भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

१४३ \hfill अकबर बीरबल विनोद

१४३ \hfill अकबर बीरबल विनोद हुआ चला गया। दरबार में पहुँचकर उसने बीरबल का सारा वृतान्त कह सुनाया। बादशाह बीरबल से मिलने के लिये और भी उत्सुक हुआ। कुछ समय और प्रतीक्षा करने पर जब वह न आया तब उसे बुलाने के लिये एक दूसरे आदमी को भेजा। वह भी वही पहले सा सूखा उत्तर लेकर लौटा। बादशाह मिनट २ पर उसे बुलाने को आदमी भेजने लगा, परन्तु बीरबल सबको यही एक उत्तर देकर लौटाता—"भाई खिचड़ी पका रहा हूँ, थोड़ी देर में आता हूँ।" बादशाह को बीरबल की बाट निहारते-निहारते कई घंटे हो गये और दरबार का सारा काम इसी आवा-जाही के कारण बन्द रहा। बीरबल की ऐसी धृष्टता बादशाह को असह्य हो गई और वह क्रोध में परिणत होकर बोला- "वाह मुझे प्रतीक्षा करते करते कई घण्टों का समय व्यतीत हो गया और अभी तक उसकी खिचड़ी न पकी। मैं स्वयं चलकर उसकी खिचड़ी देखता हूँ।" बादशाह कुछ लोगों को साथ लेकर स्वयं उस स्थान पर गया, जहाँ महाशय बीरबल की खिचड़ी पक रही थी। अजीब दृश्य था. ऊपर बाँस के सिरे में बँधी हुई एक काली हाँड़िया टँगी थी और वह नीचे घास सुलगा कर खिचड़ी पका रहा था। बादशाह बोला—"बीरबल यह तूँ क्या कर रहा है?" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ खिचड़ी पका रहा हूँ! बादशाह-"मैं देखता हूँ कि आज तुम्हारा दिमाग घूमा हुआ है? भला-आकाश में हड़ियाँ टाँगकर कहीं जमीन पर घास सुलगाने से खिचड़ी पक सकती है?"

अकबर बीरबल विनोद १४४

अकबर बीरबल विनोद १४४ बीरबल-“गरीबपरवर ! जिस प्रकार एक कोस की दूरी से अग्नि की उष्णता देखकर ब्राह्मण जल में रात्रि समय जीवित रह सकता है, उसी प्रकार, मेरी खिचड़ी भी थोड़ी देर में परिपक्क हो जायगी।” बादशाह-बीरबल की इस दृष्टान्त भरी खिचड़ी से प्रसन्न हो गया और बोला-“बीरबल! अब मैं भलीभाँति समझ गया, तुम्हारा कहना सत्य है अतएव दरबार में चलो। बरहमन को शर्त के अनुसार इनाम दिया जायगा। बीरबल तो केवल, उतने ही के लिये नया नाटक तय्यार किये हुए था। जब उसकी मंशा बर आई तो उठकर बादशाह के साथ दर्बार को गया। बादशाह ने सिपाही भेजकर उस बरहमन को बुलावाया और उसको अपनी घोषणा के अनुसार द्रव्य और वस्त्राभूषण देकर बिदा किया। वह बीरबल को कोटि कोटि धन्यवाद देता हुआ अपनेघर चला गया। मुल्ला की पगड़ी अकबर बादशाह के दरबारियों में कितने मुल्ले भी शरीक थे। उन्हों में एक मुल्ला का नाम दुआजा था। यह बीरबल से प्रगट तो हँसी किया करता था, परन्तु भीतर २ उसे झिपा कर अपनी प्रधानता चाहता था। एक दिन जब दरबार भरा हुआ था बादशाह ने सबके सामने बीरबल की पगड़ी देखकर उसकी बड़ी तारीफ की। दुआजा बीरबल की इस प्रशंसा को सुनकर भीतर ही भीतर जल उठा, परन्तु अपना भीतरी भाव छिपाकर बादशाह से बोला-“यह कौन सी बडी बात है, मैं

१४५ अकबर बीरबल विनोद

१४५ अकबर बीरबल विनोद इससे भी अच्छी पगड़ी बाँधकर दिखला सकता हूँ।” मुल्ला को दूसरे दिन पगड़ी बाँधने की कला दिखलाने की आज्ञा देकर बादशाह ने दरबार बरखास्त किया। मुल्ला मन में मस्त था, प्रभात होते ही पगड़ी बाँधकर सभा में हाजिर हुआ। बादशाह को मुल्ला के पगड़ी बाँधने की कला पसन्द आई और लोगों के सामने उसकी बड़ी प्रशंसा की। यहाँतक कि उसकी पगड़ी को बीरबल की पगड़ी से भी अधिक विशेषता दी। तब बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ यह इनकी करतूत नहीं है; बल्कि इसका श्रेय इनकी स्त्री को मिलना चाहिये। उसी की मदद से मुल्ला साहब ने बाजी मार ली है। यदि मेरी बातों का यकीन न हो तो ये सबके सामने फिर से बाँधकर दिखलावें।” मुल्ला की पगड़ी उतार दी गई, परन्तु वे ऐनक की सहायता के बिना फिर वैसी पगड़ी बाँध न सके, अतएव बादशाह के सामने विचारे को चपड़िाना पड़ा। इस पर बादशाह को बड़ी हँसी आई और बोला-“धन्य हैं मुल्ला साहब ! जो कर्म आपसे नहीं बन पड़ता वह जोरू से करवाते हैं।” ━:❈:━ एकान्तबास की व्याख्या बीरबल का नियम था कि दर्बार से फुरसत पाकर वह अपना कुछ समय एकान्तवास में बिताया करता था। एक दिन जब कि वह दर्बार से खाली होकर अपने घर लौट रहा था तो मार्ग में उसे एक आदमी मिला। वह बीरबल से पूछा- १०

अकबर बीरबल विनोद १४६

अकबर बीरबल विनोद १४६ “महाशय जी ! क्या आप कृपा कर मुझे बीरबल के घर का पता बतला सकते हैं ?” बीरबल ने कहा-“क्यों नहीं बतला सकता ।” तब वह उसको अपने घर का पता ठिकाना बतला कर वहाँ से चलता हुआ । वह मनुष्य पूछता २ बीरबल के घर जा पहुँचा और उसके घरवालों से बीरबल से मिलने का अनुरोध किया । वे बोले-“ताऊजी अभी बाहर गये हैं, ठहर जाओ थोड़ी देर में मुलाकात हो जायगी । वह आदमी बीर- बल के द्वार पर बैठकर उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा । थोड़ी देर बाद बीरबल लौटकर आया, वह उसे पहचान कर आश्चर्यचकित होकर पूछा-‘दीवान जी ! रास्ते में आपसे मेरी मुलाकात हुई थी, परन्तु वहाँ पर आपने मुझे अपना परिचय क्यों नहीं दिया ।” बीरबल ने कहा-“आपका कहना अक्षरसः सत्य है, परन्तु आपने मुझसे बीरबल के घर का पता पूछा था । इसलिये मैंने अपने घर का पता बतला दिया, यदि मेरा परिचय पूछे होते तो मैं आपको अपना परिचय देता ।” उस आदमी ने कहा-“लोगोंके मुखसे मैंने ऐसा सुना है कि आप नित्यप्रति अपना थोड़ा समय एकान्त बास में बिताते हैं, सो उसका क्या कारण है ?” बीरबल बोला-“आपको समझना चाहिये था कि एकान्तबास से बड़ा लाभ होता है। अव्वल तो एकान्त बास में विचारों की सूझ भलीभाँति होती है, दोयम एकान्त मनन करने का सर्वोत्कृष्ट साधन है। यदि आप कहीं अलग बैठकर विचार करेंगे तो आपको अपनी परिस्थिति और की और ही देख पड़ेगी ।” वह मनुष्य बीरबल के उत्तर से संतुष्ट होकर अपने घर लौट गया ।

१४७ अकबर बीरबल बिनोद बीरबल की कुरूपता बीरबल का रंग साँवला था। एक दिन दर्बार के समय लोगों में मनुष्य की सुन्दरता और कुरूपता पर बहस छिड़ी। बहुतेरे लोग बीरबल का स्मरण कर उसकी कुरूपता पर हँस पड़े। उस समय बीरबल दर्बार में उपस्थित नहीं था, जब कुछ कालोपरान्त लौटकर आया तो दर्बारी लोग उसे देखकर जोर २ से हँसने लगे। बीरबल चाहता था कि उनके इस आकस्मिक हँसी का कारण पूछे, परन्तु कुछ सोच विचार कर चुप रह गया। इधर उधर की बातें होने लगीं। कुछ देर बाद बीरबल को अवसर मिला तो बादशाह से बोला-“पृथ्वीनाथ ! आज आप लोग बड़े हँसमुख क्यों दीख पड़ते हैं ?” बादशाह ने हँसते हुए उत्तर दिया-“लोगों के हँसने का कारण तुम्हारी कुरूपता है, वे कहते हैं-“हम लोग गोरे और बीरबल काला कैसे हुआ ?” बीरबल बोला-“अफसोस कि अभी तक आपको इसका कारण ही नहीं ज्ञात हुआ।” बादशाह ने कहा-“भला भाई बिना बतलाए यह लोगों को कैसे मालूम हो ? आप यदि जानकारी रखते हों तो बतला कर सबका भ्रम निवारण करें।” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! जिस समय ईश्वर ने सृष्टि की रचना प्रारम्भ की सर्वप्रथम वृक्ष और बैलों की रचना की। पर इतना ही करके वह संतुष्ट नहीं हुआ, तब पशु और पक्षियों की बारी आई। इतना करके कुछ समय तक आनन्द उपभोग करता रहा, फिर उससे भी उत्तम

अकबर बीरबल विनोद

१४८ अकबर बीरबल विनोद जीवों की रचना करने का विचार कर मनुष्यों की रचना की। तब वह अति आनन्दित होकर पहले उसे रूप, दूसरे धन, तीसरे बुद्धि और चौथे बल प्रदान किया । चारों चीजों को जुदी २ रखकर सब मनुष्यों को फर्माया कि इन चारों में जिसे जो पसन्द हो अपनी इच्छानुसार ले लेवे। इस कार्य के लिये कुछ समय भी निर्धारित कर दिया था। मैं बुद्धि लेने में रह गया जब दूसरो चीज लेने गया तो समय बीत चुका था इसलिये कोरा लौटना पड़ा। मैं बुद्धि लेकर रह गया। आप लोग भी धन, रूप, बल के लालच में पड़कर बुद्धि लेना भूल गये। इसी कारण मैं कुरूप हुआ। बीरबल के उत्तर से बादशाह और दरबारियों का मन टूट गया और फिर वे कभी बीरबल की हँसी न उड़ाई ।

—०:*:०—

चतुर माँ के सपूत एक दिन बादशाह बीरबल के साथ बाग में बैठा हुआ गपाष्टक कर रहा था। गरमी का दिन था। प्रातःकाल की मन्द मन्द हवा बह रही थी। बादशाह और दीवान गरमी की पोशाक पहने हुए थे। उस सुहावने समय में वे बड़े खुश मालूम होते थे। उनके बातों की लड़ी टूटती ही न थी। प्रसंग चलते २ बनियों का जिक्र आया। बादशाह ने बीरबल से पूछा- “बीरबल ! क्या यह सच है, लोग अक्सर बनियों को चतुर माँ के बेटे क्यों कहते हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! सचमुच बनिये ऐसे ही पाये जाते हैं।” बादशाह ने कहा-“अच्छी बात है; परन्तु इसका प्रमाण देकर मेरी शंका निवारण करो।

१४६ अकबर बीरबल विनोद

१४६ अकबर बीरबल विनोद बीरबल ने तुरत एक सिपाही के द्वारा थोड़ी सी मूँग की फुरमाइश कर बाजार से चार बनियों को बुलवाया। दीवान का संदेशा मिलते ही बनिये मूँग के नमूने सहित तुरत हाजिर हुए। बीरबल ने पूछा-"साहजी इस अन्न का क्या नाम है?" बनिये विचार में पड़ गये और मन में सोचा कि यह अन्न एक प्रसिद्ध खाद्य है और इसका नाम भी किसी से छिपा नहीं है, कारण की परमातमा ने इसकी उपज भी अच्छी दी है। इसके अन्दर कोई भेद की बात जरूर है, नहीं तो बादशाह इसका नाम मुझसे क्यों पूछता ? उत्तर भी सोच समझ कर देना चाहिये।" चारो बनियों ने मिलकर एक मत किया। उन्होंने सोचा कि यदि मूँग को मूँग ही बतलाया जाय तो बादशाह इससे प्रसन्न नहीं होने का तब आखिर ऐसा कौन सा नाम बतलावें की बादशाह की प्रसन्नता हो। अभी इनका मिसकाउट चल ही रहा था कि इसी बीच बादशाह ने फिर पूछा-"क्यों साहजी ! आप लोग अभी तक क्या सोच रहे हैं, इसका नाम क्यों नहीं बतलाते ?" थोड़ी सी मूँग हाथ में उठाकर एक बनिये ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! यह तो मुझे उरद जान पड़ती है। दूसरे ने कहा-"यह मटर जान पड़ती है। परन्तु मटर मे छोटी है, इसका ठीक-ठीक नाम स्मरण में नहीं आता।" तीसरे ने कहा-"यह मिरच जान पड़ती है।" उनकी ऐसी चौरंगी बातें सुनकर बादशाह ने कहा-"तुम लोग मुझे खपतुलहवास जान पड़ते हो। यह मूँग है मूँग।" बनियों ने कहा-"हाँ गरीबपरवर ! वही वही, जो आप कह रहे हैं।" बादशाह ने

अकबर बीरबल विनोद १५०

अकबर बीरबल विनोद १५० फिर पूछा-“वही वही क्या ? नाम क्यों नहीं बतलाते ।” बनिये बोले-“गरीबपरवर ! जो नाम अभी आपने बतलाया था वही ।” बादशाह भी पर में पानी लगने देने वाला नहीं था। उसने कहा-“अभी मैंने किस चीजका नाम लिया था ?” बनिये फिर चालाकी खेल गये और बोले-“गरीबपरवर ! हम को विस्मरण हो गया है।” बादशाह ने कहा-“हाँ हाँ मैंने मूँग का नाम बतलाया था ।” बनियों ने कहा-“जी जी, पृथिवीनाथ वही ।” इतना होने पर भी बनियों ने मूँग का नाम अपनी जबान पर न लाये। बादशाह उनकी इस चातुर्यता से अति प्रसन्न हुआ, और सब को घर जाने की अनुमति दी । गौ की महिमा एक दिन बादशाह के सामने लोग गौ की उपयोगिता पर विचार कर रहे थे; सभों ने गौ की एक से एक बढ़कर महिमा बतलाई। उस समय एक मौलबी साहब भी वहीं बैठे हुए थे, उन्होंने कहा-“गौ को मैं भी गुणवती कहने को तय्यार हूँ क्योंकि हमारी पुस्तकों में भी एक स्थान पर गौ के दूध को स्वास्थ्यवर्धक और मांस को अनिष्ट कर लिखा है।” यह सुनकर बीरबल से चुप न रहा गया, वह बोला-“तभी आप लोगों की कुरान के प्रारम्भ में ही बकर लिखा है। बकर गाय का नाम है। यह सुनकर सब लोग हँस पड़े, बादशाह भी प्रसन्न हुआ।

१५१ अकबर बीरबल विनोद

१५१ अकबर बीरबल विनोद यकीनशाह पीर आज बादशाह अपनी वर्षगाँठ मना रहा था, दूर-दूर के लोग इस उत्सव में अपना २ तोहफा लेकर आये हुए थे, एल- चियों की तो मानो भरमार हो रही थी। जो आता अपनी नजर गुजार कर किसी रिक्त स्थान पर बैठ जाता। दरबारी लोग अपने २ आसनों पर मूर्तिमान बैठे हुए थे। शामियाने के अन्दर वेश्याओं का गान और वाद्य भी साथ ही साथ होता जा रहा था। बादशाह अपने दर्बार की सजावट देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे अपने दरबारियों की बुद्धि और कला विशेषता पर बड़ा गर्व था। उसका ख्याल था कि उसके मंत्री के समान बुद्धिमान कहीं दुनियाँ के पर्दे में दूसरा मंत्री नहीं है। बादशाह के दरबार में फकीर और मौलवियों का जम घट लगा हुआ था क्यों कि आज उसने हजारों फकीर जिमाये थे और बहुतेरों को मुँह माँगा दान दिया था। इसी समय बादशाह का सबसे बड़ा पीर आया। बादशाह ने भी पीर साहब की बड़ी आव भगत की और उन्हें सर्वोत्तम पदार्थ भेट में दिया। हर तरफ प्रसन्नता का साम्राज्य था जिधर देखो उधर लोग बादशाह को दुवा देते सुनाई पड़ते थे। इस नजारे को देखकर बीरबल हँस पड़ा ? उसकी हँसी से बादशाह को नाराजगी तो नहीं हुई, परन्तु वह कुछ क्षुब्ध सा अवश्य हो गया। जब सब लोग चले गये तो बादशाह ने बीरबल से पूछा- "क्यों बीरबल बतला सकते हो की पीर बड़ा होता है वा यकीन।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ ! यकीन बड़ा

अकबर बीरबल विनोद १५२

अकबर बीरबल विनोद १५२ होता है।" बादशाह ने बीरबल की बात काट दी और बोला-"भला कभी पीर से बढ़कर यकीन भी हो सकता है; बिना पीर के हुए विश्वास कैसे होगा।" बीरबल ने कहा-"नहीं शाहनशाह यकीन ही पीर से बड़ा है।" बादशाह उसके इस उत्तर से कुछ झल्लाकर कहा-"बीरबल यह तू क्या कहता है, कहीं पीर की मानता करने से वह नाखुश होता है।" बीरबल बोला-"पीर पर विश्वास करने से फल मिलता है।" हम हिन्दू मूर्त्तिका पूजन करते हैं, परन्तु वह मूर्त्ति हमे फल नहीं देती बल्कि उस पर विश्वास करने से हमें देवतों द्वारा फल मिलता है।" बादशाह को बीरबल के ऐसे उत्तर से सन्तोष नहीं हुआ तदर्थ क्रोधित होकर बीरबल से कहा-"तुमको प्रमाणों द्वारा सिद्ध कर दिखाना होगा कि पीर से आस्था बड़ी है।" बीर- बल बोला-"मुझे स्वीकार है।" बादशाह ने कहा-"इसी वक्त सिद्ध कर दिखलाओ।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ! यह काम इतना सरल नहीं है, इसके लिये अवकाश मिलना चाहिये।" बादशाह बोला-"अच्छा, तुझे इसके लिये एक महीने की मुहलत दी जाती है, परन्तु ध्यान रहे कि अगर इतने समय में सिद्ध न कर सकोगे तो तुम्हारी गर्दन उड़ा दी जायगी।" बीरबल ने कहा-"मुझे स्वीकार है।" उस दिन का काम समाप्त हुआ। बीरबल बराबर अपना कार्य्य पहले सा करने लगा। जब उसे मालूम हुआ कि अब बादशाह का दिल दूसरी बातों में बहल गया है तो चार पाँच दिनों का अन्तर देकर बादशाह के पैर का एक पघाई जूता चुरा ले गया।

१५३ अकबर बीरबल विनोद

१५३ अकबर बीरबल विनोद वह उस जूतेको शालके टुकड़ेमें भलीभाँति ढककर नगरके बाहर एक एकान्त जगह में छिपा कर रख आया दूसरे दिन उसको एक कब्र के अन्दर रख ऊपर से तीन पत्थरों को ऐसी विधि से रख दिया की वह एक खासी कब्र बनकर तय्यार हो गई। बाद को एक मुसलमान को नौकर रखकर उसका मुजावर बनाया। उसको हिदायत की कि जब कोई इसके निस्वत तुमसे पूछे तो कहना कि यह मकबरा यकीन शाह पीर की है और बराबर लोगों में इसकी सिद्धताई की चर्चा भी करते रहना।” मुजावर ने बीरबल की आज्ञानुसार उस मकबरे का यकीनशाह पीर के नाम से नया नया ढोग रचकर प्रचार करने लगा। धीरे धीरे यह बात सारे नगर में फैल गई। तमाम स्त्री पुरुष उस पर मानता मानने और चढ़ाने के लिये आने लगे। ईश्वर की कृपा से 'जंगल में मंगल' हो गया। यह बात फैलते २ एक दिन बादशाह के कान तक पहुँची। जैसा दुनिया का कायदा है, दरबारी लोग सूई की जगह फार से काम लिया। यानी बादशाह से यकीनशाह पीर की बड़ी सिद्धताई बखान की। कुछ लोगों ने तो बाद- शाह से यहाँ तक बतलाया कि-“आपके बाल्यावस्था में आपके पिता हिमायूँ ने भी इस पीर साहब की मानता की थी, और पीर साहब की कृपा से उन्हें बड़े २ कार्यों में सफ- लता भी प्राप्त हुई थी। बादशाह लोगों के भड़काने में आ गया। उसने मन में संकल्प किया कि किसी दिन मैं भी चलकर पीर साहब

अकबर बीरबल विनोद १५४

अकबर बीरबल विनोद १५४ की दरगाहपर सिरनी चढ़ाऊँगा। एक दिन जब वह सबेरे सोकर उठा तो उसके मन में एकाएक पीर की दरगाह पर जाने की समाई, तुरत चन्द मुसाहिबों के साथ सवारी पर चढ़कर वहाँ पहुँचा। वहाँ की कुछ और ही हालत हो रही थी; कितने ही लोगों की भीड़ लगी हुई थी। एक छोटी सी बाजार लग थी। बादशाह को उस स्थान के देखने से बड़ी प्रसन्नता हुई। वह अपने दरबारियों के सहित यकीनशाह पीर को बड़ी विनम्रता से प्रणाम किया। बीरबल चुपचाप खड़ा रहा। बादशाह ने बीरबल से कहा-“सब लोगों ने तो पीर को प्रणाम किया परन्तु तुमने नहीं सो क्यों। तुम्हें भी मुना- सिब है कि पीर साहब को प्रणाम करो।” बीरबलने कहा- “मैं प्रणाम करने को तय्यार हूँ, परन्तु आपको भी मेरी एक बात माननी पड़ेगी, यानी पीरसे आस्था को ही प्रधान कहना पड़ेगा।” बादशाह ने उत्तर दिया-मैं इस समय भी यही कहने को प्रस्तुत हूँ कि आस्था से पीर बड़ा है और तुम्हारे सामने ही इस बात की मनौती भी करता हूँ कि यदि मैं प्रतापसिंह पर विजय प्राप्त कर लूँगा तो इस कबर पर मखमली चादर बिछाऊँगा और मलीदा चढ़ाकर यहीं पर मौलवी और फकीरों को खाना खिलाऊँगा।” बादशाह और दीवान इस विषय पर वाद- विवाद कर ही रहे थे कि उसी के दरम्यान एक सवार तेजी से घोड़ा दौड़ाता हुआ आया और बादशाह को सलाम कर बोला-“पृथ्वीनाथ! शाहजादा सलीम ने कहलाया है कि मेवाड़ का राजा प्रतापसिंह ने अपनी हार स्वीकार कर ली है

१५५ अकबर बीरबल विनोद

१५५ अकबर बीरबल विनोद और आशा है कि कुछ ही देर बाद मेरे आधीन भी हो जायगा।” इस आनन्दवर्धक समाचार को सुनकर बादशाह के रोम २ प्रफुल्लित हो गये और बीरबल को नीचा दिखलाने के अभिप्राय से बोला-“कहो अब भी आस्था को पीर से प्रधानता देने को तय्यार हो वा नहीं। देखो इधर मनौती की और उधर से शुभ समाचार आ पहुँचा।” बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! बिना आस्था के हुए आपने पीर पर मन्नत नहीं की थी। यदि आप की पीर पर आस्था न हुई होती तो आप कदापि मानता न मानते; मुख्य आस्था ही है।” बादशाह ने कहा-“अब तुम अपनी धींगाधींगी बन्द करो, मुझे इस पर यकीन नहीं होता। चूँकि अभीतक तुम आस्था की प्रधानता सिद्ध नहीं कर सके हो अतएव मरने के लिये तय्यार हो जाओ।” बीरबल ने कहा-“मैंने आपको बहुतेरा समझाया, परन्तु आप नहीं मानते फिर इसमें मेरा क्या अपराध है।” बादशाह बीरबलके इस उत्तर से क्रोधित होकर बोला-“अब मैं तुमको इस अपराध का दण्ड स्वयं अपने हाथ से दूँगा, !तुम्हारा काल आज तुम्हारे सिर पर चढ़कर बोल रहा है। क्या कोई हाजिर है, जाकर तुरन्त एक बधिक को बुला लाओ।” बादशाह का रुख ताड़ कर बीरबल ने मन में निश्चय कर लिया कि अब और अधिक टाल मटोल करने से बाद- शाह अपने क्रोध को सम्हाल न सकेगा अतएव यकीन शाह को हाथ जोड़कर बोला-“हे यकीन शाह जो आज मैं जीता बचा तो आपकी कब्रपर मिठाई चढ़ाऊँगा और इस कबर के ऊपर एक सुन्दर मकबरा निर्माण करा दूँगा।” बीरबल के

अकबर बीरबल विनोद १५६

अकबर बीरबल विनोद १५६ इस मन्नत पर बादशाह ने हँस दिया और उसे संबोधन कर बोला—"क्यों बीरबल अब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ गई; आखिरश लाचार होकर तुम्हें भी मानता माननी ही पड़ी।" बीरबल ने उत्तर दिया—"बेशक ! पीर साहब की ही शरण लेनी पड़ी।" पश्चात् वह सब दरबारियों सहित कबर के समीप जा पहुँचा और उसके बीच वाला पत्थर अपने हाथ से उठाकर अलग रख दिया और उसके भीतर से उस गठरी को निकाल कर बाहर किया। बादशाह इस बात को देखकर बड़ा हैरान हुआ और बीरबल से उसका कारण पूछा। बीरबल ने उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! यही आपके यकीन- शाह पीर हैं और आपने इन्हीं की मानता की थी। बादशाह को उस शाल की गठरी के भीतर अपने जूते की पवाई देख- कर बड़ा आश्चर्य हुआ और लज्जित होकर अपनी गर्दन नीची कर ली। बीरबल बोला—"गरीबपरवर ! अब आप ही फर्मावें कि आस्था बड़ी है वा पीर।" अपने मनका विश्वास ही मुख्य है। जब विश्वास नहीं रहता तो मानता भी निष्फल हो जाती है। इसलिये आपको कहना पड़ेगा कि मुख्य विश्वास ही है।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली। यकीनशाह की बड़ी शोहरत हो गई थी जिस कारण वहाँ पर काफी धन संचित हो गया था। उस धन से बीरबल ने वहाँ पर एक मसजिद बनवा दिया। बीरबल की बुद्धिमानी से बादशाह को मात होना पड़ा।

१५७ अकबर बीरबल विनोद

१५७ अकबर बीरबल विनोद कौन सा अच्छा एक दिन बादशाह अपने दर्बार में बैठा हुआ दर्बारियों से दिल-बहलाव की बातें कर रहा था, इसी दर्मियान बीरबल भी आ पहुँचा ! बादशाह ने बीरबल से पूछा- “बीरबल ! क्या बतला सकते हो कि फल कौन सा अच्छा? दूध किसका अच्छा, पत्ता किसका अच्छा, फूल कौन सा अच्छा, मिठास कौन सी अच्छी, राजा कौन अच्छा ?” उप- स्थित मण्डली में एक भी ऐसा न था जो ऊपर के प्रश्नों का उचित उत्तर देता । तब बादशाह ने इसका भार बीरबल के ऊपर दिया । बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! फलों में बेटा अच्छा है जिससे बाप दादों का नाम पुस्त दरपुस्त चला जाता है । दूध माता का उत्तम होता है जिससे सब का पालन पोषण होता है । पत्ता पान का अच्छा होता है। इसके देने से नौकर स्वामिभक्त हो जाता है, यहाँतक कि उसके लिये प्राण तक न्योछावर करने को उद्यत हो जाता है। फूल कपास का अच्छा होता है कारण कि उसके सहारे संसार भर की लज्जा रहती है। मिठास वाणी की अच्छी होती है, जिसके फल- स्वरूप बिना पैसा कौड़ी के लोग वश में हो जाते हैं। राजाओं में इन्द्र महान है जो पानी बरसाकर जगत को पालता है।” बीरबल के ऐसे उत्तर से सब सभासदों के सहित बादशाह अति प्रसन्न हुए और बीरबल को कई बीघे भूमि जागीर दी ।

अकबर बीरबल विनोद १५८

अकबर बीरबल विनोद १५८ गरीब की आह एक दिन तुर्किस्तान के बादशाह को अकबर की परीक्षा लेने का विचार हुआ। वह एक एलची को पत्र देकर कई और सिपाहियोंके साथ दिल्ली भेजा। पत्रका आशय यह था-“अक- बर शाह ! मुझे सुनने में आया है कि आपके भारतवर्ष में कोई ऐसा वृक्ष उत्पन्न होता है कि जिसके पत्तों के खाने से मनुष्य की आयु बड़ी होती है। यदि यह बात सच्ची है तो मेरे लिये उस वृक्ष के थोड़े पत्ते भेज देना।” बादशाह इस पत्र को पढ़कर विचारमग्न हो गया, फिर कुछ देर तक बीरबल से राय मिलाकर सिपाहियों सहित उस एलची को कैद कर एक सुदृढ़ किले में बन्द करा दिया। इस प्रकार कैद हुए जब उनको कई दिन हो गये तो एक दिन बादशाह बीरबल को साथ लेकर उन कैदियों को देखने गया। बादशाह को देखकर उनको अपने मुक्त होने की आशा हुई; परन्तु वह बात निर्मूल थी। बादशाह उनके पास पहुँच कर बोला-“तुम्हारा बादशाह जिस वस्तु को चाहता है वह मैं तबतक उसे न दे सकूँगा जबतक कि इस सुदृढ़ किले की एक एक ईंट न ढह जाय। उसी वक्त तुम लोग आजाद भी किये जावोगे। तुमको खाने पहनने की तकलीफ न होगी; मैंने उसका यथोचित प्रबन्ध कर दिया है।” इतना कहकर बादशाह चले गये, परन्तु उन कैदियों की चिन्ता और भी बढ़ गई। वे अपने मुक्त होने का उपाय सोचने लगे। उनको अपने स्वदेश के सुखों का स्मरण कर बड़ा दुख होता था।

१५६ अकबल बीरबल विनोद

१५६ अकबल बीरबल विनोद वे सब कुछ देर तक इसी चिन्ता में डूबे रहे, अन्तमें उनका ध्यान ईश्वर प्रार्थना की तरफ झुका और अपने मुक्त होने के लिये ईशवन्दना करने लगे । “हे भगवन् ! क्या हम इस बन्धन से मुक्त न किये जायँगे ! क्या हमारा जन्म इसी किले में बन्द रहकर कष्ट भोगने ही के लिये हुआ था ! आप दीना- नाथ बजते हैं, अपना नाम याद कर हम असहायों की वेगि सुधि लीजिये ।” जैसे २ उनकी मुक्त होने की आशा विलीन होती गई तैसे २ नित्य परमेश्वर से उस किले के टूटने के लिये प्रार्थना करने लगे । ईश्वर की दयालुता प्रसिद्ध है-एक दिन बड़े जोरों का भूकम्प आया और किले का कुछ भाग भूकम्प के कारण धराशायी हो गया। सामने का पर्वत भी टूटकर चकनाचूर हो गया। इस घटना के पश्चात् एलची ने बादशाह के पास किला टूटने की सूचना भेजी। बादशाह को अपने बचन का स्मरण हो आया। इसलिये उस एलची को उसके साथियों सहित दर्बार में बुलवा कर बोला-“आपको अपने बादशाह का आशय विदित होगा और अब उसका उत्तर भी तुमने समझ लिया है, यदि न भी समझे हों तो सुनो, मैं उसे और भी स्पष्ट किये देता हूँ। देखो तुम लोग गणना के केवल सौ ही मनुष्य हो, परन्तु तुम्हारी आह से ऐसा सुदृढ़ किला ढह गया, फिर जहाँ हजारो मनुष्यों पर अत्याचार हो रहा है वहाँ के बादशाह की आयु कैसे बढ़ेगी, बल्कि दिनोंदिन घटती ही जायगी और यथाशीघ्र लोगों की आह से उसका पतन हो जायगा। तब बादशाह की आयु

अकबर बीरबल विनोद १६०

अकबर बीरबल विनोद १६० क्योंकर बढ़ सकती है। हमारे राज्य में तो अत्याचार भरसक नहीं होने पाता है। गरीब प्रजा पर अत्याचार न करना और उसका भलीभाँति पालन पोषण करना ही आयुवर्धक वृक्ष है बाकी सारी बातें मिथ्या हैं। दो०-दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय। मुए खाल को स्वाँस सों, सार भसम ह्वै जाय॥ इस प्रकार समझा बुझाकर बादशाह ने उस एलची को उसके साथियों सहित स्वदेश लौट जाने की आज्ञा दी और उनका राह खर्च भी दिया गया। वे तुर्किस्तान में पहुँच कर यहाँ की सारी बातें अपने बादशाह को समझाया। अकबर की शिक्षा को सुनकर बादशाह दरबारियों सहित उसकी भूरि भूरि प्रशंसा करने लगा।

जूते की मार अकबर बादशाह के राज में दिल्ली के निकट ग्राम में एक स्त्री रहती थी। उसका दिमाग बहुत चढ़ा हुआ था, जिस कारण वह नित्य अपने पति को दस जूते मारा करती थी। उसको एक पुत्री भी थी। जब वह सयानी हुई तो उसके विवाह की चरचा छिड़ी। उसने वर के लिये दूर २ के गाँवों में अपना पैगाम भेजा, परन्तु कोई उस कन्या से अपने लड़के का विवाह करने के लिये राजी न हुआ। कारण कि सबको उस कन्या के माता की करतूत मालूम थी। वे लोग

अकबर बीरबल बिनोद १६१ यही सोचते थे कि जैसी माता है उसकी पुत्री भी उसीके समान होगी । उन दिनों भगवान की कृपा से बीरबल की बड़ी ख्याति हो रही थी। जिसकारण कितने ही लोग क्या जात क्या परजात भीतर भीतर उससे ईर्षा करने लगे । सबों ने मिलकर सोचा कि यदि इस लड़की से बीरबल का विवाह हो जावे तो इसकी कीर्ति की जगह अपकीर्ति फैलने लगे।” एक दिन बीर- बल को बिरादरी का एक ब्राह्मण जो कि पुरोहिती करता था उससे मिलने आया । थोड़ी देरतक इधर उधर की बातें कर वह बीरबल से उस लड़की के साथ विवाह करने का आग्रह किया। बीरबल ने कहा-“पंडितवर ! आप जानते ही हैं कि मेरा विवाह हो चुका है, फिर एक स्त्री के रहते हुए दूसरी के साथ विवाह करना अनुचित होगा; हाँ यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो आप मेरे भाई को पसंद करें । वह काशी जी पढ़ने गया है, मैं उसका विवाह करने के लिये तय्यार हूँ ।” पुरोहित की मंशा वर आई, बीरबल नहीं तो उसका भाई ही सही । घरमें अशान्ति होने से बीरबल को भी कष्ट होगा । ऐसी पक्की धारणा बनाकर वह राम बाई के घर पहुँचा, वहाँ की अजीब हालत थी । रामबाई पतिदेव के मस्तक पर नौ जूता चढ़ा चुकी थी । दसवें के लिये भी तैयार थी, इसी बीच पुरोहित जी उसके मकान में दाखिल हुये और हैं ! हैं ! हैं करके उसे रोकना चाहा, परन्तु वह कुलटा भला कब मानने वाली थी । अपना दसवाँ जूता भी विचारे पति को जड़कर ही शान्त हुई । ११

१६२ अकबर बीरबलविनोद

१६२ अकबर बीरबलविनोद जब उसका मिजाज कुछ ठिकाने आया तो उसने पुरोहित के आनेका कारण पूछा। पुरोहित बीरबल का नाम लेकर बोला- मैं तुम्हारी लड़की की शादी के लिये एक वर देख आया हूँ। लड़का काशी में पढ़ रहा है; केवल तुम्हारी अनुमति की देर थी। यदि कहो तो विवाह निश्चित किया जाय। रामबाई पुरो- हित से बड़ी प्रसन्न हुई और उसका आदर सत्कार कर बोली-"मुझे मंजूर है, आप जाकर पक्का कर आइये।" पुरोहितजी फिर उल्टे पाँव बीरबल के पास पहुँचे और दोनों पक्ष को राजी कर रामबाई की कन्या और बीरबल के छोटे भाई की शादी पक्की कर दी। बीरबल पुरोहित का आन्तरिक भाव पहले ही ताड़ गया था। इसलिये झूठ मूठ अपना छोटा भाई होना बतला कर पुरोहित को फाँस लिया था। इधर जब विवाह पक्का हो गया तो वह एक सजातीय अनाथ लड़के की खोज में पड़ा। कहा भी है- जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। हौं बौरी ढूढ़न गई, रही किनारे बैठ॥ दो तीन दिनों के प्रयास करने ही से उसे एक लड़का २०, २५ वर्ष का मिल गया। वह अपने पेट पालन के फिराक में दिहात से ऊबकर दिल्ली नगर में आया था, हाँ इतना अव- श्य था कि उसने पहले कुछ विद्या भी हासिल कर ली थी। बीरबल उस लड़के को आश्रय देने का वचन देकर अपने घर ले गया और उसको समझा बुझा कर बोला-"देखो मैं तुम्हारा विवाह रामबाई की कन्या से करा दूँगा और तुम्हें निर्वाह मात्र के लिये सारा सामान भी दूँगा, परन्तु एक बात तुमको