भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० ५ ] * प्रथम अंश * २५


श्वापदा द्विखुरा हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः ।
औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः ॥ ५२

गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम् ।
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ॥ ५३

यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पञ्चदशं तथा ।
बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात् ॥ ५४

सामानि जगतीछन्दः स्तोमं सप्तदशं तथा ।
वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात् ॥ ५५

एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।
अनुष्टुभं च वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ॥ ५६

उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
देवासुरपितॄन् सृष्ट्वा मनुष्यांश्च प्रजापतिः ॥ ५७

ततः पुनः ससर्जादौ सङ्कल्पस्य पितामहः ।
यक्षान् पिशाचान्गन्धर्वान् तथैवाप्सरसां गणान् ॥ ५८

नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान् ।
अव्ययं च व्ययं चैव यदिदं स्थाणुजङ्गमम् ॥ ५९

तत्ससर्ज तदा ब्रह्मा भगवानादिकृत्प्रभुः ।
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे ।
तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ ६०

हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ ६१

इन्द्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः ।
नानात्वं विनियोगं च धातैवं व्यसृजत्स्वयम् ॥ ६२

नाम रूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपञ्चनम् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः ॥ ६३

ऋषीणां नामधेयानि यथा वेदश्रुतानि वै ।
तथा नियोगयोग्यानि ह्यान्येषामपि सोऽकरोत् ॥ ६४

यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ ६५

करोत्येवंविधां सृष्टिं कल्पादौ स पुनः पुनः ।
सिसृक्षाशक्तियुक्तोऽसौ सृज्यशक्तिप्रचोदितः ॥ ६६


रहनेवाले पशु हैं। जंगली पशु ये हैं—श्वापद (व्याघ्र आदि), दो खुरवाले (वनगाय आदि), हाथी, बन्दर और पाँचवें पक्षी, छठे जलके जीव तथा सातवें सरीसृप आदि ॥ ५१-५२ ॥ फिर अपने प्रथम (पूर्व) मुखसे ब्रह्माजीने गायत्री, ऋक्, त्रिवृत्सोम रथन्तर और अग्निष्टोम यज्ञोंको निर्मित किया ॥ ५३ ॥ दक्षिण-मुखसे यजु, त्रैष्टुप्छन्द, पंचदशस्तोम, बृहत्साम तथा उक्थकी रचना की ॥ ५४ ॥ पश्चिम-मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशस्तोम, वैरूप और अतिरात्रको उत्पन्न किया ॥ ५५ ॥ तथा उत्तर-मुखसे उन्होंने एकविंशतिस्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप्छन्द और वैराजकी सृष्टि की ॥ ५६ ॥

इस प्रकार उनके शरीरसे समस्त ऊँच-नीच प्राणी उत्पन्न हुए। उन आदिकर्ता प्रजापति भगवान् ब्रह्माजीने देव, असुर, पितृगण और मनुष्योंकी सृष्टि कर तदनन्तर कल्पका आरम्भ होनेपर फिर यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरागण, मनुष्य, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग और सर्प आदि सम्पूर्ण नित्य एवं अनित्य स्थावर-जंगम जगत्की रचना की। उनमेंसे जिनके जैसे-जैसे कर्म पूर्वकल्पोंमें थे पुनः-पुनः सृष्टि होनेपर उनकी उन्हींमें फिर प्रवृत्ति हो जाती है ॥ ५७–६० ॥ उस समय हिंसा-अहिंसा, मृदुता-कठोरता, धर्म-अधर्म, सत्य-मिथ्या—ये सब अपनी पूर्व-भावनाके अनुसार उन्हें प्राप्त हो जाते हैं, इसीसे ये उन्हें अच्छे लगने लगते हैं ॥ ६१ ॥

इस प्रकार प्रभु विधाताने ही स्वयं इन्द्रियोंके विषय भूत और शरीर आदिमें विभिन्नता और व्यवहारको उत्पन्न किया है ॥ ६२ ॥ उन्होंने कल्पके आरम्भमें देवता आदि प्राणियोंके वेदानुसार नाम और रूप तथा कार्य-विभागको निश्चित किया है ॥ ६३ ॥ ऋषियों तथा अन्य प्राणियोंके भी वेदानुकूल नाम और यथायोग्य कर्मोंको उन्होंने निर्दिष्ट किया है ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार भिन्न-भिन्न ऋतुओंके पुनः-पुनः आनेपर उनके चिह्न और नाम-रूप आदि पूर्ववत् रहते हैं उसी प्रकार युगादिमें भी उनके पूर्व-भाव ही देखे जाते हैं ॥ ६५ ॥ सिसृक्षा-शक्ति (सृष्टि-रचनाकी इच्छारूप शक्ति)-से युक्त वे ब्रह्माजी सृज्य-शक्ति (सृष्टिके प्रारब्ध)-की प्रेरणासे कल्पोंके आरम्भमें बारम्बार इसी प्रकार सृष्टिकी रचना किया करते हैं ॥ ६६ ॥


इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

२६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६


छठा अध्याय

चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाच अर्वाक्स्रोतास्तु कथितो भवता यस्तु मानुषः। ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि ब्रह्मा तमस्सृजद्यथा ॥ १ यथा च वर्णानसृजद्यद्गुणांश्च प्रजापतिः। यच्च तेषां स्मृतं कर्म विप्रादीनां तदुच्यताम् ॥ २

श्रीपराशर उवाच सत्याभिध्यायिनः पूर्वं सिसृक्षोर्ब्रह्मणो जगत्। अजायन्त द्विजश्रेष्ठ सत्त्वोद्रिक्ता मुखात्प्रजाः ॥ ३ वक्षसो रजसोद्रिक्तास्तथा वै ब्रह्मणोऽभवन्। रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः ॥ ४ पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज द्विजसत्तम। तमः प्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वर्ण्यमिदं तत ॥ ५ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम। पादोरुवक्षःस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः ॥ ६ यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार वै। चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥ ७ यज्ञैराप्यायिता देवा वृष्ट्युत्सर्गेण वै प्रजाः। आप्याययन्ते धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याणहेतवः ॥ ८ निष्पाद्यन्ते नरैस्तैस्तु स्वधर्माभिरतैस्सदा। विशुद्धाचरणोपेतैः सद्भिः सन्मार्गगामिभिः ॥ ९ स्वर्गापवर्गौ मानुष्यात्प्राप्नुवन्ति नरा मुने। यच्चाभिरुचितं स्थानं तद्यान्ति मनुजा द्विज ॥ १० प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाश्चातुर्वर्ण्यव्यवस्थिताः। सम्यक्श्रद्धासमाचारप्रवणा मुनिसत्तम ॥ ११ यथेच्छावासनिरताः सर्वबाधाविवर्जिताः। शुद्धान्तःकरणाः शुद्धाः कर्मानुष्ठाननिर्मलाः ॥ १२ शुद्धे च तासां मनसि शुद्धेऽन्तः संस्थिते हरौ। शुद्धज्ञानं प्रपश्यन्ति विष्ण्वाख्यं येन तत्पदम् ॥ १३ ततः कालात्मको योऽसौ स चांशः कथितो हरेः। स पातयत्यघं घोरमल्पमल्पाल्यसारवत् ॥ १४


श्रीमैत्रेयजी बोले— हे भगवन्! आपने जो अर्वाक्स्रोता मनुष्योंके विषयमें कहा उनकी सृष्टि ब्रह्माजीने किस प्रकार की—यह विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ श्रीप्रजापतिने ब्राह्मणादि वर्णोंको जिन-जिन गुणोंसे युक्त और जिस प्रकार रचा तथा उनके जो-जो कर्तव्य-कर्म निर्धारित किये वह सब वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठ! जगत्-रचनाकी इच्छासे युक्त सत्यसंकल्प श्रीब्रह्माजीके मुखसे पहले सत्त्वप्रधान प्रजा उत्पन्न हुई ॥ ३ ॥ तदनन्तर उनके वक्षःस्थलसे रजःप्रधान तथा जंघाओंसे रज और तमविशिष्ट सृष्टि हुई ॥ ४ ॥ हे द्विजोत्तम! चरणोंसे ब्रह्माजीने एक और प्रकारकी प्रजा उत्पन्न की, वह तमःप्रधान थी। ये ही सब चारों वर्ण हुए ॥ ५ ॥ इस प्रकार हे द्विजसत्तम! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चारों क्रमशः ब्रह्माजीके मुख, वक्षःस्थल, जानु और चरणोंसे उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥

हे महाभाग! ब्रह्माजीने यज्ञानुष्ठानके लिये ही यज्ञके उत्तम साधनरूप इस सम्पूर्ण चातुर्वर्ण्यकी रचना की थी ॥ ७ ॥ हे धर्मज्ञ! यज्ञसे तृप्त होकर देवगण जल बरसाकर प्रजाको तृप्त करते हैं; अतः यज्ञ सर्वथा कल्याणका हेतु है ॥ ८ ॥ जो मनुष्य सदा स्वधर्मपरायण, सदाचारी, सज्जन और सुमार्गगामी होते हैं उन्हींसे यज्ञका यथावत् अनुष्ठान हो सकता है ॥ ९ ॥ हे मुने! [यज्ञके द्वारा] मनुष्य इस मनुष्य-शरीरसे ही स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं; तथा और भी जिस स्थानकी उन्हें इच्छा हो उसीको जा सकते हैं ॥ १० ॥

हे मुनिसत्तम! ब्रह्माजीद्वारा रची हुई वह चातुर्वर्ण्य-विभागमें स्थित प्रजा अति श्रद्धायुक्त आचरणवाली, स्वेच्छानुसार रहनेवाली, सम्पूर्ण बाधाओंसे रहित, शुद्ध अन्तःकरणवाली, सत्कुलोत्पन्न और पुण्य कर्मोंके अनुष्ठानसे परम पवित्र थी ॥ ११-१२ ॥ उसका चित्त शुद्ध होनेके कारण उसमें निरन्तर शुद्धस्वरूप श्रीहरिके विराजमान रहनेसे उन्हें शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता था जिससे वे भगवान्‌के उस 'विष्णु' नामक परम पदको देख पाते थे ॥ १३ ॥ फिर (त्रेतायुगके आरम्भमें), हमने तुमसे भगवान्‌के जिस काल नामक अंशका पहले वर्णन किया है, वह अति अल्प सारवाले (सुखवाले) तुच्छ और घोर (दुःखमय) पापोंको प्रजामें प्रवृत्त कर देता है ॥ १४ ॥

अ० ६ ] * प्रथम अंश * २७


अधर्मबीजसमुद्भूतं तमोलोभसमुद्भवम्।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम्॥ १५

ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते।
रसोल्लासादयश्चान्याः सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति याः॥ १६

तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके।
द्वन्द्वाभिभवदुःखार्त्तास्ता भवन्ति ततः प्रजाः॥ १७

ततो दुर्गाणि ताश्चक्रुर्धान्वं पार्वतमौदकम्।
कृत्रिमं च तथा दुर्गं पुरखर्वटकादिकम्॥ १८

गृहाणि च यथान्यायं तेषु चक्रुः पुरादिषु।
शीतातपादिबाधानां प्रशमाय महामते॥ १९

प्रतीकारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजाः पुनः।
वार्त्तोपायं ततश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्॥ २०

व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।
प्रियङ्गवो ह्युदाराश्च कोरदूषाः सतीनकाः॥ २१

माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुल्त्थकाः।
आढक्यश्चणकाश्चैव शणाः सप्तदश स्मृताः॥ २२

इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो मुने।
ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ २३

हिन्दी अनुवाद:

हे मैत्रेय! उससे प्रजामें पुरुषार्थका विघातक तथा अज्ञान और लोभको उत्पन्न करनेवाला रागादिरूप अधर्मका बीज उत्पन्न हो जाता है॥ १५॥ तभीसे उसे वह विष्णु-पद-प्राप्ति-रूप स्वाभाविक सिद्धि और रसोल्लास आदि अन्य अष्ट सिद्धियाँ १ नहीं मिलतीं॥ १६॥

उन समस्त सिद्धियोंके क्षीण हो जाने और पापके बढ़ जानेसे फिर सम्पूर्ण प्रजा द्वन्द्व, ह्रास और दुःखसे आतुर हो गयी॥ १७॥ तब उसने मरुभूमि, पर्वत और जल आदिके स्वाभाविक तथा कृत्रिम दुर्ग और पुर तथा खर्वट२ आदि स्थापित किये॥ १८॥ हे महामते! उन पुर आदिकोंमें शीत और घाम आदि बाधाओंसे बचनेके लिये उसने यथायोग्य घर बनाये॥ १९॥

इस प्रकार शीतोष्णादिसे बचनेका उपाय करके उस प्रजाने जीविकाके साधनरूप कृषि तथा कला-कौशल आदिकी रचना की॥ २०॥ हे मुने! धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी, ज्वार, कोदो, छोटी मटर, उड़द, मूँग, मसूर, बड़ी मटर, कुलथी, राई, चना और सन—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। ग्राम्य और वन्य दोनों प्रकारकी मिलाकर कुल चौदह ओषधियाँ याज्ञिक हैं।


१- रसोल्लासादि अष्ट-सिद्धियोंका वर्णन स्कन्दपुराणमें इस प्रकार किया है—
रसस्य स्वत एवान्तरुल्लासः स्यात्कृते युगे। रसोल्लासाख्यिका सिद्धिस्तया हन्ति क्षुधं नरः॥
स्त्र्यादीनां नैरपेक्ष्येण सदा तृप्ता प्रजास्तथा। द्वितीया सिद्धिरुद्दिष्टा सा तृप्तिर्मु निसत्तमैः॥
धर्मोत्तमश्च योऽस्त्यासां सा तृतीयाऽभिधीयते। चतुर्थी तुल्यता तासामायुषः सुखरूपयोः॥
ऐकान्त्यबलबाहुल्यं विशोका नाम पञ्चमी। परमात्मपरत्वेन तपोध्यानादिनिष्ठिता॥
षष्ठी च कामचारित्वं सप्तमी सिद्धिरुच्यते। अष्टमी च तथा प्रोक्ता यत्रक्वचनशायिता॥

**अर्थ—**सत्ययुगमें रसका स्वयं ही उल्लास होता था। यही रसोल्लास नामकी सिद्धि है, उसके प्रभावसे मनुष्य भूखको नष्ट कर देता है। उस समय प्रजा स्त्री आदि भोगोंकी अपेक्षाके बिना ही सदा तृप्त रहती थी; इसीको मुनिश्रेष्ठोंने 'तृप्ति' नामक दूसरी सिद्धि कहा है। उनका जो उत्तम धर्म था वही उनकी तीसरी सिद्धि कही जाती है। उस समय सम्पूर्ण प्रजाके रूप और आयु एक-से थे, यही उनकी चौथी सिद्धि थी। बलकी ऐकान्तिकी अधिकता—यह 'विशोका' नामकी पाँचवीं सिद्धि है। परमात्मपरायण रहते हुए तप-ध्यानादिमें तत्पर रहना छठी सिद्धि है। स्वेच्छानुसार विचरना सातवीं सिद्धि कही जाती है तथा जहाँ-तहाँ मनकी मौज पड़े रहना आठवीं सिद्धि कही गयी है।

२- पहाड़ या नदीके तटपर बसे हुए छोटे-छोटे टोलोंको 'खर्वट' कहते हैं।

२८ । श्रीविष्णुपुराण । [ अ० ६


व्रीहयस्सयवा माषा गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।<br>प्रियङ्गुसप्तमा ह्येते अष्टमास्तु कुलत्थकाः ॥ २४<br>श्यामाकास्त्वथ नीवारा जर्तिलाः सगवेधुकाः।<br>तथा वेणुयवाः प्रोक्तास्तथा मर्कटका मुने ॥ २५<br>ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्येता ओषध्यस्तु चतुर्दश।<br>यज्ञनिष्पत्तये यज्ञस्तथासां हेतुरुत्तमः ॥ २६<br>एताश्च सह यज्ञेन प्रजानां कारणं परम्।<br>परावरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते ॥ २७<br>अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां मुनिसत्तम।<br>उपकारकं पुंसां क्रियमाणाघशान्तिदम् ॥ २८<br>येषां तु कालसृष्टोऽसौ पापबिन्दुर्महामुने।<br>चेतःसु ववृधे चक्रुस्ते न यज्ञेषु मानसम् ॥ २९<br>वेदवादांस्तथा वेदान्यज्ञकर्मादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं निन्दयामासुर्यज्ञव्यासेधकारिणः ॥ ३०<br>प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्तिकारिणो वेदनिन्दकाः।<br>दुरात्मानो दुराचारा बभूवुः कुटिलाशयाः ॥ ३१<br>संसिद्धायां तु वार्तायां प्रजाः सृष्टा प्रजापतिः।<br>मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम् ॥ ३२<br>वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान्धर्मभृतां वर।<br>लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥ ३३<br>प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ३४<br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥ ३५<br>अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम् ॥ ३६<br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ३७<br>योगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम् ॥ ३८<br>एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनश्च ये।<br>तेषां तु परमं स्थानं यत्तत्पश्यन्ति सूरयः ॥ ३९उनके नाम ये हैं—धान, जौ, उड़द, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी और कुलथी—ये आठ तथा श्यामाक (समाँ), नीबार, वनतिल, गवेधु, वेणुयव और मर्कट (मक्का) ॥ २१–२५ ॥ ये चौदह ग्राम्य और वन्य ओषधियाँ यज्ञानुष्ठानकी सामग्री हैं और यज्ञ इनकी उत्पत्तिका प्रधान हेतु है॥ २६॥ यज्ञोंके सहित ये ओषधियाँ प्रजाकी वृद्धिका परम कारण हैं इसलिये इहलोक-परलोकके ज्ञाता पुरुष यज्ञोंका अनुष्ठान किया करते हैं॥ २७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! नित्यप्रति किया जानेवाला यज्ञानुष्ठान मनुष्योंका परम उपकारक और उनके किये हुए पापोंको शान्त करनेवाला है॥ २८ ॥<br><br>हे महामुने ! जिनके चित्तमें कालकी गतिसे पापका बीज बढ़ता है उन्हीं लोगोंका चित्त यज्ञमें प्रवृत्त नहीं होता ॥ २९ ॥ उन यज्ञके विरोधियोंने वैदिक मत, वेद और यज्ञादि कर्म—सभीकी निन्दा की है॥ ३०॥ वे लोग दुरात्मा, दुराचारी, कुटिलमति, वेद-निन्दक और प्रवृत्तिमार्गका उच्छेद करनेवाले ही थे ॥ ३१॥<br><br>हे धर्मवानोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय ! इस प्रकार कृषि आदि जीविकाके साधनोंके निश्चित हो जानेपर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रजाकी रचना कर उनके स्थान और गुणोंके अनुसार मर्यादा, वर्ण और आश्रमोंके धर्म तथा अपने धर्मका भली प्रकार पालन करनेवाले समस्त वर्णोंके लोक आदिकी स्थापना की ॥ ३२-३३॥ कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंका स्थान पितृलोक है, युद्ध-क्षेत्रसे कभी न हटनेवाले क्षत्रियोंका इन्द्रलोक है॥ ३४॥ तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्योंका वायुलोक और सेवाधर्मपरायण शूद्रोंका गन्धर्वलोक है ॥ ३५ ॥ अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि हैं; उनका जो स्थान बताया गया है वही गुरुकुलवासी ब्रह्मचारियोंका स्थान है॥ ३६ ॥ इसी प्रकार वनवासी वानप्रस्थोंका स्थान सप्तर्षिलोक, गृहस्थोंका पितृलोक और संन्यासियोंका ब्रह्मलोक है तथा आत्मानुभवसे तृप्त योगियोंका स्थान अमरपद (मोक्ष) है॥ ३७-३८ ॥ जो निरन्तर एकान्तसेवी और ब्रह्मचिन्तनमें मग्न रहनेवाले योगिजन हैं उनका जो परमस्थान है उसे पण्डितजन ही देख पाते हैं ॥ ३९ ॥

अ० ७ ] * प्रथम अंश * २९


गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः।<br>अद्यापि न निवर्त्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ ४०<br>तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिकम्॥ ४१<br>विनिन्दकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम्।<br>स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये॥ ४२चन्द्र और सूर्य आदि ग्रह भी अपने-अपने लोकोंमें जाकर फिर लौट आते हैं, किन्तु द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का चिन्तन करनेवाले अभीतक मोक्षपदसे नहीं लौटे॥ ४०॥ तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, घोर, कालसूत्र और अवीचिक आदि जो नरक हैं, वे वेदोंकी निन्दा और यज्ञोंका उच्छेद करनेवाले तथा स्वधर्म-विमुख पुरुषोंके स्थान कहे गये हैं॥ ४१-४२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन

श्रीपराशर उवाच<br>ततोऽभिध्यायंतस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः।<br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः करणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्त्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १<br>ते सर्वे समवर्त्तन्त ये मया प्रागुदाहृताः।<br>देवाद्याः स्थावरान्ताश्च त्रैगुण्यविषये स्थिताः॥ २<br>एवंभूतानि सृष्टानि चराणि स्थावराणि च॥ ३श्रीपराशरजी बोले— फिर उन प्रजापतिके ध्यान करनेपर उनके देहस्वरूप भूतोंसे उत्पन्न हुए शरीर और इन्द्रियोंके सहित मानस प्रजा उत्पन्न हुई। उस समय मतिमान् ब्रह्माजीके जड शरीरसे ही चेतन जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ॥ १॥ मैंने पहले जिनका वर्णन किया है, देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त वे सभी त्रिगुणात्मक चर और अचर जीव इसी प्रकार उत्पन्न हुए॥ २-३॥
यदास्य ताः प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः।<br>अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ ४<br>भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा।<br>मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसान्॥ ५<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ ६जब महाबुद्धिमान् प्रजापतिकी वह प्रजा पुत्र-पौत्रादि-क्रमसे और न बढ़ी तब उन्होंने भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ—इन अपने ही सदृश अन्य मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं॥ ४—६॥
ख्यातिं भूतिं च सम्भूतिं क्षमां प्रीतिं तथैव च।<br>सन्नतिं च तथैवोर्ज्रामनसूयां तथैव च॥ ७<br>प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा ददौ तेषां महात्मनाम्।<br>पत्न्यो भवध्वमित्युक्त्वा तेषामेव तु दत्तवान्॥ ८फिर ख्याति, भूति, सम्भूति, क्षमा, प्रीति, सन्नति, ऊर्ज्जा, अनसूया तथा प्रसूति इन नौ कन्याओंको उत्पन्न कर, इन्हें उन महात्माओंको 'तुम इनकी पत्नी हो' ऐसा कहकर सौंप दिया॥ ७-८॥
सनन्दनादयो ये च पूर्वसृष्टास्तु वेधसा।<br>न ते लोकेष्वसज्जन्त निरपेक्षाः प्रजासु ते॥ ९<br>सर्वे तेऽभ्यागतज्ञाना वीतरागा विमत्सराः।<br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः॥ १०ब्रह्माजीने पहले जिन सनन्दनादिको उत्पन्न किया था वे निरपेक्ष होनेके कारण सन्तान और संसार आदिमें प्रवृत्त नहीं हुए॥ ९॥ वे सभी ज्ञानसम्पन्न, विरक्त और मत्सरादि दोषोंसे रहित थे। उन महात्माओंको संसार-रचनासे
३०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मणोऽभून्महान् क्रोधस्त्रैलोक्यदहनक्षमः।<br>तस्य क्रोधात्समुद्भूतज्वालामालातिदीपितम्।<br>ब्रह्मणोऽभूत्तदा सर्वं त्रैलोक्यमखिलं मुने॥ ११ब्रह्माजीको त्रिलोकीको भस्म कर देनेवाला महान् क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुने! उन ब्रह्माजीके क्रोधके कारण सम्पूर्ण त्रिलोकी ज्वाला-मालाओंसे अत्यन्त देदीप्यमान हो गयी॥ १०-११॥
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्य ललाटात्क्रोधदीपितात्।<br>समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्नार्कसमप्रभः॥ १२उस समय उनकी टेढ़ी भृकुटि और क्रोध-सन्तप्त ललाटसे दोपहरके सूर्यके समान प्रकाशमान रुद्रकी उत्पत्ति हुई॥ १२॥
अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा तं ब्रह्मान्तर्दधे ततः॥ १३उसका अति प्रचण्ड शरीर आधा नर और आधा नारीरूप था। तब ब्रह्माजी 'अपने शरीरका विभाग कर' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये॥ १३॥
तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाऽकरोत्।<br>विभेदपुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ १४ऐसा कहे जानेपर उस रुद्रने अपने शरीरस्थ स्त्री और पुरुष दोनों भागोंको अलग-अलग कर दिया और फिर पुरुष-भागको ग्यारह भागोंमें विभक्त किया॥ १४॥
सौम्यासौम्यैस्तदा शान्ताऽशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>विभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ १५तथा स्त्री-भागको भी सौम्य, क्रूर, शान्त-अशान्त और श्याम-गौर आदि कई रूपोंमें विभक्त कर दिया॥ १५॥
ततो ब्रह्माऽऽत्मसम्भूतं पूर्वं स्वायम्भुवं प्रभुः।<br>आत्मानमेव कृतवान्प्रजापाल्ये मनुं द्विज॥ १६तदनन्तर, हे द्विज! अपनेसे उत्पन्न अपने ही स्वरूप स्वायम्भुवको ब्रह्माजीने प्रजा-पालनके लिये प्रथम मनु बनाया॥ १६॥
शतरूपां च तां नारीं तपोनिर्धूतकल्मषाम्।<br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः॥ १७उन स्वायम्भुव मनुने [अपने ही साथ उत्पन्न हुई] तपके कारण निष्पाप शतरूपा नामकी स्त्रीको अपनी पत्नीरूपसे ग्रहण किया॥ १७॥
तस्मात्तु पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूत्याकृतिसंज्ञितम्॥ १८हे धर्मज्ञ! उन स्वायम्भुव मनुसे शतरूपा देवीने प्रियव्रत और उत्तानपादनामक दो पुत्र
कन्याद्वयं च धर्मज्ञ रूपौदार्यगुणान्वितम्।<br>ददौ प्रसूतिं दक्षाय आकूतिं रुचये पुरा॥ १९तथा उदार, रूप और गुणोंसे सम्पन्न प्रसूति और आकूति नामकी दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे प्रसूतिको दक्षके साथ तथा आकूतिको रुचि प्रजापतिके साथ विवाह दिया॥ १८-१९॥
प्रजापतिः स जग्राह तयोर्जज्ञे सदक्षिणः।<br>पुत्रो यज्ञो महाभाग दम्पत्योर्मिथुनं ततः॥ २०हे महाभाग! रुचि प्रजापतिने उसे ग्रहण कर लिया। तब उन दम्पतीके यज्ञ और दक्षिणा—ये युगल (जुड़वाँ) सन्तान उत्पन्न हुईं॥ २०॥
यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवे मनौ॥ २१यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए, जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें याम नामके देवता कहलाये॥ २१॥
प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिस्तथा।<br>ससर्ज कन्यास्तासां च सम्यङ् नामानि मे शृणु॥ २२तथा दक्षने प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। मुझसे उनके शुभ नाम सुनो॥ २२॥
श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिर्मेधा पुष्टिस्तथा क्रिया।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी॥ २३श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, मेधा, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और तेरहवीं कीर्ति—इन दक्ष-कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपसे ग्रहण किया।
पत्‍न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः।<br>ताभ्यः शिष्टाः यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २४इनसे छोटी शेष ग्यारह कन्याएँ
ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्ततिश्चानसूया च ऊर्ज्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २५ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्तति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा थीं॥ २३—२५॥
भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्चर्षिवरस्तथा॥ २६हे मुनिसत्तम! इन ख्याति आदि कन्याओंको क्रमशः भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य,

अ० ७] * प्रथम अंश * ३१

अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम्।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तम ॥ २७<br>श्रद्धा कामं चला दर्पं नियमं धृतिरात्मजम्।<br>सन्तोषं च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरसूत ॥ २८<br>मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमेव च ॥ २९<br>बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम्।<br>व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत ॥ ३०<br>सुखं सिद्धिर्र्यशः कीर्त्तिरित्येते धर्मसूनवः।<br>कामाद्रतिः सुतं हर्षं धर्मपौत्रमसूत ॥ ३१<br>हिंसा भार्या त्वधर्मस्य ततो जज्ञे तथानृतम्।<br>कन्या च निकृतिस्ताभ्यां भयं नरकमेव च ॥ ३२<br>माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः।<br>तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ ३३<br>वेदना स्वसुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।<br>मृत्योर्व्याधिजराशोक तृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ ३४<br>दुःखोत्तराः स्मृता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।<br>नैषां पुत्रोऽस्ति वै भार्या ते सर्वे ह्यूर्ध्वरेतसः॥ ३५<br>रौद्राण्येतानि रूपाणि विष्णोर्मुनिवरात्मज।<br>नित्यप्रलयहेतुत्वं जगतोऽस्य प्रयान्ति वै॥ ३६<br>दक्षो मरीचिरत्रिश्च भृग्वाद्याश्च प्रजेश्वराः।<br>जगत्यत्र महाभाग नित्यसर्गस्य हेतवः ॥ ३७<br>मनवो मनुपुत्राश्च भूपा वीर्यधराश्च ये।<br>सन्मार्गनिरताः शूरास्ते सर्वे स्थितिकारिणः ॥ ३८<br>श्रीमैत्रेय उवाच<br>येयं नित्या स्थितिर्ब्रह्मन्नित्यसर्गस्तथेरितः।<br>नित्याभावश्च तेषां वै स्वरूपं मम कथ्यताम् ॥ ३९<br>श्रीपराशर उवाच<br>सर्गस्थितिविनाशांश्च भगवान्मधुसूदनः।<br>तैस्तै रूपैरचिन्त्यात्मा करोत्यव्याहतो विभुः ॥ ४०<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विज।<br>नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥ ४१पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ—इन मुनियों तथा अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया॥ २६-२७॥<br>श्रद्धासे काम, चला (लक्ष्मी) से दर्प, धृतिसे नियम, तुष्टिसे सन्तोष और पुष्टिसे लोभकी उत्पत्ति हुई॥ २८॥ तथा मेधासे श्रुत, क्रियासे दण्ड, नय और विनय, बुद्धिसे बोध, लज्जासे विनय, वपुसे उसका पुत्र व्यवसाय, शान्तिसे क्षेम, सिद्धिसे सुख और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ; ये ही धर्मके पुत्र हैं। रतिने कामसे धर्मके पौत्र हर्षको उत्पन्न किया॥ २९—३१॥<br>अधर्मकी स्त्री हिंसा थी, उससे अनृत नामक पुत्र और निकृति नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उन दोनोंसे भय और नरक नामके पुत्र तथा उनकी पत्नियां माया और वेदना नामकी कन्याएँ हुईं। उनमेंसे मायाने समस्त प्राणियोंका संहारकर्ता मृत्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३२-३३॥ वेदनाने भी रौरव (नरक)-के द्वारा अपने पुत्र दुःखको जन्म दिया और मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोधकी उत्पत्ति हुई ॥ ३४॥ ये सब अधर्मरूप हैं और 'दुःखोत्तर' नामसे प्रसिद्ध हैं, [क्योंकि इनसे परिणाममें दुःख ही प्राप्त होता है] इनके न कोई स्त्री है और न सन्तान। ये सब ऊर्ध्वरेता हैं॥ ३५॥ हे मुनिकुमार! ये भगवान् विष्णुके बड़े भयंकर रूप हैं और ये ही संसारके नित्य-प्रलयके कारण होते हैं॥ ३६॥ हे महाभाग! दक्ष, मरीचि, अत्रि और भृगु आदि प्रजापतिगण इस जगत्के नित्य-सर्गके कारण हैं॥ ३७॥ तथा मनु और मनुके पराक्रमी, सन्मार्गपरायण और शूर-वीर पुत्र राजागण इस संसारकी नित्य-स्थितिके कारण हैं॥ ३८॥<br>श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! आपने जो नित्य-स्थिति, नित्य-सर्ग और नित्य-प्रलयका उल्लेख किया सो कृपा करके मुझसे इनका स्वरूप वर्णन कीजिये॥ ३९॥<br>श्रीपराशरजी बोले—जिनकी गति कहीं नहीं रुकती वे अचिन्त्यात्मा सर्वव्यापक भगवान् मधुसूदन निरन्तर इन मनु आदि रूपोंसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करते रहते हैं॥४०॥ हे द्विज! समस्त भूतोंका चार प्रकारका प्रलय है—नैमित्तिक, प्राकृतिक, आत्यन्तिक और नित्य॥ ४१ ॥

३२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८


ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र शेतेऽयं जगतीपतिः।
प्रयाति प्राकृते चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतौ लयम्॥ ४२
ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।
नित्यः सदैव भूतानां यो विनाशो दिवानिशम्॥ ४३
प्रसूतिः प्रकृतेर्या तु सा सृष्टिः प्राकृता स्मृता।
दैनन्दिनी तथा प्रोक्ता यान्तरप्रलयादनु॥ ४४
भूतान्यनुदिनं यत्र जायन्ते मुनिसत्तम।
नित्यसर्गो हि स प्रोक्तः पुराणार्थविचक्षणैः॥ ४५
एवं सर्वशरीरेषु भगवान्भूतभावनः।
संस्थितः कुरुते विष्णुरुत्पत्तिस्थितिसंयमान्॥ ४६
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तयः सर्वदेहिषु।
वैष्णव्यः परिवर्त्तन्ते मैत्रेयाहर्निशं समाः॥ ४७
गुणत्रयमयं ह्येतद्ब्रह्मन् शक्तित्रयं महत्।
योऽतियाति स यात्येव परं नावत्तंते पुनः॥ ४८

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


उनमेंसे नैमित्तिक प्रलय ही ब्राह्म-प्रलय है, जिसमें जगत्पति ब्रह्माजी कल्पान्तमें शयन करते हैं; तथा प्राकृतिक प्रलयमें ब्रह्माण्ड प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ ४२॥ ज्ञानके द्वारा योगीका परमात्मामें लीन हो जाना आत्यन्तिक प्रलय है और रात-दिन जो भूतोंका क्षय होता है वही नित्य-प्रलय है॥ ४३॥ प्रकृतिसे महत्तत्वादिक्रमसे जो सृष्टि होती है वह प्राकृतिक सृष्टि कहलाती है और अवान्तर-प्रलयके अनन्तर जो [ब्रह्माके द्वारा] चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है वह दैनन्दिनी सृष्टि कही जाती है॥ ४४॥ और हे मुनिश्रेष्ठ! जिसमें प्रतिदिन प्राणियोंकी उत्पत्ति होती रहती है उसे पुराणार्थमें कुशल महानुभावोंने नित्य-सृष्टि कहा है॥ ४५॥

इस प्रकार समस्त शरीरमें स्थित भूतभावन भगवान् विष्णु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं॥ ४६॥ हे मैत्रेय! सृष्टि, स्थिति और विनाशकी इन वैष्णवी शक्तियोंका समस्त शरीरोंमें समान भावसे अहर्निश संचार होता रहता है॥ ४७॥ हे ब्रह्मन्! ये तीनों महती शक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं; अतः जो उन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है वह परमपदको ही प्राप्त कर लेता है, फिर जन्म-मरणादिके चक्रमें नहीं पड़ता॥ ४८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

रौद्र-सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन

श्रीपराशर उवाच

कथितस्तामसः सर्गो ब्रह्मणस्ते महामुने।
रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे महामुने! मैंने तुमसे ब्रह्माजीके तामस-सर्गका वर्णन किया, अब मैं रुद्र-सर्गका वर्णन करता हूँ, सो सुनो॥ १॥

कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः।
प्रादुरासीत्प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ २
कल्पके आदिमें अपने समान पुत्र उत्पन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहित वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ॥ २॥

रुरोद सुस्वरं सोऽथ प्राद्रवद्विजसत्तम।
किं त्वं रोदिषि तं ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच ह॥ ३
हे द्विजोत्तम! जन्मके अनन्तर ही वह जोर-जोरसे रोने और इधर-उधर दौड़ने लगा। उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे पूछा—"तू क्यों रोता है?"॥ ३॥

नाम देहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच प्रजापतिः।
रुद्रस्त्वं देव नाम्नासि मा रोदीर्धैर्यमावह।
एवमुक्तः पुनः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद वै॥ ४
उसने कहा—"मेरा नाम रखो।" तब ब्रह्माजी बोले—'हे देव! तेरा नाम रुद्र है, अब तू मत रो, धैर्य धारण कर।' ऐसा कहनेपर भी वह सात बार और रोया॥ ४॥

जगन्नाथ

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् श्रीविष्णु

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परमेश।

गीताप्रेस, गोरखपुर

लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव

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गीताप्रेस, गोरखपुर

अकृरको प्रथम दर्शन

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कालयवन और श्रीकुष्ण

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कंसकी मल्लशालामें श्रीबलराम

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कंसकी मल्लशालामें श्रीकृष्ण

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A vibrant, full-page illustration of Lord Shiva. He is depicted in a powerful, dynamic pose, standing on a rocky, uneven ground. He holds a golden mace (Gada) high above his head with his right hand, and a golden trident (Trishula) with a white tip in his left hand. He is wearing a golden crown (Kiritam) with a red gem, a blue and gold patterned upper garment (Kiritam), and a red and yellow dhoti (Dhoti). He is adorned with various golden jewelry, including necklaces, armlets, and a belt with a heart-shaped pendant. A quiver of arrows is visible on his back. The background is a swirling, colorful sky with shades of blue, yellow, and purple, suggesting a divine or cosmic setting. The overall style is that of a traditional Indian religious painting.

गीताप्रेस, मीरजापुर

श्रीबलरामजीकी लातसे धरती फट गयी

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गीताप्रेस, गोरखपुर

पौण्ड्रकपर श्रीकृष्णाका प्रहार

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अ० ८ ] * प्रथम अंश * ३३

ततोऽन्यानि ददौ तस्मै सप्त नामानि वै प्रभुः । स्थानानि चैषामष्टानां पत्नीः पुत्रांश्च स प्रभुः ॥ ५ भवं शर्वमथेशानं तथा पशुपतिं द्विज । भीममुग्रं महादेवमुवाच स पितामहः ॥ ६ चक्रे नामान्यथैतानि स्थानान्येषां चकार सः । सूर्यो जलं मही वायुर्वह्निराकाशमेव च । दीक्षितो ब्राह्मणः सोम इत्येतास्तनवः क्रमात् ॥ ७ सुवर्चला तथैवोषा विकेशी चापरा शिवा । स्वाहा दिशस्तथा दीक्षा रोहिणी च यथाक्रमम् ॥ ८ सूर्यादीनां द्विजश्रेष्ठ रुद्राद्यैर्नामभिः सह । पत्न्यः स्मृता महाभाग तदपत्यानि मे शृणु ॥ ९ एषां सूतिप्रसूतिभ्यामिदमापूरितं जगत् ॥ १० शनैश्चरस्तथा शुक्रो लोहिताङ्गो मनोजवः । स्कन्दः सर्गोऽथ सन्तानो बुधश्चानुक्रमात्सुताः ॥ ११ एवं प्रकारो रुद्रोऽसौ सतीं भार्यामनिन्दिताम् । उपयेमे दुहितरं दक्षस्यैव प्रजापतेः ॥ १२ दक्षकोपाच्च तत्याज सा सती स्वकलेवरम् । हिमवद्दुहिता साऽभून्मेनायां द्विजसत्तम ॥ १३ उपयेमे पुनश्चोमामनन्यां भगवान्हरः ॥ १४ देवौ धातुविधातारौ भृगोः ख्यातिरसूत । श्रियं च देवदेवस्य पत्नी नारायणस्य या ॥ १५

श्रीमैत्रेय उवाच

क्षीराब्धौ श्रीः समुत्पन्ना श्रूयतेऽमृतमन्थने । भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्नेत्येतदाह कथं भवान् ॥ १६

श्रीपराशर उवाच

नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी । यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तम ॥ १७ अर्थो विष्णुरियं वाणी नीतिरेषा नयो हरिः । बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्धर्मोऽसौ सत्क्रिया त्वियम् ॥ १८ स्रष्टा विष्णुरियं सृष्टिः श्रीर्भूमिर्भूधरो हरिः । सन्तोषो भगवाँल्लक्ष्मीस्तुष्टिर्मैत्रेय शाश्वती ॥ १९ इच्छा श्रीर्भगवान्कामो यज्ञोऽसौ दक्षिणा त्वियम् । आज्याहुतिरसौ देवी पुरोडाशो जनार्दनः ॥ २०


तब भगवान् ब्रह्माजीने उसके सात नाम और रखे; तथा उन आठोंके स्थान, स्त्री और पुत्र भी निश्चित किये ॥ ५ ॥ हे द्विज ! प्रजापतिने उसे भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र और महादेव कहकर सम्बोधन किया ॥ ६ ॥ यही उसके नाम रखे और इनके स्थान भी निश्चित किये । सूर्य, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश, [यज्ञमें] दीक्षित ब्राह्मण और चन्द्रमा—ये क्रमशः उनकी मूर्तियाँ हैं ॥ ७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! रुद्र आदि नामोंके साथ उन सूर्य आदि मूर्तियोंकी क्रमशः सुवर्चला, ऊषा, विकेशी, अपरा, शिवा, स्वाहा, दिशा, दीक्षा और रोहिणी नामकी पत्नियाँ हैं । हे महाभाग ! अब उनके पुत्रोंके नाम सुनो; उन्हींके पुत्र-पौत्रादिकोंसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है ॥ ८–१० ॥ शनैश्चर, शुक्र, लोहितांग, मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान और बुध—ये क्रमशः उनके पुत्र हैं ॥ ११ ॥ ऐसे भगवान् रुद्रने प्रजापति दक्षकी अनिन्दिता पुत्री सतीको अपनी भार्यारूपसे ग्रहण किया ॥ १२ ॥ हे द्विजसत्तम ! उस सतीने दक्षपर कुपित होनेके कारण अपना शरीर त्याग दिया था । फिर वह मेनाके गर्भसे हिमाचलकी पुत्री (उमा) हुई । भगवान् शंकरने उस अनन्यपरायणा उमासे फिर भी विवाह किया ॥ १३-१४ ॥ भृगुके द्वारा ख्यातिने धाता और विधातानामक दो देवताओंको तथा लक्ष्मीजीको जन्म दिया जो भगवान् विष्णुकी पत्नी हुईं ॥ १५ ॥

श्रीमैत्रेयजी बोले—भगवन् ! सुना जाता है कि लक्ष्मीजी तो अमृत-मन्थनके समय क्षीर-सागरसे उत्पन्न हुई थीं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि वे भृगुके द्वारा ख्यातिसे उत्पन्न हुईं ॥ १६ ॥

श्रीपराशरजी बोले—हे द्विजोत्तम ! भगवान्का कभी संग न छोड़नेवाली जगज्जननी लक्ष्मीजी तो नित्य ही हैं और जिस प्रकार श्रीविष्णुभगवान् सर्वव्यापक हैं वैसे ही ये भी हैं ॥ १७ ॥ विष्णु अर्थ हैं और ये वाणी हैं, हरि नियम हैं और ये नीति हैं, भगवान् विष्णु बोध हैं और ये बुद्धि हैं तथा वे धर्म हैं और ये सत्क्रिया हैं ॥ १८ ॥ हे मैत्रेय ! भगवान् जगत्के स्रष्टा हैं और लक्ष्मीजी सृष्टि हैं, श्रीहरि भूधर (पर्वत अथवा राजा) हैं और लक्ष्मीजी भूमि हैं तथा भगवान् सन्तोष हैं और लक्ष्मीजी नित्य-तुष्टि हैं ॥ १९ ॥ भगवान् काम हैं और लक्ष्मीजी इच्छा हैं, वे यज्ञ हैं और ये दक्षिणा हैं, श्रीजनार्दन पुरोडाश हैं और देवी लक्ष्मीजी आज्याहुति (घृतकी आहुति) हैं ॥ २० ॥


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३४ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० ८ ---|---|---

पत्नीशाला मुने लक्ष्मीः प्राग्वंशो मधुसूदनः।<br>चितिर्लक्ष्मीर्हरियूप इध्मः श्रीभगवान्कुशः॥ २१हे मुने! मधुसूदन यजमानगृह हैं और लक्ष्मीजी पत्नीशाला हैं, श्रीहरि यूप हैं और लक्ष्मीजी चिति हैं तथा भगवान् कुशा हैं और लक्ष्मीजी इध्मा हैं॥ २१॥
सामस्वरूपी भगवानुद्गीतिः कमलालया।<br>स्वाहा लक्ष्मीर्जगन्नाथो वासुदेवो हुताशनः॥ २२भगवान् सामस्वरूप हैं और श्रीकमलादेवी उद्गीति हैं, जगत्पति भगवान् वासुदेव हुताशन हैं और लक्ष्मीजी स्वाहा हैं॥ २२॥
शङ्करो भगवाञ्छौरिर्गौरी लक्ष्मीर्द्विजोत्तम।<br>मैत्रेय केशवः सूर्यस्तत्प्रभा कमलालया॥ २३हे द्विजोत्तम! भगवान् विष्णु शंकर हैं और श्रीलक्ष्मीजी गौरी हैं तथा हे मैत्रेय! श्रीकेशव सूर्य हैं और कमलवासिनी श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रभा हैं॥ २३॥
विष्णुः पितृगणः पद्मा स्वधा शाश्वतपुष्टिदा।<br>द्यौः श्रीः सर्वात्मको विष्णुरवकाशोऽतिविस्तरः॥ २४श्रीविष्णु पितृगण हैं और श्रीकमला नित्य पुष्टिदायिनी स्वधा हैं, विष्णु अति विस्तीर्ण सर्वात्मक अवकाश हैं और लक्ष्मीजी स्वर्गलोक हैं॥ २४॥
शशाङ्कः श्रीधरः कान्तिः श्रीस्तथैवानपायिनी।<br>धृतिर्लक्ष्मीर्जगच्चेष्टा वायुः सर्वत्रगो हरिः॥ २५भगवान् श्रीधर चन्द्रमा हैं और श्रीलक्ष्मीजी उनकी अक्षय कान्ति हैं, हरि सर्वगामी वायु हैं और लक्ष्मीजी जगच्चेष्टा (जगत्की गति) और धृति (आधार) हैं॥ २५॥
जलधिर्द्विज गोविन्दस्तद्वेला श्रीर्महामुने।<br>लक्ष्मीस्वरूपमिन्द्राणी देवेन्द्रो मधुसूदनः॥ २६हे महामुने! श्रीगोविन्द समुद्र हैं और हे द्विज! लक्ष्मीजी उसकी तरंग हैं, भगवान् मधुसूदन देवराज इन्द्र हैं और लक्ष्मीजी इन्द्राणी हैं॥ २६॥
यमश्चक्रधरः साक्षाद्धूमोर्णा कमलालया।<br>ऋद्धिः श्रीः श्रीधरो देवः स्वयमेव धनेश्वरः॥ २७चक्रपाणि भगवान् यम हैं और श्रीकमला यमपत्नी धूमोर्णा हैं, देवाधिदेव श्रीविष्णु कुबेर हैं और श्रीलक्ष्मीजी साक्षात् ऋद्धि हैं॥ २७॥
गौरी लक्ष्मीर्महाभागा केशवो वरुणः स्वयम्।<br>श्रीर्देवसेना विप्रेन्द्र देवसेनापतिर्हरिः॥ २८श्रीकेशव स्वयं वरुण हैं और महाभागा लक्ष्मीजी गौरी हैं, हे द्विजराज! श्रीहरि देवसेनापति स्वामिकार्तिकेय हैं और श्रीलक्ष्मीजी देवसेना हैं॥ २८॥
अवष्टम्भो गदापाणिः शक्तिर्लक्ष्मीर्द्विजोत्तम।<br>काष्ठा लक्ष्मीर्निमेषोऽसौ मुहूर्त्तोऽसौ कला त्वियम्॥ २९हे द्विजोत्तम! भगवान् गदाधर आश्रय हैं और लक्ष्मीजी शक्ति हैं, भगवान् निमेष हैं और लक्ष्मीजी काष्ठा हैं, वे मुहूर्त हैं और ये कला हैं॥ २९॥
ज्योत्स्ना लक्ष्मीः प्रदीपोऽसौ सर्वः सर्वेश्वरो हरिः।<br>लताभूता जगन्माता श्रीविष्णुर्द्रुमसंज्ञितः॥ ३०सर्वेश्वर सर्वरूप श्रीहरि दीपक हैं और श्रीलक्ष्मीजी ज्योति हैं, श्रीविष्णु वृक्षरूप हैं और जगन्माता श्रीलक्ष्मीजी लता हैं॥ ३०॥
विभावरी श्रीर्दिवसो देवश्चक्रगदाधरः।<br>वरप्रदो वरो विष्णुर्वधूः पद्मवनालया॥ ३१चक्रगदाधरदेव श्रीविष्णु दिन हैं और लक्ष्मीजी रात्रि हैं, वरदायक श्रीहरि वर हैं और पद्मनिवासिनी श्रीलक्ष्मीजी वधू हैं॥ ३१॥
नदस्वरूपी भगवाञ्छ्रीनदीरूपसंस्थिता।<br>ध्वजश्च पुण्डरीकाक्षः पताका कमलालया॥ ३२भगवान् नद हैं और श्रीजी नदी हैं, कमलनयन भगवान् ध्वजा हैं और कमलालया लक्ष्मीजी पताका हैं॥ ३२॥
तृष्णा लक्ष्मीर्जगन्नाथो लोभो नारायणः परः।<br>रती रागश्च मैत्रेय लक्ष्मीर्गोविन्द एव च॥ ३३जगदीश्वर परमात्मा नारायण लोभ हैं और लक्ष्मीजी तृष्णा हैं तथा हे मैत्रेय! रति और राग भी साक्षात् श्रीलक्ष्मी और गोविन्दरूप ही हैं॥ ३३॥
किं चातिबहुनोक्तेन सङ्क्षेपेणेदमुच्यते॥ ३४<br>देवतिर्यङ्मनुष्यादौ पुन्नामा भगवान्हरिः।<br>स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयोर्विद्यते परम्॥ ३५अधिक क्या कहा जाय? संक्षेपमें, यह कहना चाहिये कि देव, तिर्यक् और मनुष्य आदिमें पुरुषवाची भगवान् हरि हैं और स्त्रीवाची श्रीलक्ष्मीजी, इनके परे और कोई नहीं है॥ ३४-३५॥

$$\Rule{60mm}{0.4pt}{0.4pt}$$

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

$$\Rule{30mm}{0.4pt}{0.4pt}$$

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अ० ९] * प्रथम अंश * ३५

नवाँ अध्याय

दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्‌का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय ! तुमने इस समय मुझसे जिसके विषयमें पूछा है वह श्रीसम्बन्ध (लक्ष्मीजीका इतिहास) मैंने भी मरीचि ऋषिसे सुना था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ, [सावधान होकर] सुनो॥ १॥ एक बार शंकरके अंशावतार श्रीदुर्वासाजी पृथिवीतलमें विचर रहे थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विद्याधरीके हाथोंमें सन्तानक पुष्पोंकी एक दिव्य माला देखी। हे ब्रह्मन्! उसकी गन्धसे सुवासित होकर वह वन वनवासियोंके लिये अति सेवनीय हो रहा था॥ २-३॥ तब उन उन्मत्तवृत्तिवाले विप्रवरने वह सुन्दर माला देखकर उसे उस विद्याधर-सुन्दरीसे माँगा॥ ४॥ उनके माँगनेपर उस बड़े-बड़े नेत्रोंवाली कृशांगी विद्याधरीने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम कर वह माला दे दी॥ ५॥
इदं च शृणु मैत्रेय यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>श्रीसम्बन्धं मयाप्येतच्छ्रुतमासीन्मरीचितः॥ १
दुर्वासाः शङ्करास्यांशश्चचार पृथिवीमिमाम्।<br>स ददर्श स्त्रजं दिव्यांमृषिर्विद्याधरीकरे॥ २
सन्तानकानांमखिलं यस्या गन्धेन वासितम्।<br>अतिसेव्यमभूद्ब्रह्मन् तद्वनं वनचारिणाम्॥ ३
उन्मत्तव्रतधृग्विप्रस्तां दृष्ट्वा शोभनां स्त्रजम्।<br>तां ययाचे वरारोहां विद्याधरवधूं ततः॥ ४
याचिता तेन तन्वङ्गी मालां विद्याधराङ्गना।<br>ददौ तस्मै विशालाक्षी सादरं प्रणिपत्य तम्॥ ५
तामादायात्मनो मूर्ध्नि स्त्रजमुन्मत्तरूपधृक्।<br>कृत्वा स विप्रो मैत्रेय परिबभ्राम मेदिनीम्॥ ६हे मैत्रेय! उन उन्मत्तवेषधारी विप्रवरने उसे लेकर अपने मस्तकपर डाल लिया और पृथिवीपर विचरने लगे॥ ६॥ इसी समय उन्होंने उन्मत्त ऐरावतपर चढ़कर देवताओंके साथ आते हुए त्रैलोक्याधिपति शचीपति इन्द्रको देखा॥ ७॥ उन्हें देखकर मुनिवर दुर्वासाने उन्मत्तके समान वह मतवाले भौरोंसे गुंजायमान माला अपने सिरपरसे उतारकर देवराज इन्द्रके ऊपर फेंक दी॥ ८॥ देवराजने उसे लेकर ऐरावतके मस्तकपर डाल दी; उस समय वह ऐसी सुशोभित हुई मानो कैलास पर्वतके शिखरपर श्रीगंगाजी विराजमान हों॥ ९॥ उस मदोन्मत्त हाथीने भी उसकी गन्धसे आकर्षित हो उसे सूँडसे सूंघकर पृथिवीपर फेंक दिया॥ १०॥ हे मैत्रेय! यह देखकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् दुर्वासाजी अति क्रोधित हुए और देवराज इन्द्रसे इस प्रकार बोले॥ ११॥
स ददर्श तमायान्तमुन्मत्तैरावते स्थितम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं देवं सह देवैः शचीपतिम्॥ ७
तामात्मनः स शिरसः स्त्रजमुन्मत्तषट्पदाम्।<br>आदायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः॥ ८
गृहीत्वाऽमरराजेन स्त्रगैरावतमूर्द्धनि।<br>न्यस्ता रराज कैलासशिखरे जाह्नवी यथा॥ ९
मदान्धकारिताक्षोऽसौ गन्धाकृष्टेन वारणः।<br>करेणाघ्राय चिक्षेप तां स्त्रजं धरणीतले॥ १०
ततश्चुक्रोध भगवान्दुर्वासा मुनिसत्तमः।<br>मैत्रेय देवराजं तं क्रुद्धश्चैतदुवाच ह॥ ११
दुर्वासा उवाचदुर्वासाजीने कहा—अरे ऐश्वर्यके मदसे दूषितचित्त इन्द्र! तू बड़ा ढीठ है, तूने मेरी दी हुई सम्पूर्ण शोभाकी धाम मालाका कुछ भी आदर नहीं किया!॥ १२॥ अरे ! तूने न तो प्रणाम करके ‘बड़ी कृपा की’ ऐसा ही कहा और न हर्षसे प्रसन्नवदन होकर उसे अपने सिरपर ही रखा॥ १३॥ रे मूढ़! तूने मेरी दी हुई मालाका कुछ भी मूल्य नहीं किया, इसलिये तेरा त्रिलोकीका वैभव नष्ट हो जायगा॥ १४॥
ऐश्वर्यमददुष्टात्मन्नतिस्तब्धोऽसि वासव।<br>श्रीयो धाम स्त्रजं यस्त्वं मदत्तां नाभिनन्दसि॥ १२
प्रसाद इति नोक्तं ते प्रणिपातपुरःसरम्।<br>हर्षोत्फुल्लकपोलेन न चापि शिरसा धृता॥ १३
मया दत्तामिमां मालां यस्मान्न बहु मन्यसे।<br>त्रैलोक्यश्रीरतो मूढ विनाशमुपयास्यति॥ १४

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३६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ९
मां मन्यसे त्वं सदृशं नूनं शक्रेतरद्विजैः।<br>अतोऽवमानमस्मासु मानिना भवता कृतम्॥ १५इन्द्र! निश्चय ही तू मुझे और ब्राह्मणोंके समान ही समझता है, इसीलिये तुझ अति मानीने हमारा इस प्रकार अपमान किया है॥ १५॥
मद्दत्ता भवता यस्मात्क्षिप्ता माला महीतले।<br>तस्मात्प्रणष्टलक्ष्मीकं त्रैलोक्यं ते भविष्यति॥ १६अच्छा, तूने मेरी दी हुई मालाको पृथिवीपर फेंका है इसलिये तेरा यह त्रिभुवन भी शीघ्र ही श्रीहीन हो जायगा॥ १६॥
यस्य सञ्जातकोपस्य भयमेति चराचरम्।<br>तं त्वं मामतिगर्वेग देवराजावमन्यसे॥ १७रे देवराज! जिसके क्रुद्ध होनेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् भयभीत हो जाता है उस मेरा ही तूने अति गर्वसे इस प्रकार अपमान किया!॥ १७॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
महेन्द्रो वारणस्कन्धादवतीर्य त्वरान्वितः।<br>प्रसादयामास मुनिं दुर्वाससमकल्मषम्॥ १८तब तो इन्द्रने तुरन्त ही ऐरावत हाथीसे उतरकर निष्पाप मुनिवर दुर्वासाजीको [अनुनय-विनय करके] प्रसन्न किया॥ १८॥
प्रसाद्यमानः स तदा प्रणिपातपुरःसरम्।<br>इत्युवाच सहस्राक्षं दुर्वासा मुनिसत्तमः॥ १९तब उसके प्रणामादि करनेसे प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाजी उससे इस प्रकार कहने लगे॥ १९॥
दुर्वासा उवाचदुर्वासाजी बोले—
नाहं कृपालुहृदयो न च मां भजते क्षमा।<br>अन्ये ते मुनयः शक्र दुर्वाससमवेहि माम्॥ २०इन्द्र! मैं कृपालु-चित्त नहीं हूँ, मेरे अन्तःकरणमें क्षमाको स्थान नहीं है। वे मुनिजन तो और ही हैं; तुम समझो, मैं तो दुर्वासा हूँ न?॥ २०॥
गौतमादिभिरन्यैस्त्वं गर्वमारोपितो मुधा।<br>अक्षान्तिसारसर्वस्वं दुर्वाससमवेहि माम्॥ २१गौतमादि अन्य मुनिजनोंने व्यर्थ ही तुझे इतना मुँह लगा लिया है; पर याद रख, मुझ दुर्वासाका सर्वस्व तो क्षमा न करना ही है॥ २१॥
वसिष्ठाद्यैर्दयासारेःस्तोत्रं कुर्वद्भिरुच्चकैः।<br>गर्वं गतोऽसि येनैवं मामप्यद्यावमन्यसे॥ २२दयामूर्ति वसिष्ठ आदिके बढ़-बढ़कर स्तुति करनेसे तू इतना गर्वीला हो गया कि आज मेरा भी अपमान करने चला है॥ २२॥
ज्वलज्जटाकलापस्य भृकुटीकुटिलं मुखम्।<br>निरीक्ष्य कस्त्रिभुवने मम यो न गतो भयम्॥ २३अरे! आज त्रिलोकीमें ऐसा कौन है जो मेरे प्रज्वलित जटाकलाप और टेढ़ी भृकुटिको देखकर भयभीत न हो जाय?॥ २३॥
नाहं क्षमिष्ये बहुना किमुक्तेन शतक्रतो।<br>विडम्बनामिमां भूयः करोष्यनुनयात्मिकाम्॥ २४रे शतक्रतो! तू बारम्बार अनुनय-विनय करनेका ढोंग क्यों करता है? तेरे इस कहने-सुननेसे क्या होगा? मैं क्षमा नहीं कर सकता॥ २४॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः।<br>आरुह्यैरावतं ब्रह्मन् प्रययावमरावतीम्॥ २५हे ब्रह्मन्! इस प्रकार कह वे विप्रवर वहाँसे चल दिये और इन्द्र भी ऐरावतपर चढ़कर अमरावतीको चले गये॥ २५॥
ततः प्रभृति निःश्रीकं सशक्रं भुवनत्रयम्।<br>मैत्रेयासीदपध्वस्तं सङ्क्षीणौषधिवीरुधम्॥ २६हे मैत्रेय! तभीसे इन्द्रके सहित तीनों लोक वृक्ष-लता आदिके क्षीण हो जानेसे श्रीहीन और नष्ट-भ्रष्ट होने लगे॥ २६॥
न यज्ञाः समवर्त्तन्त न तपस्यन्ति तापसाः।<br>न च दानादिधर्मेषु मनश्चक्रे तदा जनः॥ २७तबसे यज्ञोंका होना बन्द हो गया, तपस्वियोंने तप करना छोड़ दिया तथा लोगोंका दान आदि धर्मोंमें चित्त नहीं रहा॥ २७॥
निःसत्त्वाः सकला लोका लोभाद्युपहतेन्द्रियाः।<br>स्वल्पेऽपि हि बभूवुस्ते साभिलाषा द्विजोत्तम॥ २८हे द्विजोत्तम! सम्पूर्ण लोक लोभादिके वशीभूत हो जानेसे सत्त्वशून्य (सामर्थ्यहीन) हो गये और तुच्छ वस्तुओंके लिये भी लालायित रहने लगे॥ २८॥
यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः सत्त्वं भूत्यनुसारि च।<br>निःश्रीकाणां कुतः सत्त्वं विना तेन गुणाः कुतः॥ २९जहाँ सत्त्व होता है वहीं लक्ष्मी रहती है और सत्त्व भी लक्ष्मीका ही साथी है। श्रीहीनोंमें भला सत्त्व कहाँ? और बिना सत्त्वके गुण कैसे ठहर सकते हैं?॥ २९॥