बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( ३४३ ) है । अतः उस अवधि में भी मकान बनाने का योग बना होगा या जमीन खरीदने का योग बना होगा । परन्तु ऐसा ज्ञात होता है कि इस आयु में मकान तो नहीं बना होगा परन्तु जमीन आपने अवश्य खरीदी होगी । मेरी राय में यह जमीन भी आपने ही खरीदी होगी या आपके नाम से खरीदी गई होगी । आपके हाथ में मंगल रेखा बलवान है और वह जीवन रेखा के समानान्तर चल रही है । मंगल पर्वत विकसित होने के कारण आपमें क्रोध की भावना भी कुछ विशेष होनी चाहिए । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपमें अपने व्यक्तित्व के प्रति जागरूकता जरूरत से ज्यादा है । और जबकि आपके आत्म विश्वास को या आपके अहं को चोट लगती है तो आप तिलमिला जाती हैं । उस समय आप सामने वाले का कच्चा चिट्ठा खोलने लग जाती हैं और यह आपकी प्रवृत्ति होनी चाहिए कि जैसे भी हो अपना पक्ष मजबूत और दृढ़ होना चाहिए और इस पक्ष को पुष्ट करने के लिए आप उन सभी तरीकों का तथा सभी तकों का प्रयोग करती हैं जो आपके अनुकूल हो सकते हैं । इसके साथ ही जैसा कि मैंने अभी बताया कि मंगल रेखा धीरे- धीरे जीवन रेखा के समानान्तर चल रही है जो कि आपमें आत्म विश्वास की भावना पैदा करती है । आपमे जरूरत से ज्यादा आत्म विश्वास होना चाहिए । किसी भी प्रकार की बाधा आने पर आप हताश या निराश नहीं होतीं अपितु अपने परिचितों को भी मुसीबत में या दुख के दिनों में धैर्य बंधाती हैं और उस परेशानियों के समुद्र को पार कराने में सहायक होती हैं । यह आपका एक उज्जवल पक्ष है । मंगल पर्वत से ही एक रेखा शनि पर्वत की ओर गई है और ऐसा ज्ञात होता है कि भले ही वह भाग्य रेखा से पूर्णतः मिल नहीं पाई है, परन्तु फिर भी उस तरफ वह बहुत अधिक बढ़ी है । इससे यह ज्ञात होता है, कि आपके जीवन में जमीन संबंधी कार्यों से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है और न भविष्य में जमीन स बन्धी कार्यों से लाभ ही है । मेरी सलाह यह है कि आप अपने नाम से यथासंभव भूमि संबंधी कार्य न करें तो ज्यादा उचित एवं अनुकूल रहेगा । हाथ में सभी गौण रेखाएं सामान्यतः अनुकूल ही हैं । हथेली में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा को मिलाकर एक बड़े त्रिभुज का आकार बनता है । और इस त्रिभुज को आकार देने में चन्द्र रेखा का भी सहयोग रहता है । यह त्रिभुज अपने आप में अनुकूल हैं । इस त्रिभुज से यह भली-भांति ज्ञात हो जाता है कि आपके जीवन का उत्तरार्द्ध ज्यादा अनुकूल एवं सुखमय कहा जा सकता है । मोटे रूप में यदि आपके पूर्ण आयु ६८ वर्ष मानते हैं तो जीवन के ३४ वें वर्ष के बाद से अनुकूलता प्रारंभ हुई होगी और आगे की अवधि में यह अनुकूलता या सुख आपके जीवन में बरा- बर बना रहेगा । मेरी राय में आपको अपने जीवन की अनुकूलता के लिए विष्णु या
( ३४४ ) श्री कृष्ण की आराधना थोड़े बहुत रूप में रखनी चाहिए । इसके अलावा श्री राम, लक्ष्मी तथा अन्य देवी देवताओं की पूजा भी आपके जीवन को अनुकूल बनाने में सहा- यक हो सकती है । महिला ने अपना सिर ऊंचा उठाया और कहा पंडितजी अब तक आपने जो भी तथ्य स्पष्ट किये हैं वे अपने आप में पूर्णतः सत्य हैं पर कुछ प्रश्न मैं इसके अतिरिक्त भी जानना चाहती हूँ । पंडितजी ने कहा—आप बिना संकोच के पूछिए, मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है । युवती मुस्कराई और कहा, आप हाथ के माध्यम से जन्म का महीना तथा जन्म समय संशोधन कर लेते हैं । मैं इस मामले में अभी तक सन्देह में हूं । मेरी मां ने जो समय मुझे बताया है वह भी उन्हें पूरी तरह से याद नहीं है । कभी वह कुछ और समय बताती हैं कभी कुछ अन्य समय को ही बता देती हैं । इस प्रकार एक समय और दूसरे समय में लगभग दो से तीन घण्टों का अन्तर है । पंडितजी ने कहा जन्म समय को संशोधन करना कोई बहुत अधिक कठिन कार्य नहीं है । आप एक मिनट रुकिये मैं अभी आपकी इस समस्या का भी समाधान कर देता हूं । पंडितजी ने आतशी शीशे का सहारा लेते हुए हाथ की रेखाओ का अध्ययन करने के बाद बोले आपका जन्म अप्रैल महीने में होना चाहिए क्योंकि आपकी मध्यमा उंगली के दूसरे पौर पर केवल एक ही रेखा पूरी है । इसके अलावा बाकी जितनी भी रेखाएं हैं वे सभी टूटी हुई तथा अस्पष्ट हैं । यदि हम तारीख का अध्ययन करें तो रेखाओं की गणना से ज्ञात होता है कि आपका जन्म ८ अप्रैल को ही होना चाहिए । दो क्षण रुककर पंडित जी ने कहा निश्चय ही आपका जन्म ८ अप्रैल १६३३ है । जहां तक हाथ की रेखाओं के अध्ययन का प्रश्न है आपकी जन्म तारीख में पूर्णतः सत्यता है । आपको अपनी तारीख तो याद है न ? हां पंडितजी मेरी जन्म तारीख आपने हाथ के माध्यम से पूर्णतः सत्य बताई है वास्तव में मेरी जन्म तारीख ८ अप्रैल १६३३ ही है । पंडितजी ने हाथ पर उसी प्रकार से दृष्टि जमाते हुए आगे उत्तर दिया कि जहां तक आपके अंगूठे के सबसे ऊपरी पौर का प्रश्न है उससे ऐसा ज्ञात होता है कि आपकी लग्न कर्क होना चाहिए और यह कर्क लग्न ही लगभग दो अंश से कुछ ही ज्यादा होना चाहिए । इस हिसाब से आपका जन्म समय शाम के ८ बजकर ३१ मिनट २४ सेकेण्ड के आसपास ही होना चाहिए और इस समय की गणना करने पर कर्क लग्न दो अंश से ही स्पष्ट होता है ।
( ३४५ ) आपकी बात लगभग सही दिखाई देती है। क्योंकि मेरी मां ने मेरा जन्म लगभग शाम को ७ से १० के बीच बताया है। मेरे पंडित जी ने जो मेरी जन्म कुण्डली बनाई थी उसमें कर्क लग्न है। परन्तु कर्क लग्न लगभग ८ अंशों में उन्होंने स्पष्ट किया है। परन्तु ऐसा ज्ञात होता है कि उनको पूर्णतः जन्म समय का ध्यान नहीं रहा होगा। आपने जो पिछली घटनाएं स्पष्ट की हैं वे पूर्णतः सत्य हैं और उसके आधार पर मेरी राय में आपने जो समय बताया है वही सत्य है और प्रामाणिक होना चाहिए। पंडितजी ने धीरे से उत्तर दिया यह पूर्णतः प्रामाणिक ही समझिये । मैंने जो जन्म समय आपको बताया है वही सत्य है। क्योंकि इसी समय को आधार बनाकर यदि जन्म कुण्डली के ग्रहों का निर्धारण किया जाय तो आपके हाथ की रेखाओं तथा जन्म कुण्डली का पूर्णतः सामंजस्य हो जाता है। और इस प्रकार आपके हाथ की रेखाओं से जो घटनाएं स्पष्ट होती हैं वे ही घटनाएं जन्म कुण्डली से स्पष्ट हो जाती हैं। कुछ क्षण रुककर पंडित जी ने बताया कि मैं १ सेकेण्ड में आपके जन्म- कालीन ग्रहों को भी स्पष्ट कर देता हूं। आपकी जन्म कुण्डली में कर्क लग्न होना चाहिए तथा सिंह राशि में सिंह गुरु, चन्द्र, मंगल तथा केतु चार ग्रहों का संगम होना चाहिए। इसी प्रकार मकर में शनि कुम्भ में राहु तथा मीन राशि में सूर्य बुध और शुक्र तीन ग्रह एक साथ बैठे हुए होना चाहिए। हकीकत में देखा जाय तो आप की जन्म कुण्डली यही बनती है। महिला ने अपने बैग में पड़ी हुई जन्म कुण्डली निकाली और मिलान करने पर देखा गया कि वास्तव में जन्म कुण्डली में ग्रहों की स्थिति लगभग वही थी जो पंडित जी ने बताई थी । पंडितजी ने हाथ की रेखाओं का अध्ययन समापन करते हुए कुछ तथ्य और बताये जो कि इस प्रकार से थे— १. आपके हाथ में आकस्मिक धन रेखा का योग नहीं है। न तो अभी तक आपको आकस्मिक धन प्राप्त हुआ है और न आगे के जीवन में ऐसा कोई योग ही है। २. वाहन सुख जीवन के २४ वर्ष के प्रारम्भ में होगा। यह कार योग होगा और आगे के जीवन में यह वाहन सुख बराबर बना रहेगा। ३. आर्थिक दृष्टि से आपके आगे के जीवन में किसी प्रकार की कोई बाधा या परेशानी नहीं है। ४. आपके हाथ में कनिष्ठिका अनामिका तथा मध्यमा पर शंख है और तर्जनी पर पर्वत चिह्न है। अतः आपके जीवन का उत्तरार्द्ध निश्चय ही ज्यादा अनुकूल एवं सुखमय है।
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५. आपके हाथ में लक्ष्मी योग, ब्रह्म योग, साधु योग, महालक्ष्मी योग, कला- कार योग पतिव्रता योग, कैलाश योग तथा कमल योग स्पष्ट दिखाई देते हैं और इन योगों के बारे में मैं व्यावहारिक हस्तरेखा ज्ञान पुस्तक में विवरण दे चुका हूँ आप इससे सम्बन्धित तथ्य वहां देख सकते हैं । ६. आगे का पूरा जीवन आध्यात्मिक दृष्टि से अनुकूल एवं सुखदायक रहेगा मृत्यु हार्ट अटैक से अपने परिवार में अपने ही घर में होगी तथा पति से पहले होगी जो कि भारतीय नारी आदर्श के अनुरूप ही है । महिला पंडितजी के ज्ञान से पूर्णतः प्रभावित हो चुकी थी । उसने उठकर चरण छूते हुए कहा—वस्तुतः आपने जो मेरे हाथ का विवेचन किया है वह अपने आप में पूर्णतः सत्य एवं प्रामाणिक है । हस्तरेखा पर आपका ज्ञान अपने आप में अद्भुत है । मैं आपको तथा आपके ज्ञान को पूर्ण श्रद्धा की दृष्टि से देखती हूँ । पंडित जी ने उत्तर दिया इसमें मेरा कोई विशेष महत्व नहीं है । हमें विनीत और श्रद्धायुक्त होना चाहिए हमारे साहित्य पर, हस्तरेखा ज्ञान पर, हमारे पूर्वज ऋषियों पर जिन्होंने यह हमें ज्ञान दिया । मैं तो एक निमित्त मात्र हूं । उनके द्वारा दिये हुए ज्ञान का दीपक जलाऊं और उसके प्रकाश में ज्यादा से ज्यादा लोग अपना रास्ता ढूंढ़ सकें । अपने जीवन को अनुकूल और व्यवस्थित कर सकें, जीवन मे सभी दृष्टियों से पूर्णता पा सकें । इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही मैंने भारतीय ज्योतिष अध्ययन अनु- संधान केन्द्र, हाई-कोर्ट कालोनी जोधपुर, राजस्थान की स्थापना की है और इसमें श्रेष्ठ पंडितों को लगाया है जिससे कि भारत और भारत के बाहर के व्यक्ति जन्म-पत्रिका और हस्तरेखा के माध्यम से पथ-प्रदर्शन प्राप्त कर सकें । मुझे अत्यन्त प्रसन्नता है कि इस थोड़े से समय में ही केन्द्र ने अत्यधिक ख्याति और सम्मान अर्जित किया है। आज वहां भारत और भारत से बाहर विश्व के अन्य देशों से भी सैकड़ों हजारों हस्तरेखाओं के चित्र तथा जन्म कुण्डलियां प्राप्त होती हैं । सभी को इस सम्बन्ध में सन्तुष्ट किया जाता है और सभी लोगों से प्रशंसा प्राप्त हुई है । मुझे विश्वास है कि यह केन्द्र निश्चय, ही ज्योतिष के क्षेत्र में भारत का प्रति- निधित्व कर सकेगा ।
उपसंहार प्रत्येक मनुष्य या सही शब्दों में कहा जाय तो प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश विद्यमान है और इसीलिए हम ईश्वर पुत्र कहे जाते हैं। ईश्वर से यहाँ सारा कार्य व्यवस्थित है, सोच समझ कर किया हुआ है, यदि आप का निर्माण हुआ है तो उसके पीछे कोई बहुत बड़ा रहस्य है कोई बहुत बड़ी आवश्यकता है। हकीकत में देखा जाय तो इस पूरे संसार में जिस रूप में आपका निर्माण और प्रादुर्भाव हुआ है वह केवल आपका ही हुआ है। आपके समान केवल इस पूरे विश्व में आप ही हैं। यह हो सकता है कि विश्व में कुछ आपसे घटकर हो सकते हैं या कुछ आपसे बढ़ कर हो सकते हैं परन्तु जिन तत्वों के अनुपात से आपका निर्माण हुआ है वह अपने आप में अन्यतम है। इसीलिये यह कहा जाता है कि ये आपके हाथ में जो रेखाएं हैं वे केवल आपके हाथ ही में है। संसार में किसी भी दो व्यक्तियों के हाथों में एक सी रेखाएं मिल ही नहीं सकतीं और इसी वजह से हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अपने आप में अलग हो जाता है। आपके सामने प्रभु ने पूरा संसार फैलाकर रखा है। अब यह आप पर निर्भर है कि इस विश्व में आप अपना क्या स्थान बनायें, किस प्रकार से स्थान बनायें, और इसके लिए यह देखना आवश्यक है कि आप अपने जीवन के क्षणों का किस प्रकार से उपयोग करते हैं। एक-एक क्षण प्रभु की तरफ से आपको वरदान स्वरूप है जो क्षण बीत गया है वह क्षण वापस आ ही नहीं सकता। चाहे हम उस क्षण को प्राप्त करने के लिए लाखों करोड़ों रुपये व्यय कर दें। जब एक क्षण लाखों करोड़ों रुपयों से भी कीमती है तो आपको यह कोई अधिकार नहीं है कि आप उस क्षण का लापरवाही के साथ उपयोग करें। व्यर्थ के वाद-विवाद में या व्यर्थ की क्रिया कलापों में उस क्षण का उपयोग करें। आपको सोचना चाहिए कि आप के जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग है और आपको प्रत्येक क्षण का उपयोग सही-सही रूप में करना है। यह आप पर निर्भर है कि आप उन क्षणों का अपने साथ और अपने आपका विश्व के साथ किस प्रकार से सामंजस्य करते हैं। यह विश्व निरन्तर गतिशील है और यदि आप भी उसी के साथ-साथ गतिशील हैं तो निश्चय ही आपका विकास है। परन्तु यदि आपकी गति उससे कम हुई तो आप पिछड़ जायेंगे, पीछे रह जायेंगे और यह विश्व आपसे बहुत अधिक आगे बढ़ जायेगा। इसके बाद आप भले ही कितना ही प्रयत्न करें, विश्व की गति के साथ-साथ आप अपनी गति का सामंजस्य नहीं कर पा सकेंगे। यह पूरा जीवन आपका स्वयं का है। ये पूरे जीवन के क्षण आपके सामने खुले हुए पड़े हैं। आपको चाहिए कि आप एक-एक क्षण का उपयोग करें। प्रत्येक
( ३४८ ) - अवसर को आते ही पहिचान लें । और उसको अपनी मुट्ठी में बन्द कर लें । प्रत्येक काल, के क्षणांश के धड़कन को आप अनुभव करें और अपने अनुकूल बनाने की कोशिश करें । ये आपके हाथ में है और यदि आपने इस प्रकार से किया तो आप देखेंगे कि आपके हाथ की रेखाएं बदल रही हैं । आपके हाथ की रेखाएं ऊपर की ओर उठ रही हैं । आपके कदम उन्नति की तरफ अग्रसर हो रहे हैं । सफलता, प्रसिद्धि और सम्मान सामने जयमाला लिये हुए खड़ा है । आवश्यकता है आपके कदम बढ़ाने की जयमालाएं वरण करने की वे आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं । व्यग्रता के साथ इन्त- जार कर रही है । जीवन के प्रत्येक कार्य के दो पहलू हैं; सकारात्मक और नकारात्मक । हम किसी भी कार्य को इन दो रूपों में ही देख सकते हैं । या यों कहा जाय कि हम निर्माण और ध्वंस के बीच में खड़े हैं । यह आप पर निर्भर है कि आप अपने जीवन की घड़ियों का सृजन करते हैं या ध्वंस करते हैं । हकीकत में देखा जाय तो आप जड़ नहीं हैं चेतन हैं । गतिशील हैं सक्रिय हैं । और सक्रियता का तात्पर्य यह है कि आप गतिशील रहें और हर क्षण अपने आपको गतिशील बनाये रखें । निरन्तर आपके पग उन्नति की तरफ अग्रसर होते रहें । आप उठें, सक्रिय बनें, सृजन करें । आप निश्चिन्त रहें कि यह आपके चारों तरफ अभाव और निराशा की जो खाई है वह अपने आप ही मिट जायेगी । ये रास्ते में जो कांटे पड़े हैं वे अपने आप फूलों में परिवर्तित हो जायेंग । पर इसके लिये आत्म-विश्वास की जरूरत है । हिम्मत साहस और धैर्य की आवश्यकता है । निरन्तर आगे बढ़ने की इच्छा-शक्ति की आवश्यकता है । आपके पास समय, शक्ति, श्रम, स्वास्थ्य और जीवन है। आप दोनों हाथों से इनका उपयोग कीजिये । आपको जितना श्रम और समय मिला है उतना ही समय गांधी को, लिंकन को, टैगोर को, ईशा को या टॉलस्टाय को भी मिला था । फिर क्या कारण है कि वे इस संसार के आकाश में आज भी चमक रहे हैं और आप गुम- नाम से अंधेरे में भटक रहे हैं। फिर क्या कारण है कि आप पीछे हैं, फिर क्या बात है कि आपके कदम लड़खड़ा रहे हैं। उठिये, आगे बढ़िए, सफलता की मंजिल सामने ही है, विजय श्री आपको पुकार रही है, प्रसिद्धि और सम्मान आपके स्वागत के लिए खड़े हैं और सफलता जयमाला लिए आपको वरण करने के लिए तैयार है। हृदय में जोश और स्नायुओं में साहस भरकर आगे बढ़िये । आपका प्रत्येक के कदम मजबूत हो, इस धुंधलके में भी आपकी दृष्टि आर-पार देख सके। आपके हाथ में है कि आप अपनी दुर्बल रेखाओं को बदल दें । अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिणित कर दें । काम करने का यही समय है । इसी क्षण से समय है और सही रूप में आपके जीवन के समय की यही पुकार है ।
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