बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
परिशिष्टम्
४१३
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 'कौपीनाच्छादनार्थम् | गौ. ध. ३. १८. | २५२ |
| क्षितिस्थाश्चैव | व. ध. ३. ४६. | ६० |
| क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि | मुण्ड. उ. २. २. ८. | २५८ |
| क्षारं च सविकारम् | व. ध. २. २१. | ९६ |
| 'क्षुधापरीतस्तु किंचिदेव | व. ध. १२. ३. | ३६ |
| खड्गे तु विवदन्ते | व. ध. १४. ३५. | ९५ |
| ख्यापनेनानुतापेन (वशिष्ठः) | मनु. ११. २२७. | ७७ |
| गर्भस्थैस्सदृशो ज्ञेयः | १९१ | |
| गृहस्थोऽपि विमुच्यते | या. स्मृ. ३. २०२. | २५५ |
| गोवालः परिमार्जनम् | व. ध. ३. ५०. | ५४ |
| ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु | मनु. ६. २३. | ३२० |
| चक्रिणेऽन्धकाय समुपजीविने | २१८ | |
| (१) चण्डालाः प्रत्यवसिताः | दक्ष. स्मृ. ४. २१. | २८२ |
| चतुर्धा मेदमेके | २५४ | |
| चतुर्विधस्य मनुष्यजातस्य | गौ. ध. ८. २. | १२८ |
| चत्वार आश्रमाः | आप ध. २. २१. १. | २६० |
| चरन्नभ्यवहार्येषु | व. ध. ३. ४२. | ५३ |
| चषकां शुक्कुवाणां च | मनु. ५. ११७. | १०६ |
| चलतश्चैनान् स्वधर्म्म | गौ. ध. ११. ११ | १२८ |
| चित्तिस्स्रुक् | तै. आ. ३. १. १. | ३३९ |
| (२) चान्द्रायणं नवश्राद्ध | अत्रि. स्मृ. ३०५ | १४७ |
| चित्रं देवानाम् | साम. सं. पू० ६. ३ | ३५९ |
| चित्रादितारकाद्वन्द्वैः | ९९ | |
| चीरवल्कलधारिणां | १०३ | |
| छत्रोत्पन्नास्तु | व. ध. १८. ५. | १२० |
| छन्दसा अप उत्पुनाति | तै. ब्रा. ३. ३. ४. | ४०१ |
| 'जननेऽप्येवम् | गौ. ध. १४. १३. | ७८ |
| जपे होमे तथा दाने | दक्ष. स्मृ. १. ११. | ३४ |
| जातवेदसे | याज्ञिकी १० | ३७८ |
| जातिमात्रोपजीवी च | मनु. ८. २०. | ६ |
| जात्युक्तं पारदार्यञ्च | व्याघ्रः | १९७ |
| जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः | छा. उ. ४. १. | ३०५ |
| •तच्छन्दसा ब्रह्मणेन | २९७ | |
| 'तच्छ्रेष्ठं जन्म | आप. ध. १. १. १७. | १४९ |
| 'सजातीयमेवापतेत' | गौ. ध. १४. ६. | ८३ |
१. शातातपीयत्वेनोक्तमिदं मस्करिणा।
२. मुद्रितशङ्खस्मृतावनीदं नोपलभ्यते।
४१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| तत् सवितुः | याज्ञिकी ४२. | २२७ |
| तद्यथेषीकातूलमग्नौ | छा. उ. ५. २४. | २६४ |
| तप्तकृच्छ्रं चरन् | मनु ११. २१४. | ३८६ |
| तस्माद्गुरुकुले तिष्ठन् | श्लो. वा. १. १. १. | ३५ |
| तस्मात्तद्विसः पुण्यः | वृद्धमनुः | ७८ |
| तस्माच्छ्रेयांसं पापीयान् | तै. सं. २. ५. १. २. | २ |
| तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं | भगवद्गीता १६. २४. | ६६ |
| तस्मात्प्रजननं परं | याज्ञिकी ७८ | २५४ |
| तस्मात्तेनोभयं पश्यति | छा. उ. १. २. ४. | १२१ |
| तस्मात्तेनोभयं संकल्पयन्ते | छा. उ. १. २. ६. | १२१ |
| तस्मात्स्त्रियो निरिन्द्रियाः | तैं. सं. ६. ५. ८. | १८० |
| तस्मादन्नं ददत् | याज्ञिकी. ६२. | २२३ |
| तस्माद्विनामा ब्राह्मणः | तै. सं. ६. ३. १. | १४९ |
| तस्मादुपारिष्टाद्दोषधयः | तैं. सं. ७. ५. १. | ३१५ |
| तस्माद्ब्राह्मणाय नाऽपगुरेत | तै. सं. २. ६. १० | १५४ |
| तस्मद्यज्ञवास्तु नाम्बवेत्यम् | तै. सं. ३. १. ९. | ११८ |
| तस्मिन् स्फेयेन प्रहरति | आप. श्रौ. २. २६. ५, बौ. श्रौ. १. ११. | ११४ |
| तस्मै हितम् | पा. सू. ५ १. ५. | ३५१ |
| तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति | २५४ | |
| तं स खनति खानयति वा | बौ. आ. ४. २. (पृ. ११०. पं. ९.) | ११५ |
| तस्य वा एतस्य | तै. आ. २. १५. | १५१ |
| तस्य वाचकः प्रणवः | पात. सू. १. ३१. | २९२ |
| तस्याजिनमूर्ध्ववालं | गौ. ध. २३. १८. | १६५ |
| तस्याऽऽश्रमविकल्पमेके | गौ. ध. ३. १. | २५९ |
| तस्यैषा भवति यत्से शिश्नं | तै. आ. १. ७. | ४५ |
| तस्यैवं विदुषो यज्ञस्य | याज्ञिकी. ७९. | २६० |
| त्रीणि स्त्रियाः पातकानि | व. ध. २८. ७. | १७० |
| तृणं वा किंजारु वा | बौ. श्रौ. १. ४. (पृ. ७. पं. १०) | ११५ |
| तेभ्योऽभितप्तेभ्यः | छा. उ. २. २३. | ३०२ |
| तैलं दधि पयस्सोमः | ११२ | |
| त्रयो धर्मस्कन्धा | छा. उ. २. २३. | २१४ |
| त्यजेत् पितरम् | गौ. ध. २०. १. | १६६ |
| त्वामिद्धि हवामहे | साम. सं. पू. ३. १. | ३५९ |
| दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा | गौ. ध. १. ३८. | ५० |
| दक्षिणं बहुमुद्धरते | तै. आ. २. १. | ४० |
| दधिक्राव्णः | तै. सं. १. ५. ११. | २२४ |
| दधि भक्ष्यं तु शुक्तेषु | मनु. ५. १०. | ९८ |
परिशिष्टम्
४१५
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| दधि मधु घृतमापो धानाः | तै. सं. २. ३. २. | ११२ |
| दशवर्षसुखं परैस्सन्निधौ | गौ. ध. १२. ३४. | २१३ |
| दर्भ्या अन्नस्य जुहोति | बो. प. १. ६. १०. | ४०१ |
| दारामिहोत्रसंयोगं | मनु. ३. १७१. | ३९६ |
| दिग्भ्यस्स्वाहा | तै. सं. ७. १. १५. | ३५४ |
| द्विजातीनामध्ययनम् | गौ. ध. १०. १. | २ |
| द्विरेन्द्रवायवस्य भक्षयति | आप. श्रौ. १२. २५. २. | ३१ |
| दिवाकीर्त्यमुदक्यां च | मनु. ५. ८५. | ९० |
| दीक्षितश्चेदनृतं वदेत् | बौ. श्रौ. २८. ९. | १२० |
| दुहिताऽऽचार्यभार्या च | नारदस्मृ. १२. ७४. | १७० |
| देवेभ्यस्स्वाहा | तै. सं. ३. १. ४. | २४६ |
| देशकालवयश्शक्ति | या. स्मृ. २. २७५. | १३३ |
| देशजातिकुल | गौ. ध. ११. २२. | १० |
| द्वैधे बहूनां वचनं | या. स्मृ. २. ७८. | १३९ |
| द्वौ द्वौ मासौ समाहितः | आप. ध. १. १३. १९. | १७१ |
| द्रव्याणि हिंस्याद्यः | मनु. ८. २८८. | १३३ |
| धन्वन्निव प्रपा असि | तै. सं. २. ५. ११. | २ |
| ध्रुवशीलो वर्षासु | गो. गृ. ३. १३ | २५३ |
| न कर्हिचिन्मातापित्लोः | गौ. ध. २१. १५. | १९२ |
| न तस्य मायया च न | ऋ. सं. ६. २. ११ | २७१ |
| न तिष्ठति तु यः पूर्वों | मनु. २. १०३ | २३१ |
| न तु कदाचित् ज्यायसीम् | व. ध. २. २८. | २०३ |
| नदीषु देवखातेषु | मनु. ४. २०३ | २३४ |
| न दोषो हिंसायामाहवे | गौ. ध. १०. १६. | १३० |
| नमो रुद्राय | तै. ब्रा. ३. ७. ९. | ३२९ |
| न पादेन पाणिमा वा | व. ध. ६. ३३. | २७ |
| नमस्ते रुद्र | तै. सं. ४. ५. १. | ३५९ |
| नवो नवो भवति | तै. सं. २. ४. १४. | ३४७ |
| न श्रोत्रियप्रव्रजित | गौ. ध. १२.३५. | २१३ |
| न शब्दशास्त्राभिरतस्य | व. ध. १०. १४. | ३०० |
| न हि प्रभायारणस्सुशेवः | ऋ. सं. ५. २. ६. | २७७ |
| न हीदृशमनायुष्यम् | मनु. ४. १३४. १३५. | २७८ |
| नात्रिवर्षस्य कर्तव्या | मनु. ५. ७०. | ७९ |
| नाऽस्य कार्योऽग्निसंस्कारः | मनु. ५. ६९. | ७९ |
| नावेदविन्मनुते | तै. ब्रा. ३. १२. ९. | २५७ |
| न्यायार्जितधनः | या. स्मृ. ३. २०५. | १८० |
| निष्क्राम्यस्थ देवश्रुतः | तै. सं. ३. १. ८. | ३४५ |
| ४१६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् |
|---|
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| नित्यनैमित्तिके कुर्यात् | श्लो. वा. पृ. ६७१ को. ११०. | २०५ |
| नित्यं मद्यामपेयम् | गौ. ध. २. २६. | ११ |
| नेन्मे वाक्प्राणैरनुषक्ता | ३१ | |
| नर्चंतेन पूर्वेण | तै. ब्रा. १. ६. १. | ११५ |
| पञ्जिग्ध्यं गवाघ्रातं | मनु. ५. ११५. | ५९ |
| पञ्चदशग्रासान् | गौ. ध. २७. १३. | ३५१ |
| पञ्चमी मातृबन्धुभ्यः | व. ध. ८. ३. | ११ |
| पञ्चमे व्यवहार्थसकामः | १९ | |
| (१) पञ्चमे भोजनं भवेत् | दक्षः | २०४ |
| (२) पञ्चमे भोजनं स्मृतम् | दक्षः . | २०२ |
| पतितोत्पन्नः पतितः | व. ध. १३. २०. | १७४ |
| परकीयनिपानेषु | मनु. ४. २०१. | २०७ |
| परस्त्रीषु दिवा च | बो. गृ. १. ११. | १६३ |
| परिषद्यं शरणस्य | ऋ. सं. ७. २. ६. | २७७ |
| परीक्षार्थोऽपि ब्राह्मणः | आप. ध. १. २९. ७. | ११ |
| पर्युषितभोजनेऽहोरात्रोपवासः | संव. स्मृ. १. १३०. | १० |
| पवमानस्सुवर्जनः | तै. ब्रा. १. ४. ८. | २२५ |
| पवित्रं नो वृत | तै. आ. २. ७. | ३३२ |
| पशुं वेश्यां च यो गच्छेत् | सं. स्मृ. १. १६४. | १९६ |
| पादावमृश्य सर्वाभिः | ५२ | |
| पादुकामजिनं छत्रं | मनु. ६. ५४. | २८४ |
| पालाशं पद्मपत्रम् | प्रजापतिः | ३९१ |
| पिण्याकाचामतक्र- | या. स्मृ. ३. ३२१ | ३९० |
| पितुर्वा भजते शीलम् | मनु. १०. ५९. | १७४ |
| पितुर्गृहे तु या कन्या | लघु शाता. ६५ | २१९ |
| पितृभ्यः स्वधा नमः | २४७ | |
| पित्रे पितामहाय | शङ्ख. स्मृ. १३. ३. | १८६ |
| पिबा सोमम् | साम. सं. उ. ३. १. | ३५९ |
| पुनर्मा मैत्विन्द्रियम् | तै. आ. १. ३० | १६३ |
| पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः | मनु. ६. ३६. | १८९ |
| पुरश्चरणमादौ | शौनक. | ४०८ |
| पूर्वार्द्धो वै देवानाम् | श. ब्रा. २. ४. २. ८. | २६१ |
| पृथिवी च | तै. सं. ४. २. १० | ३११ |
| पृथिवी होता | तै. आ. ३. २ | ३३९ |
| पैतृष्वसेयीं भगिनीं | मनु. ११. १७१ | ११ |
१. २. मुद्रितशङ्खस्मृतावनीदं नोपलभ्यते।
परिशिष्टम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| प्रच्युतः कालः | यास्क २. ७. ३. | ३०४ |
| प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः | तै. उ. १. ११. | २५३ |
| प्रजानिःश्रेयसं | आप. गृ. १. ८. ४. ६. | १८० |
| प्रजातिस्त्रियाम् | तै. ब्रा. २. ४, ६. | १४१ |
| प्रणष्टस्वामिकं | मनु. ८. ३०. | १३२ |
| प्रचानामितरे कुर्वीरन् | व. ध. ४. १९ | ८० |
| प्रतिबध्नाति हि श्रेयः | रघु. वं. १ ७९. | २२० |
| प्रतिलोमं चरेयुस्ताः | व. ध. २१. १४. | १९४ |
| प्रत्यग्ने मिथुनादह | ऋ. सं. ८. ४. ९. | २७० |
| प्रत्यग्रहरसाहरः | सा. सं. पू. १. २. ५. | २७१ |
| प्रत्यासन्नमधीयानं | शातातपः | ७२ |
| प्रत्युद्धारः पुत्रजन्मना | व. ध. १५. १७ | १६६ |
| प्रसमित्र मर्तो अस्तु | तै. सं. ४. १. ६. | ३०१ |
| प्रदेशिन्यङ्गुष्ठयोर्मध्ये | व. ध. ३. ६१ | ४९ |
| प्रदेशिन्यङ्गुष्ठभ्यान्तु | ५२ | |
| प्रसारितं च यत्पण्यं | व, ध. ३. ४५ | ६० |
| प्रागुपनयनात्कामचारं | गौ. ध. २. १ | १९ |
| प्रागुत्तमास्त्रय आश्रमिणः | गौ. ध. २८. ५०. | ४ |
| प्राची दिगग्निदेवता | तै. ब्रा. ३. ११. ५ | ३४४ |
| प्राच्यै दिशे स्वाहा | तै. सं. ७. १. १५. | ३५४ |
| प्राणस्यान्नमिदं सर्वं | मनु. ५. २८. ९ | ९४ |
| 'प्राणायामस्तथा ध्यानम् | ३६९ | |
| प्राणापान | याज्ञिकी ६६. | ३७८ |
| प्राणे निविष्टः | याज्ञिकी, ४९. | २६१ |
| प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य | मनु. ११. ४७. | २०९ |
| बुद्धे चेत्क्षेमप्रापणं | आप. ध. २. २१. १६. | २५८ |
| ब्रह्ममे तु माम् | याज्ञिकी. ६३. | २४९ |
| ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् | जाबालोप. ४. | २५९ |
| ब्रह्म वै चतुर्होतारः | तै. ब्रा. ३. १२. ५, | ३०१ |
| ब्रह्मा देवानाम् | तै. सं. ३. ४. ११. | ३२९ |
| ब्राह्मणं पुरोदधीत | गौ. ध. ११. १२. | १२९ |
| ब्राह्मणक्षत्रियविशां | व. ध. २१. १४. | १९४ |
| ब्राह्मणश्चेत्प्रेत्त्यापूर्वं | व. ध. २१. १७ | १९५ |
| ब्राह्मणाभिशंसने | गौ. ध. २१. १७. | १७७ |
| ब्राह्मणेषु च विद्वांसः | मनु. १. ९७. | २७० |
| ब्राह्मणो ब्राह्मणं हत्वा | सुमन्तुः | १५४ |
| ब्राह्मणो धर्मान् प्रब्रूयात् | व. ध. १. ४१. | ४ |
४१८ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ब्राह्मणस्पत्यं तूपरमालभेत | तै. सं. २. १. ५. | १०२ |
| ब्राह्मणस्याधिकाः प्रवचन- | गौ. ध. १०. २. | ३ |
| भिक्षादानमप्सुपूर्वम् | गौ. ध. ५. १९. | २७५ |
| भिद्यते हृदयग्रन्थिः | मुण्ड. २. २. ८. | २५६ |
| भूतानां प्राणिनःश्रेष्ठाः | मनु. १. ९६. | २७० |
| भूतेभ्यो नमः | याज्ञिकी. ६७. | २४६ |
| भूमियमयज्ञियैस्तृणैः | वै. ध. १२. १०. | ६७ |
| भूरग्नये च पृथिव्यै च | याज्ञिकी ५. | २६१ |
| भृत्यानानुपरोधेन | मनु. ११. १०. | २१० |
| भूर्वृक्षिशिलावर्जम् | व. ध. २४. ६ | ३८३ |
| मद्यं नित्यं ब्राह्मणः | गौ. ध. २. २६. | १९ |
| मद्यभाण्डस्थिता आपः | व. ध. २०. २४. | १६० |
| मधुवाता ऋतायते | ऋ. सं. १. ३. १८. | २६९ |
| मनुष्यलोकः पुत्रेण | श. ब्रा. १४. ४. ३. २४. | २५३ |
| मशकैर्मक्षिकामिश्च | व. ध. ३. ४५. | २६३ |
| महाहविर्होता | तै. आ. ३. ५. | ३४० |
| मातरि पितर्याचार्ये | आप. ध. १. १०. ४ | १४८ |
| माता मातृष्वसा | नार. १२. ७३. | १६९ |
| मानस्तोके तनये | तै. सं. ४. ५. १०. | ३११ |
| मासि श्राद्धे च तामेव | शङ्खः | १४८ |
| मार्जारनकुलौ हत्वा | मनु. ११. १३१. | १३५ |
| मूर्धानं दिवः | ऋ. सं. ४. ५. ९. | २७० |
| मृतेऽपि वा सा पुनर्भूः | व. ध. १७. २१ | १९१ |
| य इन्द्रियकामो वीर्यकामः | तै. सं. २. ३. ७. | १५ |
| य उभयादत् | तै. सं. २. २. ६. | ११ |
| यः करोति तु | मनु. १२. १२. | ४६ |
| यः प्रमत्तां हन्ति | आप. ध. १. २९. २. | ३६१ |
| यं यजमानो | बौ. श्रौ. ६. २८. | ११५ |
| यं यं क्रतुमधीते | तै. आ. २. १५. | २४८ |
| यच्चाउतस्त्रिय आहुः | बौ. पितृ. १. ५. १५. | ८७ |
| यच्चिद्धि ते | तै. सं. ३. ४. ११. | २२५ |
| यत्र यत्र कामयते | बौ. गृ. २. १२. | ३५ |
| यथाकर्मर्त्विजः | १२० | |
| यथा वृक्षस्य सम्पुष्पितस्य | तै. आ. १०. ११. | ४०७ |
| (१) यथासम्भवमुत्स्वेदनं | शङ्खः | ५७ |
१. मुद्रितशंखस्मृतावित्थं नोपलभ्यते ।
परिशिष्टम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| यथैवका न पातव्या | मनु. ११. १४. | १५९ |
| यथैव न प्राक्श्वतः | छा. उ. ५. ३. ७. | १५९ |
| यथोपपादनमूत्रपुरीषः | गौ. ध. २. ४. | १८ |
| यद्योतदेकस्य सतः | ३०९ | |
| यददीव्यन्नृणं | तै. आ. २. ४. | ३३५ |
| यदि पद्भ्यामेव विशेषं | १४ | |
| यदि यजुष्टो भूर्स्वाहेति | ऐ. ब्रा. २५. ३४. | १२० |
| यद्देवत्यः पशुः | श. ब्रा. ३. ८. ३. १. | १६४ |
| यद्देवा देवहेलनम् | तै. आ. २. ३. | १३९ |
| यद्देवाः | तै. ब्रा. ३. ७. १२. | ३५९ |
| यद्वा उ विश्पतिः | सा. सं. पू. २. १. १. ८. | २७१ |
| यन्मे मनसा वाचा | तै. आ. २. ६. | ३३८ |
| यस्ततो जायते | तै. सं. २. ५. १. | ८८ |
| यस्य चैव गृहे मूर्खों | व. ध. ३. १०. | ७३ |
| यस्याग्नौ न क्रियते | आप. ध. २. १५. १३. | २१५ |
| यस्यां मनश्चक्षुषोः | आप. गृ. ३. २१. | १४३ |
| यस्मिन्कर्मण्यस्य कृते | मनु. ११. २३३. | ५८ |
| यां निधि समनुप्राप्य | बृहस्पतिः | १५० |
| यात्रामानप्रसिद्ध्यर्थम् | मनु. ४. ३. | २०१ |
| यावज्जीवं प्रेतपत्नी | १९८ | |
| यावज्जीवं जुहुयात् | ई. उ. २. | २५४ |
| या वामिन्द्रावरुणा | तै. सं. २. ३. १३. | ४०० |
| या वेदबाह्याःस्मृतयः | मनु. १२. ९५. | २८० |
| यासां राजा वरुणः | तै. स. ५. ६. १. | २३५ |
| ये अप्रथेताम् | तै. सं ४. ७. १५. | ४०१ |
| ये चत्वारः पथयो | तै. सं. ५. ७. २. | २५९ |
| ये देवाः | तै. सं. १. ८. ७. | ३२९ |
| येन सूर्यस्तपति | तै. ब्रा. १२. ३. ९. | २५७ |
| योऽनधीत्य द्विजः | मनु. २. १६८. | ३६४ |
| योऽधीतेऽहन्यहन्येताम् | मनु. १. ८२. | २३३ |
| योऽस्याऽऽत्मनः कारयिता | मनु. १२. १२. | १७३ |
| यो वा मिन्द्रावरुणा | तै. सं. २. ३. १३. | ४०० |
| रक्षसां भागोऽसि | तै. सं. १. १. ५ | ११५ |
| रजस्वलाऋतुस्नातां | व. ध. २०. ४२. | १५६ |
| रहस्यं प्रायश्चित्तं | गौ. ध. २४. १. | २०८ |
| राजा तु धर्मेणाऽनुशासन् | व. ध. १. ४३. | १२८ |
| राजा विजितसार्वभौमः | १५५ |
४२०
बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| रात्रावचिरेवाऽनेदंदशे | ४२ | |
| रात्रिशेषे द्वाभ्यां | गौ. ध. १४. ७. | ८४ |
| रौरवयौधाजने नित्यं | गौ. ध. २६. ९. | २४९ |
| वचनाद्दोषतो भेदाः | नार. १. १५७. | १३८ |
| वरुणाय धर्मपतये | तै. सं. १. ८. १०. | ३२७ |
| वर्णान्तरगमनं | गौ. ध. ४. २२. | १२४ |
| वर्त्तयंस्तु सिलोञ्छाभ्याम् | मनु. ४. १०. | १७१ |
| वर्षासु रथकारः | १२५ | |
| वलीपलितकालेऽपि | १७१ | |
| वसाऽसृङ्मज्जशुक्रमजा | मनु. ५. १३५ | ५६ |
| वाग्घोता | तै. आ. ३. ६. | ३४० |
| वाचा प्रशस्तमुपयुञ्जीत | वशिष्ठः | ६२ |
| वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणां | याज्ञ. स्मृ. २. १३७ | २१३ |
| वायुरन्तरिक्षस्याऽधिपतिः | तै सं. ३. ४. ५. | ३४४ |
| वारुणं यवमयं | तै. सं. १. ८. ८. | ३२७ |
| विदा मघवन् | ३५९ | |
| विद्यानुष्ठानसम्पन्नः | लघुशाता. ५३. | २०९ |
| विधियज्ञाज्जपयज्ञः | मनु. २. ८५. | २४० |
| विधूमे सन्नमुसले | मनु. ६. ५६. | २५२ |
| विभागञ्चेत्पिता कुर्यात् | याज्ञ. २. ११४ | १८१ |
| विहितोरुस्रुत | ऋ. सं. ८. ४, १. | १०२ |
| विंशतिभागः शुल्कः | गौ. ध. १०. २५ | १३१ |
| विंशो भागः पणस्य | ७१ | |
| वित्र्यङ्गैर्हीनानां | मनु. २. १८४. | २२ |
| वेदसन्यासिकानान्तु | मनु. ६. ८६. | ३०२ |
| वेदानधीत्य वेदौ वा | मनु. ३. २. | १८ |
| वेदाहमेतं पुरुषं | तै आ. ३. १२. | ३७८ |
| वैदिकाश वेदिं कल्पयन्ते | १०४ | |
| वैश्वानराय प्रतिवेश्यायः | तै. आ. २. ६. | ३३७ |
| वैश्वानरो न ऊत्या | तै. सं. १. ५. ११. | ४०० |
| वैष्णवान् खनामि | तै. सं. १. ३. २. | २३९ |
| व्यभिचारेण वर्णानां | मनु. १०. २४. | १२४ |
| व्यस्तस्तपाणिना कार्यं | मनु. २. ७२. | २३ |
| शन्नो देवीः | सा. सं. पू. १. १. | ३५९ |
| शय्यासनमलङ्कारं | मनु. ९. १७. | १९३ |
| शस्त्रेण च प्रजापालनम् | व. ध. २. २२. | १२८ |
| शाखानां विप्रकीर्णत्वात् | तं. वा. १. ३. १. | ७ |
परिशिष्टम्
४२१
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| शुश्रूषा शूद्रस्य | आप. ध. १. १. ७ | १२९ |
| श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे | सा. सं. पू. २. १. १. १०. | २७० |
| शूद्रश्चेद्व्राह्मणमभिगच्छेत् | व. ध. २१. १. | १९५ |
| शेषेषूपवसेदहः | मनु. ५. २०. | ९८ |
| श्रेयासं श्रेयांसं | व. ध. ११. ५. | २६६ |
| श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी | मनु. २. ९०. | १७२ |
| श्वभिः खादेयद्राजा | गौ. ध. २३, १४. | १३३ |
| श्वेताश्च मृगा वन्याः | व. ध. ३. ४४ | ६० |
| षड्भिः परिहार्यो राजा | गौ. ध. ८. १२. | १३२ |
| षष्ठीं चितिम् | तै. सं. ५. ४. २. २. | ३८५ |
| सकामेन सकामायाम् | १४३ | |
| सखिभार्यां समाहृत्य | संव. स्मृ. १. १६४. | १५ |
| सङ्ग्रामे संस्थानं | गौ. ध. १०. १५. | २८३ |
| सचित्रचित्रं | ऋ. मं. ४. ५. ८. | ३४७ |
| सति प्रभूते पयसि | २३४ | |
| सत्येन शापयेद्विप्रम् | मनु. ८. ११३. | ७२ |
| सद्यः पतति मांसेन | व. ध. २. ३१. | ३६४ |
| सन्ध्यायां गायत्र्या अभि | तै. आ. २. २. | २२६ |
| सन्न्यस्य दुर्मतिः कश्चित् | संवर्त. स्मृ. १७१. | २८२ |
| सन्धिनीक्षीरमवत्साक्षीरं | व. ध. १४. २९ | ९७ |
| स पापिष्ठो विवाहानां | मनु. ३. ३४. | १४२ |
| सपिण्डाः पुत्रस्थानीया वा | व. ध. १७. ७२. | ८२ |
| सपिण्डे तु त्रिरात्रं | १४७ | |
| सम्मार्जनेनाऽञ्जनेन | मनु. ५. १२४. | ४३ |
| सम्यग्दर्शनसम्पन्नः | मुण्ड. उ. २. २. | २५६ |
| संवीतं मानुषं | तै. आ. २. १. | ४७ |
| स य इदमविद्वान् | छा. उ. ५. २४. १. | २६४ |
| सवर्णाग्रे द्विजातीनां | मनु. ३. १२. | १२२ |
| सव्याहृतिं सप्रणवां | व. ध. २५. १३. | २२८ |
| सर्वे एते पुण्यलोका भवन्ति | छा. उ. २. २३. १. | ५ |
| सर्वत एवाऽऽत्मानं गोपायेत् | गौ. ध. ९. ३५. | १६२ |
| सर्वं हि विचरेद्ग्रामम् | मनु. २. १८५. | २२ |
| सर्वान्परित्यजेदर्थान् | मनु. ४. १७. | ७४ |
| सर्वेषामपि चैतेषाम् | मनु. ६. ८९. | २५९ |
| सशिखं वपनं कृत्वा | परा. स्मृ. ८. ३९. | १८३ |
| सह शाखया प्रस्तरं | आप. श्रौ. ३. ३. ६. | १०३ |
| सहोवाच किं मेऽन्नं | छा. उ. ५. २. १. | ९४ |
४२२ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| साऽस्य देवता | पा. सू. ४. २. २४ | ३४४ |
| सान्तानिकं यक्ष्यमाणं | मनु. ११. १. २. | २१२ |
| सार्ववर्णिकं भैक्षाचरणं | गौ. ध. २. ४२. | २२ |
| सिंहे मे मन्युः | बौ. श्रौ. २. ५. | ४०२ |
| सिंहे व्याघ्र उत | तै. ब्रा. २. ७. ७. | ३३६ |
| सुकृतं यत्त्वया किञ्चित् | याज्ञ. २. ७५. | १३७ |
| सुरां पीत्वा द्विजः | मनु. ११. ९० | १५८ |
| सुवर्णस्तेयकृद्विप्रः | मनु. ११. ९९. | १५९ |
| सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा | मनु. ३. ३४. | १४२ |
| सूर्ये ते चक्षुः | तै. आ. ३. ४. | ३४० |
| सूर्यश्च मा मन्युश्च | याज्ञिकी. २४. २५. | २२४ |
| सृष्टीरुपदधाति | तै. सं. ५. ३. ४. | १६३ |
| सोमाय पितृपीताय | बौ. गृ. १. ८. ८. | २७१ |
| स्तेनो हिरण्यस्य सुरां | छा. उ. ५. १०. ९. | १५९ |
| स्तेनस्य श्वपदः कार्यः | मनु, ९. २३७, | १३२ |
| स्नातकव्रतलोपे च | मनु. ११. २०३. | २१७ |
| स्त्रीषु चान्तं | १९७ | |
| स्त्रीभ्यस्सर्ववर्णेभ्यः | आप. ध. २. २९. १६. | ८७ |
| स्त्रीष्वनन्तरजातासु | मनु. १०. ६. | १२२ |
| स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधः | मनु. ११. ६६. | १३४ |
| स्वधर्मो राज्ञः परिपालनं | व. ध. १९. १. | १२८ |
| स्वधा पितृभ्यः | तै. सं. १. १. ११. | ११५ |
| स्वप्ने सिक्त्वा | मनु. २. १८१. | ३८३ |
| स्वमातुलसुतां प्राप्य | तं. वा. १. ३. ३. | ९ |
| स्वमांसं परमांसेन | मनु. ५. ५२. | ७५ |
| स्वरादित्योभवति | निरु. २. ४. २. | २२७ |
| स्वादिष्ठया | ऋ. सं ६. ७. १६. | ३५९ |
| स्वाध्याय एवोत्सृजमानः | आप. ध. .१. २६. ११. | २८९ |
| हन्तिजातानजातांश्च | मनु. ८. ९९. | १३८ |
| हिरण्यवर्णाः | तै. सं. ५. ६. १. | २२५ |
| हिरण्यशृङ्गं वरुणं | याज्ञिकी. उ. १. ७. | २२४ |
| हिंसानुग्रहयोः | गौ. ध. ३. २५. | ३०० |
सूत्रों में आये हुए नामों एवं विषयों की अनुक्रमणिका
( संख्याएँ इस ग्रन्थ के पृष्ठ का निर्देश करती हैं । )
| अक्षर ( ओम् ), २६४ | अश्विन् देव २७७ |
| अगम्या १९९ | अष्टका होम २७६ |
| अग्नि १९७, ४०४, वैश्वानर २८८, ३२१, ३३८, उपसमाधान ३५२ | आग्नीध्र ११९ |
| अग्निहोत्र २८८, ३१७, २८७, में धर्मोच्छिष्ट १०८, के मन्त्र २९९, ३३९ | आचमन ४८, २२१, २३६, २६३, २७५, २९६, ३३० |
| अग्निहोत्री २६७, ३९२ | आचार्य ४०४ |
| अग्न्याधेय २०३ | आत्मयज्ञ २९६ |
| अघमर्षण ३२३, ३५९, ३७२, ३७५, ३७९ | आत्मयाजी २५९ |
| अङ्ग १४ | आत्रेयी १३४, १५६ का वध १३५ |
| अतिकृच्छ्र १७८, १९४, १९९, १५५, ३६२, ३८५ | आदित्य २३२ |
| अथर्ववेद ३७७, ३८२ | आमिक्षा ११२, ३३४ |
| अथर्वशिरस् ३५९ | आयोगव १२३, १२६ |
| अथर्वाङ्गिरस् ४०८ | आरट्ट प्रदेश, १४ |
| अधोवीत ४७ | आर्यावर्त १२ |
| अनशनपारायण ३५१ | आर्ष, तीर्थ ४८, विवाह १४१ |
| अन्तर्वास ३५ | आवसथ्य अग्नि २९५ |
| अन्वाहार्यपचन २९५ | आसुर, विवाह १४१ |
| अपचमानक ३१५ | आहवनीय ११९, २८६, २८८, २९५, ३०६ |
| अपविद्धपुत्र | इन्द्र २७९ |
| अभिजित् ३४९ | इन्द्रकील २१५ |
| अभ्युक्षण ६४ | उग्र १२३ |
| अम्बष्ठ १२३ | उत्तरीय ३५, २२१ |
| अरणी ३४१ | उत्सर्पिणामयन १०८ |
| अर्घ्य २२० | उदयनीय ३२ |
| अलाबु ११० | उन्मज्जक ३१८ |
| अवकीर्णी १६३ | उपनयन १५६, दुबारा १५९ |
| अवन्ति १४ | उपनिषद् ३५९ |
| अवभृथ १५४, ३२३, ३७५ | उपवास २६७ |
| अश्व ३६१ | उपाकर्म ९९ |
| अश्वमेध १५४, ३२३, ३५८, ३७५ | उपावृत् १४ |
| उशनस् २०५, ३५४ | |
| ऋक् ३८२, ४०८ |
| ४२४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् |
|---|
| ऋग्वेद ३७२, ३९२ | गङ्गा १३ |
| ऋण २७८ | गणिका ३२८ |
| ऋतुममती, कन्या ३६६, पत्नी ३६७ | गान्धर्व १४१, १४३ |
| ऋत्विज ८२ | गायत्री २०, २२६, ३७०, ३८०, ३९३, ३९४ |
| ऐडावध १०८ | गार्हपत्य अग्नि १२०, २९५, ३०६ |
| ऐष्टिक यज्ञ २९८ | गूढज १८७ |
| ओंकार ३७०, ३७२, ३७६, ३९४ | गोमय ३८६, ३९१ |
| औपजंघनि १८९ | गोमूत्र ३८६, ३९१, ३९५ |
| औरस पुत्र १८४ | गौ, दान ३२२, ३४६ |
| कन्या अपरण ३६७ | गौतम १०, २०१ |
| कपिञ्जल ९६ | ग्रीष्म १९ |
| कमण्डलु ३५ आदि | चक्रचर ३०३ |
| कलिङ्ग १४, १५ | चण्डाल १२३, १२६, २०० |
| कश्यप १४५ | चतुश्चक्र १०८ |
| कास्य २८ | चमस ४४, ५७ |
| कानीन, अविवाहिता का पुत्र १८७ | चान्द्रायण १३४, १५५, १९४, १९९, ३४१, ३६२, ३८८ |
| कापोता वृत्ति ३०४, ३१३, ३९२ | चारण की पत्नी १९३ |
| कारस्कर प्रदेश १४ | चिलिचिम, मत्स्य ९६ |
| कारु ५९, ७१ | जगती २० |
| कुक्कुट १२३, १२७ | जघन्यसंवेशी २२ |
| कुण्डपायिनामयन १०८ | जनक १९० |
| कुम्भीधान्य ३ | तक्र ३८९ |
| कुलुङ्ग ९५ | तप्तकृच्छ्र १७७ |
| कुशीलव ७१ | तरत्समन्दीय २०८, ३७१ |
| कुशोदक ३८७ | तित्तिर ९६ |
| कुसीद ७० | तिल ३६१, ३९५, ४०३ |
| कूष्माण्ड १३९, १७६, ३५९, ३७८, ३९९ | तीर्थ २२३, ३६० |
| कृच्छ्र १५५, १५९, १६०, १७६, १९४, १९९, ३३४, ३६२ | तुलापुमान् ३८९ |
| कृच्छ्रातिकृच्छ्र १७८, ३८५ | तोयाहार ३१८ |
| कृत्रिम पुत्र १८७ | त्रिष्टुप् २० |
| कौशली वृत्ति, ३०४, ३१० | त्रैधातवीय ३०५ |
| क्षत्ता १२३, १२६ | दक्षिणापथ १४ |
| क्षत्रिय १९, का वध दण्ड १३३, उपनयन १९, वर्ण १२१, से कमण्डलु ७१, पत्नियां १२२, का पुत्र १२५, कर्त्तव्य १२८, आपत्काल में २०१ | दण्ड २९३ |
| क्षेत्रज १८६ | दत्तपुत्र १८६ |
| खुर ९७ | दधिचर्म १०८ |
| दर्श पूर्णमास ३६, १०७ | |
| दाक्षायण १०८ | |
| दार्बीहोम २७८, ३७३ |
परिशिष्टम्
| ४२५ | |
|---|---|
| दीक्षणीया इष्टि ७८ | पितृयज्ञ २४६ |
| दीर्घसत्र ३१ | पित्र्य तीर्थ ४८ |
| दुर्गा ३७८ | पिशाच २७५ |
| देवयज्ञ २४६ | पुण्ड्र प्रदेश १४ |
| दैव तीर्थ ४८, विवाह १४१ | पुत्र, अयोनिज ८५, पुत्रिकापुत्र १८४, क्रीत १८८, स्वयंदत्त १८८, निषाद १८८, पारशव १८९, पौनर्भव १८८, भरण-पोषण १९१ |
| धर्म १, के द्वारा ७, न्याय व्यवहार में १३६, आपत्कालीन २०१, चार भेद २४८ | |
| ध्रुवा वृत्ति ३०४, ३१० | पुनर्भू ३६७ |
| नर्तकी १६६ | पुनस्तोम १४, ३५८ |
| नास्तिक ७२ | पुरुषसूक्त ३५९ |
| नियोग १९९ | पुरोहित १२९ |
| निर्ऋति ११४, १६४ | पुक्कस १२३, १२७ |
| निवीत ४७ | पैशाच विवाह १४२ |
| निषाद १२३ | प्रजापति २६१, ३५६, ४०५, ४०७, परमेष्ठी ३७ |
| नृत्य २३ | प्रणव २२७, २७०, २८५, ३०१, ३०२ |
| पञ्चगव्य ३८७ | प्रवृत्ताशिन् ३१८ |
| पतनीय ३६५ | प्रह्लाद २५५ |
| पचमानक ३१५ | प्राजापत्य १४०, ३८४, ३९३ |
| पञ्चनखाः ९५ | प्राण २५९ |
| पत्नी यजमान की ११६, गुरु की १५७, की रक्षा १९० | प्राणाग्नि २६८ |
| परित्याग १९८ | प्राणायाम २२७, २२८, ३५३, ३६३, ३६८ |
| परिधा २१५ | प्रानून १४ |
| परिवित्त ३९६ | प्रायणीय ३२ |
| परिषत् ३ | पृष्ठ्या २८८ |
| पर्यग्निकरण ३८ | प्रैष्य ७१ |
| पर्वे ३६ | बलि २०९ |
| पवमान ११२ | बहिष्पवमान ३५९ |
| पवित्रेष्टि १५, ३९४ | बृहच्छिरस ९६ |
| पशु विक्रय ९, ग्राम्य १३, हत्या का प्रायश्चित्त १३५, यज्ञ २४८ | बृहस्पति ३५४ |
| पाकयज्ञ ३७ | बौधायन ३७, ४२, ४५, ३२५, ३३१ |
| पात्र, मिट्टी के ५४, बाँस के ११० | ब्रह्मकूर्च ३७३, ३९१ |
| पारशव, शूद्रा का पुत्र १२५ | ब्रह्मचर्य १९५ |
| पालनी वृत्ति ३०४, ३१३ | महायज्ञ २४०, २४७ |
| पावमानी ३५१, ३७८, ३९४, ३९९ | ब्रह्मलोक २२३ |
| पिण्डोदक ७९ | ब्रह्महत्या ३५८ |
| पिण्याक २१८ | ब्रह्महृदय १०८, २२८ |
| पिपीलिकामध्य चान्द्रायण ३४९ | ब्रह्मा, का स्थान ११९ |
| ३१ बौ०ध० |
४२६ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| ब्रह्मान्ववधान २८६ | यतिचान्द्रायण ३८९ |
| ब्रह्मौदन १०८ | यम १६४, ४०४ |
| ब्राह्म, तीर्थ ४८, मुहूर्त ३५५, विवाह १४० | यमुना १३ |
| ब्राह्मण, अवध्य १३२, उपनयन १९, ब्राह्मण २५५, का धन ८२, दो नाम १४९; कृषि-कर्म २०२, दण्ड १३२, वाणिज्य १७५ पंक्तिपावन २६९, ३५५, वध का दण्ड १३३, संख्या २७६, की हत्या ३७०, ३७२ विचारहित ७३, श्राद्धभोजन २७१, का वध ३२५, ३३३ | यवागू ३२६, ३३४ |
| यातुधान २७५ | |
| यायावर २५९, २८२, २९४, ३०३, ३०४, ३०६, ३९२ | |
| यावकभक्षण ३६०, ३९० | |
| योग ३६९ | |
| रक्षोदेवता १६४ | |
| रजस्वला ९० | |
| भक्ष्य ९५ | रथकार २६, १२५ |
| भरद्वाज ३९६ | राक्षस १४१ |
| भाल्लविन् १३१ | राजीव ९६ |
| भिक्षा ३३४ | रुद्र ११४, ३५९, ३९५ |
| भूतयज्ञ २४६ | रोमशकरि ९६ |
| भूतात्मा ४६ | रोहित ९६ |
| भ्रूणघ्नी ३६८ | वंग १४ |
| भ्रूणहत्या ३६६, ३६७ | वरुण ४०, २२९, २३२, २९०, २९९ |
| भ्रूणहा १५३, ३९३ | वर्मी ९६ |
| मगध १४ | वल्कल १०३ |
| मत्स्य ९६ | वसन्त १९ |
| मधु ३६४ | वस्त्र, रेशमी ५६, १०२, वृक्ष की छाल १०३, यज्ञ का १०१, उत्तरीय २२१, काषाय २५२, २७५, ३१४ संन्यासी का २९२, ३६१, नवीन ३४१, वृक्ष की छाल २५२ |
| मधुच्छन्दा ३९४ | |
| मधूदक ११२ | |
| मनुष्य यज्ञ २४६ | |
| मयूर ९६ | वान्था ३१४ |
| महाव्याहृति २६० | वायु ४०४, वायुभक्ष ३१८, ३१९ |
| महासान्तपन ३८८ | वारुणी १६० |
| मांस १५०, २१४, ३६४, ३२१, ३३३ | वार्ध्राणस ९६ |
| मागध १२३, १२६ | वार्धुषिक ७१ |
| मार्जन ३९४ | वास्तोष्पतीय ३०१ |
| मार्जलीय १०८ | विकल्पी ४ |
| मित्र २२९, २३२, २९९ | विधवा १९८ |
| मृगारेष्टि ३९४ | विधुर २८२ |
| मृग्युलाङ्गल ३७८ | विरजा, मन्त्र ३७८ |
| मौञ्जीबन्धन १८ | विवाह ३४५ अनियमितता १६७ कन्या, की अवस्था ३६५ |
| मौद्गल्य १९८ | |
| यजुर्वेद ३७७, ३८२, ३९२ | वृत्ति ३०३ |
| यजुस ४०८ | वेद ३५९ |
| यज्ञोपवीत ३५ | वेदान्त ३५९ |
परिशिष्टम्
| ४२७ | |
|---|---|
| वेश्या ३२८ | सप्तर्षि ३५६ |
| वैण १२३, १२७ | समिदाहरण ३० |
| वैतुषिक ३१६ | समूहा ३०४, ३१२ |
| वैदेहक १२३, १२६ | सम्प्रक्षालनी ३०४, ३१२ |
| वैश्य १९, वर्ण १२१, से कमण्डलु ४१, पत्नियां १२२, का पुत्र १२५, कर्तव्य १२८, के वध का दण्ड १३३, आपत्काल में २०२ | सर्वपृष्ठा १४<br>सर्वारण्यका ३१६<br>सवन ३५५, ४०१, ४०८<br>सवर्णा १८४ |
| वैश्वदेव २०९, २९४ | सहस्रदंष्ट्र ९६ |
| वैश्वानरी १५, ३०५, ३९४, ३९९ | सहस्राक्ष ४०४ |
| व्याहृति ३९, २२७, २४०, २६०, २८५, २९०, २९२, ३०२, ३७०, ३७२, ३७६, ३७८, ३८०, ३९४ | सहोढ १८७<br>सान्तपन ३८६<br>सामवेद ३७७, ३८२, ३९२, ४०८ |
| व्रत ३६१ | सामुद्र शुल्क १३१ |
| व्रतपती १५ | सावित्री २४०, २८५, २९२, ३५९ |
| व्रात्य १२७ | सिद्धेच्छा ३०४, ३१४ |
| शंखपुष्पी १६० | सिन्धु १४ |
| शरद् १९ | सिलोञ्छा ३०४, ३१३ |
| शालीन २८२, २९४, ३०३, ३०४ | सुरभिमती २९० |
| शिक्य २८४ | सुराष्ट्र १४ |
| शिशु आङ्गिरस २८ | सुवर्ण ३६१, का दान ४०३ |
| शिशु चान्द्रायण ३८९ | सूत १२६ |
| शिष्ट २, परम्परा ११ | सूर्भि १५७ |
| शूद्र, अतिथि २१०, अन्न ३६३, स्त्री ३६६, की सेवा १६९, से कमण्डलु ४१, से व्यभिचार १९४, का अन्न ३२८ शूद्र से बात नहीं ३४७ | सूर्य ३४७, ४०४<br>सोम १९७, ४०४, का पान ३६०, सोमयज्ञ २४८, २७९<br>सौवीर १४ |
| शूद्रा ३६४, ३९५, से विवाह २१८, से मैथुन ३७४ | स्त्री, ऋतुमती ३६७, की पवित्रता १९७, की परतन्त्रता १९३, की प्रतिमा १५७, के साथ भोजन ९, पिण्डोदक क्रिया नहीं ७९, पुनर्भू ३६७, से बात नहीं ३४७, ३८३ |
| श्मशान १५३ | स्नातक ३४ |
| श्रोणा ३४९ | स्वधा २४६ |
| श्रोत्रिय २१०, २१२ | स्वयंभू ४३ |
| श्वपाक १२७ | स्वाध्याय २४७, २७९, ३०० |
| षण्णिवर्तनी ३०४, ३०९ | स्वाहा २४६ |
| सङ्कीर्णयोनि १४ | हारीत १७३ |
| सकुल्य ८१ | होता ११९ |
| सन्दंशी ३११ | |
| सन्ध्योपासन २२२ | |
| सपिण्ड ७८ |
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- आपस्तम्बधर्मसूत्रम्। हरदत्तमिश्र कृत 'उज्ज्वला' टीका ए० चिन्नस्वामी शास्त्री कृत भूमिका, टिप्पणी, शब्दानुक्रमणिका डॉ० उमेशचन्द्र पाण्डेय कृत हिन्दी टीका (का. ९३)
- गोभिलगृह्यसूत्रम् । मुकुन्द झा बक्शी कृत संस्कृत टीका, डॉ० सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी टीका (का. ११८)
- गौतमधर्मसूत्राणि । गौतमकृत । हरदत्त कृत 'मिताक्षरा' संस्कृत टीका तथा रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत हिन्दी टीका (का. १९२)
- धर्मसिन्धुः । काशीनाथ उपाध्याय कृत। वशिष्ठ दत्त मिश्र कृत 'सर्वतोमुखी' हिन्दी टीका तथा सुदामा मिश्र शास्त्री कृत 'सुधा' ... गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर कृत समीक्षात्मक प्रस्तावना (का. १२३)
- नारद स्मृति। 'तिलोत्तमा' संस्कृत एवं हिन्दी टीका ...
डॉ० ब्रजकिशोर स्वैन (ना. स. ग्र. २६) - पारस्करगृह्यसूत्रम्। प्रथम दो कांड पर हरिहर भाष्य तथा गदाधर भाष्य एवं तृतीय काण्ड पर हरिहर तथा जयराम भाष्य गोपाल शास्त्री नेने कृत भूमिका, नोट्स तथा सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी व्याख्या सहित, प्र० काण्ड एवम् सम्पूर्ण (का. १७)
- मनुस्मृतिः। कुल्लूक भट्ट कृत 'मन्वर्थमुक्तावली' टीका तथा हरगोविन्द शास्त्री कृत 'मणिप्रभा' हिन्दी टीका। गोपाल शास्त्री नेने कृत भूमिका १-२ अध्याय, ७वां अध्याय एवम् सम्पूर्ण (का. ११४)
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