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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ

॥श्रीमद्भगवद्गीता॥ ॥यथार्थ गीता॥ मानव धर्मशास्त्र स्वामी अड़गड़ानन्द HINDI ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥ ॥यथार्थ गीता॥ ५२०० वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥ ॥यथार्थ गीता॥ मानव धर्मशास्त्र

लेखक के प्रति ..... “यथार्थ गीता” के लेखक एक सन्त हैं जो शैक्षिक उपाधियों से सम्बद्ध न होने पर भी सद्गुरु कृपा के फलस्वरूप ईश्वरीय आदेशों से संचालित हैं । लेखन को आप साधना-भजन में व्यवधान मानते रहे हैं किन्तु गीता के इस भाष्य में निर्देशन ही निमित्त बना । भगवान ने आपको अनुभव में बताया कि आपकी सारी वृत्तियाँ शान्त हो गई हैं केवल छोटी-सी एक वृत्ति शेष है - गीता लिखना । पहले तो स्वामीजी ने इस वृत्ति को भजन से काटने का प्रयत्न किया किन्तु भगवान के आदेश का मूर्त स्वरूप है, ‘यथार्थ गीता’ । भाष्य में जहाँ भी त्रुटि होती भगवान सुधार देते थे । स्वामीजी की स्वान्तः सुखाय यह कृति सर्वान्तः सुखाय बने, इसी शुभकामना के साथ ।

  • प्रकाशक की ओर से

यथार्थ गीता: भूमिका एवं मानव धर्मशास्त्र

।। ॐ नमः सद्गुरुदेवाय ।। ।। श्रीमद्भगवद्गीता ।। ॥ यथार्थ गीता ॥ मानव-धर्मशास्त्र प्रत्यक्षानुभूत व्याख्या : परमपूज्य श्री परमहंस महाराज का कृपा-प्रसाद स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी श्री परमहंस आश्रम ग्राम-पत्रालय- शक्तेषगढ़, जिला-मिर्जापुर, उ०प्र०, भारत फोन : (०५४४३) २३८०४० प्रकाशक : श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट न्यू अपोलो स्टेट, गाला नं- ५, मोगरा लेन (रेलवे सब वे के पास) अंधेरी (पूर्व), मुम्बई - ४०००६९

श्रीकृष्ण जिस स्तर की बात करते हैं, क्रमशः चलकर उसी स्तर पर खड़ा होनेवाला कोई महापुरुष ही अक्षरशः बता सकेगा कि श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे? मनोगत समस्त भाव कहने में नहीं आते। कुछ तो कहने में आ पाते हैं, कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक हैं- जिन्हें कोई पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमशः चलकर उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। वह गीता की पंक्तियाँ ही नहीं दुहराता, बल्कि उनके भावों को भी दर्शा देता है; क्योंकि जो दृश्य श्रीकृष्ण के सामने था, वही उस वर्तमान महापुरुष के समक्ष भी है। इसलिये वह देखता है, दिखा देगा; आपमें जागृत भी कर देगा, उस पथ पर चला भी देगा। 'पूज्य श्री परमहंस जी महाराज' भी उसी स्तर के महापुरुष थे। उनकी वाणी तथा अन्तःप्रेरणा से मुझे गीता का जो अर्थ मिला, उसी का संकलन 'यथार्थ गीता' है।

  • स्वामी अड़गड़ानन्द

हमारे प्रकाशन पुस्तकें भाषा यथार्थ गीता भारतीय भाषायें हिन्दी, मराठी, पंजाबी, गुजराती, उर्दू, संस्कृत, उड़िया, बंगला, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़, आसामी, सिन्धी। विदेशी भाषायें अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, नेपाली, स्पेनिश, फारसी, डच, नार्वेजीयन, चायनीज, इटालियन, रूसी, पुर्तगाली। शंका समाधान हिन्दी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी। जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति हिन्दी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी। अंग क्यों फड़कते हैं? क्या कहते हैं? हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, जर्मन। अनछुए प्रश्न हिन्दी, मराठी, गुजराती। एकलव्य का अंगूठा हिन्दी, मराठी, गुजराती। भजन किसका करें? हिन्दी, मराठी, गुजराती, जर्मन, अंग्रेजी, नेपाली। योगशास्त्रीय प्राणायाम हिन्दी, मराठी, गुजराती। षोडशोपचार पूजन-पद्धती हिन्दी, मराठी, गुजराती। योगदर्शन-प्रत्यक्षानुभूत व्याख्या हिन्दी, गुजराती, संस्कृत। ग्लोरिस् ऑफ योगा अंग्रेजी। प्रश्न समाज के - उत्तर गीता से हिन्दी। बारहमासी हिन्दी। अहिंसा का स्वरुप हिन्दी, मराठी, गुजराती, नेपाली। ऑडियो कैसेट्स यथार्थ गीता हिन्दी, गुजराती, मराठी, अंग्रेजी। अमृतवाणी हिन्दी। (श्री स्वामीजी के मुखारविन्द से निःसृत अमृतवाणियों का संकलन वाल्यूम १ से ५५ तक।) गुरुवंदना (आरती) ऑडियोसीडीज् (Mp3) यथार्थ गीता हिन्दी, गुजराती, मराठी, अंग्रेजी, जर्मन, बंगला। अमृतवाणी हिन्दी। © सर्वाधिकार-लेखक (उपरोक्त पुस्तकों का कोई भी अंश प्रकाशन, रिकार्डिंग, प्रतिलिपि प्रकाशन तथा संशोधन बिना लेखक की अनुमति के वर्जित है।)

अनन्तश्री विभूषित, योगिराज, युग पितामह परमपूज्य श्री स्वामी परमानन्द जी श्री परमहंस आश्रम अनुसुइया-चित्रकूट के परम पावन चरणों में सादर समर्पित अन्तःप्रेरणा

गुरु-वन्दना ।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय ।। जय सद्गुरुदेवं, परमानन्दं, अमर शरीरं अविकारी।। निर्गुण निर्मूलं, धरि स्थूलं, काटन शूलं भवभारी।। सूरत निज सोहं, कलिमल खोहं, जनमन मोहन छविभारी।। अमरापुर वासी, सब सुख राशी, सदा एकरस निर्विकारी।। अनुभव गम्भीरा, मति के धीरा, अलख फकीरा अवतारी।। योगी अद्वैष्टा, त्रिकाल द्रष्टा, केवल पद आनन्दकारी।। चित्रकूटहिं आयो, अद्वैत लखायो, अनुसुइया आसन मारी।। श्री परमहंस स्वामी, अन्तर्यामी, हैं बड़नामी संसारी।। हंसन हितकारी, जग पगुधारी, गर्व प्रहारी उपकारी।। सत्-पंथ चलायो, भरम मिटायो, रूप लखायो करतारी।। यह शिष्य है तेरो, करत निहोरो, मोपर हेरो प्रणधारी।। जय सद्गुरु.........भारी।। ।। ॐ ।।

आत्मने मोक्षार्थ जगत् हिताय च श्री श्री १००८ श्री स्वामी परमानन्दजी महाराज ( परमहंसजी ) जन्म : शुभ सम्वत् विक्रम १९६९ (सन् १९११ ई०) महाप्रयाण : ज्येष्ठ शुक्ल ७, वि०सं० २०२६, दिनांक २३/०५/१९६९ ई० परमहंस आश्रम अनुसुइया, चित्रकूट

श्री स्वामी अड़गड़ानन्दजी महाराज (परमहंस महाराज का कृपा-प्रसाद)

श्री हरि की वाणी वीतराग परमहंसों का आधार आदि शास्त्र गीता - संत मत १०-२-२००७ - तृतीय विश्वहिन्दू सम्मेलन दिनांक १०-११-१२-१३ फरवरी २००७ के अवसर पर अर्धकुम्भ २००७ प्रयाग भारत में प्रवासी एवं अप्रवासी भारतीयों के विश्व सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर विश्व हिन्दु परिषद ने ग्यारहवी धर्मसंसद में पारीत गीता हमारा धर्मशास्त्र है प्रस्ताव के परिप्रेक्ष्य में गीता को सदैव से विद्यमान भारत का गुरुग्रन्थ कहते हुए यथार्थ गीता को इसका शाश्वत भाष्य उद्घोषित किया तथा इसके अन्तर्राष्ट्रीय मानव धर्मशास्त्र की उपयोगिता रखने वाला शास्त्र कहा । अशोक सिंहल (अशोक सिंहल) अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष - विश्व हिन्दू परिषद ॥ श्री काशीविश्वनाथो विजयते ॥ टे.नं. : २४५२१९३ ॐ मो. : ९४१५२८५८५६ सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-शास्त्रार्थविद्यावतार-विश्वविश्रुत-महामहोपाध्यायादिविरुदविभूषक पण्डितसम्राट्-प्रातःस्मरणीय श्री शिवकुमाराशास्त्रीभिरप्रतिष्ठापिता वाराणसेयसर्वविद्वद्विद्वत्समाज-प्रतिनिधिभूता- श्री काशीविद्वत्परिषद् पत्राचार कार्यालय : डी. १७/५८, दशाश्वमेध, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत दिनांक १.३.०४ १-३-२००५- भारत की सर्वोच्च श्री काशी विद्वत्परिषद ने दिनांक १-३-२००४ को “श्रीमद् भगवद् गीता” को आदि मनुस्मृति तथा वेदों को इसी का विस्तार मानते हुए विश्वमानव का धर्मशास्त्र और यथार्थ गीता को परिभाषा के रूप में स्वीकार किया और यह उद्घोषित किया कि धर्म और धर्मशास्त्र अपरिवर्तनशील होने से आदिकाल से धर्मशास्त्र “श्रीमद् भगवद् गीता” ही रही है। गणेशदत्त शास्त्री डा. केदार नाथ त्रिपाठी गणेशदत्त शास्त्री आचार्य केदारनाथ त्रिपाठी दर्शनरत्नम वाचस्पति मंत्री अध्यक्ष श्री काशीविद्वत्परिषद श्री काशीविद्वत्परिषद भारत भारत विश्व धर्म संसद् WORLD RELIGIOUS PARLIAMENT ३-१-२००१- विश्वधर्म संसद में विश्व मानव धर्मशास्त्र “श्रीमद् भगवद् गीता” के भाष्य यथार्थ गीता पर परम पूज्य परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज जी को प्रयाग के परमपावन पर्व महाकुम्भ के अवसर पर विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित किया । २-४-१९९८- मानवमात्र का धर्मशास्त्र “श्रीमद् भगवद् गीता” की विशुद्ध व्याख्या यथार्थ गीता के लिए धर्मसंसद द्वारा हरिद्वार में महाकुम्भ के अवसर पर अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन में परमपूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज को भारत गौरव के सम्मान से विभूषित किया गया । १-४-१९९८- बीसवी शताब्दी के अन्तिम महाकुम्भ के अवसर पर हरिद्वार के समस्त शंकराचार्यों महामण्डलेश्वरो ब्राह्मण महासभा और ४४ देशों के धर्मशील विद्वानों की उपस्थिति में विश्व धर्म संसद द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन में पूज्य स्वामी जी को “श्रीमद् भगवद् गीता” धर्मशास्त्र (भाष्य यथार्थ गीता) के द्वारा विश्व के विकास में अद्वितीय योगदान हेतु “विश्वगौरव” सम्मान प्रदान किया गया । 26-1-2001 Chairman Acharya Prabhakar Mishra Presentation Committee महाकुम्भ प्रयाग Chairman (Indian Region) or मेला World Religious Parliament Presiding Authority WRP

<u>माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद का ऐतिहासिक निर्णय</u> माननीय उच्चन्यायालय इलाहाबाद ने रिट याचिका संख्या ५६४४७ सन २००३ श्यामलरंजन मुखर्जी बनाम निर्मलरंजन मुखर्जी एवं अन्य के प्रकरण में अपने निर्णय दिनांक ३० अगस्त २००७ को “श्रीमद् भगवद् गीता” को समस्त विश्व का धर्मशास्त्र मानते हुए राष्ट्रीय धर्मशास्त्र की मान्यता देने की संस्तुति की है। अपने निर्णय के प्रस्तर ११५ से १२३ में माननीय न्यायालय ने विभिन्न गीता भाष्यों पर विचार करते हुए यथार्थ गीता को इसके सम्यक एवं युगानुकुल भाष्य के रुप में मान्य करते हुए धर्म, कर्म, यज्ञ, योग आदि को परिभाषा के आधार पर इसे जाति पाति मजहब सम्प्रदाय देश व काल से परे मानवमात्र का धर्मशास्त्र माना जिसके माध्यम से लौकिक व पारलौकिक दोनों समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। नोट - उपरोक्त निर्णय माननीय उच्च न्यायालय ईलाहाबाद की बेवसाईट पर उपलब्ध है। <u>Extract from Historical Judgment of Hon'ble High Court,</u> <u>Allahabad</u> Hon'ble Mr. Justice S.N. Srivastava, (in his judgment dated 30.8.2007 passed in writ petition No. 56447 of 2003 Shyamal Ranjan Mukherjee Vs. Nirmal Ranjan Mukherjee & others) has been pleased to hold that: “Shrimadbhagwad Gita is a Dharmshastra not only for Hindu but for all human beings. Message of Gita is relevant for all Religions of the world and is not limited for any particular Religion”. “Yatharth Geeta” by Swami Adgadanandji Maharaj, a great saint of India,is Dharm and Dharmshastra for all, irrespective of their caste, creed, race, religion, Dharm & community and is for all times and space. N.B.:- The aforesaid decision is available on the Website: http://www.allahabadhighcourt.in

गीता मानव मात्र का धर्मशास्त्र है। -महर्षि वेदव्यास श्रीकृष्णकालीन महर्षि वेदव्यास से पूर्व कोई भी शास्त्र पुस्तक के रूप में उपलब्ध नहीं था। श्रुतज्ञान की इस परम्परा को तोड़ते हुए उन्होंने चार वेद, ब्रह्मसूत्र, महाभारत, भागवत एवं गीता-जैसे ग्रन्थों में पूर्वसंचित भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञानराशि को संकलित कर अन्त में स्वयं ही निर्णय दिया कि- गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।। ( म.भा., भीष्मपर्व अ० ४३/१ ) गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से निःसृत वाणी है; फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता? मानव-सृष्टि के आदि में भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निःसृत अविनाशी योग अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता, जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद् हैं, विस्मृति आ जाने पर उसी आदिशास्त्र को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया, जिसकी यथावत् व्याख्या 'यथार्थ गीता' है। 'गीता' का सारांश इस श्लोक से प्रकट होता है- एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम् एको देवो देवकीपुत्र एव। एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।। -( गीता-माहात्म्य ) अर्थात् एक ही शास्त्र है जो देवकीपुत्र भगवान ने श्रीमुख से गायन किया- गीता! एक ही प्राप्त करने योग्य देव है। उस गायन में जो सत्य बताया- आत्मा! सिवाय आत्मा के कुछ भी शाश्वत नहीं है। उस गायन में उन

महायोगेश्वर ने क्या जपने के लिये कहा? ओम्। अर्जुन ! ओम् अक्षय परमात्मा का नाम है, उसका जप कर और ध्यान मेरा धर। एक ही कर्म है गीता में वर्णित परमदेव एक परमात्मा की सेवा। उन्हें श्रद्धा से अपने हृदय में धारण करें। अस्तु, आरम्भ से ही गीता आपका शास्त्र रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के हजारों वर्ष पश्चात् परवर्ती जिन महापुरुषों ने एक ईश्वर को सत्य बताया, गीता के ही सन्देशवाहक हैं। ईश्वर से ही लौकिक एवं पारलौकिक सुखों की कामना, ईश्वर से डरना, अन्य किसी को ईश्वर न मानना- यहाँ तक तो सभी महापुरुषों ने बताया; किन्तु ईश्वरीय साधना, ईश्वर तक की दूरी तय करना- यह केवल गीता में ही सांगोपांग क्रमबद्ध सुरक्षित है। गीता से सुख-शान्ति तो मिलती ही है, यह अक्षय अनामय पद भी देती है। देखिये श्रीमद्भगवद्गीता की टीका- 'यथार्थ गीता'। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादर है फिर भी यह किसी मज़हब या सम्प्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी; क्योंकि सम्प्रदाय किसी-न-किसी रूढ़ि से जकड़े हैं। भारत में प्रकट हुई गीता विश्व-मनीषा की धरोहर है, अतः इसे राष्ट्रीय शास्त्र का मान देकर ऊँच-नीच, भेदभाव तथा कलह-परम्परा से पीड़ित विश्व की सम्पूर्ण जनता को शान्ति देने का प्रयास करें। ।। ॐ ।।

धर्म-सिद्धान्त — एक १. सभी प्रभु के पुत्र- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। (गीता, १५/७) सभी मानव ईश्वर की सन्तान हैं। २. मानव तन की सार्थकता- अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। (गीता, ९/३३) सुखरहित, क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मानव-तन को पाकर मेरा भजन कर अर्थात् भजन का अधिकार मनुष्य-शरीरधारी को है। ३. मनुष्य की केवल दो जाति- द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।। (गीता, १६/६) मनुष्य केवल दो प्रकार के हैं- देवता और असुर। जिसके हृदय में दैवी सम्पत्ति कार्य करती है वह देवता है तथा जिसके हृदय में आसुरी सम्पत्ति कार्य करती है वह असुर है। तीसरी कोई अन्य जाति सृष्टि में नहीं है। ४. हर कामना ईश्वर से सुलभ- त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।। (गीता, ९/२०) मुझे भजकर लोग स्वर्ग तक की कामना करते हैं; मैं उन्हें देता हूँ। अर्थात् सब कुछ एक परमात्मा से सुलभ है। ५. भगवान की शरण से पापों का नाश- अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।। (गीता, ४/३६) सम्पूर्ण पापियों से अधिक पाप करनेवाला भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह पार हो जायेगा।

६. ज्ञान- अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थ दर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता, १३/११) आत्मा के आधिपत्य में आचरण, तत्त्व के अर्थरूप मुझ परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ज्ञान है और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, अज्ञान है। अतः ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी ही ज्ञान है। ७. भजन का अधिकार सबको- अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।। (गीता, ९/३०) क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।। (गीता, ९/३१) अत्यन्त दुराचारी भी मेरा भजन करके शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है एवं सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है। अतः धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा के प्रति समर्पित है और भजन करने का अधिकार दुराचारी तक को है। ८. भगवत्पथ में बीज का नाश नहीं- नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। (गीता, २/४०) इस आत्मदर्शन की क्रिया का स्वल्प आचरण भी जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार करनेवाला होता है। ९. ईश्वर का निवास- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१) ईश्वर सभी भूतप्राणियों के हृदय में रहता है। तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, १८/६२) सम्पूर्ण भाव से उस एक परमात्मा की शरण में जाओ। जिसकी कृपा से तू परमशान्ति, शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा।

१०. यज्ञ- सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।। ( गीता, ४/२७) सम्पूर्ण इन्द्रियों के व्यापार को, मन की चेष्टाओं को ज्ञान से प्रकाशित हुई आत्मा में संयमरूपी योगाग्नि में हवन करते हैं। अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।। ( गीता, ४/२९) बहुत से योगी श्वास को प्रश्वास में हवन करते हैं और बहुत से प्रश्वास को श्वास में। इससे उन्नत अवस्था होने पर अन्य श्वास-प्रश्वास की गति रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं। इस प्रकार योग-साधना की विधि-विशेष का नाम यज्ञ है। उस यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। ११. कर्म- एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।। ( गीता, ४/३२) इस प्रकार बहुत से यज्ञ जैसे श्वास का प्रश्वास में हवन, प्रश्वास का श्वास में हवन, श्वास-प्रश्वास का निरोध कर प्राणायाम के परायण होना इत्यादि यज्ञ जिस आचरण से पूर्ण होता है, उस आचरण का नाम कर्म है। कर्म माने आराधना, कर्म माने चिन्तन ! योग साधना पद्धति का नाम यज्ञ है। विकर्म- विकर्म का अर्थ विकल्पशून्य कर्म है। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम महापुरुषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है; फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिए कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है। ( गीता, ४/१७) १२. यज्ञ करने का अधिकार- यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।। ( गीता, ४/३१ )

यज्ञ न करनेवालों को दुबारा मनुष्य-शरीर भी नहीं मिलता अर्थात् यज्ञ करने का अधिकार उन सबको है जिन्हें मनुष्य-शरीर मिला है। १३. ईश्वर देखा जा सकता है- भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। (गीता, ११/५४) अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने, जानने तथा प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ। आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।। (गीता, २/२९) इस अविनाशी आत्मा को कोई विरला ही आश्चर्य की तरह देखता है, आश्चर्य की ज्यों उपदेश करता है और कोई विरला ही इसे आश्चर्य की ज्यों सुनता है अर्थात् यह प्रत्यक्ष दर्शन है। १४. आत्मा ही सत्य है, सनातन है- अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।। (गीता, २/२४) यह आत्मा सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है। आत्मा ही सत्य है। १५. विधाता और उससे उत्पन्न सृष्टि नश्वर है- आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। (गीता, ८/१६) ब्रह्मा और उससे निर्मित सृष्टि, देवता और दानव दुःखों की खानि, क्षणभंगुर और नश्वर हैं। १६. देव-पूजा- कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।। (गीता, ७/२०)

कामनाओं से जिनकी बुद्धि आक्रान्त है, ऐसे मूढ़बुद्धि ही परमात्मा के अतिरिक्त अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।। ( गीता, ९/२३ ) देवताओं को पूजनेवाला मेरी ही पूजा करता है; किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है, इसलिये नष्ट हो जाता है। शास्त्रविधि का त्याग- यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।। ( गीता, १७/४ ) अर्जुन ! शास्त्रविधि को त्यागकर भजनेवाले सात्त्विकी श्रद्धावाले देवताओं को, राजस पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामस पुरुष भूत-प्रेतों को पूजते हैं; किन्तु- कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।। ( गीता, १७/६ ) वे शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय और अन्तर्यामी रूप में स्थित मुझ परमात्मा को कृश करनेवाले हैं। उनको तू असुर जान। अर्थात् देवताओं को पूजनेवाले भी आसुरी वृत्ति के अन्तर्गत हैं। १७. अधम- तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।। ( गीता, १६/१९ ) जो यज्ञ की नियत विधि छोड़ कल्पित विधियों से यजन करते हैं वे ही क्रूरकर्मी, पापाचारी तथा मनुष्यों में अधम हैं। अन्य कोई अधम नहीं है। १८. नियत विधि क्या है?- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। ( गीता, ८/१३ ) ॐ, जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है उसका जप तथा मुझ एक परमात्मा का स्मरण, तत्त्वदर्शी महापुरुष के संरक्षण में ध्यान।

१९. शास्त्र- इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।। (गीता, १५/२०) इस प्रकार यह अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। स्पष्ट है कि शास्त्र गीता है। तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। (गीता, १६/२४) कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य के निर्धारण में शास्त्र ही प्रमाण है। अतः गीता में निर्धारित विधि से आचरण करें। २०. धर्म- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।। (गीता, १८/६६) धार्मिक उथल-पुथल को छोड़ एकमात्र मेरी शरण हो जा अर्थात् एक भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही धर्म का मूल है, उस प्रभु को पाने की नियत विधि का आचरण ही धर्माचरण है (अध्याय २, श्लोक ४०) और जो उसे करता है वह अत्यन्त पापी भी शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है (अध्याय ९, श्लोक ३०)। २१. धर्म प्राप्त कहाँ से करें?- ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।। (गीता, १४/२७) उस अविनाशी ब्रह्म का, अमृत का, शाश्वत-धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् परमात्मस्थित सद्गुरु ही इन सबका आश्रय है। नोट- विश्व के सारे धर्मों की सत्यधारा 'गीता' का ही प्रसारण है। ॐ

प्राचीनकाल से लेकर अद्यतन मनीषियों द्वारा दिये गये तैथिक क्रमानुसार सन्देश श्री परमहंस आश्रम जगतानन्द, ग्रा०पो०-बरैनी, कछवा, जिला-मिर्जापुर (उ०प्र०) में अपने निवास की अवधि में स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी ने प्रवेश-द्वार के पास इस तालिका को गंगा दशहरा (१९९३ ई०) के पावन पर्व पर बोर्ड पर अंकित कराया। ।। विश्वगुरु भारत ।। • सृष्टि का आदिशास्त्र- ‘इमं विवस्वते योगम्’ (गीता, ४/१) भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- इस अविनाशी योग को मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे स्वयंभू आदिमनु से कहा। जिसके अनुसार एक परमात्मा ही सत्य है, परमतत्त्व है; वह कण- कण में व्याप्त है। योग-साधना के द्वारा वह परमात्मा दर्शन, स्पर्श और प्रवेश के लिये सुलभ है। भगवान द्वारा उपदिष्ट वह आदिज्ञान वैदिक ऋषियों से लेकर अद्यावधि अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित है। • वैदिक ऋषि (अनादिकाल-नारायण सूक्त)- कण-कण में व्याप्त ब्रह्म ही सत्य है। उसे विदित करने के अतिरिक्त मुक्ति का कोई अन्य उपाय नहीं है। • भगवान श्रीराम (त्रेता-लाखों वर्ष पूर्व-रामायण)- एक परमात्मा के भजन के बिना जो कल्याण चाहता है, वह मूढ़ है। • योगेश्वर श्रीकृष्ण (५००० वर्ष पूर्व-गीता)- परमात्मा ही सत्य है। चिन्तन की पूर्ति में उस सनातन ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है। देवी-देवताओं की पूजा मूढ़बुद्धि की देन है। • महात्मा मूसा (३००० वर्ष पूर्व-यहूदी धर्म)- तुमने ईश्वर से श्रद्धा हटायी, मूर्ति बनायी- इससे ईश्वर नाराज है। प्रार्थना में लग जाओ। • महात्मा जरथुस्त्र (२७०० वर्ष पूर्व-पारसी धर्म)- अहूर-मज्दा (ईश्वर) की उपासना द्वारा हृदय में स्थित विकारों को नष्ट करो, जो दुःख के कारण हैं।