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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

३ अकवर बीरबल विनोद

३ अकवर बीरबल विनोद -------------------

बादशाह का प्रश्न सुनकर बीरबल विचारपूर्वक बोला— “पृथिवीनाथ ! यह जौहरियों का काम है; क्योंकि मूल्य लगाना वे ही जानते हैं। यदि हुक्म हो तो एक आन में शहर के तमाम जौहरी, शराफ और साहूकारों को बुलवा लूँ। वृद्ध की मंशा बीरबल को फाँसने की थी, परन्तु बीरबल ने अपनी बुद्धिबल से उसी को फँसा दिया क्योंकि वह भी जौहरी ही था। बादशाह के हुक्म से नगर के सब जौहरी सर्राफ और साहूकार बुलवाये गये, वे सब इस आकस्मिक बुलावे से बहुत घबड़ाये हुए थे। बीरबल बोला–नगर जौहरियो, सर्राफ तथा साहूकारो ! आप लोगों को इस लिये बुलाया गया है कि आप लोग मिलकर बाद- शाह का वजन और मूल्य निश्चित करें। यह सुनकर वे जौहरी अवाक हो गये, किसी की समझ में न आया कि बादशाह का मूल्य और वजन कैसे निश्चित किया जावे। अन्तमें उनका सरदार गिड़गिड़ाता हुआ बोला— “गरीब परवर ! इस समय हम लोग सरकारी सूचना पाकर तुरन्त भागे चले आरहे हैं जिस कारण हमारा हृदय भय- विह्वल हो रहा है। हमको कुछ देर की मुहलत मिले तो एक जगह अलग बैठकर आपस में विचार कर उत्तर दें। बादशाह ने उस सरदार की बात स्वीकार करली और उनकी मदद के लिये बीरबल को भी उनके साथ कर दिया। बीरबल उनको लेकर एक अलग कमरे में चला गया। सबों ने मिलकर कोशिश की परन्तु किसो सिद्धान्त पर अटल न हुए। बीरबल बोला—“यह बात इतनी आसान नहीं है जो

अकबर बीरबल बिनोद ६


पन्द्रहवें दिन प्रातःकाल सब जौहरी बीरबल के मकान पर उपस्थित हुए और अशर्फी का तोड़ा लिए हुये बीरबल भी उनके साथ हो लिया। उधर बादशाह भी पन्द्रहवें दिन की प्रतीक्षा कर रहा था। वह शहर के बाहर बाग में एक बड़ा तंबू खड़ा करवाया। उसमें इतनी कुशादह जमीन रक्खी गयी थी कि जिसमें सर्वसाधारण से लेकर बड़े-बड़े सेठ साहूकार तक के बैठने के लिये अलग-अलग स्थान मिले। पन्द्रहवें दिन उसी बाग में ठीक समय पर दरबार लगा और तमाम लोग जमा होकर किते से बैठ गये। तंबू के मध्य में बादशाह का सिंहासन था। उसके ठीक सामने जौहरियों को बैठनेके लिये जमीन छोड़ी गई थी। बीरबल जौहरियों के दल से पहिले पहुँचा। थोड़ी देर बाद जौहरियों का दल भी जा पहुँचा। सब लोग किते से खाली स्थान पर बैठाये गये और उनके मध्य अशर्फियों का तोड़ा रख दिया गया, फिर क्या पूछना था; उनमें से प्रत्येक जौहरी एक २ अशर्फी को तराजू पर रखकर बटखरेसे तौलना शुरू किये। कुछ कालोपरान्त एक जौहरी बोला—"मिल गयी ! मिल गयी !! मिल गयी !!! जिस बात की तलाश थी वह मिल गयी।" इतने में उनका मुखिया उठा और उस अशर्फी को लेकर बादशाह के क़दमोंपर जा रखा। लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। बादशाह को एक तरफ विस्मय और दूसरी तरफ हर्ष हुआ वह उस अशर्फी को अपने हाथ में लेकर बोला-"क्या मेरी कीमत यही एक अशर्फी है?" बूढ़े जौहरी ने गम्भीरता पूर्वक उत्तर दिया- "जी हाँ, यही

७ Akbar Birbal Binod / अकबर बीरबल बिनोद

अशर्फी आपका मूल्य है और यही श्रीमान् का वजन है। यह अन्य अशर्फियों से एक रत्ती बड़ी है, इस कारण इसके समान दूसरी अशर्फी नहीं है। पृथिवीनाथ ! हम प्रजागण साधारण अशर्फी हैं और आप इस बड़ी अशर्फी के समान हैं। बादशाह ने पूछा-"तो क्या मुझमें और अन्य दूसरे मनु- ष्यों में केवल एक रत्ती का ही अन्तर है ?" शर्फ़ों का मुखिया बोला-"जी हाँ, गरीबपरवर ! इसमें कुछ भी सन्देह करने की बात नहीं है। आप में और आपकी प्रजा में केवल इतना ही अन्तर है कि प्रजा आपके आधीन रहने के लिये बनाई गयी है और आप प्रजा को अपने आधीन रखने के लिये हैं। आप प्रजाओं में जिस प्रकार बड़े समझे जाते हैं उसी प्रकार यह अशर्फी भी अन्य अशर्फियों में श्रेष्ठ साबित हुई है। आपके बैठने को ऊँचा आसन मिलता है और प्रजावर्ग को बैठने के लिये नीचा आसन दिया जाता है। इन्हीं सब कारणों से निश्चित हुआ कि यही अशर्फी आपका मूल्य है।" जौहरी की उपरोक्त युक्तिभरी वार्ता सुन बादशाह गद- गद हो गया और उसको उसके साथियों सहित अच्छा पुरस्कार देने की आज्ञा दी। जौहरी का मुखिया पुरस्कार पाकर मनही मन बीरबल को आशीर्वाद देता हुआ अपनी मण्डली के सहित नगर को चला गया और सभा भंग हुई।

अकबर बादशाह को कहानी सुनने का बड़ा शौक था।

अकबर बीरबल बिनोद २८ और क्या ! फुर्र । अकबर बादशाह को कहानी सुनने का बड़ा शौक था। इसलिये वह कुछ चुने हुए दरबारियों की ऐसी पारी बाँध रक्खी थी जो अपनी अपनी पारी पर रात्रि में बादशाह के मनोरंजनार्थ नित्य नवीन नवीन कहानियाँ सुनाया करते थे । एक दिन बीरबलकी बारी आई । यथा समय कहानी शुरू हुई। बादशाह हुँकारी भरने लगा। इस प्रकार बीरबल को कहानी कहने में बड़ी तकलोफ होती थी कारण की वादशाह बड़ी से बड़ी कहानी सुनना चाहता था। जब बीरबल एक सम्पूर्ण वाक्य कह जाता तब बादशाह केवल 'और' कह कर ही छुट्टी पा जाता था। छोटी मोटी कहानियों से बादशाह को सन्तोष नहीं होता था। वह हमेशा बड़ी से बड़ी कहानियाँ सुनने की फिराक में रहता था । बीरबल को कहानी सुनाते बहुत रात व्यतीत हो गई फिर भी बादशाह से फुरसत मिलने की कोई आशा न दिखाई पड़ी, वह झल्ला उठा और अपने मन में सोचा-‘जो कुछ भी परिश्रम है; वह मेरे को है, बादशाह तो केवल एक शब्द कह कर फुरसत पा जाते हैं इसलिये अब कोई ऐसी तरकीब सोचनी चाहिये जिससे बादशाह भी झल्ला उठें ।' वह अपनी प्रखर बुद्धिके कारण तुरत एक ऐसी ही तरकीब ढूँढ़ निकाली और उसी के अनुसार दूसरी कहानी शुरू की-‘‘एक धनिक किसान ने अपने अन्न को सुरक्षित रखने के लिये एक कोठलीं बनवा रक्खी थी, उसमें अनाज भर कर उसके मुँह

चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर

६ अकबर बीरबल बिनोद पर ढक्कन रखकर उसे भलीभाँति बन्द कर दिया, यहाँ तक कि उसमें हवा आने जाने तक की जगह भी नहीं छूटी थी । विधना का विधान कठिन होता है, दैवात उस कोठली में एक छोटा सा छिद्र छूट गया था जिसके द्वारा एक छोटी चिड़िया उस कोठली में घुस गई और एक दाना अपनी चोंच में लेकर बाहर निकल आई और 'फुर्र' उड़ गई। फिर दूसरी चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर तीसरी चिड़िया आई और भीतर गई, अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़गई । फिर एक चिड़िया आई, भीतर घुसी अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई, फिर और एक चिड़िया आई और भीतर घुसकर अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई । इसी तरह लगातार कहते कहते बीरबल को सैकड़ों बार हो गया जब बादशाह और और कहता कहता थक गया तो भुँझला कर बीरबल से बोला- "यह तो मैं सुन चुका, अब आगे क्या हुआ सो कहो । बीरबल ने गम्भीरता से उत्तर दिया- "पृथ्वी- नाथ ! दाने के लोभ से वहाँ पर चिड़ियों का जमघट लग गया यहाँ तक कि वहाँ करोड़ों चिड़ियाँ इकट्ठी हो गईं और अपना अपना दाना बारी बारी से लेकर जाने आने लगीं । अभी सौ पचास की ही बारी आई है, जब सब चिड़ियों का पेटभर जायगा तो कहानी आगे चलेगी। क्या अभी खतम हुआ जाता है । इसमें वर्षों का समय लगेगा । बादशाह बोला- "मैं ऐसी कहानी से भर पाया अब इसे यहीं बन्द करो।" बीरबल को अवकाश मिल गया वह मनही मन गाजता हुआ वहाँ से प्रस्थान किया ।

अकबर बीरबल बिनोद १० बादशाह का तोता । एक फकीर बड़ा तोते बाज था। वह तोता बाजार से खरीद कर लाता और उसे भली प्रकार शिक्षित कर अमीर उमरावों को देकर द्रव्य उपार्जन करता। एक दिन वह अपने नियम के अनुसार एक बहुत अच्छे तोते को खूब सिखा पढ़ा कर बादशाह को दिया। बादशाह तोते की खूबसूरती और इल्मियत से निहायत खुश हुआ और वह उसे एक सुविज्ञ सेवक को सुपुर्द कर उससे बोला—"देखो इस तोते की आब हवा और दाना पानी पर बड़ी सावधानी रखना, इसकी प्रकृति में कुछ अन्तर न पड़ने पावे। इसको जरा भी तकलीफ होते ही फौरन मुझे खबर देना। यदि कोई मेरे पास इसके मरने की खबर लायेगा तो तुरत उसकी गर्दन मार दी जायगी।" दैवात् तोता मर गया। बिचारा सेवक बहुत डरा, उसे अपने जीवनरक्षा की कोई सूरत नहीं दिखलाई पड़ती थी। दोनों प्रकारसे मृत्यु का सामना था। "कहने पर गर्दन मारी जावेगी और यदि मरने का समाचार न देकर गुप्त रक्खूँ तो किसी दिन भेद खुलने पर और भी दुर्गति होगी।" लाचार अपना कुछ वश न चलते देख बीरबल के पास गया और उससे सारा समाचार कहकर बहुत गिड़गिड़ाया और कष्ट से छुटकारा पाने की तरकीब पूछी। बीरबल बोला—"डरो नहीं, मैं तुमको अभयदान देता हूँ।" इधर नौकर को बिदा कर वह तुरत बादशाह के पास जा पहुँचा और

११ अकबर बीरबल बिनोद बड़ी घबड़ाहट के साथ बोला- "गरीब परवर ! अपना तो-ता, अपना तो-ता ।" उसकी घबराहट देखकर बादशाह बोल उठा- "क्या वह मर गया ?" बीरबल बात सँभालते हुए उत्तर दिया- "नहीं पृथ्वीनाथ ! वह बड़ा बिरागी हो गया है, आज सुबह से ही अपना मुख ऊपर किये हुए है और कोई अंग नहीं हिलाता, उसकी चोंच और आँखें भी बन्द हैं।" बीरबल की ऊपर कही बातें सुनकर बादशाह ने कहा- "तब क्यों नहीं कहते कि वह मर गया।" बीरबलने उत्तर दिया- "आप चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु मेरी समझ में तो यही आता है कि वह मौन होकर तपस्या कर रहा है। आप चलकर स्वयं देख लेवें तो बहुत अच्छा हो ।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और दोनों तोते के पास पहुँचे, तोते की दशा देखकर बादशाह ने बीरबल से पूछा- "बीरबल ! कहने को तो तुम बड़े चतुर बनते हो फिर भी तोते के मरने की तुम्हे खबर न मिली। यदि यही बात मुझसे पहले ही बतला दिये होते, तो मुझको यहाँ तक आने की क्या जरूरत थी ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथ्वीनाथ ! मैं लाचार था, क्योंकि यदि पहले ही बतला दिये होता तो जान से हाथ धोना पड़ता । उसकी इस चालाकी से बादशाह बहुत खुश हुआ और उसको अपनी पहली आज्ञा का स्मरण हो आया । उसने बीरबल की बड़ी प्रशंसा की और एक बड़ी रकम पुरस्कार में देकर उसे बिदा किया। बीरबल उसी क्षण उस रकम को

अकबर बीरबल बिनोद १२ तोते के रक्षक को दे दिया। इस प्रकार विचारे सेवक की प्राणरक्षा हुई और उसे धन भी मिला। बैल का दूध । एक दिन की बात है कि अकबर और बीरबल दोनों एक उपवन में बैठे हुये आनन्द मना रहे थे इतने में शाम होगई । जब बीरबल घर जाने को उद्यत हुआ तो बादशाह ने उसे रोककर कहा-"बीरबल ! आज कई दिनोंसे मैं एक बात सोच रहा था, परन्तु तुमसे कहना भूल जाता था। एक हकीम दवा बनाता है उसमें बैल के दूध की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि तुम कहीं से उसे ला दो तो अति उत्तम हो । "पत्ता खड़का बन्दा भड़का।" बीरबल बादशाह की मन्शा समझ गया और मनमें कहा कि बादशाह इस बहाने मुझे मूर्ख बनाना चाहते हैं। बीरबल बोला-"इसमें घबड़ाने की कौनसी बात है, मैं एक सप्ताह में बैल का दूध ला दूँगा।" बादशाह ने कहा-"दो-चार दिन और अधिक लग जायें तो कोई चिन्ता की बात नहीं है, परन्तु दूध का आना बहुत लाजिमी है।" "बहुत अच्छा" -कहता हुआ बीरबल वहाँ से बिदा हुआ। वह-घर पहुँच एकान्त स्थान में बैठकर बैल के दूध वाले प्रश्न पर विचार करने लगा। चिन्ताग्रस्त बीरबल को कई घण्टे का समय मिनटों के समान बीत गया। जब भोजन करने का समय हुआ तो नियमानुसार उसकी लड़की बुलाने

१३ अकबर बीरबल विनोद

१३ अकबर बीरबल विनोद

आई। वह अपने पिताका चेहरा उतरा और विचार-मग्न देख कर ठिठक गई। जब उसको खड़े कई मिनट व्यतीत होगये और पिता का ध्यान न टूटा तो वह उद्विग्न होकर पितासे चिन्ता का कारण पूछा। यद्यपि यह बीरबलकी बड़ी लड़की थी और वह इसकी बुद्धिमत्ता को कई बार परीक्षा भी ले चुका था। फिर भी ऐसे गूढ़ विषय में उसे सफलता मिलेगी ऐसी आशा स्वप्न में भी न थी। इसलिये कुछ समय तक उसकी बातों को अनसुनी कर टाल-मटोल करता रहा। पुत्री के पुनः पुनः अनुरोध करने पर उसे विवश होकर बादशाह का जटिल प्रश्न सुनाना पड़ा। कन्या बोली—"पिताजी ! यह कौनसी ऐसी कठिन बात है जिसके लिये आप ऐसे चिन्ताकुल हो रहे हैं। चलिये भोजन का समय बीता जा रहा है। मैं उसका उत्तर एक हफ्ते के भीतर ही बादशाह को पहुँचा दूँगी।" लड़की के ऐसे उत्तरसे बीरबल की चिन्ता घटी और शाह- सकर भोजन करने गया। इस प्रकार जब दो दिन व्यतीत हो गये तो बीरबल की लड़की ने एक नयी तरकीब निकाली। वह ढूँढ़कर बहुतेरे पुराने वस्त्रों को घर से बाहर निकाल लाई और उनका एक गठ्ठर तैयार किया। जब आधी रात का समय हुआ तो उस गठ्ठर को सिरपर लादकर नदी तटपर जा पहुँची और 'छियो-छियो' कर वस्त्र पछारने लगी। बादशाह का महल ठीक नदी तटपर बना हुआ था अर्ध रात्रि के समय नींद के प्रथम प्रहर में जब कपड़ा धोने की आवाज बादशाह के कान में पड़ी तो उसकी निद्रा भंग हो गई और

अकबर बीरबल बिनोद १४ पहरे वाले सन्तरी को पुकार कर बोला-"देखो इतनी रात्रि में कौन धोबी कपड़ा छाँट रहा है; उसे तुरत पकड़कर मेरे पास लाओ ?" पहरे वाला सिपाही हुक्म पाते ही कई अन्य सिपाहियों के साथ वहाँ पर जा पहुँचा जहाँ से कपड़े धोने की आवाज आ रही थी । वे सब बड़े हैरान और परेशान हुए क्योंकि देखते क्या हैं कि एक सिरसे पैर तक अति सुन्दरी युवती कपड़े पछाड़ रही है । सिपाहियों ने उसे कई बार पुकार कर बादशाह का हुक्म सुनाया परन्तु वह उनकी बातें अनसुनी कर बराबर अपने काम में व्यस्त रही-आखिर एक सिपाही उसके बिल्कुल समीप पहुँचकर बोला-"अरी तू कौन है जो इतनी धृष्टता कर रही है और पुकारने पर सुनती भी नहीं ! चल तुझे बादशाह ने बुलाया है ?" लड़की तो येनकेन प्रका- रेण बादशाह के पास पहुँचना ही चाहती थी । परन्तु फिर भी अपना अभिप्राय छिपाकर बोली-"आप लोग मुझे क्यों दुख देने पर उतारू हुए हैं, लो मैं अपने घर चली जाती हूँ ।" सिपाहियों ने कहा-"खबरदार तुम्हारा भला इसी में है कि सीधे हमलोगों के साथ बादशाह के पास चलो ।" लड़की कपड़ों को जहाँ का तहाँ छोड़ उनके पीछे हो ली और जब बादशाह के सन्निकट पहुँची तो बड़े अदब से झुककर सलाम की और डरीसी होकर एक किनारे खड़ी हो बादशाह के हुक्म की प्रतीक्षा करने लगी । बादशाह क्रोध से आग बबूला हो रहा था । उसने अपनी लाल लाल आँखे निकाकर पूछा- "ऐ कम्बख्त ! तूं कौन है और इस रात्रि के मध्यकाल में यहाँ

१५ अकबर बीरबल बिनोद कपड़े क्यों धो रही है ?" लड़की ने देखा कि बादशाह क्रोध से तमतमा गया है इसलिये काँपती हुई गिड़गिड़ाकर लड़- खड़ाती जुबान से बोली-“श्रीमान ! श्रीमान् ! मैं तो"......! बादशाह को उसे घबड़ाई हुई देखकर दया आ गई और उसे शान्त्वना देते हुए बोला-“तू इतना घबड़ाती क्यों है, यदि साफ २ बतला देगी तो तुझे माफी दी जायगी अन्यथा बहुत कष्ट उठायेगी ।” लड़की ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मुझे इस समय नितान्त आवश्यकता पड़ी है जिस कारण विवश हो कर कपड़े धोने आई हूँ ।” बादशाह ने कहा-“ऐ अभागी ! ऐसी कौन सी जरूरत थी जिसके लिये तू इतना परेशान है ।”लड़की ने उत्तर दिया- “क्या कहूँ, पृथ्वीनाथ ! आज दोपहर में मेरे पिता को लड़का पैदा हुआ है सो मैं दिन भर तो और और कामों में परेशान थी इस वक्त फुरसत पाने पर कपड़े धोने आई हूँ । क्योंकि साफ कपड़ों की आवश्यकता आन पड़ी है ।” लड़की के ऐसे कौतूहलपूर्ण उत्तर को सुन बादशाह बड़ा आश्चर्य-चकित हुआ और उसे फटकारते हुए बोला—"ऐ नादान छोकरी ! तू क्या बकती है ! क्या तेरा दिमाग खब्त तो नहीं हो गया है, भला पुरुष को भी कहीं लड़का पैदा होता है ?” लड़की सुअवसर देखकर विनम्रता पूर्वक बोली-“पृथ्वी नाथ ! जब पुरुष को लड़का नहीं हो सकता तो बैल को दूध कैसे होगा ?” बादशाह को अपनी पहली बात स्मरण हो आई चकित होकर लड़की से पूछा-“क्या तू बीरबल की लड़की तो नहीं है?”

अकबर बीरबल बिनोद १६ लड़की ने उत्तर दिया-“जी हाँ, पृथिवीनाथ ! आपका अनु- मान बिल्कुल ठीक है।” बादशाह उसकी इस चतुरता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसको आभूषण और द्रव्य पुरस्कार में देकर बड़ी इज्जत से पालकी में बैठाकर बिदा किया। लड़की ने घर पहुँचकर पिता का चरण स्पर्श कर रात की घटना का सारा वृतान्त कह सुनाया। बीरबल अपनी बुद्धिमती कन्या से बहुत प्रसन्न हुआ और उसका पुरस्कार उसे लौटाकर बहुत आशीर्वाद दिया।

पंडित की पदवी ।

एक मूर्ख ब्राह्मण को पंडित कहलवाने की बड़ी प्रबल इच्छा थी। विचारा सतत् प्रयत्न करने पर भी जब कामयाब न हुआ तो उसे बीरबल से मिलकर कार्य-साधन की तरकीब सूझी। वह तुरंत बीरबल के मकान की तरफ प्रस्थान किया। बीरबल का घर उसके घर से दूर था। रास्ते का थका-माँदा जब वहाँ पहुँचा तो लोगों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि अभी बीरबल दरबार से नहीं आया है। 'मरता क्या न करता' वह तो पंडित कहलाने की धुन में चूर हो रहा था, तत्काल वहाँ से मुड़ा और दरबार की तरफ राही हुआ। मौन मारे चला जा रहा था, अचानक बीच रास्ते में उसकी बीरबल से मुलाकात हो गई। वह बड़ी विनम्रतापूर्वक अपना दोनों हाथ जोड़कर बीरबल से बोला-“बुद्धिवर प्रधान जी ! मैं निरक्षर भट्टाचार्य्य हूँ, यानी मुझे पढ़ना लिखना कुछ भी नहीं आता

१७ अकबर बीरबल विनोद

१७ अकबर बीरबल विनोद तिसपर मुझे पंडित बनने की बड़ी अभिलाषा है ! अपनी बुद्धि भर प्रयास करके हार गया पर मेरी मनोकामना सफल न हुई। अब लाचार होकर आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे इसका उपाय बतला कर मेरी जीवन रक्षा कीजिये।” बीरबल ने कहा—“इसमें आपके घबड़ाने की बात नहीं है, इसका उपाय तो बड़ा ही सरल है। जो तुम्हें पंडित कहलाने की इतनी कांक्षा है तो किसी चौराहे पर जाकर खड़े हो जावो, जब तुम्हें कोई पंडित कहकर पुकारे तो उसे मारने दौड़ना, बस फिर देखोगे कि तुम जहाँ २ जावोगे सर्वत्र लोग पंडित ही पंडित पुकारते फिरेंगे।” बीरबल की युक्ति से वह मूर्ख ब्राह्मण बड़ा सन्तुष्ट हुआ। तुरत आगे बढ़कर वह एक चौराहे पर खड़ा होगया। इधर बीरबल भी जा पहुँचा और वहाँ के खेलते हुए छोटे २ लड़कों के कान में कुछ कहकर समझाया। फिर क्या था; चारों तरफ से पंडित २ की आवाज आने लगी और वह उन्हें मारने को दौड़ाने लगा। उस चौमोहानी पर लोगों की भीड़ लग गई। लड़कों की देखा देखी बड़कों ने भी पंडित पुकारना प्रारम्भ कर दिया। ज्यों-ज्यों वह लोगों पर चिढ़ता त्यों-त्यों लोग और भी चिढ़ाते जाते थे। देखा-देखी थोड़े समय में ही वह मूर्ख सर्वत्र पंडित के नाम से ख्यात हो गया। जब उसका मतलब हल हो गया तो बीरबल की अनुमति से क्रमशः चिढ़ना बन्द कर दिया, परन्तु लोगों ने पंडित कहना नहीं छोड़ा ? २

अकबर बीरबल बिनोद १८ दो पड़ोसिनें । दिल्ली शहर के एक महल्ले में दो पड़ोसिनें बहुत दिनों से आबाद थीं, परन्तु दोनों का स्वभाव भेद से उनकी पटरी नहीं खाती थी । उसमें एक तो गुणवती और सरल स्वभाव थी परन्तु दूसरी खोटी और कर्कशा थी । उनके मनमुटाव का यही खास कारण था । न वह उसकी विभूति को सहन करती और न वह उसकी । यहाँ तक कि कर्कशा हमेशा सरला की हँसी उड़ाया करती थी । जब वह किसी प्रकार भी सरला को न दबा सकी तो एक दिन उसने अपने लाड़ले पुत्र की हत्या कर चुपके से उस भलामानस के घर में छोड़ आई और आप स्वयं रोती बिलबिलाती हुई बादशाह के पास पहुँची । जब बीरबल ने उसके बच्चे के कत्ल का हाल सुना तो वह उस भलीमानस औरत को बुलवाया, जिसपर की दुष्टाने अपने पुत्र के मारने का अभियोग लगाया था । बीरबल की आज्ञा पर वह तुरत हाजिर हुई और अपने को इस प्रकार आकस्मिक बुलाये जाने का कारण पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया-“क्या तूने इस औरत के बालक की हत्या की है जैसा कि यह तेरे ऊपर अभिशाप लगा रही है ? यदि नहीं, तो तेरे पास निर्दोष होने का क्या सबूत है, तुरत बतला ?” वह बोली-“महाशय जी ! न जाने कौन इस बालक की हत्या कर लाश मेरे घर में डाल गया है । मुझे इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं। आप इसपर भलीभाँति विचार करें, मुझे

१६ अकबर बीरबल विनोद

१६ अकबर बीरबल विनोद अधिक बोलने का अभ्यास नहीं है । बीरबल दोनों स्त्रियों को वहीं रोक कर अपने एक सच्चे सेवक के कान में कुछ समझा कर उनके घर भेजा । वह उन स्त्रियों के चालचलन की जाँच कराना चाहता था । नौकर आज्ञा पाते ही उस महाल में गया; जहाँ ये रहती थीं । वह उनके अड़ोस पड़ोस के तमाम लोगों से उनके चाल चलन के संबंध में पूछ-ताछ की । उनकी जबानी मालूम हुआ कि जिस स्त्री पर अभिशाप लगाया गया है वह निहायत भलीमानस है और अभिशाप लगानेवाली स्त्री निहायत दुष्टा और फरेबिन है । नौकर जैसा सुन कर आया था उसका सारा कच्चा चिट्ठा बीरबल से कह सुनाया । सच झूठ की पहचान के लिये बीरबल ने एक तरकीब निकाली । वह पहली भलीमानस स्त्री को बुलाकर पूछा- "यदि तूने सचमुच इस बालक का बध नहीं किया है तो अपना सारा वस्त्र उतार कर एक तरफ अलग खड़ी हो जा ।” वह बोली- "मन्त्रिवर ! मैं चाहे कलकी जगह आजही मार डाली जाऊँ, परन्तु मुझसे यह नहीं होने का । मैं मरने से उतना नहीं डरती जितना निर्लज्जतासे ।” तब बीरबल ने दुश्शीला यानी दुष्टा औरत को बुलाकर पूछा- "यदि तू जानती है कि सचमुच इसने ही तेरे बालक का बध कराया है तो इस सभा के बीच अपना सारा वस्त्र अलग फेंककर एकदम नग्न खड़ी हो जा । वह तुरत वस्त्र उतार कर फेंकने को उद्यत हुई । उसकी ऐसी निर्लज्जता देखकर बीरबल स्वयं शरमिन्दा हुआ और उसे वस्त्र उतारने

अकबर बीरबल विनोद २०

अकबर बीरबल विनोद २० से रोका। उसको निश्चय हो गया कि इसीने बालक का वध किया है। बीरबल ने सिपाहियों को उसे पीटने की आज्ञा दी। उसका दोनों हाथ पाँव बाँध दिया गया और सिपाही मारने को उद्यत हुए। अब तो दुष्टा स्त्री का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरत अपना कसूर स्वीकार कर लिया। बादशाह को उस मक्कारा की काली करतूत पर बड़ा रंज हुआ इसलिये उसे कारागार भुगतने की सजा दी और उस विनम्रा स्त्री को पुरस्कार देकर बिदा किया। गुलाम को मारडाल । सन्ध्या का समय था अकबर अपने बाग में दरबारियों के साथ राजकीय विषयों पर विचार कर रहा था, इतने में तानसेन ने अपनी सारंगी मिलानी शुरू की। सबका ध्यान तानसेन के वाद्य की तरफ आकृष्ट हो गया। दरबार का शेष कार्य स्थगित कर दिया गया। तानसेन ने एक मनहरन तान सारंगी पर छेड़ी। चारोतरफ से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह आनन्दमग्न तकिये के सहारे लेटा हुआ सुन रहा था। चारो तरफ आनन्द छा रहा था। इसी समय शहर का कोतवाल दो आदमियों को लिये हुए आया। उन आदमियों के कपड़े खून से लथपथ हो रहे थे। कोतवाल के अचानक आ पहुँचने से बड़ा रंग में भंग होगया । बादशाह झल्ला गया और झिड़ककर कोतवाल

२१ अकबर बीरबल बिनोद से बोला—"क्या तुमको इतनी भी तमीज न हुई कि यह समय दरबार का नहीं है, ऐसे मनबहलाव के समय बन्दियों का लाना कहाँ तक उचित था। ये कैदी रातभर हवालात में रक्खे जा सकते थे। कल्ह दरबार लगने पर इनके मामले पर विचार किया जा सकता था, फिर इतनी आतुरता दिखलाने का क्या कारण है ?" बादशाह की नाराजगी से कोतवाल सहम गया, परन्तु बिना असलियत बतलाये भी काम नहीं चलते देखा। कुछ सोच समझकर उसने कहा-“गरीबपरवर ! इसमें सन्देह नहीं कि मैं इनको सुबह लेकर हाजिर हो सकता था परन्तु इनका मामला बड़ा बेढंगा है जिस कारण मुझको विवश होकर इसी समय आना पड़ा।" उससे ऐसा सुनकर बादशाह कुछ शान्त होकर बोला-“अच्छी बात है ! इनका अभियोग सुनाओ।” कोतवाल ने कहा-“आज जब मैं नगर में गस्त लगाते हुए व्यापारियों की मंडी में पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि एक जगह बहुतेरे आदमियों की भीड़ लगी हुई है, जब वहाँ गया तो इस अपरिचित मनुष्य को इस नगर व्यापारी से मार पीट करते देखा। यह अपरिचित मनुष्य नगर व्यापारी को झिड़क रहा था कि-“अरे दुष्ट ! आज से पाँच सात वर्ष पहले तू मेरा दास था और वहाँ से छिप कर भाग आया है। बड़े परिश्रम के बाद आज तुझे पकड़ लिया है, अब मेरे रुपये अदा कर । इसको झिड़कते देख नगर व्यापारी बोला-“नालायक ! दास तो मेरा तू है तुझे मैं आज कितने ही वर्षों से ढूँढ़ रहा था, भाग्यवश इससमय हाथ

हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग

अकबर बीरबल बिनोद २२ लगा है। इन की आपस की ऐसी लड़ाई देखकर मैं इन्हें गिरफ्तार कर सरकार में लाया हूँ, अब आपकी जैसी मरजी हो इनका निपटारा कीजिये।" बादशाह ने उनसे साक्षी माँगी। नगर सौदागर ने कहा- "गरीबपरवर ! आज पाँच वर्ष का अर्सा हुआ कि मैं अपना शहर ईरान छोड़कर दिल्ली आ बसा हूँ और यह हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग गया था। आज जब मैं बाजार में खरीद फरोख्त कर रहा था तो यह भी अचानक वहीं आपहुँचा और मेरा हाथ पकड़ कर बोला- "तू मेरा गुलाम है, तू मेरा गुलाम है।" मेरे व्यापारी होने का सारा शहर साक्षी है।" जब पहला व्यापारी अपना बयान दे चुका तो दूसरा विदेशी व्यापारी बोला- "पृथ्वीनाथ ! यह झूठ बोलता है। क्योंकि ईरान का व्यापारी मैं हूँ। इस शहर में मैं बिल्कुल नया नया आया हूँ; इस कारण यहाँ का एक भी नागरिक मुझे नहीं पहचानता। यह जो इस नगर में शेरअली के नाम से विख्यात हो रहा है सो इसका फर्जी नाम है। यह "नसीबा" नामी मेरा गुलाम है। सात वर्ष का जमाना गुजरा जब मैं इसे दूकान पर छोड़ बाहर व्यापार के लिये गया था। मौका देख यह मेरी बहुत बड़ी रकम चुराकर भाग आया है। तभी से मैं इसकी खोज में दरदर ढूँढ़ता फिरता हूँ। आज सात वर्षों के बाद यहाँ मिला है।" इनका अभियोग दरबार के सभी लोग बड़े गौर से सुने रहे थे, मामला भी बड़ा पेचीदा जान पड़ता था, दोनों ही सौदागर के लिबास में थे और दोनों की मुखाकृति

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भी अमीरों की सी थी । जब यह मामला चल रहा था इसी बीच एक सरदार साहब भी आ पहुँचे और नगर व्यापारी शेरअली को कैदी की सूरत में देखकर बोले- "शेरअली ! यह तुम्हारी क्या हालत है, तुम कैदी की सूरत में क्यों दिखाई पड़ रहे हो ?" शेरअली को इस सरदार के आनेसे बड़ी तसल्ली हुई और बोला- "सरदार साहब ! आप भी जानते हैं कि मैं कितने वर्षों से इस नगर में व्यापार कर रहा हूँ और यहाँ का बच्चा बच्चा मुझे पहचानता है। समय के फेर से वा दैव की अकृपा से आज मैं अपने ही दास द्वारा अभिशापित किया जा रहा हूँ । सरदार बादशाह को चिताकर बोला- "गरीबपरवर ! यह शेरअली आजकल का व्यापारी नहीं है बल्कि लड़ाई के समय में इसने कई बार सरकार को रुपये की मदद देकर राजभक्ति प्रकट की है। (शेरअली की तरफ इशारा करके ) "शेरअली ! यह तुम्हारी ही उदारता का कारण था कि मैंने गुजरात ऐसे सामर्थ्यशाली अधिपति पर विजय प्राप्त की थी तुम्हारी वह मदद हमारी नहीं बल्कि बादशाह की मदद थी।" सरकार की तरफसे तुमको अभी तक उसका कोई पुरस्कार नहीं मिला है ? सरदार की इस सारगर्भित शाक्षी से बादशाह खुश हो गया और बोला शेरअली को उस उपकार का बदला चुकाया जायगा । बादशाह ने ईरान के सौदागर की तरफ इशारा करके कहा- "क्यों भाई ! तुमको भी किसीकी साक्षी दिलानी है, यदि

अकबर बीरबल बिनोद २४ है तो उसे सामने लावो, सरदार की साक्षी से तो नगर व्या- पारी का शेरअली होना साबित होता है। ईरान का व्या- पारी बोला-"गरीबपरवर ! मैं इस स्थान में पहले पहल आया हूँ, यहाँ की भाषा तक नहीं समझता और न यहाँ पर मेरा कोई परिचित ही है। अभी मेरा सामान भी बाहर ही पड़ा हुआ है, उसको यहाँ लाने में अभी कई दिन व्यतीत हो जायेंगे, फिर मैं किसकी साक्षी दूँ। हाँ इतना जरूर है कि मैं दूर देशों से सुनता आ रहा हूँ कि आपके दर्बार में बड़ा सच्चा न्याय होता है इसलिये कृपया हमारा उचित न्याय करा दीजिये । दोनों फरीकैनों की बातें सुनकर एक सभासद् ने बाद- शाह से अर्ज किया-"पृथ्वीनाथ ! यह मामला बड़ा ही बेढंगा दीख पड़ता है। इसका फैसला कवि गंग से कराया जाय। वे ऐसे२ मामलातों को महज खिलवाड़ मात्र समझा करते हैं। विचारा कवि गंग बड़ा घबराया और झट बोल उठा- "हजूर । बीरबल के रहते इसका न्याय करने की दूसरे की आवश्यकता नहीं है अतएव इसका न्याय बीरबल से ही कराया जाय। वे इससे कभी इनकार नहीं कर सकते। बादशाह तो पहले ही से समझ रहा था, उसने बीरबल को आज्ञा दी-"इस मामले को अच्छी तरह जांचकर न्याय करो।" बीरबल ने भी सहर्ष स्वीकार किया । बीरबल की कार्रवाई शुरू हुई। वह दोनों व्यापारियों को पास बुलाकर उनसे बहुत प्रकार की पूछ-ताछ की परन्तु फिर भी कुछ मतलब की बात हासिल न हुई।