योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण । ७०३
भासता है और जैसे जल में द्रवता और पवन में चलना भासता है तैसे ही ज्ञानरूप आत्मा में अहन्ता से देश काल, जगत् भासता है । हे रामजी ! जीवों का जीना ज्ञान से होता है और ज्ञानसत्ता चैतन्यरूप है । चिन्मात्र और जीवों में रश्कमात्र भी कुछ भेद नहीं । जैसे ज्ञान चैतन्यसत्ता और जीव में भेद नहीं तैसे ही ज्ञाता और जगत् में कुछ भेद नहीं—एक ही अखण्डसत्ता ज्यों की त्यों स्थित है । हे रामजी ! सर्वसत्ता एक, अज, अनादि और आदि अन्त, मध्य से रहित, प्रकाशरूप, चिन्मात्र अद्वैततत्त्व अपने आप में स्थित है । वह अवाच्यपद है उसमें वाणी प्रवेश नहीं कर सकती और जितने वाक्य हैं वह उसके जताने के निमित्त कहे हैं । वास्तव में द्वैत वस्तु कुछ नहीं है, एक आत्मतत्त्व को अपने हृदय में धारण कर स्थित हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे भेदनिराशावर्णनन्नाम द्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक आगे पुरातन इतिहास हुआ है उसको तुम सुनो । उत्तर दिशा में एक सुगन्धित पृथ्वी है वह मानो कपूर से लिपी हुई है और वहाँ सदाशिव के हंस स्थित हैं । हिमालय के शिखर पर वह कैलास पर्वत है जो सब पर्वतों से उत्तम और उज्ज्वल है वह रुद्र के रहने का स्थान है, वहाँ कल्पवृक्ष लगे हैं और गङ्गा का प्रवाह चलता है । और भी बहुतसी बड़ी नदियाँ वहाँ चलती हैं और कमलों सहित बहुत महासुन्दर तालाब स्थित हैं जहाँ बहुत मृग पक्षी हैं । उस हिमालय के नीचे स्वर्णवत् जटावाले क्रान्त रहते हैं—जैसे वृक्ष के मूल में पिपीलिका रहती हैं । उस कान्त देश का राजा सुरध मानो प्रत्यक्ष लक्ष्मीमूर्ति धारे हुए, वेगवान् ऐसा मानो पवन की मूर्ति, वैराग्यवान् मानो गजेन्द्र, बुद्धिमान् मानो वृहस्पति और शुक्र के समान कवि था । राजा ऐसा था मानो इन्द्र है, और धनी ऐसा मानो कुबेर था । राजा होकर वह राज्य करता था और भली प्रकार प्रजा की पालना करता था । जो भले मार्ग में चलें उनकी वह रक्षा करे और जो पापकर्म चोरी आदिक करें उनको दण्ड दे और जैसा कर्म प्राप्त हो उसमें द्वेष से रहित होकर व्यतीत करे । एक समय वह अपने ध्यान में बैठा था तब चित्त में विचार
उपशम प्रकरण । ७०५
तब ताप भी निवृत्त हो जाता है । जैसे शरत्काल के आये से कुहिरा नष्ट हो जाता है तैसे ही विचार किये से मननभाव नष्ट हो जाता है । विचारो कि मैं कौन हूँ, इन्द्रियाँ क्या हैं, जगत् क्या है और जन्म-मरण किसको कहते हैं ? इस विचार से जब तुम अपने स्वभाव में स्थित होगे तब तुमको हर्ष, शोक, क्रोध और राग-द्वेष चलायमान न कर सकेगा । जैसे वायु से पर्वत चलायमान नहीं होता तैसे ही तुम अचल रहोगे । हे राजन् ! जब आत्मबोध होगा तब मन अपने मननभाव को त्याग देगा और तुम सन्ताप से रहित अपने स्वरूप को प्राप्त होगे। जैसे तरङ्गभाव मिटने से जल निर्मल होता है तैसे ही तुम अचल होगे और मनधर्म भी रहेगा परन्तु मध्य से अज्ञान नष्ट हो जावेगा और आत्मसत्ताभाव होगा । जैसे काल वही रहता है परन्तु ऋतु और हो जाती है तैसे ही मन वही होगा परन्तु स्वभाव और हो जावेगा । तेरे नौकर और प्रजा भी साधु हो जावेंगे और तेरी आज्ञा में चलेंगे और तुझको देखकर प्रसन्न होंगे । हे राजन् ! जब तुझको विवेकरूपी दीपक से आत्मारूपी मणि मिलेगा तब तेरी बड़ाई सुमेरु और समुद्र और आकाश से भी अधिक होगी । जब तुझको विवेक से आत्मतत्त्व का प्रकाश होगा तब तू संसार की तुच्छ वृत्ति में न डूबेगा । जैसे गोपद के जल में हाथी नहीं डूबता तैसे ही तू राग द्वेष में न डूबेगा । जिसको देह में अभिमान है और चित्त में वासना है और वह तुच्छ संसार की वृत्ति में डूबता है, इससे जितना अनात्मभाव दृश्य है उसका त्यागकर, पीछे जो शेष रहे सो परमतत्त्व आत्मा है । हे राजन् ! जो कुछ सत्य वस्तु है उसको हृदय में धरो और जो असत्य है उसको त्याग करो । जैसे जब तक कल्लर को सोनार धोता है तब तक सुवर्ण नहीं निकलता और जब सुवर्ण निकलता है तब धोने का त्याग करता है, तैसे ही तब तक आत्मविचार कर्तव्य है जब तक आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ । जब आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है तब विचार से प्रयोजन नहीं रहता । हे राजन् ! सबमें, सब प्रकार, सब काल, सब आत्मा की भावना करो अथवा जितना दृश्यभाव है सो सब त्याग करोगे तो जो शेष रहेगा सो तुमको भासि आवेगा । जब
७०६ | योगवाशिष्ठ ।
तक सब दृश्य का त्याग न करोगे तब तक आत्मपद का लाभ न होगा । सर्व दृश्य के त्याग से आत्मपद भासेगा । हे राजन ! जब किसी वस्तु के पाने का यत्न करता है तो और का त्यागकर उसी का यत्न करिये तो प्राप्त होता है तो आत्मतत्त्व अनन्य हुए बिना कैसे प्राप्त होगा । जब अपना सम्पूर्ण यत्न एक ही ओर लगाता है तब उस पद की प्राप्ति होती है। इससे आत्मपद के पाने के लिये सब दृश्य को त्यागकर सबके त्याग किये में जो शेष रहे सो परमपद है । हे राजन ! सबके त्याग किये से जो सत्ता अधिष्ठान रहेगा सो तुझको आत्मभाव से प्राप्त होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुरघवृत्तान्तमाण्डव्योपदेशोनाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर जब माण्डवमुनि अपने स्थान को गये तब सुरघ राजा एकान्त में बैठकर विचार करने लगा कि मैं कौन हूँ ? न मैं सुमेरु हूँ, न मेरा सुमेरु है, न मैं जगत हूँ, न मेरा जगत् है, न मैं पृथ्वी हूँ, न मेरी पृथ्वी है, न मैं क्रान्तमण्डल हूँ और न मेरा क्रान्तमण्डल है, क्योंकि यह अपने भाव में स्थित है मेरे भाव में तो नहीं । जो मैं न होऊँ तो भी यह ज्यों का त्यों स्थित है, तो यह मेरे कैसे होवे और मैं इनका कैसे होऊँ ? न मैं नगर हूँ और न मेरा नगर है । हाथी, घोड़ा, मन्दिर, धन स्त्री पुत्रादिक जो कुछ पदार्थ हैं सो न मेरे हैं और न मैं इनका हूँ । इनमें आसक्त होना वृथा है, इनमें मेरा कुछ सम्बन्ध नहीं । जितने भोगों के समूह हैं ये न मैं हूँ, और न ये मेरे हैं । नौकर, भृत्य और कलत्र सब अपने भाव से सिद्ध हैं, मेरा इनमें सम्बन्ध कुछ नहीं । न मैं राजा हूँ, न मेरा राज्य है । में एकाएकी शरीरमात्र हूँ और इनमें में ममत्व करता हूँ सो वृथा है । शरीर में जो में अहँ करता हूँ सो भी व्यर्थ है, क्योंकि हाथ-पाँव आदिक का स्वरूप भिन्न है, न यह मैं हूँ और न ये मेरे हैं । इनमें मेरा शब्द कुछ नहीं । यह रक्त, मांस, हाड़ आदिकरूप है सो मैं नहीं । यह जड़ है और मैं चेतन हूँ, इनके साथ मेरा कैसे सम्बन्ध हो । जैसे जल का स्पर्श कमल को नहीं होता तैसे ही इनका स्पर्श मुझको नहीं । न में कर्मइन्द्रियाँ हूँ और न मेरी कर्म-
उपशम प्रकरण । ७०७
इन्द्रियाँ हैं । यह जड़ है, मैं चैतन्य हूँ । न मैं ज्ञानेन्द्रिय हूँ, न मेरी ज्ञान इन्द्रियाँ हैं । इनसे परे मन है सो भी मैं नहीं, क्योंकि यह जड़ है । मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये सब अनात्मरूप हैं । मेरा इनके साथ अविद्या का सम्बन्ध है । भ्रान्ति से में इनको अपना स्वरूप जानता था पर यह सब भूतों का कार्य है । इनके पीछे चेतन जीव है जो चेतन दृश्य को चेतनेवाला है सो चेतन चेतना भी मैं नहीं । इन सबमें शेष अचेत चिन्मात्रसत्ता मेरा स्वरूप है । बड़ा कल्याण हुआ जो मैंने अपना आप पाया । अब मैं जागा हूँ । बड़ा आश्चर्य है कि में वृथा देहादिक को अपना जानकर शोक और मोह को प्राप्त होता था । मैं तो एक निर्विकल्प चेतन और अनन्त आत्मा सबमें व्याप रहा हूँ और ब्रह्मरूप आत्मा हूँ । इन्द्रियों से आदि जितने भूतगण हैं उन सबका में आत्मा हूँ । यह भगवान् आत्मा सबके भीतर व्यापा है । जैसे सबके भीतर पाँचतत्त्व होते हैं तैसे ही यह चेतनरूप सर्व भाव को भर रहा है और सर्व भावों में व्याप रहा है । भेदरूप और उदय अस्त भाव आदि विकारों से वह रहित है । ब्रह्मा से आदि तृण पर्यन्त सबका आत्मा यही है । सब प्रकाशों का प्रकाशनेवाला दीपक वही है और संसाररूपी मोतियों के पिरोनेवाला तागा और सबका कारण कार्य यही है । वह साकार से रहित है और शरीरादिक सब उसी की सत्ता मे उपलब्ध होते हैं । शरीररूपी रथ इसी से चलता है वास्तव में शरीरादिक कुछ वस्तु नहीं । यह जगत् चित्तरूपी नट की नृत्यलीलारूप है । चित्त में जगत् फुरता है वास्तव में और कुछ वस्तु नहीं । बड़ा कष्ट है कि में वृथा संग्रह असंग्रह की चिन्ता करता था । यह गुणों का प्रवाह है इसमें में क्यों शोकवान् होता था ? बड़ा आश्चर्य है कि असत्यभ्रम सत्य हो मुझको दीखता था । अब मैं निश्चय करके मम प्रबोध हुआ हूँ और दुर्दृष्टि मेरी दूर हुई है । दृष्टि की जो अलभ्य दृष्टि है सो अब मैंने देखी है और जो कुछ पाने योग्य था सो मैंने पाया है और अचेत्य चिन्मात्र को प्राप्त हुआ हूँ । जो कुछ दृश्य है उसको में स्वरूप से देखता हूँ और अहँ मम दुःख मेरा नष्ट हुआ है । मैं चिदानन्द पूर्ण और नित्य शुद्ध अनन्त आत्मा अपने आप में स्थित हूँ । ग्रहण क्या और त्याग
७०८ | योगवाशिष्ठ ।
क्या ? यह क्लेश कोई नहीं और न कोई दुःख है, न सुख है, सर्व ब्रह्म है और दूसरी वस्तु कुछ नहीं। में राग किसका करूँ और द्वेष किसका हो ? मैं मिथ्या मूढ़ता को प्राप्त होकर दुःखी होता था, अब कल्याण हुआ कि में अमूढ़ होकर अपने आप स्वभाव में स्थित हुआ हूँ। ऐसे आत्मा के साक्षात्कार बिना में दुःखी था। इसके देखे से अब किसका शोक करूँ और मोह को कैसे प्राप्त होऊँ। अब में क्या देखूँ, क्या करूँ और कहाँ स्थित होऊँ ? यह सब जगत् आत्मा के प्रकाश से है और सब आत्मरूप है। हे अतत्त्वरूप ! अर्थात् जिसमें तत्त्वों की उपाधि कुछ नहीं तेरी दृष्टि निष्कलङ्क है। में अब सम्यक् ज्ञानवान् हुआ हूँ। मेरा तुझको नमस्कार है। में अनन्त आत्मा, अनुभवरूप, निष्कलङ्क, सर्व इच्छा भ्रमरहित, सुषुप्ति की नाईं शान्तरूप, अचैत्य, चिन्मात्र सदा अपने आपमें स्थित हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुरघवृत्तान्तवर्णन-नाम चतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! क्रान्त जो सुवर्णरूप देश है उसका राजा परमानन्द को प्राप्त हुआ। वह इस प्रकार विचार अभ्यास से ब्रह्मरूप हुआ जैसे गाधि का पुत्र विश्वामित्र तपस्या करके उसी शरीर में क्षत्रिय से ब्राह्मण हुआ था तैसे ही राजा सुरघ अभ्यास करके ब्रह्मरूप ब्रह्मबोध हुआ और जैसे सूर्य इष्ट अनिष्ट में सम है और विगतज्वर होकर दिनों को व्यतीत करता है तैसे ही राग द्वेष से रहित वह राज्य का कार्य करता रहा। जैसे जल ऊँची नीची ठौर में जाता है और अपना जलभाव नहीं त्यागता सम रहता है, तैसे ही राजा हर्षशोक से रहित होकर राज्य कार्य करता रहा और स्वभाव को न त्यागा। आत्मविचार का धार सुषुप्ति की नाईं उसकी वृत्ति हो गई और संसार भाव का स्फुरना रुक गया। जैसे वायु से रहित दीपक प्रकाशता है तैसे ही वह शुद्ध प्रकाश धारता भया। हे रामजी ! वह दया करता भी दृष्टि आवे परन्तु उसकी दृष्टि में कुछ दया नहीं और दया से रहित भी औरों को दीखे परन्तु उसकी दृष्टि में निर्दयता नहीं। न कुछ सुख, न दुःख, न अर्थ, न अनर्थ सब पदार्थों में एक समभाव आत्मा देखे और हृदय से पूर्णमासी के चन्द्रमावत् शीतल
उपशम प्रकरण । ७०४
रहे । वह जगत् आत्मा का किञ्चनरूप जानता था और उसके सुख दुःख का भाव शान्त हो गया । जैसे सूर्य के उदय हुए अन्धकार नष्ट हो जाता है तैसे ही उसके सुख दुःख नष्ट हो गये थे। शोक, विलास करता, मत्त होता, स्थित होता, चलता श्वास लेता और पाँचों विषयों को ग्रहण करता वह राग द्वेष को प्राप्त न होता था । जैसे पत्थर में फुरना कुछ नहीं फुरता तैसे ही उसको कर्तृत्व भोक्तृत्व का मान कुछ न फुरा, सब कर्त्तव्य को करता भी निःसंग रहा जैसे जल में कमल अलेप रहता है तैसे ही वह राज्य में निर्लेप होकर जीवन्मुक्त हुआ । इस प्रकार जब बहुत काल बीता तब उसने शरीर का त्याग किया । जैसे बर्फ का कणका सूर्य के तेज से जलमय हो जाता है तैसे ही उसका शरीर अपने भाव को त्यागकर आत्मतत्त्व में लीन हो गया । जैसे नदी समुद्र में लीन होती है और फिर भिन्न नहीं भासती तैसे ही सुरघ अपने भाव को त्यागकर उज्ज्वलभाव को प्राप्त हुआ और कलनारूपी मल को त्यागकर निर्मल ब्रह्म हुआ । जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही यह निर्मल चिदानन्द ज्योतिभाव को प्राप्त हुआ और जैसे घट फूटे से घटाकाश महाकाश हो जाता है तैसे ही वह पूर्णब्रह्म चिदानन्द तत्त्व हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे सुरघव़ृत्तान्तसमाप्तिर्नाम पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तुम भी इसी दृष्टि का आश्रय करके विचरो तब सब भय मिट जावेगा । जैसे घोर तम में बालक भय पाता है और जब दीपक का प्रकाश होता है तब निर्भय होता है तैसे ही संसार-रूपी घोरतम में आया पुरुष दुःख पाता है और जब ज्ञानरूपी दीपक उदय होता है तब निर्भय हो जाता है। हे रामजी ! जब आत्म विचार में कुछ भी मनुष्य का चित्त विश्राम पाता है तब उस विश्राम का आश्रयकर वह संसारसमुद्र से निकल जाता है, जैसे गड्ढे में गिरे और तृण का वृक्ष हाथ लगे तो भी उसके आश्रय से निकल आता है । हे रामजी ! यह पावन दृष्टि मैंने तुमसे कही है इसको चित्त में विचारो और परस्पर मिल-कर उदाहरण के साथ अभ्यास कर नित्य एक समाधि में स्थित हो और
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पृथ्वी का भूषण होकर लोगों में विचरो। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! एक समाधि किसको कहते हैं और कैसे होती है सो कहो जिसमें मेरा चित्त जो फुरता है सो स्थित हो। जैसे वायु से मोर की पुच्छ हिलती है तैसे ही चञ्चलरूप चित्त सदा फुरता है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जबसुरघ प्रबुद्ध हुआथा तब उसका संवाद पर्णाद राजऋषि के साथ हुआ था वह अद्भुत समाधि है, उसको सुनकर विचारोगे तो तुम भी एक समाधिमान् होगे। उसने परस्पर मिलकर जो चर्चा की थी सो सुनो। हे रामजी ! पारसदेश का राजा महा वीर्यवान था। उसका परघ नाम था और वह सुरघ का मित्र था। जैसे नन्दनवन में कामदेव और बसन्तऋतु का मित्रभाव होता है तैसे सुरघ और परघ का मित्रभाव था। एक काल में परघ के देश में प्रलयकाल बिना प्रलयकाल की नाईं समय हुआ और उससे सब जीव दुःख पाने लगे। निदान प्रजा की पापबुद्धि का फल आन लगा और महादुर्भिक्ष पड़ा। कोई क्षुधा से मृतक हुए, कोई अग्नि से जल मरे और बहुतेरे झगड़ा करके मृतक हुए। प्रजा बहुत दुःख को प्राप्त हुई पर राजा को कुछ दुःख प्राप्त न हुआ। जब प्रजा ने बहुत दुःख पाया और राजा ने प्रजा को दुःखी देखा पर प्रजा का दुःख निवृत्त न कर सका तो प्रजा अपने अपने कुटुम्ब को त्यागकर चली गई—जैसे बन में अग्नि लगने से पक्षी त्याग जाते हैं। तब राजा एक पहाड़ की कन्दरा में तप करने लगा और ऐसा तप करने लगा जैसा कि जिनेन्द्र ने किया था। वह उस कन्दरा में फल न पाये केवल सूखे पत्ते लेकर खावे—जैसे अग्नि सूखे पत्तों को भक्षण करती है उससे उसका नाम पर्णाद हुआ। निदान चित्त की वृत्ति को आत्मपद में लगाकर सहस्रवर्ष पर्यन्त उसने तप किया तब अभ्यास के बल से चित्त स्थित हुए से केवल ज्ञानरूप आत्मतत्त्व हृदय की निर्मलता से प्रकाश आया और सब तमना मिट गई। तब वह राग द्वेष से रहित हो निष्क्रिय-आत्मदर्शी-जीवन्मुक्त होकर विचरने लगा। जैसे सरोवरों में कमलों के निकट भँवरा हंसों के साथ जा मिलता है तैसे ही सिद्धों के साथ राजा जा मिले। ऐसे फिरता फिरता वह क्रान्त देश में सुरघ के स्थानों को गया। सुरघ पूर्वमित्र को देखकर उठ खड़ा
उपशम प्रकरण । ७११
हुआ और परस्पर कण्ठ लगाके मिले फिर परस्परभाव करके एक आसन पर चन्द्रमा और सूर्य के समान दोनों बैठ गये और आपस में कुशल पूछने लगे । प्रथम परघ बोला, हे मित्र ! तेरे दर्शन से जैसे कोई चन्द्रमा के मण्डल में जा आनन्दवान् हो तैसे ही में आनन्दवान् हुआ हूँ । बहुत काल का जो वियोग होता है तो बहुत प्रीति बढ़ती है जैसे वृक्ष को ऊपर कांटे से बढ़ता है तैसे ही प्रीति बढ़ती है । हे साधो ! अब मैं भी ज्ञानवान् हुआ और तू भी माण्डव्य मुनि और आत्मा के प्रसाद से ज्ञान को प्राप्त हुआ है । हे राजन् ! मेरा अभीष्ट प्रश्न यह है कि तू अब दुःखों से मुक्त होकर विश्राम को प्राप्त हुआ है । आत्मपद पाने की बड़ाई मेरु आदिक से भी ऊँची है उसको तू प्राप्त हुआ है और परम कल्याणवान् आत्मारामी हुआ है । तुम रागद्वेष मल से रहित हुए हो-जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है-और सब कार्यों के करते भी ममभाव में रहते हो । आधि-व्याधि ताप तुम्हारे दूर हुए हैं; तुम्हारी प्रजा भी विगतज्वर हुई है और धन, राज्य और माल में भी कुशल है । जैसे चन्द्रमा की किरणें शीतलता फैलाती हैं तैसे ही तुम्हारा यश दशों दिशाओं में फैल रहा है और तुम्हारा यश ग्राम-वासी क्षेत्रों में लड़कियां गाती हैं । हे राजन् ! तुम्हारे प्रजा, नौकर, पुत्र और कलत्र सब आधि-व्याधि से रहित हुए हैं । विषय पदार्थ आपाता-रमणीय हैं उनमें अब तुम्हारी प्रीति नहीं है और तृष्णारूपी सर्पिणी तुमको अब तो नहीं डसती । हे राजन् ! तुम्हारी हमारी मित्रता हुई थी । समय पाकर तुम कहाँ रहे और हम कहाँ रहे, अब फिर इकट्ठे हुए हैं । बड़ा आश्चर्य है ? ईश्वर की नीति जानी नहीं जाती, सुख से दुःख हो जाता है और दुःख गये से सुख हो जाता है । संसार की दशा आरामपायी है, संयोग का वियोग होता है और वियोग का संयोग होता है । तैसे ही तुम्हारा हमारा भी संयोग का वियोग हो गया था और अब फिर वियोग का संयोग हुआ है । बड़ा आश्चर्य है-ईश्वर की नीति अद्भुतरूप है । सुरघ बोले, हे देव ! परमात्मा देव की नीति जान नहीं सकते । वह महा-गम्भीर विस्मय में देनेवाली और दुर्ज्ञात है । तुम्हारा हमारा वियोग
७१२ | योगवाशिष्ठ।
हुआ तब दूर से दूर जा पड़े, तुम कहाँ थे और हम कहाँ थे अब फिर इकट्ठे हुए हैं। देव की नीति आश्चर्यरूप है। तुमने जो मुझसे कुशल पूछी सो तुम्हारा आना ही पुण्य है उसमे में परम पावन हुआ हूँ और तुम्हारे दर्शन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। आज हमारे पुण्य का फल लगा है जो तुम्हारा दर्शन हुआ है और जो कुछ यश सम्पदा है, वह सब आज प्राप्त हुई है। हे भगवन्! सन्तों का आना मधुर अमृत की नाईं है। जैसे अमृत झरने से निकलता है तैसे ही तुम्हारे दर्शन और वचनों से परमार्थरूपी अमृत स्रवता है। जिसको पाकर जीव निर्भयता को प्राप्त होता है। सन्तों का मिलना परमपद के तुल्य है इसलिये हम परम शुद्धता को प्राप्त हुए हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुरघपरघसमागमवर्णन- नामषट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार जब वे पूर्व वृत्तान्त कह रहे थे तब फिर परघ बोले, हे राजन्! समाहित चित्त इस जगज्जाल में जो-जो कर्म करता है सो सुखरूप होता है। संकल्प से रहित जो परम विश्राम और परम उपशम समाधि है उसमें अब तुम स्थित हुए हो। सुरघ बोले, हे भगवन्! तुम्हीं कहो कि सब संकल्पों से रहित परम उपशम समाधि किसको कहते हैं? और यदि तुम मुझको पूछो तो सुनो। जो ज्ञान- वान् महात्मा पुरुष हैं वे चाहे तूष्णीम् रहें अथवा व्यवहार करें असमा- हितचित्त कदाचित् नहीं होते। हे साधो! जिनका नित्य प्रबुद्ध चित्त है वे जगत् के कार्य भी करते हैं पर आत्मतत्त्व में स्थित हैं। तो वह सर्वदा समाधि में स्थित हैं और जो पद्मासन बाँधकर बैठते हैं और ब्रह्माञ्जली हाथ में रखते हैं पर चित्त आत्मपद में स्थित नहीं होता और विश्रान्ति नहीं पाते तो उनको समाधि कहाँ? वह समाधि नहीं कहाती। हे भगवन्! परमार्थ तत्त्वबोध आशारूपी सब तृणों के जलानेवाली अग्नि है। ऐसी निराशारूपी जो समाधि वही समाधि है। तूष्णीम होने का नाम समाधि नहीं है। हे साधो! जिसका चित्त समाहित, नित्यतृप्त और सदा शान्त- रूप है और जो यथा भूतार्थ है अर्थात् जिसे ज्यों का त्यों ज्ञान हुआ है और उसमें निश्चय है वह समाधि कहाती है; तूष्णीम होने का नाम
उपशम प्रकरण । ७१३
समाधि नहीं है जिसके हृदय में संसाररूप मन्यता का क्षोभ नहीं है, जो निरहंकार है और अनुदय ही उदय है वह पुरुष समाधि में कहाता है । ऐसा जो बुद्धिमान् है वह सुमेरु से भी अधिक स्थित है । हे साधो ! जो पुरुष निश्चिन्त है, जिसका ग्रहण और त्याग बुद्धि निवृत्त हुई है, जिसे पूर्ण आत्मतत्त्व ही भासता है वह व्यवहार भी करता दृष्ट आता है तो भी उसकी समाधि है । जिसका चित्त एक क्षण भी आत्मतत्त्व में स्थित होता है उसकी अत्यन्त समाधि है और क्षण-क्षण बढ़ती जाती है निवृत्त नहीं होती । जैसे अमृत के पान किये से उसकी तृष्णा बढ़ती जाती है तैसे ही एक क्षण को भी समाधि बढ़ती ही जाती है । जैसे सूर्य के उदय हुए सब किसी को दिन भासता है तैसे ही ज्ञानवान् को सब आत्मतत्त्व भासता है—कदाचित् भिन्न नहीं भासता । जैसे नदी का प्रवाह किसी से रोका नहीं जाता तैसे ही ज्ञानवान् की आत्मदृष्टि किसी से रोकी नहीं जाती और जैसे काल की गति काल को एक क्षण भी विस्मरण नहीं होती तैसे ही ज्ञानवान् की आत्मदृष्टि विस्मरण नहीं होती । जैसे चलने से ठहरे पवन को अपना पवनभाव विस्मरण नहीं होता तैसे ही ज्ञानवान् को चिन्मात्र तत्त्व का विस्मरण नहीं होता और जैसे सत् शब्द बिना कोई पदार्थ सिद्ध नहीं होता तैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा के शिवाय कोई पदार्थ नहीं भासता । जिस ओर ज्ञानवान् की दृष्टि जाती है उसे वहाँ अपना आप ही भासता है—जैसे दर्पण के मन्दिर में सर्व ओर अपना ही मुख भासता है । जैसे उष्णता बिना अग्नि नहीं, शीतलता बिना वरफ नहीं और श्यामता बिना काजर नहीं होता तैसे आत्मा बिना जगत् नहीं होता । हे साधो ! जिसको आत्मा से भिन्न पदार्थ कोई नहीं भासता उसको उत्थान कैसे हो ? मैं सर्वदा बोधरूप, निर्मल और सर्वदा सर्वात्मा समाहितचित्त हूँ, इससे उत्थान मुझको कदाचित् नहीं होगा । आत्मा से भिन्न मुझको कोई नहीं भासता सब प्रकार आत्मतत्त्व ही मुझको भासता है । हे साधो ! आत्मतत्त्व सर्वदा जानने योग्य है । सर्वदा और सब प्रकार आत्मा स्थित है, फिर समाधि और उत्थान कैसे हो ? जिसको कार्य कारण में
७१४ योगवाशिष्ठ ।
विभागकलना नहीं फुरती और जो आत्मतत्त्व में ही स्थित है उसको समाहित असमाहित क्या कहिये ? समाधि और उत्थान का वास्तव में कुछ भेद नहीं । आत्मतत्त्व सदा अपने आप में स्थित है, द्वैतभेद कुछ नहीं तो समाहित असमाहित क्या कहिये ?
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे समाधिनिश्चयवर्णनन्नाम सप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५७ ॥
सुरघ बोले, हे राजन् ! निश्चय करके अब तुम जागे हो और परमपद को प्राप्त हुए हो । तुम्हारा अन्तःकरण पूर्णमासी के चन्द्रमावत् शीतल हुआ है और परम शोभा से तुम्हारा मुख शोभित होकर तुम प्रफुल्ललक्ष्मीसम्पन्न और परमानन्द से पूर्ण हुए हो । तुम्हारा हृदयकमल शीतल और स्निग्ध विराजमान है और निर्मल तुम्हारी विस्तृत गम्भीरता मुझको प्रकट भासती है । निर्मल शरत्काल के आकाशवत् तुम्हारा हृदय भासता है और अहंकाररूपी मेघ तेरा नष्ट हुआ है । हे राजन् ! अब तुमको सर्वत्र स्वस्थ और सर्वथा सन्तुष्टता है और किसी में राग नहीं। तुम वीतराग होकर विराजते हो, सार असार को तुमने भली प्रकार जाना है और उसे जानकर असार संसाररूपी समुद्र सेपार हुए हो और महाबोध को तुमने ज्यों का त्यों जानकर अखण्ड स्थिति पाई है और भाव-अभाव पदार्थ दोनों को तुम जानते हो । तुम जगत् के सम असम पदार्थों से मुक्त हो और तुम्हारा आशय पवित्र और मुदिता प्राप्त हुई । इष्ट, अनिष्ट, ग्रहण, त्याग तुम्हारा निवृत्त हुआ है, राग द्वेष और तृष्णारूपी बादलों से रहित निर्मल आकाशवत् तुम शोभते हो और अपने आपसे तृप्त हुए हो कुछ इच्छा तुमको नहीं है । सुरघ बोले हे मुनीश्वर ! इस जगत् में ग्रहण करने योग्य वस्तु कोई नहीं । जो कुछ दृश्य पदार्थ हैं वे सब आभासरूप हैं तो ग्रहण किसको कीजिये ? और जो कहिये कि ग्रहण करने योग्य नहीं इससे त्याग करिये तो आभासरूप पदार्थों का त्याग क्या कीजिये और ग्रहण क्या कीजिये क्योंकि हैं नहीं सब तुच्छ पदार्थ हैं जैसे सूर्य की किरणों में जल
- 'संयोगनाशको गुणो विकारा ।'
उपशम प्रकरण । ७१५
भासता है तो उस जलाभास का कौन अङ्ग ग्रहण कीजिये और कौन अङ्ग त्याग कीजिये, तैसे ही यह जगत् भी है । हे मुनीश्वर ! जगत् के कोई पदार्थ तुच्छ हैं और कोई अतुच्छ हैं । जो थोड़े काल में नष्ट हो जाते हैं सो तुच्छ हैं और जो चिरकालपर्यन्त रहते हैं वे अतुच्छ हैं परन्तु दोनों काल में उपजे हैं अब मैंने अकालरूप को देखा है इससे दोनों तुल्य हो गये हैं फिर इच्छा किसकी करूँ ? हे मुनीश्वर ! जो पदार्थों को रमणीय जानते हैं वे उनकी इच्छा करते हैं पर त्रिलोकी में रमणीय पदार्थ कोई नहीं, सब तुच्छ और नाशरूप हैं और अविचार से जीवों को भासते हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध जो इन्द्रियों के विषय हैं वे भी सब असाररूप हैं । स्त्री को बड़ा पदार्थ जानते हैं पर वह भी देखने--मात्र सुन्दर है और भीतर से रक्त, मांस, विष्ठा और मूत्र का थैला बना हुआ है—इसमें भी कुछ सार नहीं । पर्वत बड़े पदार्थ हैं सो पत्थर बटोरे हैं, समुद्र जल है वनस्पति काष्ठ-पत्र हैं और इनसे आदि जो पदार्थ हैं वे सब आपातरमणीय हैं विचार बिना सुन्दर भासते हैं । इनकी जो इच्छा करते हैं वे अपने नाश के निमित्त करते हैं—जैसे पतङ्ग दीपक की इच्छा करता है सो अपने नाश के निमित्त करता है और हरिण राग की इच्छा से नाश को प्राप्त होता है तैसे ही जो विषयों की तृष्णा करते हैं वे अपने नाश को करते हैं । इससे विचार से रहित जो अज्ञानी हैं वे पदार्थों को रमणीय जानकर अपने नाश के निमित्त इच्छा करते हैं और जो समदर्शी ज्ञानवान् हैं वे उन्हें अरमणीय जानकर किसी जगत् के पदार्थ की इच्छा नहीं करते । जैसे सूर्य के उदय हुए अन्धकार का अभाव होता है तैसे ही जब पदार्थों का राग उठ गया तब तृष्णा किसमें रहे । हे साधो ! राग द्वेष इच्छा ग्रहण त्याग जो कुछ विचारे हैं उन सबसे रहित शुद्ध आत्मतत्त्व में स्थित हो । बहुत कहने से क्या है जिस पुरुष के मन में वासना नष्ट हो गई है वह उपशमवान् कल्याणमूर्ति परमपद को प्राप्त हुआ और संसारसमुद्र से तर गया है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुग्धपरमनिश्चयवर्णन नामाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५८ ॥
७१६ योगवाशिष्ठ ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार सुरघ और परघ जगत् को भ्रमरूप विचारते परस्पर गुरु जानकर पूजते रहे, फिर कुछ दिन उपरान्त परघ चला गया। हे रामजी! इनका जो परस्पर संवाद तुमको सुनाया है सो परमबोध का कारण है। इस विचार के क्रम से बोध की प्राप्ति होती है। तीक्ष्ण बोध से जब विचार करोगे तब अहंकाररूपी बादल का अभाव हो जावेगा और शुद्ध हृदयरूपी आकाश में आत्मरूपी सूर्य का प्रकाश हो जावेगा। इससे परमपद के लाभ के निमित्त अहंकाररूपी बादल के अभाव का यत्न करो। आत्मा जो सत्य और सब आनन्दों की सम्पदा चिदाकाश है उसमें स्थिति पावोगे। हे रामजी ! जो पुरुष नित्य अन्तर्मुखी अध्यात्ममय है और नित्य चिदानन्द में चित्त को लगाता है वह सदा सुखी है—उसको शोक कदाचित् नहीं होता और जो पुरुष आत्मपद में स्थित हुआ है वह बड़े व्यवहार करे और राग द्वेष सहित दृष्टि आवे तो भी उसको कुछ कलङ्क नहीं होता। जैसे कमल जल में दृष्टि आता है तो भी ऊँचा रहता है, जल उसको स्पर्श नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् को व्यवहार का राग द्वेष हृदय में स्पर्श नहीं करता। हे रामजी ! जिसका मन शान्त हुआ है उसको संसार के इष्ट अनिष्ट पदार्थ चला नहीं सकते। जैसे सिंहों को मृग दुःख दे नहीं सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को जगत् के पदार्थ दुःख नहीं दे सकते। जिस पुरुष को आत्मानन्द-प्राप्त हुआ है उसको विषयों की तृष्णा नहीं रहती और न वह विषयों के निमित्त कदाचित् दीन होता है। जैसे जो पुरुष नन्दनवन में स्थित होता है वह कण्टकों के वृक्ष की इच्छा नहीं करता तैसे ही ज्ञानवान् जगत् के पदार्थों की इच्छा नहीं करता। हे रामजी ! जिस जिस पुरुष ने जगत् का अविद्यारूप जानकर त्याग किया है उसके चित्त को जगत् के पदार्थ दुःख दे नहीं सकते। जैसे विरक्तचित्त पुरुष की स्त्री मर जावे तो उसको दुःख नहीं होता तैसे ही ज्ञानवान् के चित्त में भोगों की दीनता ऐसे नहीं उपजती उसे नन्दनवन में कण्टक का वृक्ष नहीं उपजता। जिस पुरुष को आत्मबोध हुआ है और संसार का कारण मोह निवृत्त हुआ है वह जगत् का कार्यकार्ता दृष्टि आता है परन्तु वह कार्य उसको स्पर्श
उपशम प्रकरण । ७१७
नहीं करते-जैसे आकाश में अन्धकार दृष्टि आता है परन्तु आकाश को स्पर्श नहीं करता । हे रामजी ! अविद्या के निवृत्ति का कारण विद्या है और किसी उपाय से निवृत्ति नहीं होती । जैसे प्रकाश बिना तम निवृत्त नहीं होता तैसे ही विचार बिना अविद्या निवृत्ति नहीं होती । अविचार का नाम अविद्या है और विचार का नाम विद्या है, जब अविद्या नष्ट होगी तब विषय भोग स्वाद न देवेंगे और आत्मानन्द से संतुष्टवान् रहोगे। हे रामजी ! ज्ञानवान् को विचार के कारण इन्द्रियों के व्यवहार अन्धा नहीं करते-जैसे जल में मछली रहती है उसको जल अन्धा नहीं कर सकता पर और अन्धे हो जाते हैं । जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है तब अज्ञानरूपी रात्रि निवृत्त हो जाती है, चित्त परमानन्द को प्राप्त हो जाता है और रागद्वेषरूपी निशाचर नष्ट हो जाता है । तब फिर मोह को नहीं प्राप्त होता । जिसके हृदय आकाश में आत्मज्ञानरूपी सूर्य उदय हुआ है उसका जन्म और कुल सफल होता है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अपने अमृत को पाकर अपने में ही शीतल होता है तैसे ही जो पुरुष आत्मचिन्तना में अभ्यास करता है वह शान्ति पाता है । हे रामजी ! बुद्धि श्रेष्ठ और सतशास्त्र वही है जिसमें संसार से वैराग और आत्मतत्त्व की चिन्तना उपजे । जब जीव आत्म-पद को पाता है तब उसका सब क्लेश मिट जाता है और जिसकी आत्म चिन्ता में रुचि नहीं वे महाअभागी हैं । ऐसे पुरुष चिर पर्यन्त कष्ट पावेंगे और जन्मरूपी जङ्गम के वृक्ष होंगे । हे रामजी ! जीवरूपी बैल अनेक आशारूपी फाँसियों से बँधा है, जरा अवस्थारूपी पत्थरों के मार्ग से जर्जरीभूत होता है, भोगरूपी गढ़े में गिरा है और कर्मरूपी भार को लिये जन्मरूपी जङ्गम में भटककर कर्म कीचड़ में फँसा हुआ राग द्वेषरूपी मच्छरों से दुःखी होता है स्नेहरूपी रथ को पकड़ के खैंचता है और पुत्र, आदिक की ममतारूपी कीचड़ में गोते खाता है और मोह संसाररूपी मार्ग में कर्मरूपी रथ के साथ लगता है और ऊपर से अज्ञानरूपी तप्ता से जलता है और सन्तजन और सतशास्त्ररूपी वृक्ष की छाया नहीं पाता । हे रामजी ! जीवरूपी ऐसा बैल है । उसे निका-
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लने का यत्न करो जब तत्त्व का अवलोकन करोगे तब चित्तभ्रम नष्ट हो जावेगा । हे रामजी ! संसाररूपी समुद्र के तरने का उपाय सुनो । महा-पुरुष और सन्तजन मल्लाह हैं, उनका युक्तिरूपी जहाज है उससे संसार-रूपी समुद्र तर जावेगा, और उपाय कोई नहीं यही परम उपाय है । जिस देश में सन्तजनरूपी वृक्ष नहीं हैं और जिनकी फलों सहित शीतल छाया नहीं है उस निर्जन मरुस्थल में एक दिन भी न रहिये । हे रामजी ! सन्तजनरूपी वृक्ष हैं, जिनके स्निग्ध और शीतल वचनरूपी पत्र हैं, प्रसन्न होना सुन्दर फूल है और निश्चय उपदेशरूपी फल है । जब यह पुरुष उनके निकट जावे तब महामोहरूपी तप्ता से छूटेगा और शान्ति पाकर तृप्त होगा । तभी तीनों को पाकर अघावेगा और सब दुःखों से मुक्त होगा हे रामजी ! अपना आपही मित्र है और अपना आपही शत्रु है । अपने आपको जन्मरूपी कीचड़ में न डाले । जो देह में अहंभावना से विषयों की तृष्णा करता है वह अपना आपही नाश करता है । जो देह भाव को त्यागकर आत्म अभ्यास करता है वह अपना आप उद्धार करता है और वह अपना आपही मित्र है और जो आपको संसारसमुद्र में डालता है यह अपना आपही शत्रु है । हे रामजी ! प्रथम यह विचारकर देखे कि जगत् क्या है, कैसे उत्पन्न हुआ है और कैसे निवृत्त होगा ? मैं कौन हूँ, सत्य क्या है और असत्य क्या है ? ऐसे विचार कर जो सत्य है उसको अङ्गीकार करे और जो असत्य है उसका त्याग करे । हे रामजी ! न धन कल्याण करता है न मित्र बान्धव और न शास्त्रकल्याण करते हैं, अपना उद्धार आपसे होता है । इससे तुम अपने मन के साथ मित्रता करो । जब वह दृढ़ वैराग्य और अभ्यास करे तब संसारकष्ट से छूटे । जब वैराग्य अभ्यास से तत्त्व के अवलोकन से अहंतारूप बेड़ी कटे तब संसार-समुद्र से तर जाता है । हे रामजी ! जीवरूपी हाथी जन्मरूपी गढ़े में गिरा हुआ है, तृष्णा और अहंकाररूपी जंजीर से बँधा है और कामनरूपी मद से उन्मत्त है । जब उनसे छूटे तब मुक्त हो । हे रामजी, हृदयरूपी औषध से अनात्म अभिमानरूपी रक्त रोग हो गया है, जब विचाररूपी नेत्रों से उसको दूर कीजिये तब आत्मरूपी सूर्य का दर्शन हो । हे रामजी ! और
उपशम प्रकरण । ७१५
उपाय कोई न करो तो एक उपाय तो अवश्य करो कि देह को काष्ठ लोष्टवत् जानकर इसका अभिमान त्यागो। जब अहं अभिमानरूपी बादल नष्ट होगा तब आपही आत्मरूपी सूर्य प्रकाश आवेगा । जब अहंकार-रूपी बादल लय होगा तब आत्मतत्त्वरूपी सूर्य भासेगा, वह परमानन्द-स्वरूप है, सुषुप्तिरूप मौन है अर्थात् केवल अद्वैत तत्त्व है, वाणी से कहा नहीं जाता अपने अनुभव से आपही जाना जाता है। हे रामजी ! सब जगत् अत्यन्त आत्मा है । जब चित्त का दृढ़ परिणाम उसमें हो तब स्थावर जङ्गमरूप जगत् में वही दिव्यदेव भासेगा और वासना सब निवृत्त हो जावेगी । तब अनुभव से केवल परमानन्द आत्मतत्त्व दिखाई देगा सो स्वरूप पूर्ण और अद्वैत है । सब जगत् का त्याग कर उसी के पाने का यत्न करो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे कारणोपदेशो नामैकोनषष्टितमसर्गः ॥ ५९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मन से मन को छेदो और अहं ममभाव को त्यागो । जबतक मन नष्ट नहीं होता तब तक जगत् के दुःख निवृत्त नहीं होते । जैसे मूर्ति का सूर्य मूर्ति के नष्ट हुए बिना अस्त नहीं होता—जब मूर्ति नष्ट हो तब सूर्य का आकार भी दूर हो तैसे ही जब मन नष्ट हो तब संसार के दुःख नष्ट हो जावेंगे—अन्यथा नष्ट न होंगे । हे रामजी ! जैसे प्रलयकाल में अनन्त दुःख होता है तैसे ही मन के होने से अनन्त दुःख होते हैं और जैसे मेघ के दर्पने से नदी बढ़ती जाती है तैसे ही मन के जागे से आपदा बढ़ती जाती है । इसही पर एक पुरातन इतिहास मुनीश्वर कहते हैं सो परस्पर सुहृदों का हेतु है । हे रामजी ! सह्याचल सब पर्वतों में बड़ा पर्वत है । उस पर फूलों के समूह और नाना प्रकार के वृक्ष हैं, जल के झरने चलते हैं और मोतियों के स्थान और सुवर्ण के शिखर हैं । कहीं देवताओं के स्थान हैं और कहीं पक्षी शब्द करते हैं । नीचे क्रान्त रहते हैं ऊपर सिद्ध, देवता और विद्याधर रहते हैं पीठ में मनुष्य रहते हैं और नीचे नाग रहते हैं—मानो सम्पूर्ण जगत् का गृह यही है । उसके उत्तर दिशा में सुन्दर वृक्ष और फूलों से पूर्ण तालाब है
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जिसकी महासुन्दररूप रचना स्वर्ग की सी है। वहाँ अत्रिनाम एक ऋषीश्वर साधुओं के श्रम दूर करने वाला रहता था। उसके आश्रय के पास दो तपस्वी आ रहने लगे—जैसे आकाश में बृहस्पति और शुक्र आ रहे। उन दोनों के गृह में दो महासुन्दर पुत्र जैसे कमल उत्पन्न हो तैसे ही उत्पन्न हुए उनमें एक का नाम भास और दूसरे का नाम विलास हुआ। दोनों क्रम से बड़े हुए और जैसे अंकुर के दोनों पत्र बढ़ते हैं तैसे ही वे बढ़ने लगे। परस्पर उनकी प्रीति बहुत बढ़ी और इकट्ठे रहने लगे। जैसे तिल और तेल, और फूल और सुगन्ध इकट्ठे रहते हैं और जैसे स्त्री पुरुष की प्रीति आपस में होती है, तैसे ही उनकी प्रीति बढ़ी। वे देखनेमात्र तो दो मूर्ति दृष्ट आते थे परन्तु मानो एक ही थे। उनकी स्नान आदिक क्रिया और मानसी क्रिया भी एक समान था और वे महासुन्दर प्रकाशवान् थे जैसे चन्द्रमा और सूर्य हों जब कुछ काल व्यतीत हुआ तब उनके माता पिता शरीर त्यागकर स्वर्ग को गये और उनके वियोग से वे दोनों शोकवान् हुए और जैसे कमल की कान्ति जल बिना जाती रहे तैसे ही उनके मुख की कान्ति कुम्हिला गई। फिर उन्होंने उनके मरने की सब क्रिया की और उनके गुण सुमिरण करके विलाप करें और महाशोकवान् हों क्योंकि महापुरुष भी लोकमर्यादा नहीं लँघते। हे रामजी! इस प्रकार शोक कर उनका शरीर कृश हो गया।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे भासविलासवृत्तान्त- वर्णनन्नाम षष्टितमस्सर्गः ॥ ६० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसे उजाड़ वन का वृक्ष जल बिना सूख जाता है तैसे ही उनका शरीर सूख गया। तब वे दोनों शोकातुर होकर विचरने लगे। जैसे समूह से बिछड़ा हरिण शोकवान् होता है तैसे ही वे दुःखी हुए क्योंकि उनको निर्मल ज्ञान प्राप्त न था। जब कुछ काल व्यतीत हुआ तब वे फिर आ मिले। विलास ने कहा, हे भाई! हृदय को आनन्द देनेवाला अमृत का समुद्र जीवनरूप जो वृक्ष है उस का फल सुख है सो तुम इतने काल क्या सुख से रहे। तुम्हारा हमारा वियोग हो गया था तब तुम कैसी क्रिया करते रहे। क्या तुमने अपना कुछ चित्त निर्मल किया है
उपशम प्रकरण ।
<p align="right">७२१</p>और अब आत्मपद पाया है । क्या अब तुम्हारी बुद्धि शोक से रहित होकर विद्या तुमको फली है और तुम अब कुशलरूप हुए हो ? भास बोले, हे साधो ! अब हमको कुशल हुई जो तुम्हारा दर्शन हुआ । जगत् में कुशल कहाँ है, इस संसार में स्थित हुए हमको सुख और कुशल कहाँ है ? हे साधो ! जब तक ज्ञेय परमात्मतत्त्व को नहीं पाया, जब तक चित्तभूमिका क्षीण नहीं हुई और जबतक संसारसमुद्र को नहीं तरे तबतक कुशल कहाँ है ? जब तक चित्त से दुःख निवृत्त नहीं होता तब तक चित्त की भूमिका नष्ट नहीं होती । जब तक संसारसमुद्र से पार नहीं होते तब तक हमको सुख कहाँ है ? जब तक चित्तरूपी क्षेत्र में आशारूपी कणटकों की बेलि बढ़ती जाती है और आत्मविचाररूपी हँसिये से नहीं काटी जाती तब-तक हमको कुशल कहाँ, जब तक आत्मज्ञान उदय नहीं हुआ तबतक हमको कुशल कहाँ है ? हे साधो ! संसाररूपी विसूचिका रोग आत्म-ज्ञानरूपी औषध बिना दूर नहीं होता । सब जीव नित्य वही क्रिया कहते हैं जिससे दुःख प्राप्त हो इससे सुख को नहीं पाते । देहरूपी वृक्ष में बालअवस्थारूपी पत्र हैं और यौवन और वृद्ध अवस्थारूपी फल हैं सो मृत्यु के मुख में जा पड़ता है, उपजता है और फिर नष्ट होता है । यह सुख जो लवाकार है और दुःख जिसका दीर्घ से दीर्घ है । ऐसे जो शुभाशुभ आरम्भ हैं उनमें इनको दिन-रात्रि व्यतीत होते हैं । हे साधो ! चित्त रूपी हाथी वैराग्यरूपी जंजीर बिना तृष्णारूपी हथिनी के पीछे दूर से दूर चला जाता है । जैसे चील्ह पक्षी मांस की ओर जाता है तैसे ही चित्त विषयों की ओर धावता है और आत्मारूपी चिन्तामणि की ओर नहीं जाता । अहंकाररूपी चील्ह देहादिकरूपी मांस की ओर धावता है और सुखरूपी कमल अपानरूपी धूलि से धूसर हो जाता है और भोग-रूपी वरफ से नष्ट हो जाता है । हे साधो ! यह देहरूपी कूप में गिरा है, जिसमें भोगरूपी सर्प है, आशारूपी कणटक है और तृष्णारूपी जल है उसमें दुःख पाता है । हे साधो ! नाना प्रकार के रङ्गरञ्जनारूपी भोग हैं और जिसमें तृष्णारूपी चञ्चलता है ऐसे चैत्यदृश्य में मग्न है । चित्तरूपी ध्वजा कालरूपी वायु से हिलती है चित्तरूपी समुद्र में चिन्तारूपी भँवर
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हैं जिसमें जीवरूपी तृण आय कष्ट पाता है और बुद्धिरूपी पद्मिणी है जो वासनारूपी जाल से कष्ट पाती है। यह मैंने किया है, यह करती हूँ और यह करूँगी, इसी वासनारूपी जाल में बुद्धिरूपी पद्मिणी कष्ट पाती है-एक तृण भी विश्रामवान् नहीं होती। हे भाई ! इस चित्तरूपी कमल को राग-द्वेषरूपी हाथी चूर्ण करता है। यह मेरा सुहृद है, यह मेरा शत्रु है, यह 'अहं' 'मम' ही उसको मारता है। शुद्ध आत्मरूप को त्यागकर देहादिक अनात्मरूप में अहंभाव करता है और दीनता को प्राप्त होता है। जैसे राज्य से रहित राजा कष्ट पाता है तैसे ही आत्मभाव से रहित कष्ट पाता है और देहाभिमानी जन्ममरण के दुःख देखता है। जब देहाभिमान को त्याग करे तब कुशल हो अन्यथा कुशल नहीं होती।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे अन्तरप्रसङ्गो नामैकषष्टितमसर्गः ॥ ६१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार उन्होंने परस्पर कुशल प्रश्न किया। जब कुछ काल व्यतीत हुआ अभ्यास द्वारा उनको निर्मल ज्ञान प्राप्त हुआ और मोक्षपद को प्राप्त हुए। इससे हे रामजी ! कल्याण के निमित्त ज्ञान के सिवा और मार्ग कोई नहीं। जिसका चित्त आशा-रूपी फाँसी से बँधा है वह संसारसमुद्र से पार नहीं हो सकता। इससे जीव संसारसमुद्र में गोते खाता है और ज्ञानवान् शीघ्र ही ऐसे तर जाता है जैसे गोपद लंघने में सुगम होता है। जैसे जिस पक्षी के पंख टूटे हैं सो समुद्र को नहीं तर सकता बीच में ही गिरके गोते खाता है और गरुड़ पंखों से शीघ्र ही लंघ जाता है, तैसे ही जिन पुरुषों के वैराग्य और अभ्यासरूपी पंख टूटे हैं वे संसारसमुद्र से पार नहीं हो सकते और जिन पुरुषों के वैराग्य और अभ्यासरूपी पंख हैं वे शीघ्र ही तर जाते हैं। हे रामजी ! जो देह से अतीत महात्मा पुरुष चिन्मात्रतत्त्व में स्थित हुए हैं वे ऊँचे होकर देखते हैं और अपने आप को देखके हँसते हैं-जैसे सूर्य जनता को देख हँसता है अर्थात् जगत् की क्रिया में निर्लेप रहता है। जैसे रथ के टूटे से रथवाहक को कुछ खेद नहीं होता तैसे ही देह के दुःख से ज्ञानवान् को कदाचित् खेद नहीं होता और मनके क्षोभ से भी आत्मतत्त्व में कुछ क्षोभ नहीं होता। जैमे नग्न पर धूलि पड़ती
उपशम प्रकरण। ७३३
है तो उसमें समुद्र को कुछ लेप नहीं होता तैसे ही मन के दुःख से आत्मा को क्षोभ नहीं होता । हे रामजी ! जैसे जल और हंस का और जल और नौका का कुछ सम्बन्ध नहीं तैसे ही देह और आत्मा का कुछ सम्बन्ध नहीं । जैसे पहाड़ और समुद्र का सम्बन्ध नहीं, जैसे जल, पत्थर और काष्ठ एक ठौर रहते हैं परन्तु कुछ सम्बन्ध नहीं और जैसे जल और नौका का संसर्ग होता है तो जलकणके उठते हैं तैसे ही देह और आत्मा के संयोग से चित्तवृत्ति फुरती है । हे रामजी ! जीव को दुःख संग से ही होता है । जहाँ अहं मम का अभिमान होता है वहाँ दुःख भी होता है और जहाँ अहं मम का अभिमान नहीं वहाँ दुःख भी कुछ नहीं होता । जैसे मछली को जल में ममत्व होता है और उसके वियोग से कष्ट पाती है तैसे ही जिस पुरुष को देह में अहं मम भाव है वह बड़ा कष्ट पाता है और जिसको देह में अभिमान नहीं उसको दुःख नहीं होता । हे रामजी ! ज्यों ज्यों मन से संसर्गता निवृत्त होती है त्यों त्यों भोग-प्रवाह कष्ट नहीं देता जैसे जल से पत्थर को कष्ट नहीं होता और जैसे दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है सो दर्पण को प्रतिबिम्ब का संग नहीं होता और कष्ट भी नहीं होता । तैसे ही जब देह से संसर्गभाव उठ जाता है तब कोई कष्ट नहीं होता । जैसे दर्पण को कुछ कष्ट नहीं होता तैसे ही आत्मा और जगत् की क्रिया है । हे रामजी ! सर्वथा संवित्मात्र आत्मतत्त्व स्थित है वह शुद्ध है और द्वैतशब्द के फुरने से रहित है । जो उसमें स्थित है उसको द्वैतशब्द नहीं फुरता और जो अज्ञानी है उसको द्वैतकल्पना उठती है । हे रामजी ! यह सब जीव अदुःखरूप हैं परन्तु अज्ञान से आपको दुःखी जानते हैं । जैसे स्थाणु में चोरभावना अविचार से होती है तैसे ही आत्मा में दुःख की भावना अविचार से होती है । यह जीव अशब्दरूप हैं परन्तु कलना के वश से आपको सम्बन्धी जानता है । जैसे स्वप्न में अङ्गना बन्धन करती है और स्थाणु में वैताल भासता है और भय प्राप्त होता है तैसे ही अपनी कल्पना से जीव बन्धवान् होता है । हे रामजी ! देह और आत्मा का सम्बन्ध असत्य है-जैसे जल और नौका का सम्बन्ध असत्य है । यदि जल का अभाव हो तो नौका को