रिय कहा जाता है। इनकी संख्या भी पांच है-वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के अंश से अलग-अलग मानी गई है। अर्थात् रजोगुणप्रधान आकाश नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से वाक् (वाणी) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुण प्रधान 'वायु' नामक सूक्ष्मभूत से पाणि (हाथ) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुणप्रधान 'अग्नि' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पाद अर्थात् पैर नामक कर्मेन्द्रिय की, इसीप्रकार रजोगुणप्रधान 'जल' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पायु अर्थात् गुदा नामक कर्मेन्द्रिय की तथा रजोगुणप्रधान पृथिवी नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से 'उपस्थ' अर्थात् जननेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है। रजोगुण के स्वभाव से चञ्चल एवं क्रियाशील होने के कारण सभी कर्मेन्द्रियों में गति एवं क्रियाशीलता देखने को मिलती है। इसी अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-

६४ वेदान्तसार चित्र-४ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी [ रजोगुण प्रधान अंशों से क्रमशः ] वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ (वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (जननेन्द्रिय) बोलना कार्य करना चलना मल उत्सर्जन आनन्द एवं सन्तति उत्पत्ति (ग) पञ्चवायु- प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान ये पाँच वायु हैं। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण अंश से स्वीकार की गई है। इनका शरीर के विभिन्न अङ्गों में वास माना गया है। जैसे-नासिका के अग्रभाग पर विराजमान वायु 'प्राण' है। यह ऊर्ध्व गमनशीला है। (प्राणो नाम प्राग्गमनवान् नासाग्रस्थानवर्ती-वेदान्तसार) किन्तु ब्राह्मणग्रन्थों में इसकी स्थिति हृदय में स्वीकार की गयी है। (प्राणी हृदये-तैत्तिरीयब्राह्मण 3/10/8/5)। पुनरपि हृदय में स्थित होते हुए भी प्रत्यक्षरूप से नासिका के अग्रभाग पर अवस्थित होने के कारण इसका नासिका के अग्रभाग पर स्थित होना ही विद्वानों को स्वीकार्य रहा है (वेदान्तसार विद्वन्मनोरञ्जनीकार) अपान नामक वायु को गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय) में स्थित माना गया है। नाभि के नीचे की ओर जाना इसका स्वभाव है। सम्भवतः इसीकारण इसे अधोगमनशीला कहा गया है। इसीप्रकार 'व्यान' नामक वायु का स्वभाव सभी ओर गमन करना है। अतः इसकी स्थिति सम्पूर्णशरीर में स्वीकार की गई है। प्रतिदिन खाए हुए अन्न पानादि को पचाने वाली, उदर में निवास करने वाली वायु ही 'समान' है। इसका प्रमुख कार्य उदरस्थ अन्न से साररूप रस निकालकर उसका रुधिर आदि के रूप में परिपाक करना तथा अवशिष्ट अन्न को मल-मूत्र के रूप में बाहर निकलना है। उदान वायु का निवास कण्ठ में होता है। ऊर्ध्वगमन इसका स्वभाव है। अतः मृत्यु के समय शरीर

भूमिका ६५ से इसका उत्क्रमण माना गया है। पञ्चवायुओं की स्थिति एवं कार्य को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-५ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से पञ्चवायु प्राण अपान व्यान समान उदान | | | | | नासिकाग्रवर्ती गुदा-उपस्थवर्ती सम्पूर्णशरीरस्थ उदरस्थ कण्ठस्थ | | | | | श्वास मलमूत्रनिस्सारण रक्तसंचरण पाचन मृत्यु के समय निस्सरण | | | | | ऊर्ध्वगमनशीला अधोगमनशीला सर्वत्रगमनशीला अधोगमनशीला ऊर्ध्वगमनशीला उपर्युक्त पञ्चवायुओं के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय पाँच अन्य वायुओं के अस्तित्व को भी स्वीकार किया है। उनके अनुसार नागवायु उद्गार एवं वमन लाने वाली, कूर्मवायु आँखों का उन्मीलन, निमीलन कराने वाली, कृकल नामक वायु भूख लगाने वाली, देवदत्त नामक वायु जमुहाई लाने वाली होती है। इसीप्रकार धनञ्जय नामक वायु द्वारा शरीर का पोषण किया जाता है। किन्तु वेदान्तशास्त्र इन सभी का अन्तर्भाव पूर्ववर्णित चारों वायुओं में कर लेता है। (एतेषां प्राणादिष्वन्तर्भावात् प्राणादयः पञ्चैवेति केचित् (वेदान्तसार)। विद्वन्मनो- रञ्जनीकार स्वामीरामतीर्थ ने विस्तारपूर्वक नाग आदि पञ्चवायुओं का अन्तर्भाव पूर्ववर्णित प्राण, अपान इत्यादि वायुओं में ही किया है। (घ) बुद्धि और मन-ये दोनों शरीर के अन्तःभाग में स्थित इन्द्रियाँ हैं। अतः इन्हें अन्तरिन्द्रिय भी कहा जाता है। वस्तुतः ये दोनों ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विषयों का ग्रहण करती है। इसलिए इन्हें अन्तःकरण भी कहते हैं। अन्तःकरण की निश्चयात्मकवृत्ति को 'बुद्धि' कहा गया है। इसका कार्य अध्यवसाय अर्थात् निश्चय करना है। इसके अतिरिक्त मन अन्तःकरण की ही दूसरी वृत्ति है। इसका कार्य संकल्प-विकल्प करना है। इनकी उत्पत्ति आकाशादिक सात्त्विक अंश के मिश्रितरूप से मानी गयी है। कुछ विद्वानों ने अन्तःकरण की चित्त और अहंकार नामक दो अन्य वृत्तियों का भी उल्लेख

६६ वेदान्तसार किया है, इनमें अनुसन्धानात्मिका अन्तःकरणवृत्ति को चित्त तथा अभिमानात्मिकावृत्ति को अहंकार कहते हैं- मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं करणमान्तरम्। संशयी निश्चयो गर्वः स्मरणं विषया इमे॥ (शारीरकोपनिषद्-12) किन्तु आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में चित्त का बुद्धि में तथा अहङ्कार का मन में ही अन्तर्भाव माना है- (अनयोरेव चित्ताहंकारयोरन्तर्भावः) उनके अनुसार गर्वरूप अहङ्कार जिसमें संशयात्मकरूप में स्थित, अपने उत्कर्ष की सम्भावना का मन में अन्तर्भाव करना चाहिए। इसीप्रकार विषय का परिच्छित्ति (स्मरण) रूप में ज्ञान कराने वाले चित्त का अन्तर्भाव बुद्धि में करना संगत प्रतीत होता है, क्योंकि स्मरण की उत्पत्ति निश्चयात्मक अनुभव से ही होती है। इसप्रकार कारणशरीर के निर्माण में विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन कोषत्रय की महती भूमिका रहती है, क्योंकि विज्ञानमयकोष में पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ+बुद्धि होता है। मनोमयकोष का निर्माण पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ+मन द्वारा होता है। इसीप्रकार पञ्चप्राण सहित कर्मेन्द्रियों का समूह प्राणमयकोष कहलाता है। अतः कोष की दृष्टि से कारणशरीर के स्वरूप का उल्लेख इसप्रकार भी किया जा सकता है- चित्र-६ कारण । शरीर ┌─────────────┼─────────────┐ विज्ञानमयकोश मनोमय कोश प्राणमय कोश (बुद्धि+पञ्चज्ञाने०) (मन+पञ्चज्ञाने०) (पञ्चकर्मे०+पञ्चप्राण) ↓ ↓ ↓ (व्यावहारिक कार्यों का कर्ता) (इच्छाशक्ति सम्पन्न) (क्रियाशीलता का प्राधा.) कर्तृरूप करणरूप कार्यरूप (स) स्थूलशरीर-आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के पञ्चीकरण के बाद आकाश आदि स्थूलभूतों की उत्पत्ति होती है, जिसका विस्तृतवर्णन आगे सृष्टिप्रक्रिया के अन्तर्गत किया जाएगा। इन स्थूलभूतों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है एवं उसमें चार प्रकार के स्थूल शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं। यहाँ हम इन्हीं चारों स्थूल शरीरों का उल्लेख करेंगे-

भूमिका ६७ जैसा कि कथन किया गया कि स्थूलशरीर का निर्माण आकाश आदि पञ्चीकृत स्थूलभूतों से होता है। यह शरीर ही वस्तुतः जन्म-मरण की स्थिति को प्राप्त होता है। इसी शरीर द्वारा जीवात्मा कर्म करता है तथा उससे प्राप्त होने वाले फल को भोगता है। यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा खाए हुए तथा जन्म के बाद स्वयं द्वारा खाए अन्न का विकार होने के कारण अन्नमयकोश कहलाता है तथा जीव की यह जाग्रत अवस्था होती है। स्थूलशरीर चार प्रकार के होते हैं-(1) जरायुज (2) अण्डज (3) स्वेदज (4) एवं उद्भिज्ज। जरायु (उदर में रहने वाली पतली झिल्ली-जेर) से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि जरायुज हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि अण्डज हैं। पसीने से उत्पन्न होने वाले जूँ, मच्छर आदि स्वेदज हैं तथा भूमि को उद्भेद (फाड़) कर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज्ज नामक स्थूलशरीर हैं। स्थूलभोग का आश्रय होने के कारण इन्हें स्थूलशरीर तथा विषयों का भोग करने के कारण जाग्रत् कहा जाता है। इन चारों स्थूलशरीरों में मनुष्य की योनि को उत्कृष्ट माना गया है, क्योंकि इसमें उसे चिन्तन, बोध, संकल्प शक्ति की सामर्थ्य प्राप्त होती है। इस शरीर द्वारा प्रयत्न करके वह उत्कृष्टस्थिति (देवत्वादि) को भी प्राप्त कर सकता है। यहाँ तक कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है तथा निकृष्टकर्मों का सम्पादन करके निम्न से निम्न योनियों में भी जा सकता है। इनमें शेष उद्भिज्जादि दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली भोग योनियाँ हैं। चित्र-७ स्थूल शरीर जरायुज अण्डज स्वेदज उद्भिज्ज (मनुष्य, पशु आदि) (पक्षी सर्पादि) (जूँ मच्छरादि) (वृक्ष लतादि) (११) पञ्चकोष-उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि आत्मा के आच्छादक तत्त्वों में प्रमुखरूप से अज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, उसी से ईश्वर, जीव, जगत् आदि की सृष्टि होती है। तीनों प्रकार के शरीरों के निर्माण एवं विकास में कोशों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इनकी संख्या कुल मिलाकर पाँच मानी गई है। (1) आनन्दमयकोष (2) विज्ञानमयकोष (3) मनोमयकोष (4) प्राणमयकोष तथा (5) अन्नमयकोष।

६८ वेदान्तसार (क) आनन्दमयकोष-आत्मा के आच्छादक होने के कारण अथवा समूह में स्थित होने के कारण ही इन्हें कोष की संज्ञा प्रदान की गई है। इन पञ्चकोषों में प्रथम आनन्दमयकोष की स्थिति सृष्टि के विकास की प्रथम कारणावस्था में विद्यमान होती है। निर्गुणब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित होता है तो वही कारणशरीर, ईश्वर तथा आनन्द की प्रचुरता के कारण आनन्दमय कोष कहलाता है। प्रलय की अवस्था में भी यह विद्यमान रहता है। यही सूक्ष्मशरीर का लयस्थान भी है। इसीलिए इस अवस्था को सुषुप्ति कहा गया है। ये ही सब स्थितियाँ ब्रह्म के मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित होने पर 'जीव' पक्ष में भी होती हैं। (द्रष्टव्य चित्र संख्या-1) (ख) विज्ञानमयकोष-जीव की स्वप्नावस्था में स्थित 'सूक्ष्मशरीर' में तीन कोषों की स्थिति को स्वीकार किया गया है, विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय। इन तीन कोषों के मिलने पर ही सूक्ष्मशरीर का निर्माण होता है। इनमें विज्ञानमयकोष के अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से उत्पन्न श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, रसना और घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ बुद्धितत्त्व विद्यमान रहता है। अन्तःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति 'बुद्धि' द्वारा ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ नियन्त्रित होती हैं। अतः इस कोष का कार्य 'निश्चय' करना है। (ग) मनोमयकोष-सूक्ष्मशरीर में स्थित तीन कोषों में से इसका द्वितीय स्थान है। इसके अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुणप्रधान अंशों से उत्पन्न वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के साथ मन की स्थिति विद्यमान रहती है। मन के संकल्प-विकल्पात्मक होने के कारण मनोमयकोष का कार्य संकल्पविकल्प माना गया है। दूसरे शब्दों में यह कोष इच्छाशक्ति से युक्त होता है। (घ) प्राणमयकोष-यह सूक्ष्मशरीर में ही स्थित तृतीयकोष है। शरीर के विभिन्नस्थानों पर रहने वाले प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान नाम पञ्चवायु एवं वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के साथ मिलकर इस कोष का निर्माण होता है। क्रियाशीलता प्राण का धर्म है अतः इनके प्रभाव से ही कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों को सम्पादित करती हैं। इस दृष्टि से इस कोष में क्रियाशीलता का प्राधान्य कहा जा सकता है। वैसे भी पञ्चप्राणों की उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से मानी

भूमिका ६९ गई है। चञ्चलता, गति रजोगुण की विशेषता है। इसीलिए प्राणों में गतिशीलता देखी जाती है तथा प्राणों के सान्निध्य से कर्मेन्द्रियाँ गतिशील होती हैं। इसीकारण प्राणमयकोष को गतिशील अथवा क्रियाशीलकोष माना गया है। विज्ञानमय तथा मनोमयकोष की क्रियाशीलता केवल अनुभव का विषय होती है, अतः अप्रत्यक्ष होती है। जबकि इसकी क्रियाशीलता को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय ये तीनों कोष जीव की स्वप्नावस्था में विद्यमान होते हैं। (ङ) अन्नमयकोष-पञ्चम एवं अन्तिम अन्नमयकोष होता है। यह जीव की जाग्रत अवस्था में विद्यमान रहता है। अतः इसीको जाग्रत भी कहते हैं। अन्न के विकार का बाहुल्य होने से इसे अन्नमय कहा गया है तथा आत्मा का आच्छादक होने से इसे कोष संज्ञा प्रदान की गई है। जीव इसी कोष के माध्यम से विषयों का उपभोग करता है। भोगों के उपभोग में सभीप्रकार की इन्द्रियाँ भी सहायक होती हैं। इस कोष का निर्माण पञ्चीकृत महाभूतों से होता है। उपर्युक्त पञ्चकोषों को एक साथ इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-८

मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान त्वक् चक्षु रसना पाणि पाद पायु (ब्रह्म) (ब्रह्म) (बुद्धि) (मन) (अ) ईश्वर (ब) ईश्वर श्रोत्र घ्राण वाक् उपस्थ (१) आनन्दमय कोष (२) विज्ञानमय कोष (३) मनोमय कोष बुद्धि + पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन + पञ्चकर्मेन्द्रिय प्राण पाणि अग्नि अपान + वाक् पाद वायु | जल (उदान / पञ्चप्राण) प्राणमयकोष (पञ्चीकृत महाभूतों द्वारा) व्यान (४) पायु आकाश | पृथिवी समान उपस्थ [(५) अन्नमय कोष]

(१२) पञ्चीकरणप्रक्रिया-स्थूलसृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया में अद्वैतवेदान्त पञ्चीकरण के सिद्धान्त को महत्ता प्रदान करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार आकाश आदि पञ्चभूतों की तन्मात्राओं के संयोग से

७० वेदान्तसार स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। यहाँ प्रत्येक भूत में अन्य चार भूतों के मिश्रण को पञ्चीकरण कहा गया है। अर्थात् जो पाँच नहीं है, उन्हें पाँच बना देने का नाम ही पञ्चीकरण है। पञ्चीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए आचार्य सदानन्द ने पञ्चदशी की निम्नकारिका को उद्धृत किया है— द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्व स्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात् पञ्च पञ्च ते॥1/27॥ अर्थात् सबसे पहले आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूतों में प्रत्येक को दो-दो समान भागों में विभाजित कर लेते हैं। इसप्रकार विभक्त पञ्चतन्मात्राओं के दस भागों में से पहले पाँच को, छोड़कर दूसरे पाँच भागों को फिर से बराबर चार-चार भागों में विभाजित करते हैं। तत्पश्चात् उन चार बराबर भागों में से एक-एक भाग को अपने-अपने दूसरे आधे भाग को छोड़कर दूसरे चार भूतों के दूसरे अर्धभाग में मिलाने पर एक-एक पञ्चीकृत महाभूत का निर्माण होता है। वेदान्तदर्शन की भाषा में इसी प्रक्रिया को पञ्चीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। इस सम्पूर्णप्रक्रिया को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-९ अपञ्चीकृत पञ्चीभूत [चित्र: पाँच चक्र - आकाश (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), वायु (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), अग्नि (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), जल (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), पृथिवी (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8)] | आकाश सूक्ष्मतन्मात्रा | | वायु सूक्ष्मतन्मात्रा | | अग्नि सूक्ष्मतन्मात्रा | | जल सूक्ष्मतन्मात्रा | | पृथिवी सूक्ष्मतन्मात्रा | चित्र-१० पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत [चित्र: पाँच चक्र - आ. 1/2 + चार 1/8 भाग, वायु 1/2 + चार 1/8 भाग, अग्नि 1/2 + चार 1/8 भाग, जल 1/2 + चार 1/8 भाग, पृथिवी 1/2 + चार 1/8 भाग] | आकाश | | वायु | | अग्नि | | जल | | पृथिवी | (1) स्थूल आकाश= 1/2 आकाश + 1/8 अग्नि + 1/8 वायु+1/8जल+1/8 पृथ्वी (2) स्थूल वायु= 1/2 वायु + 1/8 आकाश / 1/8 अग्नि+1/8 जल+ 1/8पृथ्वी। (3) स्थूल अग्नि=1/2 अग्नि+1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 जल + 1/8 पृथ्वी

भूमिका ७१ (4) स्थूल जल=1/2 जल +1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 अग्नि + 1/8 पृथ्‍वी (5) स्थूल पृथिवी= 1/2 पृथिवी +1/8 आकाश+1/8 वायु+1/8 अग्नि+1/8 जल इसप्रकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया से प्रत्येक सूक्ष्मभूत महाभूत होकर पिण्ड के रूप में एक इकाई बन जाता है। अतः इस प्रक्रिया के पश्चात् आकाश मात्र आकाश नहीं रहता, अपितु उसमें आकाशीयतत्त्व आधा रहता है तथा शेष चार भूतों में से प्रत्येक का भी 1/8 भाग होने से इस स्थूलभूत में उनके गुण भी विद्यमान रहते हैं। ठीक यही स्थिति शेष चार महाभूतों की भी होती है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जिस भूत में जिस अंश की प्रधानता रहती है, उसी के आधार पर उसका नामकरण होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से चौदहभुवन तथा उनमें निवास करने वाले सम्पूर्ण प्राणिवर्ग अर्थात् चारप्रकार के स्थूलशरीरों का निर्माण होता है। चित्र-११ आकाशादि पञ्चीकृत स्थूलमहाभूतों द्वारा निर्माण चौदह भुवन | चतुर्विध स्थूलशरीर | 14' 1 2 3 4 सप्त उर्ध्व लोक सप्त अधःलोक | ↓ | | | 1 2 3 4 5 6 7 जरायुज | | | | | | | (मनुष्य पशु) भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् अण्डज 1 2 3 4 5 6 7 ↓ (पक्षी सर्प) | | | | | | | स्वेदज अतल वितल सुतल रसातल तलातल महातल पाताल (जूं, मच्छर) उद्भिज्ज (वृक्ष-लता) पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् ही आकाश में शब्दगुण की, वायु में शब्द एवं स्पर्श की, अग्नि में शब्द, स्पर्श, रूप और रस की, तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक गुणों की अभिव्यक्ति होती है। (१३) त्रिवृत्करण-वेदान्तसार के लेखक आचार्य सदानन्द ने पञ्चीकरण प्रक्रिया के प्रसंग में ही त्रिवृत्करण का उल्लेख करते हुए इसे पञ्चीकरण का ही उपलक्षण माना है—“अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युपलक्षणत्वात्” त्रिवृत्करण वस्तुतः उपनिषदों

७२ वेदान्तसार में प्रतिपादित सिद्धान्त है। छान्दोग्योपनिषद् की टीका करते हुए आचार्य आनन्दगिरि लिखते हैं- प्रथममेकैकां देवतां द्विधा विभज्य, पुनरेकैकं भागं द्विधा द्विधा कृत्वा तदितरभागयोर्निक्षिप्य त्रिवृत्करणं विवक्षितम् (6/3/2-3) इसके अनुसार अग्नि, जल, पृथिवी इन तीन भूतों में से सर्वप्रथम एक-एक को दो-दो भागों में विभाजित करके पुनः प्रत्येक एक-एक भाग के दो-दो विभाग करके उन्हें परस्पर इसप्रकार संयुक्त किया जाए- चित्र-१२

(चित्र विवरण: ऊपर: [वृत्त १: 1/2, 1/4, 1/4] अग्नि | [वृत्त २: 1/2, 1/4, 1/4] जल | [वृत्त ३: 1/2, 1/4, 1/4] पृथिवी नीचे: [वृत्त १: 1/2 अग्नि, 1/4 जल, 1/4 पृथिवी] | [वृत्त २: 1/2 जल, 1/4 अ., 1/4 पृथिवी] | [वृत्त ३: 1/2 पृथिवी, 1/4 अ., 1/4 जल])

त्रिवृत्करण इसप्रकार करने पर अग्नि, जल और पृथिवी में प्रत्येक का आधा अपना-अपना भाग होता है तथा शेष दो भूतों का चौथाई-चौथाई भाग होता है। अतः प्रत्येक भूत में अपना प्राधान्य तथा अन्य दो भूतों का गौणभाव होता है। इनके नामकरण का आधार भी यह गुणप्राधान्य ही है। यद्यपि पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख श्रुति में भी हुआ है, तथापि प्रयोग की सरलता की दृष्टि से उपनिषद्ग्रन्थों में त्रिवृत्करण का कथन किया गया है, क्योंकि पञ्चीकरण की प्रक्रिया कुछ जटिल होने के कारण सामान्य- व्यक्ति के लिए सरलतापूर्वक बोधगम्य नहीं है। वस्तुतः त्रिवृत्करण की प्रक्रिया भी पञ्चीकरण की ओर ही संकेत करती है। अतः इसकी प्रामाणिकता में संदेह नहीं करना चाहिए। (१४) प्रमाण- प्रमा अर्थात् यथार्थज्ञान के कारण को दार्शनिक भाषा में प्रमाण कहते हैं। यहाँ किसी भी कथन की सत्यता का आधार प्रमाण को माना गया है। अन्य दर्शनों के समान वेदान्तदर्शन भी प्रमाणों को मान्यता प्रदान करता है। उसकी दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म पूर्णतया सत्य, नित्य एवं

भूमिका ७३ पारमार्थिक सत्तावान् है, शेष सम्पूर्णजगत् भ्रान्तिभासिकसत्तावान् होने से अनित्य एवं मिथ्या है (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या)। साथ ही वेदान्तदर्शन व्यावहारिकदृष्टि से सभी सांसारिकवस्तुओं के अस्तित्व को स्वीकार करता है। अतः उन सभी की सिद्धि के लिए यहां भी अन्य दर्शनों के समान प्रमाणों को स्वीकार किया गया है। यहाँ इनकी संख्या छः रही है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति एवं अभावप्रमाण। अब हम इनका क्रमशः वर्णन करेंगे- (i) प्रत्यक्ष- यथार्थज्ञान का कारण प्रत्यक्षप्रमाण को माना गया है। दूसरे शब्दों में इसे प्रत्यक्षरूप से होने वाला यथार्थ-अनुभव भी कहा जा सकता है। यह अनुभव वस्तु के ज्ञानेन्द्रियों के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप होता है। घट-पट आदि कोई वस्तु जब नेत्र आदि इन्द्रिय के सम्पर्क में आती है तो मन एवं बुद्धिरूप अन्तरिन्द्रिय उस वस्तु तक पहुँचते हैं तथा वे उस वस्तु के आकार से आकारित हो जाते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को निश्चयात्मिकाबुद्धि द्वारा उसके घट (घड़ा) अथवा पट (कपड़ा) होने का यथार्थज्ञान होता है। इस प्रत्यक्षप्रक्रिया में वस्तु का इन्द्रिय के साथ सम्पर्क होना अत्यावश्यक है। जिसके परिणामस्वरूप 'चित्' आभास से आभासित अन्तःकरणवृत्ति अपने वस्तुविषयक अज्ञान को विनष्ट कर देती है और हमें वस्तु का यथार्थप्रत्यक्ष (ज्ञान) होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार यह प्रत्यक्ष ठीक वैसा ही होता है, जैसा कि किसी दीपक का प्रकाश वहाँ फैले अन्धकार को अपने प्रभाव से विनष्ट भी करता है तथा वहाँ स्थित घट आदि वस्तुओं को प्रकाशित भी करता है। इस सम्पूर्ण व्यापार में चिद्वृत्ति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। जिसे पञ्चदशीकार ने इसप्रकार प्रतिपादित किया है- “बुद्धितत्स्थाचिदाभासो द्वावेतौ व्याप्नुतो घटम्। तत्राज्ञानं धिया पश्येदाभासेन घटः स्फुरेत्॥” वस्तुओं का यह प्रत्यक्ष निर्विकल्पक एवं सविकल्पकभेद से दो प्रकार का होता है। (तच्च प्रत्यक्षं द्विविधं, सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात्)। वस्तु के नाम, रूप, जाति, योजना आदि से रहित ज्ञान निर्विकल्पक होता है। जो वस्तु के प्रथमज्ञान के समय होता है। तदनन्तर उसके नाम, रूप, जाति, गुण आदि से युक्त ज्ञान को सविकल्पक कहा गया है।

७४ वेदान्तसार प्रत्यक्षज्ञानविषयक यह प्रक्रिया सम्पूर्ण सांसारिकपदार्थों के सम्बन्ध में होती है। इसके विपरीत ब्रह्म-साक्षात्कार आदि के सम्बन्ध में इसमें आंशिक भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। घटादि सांसारिकपदार्थों के अचेतन होने से उन्हें भासित करने का कार्य चिद्वृत्ति को करना पड़ता है। जबकि ब्रह्म के स्वयं चेतन तथा ज्योतिस्वरूप होने के कारण उसके साक्षात्कार में चिद्वृत्ति द्वारा ब्रह्मगत अज्ञान नष्ट कर दिये जाने पर ब्रह्मतत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो उठता है। इस प्रत्यक्ष में इन्द्रियों का विषय से सन्निकर्ष नहीं होता है। इसप्रकार इन्द्रिय-सन्निकर्ष के आधार पर वेदान्तदर्शन में प्रत्यक्ष के दो भेद कहे जा सकते हैं-(1) इन्द्रियजन्य तथा (2) इन्द्रियाजन्य। सुखदुःख आदि का प्रत्यक्ष भी इन्द्रिय अजन्य ज्ञान (प्रत्यक्ष) की कोटि में आता है, क्योंकि सुख-दुःख आदि भी बाह्यसांसारिकपदार्थों के समान नहीं हैं, अपितु वे अन्तःकरण के धर्म हैं। अतः अन्तःकरण द्वारा ही उनका प्रत्यक्ष होता है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि वेदान्तदर्शन में बुद्धि एवं मन को इन्द्रिय की कोटि में नहीं रखा गया है। इसीकारण सुखदुःख का प्रत्यक्ष यहाँ इन्द्रिय अजन्य कहा गया है। (ii) अनुमान- वेदान्तशास्त्र की दृष्टि में दूसरा प्रमाण अनुमान है। अनेकशः अनुमिति भी प्रमा अर्थात् यथार्थ-अनुभव (ज्ञान) का कारण बनती है। अतः इसे प्रमाण की कोटि में रखा गया है। इसका मुख्यहेतु व्याप्तिज्ञान को स्वीकार किया गया है। किन्हीं दो पदार्थों का दैनिकजीवन में हमेशा एक साथ देखना तथा कभी भी विपरीतस्थिति के दर्शन न करना ही 'व्याप्ति' कहलाती है। जिसप्रकार हम अपने दैनिकजीवन में हमेशा धूम और अग्नि के साहचर्य के दर्शन करते हैं। अर्थात् जहाँ-जहाँ भी हमें धूम दिखायी देता है, वहाँ-वहाँ हमें अग्नि अवश्य दृष्टिगोचर होती है। हमें ऐसा कभी भी देखने को नहीं मिला कि धुआँ तो हो, किन्तु अग्नि वहाँ न मिली हो। इसप्रकार का व्यभिचार (नियम का वैपरीत्य) रहित दर्शन करने पर हमारे मन में यह बात दृढ़रूप से स्थापित हो जाती है कि 'यत्र-यत्र धूमः, तत्र तत्र वह्निः'। दृढ़रूप में स्थापित यही सिद्धान्त, यही मान्यता दर्शन की भाषा में व्याप्ति कहलाती है। इसी व्याप्ति के सहयोग से जब हम एक या दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित पर्वत में धुआँ उठता हुआ देखते हैं तो हम निःशंक होकर कह उठते

भूमिका ७५ हैं कि 'यह पर्वत अग्निवाला है।' यद्यपि उस अग्नि का हम प्रत्यक्ष नहीं कर रहे हैं, वह हमें दिखायी नहीं दे रही है, तथापि हमारे कथन में सत्यता है, वह प्रामाणिक है तथा इसे प्रमाणित करने वाला प्रमाण ही अनुमानप्रमाण है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि न्यायदर्शन के समान वेदान्त अन्वयव्यतिरेक व्याप्तियों को स्वीकार नहीं करता है। यहाँ केवल अन्वय- व्याप्ति ही आवश्यक है, क्योंकि इनके मत में व्यतिरेकव्याप्ति अभाव को सिद्ध करती है, भाव को नहीं। अतः यहाँ उसकी व्यर्थता स्वतःसिद्ध है। अभाव को सिद्ध करने के लिए वेदान्तदर्शन 'अनुपलब्धि' नामक प्रमाण को मान्यता प्रदान करता है, जिसका हम आगे उल्लेख करेंगे। इसलिए अनुमानप्रमाण में वेदान्तीलोग न्यायदर्शन के समान पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग न करके केवल तीन अवयवों में ही व्याप्ति एवं पक्षधर्मता की सिद्धि स्वीकार करते हैं जैसे- (क) यह पर्वत वह्नि वाला है (पर्वतोऽयं वह्निमान्) प्रतिज्ञावाक्य (ख) क्योंकि यह धूमवान् है (धूमवानोऽयम्) हेतुवाक्य (ग) जहाँ जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है, जैसाकि- रसोईघर (यत्र-यत्र धूमः तत्र तत्र वह्निः' यथा महानसः) उदाहरणवाक्य अतः यहाँ तीन अवयवों में ही पक्षधर्मता की सिद्धि हो जाती है। किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं साधन-धूम एवं साध्य-अग्नि का साहचर्य देखकर व्याप्ति ग्रहण करके दूर पर्वतप्रदेश में उठते हुए अग्नि के लिङ्ग (चिह्न) धूम को देखकर स्वयं ही वहाँ अग्नि की उपस्थिति का 'निश्चय' अनुमानप्रमाण द्वारा किया जाता है। अतः इसे स्वार्थानुमान की श्रेणी में रखा जाएगा। इसके विपरीत यदि यही ज्ञान अज्ञानीव्यक्ति को किसी ज्ञानी व्यक्ति द्वारा कराया जाता है तो इसी प्रक्रिया से गुजरने पर वह परार्थानुमान की कोटि में माना जाएगा। परार्थानुमान में व्यक्ति स्वयं अनुमान नहीं करता, अपितु किसी अन्य को उसका ज्ञान कराने के लिए त्रि-अवयवी वाक्यों का उसीप्रकार ग्रहण करता है। इसी आधार पर अनुमानप्रमाण के दो भेद कहे गये हैं-(1) स्वार्थानुमान एवं परार्थानुमान। इसमें परार्थानुमान का प्रयोग वेदान्ती प्रायः ब्रह्मभिन्न सम्पूर्णजगत् का मिथ्यात्व सिद्ध करने के लिए करते हैं। (iii) उपमान- सादृश्य के आधार पर प्रमा के कारणस्वरूप 'उपमान' को भी वेदान्तदर्शन स्वतन्त्रप्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान करता है। उनकी

७६ वेदान्तसार उपमान विषयक यह परिकल्पना लगभग नैयायिकों के समान ही है। इस प्रक्रिया में हम पहले देखी गई किसी वस्तु की समानता के आधार पर अन्य वस्तु का प्रामाणिकज्ञान प्राप्त करते हैं। इसप्रकार इस प्रमाण का मुख्यहेतु अथवा आधार सादृश्य है, जो हमें यथार्थज्ञान (प्रमा) कराता है। वेदान्तदर्शन में भी न्यायदर्शन के समान ही इस प्रमाण को समझाने की दृष्टि से गो एवं गवय को उदाहरणरूप में लिया है। इस प्रमाण को उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझाया जा सकता है। किसी व्यक्ति का लड़का किसी दूसरे शहर में जाने की तैयारी कर रहा है। उसके मार्ग में एक जंगल पड़ता है। व्यक्ति अपने लड़के को समझाते हुए कहता है कि-बेटा! जंगल में 'गवय' से सावधान रहना। लड़का पूछता है-बापू! गवय कैसा होता है? इसपर व्यक्ति जवाब देता है कि तुमने गाय देखी है? बस वैसा ही गवय होता है, जो खतरनाक होता है। उससे बचकर रहना चाहिए। पिता की बात सुनकर वह लड़का जंगल से गुजरता है और वह गाय के समान दिखायी देने वाले एक जानवर को देखता है। उसे देखकर उसे अपने पिता द्वारा बतायी गई सभी बातें याद आती हैं और वह समझ जाता है कि यही गवय है। इस यथार्थज्ञान के होने पर वह उसकी दृष्टि में बिना पड़े सावधानीपूर्वक निकल जाता है। इसप्रकार 'गवय गाय के समान होता है', ऐसा ज्ञान प्राप्त किया हुआ, वह लड़का 'गवय' के दिखायी देने पर 'यह प्राणी ही गवय है', ऐसा निश्चय कर लेता है। अतः यथार्थज्ञान (प्रमा) कराने में यहाँ सादृश्य (उपमान) की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसीकारण इसे उपमानप्रमाण कहा गया है। (तत्र सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्) (iv) आगम-वेदान्तशास्त्र में आगम अर्थात् शब्दप्रमाण को भी मान्यता प्रदान की गई है। इतना ही नहीं यह दर्शन निर्गुण, निराकार एवं शाश्वत- सत्ता ब्रह्म का ज्ञान कराने में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आदि प्रमाणों की असमर्थता स्वीकार करते हुए एकमात्र आगमप्रमाण को ही सार्थक मानता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार-ब्रह्म का ज्ञान कराने में एकमात्र आगमप्रमाण ही समर्थ प्रमाण है। अन्य किसी प्रमाण से इसके अस्तित्व की सिद्धि असम्भव है। तदनुसार- वेद एवं श्रुतिवचनों को अपौरुषेय मानकर उन्हें शब्दप्रमाण के अन्तर्गत स्वीकार करना चाहिए।

भूमिका ७७ यहाँ इन्होंने शब्द को पौरुषेय एवं अपौरुषेय दो श्रेणियों में रखा है। पौरुषेय लौकिक एवं अपौरुषेय वैदिकवाक्य हैं। वेदान्तदर्शन के आचार्यों ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए, उसकी पुष्टि एवं समर्थन के लिए हेतु के रूप में पद-पद पर श्रुतिवचनों को उद्धृत किया है, क्योंकि उनके मत में श्रुति (आगम) से प्रबल एवं उत्कृष्ट कोई अन्यप्रमाण नहीं है। अतः वेदान्त की दृष्टि में वेद (श्रुति) का स्वतःप्रामाण्य सिद्ध होता है। इनके मत में सूर्य के प्रकाश के समान वेद स्वतःसिद्ध हैं, उन्हें प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। स्मृति, पुराण, इतिहास आदि भी वेदसम्मत होने से स्वतःप्रमाण की ही श्रेणी में आते हैं। वेदान्तदर्शन वेदमन्त्रों को विभिन्नऋषियों द्वारा दर्शन किए हुए मानता है। उसके मत में वेदमन्त्र किसी की रचना नहीं है। अतः इनके अपौरुषेय होने में संशय करना उचित नहीं है। शङ्कराचार्य के अनुसार वेद दीपक के समान सत्य का प्रकाशन करने वाले हैं। (v) अर्थापत्ति- यहाँ 'अर्थापत्ति' को अलग से प्रमाणरूप में मान्यता प्रदान की गई है। वेदान्तदर्शन के अनुसार-कार्य को देखकर उसके कारण की परिकल्पना करना ही अर्थापत्ति कही गई है (अर्थस्य आपत्तिः अर्थापत्तिः) अथवा प्रत्यक्षरूप में कार्य-कारण में दिखायी देने वाले विरोध के परिहार के लिए कार्य के औचित्य की दृष्टि से अन्यकारण की परिकल्पना को ही 'अर्थापत्ति' माना गया है। पीनो देवदत्तः दिवा न भुङ्क्ते (देवदत्त मोटा है, किन्तु दिन में भोजन नहीं करता है) इत्यादि वाक्य में देवदत्त का मोटापन् भोजन के अभाव में सम्भव नहीं है। अतः प्रत्यक्षरूप से कार्य-कारण में विरोध प्रतीत होता है। इसके परिहार के लिए अर्थौचित्य की दृष्टि से अन्यकारण 'रात्रौ भुङ्क्ते' (यदि वह दिन में नहीं खाता तो अवश्य ही रात्रि में खाता होगा) इस अर्थ की परिकल्पना वेदान्तियों के मत में 'अर्थापत्तिप्रमाण' का विषय है। उनके अनुसार व्यक्ति का रात्रिभोजन प्रत्यक्षप्रमाण का विषय हो नहीं सकता, क्योंकि उसे भोजन करते हुए किसी ने प्रत्यक्षतः देखा ही नहीं है। साथ ही व्याप्ति के अभाव में अनुमानप्रमाण का भी यह क्षेत्र नहीं होगा। इसीप्रकार शब्द (आगम) एवं उपमानप्रमाण भी सादृश्य आदि के अभाव में सम्भव नहीं है। अतः इसके लिए अर्थापत्तिप्रमाण को मानना आवश्यक है।

७८ वेदान्तसार अर्थापत्ति के दो भेद माने गए हैं—(1) दृष्टार्थापत्ति (2) श्रुतार्थापत्ति (सा चार्थापत्तिर्द्विविधा-दृष्टार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिश्चेति"। इनमें दृष्टार्थापत्ति के अन्तर्गत वस्तु या व्यक्ति को देखकर विरोध के परिहार के लिए स्वयं अन्य कारण की परिकल्पना की जाती है। जैसे-उक्त उदाहरण में प्रतिदिन देवदत्त के दिवाभोजन को न देखकर, उसके स्थूलत्व को देखते हुए व्यक्ति स्वयं ही उसके रात्रिभोजनरूप अर्थ की परिकल्पना कर लेता है। अतः यह दृष्टार्थापत्ति प्रमाण का विषय कहलाएगा। इसके विपरीत इसीविषय को स्वयं न देखकर किसी अन्य व्यक्ति से देवदत्त का स्थूलत्व एवं दिवाभोजन का अभाव सुनकर उसके रात्रिभोजन की परिकल्पना श्रुतार्थापत्ति का विषय कहलाएगी। इसीको अन्य उदाहरण द्वारा भी इसप्रकार समझ सकते हैं। (जीवित) श्याम नामक व्यक्ति घर में नहीं है। अतः वह घर से बाहर होगा। उसका घर से बाहर होना रूप अर्थ श्रुतार्थापत्ति का विषय माना जाएगा। (vi) अनुपलब्धि (अभाव)— अभावरूप अर्थ की सिद्धि के लिए वेदान्तदर्शन 'अनुपलब्धि' नामक प्रमाण को मान्यता प्रदान करता है। संख्या की दृष्टि से इस दर्शन में यह छटा प्रमाण है। वेदान्तदर्शन किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के अभाव को कारणजन्य न होने के कारण प्रत्यक्ष आदि पूर्व में कहे गए पाँच प्रमाणों द्वारा ज्ञान कराने में असमर्थ मानता है। उनके मत में घट का अभाव इन्द्रियसन्निकर्ष के अभाव में प्रत्यक्षप्रमाण द्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याप्तिसम्बन्ध के अभाव में इसे अनुमान द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इसीप्रकार सादृश्यज्ञान न होने से घट के अभाव के ज्ञान को उपमानप्रमाण से भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं। साथ ही शब्दप्रमाण भी आप्तवाक्य के अभाव में 'वस्तु के अभाव' रूप ज्ञान को कराने में सक्षम नहीं है। अतः इसके लिए 'अनुपलब्धि' रूप छठे प्रमाण को मान्यता प्रदान करना आवश्यक है। इस प्रसङ्ग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि वेदान्तदर्शन घट आदि पदार्थों के अभाव के ज्ञान में अनुपलब्धि से अभिप्राय सामान्य अनुपलब्धि से नहीं, अपितु योग्य अनुपलब्धि से ग्रहण करता है। इनके मत में-अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा इन्द्रिय आदि द्वारा प्रत्यक्ष करने योग्य घट-पट आदि के अभाव का ज्ञान ही सम्भव है, ऐसे पदार्थ जो इन्द्रियों की पहुँच

भूमिका ७९ से बाहर हैं पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि के अभाव को इस प्रमाण द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इनके मत में यह अनुपलब्ध अर्थात् अभाव चार प्रकार का होता है-(1) प्राग्-अभाव (2) प्रध्वंस-अभाव (3) अत्यन्त-अभाव तथा (4) अन्योन्य-अभाव। इन चारों प्रकार का अभावों को हम अनुपलब्धिप्रमाण से ही ग्रहण कर सकते हैं। चित्र-१३ अनुपलब्धि प्रमाण 1 | 2 | 3 | 4 प्राक्-अभाव | प्रध्वंस-अभाव | अत्यन्त-अभाव | अन्योन्य-अभाव (उत्पत्ति से पहले | (निर्माण के बाद | (कालत्रय में रहने वाला | (एक वस्तु में अन्य मृत्पिण्ड में कार्य | दण्ड आदि से विनष्ट | अभाव - यथा वायु | वस्तु का यथा-घट रूप घट का अभाव) | घट का अभाव) | में रूप का) | में पट का) उपर्युक्त प्रदर्शन से स्पष्ट है कि किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पहले अपने कारण में स्थितिरूप अभाव का ज्ञान 'प्राग्-अभाव' है जो अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्राह्य होगा। जैसे-घट के निर्माण से पूर्व वह अपने कारणरूप मृत्पिण्ड में विद्यमान रहता है, किन्तु दृश्यमानजगत् में उसका अभाव प्रतीत होता है। अतः इस अभाव को केवल अनुपलब्धि प्रमाण से ही ग्रहण कर सकते हैं। इसीप्रकार किसी वस्तु के निर्माण के बाद कारणविशेष से विनष्ट होने के पश्चात् होने वाले अभाव को 'प्रध्वंसाभाव' कहा जाएगा जो अनुपलब्धि प्रमाण से ही ग्रहण किया जा सकता है। जैसे-घट के बनने के बाद किसी व्यक्ति द्वारा उसे डण्डे से तोड़ देने के परिणामस्वरूप होने वाला अभाव प्रध्वंसाभाव होगा। इसके अतिरिक्त जो भूत-भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में विद्यमान रहने वाला है, इसप्रकार के अभाव को अत्यन्ताभाव कहते हैं जिसे हम अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्रहण कर सकते हैं। इस अभाव को वायु में रूप के अभावरूप उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है, क्योंकि वायु में रूप (दिखायी देने) का गुण नहीं होता और यह अभाव तीनों कालों में रहने वाला है। अतः अत्यन्ताभाव की कोटि में आएगा।

८० वेदान्तसार चतुर्थ, अन्योन्याभाव एक वस्तु में दूसरी वस्तु के अभाव को कहते हैं। जैसे घट में कभी भी पट विद्यमान नहीं रह सकता। अतः इसप्रकार के अभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'अनुपलब्धि' नामक षष्ठप्रमाण की आवश्यकता होगी ही, क्योंकि उक्त चारों प्रकार के अभावों के ज्ञान को हम प्रत्यक्षादि शेष पाँच प्रमाणों द्वारा ग्रहण नहीं कर सकते हैं। (१५) कार्यकारणसिद्धान्त- कार्यकारणसिद्धान्त भारतीय दर्शनशास्त्र का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। यही सिद्धान्त किसी भी दर्शन की सृष्टिप्रक्रिया का मुख्य आधार है। चार्वाकदर्शन को छोड़कर प्रायः सभी दर्शनों ने इस विषय पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्षरूप से विचार किया है। पुनरपि सांख्य एवं न्यायदर्शन में इस सिद्धान्त की विस्तार से चर्चा की गई है। कार्यकारणसिद्धान्त को लेकर प्रचलित मतों को मुख्यरूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- (क) सत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण) से ही सत् कार्य की उत्पत्ति हो सकती है। इसलिए उत्पत्ति से पहले कार्य अपने कारण में विद्यमान रहता है। इस मान्यता को सांख्यदर्शन ने विस्तारपूर्वक प्रस्थापित किया, जिसे सत्कार्यवाद के नाम से जाना जाता है। (ख) असत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार-उत्पत्ति से पहले कार्य का अपने कारण में प्राग्भाव रहता है। अतः असत् कारण से सत् कार्य की उत्पत्ति होती है। इस मान्यता के अनुसार कारणविशेष से कार्यविशेष स्वभाववश उत्पन्न होता है। इसमें किसी अन्य हेतु की परिकल्पना उचित नहीं है। इस सिद्धान्त के मानने वालों में न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध तथा मीमांसादर्शन विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। (ग) सत् से असत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण) से असत् (कार्य) की उत्पत्ति होती है। वेदान्तदर्शन ने इसी मान्यता को प्रस्थापित किया, क्योंकि यह दर्शन सत् ब्रह्म से असत् जगत् की उत्पत्ति को स्वीकार करता है। यही सिद्धान्त इसकी सृष्टिप्रक्रिया का मुख्य आधार है। यहाँ किसी भी कार्य की उत्पत्ति के लिए मूल आधारभूत कारण उपादान है, जैसे घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी। साथ ही जिनके सहयोग से कार्य उत्पन्न होता है, वे निमित्तकारण कहलाते हैं, जैसे-कुम्हार, तुरी, वेमा आदि।