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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

वैराग्य प्रकरण । ६१

विष्णु, रुद्र और काल जो सबका भक्षण करता है, काल की स्त्री, सब का आधार आकाश और जितना जगत् है यह सब नष्ट हो जावेंगे तो हमारी कौन गिनती है। हम किसकी आस्था करें और किसका आश्रय करें ? यह सब जगत् भ्रममात्र है; अज्ञानियों की इसमें आस्था होती है और हमारी नहीं; क्योंकि जगत् भ्रम से उत्पन्न हुआ है। मैं इतना जानता हूँ कि संसार में जीव को इतना दुःखी अहङ्कार ने किया है। हे मुनीश्वर ! यह जीव अपने परमशत्रु अहङ्कार से भटकता फिरता है। जैसे रस्सी से बँधे हुए पतङ्ग कभी ऊर्ध्व और कभी नीचे जाते हैं, स्थिर कभी नहीं रहते वैसे ही जीव अहङ्कार से कभी ऊर्ध्व और कभी अधो जाता है; स्थिर कभी नहीं होता। जैसे अश्व जुते हुए रथ के ऊपर बैठकर सूर्य आकाश मार्ग में फिरता है वैसे ही जीव भ्रमता है, स्थिर कदाचित् नहीं होता। हे मुनीश्वर ! यह जीव परमार्थ सत्य स्वरूप से भूला हुआ भटकता है; अज्ञान से संसार में आस्था करता है और भोग को सुखरूप जानकर उसमें तृष्णा करता है। पर जिसको सुखरूप जानता है वह रोग समान है और विष से पूर्ण सर्प जीव का नाश करनेवाला है; जिसको सत्य जानता है वह सब असत्य है सब काल के मुख में ग्रसे हुए हैं। हे मुनीश्वर ! विचार के बिना जीव अपना नाश आप ही करता है, क्योंकि उसका कल्याण करनेवाला बोध है। जब सत्य विचार बोध के शरण जाय तो कल्याण हो। जितने पदार्थ हैं वह स्थिर नहीं रहते। इनको सत्य जानना दुःख के निमित्त है। हे मुनीश्वर ! जब तृष्णा आती है तब आनन्द और धैर्य का नष्ट कर देती है। जैसे वायु मेघ का नाश कर डालता है वैसे ही तृष्णा ज्ञान का नाश कर डालती है। इससे मुझे वही उपाय कहिये जिससे जगत् का भ्रम मिट जावे और अविनाशी पद की प्राप्ति हो। इस भ्रमरूप जगत् की आस्था मैं नहीं देखता। इससे जैसी इच्छा हो वैसा करो, परन्तु जो सुख दुःख इसको होने हैं वह अवश्य होंगे कभी न मिटेंगे। चाहे पहाड़ की कन्दरा में बैठो, चाहे कोट में परन्तु जो होने को है वह अवश्य होगा। इस निमित्त यत्न करना मूर्खता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्य प्रकरणे कालविलास वर्णन-
न्नामैकविंशतितमस्सर्गः ॥ २१ ॥

६२ । योगवाशिष्ट ।

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! यह जो नाना प्रकार के सुन्दर पदार्थ भासते हैं वह सब नाशरूप हैं, उनकी आस्था मूर्ख करते हैं । यह तो मन की कल्पना मे रचे हुए हैं, उनमें से में किसकी आस्था करूँ ? हे मुनीश्वर अज्ञानी जीव का जीना व्यर्थ है, क्योंकि जीने से उनका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जब कुमार अवस्था होती है तब बुद्धि मूढ़ होती है, उसमें कुछ विचार नहीं होता । जब युवावस्था आती है तब काम क्रोधादिक विकार उत्पन्न होते हैं ये सदा ढाँपे रहते हैं । जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है और आकाशमार्ग को देख भी नहीं सकता वैसे ही काम क्रोधादिक में ढँका हुआ जीव विचार मार्ग को नहीं देख सकता । जब वृद्धावस्था आती है तब शरीर जर्जरीभूत और महादीन हो जाता है और जीव शरीर को त्याग देता है । जैसे कमल के ऊपर बरफ पड़ती है तब उसको भँवरा त्याग देता है वैसे ही शरीररूपी कमल को जरा का स्पर्श होता है तब जीव-रूपी भँवरा त्याग देता है । हे मुनीश्वर ! यह शरीर तब तक सुन्दर है जब तक वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होती । जैसे चन्द्रमा का प्रकाश जब तक राहु दैत्य ने आवरण नहीं किया तब तक रहता है; जब राहु दैत्य आवरण करता है तब तक प्रकाश नहीं रहता, वैसे ही जरावस्था के आने से युवावस्था की सुन्दरता जाती रहती है । हे मुनीश्वर ! जरा के आने से शरीर कृश हो जाता है, जैसे वर्षाकाल में नदी बढ़ जाती है वैसे ही जरावस्था में तृष्णा बढ़ जाती है और जिस पदार्थ की तृष्णा करता है वह पदार्थ भी दुःखरूप है, इसलिये तृष्णा करके आप ही दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी समुद्र में चित्तरूपी बेड़ा पड़ा है और रागद्वेष-रूपी मच्छों से कभी ऊर्ध्व को जाता है और कभी नीचे आता है, स्थिर कदाचित् नहीं रहता । हे मुनीश्वर ! कामरूपी वृक्ष में तृष्णारूपी लता और विषयरूपी फूल हैं; जब जीवरूपी भँवरा उसके ऊपर बैठता है तब विषयरूपी बेलि मे मृतक हो जाता है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी एक बड़ी नदी है उसमें राग द्वेषादिक बड़े-बड़े मच्छ रहते हैं । उसी नदी में पड़े हुए जीव दुःख पाते हैं । जिस संसार की इच्छा करता है वह नाशरूप है । हे मुनीश्वर ! तरंगों के समूह के गणरूपी समुद्र को तरजानेवाले को भी

वैराग्य प्रकरण । ६३

मैं शूर नहीं मानता, परन्तु जो इन्द्रियरूपी समुद्र में मनोवृत्तिरूपी तरङ्ग उठते हैं उस समुद्र के तरजानेवाले को मैं शूर मानता हूँ। ऐसी क्रिया अज्ञानी जीव आरम्भ करते हैं कि जिसके परिणाम में दुःख हो। जिसके परिणाम में सुख है उसका आरम्भ वे नहीं करते और काम के अर्थ की धारणा करते हैं। ऐसे आरम्भ से शरीर की शान्ति के पीछे भी सुख की प्राप्ति नहीं होती। वे कामना करके सदा जलते रहते हैं। जो अनात्मपदार्थ की तृष्णा करते हैं उनको शान्ति कैसे प्राप्त हो? हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी नदी में बड़ा प्रवाह है; उसके किनारे पर वैराग्य और सन्तोष दो वृक्ष खड़े हैं, सो तृष्णा नदी के प्रवाह में दोनों का नाश होता है। हे मुनीश्वर! तृष्णा बड़ी चंचल है, किसी को स्थिर नहीं होने देती। मोहरूपी एक वृक्ष है उसके चारों ओर स्त्रीरूपी बेलि है सो विषसे पूर्ण है। उस पर चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है तब स्पर्शमात्र से नाश होता है। जैसे मोर का पुच्छ हिलता है वैसे ही अज्ञानी का चित्त चंचल रहता है, इसलिए वह मनुष्य पशु के समान है। जैसे पशु दिन को जंगल में जा आहार करते और चलते फिरते हैं और रात्रि को घर में आय खूँटे में बाँधे जाते हैं वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी दिन को घर छोड़के व्यवहार में फिरते हैं और रात्रि को आ अपने घर में स्थिर होते हैं। पर इससे परमार्थ की कुछ सिद्धि नहीं होती, वे अपना जीवन वृथा गँवाते हैं। बाल्यावस्था में तो शून्य रहता है और युवावस्था में काम में उन्मत्त होता है। उस काम में चित्तरूपी उन्मत्तहस्ती स्त्रीरूपी कन्दरा में जा स्थिर होता है, पर वह भी क्षणभंगुर है। फिर वृद्धावस्था आती है उसमें शरीर कृश हो जाता है। जैसे बर्फ में कमल जर्जरीभाव को प्राप्त होता है वैसे ही जरा से शरीर जर्जरीभाव को प्राप्त होता है और सब अङ्ग जीर्ण हो जाते हैं; पर एक तृष्णा बढ़ जाती है। हे मुनीश्वर! यह जीव मनुष्यरूपी पर्वत पर आ आकाश के फलरूपी जगत के पदार्थों की इच्छा करता है सो नीचे गिर राग-द्वेषरूपी कण्टक के वृक्ष में जा पड़ेगा। हे मुनीश्वर! जितने जगत के पदार्थ हैं वह सब आकाश के फूल की नाई नाशवान हैं। इनमें आस्था करनी मूर्खता है। यह तो शब्दमात्र है।

६९योगवाशिष्ठ ।

इनसे अर्थ कुछ सिद्ध नहीं होता । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको विषय-भोग की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि आत्मा के प्रकाश से वे इनको मिथ्या जानते हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसे ज्ञानवान् दुर्विज्ञेय पुरुष हमको तो स्वप्न में भी नहीं भासते । ऐसे विरक्तात्मा दुर्लभ हैं कि जिनका भोग की इच्छा नहीं और सर्वदा ब्रह्म की स्थिति में भासते हैं। ऐसे पुरुषों को संसार की कुछ इच्छा नहीं रहती, क्योंकि यह पदार्थ नाशरूप है । हे मुनीश्वर ! जैसे पर्वत को जिस ओर देखिये पत्थरों से, पृथ्वी मृत्तिका से, वृक्ष काष्ठ से और समुद्र जल से पूर्ण दृष्टि आते हैं वैसे ही शरीर अस्थि-मांस से पूर्ण भासता है । ये सब पदार्थ पञ्चतत्त्व से पूर्ण और नाशरूप हैं ऐसा जानकर ज्ञानी किसी की इच्छा नहीं करता । हे मुनीश्वर ! यह जगत् सब नाशरूप है, देखते ही देखते नष्ट हो जाता है, मैं उसमें किस का आश्रय करके सुख पाऊँ ? जब युगों की सहस्र चौकड़ी व्यतीत होती हैं तब ब्रह्मा का दिन होता है । उस दिन के क्षय होने से जगत् का प्रलय होता है और ब्रह्मा भी काल पाकर नष्ट हो जाता है । ब्रह्मा भी जितने हो गये हैं उनकी संख्या नहीं हो सकती असंख्य ब्रह्मा नष्ट हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्ता है। हम किसी भोग की वासना नहीं करते, क्योंकि सब चलरूप हैं, स्थिर रहने के नहीं, सब नाशरूप हैं, इसलिये इनकी आस्था मूर्ख करते हैं, इनके साथ हमको कुछ प्रयोजन नहीं । जैसे मरुस्थल को देख मृग जलपान करने को दौड़ता और शान्ति नहीं पाता, वैसे ही मूर्ख जीव जगत् के पदार्थों को सत्य मानकर तृष्णा करता है, परन्तु शान्ति नहीं पाता, क्योंकि सब असाररूप हैं । स्त्री, पुत्र और कलत्र जब तक शरीर नष्ट नहीं होता तभी तक भासते हैं, जब शरीर नष्ट हो जायगा तो जाना न जावेगा कि कहाँ गये और कहाँ से आये थे । जैसे तेल और बत्ती से दीपक बड़ा प्रकाशवान दृष्टि आता है, जब बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया वैसे ही वर्त्तरूप बान्धव हैं और उसमें स्नेहरूपी तेल है उसमें जो शरीर भासता है सो प्रकाश है । जब शरीररूपी दीपक का प्रकाश बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया । हे मुनीश्वर ! बन्धु का मिलाप ऐसा है जैसे कोई तीर्थ यात्रा

वैराग्य प्रकरण । ६५

को सङ्ग चला जाता हो सो सब एक क्षण वृक्ष की छाया के नीचे बैठते हैं फिर न्यारे न्यारे हो जाते हैं । जैसे उस यात्रा में स्नेह करना मूर्खता है वैसे ही इनमें भी स्नेह करना मूर्खता है । हे मुनीश्वर ! अहं ममता की रस्सी के साथ बाँधे हुए घटीयन्त्र की नाईं सब जीव भ्रमते फिरते हैं, उनको शान्ति कदाचित् नहीं होती । यह देखने मात्र तो चेतन दृष्टि आता है, परन्तु पशु और बन्दर इन से श्रेष्ठ हैं जिनकी सम्मति देह और इन्द्रियों के साथ बँधी हुई है और आगमापायी है उनकी आत्मपद की प्राप्ति कठिन है । जैसे पवन से वृक्ष के पात टूट के उड़ जाते हैं फिर उनको वृक्ष के साथ लगना कठिन है वैसे ही जो देहादिक से बाँधे हुए हैं उनको आत्म-पद का पाना कठिन है । हे मुनीश्वर ! जब आत्मपद से विमुख होता है तब जगत् को सत्य देखता है और जब आत्मपद की ओर आता है तब संसार इसको बड़ा विरस लगता है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जो स्थिर रहे जो कुछ पदार्थ हैं सो नाश को प्राप्त होते हैं । इससे मैं किसकी आस्था करूँ और किसका आश्रय करूँ सब तो नाशवन्त भासते हैं ? वह पदार्थ मुझसे कहिये जिसका नाश न हो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणेसर्वपदार्थाभाववर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितना स्थावर जङ्गम जगत् दीखता है वह सब नाशरूप है, कुछ भी स्थिर न रहेगा । जो खाई थी वह जल में पूर्ण हो गई है और जो बड़े जल से भरे हुए समुद्र दीखते थे वे खाई-रूप हो गये; जो सुन्दर बड़े बगीचे थे वे आकाश की नाईं शून्य हो गये और जो शून्य स्थान थे वे सुन्दर वृक्ष होकर वन में दृष्टि आते हैं । जहाँ वस्ती थी वहाँ उजाड़ हो गई और जहाँ उजाड़ थी वहाँ वस्ती हो गई । जहाँ गड्ढे थे वहाँ पर्वत हो गये और जहाँ बड़े पर्वत थे वहाँ समान पृथ्वी हो गई । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार पदार्थ देखते देखते विपर्यय हो जाते हैं, स्थिर नहीं रहते तो फिर में किसका आश्रय करूँ और किसके पाने का यत्न करूँ ? ये पदार्थ तो सब नाशरूप हैं । जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न और बड़े कर्तव्य करते और बड़े वीर्यवान् तेजवान् हुए हैं वे भी स्मरणमात्र

६६ योगवाशिष्ठ ।

हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्त्ता है ? सब नाश होते हैं तो हमें भी थोड़ी पल में चला जाना है। हे मुनीश्वर ! ये पदार्थ बड़े चञ्चलरूप हैं, एक रस कदाचित् नहीं रहते। एक क्षण में कुछ हो जाते और दूसरे क्षण में कुछ हो जाते हैं। एक क्षण में दरिद्री हो जाने और दूसरे क्षण में सम्पदा-वान् हो जाते हैं। एक क्षण में फिर जीते दृष्टि आते हैं और दूसरे क्षण में मर जाते हैं, और एक क्षण में फिर जी उठते हैं। इस संसार की स्थिरता कभी नहीं होती। ज्ञानवान् इसकी आस्था नहीं करते। एक क्षण में समुद्र के प्रवाह के ठिकाने मरुस्थल हो जाते हैं और मरुस्थल में जल के प्रवाह हो जाते हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् का आभास स्थिर नहीं रहता। जैसे बालक का चित्त स्थिर नहीं रहता वैसे ही जगत् का पदार्थ एक भी स्थिर नहीं रहता। जैसे नट नाना प्रकार के स्वाँग धरता है वैसे ही जगत् के पदार्थ और लक्ष्मी एकरस नहीं रहती। कभी पुरुष स्त्री हो जाता और कभी स्त्री पुरुष हो जाती है, कभी मनुष्य पशु हो जाना और कभी पशु मनुष्य हो जाता है, स्थावर का जंगम हो जाता है और जंगम का स्थावर हो जाता है, मनुष्य का देवता हो जाता और देवता का मनुष्य हो जाता है। इसी प्रकार घटीयन्त्र की नाईं जगत् की लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती; कभी ऊर्ध्व को जाती है और कभी अधः को जाती है, स्थिर कभी नहीं रहती, सदा भटकती रहती है। हे मुनीश्वर ! जितने पदार्थ दृष्टि आते हैं वे सब नष्ट हो जावेंगे किसी भाँति स्थिर न रहेंगे। ये सब नदियाँ बड़वाग्नि में लय हो जावेंगी और जितने पदार्थ हैं वे सब अभावरूपी बड़वाग्नि को प्राप्त होंगे। बड़े बड़े बलिष्ठ भी मेरे देखते ही देखते लीन हो गये हैं जो बड़े बड़े सुन्दर स्थान थे वे शून्य हो गये और सुन्दर ताल और बगीचे जो मनुष्यों से परिपूर्ण थे शून्य हो गये। मरुस्थल की भूमि सुन्दर हो गई और घट के पट हो गये हैं। वर के शाप हो जाते हैं और शाप के वर हो जाते हैं। इसी प्रकार हे विप्र ! जो जगत् दृष्टि आता है वह कभी सम्पत्तिमान् और कभी आपत्तिमान् दृष्टि में आता है और महाचपल है। हे मुनीश्वर ! ऐसे सब अस्थिररूप पदार्थों का विचार बिना मैं कैसे आश्रय करूँ और किसकी इच्छा करूँ सब तो नाशरूप है ? ये जो सूर्य प्रकाश

वैराग्य प्रकरण । ६७

युक्त दृष्टि आते हैं वे भी अन्धकाररूप हो जावेंगे। अमृत से पूर्ण चन्द्रमा भी शून्य हो जायगा और सुमेरु आदिक पर्वत, सब लोक, मनुष्य, देवता, यक्ष और राक्षस सब नष्ट होंगे। इससे हे मुनीश्वर ! और किसी का क्या कहना है ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, जगत् के ईश्वर भी शून्य हो जायँगे। जो कुछ जगत् दृष्टि आता है और स्त्री, पुत्र, बान्धव, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज से युक्त नाना प्रकार के जो जीव भासते हैं वे सब नाशरूप हैं, फिर में किस पदार्थ का आश्रय करूँ और किसकी इच्छा करूँ ? हे मुनीश्वर ! जो पुरुष दीर्घदर्शी है उसको तो सब पदार्थ विरस हो गये, वह किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता, क्योंकि उसे तो सब पदार्थ नाशरूप भासते हैं और वह अपनी आयु को बिजली के चमत्कारवत् देखता है। जिसको अपनी आयु की प्रतीति होती है सो किसी की इच्छा नहीं करता। जैसे किसी को बलिदान के अर्थ पालते हैं तो वह खाने पीने और भोगने की इच्छा नहीं करता वैसे ही जिसको अपना मरना सम्मुख भासता है उसको भी किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रहती। ये सब पदार्थ आप ही नाशरूप हैं तो हम किसका आश्रय करके सुखी हों। जैसे कोई पुरुष समुद्र में मच्छ का आश्रय करके कहे कि में इस पर बैठकर समुद्र के पार जाऊँगा और सुखी होऊँगा तो वह मूर्खता से डूब ही मरेगा वैसे ही जिस पुरुष ने इन पदार्थों का आश्रय लिया है और उन्हें अपने सुख के निमित्त जानता है वह नष्ट होगा। हे मुनीश्वर ! जो पुरुष जगत् को चितवता रहता है उसको यह जगत् रमणीय भासता है और जो रमणीय जान-कर नाना प्रकार के कर्म करता है और नाना प्रकार के सङ्कल्प करके जगत् में भटकता है, उसी को यह भटकाता है। जैसे पवन से धूलि कभी ऊंचे और कभी नीचे आती है स्थिर नहीं रहती वैसे ही यह जीव भटकता फिरता है स्थिर कभी नहीं रहना और जिस पदार्थ की इच्छा करता है वह सब काल का ग्रास है। ईंधनरूपी जगत् वन में काल-रूपी अग्नि लगी उसने सबको ग्रास लिया है। जो इन पदार्थों की इच्छा करते हैं वे महामूर्ख हैं। जिनको आत्मविचार की प्राप्ति है उनको यह जगत् भ्रमरूप भासता है और जिसको आत्मविचार की प्राप्ति नहीं

६८ | योगवाशिष्ठ ।

है उसको यह जगत् रमणीय भासता है। जगत् को देखते ही देखते नष्ट हो जाता है । इस स्वप्नपुरी की नाईं संसार की में कैसे इच्छा करूँ यह तो दुःख का निमित्त है ? जैसे विष मिली मिठाई खानेवाले मृत्यु पाते हैं वैसे ही विषय भोगनेवाले नष्ट होते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जगद्विपर्ययवर्णन- न्नाम त्रयोविंशतितममसर्गः ॥२३॥

श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! इस संसार में भोगरूपी अग्नि लगी है उससे सब जलते हैं । जैसे ताल में हाथी के पाँव से कमल नष्ट हो जाता है वैसे ही भोग में मनुष्य दीन हो जाते हैं, जैसे वायु में मेघ नष्ट हो जाता है वैसे ही काम, क्रोध और दुराचार से शुभ गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे भटकटैया के पत्ते और फल में काँटे हो जाते हैं वैसे ही विषयों की वासणारूपी कण्टक आ लगते हैं । हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् नाचरूपी है, कोई पदार्थ स्थिर नहीं । वासणारूपी जल और इन्द्रियरूपी गाँठ है उसमें पुरुष काल से ग्रसा है वह बड़े दुःख पावेगा । हे मुनीश्वर ! वासणारूपी सूत में जीवरूपी मोती पिरोये हुए हैं और मनरूपी नट आय पिरोय कर चैतन्यरूपी आत्मा के गले में डालता है । जब वासणारूपी तागा टूट पड़ता है तब यह सब भ्रम भी निवृत्त हो जाता है । हे मुनीश्वर ! इस जीव को भोग की इच्छा ही बन्धन का कारण है उसी से यह भटकता है और शान्ति नहीं पाता । इससे मुझको किसी भोग की इच्छा नहीं न राज्य की ही इच्छा है और न घर की न वन की इच्छा है, न मरने का दुःख ही मानता हूँ और न जीने का सुख मानता हूँ । मुझे किसी पदार्थ का सुख नहीं, सुख तो आत्मज्ञान से होता है, अन्यथा किसी पदार्थ में नहीं होता । जैसे सूर्य के उदय हुये बिना अन्धकार का नाश नहीं होता वैसे ही आत्मज्ञान के बिना संसार के दुःख का नाश नहीं होता । इससे आप वही उपाय कहिये जिससे मोह का नाश हो और में सुखी होऊँ । हे मुनीश्वर ! भोग के भोगनेवाले अहङ्कार को मैंने त्याग दिया, फिर भोग की इच्छा कैसे हो ? हे मुनीश्वर ! विषयरूप सर्प ने जिसका स्पर्श किया उसका नाश हो जाता है । सर्प जिसको काटता है वह एक ही बेर उसको

वैराग्य प्रकरण । ६६

मार डालता है, पर विषयरूपी सर्प जिसको काटता है वह अनेक जन्म-पर्यन्त भागता ही चला जाता है। इसमें परम दुःख का कारण विषय भोग ही है और परम विष है। हे मुनीश्वर! आरे से अङ्ग का काटना और वज्र में शरीर का चूर्ण होना में सहूँगा परन्तु विषय का भोगना मुझसे किसी प्रकार सहा नहीं जाता। यह तो मुझको दुःखदायक ही दृष्टि आता है। इसमें वही मुझसे कहिये जिससे मेरे हृदय से अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश हो और जो न कहोगे तो में अपनी छाती पर धैर्यरूपी शिला धर के बैठा रहूँगा, परन्तु भोग की इच्छा न करूँगा। हे मुनीश्वर! जितने पदार्थ हैं वे सब नाशरूप हैं। जैसे बिजली का चमत्कार होके छिप जाता है और अञ्जलि में जल नहीं ठहरता वैसे ही विषयभोग और आयु नष्ट हो जाते हैं—ठहरते नहीं। जैसे काँटे से मछली दुःख पाती है वैसे ही भोग की तृष्णा मे जीव दुःख पाते हैं। इससे मुझे किसी पदार्थ की इच्छा नहीं। जैसे कोई मृगमरीचिका के जल को सत्य जान जलपान की इच्छा करे और दौड़े पर जल नहीं पाता है। इससे में किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे सर्वान्तप्रतिपादननाम चतुर्विंशतितमस्सर्गः ॥ २४ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़े और मोहरूपी कीच में मूर्ख का मन गिर जाता है। उससे वह दुःख ही पाता है शान्तिवान् कभी नहीं होता। जब जरावस्था आती है तब जैसे पुरातन वृक्ष के पत्र पवन में हिलते हैं वैसे ही अङ्ग हिलते हैं और तृष्णा बढ़ जाती है। जैसे नीम का वृक्ष ज्यों-ज्यों वृद्ध होता है त्यों-त्यों कटुता बढ़ती है वैसे ही तृष्णा बढ़ती है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने देह इन्द्रियादिकों का आश्रय अपने सुख निमित्त लिया है वह मूर्ख संसाररूपी अन्धकूप में गिरता है और निकल नहीं सकता। अज्ञानी का चित्त भोग का त्याग कदाचित् नहीं करता, हे मुनीश्वर ! जगत् के पदार्थों में मेरी बुद्धि मलीन हो गई है। जैसे वर्षाकाल में नदी मलीन होती है और जैसे मार्गशीर्ष मास में मञ्जरी सूख जाती है वैसे ही जगत् की शोभा देखते-देखते मेरी बुद्धि विरस हो गई है। जैसे जगत् का पदार्थ मूर्ख को रमणीय भासता है और जैसे पानी का

७० | योगवाशिष्ठ ।

गढ़ा तृण से आच्छादित होता है और मृग का बालक उस तृण को रमणीय जानकर खाने जाता है तो गिर जाता है वैसे ही यह मूर्ख जीव भोगों को रमणीय जान भोगों में गिर पड़ता है, फिर महादुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! जगत् के पदार्थों में मेरी बुद्धि चञ्चल हो गई है, इससे वही उपाय कहिये जिससे मेरी बुद्धि पर्वत की नाईं निश्चल हो और परमानन्द जो निर्भय निराकार है और जिसके पाने में किसी पद की इच्छा नहीं रहती उसे पाऊँ । हे मुनीश्वर ! ऐसे पद से मेरी बुद्धि शून्य है, इससे में शान्तिमान् नहीं होता । यह संसार और संसार के कर्म मोहरूप हैं, इसमें पड़े हुए शान्ति नहीं पाते । जनकादिक शान्तिमान् संसार में रहे हुए कमल की नाईं निर्लेप रहते हैं । उनकी क्या समझ है कृपा करके कहिए और आप ऐसे सन्तजन विषय भोगते दृष्टि आते और जगत् की सब चेष्टा करते हैं पर निर्लेप कैसे रहते हैं वह युक्ति कहिये । यह बुद्धि जैसे ताल में हाथी प्रवेश करता है और पानी मलीन हो जाता है वैसे ही मोह में मलीन हो जाती है । इससे वही उपाय कहिये जिससे बुद्धि निर्मल हो । यह बुद्धि स्थिर कभी नहीं रहती । जैसे कुल्हाड़े का कटा वृक्ष मूल में स्थिर नहीं होता वैसे ही वासना में कटी बुद्धि स्थिर नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! संसाररूपी विसूचिका मुझको लगी है इसमें वही उपाय कहिये जिससे दृश्य का नाश हो—उसने मुझको बड़ा दुःख दिया है । आत्मज्ञान कब प्रकाश होगा जिसके उदय से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो ? हे मुनीश्वर ! जैसे बादल से चन्द्रमा आच्छादित हो जाता है वैसे ही बुद्धि की मलीनता से में आच्छादित हुआ हूँ । इससे वही उपाय कहिये जिससे आवरण दूर हो और आत्मानन्द जो नित्य है प्राप्त हो इसके पाने में फिर कुछ पाने की आवश्यकता नहीं रहती और इससे सम्पूर्ण दुःख नष्ट हो जाते हैं । अन्तःकरण शीतल हो जाता है । ऐसे पद की प्राप्ति का उपाय मुझसे कहिये । हे मुनीश्वर ! आत्मज्ञानरूपी चन्द्रमा की मुझको इच्छा है; जिसके प्रकाश से बुद्धिरूपी कमलिनी खिल जाती है और जिसकी अमृतरूपी किरणों से वृत्ति तृप्त होती है । हे मुनीश्वर ! अब मुझको गृह में रहने की इच्छा नहीं

वैराग्य प्रकरण । ७१

और वन में जाने की भी इच्छा नहीं। मुझको तो उसी पद की इच्छा है जिसे पाकर अन्तःकरण शान्त हो जाय।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे वैराग्यप्रयोजन- वर्णनन्नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २५ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जो जीने की आस्था करते हैं वे मूर्ख हैं। जैसे कमलपत्र पर जल की बूँद नहीं ठहरती वैसे ही आयु भी क्षणभंगुर है। जैसे वर्षाकाल में दादुर बोलते हैं और उनका चञ्चल कंठ सदा फड़कता रहता है वैसे ही आयु क्षण क्षण में चञ्चल हो जाती है। जैसे शिवजी के मस्तक में चन्द्रमा की रेखा छोटी सी है वैसे ही यह शरीर है। हे मुनीश्वर ! जिसको इसमें आस्था है वह महामूर्ख है-यह तो काल का ग्रास है। जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ लेती है वैसे ही सबको काल पकड़ लेता है। जैसे बिल्ली चूहे को मँभलने नहीं देती वैसे ही काल सबको अचानक ग्रहण कर लेता है और किसी को नहीं भासता। हे मुनीश्वर ! जब अज्ञानरूपी मेघ गर्जता है तब लोभरूपी मोर प्रसन्न होकर नृत्य करता है। जब अज्ञानरूपी मेघ वर्षा करता है तब दुःखरूपी मञ्जरी बढ़ने लगती है, लोभरूपी बिजुली क्षण में उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती है और तृष्णारूपी जाल में फँसे हुए जीवरूपी पक्षी बड़े दुःख पाते हैं-शान्ति को प्राप्ति नहीं होते। हे मुनीश्वर ! यह जगतरूपी बड़ा रोग लगा है उसके निवारण करने का कौन सा उपाय है ? जो पाने योग्य है और जिसमे भ्रमरूपी रोग निवृत्त हो वह उपाय कहिये ? यह जगत् मूर्ख को रमणीय दीखता है ऐसे पदार्थ पृथ्वी, आकाश, देवलोक और पाताल में भी नहीं जो ज्ञानवान् को रमणीय दीखें। ज्ञानवान् को सब भ्रमरूपी भासता है और अज्ञानी जगत् में आस्था करता है। हे मुनीश्वर ! चन्द्रमा में जो कलङ्क है उसमे सुन्दरता नहीं रहती। जब कलङ्क दूर हो जाय तब सुन्दर लगे वैसे ही मेरे चित्तरूपी चन्द्रमा में कामरूपी कलङ्क लगा है इससे वह उज्ज्वल नहीं भासता। आप वही उपाय कहिये जिससे कलङ्क दूर हो। हे मुनीश्वर ! यह चित्त बहुत चञ्चल है, स्थिर कदाचित् नहीं होता। जैसे अग्नि में डाल दिया पारा उड़ जाता

७२ | योगवाशिष्ठ ।

है वैसे चित्त भी स्थिर नहीं होता, विषय की ओर सदा धावता है। इससे आप वही उपाय कहिये जिससे चित्त स्थिर हो। संसाररूपी वन में भोगरूपी सर्प रहते हैं और जीव को काटते हैं उनसे बचने का उपाय कहिये। जितनी क्रिया हैं वे राग-द्वेष के साथ मिली हुई हैं, इससे वही उपाय कहिये जिसमें रागद्वेष का प्रवेश न हो और संसारसमुद्र में पड़ के तृष्णारूपी जल का स्पर्श न हो। और ऐसा उपाय भी कहिये जिसमें रागद्वेष का स्पर्श न हो। मन में जो मनरूपी मत्ता है वह युक्ति से दूर होती है, अन्यथा दूर नहीं होती। उसकी निवृत्ति के अर्थ आप मुझसे युक्ति कहिये और आगे जिसको जिस प्रकार निवृत्ति हुई है और जिस प्रकार आपके अन्तःकरण में शीतलता हुई वह कहिये। हे मुनीश्वर ! जैसे आप जानते हैं सो कहिये और जो आपने ही वह युक्ति नहीं पाई तब मैं तो कुछ नहीं जानता। सब त्यागकर निरहंकार हो रहूँगा और जब तक वह युक्ति मुझको न प्राप्त होगी तब तक मैं भोजन जलपान और स्नानादिक क्रिया और किसी सम्पदा और आपदा का कार्य न करूँगा, निरहंकार होऊँगा। यह न मेरी देह है, न में देव हूँ, सब त्याग के बैठा रहूँगा। जैसे कागज के ऊपर मूर्ति चित्रित होती है वैसे ही हो रहूँगा। श्वास आत जाने आप ही क्षीण हो जायेंगे। जैसे तेल बिना दीपक बुझ जाता है वैसे ही अनर्थवान् देह निर्वाण हो जायगा तब महाशान्ति पाऊँगा। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! ऐसे कहकर रामजी चुप हो रहे। जैसे बड़े मेघ को देखके मोर शब्द करके चुप हो जाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे अनन्यत्यागदर्श- नन्नाम षड्विंशतितमस्सर्गः ॥ २६ ॥

इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले हे पुत्र ! जब इस प्रकार रघुवंशरूपी आकाश के रामचन्द्ररूपी चन्द्रमा बोले तब सब मौन हो गये और सब के रोम खड़े हो गये, मानों रोम भी खड़े होकर रामजी के वचन सुनते हैं और सभा में जितने बैठे थे वे सब निर्वासनारूपी अमृत के समुद्र में मग्न हो गये। वशिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र आदि जो मुनीश्वर थे और दृष्टि

वैराग्य प्रकरण । ७३

आदिक मन्त्री, राजा दशरथ और मण्डलेश्वर, चाकर, नौकर और माता कौशल्या आदिक सब मौन हो गये-अर्थात् अचल हो गये। पिंजड़े में जो तोते और बगीचे में पशु आदि थे, जो पक्षी आलय में बैठे थे वे भी सुन कर मौन हो गये। आकाश के पक्षी जो निकट थे वे भी स्थिर हो गये और आकाश में देव, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर भी आके सुनने और फूलों की वर्षा करने तथा सब धन्य-धन्य शब्द करने लगे। उस समय फूलों की ऐसी वर्षा हुई मानो बर्फ की वर्षा होती है, और क्षीरसमुद्र के तरङ्ग उछलते आते थे मानो मोती की माला की वृष्टि होने लगी। जैसे माश्विन के पिंग उड़ते हैं इस प्रकार आधी घड़ी पर्यन्त फूलों की वर्षा हुई और बड़ी सुगन्ध फैली। फूलों पर भँवरे फिरने लगे और बड़ा बिलास उस काल में हुआ। सब "नमोनमः" शब्द करने लगे और देव बोले हे कमल नयन, रघुवंशी ! आकाश में चन्द्रमारूप तुम धन्य हो तुमने बड़े श्रेष्ठ स्थान देखे हैं और बहुत प्रकार के वचन सुने हैं। जैसे तुमने वचन कहे हैं वैसे हमने कभी नहीं सुने। यह वचन सुनके हमारा जो देवताओं का अभिमान था सो सब निवृत्त हो गया और अमृत रूपी वचन सुनकर हमारी बुद्धि पूर्ण हो गई। हे रामजी ! जैसे वचन तुमने कहे हैं ऐसे बृहस्पति भी नहीं कह सकते। तुम्हारे वचन परमानन्द के करनेवाले हैं इससे तुम धन्य हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे सिद्धसमाजवर्णनन्नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥

वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! सिद्ध ऐसे वचन कहके विचारने लगे कि रघुवंश का कुल पूजने योग्य है, जिससे रामजी ने बड़े उदार वचन मुनीश्वर के सम्मुख कहे हैं। अब जो मुनीश्वर उत्तर देंगे वह भी सुनना चाहिए। जैसे फूल के ऊपर भँवरा स्थिर होता है वैसे ही व्यास, नारद, पुलह, पुलस्त्य आदि सब साधु सभा में स्थित हुए तब वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि मुनीश्वर उठ खड़े हुए और उनकी पूजा करने लगे। पहिले राजा दशरथ ने पूजा की और फिर नाना प्रकार से सबने उनकी पूजा की और यथायोग्य आसन के ऊपर बैठे। उनमें नारदजी हाथ में बहुत

७४ | योगवाशिष्ठ


सुन्दर बीणा लिये और श्याममूर्ति व्यासजी नाना प्रकार के रंग से रञ्जित वस्त्र पहिने हुए मानो तारागणों में महाश्यामघटा आई है विराजमान थे। ऐसे ही दुर्वासा, वामदेव, पुलह, पुलस्त्य, बृहस्पति के पिता अङ्गिरा, भृगु और में भी वहाँ था और ब्रह्मर्षि, राजर्षि, देवर्षि, देवता, मुनीश्वर सब आके उस सभा में स्थित हुए। किसी की बड़ी जटा, कोई मुकुट पहिरे, कोई रुद्राक्ष की माला और कोई मोती की माला पहिने थे, किसी के कण्ठ में रत्न की माला और हाथ में कमण्डलु और मृगछाला, किसी के महासुन्दर वस्त्र, किसी की कटि पे कौपीन और किसी की कटिपे सुवर्ण की जंजीर थी। ऐसे बड़े-बड़े तपस्वी जो वहाँ आके बैठे थे उनमें कोई राजसी और कोई सात्त्विक स्वभाव के थे और सब विद्वान वेद के पढ़नेवाले प्राप्त हुए। कोई सूर्यवत्, कोई चन्द्रमावत् कोई तारावत् कोई रत्नवत् प्रकाशमान और पुरुषार्थ पर यत्न करने वाले यथायोग्य आसन पर स्थित हुए। मोहनीमूर्ति और दीन स्वभाववाले रामजी भी हाथ जोड़ के सभा में बैठे और उनकी सब पूजाकर कहने लगे कि हे रामजी! तुम धन्य हो। नारद सबके सम्मुख कहने लगे कि हे रामजी! तुमने बड़े विवेक और वैराग्य के वचन कहे जो सबको प्यारे लगे और सबके कल्याण करनेवाले और परम बोध के कारण हैं। हे रामजी! तुम बड़े बुद्धिमान और उदारात्मा दृष्टि आने हो और महावाक्य का अर्थ तुमसे प्रकट होता है। ऐसे उज्ज्वलपात्र साधु और अनन्त तपस्वियों में कोई विरला होता है। जितने मनुष्य हैं वे सब पशु से दृष्टि आने हैं, क्योंकि जिसको संसार समुद्र के पार होने की इच्छा है और जो पुरुषार्थ पर यत्न करता है वही मनुष्य है। हे साधो! वृक्ष तो बहुत होते हैं, परन्तु चन्दन का वृक्ष कोई होता है वैसे ही शरीर धारी बहुत हैं परन्तु ऐसा विद्वान कोई विरला ही होता है और सब अस्थि मांस रुधिर के पुतले से मिले हुए भटकते फिरते हैं। जैसे तन्त्र की पुतली होती है वैसे ही अज्ञानी जीव हैं। हाथी तो बहुत हैं परन्तु विरले के मस्तक से मोती निकलता है वैसे ही मनुष्य तो बहुत हैं; परन्तु पुरुषार्थ पर यत्न करनेवाला कोई विरला ही होता है। जैसे वृक्ष बहुतेरे हैं परन्तु लवङ्ग का वृक्ष कोई विरला ही होता

वैराग्य प्रकरण । ७५

है वैसे ही मनुष्य बहुत हैं, परन्तु ऐसा कोई विरला ही होता है। ऐसे पात्र से थोड़ा अर्थ कहा भी बहुत हो जाता है। जैसे तेल की बूंद थोड़े ही जल में डालिये तो फैल जाती है वैसे ही थोड़े वचन तुम्हारे हिये में बहुत होते हैं। तुम्हारी बुद्धि बहुत विशेष है और दीपक सी प्रकाश-वाली और बोध का परम पात्र है। कहने मात्र से ही तुमको शीघ्र ज्ञान होवेगा और जो हमारे सामने तुमको ज्ञान न हो तो जानना कि हम सब मूर्ख बैठे हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे मुनिसमाजवर्णनन्नामा-ष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥

समाप्तमिदं वैराग्यप्रकरणम् ॥

श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीयोगवाशिष्ठ

द्वितीय मुमुक्षु प्रकरण प्रारम्भ ।

वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! ये वचन परमानन्दरूप हैं और कल्याण के कर्त्ता हैं इनमें सुनने की प्रीति तब उपजती है जब अनेक जन्म के बड़े पुण्य इकट्ठे होते हैं। जैसे कल्पवृक्ष के फल को बड़े पुण्य से पाते हैं वैसे ही जिसके बड़े पुण्यकर्म इकट्ठे होते हैं उसकी प्रीति इन वचनों के सुनने में होती है—अन्यथा नहीं होती। ये वचन परमबोध के कारण हैं। वैराग्यप्रकरण के एक सहस्र पाँचसौ श्लोक हैं। हे भरद्वाज ! इस प्रकार जब नारदजी ने कहा तब विश्वामित्र बोले कि हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ, रामजी ! जितना कुछ जानने योग्य था सो तुमने जाना है इसमें अब तुम्हें जानना और नहीं रहा, पर उसमें विश्राम पाने के लिये कुछ मार्जन करना है। जैसे अशुद्ध आदर्श की मलीनता दूर करने से मुख स्पष्ट भासता है वैसे ही कुछ उपदेश की तुमको अपेक्षा है। हे रामजी ! आपकी के सदृश भगवान् व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी हुए हैं। वह भी बड़े बुद्धिमान् थे, उन्होंने जो जानने योग्य था सो जाना था, पर विश्राम के निमित्त उनकी भी अपेक्षा थी सो विश्राम को पाकर शान्त हुए थे। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! शुकजी कैसे बुद्धिमान् और ज्ञानवान् थे और कैसी विश्राम की अपेक्षा उनकी थी और फिर कैसे उन्होंने विश्राम पाया सो कृपा करके कहो ? विश्वामित्रजी बोले हे रामजी ! अञ्जन के पर्वत के समान और सूर्य के सदृश प्रकाशवान् भगवान् व्यासजी स्वर्ण के सिंहासन पर राजा दशरथ के यहाँ बैठे थे। उनके पुत्र शुकजी सब शास्त्रों के वेत्ता थे। और सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानते थे। उन्होंने शान्ति और परमानन्दरूप आत्मा में विश्राम न पाया तब उनको विकल्प उठा कि जिसको मैंने जाना है सो न होगा। क्योंकि मुझको आनन्द नहीं भासता। यह संशय करके एक काल में व्यासजी जो सुमेरु पर्वत की कन्दरा में

मुमुक्षु प्रकरण । ७७

बैठे थे तिनके निकट आकर कहने लगे, हे भगवन् ! यह संसार सब असदात्मक कहाँ से हुआ है; इसकी निवृत्ति कैसे होगी और आगे कभी इसकी निवृत्ति हुई है सो कहो ? हे रामजी ! जब इस प्रकार शुकजी ने कहा तब विशुद्धदर्शिरोमणि वेदव्यासजी ने तत्काल उपदेश किया । शुकजी ने कहा, हे भगवन् ! जो कुछ तुम कहते हो वह तो मैं आगे से ही जानता हूँ, इससे मुझको शान्ति नहीं होती । हे रामजी ! तब सर्वज्ञ वेदव्यासजी विचार करने लगे कि इसको मेरे वचन से शान्ति प्राप्त न होगी, क्योंकि पिता पुत्र का सम्बन्ध है । ऐसा विचार करके व्यासजी कहने लगे हे पुत्र ! मैं सर्वतत्त्वज्ञ नहीं, तुम राजा जनक के निकट जाओ, वे सर्वतत्त्वज्ञ और शान्तात्मा हैं, उनसे तुम्हारा मोह निवृत्त होगा । तब शुकदेवजी वहाँ से चलकर मिथिला नगरी में आये और राजा जनक के द्वार पर स्थित हुए । द्वारपाल ने जाकर जनकजी से कहा कि व्यासजी के पुत्र शुकजी खड़े हैं । राजा ने जाना कि इनको जिज्ञासा है । इसलिए कहा कि खड़े रहने दो । इसी प्रकार फिर द्वारपाल ने जा कहा और सात दिन उन्हें खड़े ही बीत गये। तब राजा ने फिर पूछा कि शुकजी खड़े हैं कि चले गये । द्वारपाल ने कहा, खड़े हैं । राजा ने कहा, आगे ले आओ । तब वे उनको आगे ले आये । उस दरवाजे पर भी वे सात दिन खड़े रहे । फिर राजा ने पूछा कि शुकजी हैं ? द्वारपाल ने कहा कि हाँ, खड़े हैं । राजा ने कहा कि अन्तःपुर में ले आओ और नाना प्रकार के भोग भुगताओ । तब वे उन्हें अन्तःपुर में लेगये । वहाँ स्त्रियों के पास भी वे सात दिन तक खड़े रहे । फिर राजा ने द्वारपाल से पूछा कि उनकी अब कैसी दशा है और आगे कैसी दशा थी ? द्वारपाल ने कहा कि आगे वे निरादर से न शोकवान् हुए थे और न अब भोग से प्रसन्न हुए, वे तो इष्ट अनिष्ट में समान हैं । जैसे मन्द पवन से मेरु चलायमान नहीं होता वैसे ही यह बड़े भोग व निरादर से चलायमान नहीं हुए, जैसे पपीहे को मेघ के जल बिना नदी और ताल आदि के जल की इच्छा नहीं होती वैसे ही उनको भी किसी पदार्थ की इच्छा नहीं है । तब राजा ने कहा उन्हें यहाँ ले आओ । जब शुकजी आये तब राजा जनक ने उठके खड़े

७९=योगवाशिष्ठ ।

को प्रणाम किया। फिर जब दोनों बैठ गये तब राजा ने कहा कि हे मुनी-
श्वर ! तुम किस निमित्त आये हो, तुमको क्या वाञ्छा है सो कहो
उसकी प्राप्ति में कर देऊँ ? श्रीशुकजी बोले हे गुरो ! यह संसार का आडम्बर
कैसे उत्पन्न हुआ और कैसे शान्त होगा सो तुम कहो ? इतना कह
विश्वामित्रजी बोले हे रामजी ! जब इस प्रकार शुकदेवजी ने कहा तब
जनक ने यथाशास्त्र उपदेश जो कुछ व्यास ने किया था सोई कहा ।
यह सुन शुकजी ने कहा कि भगवन् ! जो कुछ तुम कहते हो सोई मेरे
पिता भी कहते थे, सोई शास्त्र भी कहता है और विचार में मैं भी ऐसा
ही जानता हूँ कि यह संसार अपने चित्त से उत्पन्न होता है और चित्त के
निवेंद होने से भ्रम की निवृत्त होती है, पर मुझको विश्राम नहीं प्राप्त होता
है ? जनकजी बोले, हे मुनीश्वर ! जो कुछ मैंने कहा और जो तुम
जानते हो इससे पृथक् उपाय न जानना और न कहना ही है । यह
संसार चित्त के संवेदन से हुआ है, जब चित्त स्फुरने से रहित होता है तब
भ्रम निवृत्त हो जाता है । आत्मतत्त्वनित्य शुद्धः परमानन्दस्वरूप केवल
चैतन्य है, जब उसका अभ्यास करोगे तब तुम विश्राम पाओगे । तुम
अधिकारी हो, क्योंकि तुम्हारा यत्न आत्मा की ओर है, दृश्य की ओर
नहीं, इससे तुम बड़े उदारात्मा हो । हे मुनीश्वर ! तुम मुझको व्यासजी
से अधिक जान मेरे पास आये हो, पर तुम मुझसे भी अधिक ही, क्योंकि
हमारी चेष्टा तो बाहर से दृष्टि आती है और तुम्हारी चेष्टा बाहर से कुछ
भी नहीं, पर भीतर से हमारी भी इच्छा नहीं है । इतना कह विश्वामित्र-
जी बोले; हे रामजी ! जब इस प्रकार राजा जनक ने कहा तब शुकजी
ने निःसङ्ग निष्प्रयत्न और निर्भय होकर सुमेरु पर्वत की कन्दरा में जाय
दशसहस्र वर्ष तक निर्विकल्प समाधि की । जैसे तेल बिना दीपक निर्वाण
हो जाता है वैसे ही वे भी निर्वाण हो गये । जैसे समुद्र में बुन्द लीन हो जाती
है और जैसे सूर्य का प्रकाश सन्ध्याकाल में सूर्य के पास लीन हो जाता
है वैसे ही कलारूप कलङ्क को त्यागकर वे ब्रह्मपद को प्राप्त हुए ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे मुनिशुकनिर्वाण-
वर्णनन्नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥

मुमुक्षु प्रकरण । ७६

विश्वामित्रजी बोले हे राजा दशरथ ! जैसे शुकजी शुद्धबुद्धि वाले थे वैसे ही रामजी भी हैं। जैसे शान्ति के निमित्त उनको कुछ मार्जन कर्तव्य था वैसे ही रामजी को भी विश्राम के निमित्त कुछ मार्जन चाहिए, क्योंकि आवरण करनेवाले जो भोग हैं उनसे इनकी इच्छा निवृत्त हुई है और जो कुछ जानने योग्य था सो जाना है। अब हम कोई ऐसी युक्ति करेंगे जिससे इनको विश्राम होगा। जैसे शुकजी को थोड़े में मार्जन से शान्ति की प्राप्ति हुई थी वैसे ही इनको भी होगी। हे राजन् ! जैसे ज्ञानवान् को आध्यात्मिक आदि दुःख स्पर्श नहीं करते वैसे ही रामजी को भी भोग की इच्छा नहीं स्पर्श करती। भोग की इच्छा सबको दीन करती है इसी का नाम बन्धन है और भोग की वासना का क्षय करना ही मोक्ष है। ज्यों ज्यों भोग की इच्छा करता है त्यों त्यों लघु होता जाता है और ज्यों ज्यों भोग वासना क्षय होती त्यों त्यों गरिष्ठ होता है। जब तक आत्मानन्द का प्रकाश नहीं होता तब तक विषय की वासना दूर नहीं होती और जब आत्मानन्द प्राप्त होता है तब विषय-वासना कोई नहीं रहती। जैसे मरुस्थल में बेलि नहीं उत्पन्न होती वैसे ही ज्ञानवान् को विषयवासना की उत्पत्ति नहीं होती। हे साधो ! ज्ञानवान् किसी फल की इच्छा से विषय भोग का त्याग नहीं करता, स्वभाव से ही उसकी विषयवासना चली जाती है। जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार का अभाव हो जाता है वैसे ही रामजी को अब किसी भोग पदार्थ की इच्छा नहीं रही। अब तो वे विदितवेद्य हुए हैं अतः विश्राम की इच्छा रखते हैं इससे जो कहो वही करूँ जिसमें वे विश्रामवान् हों। हे राजन् ! भगवान् वशिष्ठजी की युक्ति से ये शान्त होंगे और आगे में वही रघुवंशकुल के गुरु हैं। उनके उपदेश द्वारा आगे भी रघुवंशी ज्ञानवान् हुए हैं। ये सर्वज्ञ और साक्षीरूप हैं और त्रिकालज्ञ और ज्ञान के सूर्य हैं। इनके उपदेश से रामजी आत्मपद को प्राप्त होंगे। हे वशिष्ठजी ! जब हमारा तुम्हारा विरोध हुआ था और ब्रह्माजी ने मन्दराचल पर्वत पर, जो ऋषीश्वरों और अनेक वृक्षों से पूर्ण था; संसार वासना के नाश, हमारे तुम्हारे विरोध की शान्ति और

८० योगवाशिष्ठ ।

अन्य जीवों के कल्याण निमित्त जो उपदेश किया था वह तुमको स्मरण है ? अब वही उपदेश तुम रामजी को करो, क्योंकि ये भी निर्मल ज्ञान-पात्र हैं । ज्ञान, विज्ञान और निर्मलयुक्ति वही है जो शुद्धपात्र में अर्पण हो और पात्र बिना उपदेश नहीं सोहता । जिसमें शिष्यभाव और विरक्तता न हो ऐसे अपात्र मूर्ख को उपदेश करना व्यर्थ है । कदाचित विरक्त हो और शिष्यभावना नहीं तो भी उपदेश न करना चाहिये । दोनों से सम्पन्न को ही उपदेश करना चाहिये । पात्र बिना उपदेश व्यर्थ है अर्थात् अपवित्र हो जाता है । जैसे गौ का दूध महापवित्र है पर श्वान की त्वचा में डालिये तो अपवित्र हो जाता है वैसे ही अपात्र को उपदेश करना व्यर्थ है । हे मुनीश्वर ! जो शिष्य वैराग्य से सम्पन्न और उदार आत्मा है वह तुम्हारे उपदेश के योग्य है और तुम वीतराग और भय क्रोध से रहित परम शान्तरूप हो, इसलिये तुम्हारे उपदेश के पात्र रामजी हैं । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार विश्वामित्रजी ने कहा तब नारद और व्यासादिक ने साधु साधु कहा अर्थात् भला भला कहा कि ऐसे ही यथार्थ है । उस समय राजा दशरथ के पास बहुत प्रकार के साधु बैठे थे । ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठजी ने कहा कि हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने आज्ञा की है वह हमने मानी । ऐसे किसी की सामर्थ्य नहीं कि सन्त की आज्ञा निवारण करे । साधो ! राजा दशरथ के जितने पुत्र हैं उन सबके हृदय में जो अज्ञानरूपी तम है वह में ज्ञानरूपी सूर्य से ऐसे निवारण करूंगा जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार दूर होता है । हे मुनीश्वर ! जो कुछ ब्रह्माजी ने उपदेश किया था वह मुझको अखण्ड स्मरण है में वही उपदेश करूंगा जिससे रामजी निःसंशय होंगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार वशिष्ठजी विश्वामित्र से कह रामजी से मोक्ष का उपाय कहने लगे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुनिविश्वामित्रोपदेशो नाम द्वितीयःसर्गः ॥ २ ॥

वशिष्ठजी बोले हे रामजी ! ब्रह्माजी ने मुझको जीवों के कल्याण के निमित्त उपदेश किया था वह मुझे भले प्रकार स्मरण है और वही अब में तुमसे कहता हूँ । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् !