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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

वैराग्य प्रकरण । ५३

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! बालक अवस्था तो महाजड़ और अशक्त है । जब युवावस्था आती है तब बाल्यावस्था का ग्रास कर लेती है और उसके अनन्तर जब वृद्धावस्था आती है शरीर जर्जरीभूत हो जाता है और बुद्धि क्षीण हो जाती है, फिर मृत्यु पाता है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार अज्ञानी का जीना व्यर्थ है, कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं । जैसे नदी के तट पर के वृक्ष जल के प्रवाह से जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर जर्जरीभूत हो जाता है। जैसे पवन से पत्र उड़ जाते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर नाश पाता है । जितने कुछ रोग हैं वह सब वृद्धावस्था में आ प्राप्त होते हैं और शरीर कृश हो जाता है। उस समय स्त्री, पुत्रादिक भी सब वृद्ध का त्याग कर देते हैं । जैसे पक्के फल को वृक्ष त्याग देता है वैसे वृद्ध को कुटुम्ब त्याग देता है और जैसे बावले को देख के सब हँसके बोलते हैं कि इसकी बुद्धि जाती रही वैसे ही इसको भी देखके हँसते हैं । जैसे कमल का फूल बर्फ पड़ने से जर्जरीभूत हो जाना है वैसे ही जरा-वस्था में पुरुष जर्जरीभाव को प्राप्त होता है, शरीर कुबड़ा हो जाता है, केश श्वेत हो जाते हैं और शक्ति क्षीण हो जाती है। जैसे चिर काल के बड़े वृक्ष में घुन लगता है वैसे ही इसमें कुछ शक्ति नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! और भी सब कृत्य क्षीण हो जानी है परन्तु एक आसक्तिमात्र रहती है । जैसे बड़े वृक्ष पर उलूक आ रहते हैं वैसे ही इसमें क्रोध शक्ति आ रहती है और सब शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। हे मुनीश्वर ! जरावस्था दुःख का घर है जब जरावस्था आती है तब सब दुःख इकट्ठे होते हैं उनसे पुरुष महादीन हो जाते हैं । युवावस्था में जो काम का बल रहता है सो भी जरा में क्षीण हो जाता है, इन्द्रियों की आसक्ति घट जाती है और उनकी चपलता का अभाव हो जाता है । जैसे पिता के निर्धन होने से पुत्र दीन हो जाता है वैसे ही शरीर के निर्बल होने से इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं केवल एक तृष्णा बढ़ जाती है । हे मुनीश्वर ! जब जगारूपी रात्रि आती है तब खाँसी रूपी स्यार आकर शब्द करते हैं और आधिव्याधिरूपी उलूक आकर निवास करते हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच वृद्धावस्था की मुझको इच्छा नहीं । जैसे फल से वृक्ष झुक जाता है वैसे ही बुढ़ापे में देह कुबड़ी हो जाती है ।

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युवावस्था में भी पुत्रादिक उसकी टहल करते थे पर वही सब उसको वृद्धा- वस्था में जैसे वृद्ध बैल को बैलवाला त्याग देता है वैसे ही त्याग देते हैं, देखके हँसते हैं और अपमान करते हैं। उनको यह सब कंट की नाईं भासता है। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच अवस्था की मुझको इच्छा नहीं! अब जो कुछ कर्तव्य हो मुझसे कहिये मैं करूँ ? इस शरीर की तीनों अवस्था में कोई सुखदायी नहीं, क्योंकि बाल्यावस्था महामूढ़ है, युवावस्था महाविकारवान है और जरावस्था महादुःख का पात्र है। बाल्यावस्था को युवावस्था ग्रास कर लेती है; युवावस्था को जरावस्था ग्रास कर लेती है और जरावस्था को मृत्यु ग्रास कर लेती है। यह अवस्था सब अल्पकाल की हैं, इनके आश्रय से मुझको क्या सुख होगा ? इससे आप मुझे वही उपाय बताइये जिससे इस दुःख से मुक्त हो जाऊँ। हे मुनीश्वर ! जब जरावस्था आती है तब मरना भी निकट आता है। जैसे सन्ध्या आने से रात्रितत्काल आ जाती है और जो सन्ध्या के आने से दिन की इच्छा करते हैं वह मूर्ख हैं वैसे ही जरा के आने से जीने की आशा रखनी महामूर्खता है। हे मुनीश्वर ! जैसे बिल्ली चिन्तन करती है कि चूहा आवे तो पकड़ लूँ वैसे ही मृत्यु भी देखती है कि जरावस्था आवे तो मैं इसका ग्रास कर लूँ। हे मुनीश्वर ! यह परम नीच अवस्था है। यह जब आती है तब शरीर को जर्जरीभूत कर देती है; कँपाने लगती है और शरीर को निर्बल और क्रूर कर देती है। जैसे कमल पर बरफ की वर्षा हो और वह जर्जरीभूत हो जाय वैसे ही यह शरीर को जर्जरीभूत कर डालती है। जैसे वन में बाघ आकर शब्द करते हैं और मृग का नाश करते हैं वैसे ही खाँसी रूपी बाघ आकर मृगरूपी बल का नाश करते हैं। हे मुनीश्वर ! जब जरा आती है तब जैसे चन्द्रमा के उदय से कमलिनी म्लैन आती है वैसे ही मृत्यु प्रसन्न होती है। यह जरावस्था बड़ी दुष्टा है; इसने बड़े बड़े योद्धाओं को भी दीन कर दिया है। यद्यपि बड़े-बड़े शूर संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं पर उनको भी जरा ने जीत लिया है। जो बड़े-बड़े पर्वतों को चूर्ण कर डालते हैं उनको भी जरा पिशाचिनी ने महादीन कर दिया है। इस जरारूपी राक्षसी ने सबको दीन कर दिया है। यह सबको जीतनेवाली है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में अग्नि लगती और उसमें

वैराग्य प्रकरण । ५५

से धूम निकलता है। वैसे ही शरीररूपी वृक्ष में में जरारूपी अग्नि लगकर तृष्णारूपी धुआँ निकलता है। जैसे डिब्बे में बड़े रत्न रहते हैं वैसे ही जरारूपी डिब्बे में दुःखरूपी अनेक रत्न रहते हैं। जरारूपी वसन्त ऋतु है; उससे शरीररूपी वृक्ष दुःखरूपी रस से होता। जैसे हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही जरारूपी जंजीर से बँधा पुरुष दीन हो जाता है। उसके सब अङ्ग शिथिल हो जाते हैं बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जरी भाव को प्राप्त होता है, परन्तु तृष्णा नहीं घटती वह तो नित्य बढ़ती चली जाती है। जैसे रात्रि आती है तब सूर्यवंशी कमल सब मूँद जाते हैं और पिशाचिनी आ विचरने लगती है और प्रसन्न होती है वैसे ही जरारूपी रात्रि के आने से सब शक्ति रूप कमल मूँद जाते हैं तृष्णारूपी पिशाचिनी प्रसन्न होती है। हे मुनीश्वर ! जैसे गङ्गातट के वृक्ष गङ्गाजल के वेग में जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही जो यह आयुरूपी प्रवाह चलता है उसके वेग से शरीर जर्जरीभूत हो जाता है जैसे मांस के टुकड़े को देख आकाश में उड़ती चील नीचे आकर ले जाती है वैसे ही जराअवस्था में शरीररूपी मांस को काल ले जाता है हे मुनीश्वर ! यह तो काल का ग्रास बना हुआ है। जैसे वृक्ष को हाथी खा जाता है वैसे जरावाले शरीर को काल देख के खाता है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जरावस्थानिरूपणं नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़ा है इसमें अज्ञानी गिरा है, पर संसाररूपी गढ़ा तो अल्प है और अज्ञानी बड़ा हो गया है। संकल्प विकल्प की अधिकता से बढ़ा है । जो ज्ञानवान् पुरुष है वह संसार को मिथ्या जानता है और संसाररूपी जाल में नहीं फँसता और जो अज्ञानी पुरुष है वह संसार को सत्य जानकर उसकी आस्थारूपी जाल में फँसता है और भोगों की वाञ्छा करता है। वह ऐसा है जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब देखकर बालक पकड़ने की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी संसार को सत्य जानकर जगत के पदार्थ की वाञ्छा करता

५६योगवाशिष्ठ ।

है कि यह मुझे प्राप्त हो और यह न हो । यह सब सुख नाशात्मक है अभिप्राय यह कि आते हैं और जाते हैं स्थिर नहीं रहते; इनको काल ग्रास करता है । जैसे पक्के अनार को चूहा खा जाता है वैसे ही सब पदार्थों को काल खाता है । हे मुनीश्वर ! यह सब पदार्थ कालग्रसित हैं । जैसे नेवला सर्प को भक्षण कर जाता है वैसे ही बड़े बड़े बली सुमेरु ऐसे गम्भीर पुरुषों को काल ने ग्रसित किया है । जगतरूपी एक गूलर का फल है; उसमें मज्जा ब्रह्मादिक हैं और उसका वन ब्रह्म-रूप है । उस ब्रह्मरूप वन में जितने वन हैं सो सब इसका आहार है । यह काल सबको भक्षण कर जाता है । हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है; जो कुछ देखने में आता है सो सब इसने ग्रास कर लिया है । हमारे जो बड़े ब्रह्मादिक हैं उनका भी काल ग्रास कर जाता है तो और का क्या कहना है जैसे सिंह मृग का ग्रास कर लेता है । काल किसी से जाना नहीं जाता । क्षण; घरी, प्रहर, दिन, मास और वर्षादिक से जानिये सोई काल है और काल की मूर्ति प्रकट नहीं है । यह किसी को स्थिर नहीं होने देता । एक बेलि, काल ने पसारी है उसकी त्वचा रात्रि है और फूल दिन है और जीवरूपी भौंरे उस पर आ बैठते हैं । हे मुनी-श्वर ! जगतरूपी गूलर का फल है उसमें जीवरूपी बहुत मच्छर रहते हैं । जैसे तोता अनार का भक्षण करता है वैसे ही काल उस फल का भक्षण करता है । जगतरूपी वृक्ष है; जीवरूपी उसके पत्र हैं और कालरूपी हस्ती उसका भक्षण कर जाता है । शुभ अशुभरुपी भैसे को कालरूपी सिंह छेद छेद के खाता है । हे मुनीश्वर ! यह काल महाक्रूर है; किसी पर दया नहीं करता; सबको खा जाता है । जैसे मृग सब कमलों को खा जाता है उसमे कोई नहीं बचता वैसे ही काल भी सबको खाता है परन्तु एक कमल बचा है उस कमल के शान्ति और मैत्री अंकुर हैं और चेतनामात्र प्रकाश है, इस कारण वह बचा है । कालरूपी मृग इस तक नहीं पहुँच सकता बल्कि इसमें प्राप्त हुआ काल भी लीन हो जाता है । जो कुछ प्रपंच है सो सब काल के मुख में है । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, कुबेर आदि सब मूर्ति काल की धरी हुई हैं । यह उनको भी अन्तर्द्धान कर देता है । हे मुनी-

वैराग्य प्रकरण । १७

सब उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय सब काल में होते हैं। अनेक बेर इसने महाकल्प का भी ग्रास किया है और अनेक बेर करेगा। काल को भोजन करने में तृप्ति कदाचित् नहीं होती और कदाचित् होनेवाली भी नहीं। जैसे अग्नि घृत की आहुति में तृप्त नहीं होता। वैसे ही जगत और सब ब्रह्मांड का भोजन करके भी काल तृप्त नहीं होता। इसका ऐसा स्वभाव है कि इन्द्र को दरिद्री कर देता है और दरिद्री को इन्द्र कर देता है, सुमेरु को राई बनाता है और राई को सुमेरु करता है। सबसे बड़े ऐश्वर्यवान को नीच कर डालता है और सबसे नीच को ऊँच कर डालता है। बूँद को समुद्र कर डालता है और समुद्र को बूँद करता है। ऐसी शक्ति काल में है। यह जीवरूपी मच्छरों को शुभाशुभ कर्मरूपी छुरे से छेदता रहता है। कालरूप का चक्र जीवरूपी हँडिया की शुभ-अशुभ कर्मरूपी रस्सी से बाँधकर फिराता है और जीवरूपी वृक्ष को रात्रि और दिनरूपी कुल्हाड़े से छेदता है। हे मुनीश्वर ! जितना कुछ जगत् विलास भासता है काल सबको ग्रास कर लेगा। जीवरूपी रत्न का काल डब्बा है सो सबको अपने उदर में डालता जाता है। काल यों खेल करता है कि चन्द्र सूर्यरूपी गेंद को कभी ऊर्ध्व को उछालता है और कभी नीचे डालता है। जो महापुरुष है वह उत्पत्ति और प्रलय के पदार्थों में से किसी के साथ स्नेह नहीं करता और उसका काल भी नाश नहीं कर सकता। जैसे मुण्ड की माला महादेवजी गले में धारे हैं वैसे ही यह भी जीवों की माला गले में डालता है। हे मुनीश्वर ! जो बड़े बलिष्ठ हैं उनको भी काल ग्रहण कर लेता है। जैसे समुद्र बड़ा है उसको बड़वानल पान कर लेता है और जैसे पवन भोजपत्र को उड़ाता है वैसे ही काल का भी बल है, किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थित रहे। हे मुनीश्वर ! शान्तिगुण प्रधान देवता, रजोगुण प्रधान बड़े राजा और तमोगुण प्रधान दैत्य और राक्षस हैं उनमें किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थिर रहे। जैसे तौली में अन्न और जल भरकर अग्नि पर चढ़ा देने से अन्न उछलता है और वह अन्न के दाने कड़छी से कभी ऊपर और कभी नीचे फिर जाते हैं वैसे ही जीवरूपी अन्न के दाने जगतरूपी तौली में

५८योगवाशिष्ठ ।

पड़े हुए रागद्वेषरूपी अग्नि पर चढ़े हैं और कर्मरूपी करछी से कभी ऊपर जाते हैं और कभी नीचे आते हैं। हे मुनीश्वर ! यह काल किसी को स्थिर नहीं होने देता यह महा कठोर है, दया किसी पर नहीं करता। इसका भय मुझको रहता है इससे वही उपाय मुझसे कहिये जिससे मैं काल से निर्भय हो जाऊँ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्यप्रकरणे कालनिरूपणन्नामाष्टादशसर्गः ॥१८॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ट है। जैसे राजा के पुत्र शिकार खेलने जाते हैं तो वन में बड़े बड़े पशु-पक्षी उनसे दुःख पाते हैं वैसे ही यह संसाररूपी वन है उसमें प्राणिमात्र पशु-पक्षी हैं। जब कालरूपी राजपुत्र उसमें शिकार खेलने आता है तब सब जीव भय पाते हैं और जर्जरीभूत होते हैं और वह उनको मारता है। हे मुनीश्वर ! यह काल महाभैरव है सबका ग्रास कर लेता है प्रलय में सबका प्रलय कर डालता है और इसकी जो चण्डिका शक्ति है उसका बड़ा उदर है। वह कालिका सबका ग्रास करके पीछे नृत्य करती है। जैसे वन के मृग को सिंह और सिंहनी भोजन करके नृत्य करते हैं वैसे ही जगतरूपी वन में जीवरूपी मृग को भोजन करके काल और कालिका नृत्य करते हैं। फिर इन्हीं से जगत् का प्रादुर्भाव होता है। नाना प्रकार के पदार्थों को रचते हैं और पृथ्वी, बगीचे, बावली आदि सब पदार्थ इन्हीं से उत्पन्न होते हैं। जीवों की उत्पत्ति भी इनसे होती है और एक समय में उनका नाश भी कर देती है। सुन्दर समुद्र रचके फिर उनमें अग्नि लगा देती है और सुन्दर कमल को बनाके फिर उसके ऊपर वरफ की वर्षा करती है। जहाँ बड़े-बड़े स्थान बसते हैं उनको उजाड़ डालती है और फिर उजाड़ में बस्ती करती है और नाश भी करती है; किसी को स्थिर नहीं रहने देती। जैसे बाग में वानर आकर वृक्ष को ठहरने नहीं देता वैसे ही कालरूपी वानर किसी पदार्थ को स्थिर रहने नहीं देता। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार से सब पदार्थ काल से जर्जरीभूत होते हैं। उनका आश्रय में किस रीति से करूँ ? मुझको तो यह सब नाशरूप भासते हैं, इससे अब मुझको किसी जगत् के पदार्थ की इच्छा नहीं।

इति श्रीयो० वै० कालविलास वर्णनन्नामैकोनविंशतितमसर्गः ॥१९॥

वैराग्य प्रकरण । ५६

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! इस काल का महापराक्रम है। इसके तेज के सम्मुख कोई नहीं रह सकता। यह क्षण में ऊँच को नीच और नीच को ऊँच कर डालता है। उसका निवारण कोई नहीं कर सकता। सब उसी के भय से काँपते हैं। यह महाभैरव है सब विश्व का ग्रास कर लेता है। इसकी चण्डिकारूप शक्ति है, वह अति बलवान् है और नदीरूप है, उसका उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। महाकालरूप काली है, उसका बड़ा भयानक आकार है। कालरूप जो रुद्र है उससे अभिन्नरूपी कालिका है वह सबका पान करके पीछे भैरव और भैरवी नृत्य करते हैं। उस काल और कालिका का बड़ा आकार है। उसका आकाश शीश, पाताल में चरण हैं और दशों दिशा भुजा है। सब समुद्र उसके हाथ में कङ्गण हैं; सम्पूर्ण पृथ्वीरूप उसके हाथ में पात्र है; और उस पर जो जीव हैं वह भोजन के योग्य हैं। हिमालय और सुमेरु पर्वत दोनों कानों में कुण्डल हैं; चन्द्रमा और सूर्य उसके दोनों लोचन हैं और सब तारागण उसके मस्तक में बिन्दु हैं। काल के हाथ में त्रिशूल और मूसल आदि शस्त्र हैं और कालिका के हाथ में ताँतरूपी फाँसी है, उससे जीवों को मारती है। ऐसी कालिकादेवी सब जीवों का ग्रास करके महाभैरव के आगे नृत्य करती है, अट्टाट्ट शब्द करती है और जीवों को भोजन करके उनकी मुण्ड-माला गले में धारण करती है। भैरव के सम्मुख रहने की किसी में शक्ति नहीं, जहाँ उजाड़ है वहाँ क्षण में बस्ती कर डालता है और जहाँ बस्ती है वहाँ क्षण में उजाड़ करता है। इसी से उसका नाम देव कहते हैं। वह बड़े-बड़े पदार्थों को उत्पन्न और नष्ट करता है, स्थिर किसी को नहीं रहने देता, इससे इसका नाम कृतान्त है और नित्यरूप भी यही है, क्योंकि इसका परिणाम अनित्य है इसी से इसका नाम कर्म है। जब अभावरूपी धनुष हाथ में धरता है तो उसमें रागद्वेषरूपी बाण चलाता है और उस बाण से जर्जरीभूत करके नाश करता है। जैसे बालक मृत्तिका की सेना बनाता है और उठाकर नष्ट भी कर देता है वैसे ही काल को उपजाने और नष्ट करने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता । हे मुनीश्वर ! कालरूपी धीवर है और उसने क्रियारूपी जाल पसारा है।

६०योगवाशिष्ठ ।

उसमें जीवरूपी पक्षी फँसते हैं सो फँसे हुए शान्ति नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! यह तो सब नाशरूप पदार्थ हैं इनमें आश्रय किसका करूँ कि जिसमें सुख हो। यह तो स्थावर जङ्गम जगत सब काल के मुख में है यह सब नाश-रूप मुझको दृष्टि आता है, इससे जो निर्भय पद हो सो मुझको कहिए।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालजुगुप्सावर्ण-न्नामविंशतितमस्सर्गः ॥ २० ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितने पदार्थ भासते हैं वह सब नाश-रूप हैं तो मैं किसकी इच्छा करूँ और किसका आश्रय करूँ ? इनकी इच्छा करना मूर्खता है। जितनी चेष्टा अज्ञानी करता है वह सब दुःख के निमित्त है और जीने में अर्थ की सिद्धि कुछ नहीं है, क्योंकि बालक अवस्था में मूढ़ता रहती है, कुछ विचार नहीं रहता। जब युवावस्था आती है तब मूर्खता से विषय को सेवता है और मान मोहादि विकारों से मोहा जाता है, उसमें कुछ विचार नहीं होता और स्थिर भी नहीं रहता, दीन का दीन रह के विषय की तृष्णा करता है, शान्ति नहीं पाता। हे मुनीश्वर ! आयुष्य महाचंचल है और मृत्यु तो निकट है, उसमें अन्यथा भाव नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जितने भोग हैं वे रोग हैं, जिसको सम्पदा जानते हैं वह आपदा है, जिसको सत्य कहते हैं वह असत्यरूप है, जिन स्त्री, पुत्रादिकों को मित्र जानते हैं वह सब बन्धन के कर्त्ता हैं और इन्द्रियाँ महाशत्रुरूप हैं। वह सब मृगतृष्णा के जलवत् है, यह देह विकाररूप है, मन महाचंचल और सदा अशान्तरूप है और अहङ्कार महानीच है, इसने ही दीनता को प्राप्त किया है। इससे जितने पदार्थ इसको सुखदायक भासते हैं वह सब दुःख के देनेवाले हैं इससे कदाचित् शान्ति नहीं होती। इसी कारण मुझको इनकी इच्छा नहीं। यद्यपि यह देखनेमात्र सुन्दर भासते हैं पर इनमें सुख कुछ नहीं और स्थिर न रहेंगे। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरंग भासते हैं, पर वह सब बड़वाग्नि से नाश होते हैं वैसे ही यह पदार्थ भी नष्ट हो जाते हैं। मैं अपनी आयु में कैसे आस्था करूँ। हे मुनीश्वर ! बड़े समुद्र, सुमेरु, राक्षस, दैत्य, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, पृथ्वी, अग्नि, पवन, यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र, ध्रुव, चन्द्रमा और बड़े ईश्वर जगत के कर्त्ता, ब्रह्मा

वैराग्य प्रकरण । ६१

विष्णु, रुद्र और काल जो सबका भक्षण करता है, काल की स्त्री, सब का आधार आकाश और जितना जगत् है यह सब नष्ट हो जावेंगे तो हमारी कौन गिनती है। हम किसकी आस्था करें और किसका आश्रय करें ? यह सब जगत् भ्रममात्र है; अज्ञानियों की इसमें आस्था होती है और हमारी नहीं; क्योंकि जगत् भ्रम से उत्पन्न हुआ है। मैं इतना जानता हूँ कि संसार में जीव को इतना दुःखी अहङ्कार ने किया है। हे मुनीश्वर ! यह जीव अपने परमशत्रु अहङ्कार से भटकता फिरता है। जैसे रस्सी से बँधे हुए पतङ्ग कभी ऊर्ध्व और कभी नीचे जाते हैं, स्थिर कभी नहीं रहते वैसे ही जीव अहङ्कार से कभी ऊर्ध्व और कभी अधो जाता है; स्थिर कभी नहीं होता। जैसे अश्व जुते हुए रथ के ऊपर बैठकर सूर्य आकाश मार्ग में फिरता है वैसे ही जीव भ्रमता है, स्थिर कदाचित् नहीं होता। हे मुनीश्वर ! यह जीव परमार्थ सत्य स्वरूप से भूला हुआ भटकता है; अज्ञान से संसार में आस्था करता है और भोग को सुखरूप जानकर उसमें तृष्णा करता है। पर जिसको सुखरूप जानता है वह रोग समान है और विष से पूर्ण सर्प जीव का नाश करनेवाला है; जिसको सत्य जानता है वह सब असत्य है सब काल के मुख में ग्रसे हुए हैं। हे मुनीश्वर ! विचार के बिना जीव अपना नाश आप ही करता है, क्योंकि उसका कल्याण करनेवाला बोध है। जब सत्य विचार बोध के शरण जाय तो कल्याण हो। जितने पदार्थ हैं वह स्थिर नहीं रहते। इनको सत्य जानना दुःख के निमित्त है। हे मुनीश्वर ! जब तृष्णा आती है तब आनन्द और धैर्य का नष्ट कर देती है। जैसे वायु मेघ का नाश कर डालता है वैसे ही तृष्णा ज्ञान का नाश कर डालती है। इससे मुझे वही उपाय कहिये जिससे जगत् का भ्रम मिट जावे और अविनाशी पद की प्राप्ति हो। इस भ्रमरूप जगत् की आस्था मैं नहीं देखता। इससे जैसी इच्छा हो वैसा करो, परन्तु जो सुख दुःख इसको होने हैं वह अवश्य होंगे कभी न मिटेंगे। चाहे पहाड़ की कन्दरा में बैठो, चाहे कोट में परन्तु जो होने को है वह अवश्य होगा। इस निमित्त यत्न करना मूर्खता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्य प्रकरणे कालविलास वर्णन-
न्नामैकविंशतितमस्सर्गः ॥ २१ ॥

६२ । योगवाशिष्ट ।

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! यह जो नाना प्रकार के सुन्दर पदार्थ भासते हैं वह सब नाशरूप हैं, उनकी आस्था मूर्ख करते हैं । यह तो मन की कल्पना मे रचे हुए हैं, उनमें से में किसकी आस्था करूँ ? हे मुनीश्वर अज्ञानी जीव का जीना व्यर्थ है, क्योंकि जीने से उनका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जब कुमार अवस्था होती है तब बुद्धि मूढ़ होती है, उसमें कुछ विचार नहीं होता । जब युवावस्था आती है तब काम क्रोधादिक विकार उत्पन्न होते हैं ये सदा ढाँपे रहते हैं । जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है और आकाशमार्ग को देख भी नहीं सकता वैसे ही काम क्रोधादिक में ढँका हुआ जीव विचार मार्ग को नहीं देख सकता । जब वृद्धावस्था आती है तब शरीर जर्जरीभूत और महादीन हो जाता है और जीव शरीर को त्याग देता है । जैसे कमल के ऊपर बरफ पड़ती है तब उसको भँवरा त्याग देता है वैसे ही शरीररूपी कमल को जरा का स्पर्श होता है तब जीव-रूपी भँवरा त्याग देता है । हे मुनीश्वर ! यह शरीर तब तक सुन्दर है जब तक वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होती । जैसे चन्द्रमा का प्रकाश जब तक राहु दैत्य ने आवरण नहीं किया तब तक रहता है; जब राहु दैत्य आवरण करता है तब तक प्रकाश नहीं रहता, वैसे ही जरावस्था के आने से युवावस्था की सुन्दरता जाती रहती है । हे मुनीश्वर ! जरा के आने से शरीर कृश हो जाता है, जैसे वर्षाकाल में नदी बढ़ जाती है वैसे ही जरावस्था में तृष्णा बढ़ जाती है और जिस पदार्थ की तृष्णा करता है वह पदार्थ भी दुःखरूप है, इसलिये तृष्णा करके आप ही दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी समुद्र में चित्तरूपी बेड़ा पड़ा है और रागद्वेष-रूपी मच्छों से कभी ऊर्ध्व को जाता है और कभी नीचे आता है, स्थिर कदाचित् नहीं रहता । हे मुनीश्वर ! कामरूपी वृक्ष में तृष्णारूपी लता और विषयरूपी फूल हैं; जब जीवरूपी भँवरा उसके ऊपर बैठता है तब विषयरूपी बेलि मे मृतक हो जाता है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी एक बड़ी नदी है उसमें राग द्वेषादिक बड़े-बड़े मच्छ रहते हैं । उसी नदी में पड़े हुए जीव दुःख पाते हैं । जिस संसार की इच्छा करता है वह नाशरूप है । हे मुनीश्वर ! तरंगों के समूह के गणरूपी समुद्र को तरजानेवाले को भी

वैराग्य प्रकरण । ६३

मैं शूर नहीं मानता, परन्तु जो इन्द्रियरूपी समुद्र में मनोवृत्तिरूपी तरङ्ग उठते हैं उस समुद्र के तरजानेवाले को मैं शूर मानता हूँ। ऐसी क्रिया अज्ञानी जीव आरम्भ करते हैं कि जिसके परिणाम में दुःख हो। जिसके परिणाम में सुख है उसका आरम्भ वे नहीं करते और काम के अर्थ की धारणा करते हैं। ऐसे आरम्भ से शरीर की शान्ति के पीछे भी सुख की प्राप्ति नहीं होती। वे कामना करके सदा जलते रहते हैं। जो अनात्मपदार्थ की तृष्णा करते हैं उनको शान्ति कैसे प्राप्त हो? हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी नदी में बड़ा प्रवाह है; उसके किनारे पर वैराग्य और सन्तोष दो वृक्ष खड़े हैं, सो तृष्णा नदी के प्रवाह में दोनों का नाश होता है। हे मुनीश्वर! तृष्णा बड़ी चंचल है, किसी को स्थिर नहीं होने देती। मोहरूपी एक वृक्ष है उसके चारों ओर स्त्रीरूपी बेलि है सो विषसे पूर्ण है। उस पर चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है तब स्पर्शमात्र से नाश होता है। जैसे मोर का पुच्छ हिलता है वैसे ही अज्ञानी का चित्त चंचल रहता है, इसलिए वह मनुष्य पशु के समान है। जैसे पशु दिन को जंगल में जा आहार करते और चलते फिरते हैं और रात्रि को घर में आय खूँटे में बाँधे जाते हैं वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी दिन को घर छोड़के व्यवहार में फिरते हैं और रात्रि को आ अपने घर में स्थिर होते हैं। पर इससे परमार्थ की कुछ सिद्धि नहीं होती, वे अपना जीवन वृथा गँवाते हैं। बाल्यावस्था में तो शून्य रहता है और युवावस्था में काम में उन्मत्त होता है। उस काम में चित्तरूपी उन्मत्तहस्ती स्त्रीरूपी कन्दरा में जा स्थिर होता है, पर वह भी क्षणभंगुर है। फिर वृद्धावस्था आती है उसमें शरीर कृश हो जाता है। जैसे बर्फ में कमल जर्जरीभाव को प्राप्त होता है वैसे ही जरा से शरीर जर्जरीभाव को प्राप्त होता है और सब अङ्ग जीर्ण हो जाते हैं; पर एक तृष्णा बढ़ जाती है। हे मुनीश्वर! यह जीव मनुष्यरूपी पर्वत पर आ आकाश के फलरूपी जगत के पदार्थों की इच्छा करता है सो नीचे गिर राग-द्वेषरूपी कण्टक के वृक्ष में जा पड़ेगा। हे मुनीश्वर! जितने जगत के पदार्थ हैं वह सब आकाश के फूल की नाई नाशवान हैं। इनमें आस्था करनी मूर्खता है। यह तो शब्दमात्र है।

६९योगवाशिष्ठ ।

इनसे अर्थ कुछ सिद्ध नहीं होता । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको विषय-भोग की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि आत्मा के प्रकाश से वे इनको मिथ्या जानते हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसे ज्ञानवान् दुर्विज्ञेय पुरुष हमको तो स्वप्न में भी नहीं भासते । ऐसे विरक्तात्मा दुर्लभ हैं कि जिनका भोग की इच्छा नहीं और सर्वदा ब्रह्म की स्थिति में भासते हैं। ऐसे पुरुषों को संसार की कुछ इच्छा नहीं रहती, क्योंकि यह पदार्थ नाशरूप है । हे मुनीश्वर ! जैसे पर्वत को जिस ओर देखिये पत्थरों से, पृथ्वी मृत्तिका से, वृक्ष काष्ठ से और समुद्र जल से पूर्ण दृष्टि आते हैं वैसे ही शरीर अस्थि-मांस से पूर्ण भासता है । ये सब पदार्थ पञ्चतत्त्व से पूर्ण और नाशरूप हैं ऐसा जानकर ज्ञानी किसी की इच्छा नहीं करता । हे मुनीश्वर ! यह जगत् सब नाशरूप है, देखते ही देखते नष्ट हो जाता है, मैं उसमें किस का आश्रय करके सुख पाऊँ ? जब युगों की सहस्र चौकड़ी व्यतीत होती हैं तब ब्रह्मा का दिन होता है । उस दिन के क्षय होने से जगत् का प्रलय होता है और ब्रह्मा भी काल पाकर नष्ट हो जाता है । ब्रह्मा भी जितने हो गये हैं उनकी संख्या नहीं हो सकती असंख्य ब्रह्मा नष्ट हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्ता है। हम किसी भोग की वासना नहीं करते, क्योंकि सब चलरूप हैं, स्थिर रहने के नहीं, सब नाशरूप हैं, इसलिये इनकी आस्था मूर्ख करते हैं, इनके साथ हमको कुछ प्रयोजन नहीं । जैसे मरुस्थल को देख मृग जलपान करने को दौड़ता और शान्ति नहीं पाता, वैसे ही मूर्ख जीव जगत् के पदार्थों को सत्य मानकर तृष्णा करता है, परन्तु शान्ति नहीं पाता, क्योंकि सब असाररूप हैं । स्त्री, पुत्र और कलत्र जब तक शरीर नष्ट नहीं होता तभी तक भासते हैं, जब शरीर नष्ट हो जायगा तो जाना न जावेगा कि कहाँ गये और कहाँ से आये थे । जैसे तेल और बत्ती से दीपक बड़ा प्रकाशवान दृष्टि आता है, जब बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया वैसे ही वर्त्तरूप बान्धव हैं और उसमें स्नेहरूपी तेल है उसमें जो शरीर भासता है सो प्रकाश है । जब शरीररूपी दीपक का प्रकाश बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया । हे मुनीश्वर ! बन्धु का मिलाप ऐसा है जैसे कोई तीर्थ यात्रा

वैराग्य प्रकरण । ६५

को सङ्ग चला जाता हो सो सब एक क्षण वृक्ष की छाया के नीचे बैठते हैं फिर न्यारे न्यारे हो जाते हैं । जैसे उस यात्रा में स्नेह करना मूर्खता है वैसे ही इनमें भी स्नेह करना मूर्खता है । हे मुनीश्वर ! अहं ममता की रस्सी के साथ बाँधे हुए घटीयन्त्र की नाईं सब जीव भ्रमते फिरते हैं, उनको शान्ति कदाचित् नहीं होती । यह देखने मात्र तो चेतन दृष्टि आता है, परन्तु पशु और बन्दर इन से श्रेष्ठ हैं जिनकी सम्मति देह और इन्द्रियों के साथ बँधी हुई है और आगमापायी है उनकी आत्मपद की प्राप्ति कठिन है । जैसे पवन से वृक्ष के पात टूट के उड़ जाते हैं फिर उनको वृक्ष के साथ लगना कठिन है वैसे ही जो देहादिक से बाँधे हुए हैं उनको आत्म-पद का पाना कठिन है । हे मुनीश्वर ! जब आत्मपद से विमुख होता है तब जगत् को सत्य देखता है और जब आत्मपद की ओर आता है तब संसार इसको बड़ा विरस लगता है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जो स्थिर रहे जो कुछ पदार्थ हैं सो नाश को प्राप्त होते हैं । इससे मैं किसकी आस्था करूँ और किसका आश्रय करूँ सब तो नाशवन्त भासते हैं ? वह पदार्थ मुझसे कहिये जिसका नाश न हो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणेसर्वपदार्थाभाववर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितना स्थावर जङ्गम जगत् दीखता है वह सब नाशरूप है, कुछ भी स्थिर न रहेगा । जो खाई थी वह जल में पूर्ण हो गई है और जो बड़े जल से भरे हुए समुद्र दीखते थे वे खाई-रूप हो गये; जो सुन्दर बड़े बगीचे थे वे आकाश की नाईं शून्य हो गये और जो शून्य स्थान थे वे सुन्दर वृक्ष होकर वन में दृष्टि आते हैं । जहाँ वस्ती थी वहाँ उजाड़ हो गई और जहाँ उजाड़ थी वहाँ वस्ती हो गई । जहाँ गड्ढे थे वहाँ पर्वत हो गये और जहाँ बड़े पर्वत थे वहाँ समान पृथ्वी हो गई । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार पदार्थ देखते देखते विपर्यय हो जाते हैं, स्थिर नहीं रहते तो फिर में किसका आश्रय करूँ और किसके पाने का यत्न करूँ ? ये पदार्थ तो सब नाशरूप हैं । जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न और बड़े कर्तव्य करते और बड़े वीर्यवान् तेजवान् हुए हैं वे भी स्मरणमात्र

६६ योगवाशिष्ठ ।

हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्त्ता है ? सब नाश होते हैं तो हमें भी थोड़ी पल में चला जाना है। हे मुनीश्वर ! ये पदार्थ बड़े चञ्चलरूप हैं, एक रस कदाचित् नहीं रहते। एक क्षण में कुछ हो जाते और दूसरे क्षण में कुछ हो जाते हैं। एक क्षण में दरिद्री हो जाने और दूसरे क्षण में सम्पदा-वान् हो जाते हैं। एक क्षण में फिर जीते दृष्टि आते हैं और दूसरे क्षण में मर जाते हैं, और एक क्षण में फिर जी उठते हैं। इस संसार की स्थिरता कभी नहीं होती। ज्ञानवान् इसकी आस्था नहीं करते। एक क्षण में समुद्र के प्रवाह के ठिकाने मरुस्थल हो जाते हैं और मरुस्थल में जल के प्रवाह हो जाते हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् का आभास स्थिर नहीं रहता। जैसे बालक का चित्त स्थिर नहीं रहता वैसे ही जगत् का पदार्थ एक भी स्थिर नहीं रहता। जैसे नट नाना प्रकार के स्वाँग धरता है वैसे ही जगत् के पदार्थ और लक्ष्मी एकरस नहीं रहती। कभी पुरुष स्त्री हो जाता और कभी स्त्री पुरुष हो जाती है, कभी मनुष्य पशु हो जाना और कभी पशु मनुष्य हो जाता है, स्थावर का जंगम हो जाता है और जंगम का स्थावर हो जाता है, मनुष्य का देवता हो जाता और देवता का मनुष्य हो जाता है। इसी प्रकार घटीयन्त्र की नाईं जगत् की लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती; कभी ऊर्ध्व को जाती है और कभी अधः को जाती है, स्थिर कभी नहीं रहती, सदा भटकती रहती है। हे मुनीश्वर ! जितने पदार्थ दृष्टि आते हैं वे सब नष्ट हो जावेंगे किसी भाँति स्थिर न रहेंगे। ये सब नदियाँ बड़वाग्नि में लय हो जावेंगी और जितने पदार्थ हैं वे सब अभावरूपी बड़वाग्नि को प्राप्त होंगे। बड़े बड़े बलिष्ठ भी मेरे देखते ही देखते लीन हो गये हैं जो बड़े बड़े सुन्दर स्थान थे वे शून्य हो गये और सुन्दर ताल और बगीचे जो मनुष्यों से परिपूर्ण थे शून्य हो गये। मरुस्थल की भूमि सुन्दर हो गई और घट के पट हो गये हैं। वर के शाप हो जाते हैं और शाप के वर हो जाते हैं। इसी प्रकार हे विप्र ! जो जगत् दृष्टि आता है वह कभी सम्पत्तिमान् और कभी आपत्तिमान् दृष्टि में आता है और महाचपल है। हे मुनीश्वर ! ऐसे सब अस्थिररूप पदार्थों का विचार बिना मैं कैसे आश्रय करूँ और किसकी इच्छा करूँ सब तो नाशरूप है ? ये जो सूर्य प्रकाश

वैराग्य प्रकरण । ६७

युक्त दृष्टि आते हैं वे भी अन्धकाररूप हो जावेंगे। अमृत से पूर्ण चन्द्रमा भी शून्य हो जायगा और सुमेरु आदिक पर्वत, सब लोक, मनुष्य, देवता, यक्ष और राक्षस सब नष्ट होंगे। इससे हे मुनीश्वर ! और किसी का क्या कहना है ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, जगत् के ईश्वर भी शून्य हो जायँगे। जो कुछ जगत् दृष्टि आता है और स्त्री, पुत्र, बान्धव, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज से युक्त नाना प्रकार के जो जीव भासते हैं वे सब नाशरूप हैं, फिर में किस पदार्थ का आश्रय करूँ और किसकी इच्छा करूँ ? हे मुनीश्वर ! जो पुरुष दीर्घदर्शी है उसको तो सब पदार्थ विरस हो गये, वह किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता, क्योंकि उसे तो सब पदार्थ नाशरूप भासते हैं और वह अपनी आयु को बिजली के चमत्कारवत् देखता है। जिसको अपनी आयु की प्रतीति होती है सो किसी की इच्छा नहीं करता। जैसे किसी को बलिदान के अर्थ पालते हैं तो वह खाने पीने और भोगने की इच्छा नहीं करता वैसे ही जिसको अपना मरना सम्मुख भासता है उसको भी किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रहती। ये सब पदार्थ आप ही नाशरूप हैं तो हम किसका आश्रय करके सुखी हों। जैसे कोई पुरुष समुद्र में मच्छ का आश्रय करके कहे कि में इस पर बैठकर समुद्र के पार जाऊँगा और सुखी होऊँगा तो वह मूर्खता से डूब ही मरेगा वैसे ही जिस पुरुष ने इन पदार्थों का आश्रय लिया है और उन्हें अपने सुख के निमित्त जानता है वह नष्ट होगा। हे मुनीश्वर ! जो पुरुष जगत् को चितवता रहता है उसको यह जगत् रमणीय भासता है और जो रमणीय जान-कर नाना प्रकार के कर्म करता है और नाना प्रकार के सङ्कल्प करके जगत् में भटकता है, उसी को यह भटकाता है। जैसे पवन से धूलि कभी ऊंचे और कभी नीचे आती है स्थिर नहीं रहती वैसे ही यह जीव भटकता फिरता है स्थिर कभी नहीं रहना और जिस पदार्थ की इच्छा करता है वह सब काल का ग्रास है। ईंधनरूपी जगत् वन में काल-रूपी अग्नि लगी उसने सबको ग्रास लिया है। जो इन पदार्थों की इच्छा करते हैं वे महामूर्ख हैं। जिनको आत्मविचार की प्राप्ति है उनको यह जगत् भ्रमरूप भासता है और जिसको आत्मविचार की प्राप्ति नहीं

६८ | योगवाशिष्ठ ।

है उसको यह जगत् रमणीय भासता है। जगत् को देखते ही देखते नष्ट हो जाता है । इस स्वप्नपुरी की नाईं संसार की में कैसे इच्छा करूँ यह तो दुःख का निमित्त है ? जैसे विष मिली मिठाई खानेवाले मृत्यु पाते हैं वैसे ही विषय भोगनेवाले नष्ट होते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जगद्विपर्ययवर्णन- न्नाम त्रयोविंशतितममसर्गः ॥२३॥

श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! इस संसार में भोगरूपी अग्नि लगी है उससे सब जलते हैं । जैसे ताल में हाथी के पाँव से कमल नष्ट हो जाता है वैसे ही भोग में मनुष्य दीन हो जाते हैं, जैसे वायु में मेघ नष्ट हो जाता है वैसे ही काम, क्रोध और दुराचार से शुभ गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे भटकटैया के पत्ते और फल में काँटे हो जाते हैं वैसे ही विषयों की वासणारूपी कण्टक आ लगते हैं । हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् नाचरूपी है, कोई पदार्थ स्थिर नहीं । वासणारूपी जल और इन्द्रियरूपी गाँठ है उसमें पुरुष काल से ग्रसा है वह बड़े दुःख पावेगा । हे मुनीश्वर ! वासणारूपी सूत में जीवरूपी मोती पिरोये हुए हैं और मनरूपी नट आय पिरोय कर चैतन्यरूपी आत्मा के गले में डालता है । जब वासणारूपी तागा टूट पड़ता है तब यह सब भ्रम भी निवृत्त हो जाता है । हे मुनीश्वर ! इस जीव को भोग की इच्छा ही बन्धन का कारण है उसी से यह भटकता है और शान्ति नहीं पाता । इससे मुझको किसी भोग की इच्छा नहीं न राज्य की ही इच्छा है और न घर की न वन की इच्छा है, न मरने का दुःख ही मानता हूँ और न जीने का सुख मानता हूँ । मुझे किसी पदार्थ का सुख नहीं, सुख तो आत्मज्ञान से होता है, अन्यथा किसी पदार्थ में नहीं होता । जैसे सूर्य के उदय हुये बिना अन्धकार का नाश नहीं होता वैसे ही आत्मज्ञान के बिना संसार के दुःख का नाश नहीं होता । इससे आप वही उपाय कहिये जिससे मोह का नाश हो और में सुखी होऊँ । हे मुनीश्वर ! भोग के भोगनेवाले अहङ्कार को मैंने त्याग दिया, फिर भोग की इच्छा कैसे हो ? हे मुनीश्वर ! विषयरूप सर्प ने जिसका स्पर्श किया उसका नाश हो जाता है । सर्प जिसको काटता है वह एक ही बेर उसको

वैराग्य प्रकरण । ६६

मार डालता है, पर विषयरूपी सर्प जिसको काटता है वह अनेक जन्म-पर्यन्त भागता ही चला जाता है। इसमें परम दुःख का कारण विषय भोग ही है और परम विष है। हे मुनीश्वर! आरे से अङ्ग का काटना और वज्र में शरीर का चूर्ण होना में सहूँगा परन्तु विषय का भोगना मुझसे किसी प्रकार सहा नहीं जाता। यह तो मुझको दुःखदायक ही दृष्टि आता है। इसमें वही मुझसे कहिये जिससे मेरे हृदय से अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश हो और जो न कहोगे तो में अपनी छाती पर धैर्यरूपी शिला धर के बैठा रहूँगा, परन्तु भोग की इच्छा न करूँगा। हे मुनीश्वर! जितने पदार्थ हैं वे सब नाशरूप हैं। जैसे बिजली का चमत्कार होके छिप जाता है और अञ्जलि में जल नहीं ठहरता वैसे ही विषयभोग और आयु नष्ट हो जाते हैं—ठहरते नहीं। जैसे काँटे से मछली दुःख पाती है वैसे ही भोग की तृष्णा मे जीव दुःख पाते हैं। इससे मुझे किसी पदार्थ की इच्छा नहीं। जैसे कोई मृगमरीचिका के जल को सत्य जान जलपान की इच्छा करे और दौड़े पर जल नहीं पाता है। इससे में किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे सर्वान्तप्रतिपादननाम चतुर्विंशतितमस्सर्गः ॥ २४ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़े और मोहरूपी कीच में मूर्ख का मन गिर जाता है। उससे वह दुःख ही पाता है शान्तिवान् कभी नहीं होता। जब जरावस्था आती है तब जैसे पुरातन वृक्ष के पत्र पवन में हिलते हैं वैसे ही अङ्ग हिलते हैं और तृष्णा बढ़ जाती है। जैसे नीम का वृक्ष ज्यों-ज्यों वृद्ध होता है त्यों-त्यों कटुता बढ़ती है वैसे ही तृष्णा बढ़ती है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने देह इन्द्रियादिकों का आश्रय अपने सुख निमित्त लिया है वह मूर्ख संसाररूपी अन्धकूप में गिरता है और निकल नहीं सकता। अज्ञानी का चित्त भोग का त्याग कदाचित् नहीं करता, हे मुनीश्वर ! जगत् के पदार्थों में मेरी बुद्धि मलीन हो गई है। जैसे वर्षाकाल में नदी मलीन होती है और जैसे मार्गशीर्ष मास में मञ्जरी सूख जाती है वैसे ही जगत् की शोभा देखते-देखते मेरी बुद्धि विरस हो गई है। जैसे जगत् का पदार्थ मूर्ख को रमणीय भासता है और जैसे पानी का

७० | योगवाशिष्ठ ।

गढ़ा तृण से आच्छादित होता है और मृग का बालक उस तृण को रमणीय जानकर खाने जाता है तो गिर जाता है वैसे ही यह मूर्ख जीव भोगों को रमणीय जान भोगों में गिर पड़ता है, फिर महादुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! जगत् के पदार्थों में मेरी बुद्धि चञ्चल हो गई है, इससे वही उपाय कहिये जिससे मेरी बुद्धि पर्वत की नाईं निश्चल हो और परमानन्द जो निर्भय निराकार है और जिसके पाने में किसी पद की इच्छा नहीं रहती उसे पाऊँ । हे मुनीश्वर ! ऐसे पद से मेरी बुद्धि शून्य है, इससे में शान्तिमान् नहीं होता । यह संसार और संसार के कर्म मोहरूप हैं, इसमें पड़े हुए शान्ति नहीं पाते । जनकादिक शान्तिमान् संसार में रहे हुए कमल की नाईं निर्लेप रहते हैं । उनकी क्या समझ है कृपा करके कहिए और आप ऐसे सन्तजन विषय भोगते दृष्टि आते और जगत् की सब चेष्टा करते हैं पर निर्लेप कैसे रहते हैं वह युक्ति कहिये । यह बुद्धि जैसे ताल में हाथी प्रवेश करता है और पानी मलीन हो जाता है वैसे ही मोह में मलीन हो जाती है । इससे वही उपाय कहिये जिससे बुद्धि निर्मल हो । यह बुद्धि स्थिर कभी नहीं रहती । जैसे कुल्हाड़े का कटा वृक्ष मूल में स्थिर नहीं होता वैसे ही वासना में कटी बुद्धि स्थिर नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! संसाररूपी विसूचिका मुझको लगी है इसमें वही उपाय कहिये जिससे दृश्य का नाश हो—उसने मुझको बड़ा दुःख दिया है । आत्मज्ञान कब प्रकाश होगा जिसके उदय से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो ? हे मुनीश्वर ! जैसे बादल से चन्द्रमा आच्छादित हो जाता है वैसे ही बुद्धि की मलीनता से में आच्छादित हुआ हूँ । इससे वही उपाय कहिये जिससे आवरण दूर हो और आत्मानन्द जो नित्य है प्राप्त हो इसके पाने में फिर कुछ पाने की आवश्यकता नहीं रहती और इससे सम्पूर्ण दुःख नष्ट हो जाते हैं । अन्तःकरण शीतल हो जाता है । ऐसे पद की प्राप्ति का उपाय मुझसे कहिये । हे मुनीश्वर ! आत्मज्ञानरूपी चन्द्रमा की मुझको इच्छा है; जिसके प्रकाश से बुद्धिरूपी कमलिनी खिल जाती है और जिसकी अमृतरूपी किरणों से वृत्ति तृप्त होती है । हे मुनीश्वर ! अब मुझको गृह में रहने की इच्छा नहीं

वैराग्य प्रकरण । ७१

और वन में जाने की भी इच्छा नहीं। मुझको तो उसी पद की इच्छा है जिसे पाकर अन्तःकरण शान्त हो जाय।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे वैराग्यप्रयोजन- वर्णनन्नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २५ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जो जीने की आस्था करते हैं वे मूर्ख हैं। जैसे कमलपत्र पर जल की बूँद नहीं ठहरती वैसे ही आयु भी क्षणभंगुर है। जैसे वर्षाकाल में दादुर बोलते हैं और उनका चञ्चल कंठ सदा फड़कता रहता है वैसे ही आयु क्षण क्षण में चञ्चल हो जाती है। जैसे शिवजी के मस्तक में चन्द्रमा की रेखा छोटी सी है वैसे ही यह शरीर है। हे मुनीश्वर ! जिसको इसमें आस्था है वह महामूर्ख है-यह तो काल का ग्रास है। जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ लेती है वैसे ही सबको काल पकड़ लेता है। जैसे बिल्ली चूहे को मँभलने नहीं देती वैसे ही काल सबको अचानक ग्रहण कर लेता है और किसी को नहीं भासता। हे मुनीश्वर ! जब अज्ञानरूपी मेघ गर्जता है तब लोभरूपी मोर प्रसन्न होकर नृत्य करता है। जब अज्ञानरूपी मेघ वर्षा करता है तब दुःखरूपी मञ्जरी बढ़ने लगती है, लोभरूपी बिजुली क्षण में उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती है और तृष्णारूपी जाल में फँसे हुए जीवरूपी पक्षी बड़े दुःख पाते हैं-शान्ति को प्राप्ति नहीं होते। हे मुनीश्वर ! यह जगतरूपी बड़ा रोग लगा है उसके निवारण करने का कौन सा उपाय है ? जो पाने योग्य है और जिसमे भ्रमरूपी रोग निवृत्त हो वह उपाय कहिये ? यह जगत् मूर्ख को रमणीय दीखता है ऐसे पदार्थ पृथ्वी, आकाश, देवलोक और पाताल में भी नहीं जो ज्ञानवान् को रमणीय दीखें। ज्ञानवान् को सब भ्रमरूपी भासता है और अज्ञानी जगत् में आस्था करता है। हे मुनीश्वर ! चन्द्रमा में जो कलङ्क है उसमे सुन्दरता नहीं रहती। जब कलङ्क दूर हो जाय तब सुन्दर लगे वैसे ही मेरे चित्तरूपी चन्द्रमा में कामरूपी कलङ्क लगा है इससे वह उज्ज्वल नहीं भासता। आप वही उपाय कहिये जिससे कलङ्क दूर हो। हे मुनीश्वर ! यह चित्त बहुत चञ्चल है, स्थिर कदाचित् नहीं होता। जैसे अग्नि में डाल दिया पारा उड़ जाता

७२ | योगवाशिष्ठ ।

है वैसे चित्त भी स्थिर नहीं होता, विषय की ओर सदा धावता है। इससे आप वही उपाय कहिये जिससे चित्त स्थिर हो। संसाररूपी वन में भोगरूपी सर्प रहते हैं और जीव को काटते हैं उनसे बचने का उपाय कहिये। जितनी क्रिया हैं वे राग-द्वेष के साथ मिली हुई हैं, इससे वही उपाय कहिये जिसमें रागद्वेष का प्रवेश न हो और संसारसमुद्र में पड़ के तृष्णारूपी जल का स्पर्श न हो। और ऐसा उपाय भी कहिये जिसमें रागद्वेष का स्पर्श न हो। मन में जो मनरूपी मत्ता है वह युक्ति से दूर होती है, अन्यथा दूर नहीं होती। उसकी निवृत्ति के अर्थ आप मुझसे युक्ति कहिये और आगे जिसको जिस प्रकार निवृत्ति हुई है और जिस प्रकार आपके अन्तःकरण में शीतलता हुई वह कहिये। हे मुनीश्वर ! जैसे आप जानते हैं सो कहिये और जो आपने ही वह युक्ति नहीं पाई तब मैं तो कुछ नहीं जानता। सब त्यागकर निरहंकार हो रहूँगा और जब तक वह युक्ति मुझको न प्राप्त होगी तब तक मैं भोजन जलपान और स्नानादिक क्रिया और किसी सम्पदा और आपदा का कार्य न करूँगा, निरहंकार होऊँगा। यह न मेरी देह है, न में देव हूँ, सब त्याग के बैठा रहूँगा। जैसे कागज के ऊपर मूर्ति चित्रित होती है वैसे ही हो रहूँगा। श्वास आत जाने आप ही क्षीण हो जायेंगे। जैसे तेल बिना दीपक बुझ जाता है वैसे ही अनर्थवान् देह निर्वाण हो जायगा तब महाशान्ति पाऊँगा। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! ऐसे कहकर रामजी चुप हो रहे। जैसे बड़े मेघ को देखके मोर शब्द करके चुप हो जाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे अनन्यत्यागदर्श- नन्नाम षड्विंशतितमस्सर्गः ॥ २६ ॥

इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले हे पुत्र ! जब इस प्रकार रघुवंशरूपी आकाश के रामचन्द्ररूपी चन्द्रमा बोले तब सब मौन हो गये और सब के रोम खड़े हो गये, मानों रोम भी खड़े होकर रामजी के वचन सुनते हैं और सभा में जितने बैठे थे वे सब निर्वासनारूपी अमृत के समुद्र में मग्न हो गये। वशिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र आदि जो मुनीश्वर थे और दृष्टि