ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०९
परमात्मस्वरूपे ! परमानन्दरूपिणि ! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। भद्रे ! तुम भद्र अर्थात् कल्याण प्रदान करनेवाली हो। दुर्गे ! तुम दुर्गम संकटका निवारण तथा दुर्गतिका नाश करनेवाली हो। भवसागरसे पार उतारनेके लिये नूतन एवं सुदृढ़ नौकास्वरूपिणी देवि ! मुझपर कृपा करो। सर्वस्वरूपे ! सर्वेश्वरि ! सर्वबीजस्वरूपिणि ! सर्वाधारे ! सर्वविद्ये ! विजयप्रदे ! मुझपर प्रसन्न होओ। सर्वमङ्गले ! तुम सर्वमङ्गलरूपा, सभी मङ्गलोंको देनेवाली तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी आधारभूता हो; मेरे ऊपर कृपा करो। भक्तवत्सले ! तुम निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, श्रद्धा, तुष्टि, पुष्टि, लज्जा, मेधा और बुद्धिरूपा हो; मुझपर प्रसन्न होओ। वेदमातः ! तुम वेदस्वरूपा, वेदोंका कारण, वेदोंका ज्ञान देनेवाली और सम्पूर्ण वेदाङ्ग-स्वरूपिणी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। जगदम्बिके ! तुम दया, जया, महामाया, क्षमाशील, शान्त, सबका अन्त करनेवाली तथा क्षुधा-पिपासारूपिणी हो; मुझपर प्रसन्न होओ। विष्णुमाये ! तुम नारायणकी गोदमें लक्ष्मी, ब्रह्माके वक्षः-स्थलमें सरस्वती और मेरी गोदमें महामाया हो; मेरे ऊपर कृपा करो। दीनवत्सले ! तुम कला, दिशा, दिन तथा रात्रिस्वरूपा एवं कर्मोंके परिणाम (फल)-को देनेवाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। राधिके ! तुम सभी शक्तियोंका कारण, श्रीकृष्णके हृदयमन्दिरमें निवास करनेवाली, श्रीकृष्णकी प्राणोंसे भी अधिक प्रिया तथा श्रीकृष्णसे पूजित हो। मेरे ऊपर कृपा करो। देवि ! तुम यशःस्वरूपा, सभी यशकी कारणभूता, यश देनेवाली, सम्पूर्ण देवीस्वरूपा और अखिल नारीरूपकी सृष्टि करनेवाली हो। शुभे ! तुम अपनी कलाके अंशमात्रसे सम्पूर्ण कामिनियोंका रूप धारण करनेवाली, सर्वसम्पत्स्वरूपा तथा समस्त सम्पत्तिको देनेवाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। देवि ! तुम परमानन्दस्वरूपा, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कारण, यशस्वियोंसे पूजित और यशकी निधि हो; मेरे ऊपर कृपा करो। देवि ! तुम समस्त जगत् एवं रत्नोंकी आधारभूता वसुन्धरा हो, चर और अचरस्वरूपा हो; मुझपर शीघ्र ही प्रसन्न होओ। सिद्धयोगिनि ! तुम योगस्वरूपा, योगियोंकी स्वामिनी, योगको देनेवाली, योगकी कारणभूता, योगकी अधिष्ठात्री देवी और देवियोंकी ईश्वरी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। सिद्धेश्वरि ! तुम सम्पूर्ण सिद्धिस্বরূপा, समस्त सिद्धियोंको देनेवाली तथा सभी सिद्धियोंका कारण हो; मुझपर प्रसन्न होओ। महेश्वरि ! विभिन्न मतोंके अनुसार जो समस्त शास्त्रोंका व्याख्यान है, उसका तात्पर्य तुम्हीं हो। ज्ञानस्वरूपे परमेश्वरि ! मैंने जो कुछ अनुचित कहा हो, वह सब तुम क्षमा करो। कुछ विद्वान् प्रकृतिकी प्रधानता बतलाते हैं और कुछ पुरुषकी। कुछ विद्वान् इन दो प्रकारके मतोंमें व्याख्याभेदको ही कारण मानते हैं। पहले प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले महाविष्णुके नाभिदेशसे प्रकट हुए कमलपर, उसीसे उत्पन्न हुए जो ब्रह्माजी बैठे थे, उन्हें महादैत्य मधु और कैटभ खेल-खेलमें ही मारनेको उद्यत हो गये। तब ब्रह्माजी अपनी रक्षाके लिये तुम्हारी स्तुति करने लगे। उन्हें स्तुति करते देख तुमने उन दोनों महादैत्योंके विनाशके लिये जलशायी महाविष्णुको जगा दिया। तब नारायणने तुम शक्तिकी सहायतासे उन दोनों महादैत्योंको मार डाला। ये भगवान् तुम्हारा सहयोग पाकर ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। तुम्हारे बिना शक्तिहीन होनेके कारण ये कुछ भी नहीं कर सकते। सुरेश्वरि ! पूर्वकालमें त्रिपुरोंसे संग्राम करते समय जब मैं आकाशसे नीचे गिर पड़ा, तब तुमने ही विष्णुके साथ आकर मेरी रक्षा की थी। ईश्वरि ! इस समय मैं विरहाग्निसे जल रहा हूँ; तुम मेरी रक्षा करो। परमेश्वरि ! अपने दर्शनके पुण्यसे मुझे क्रीत दास बना लो।
६१०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
यह कहकर शम्भु मौन हो गये। तब उन्होंने आकाशमें विराजमान उस देवी प्रकृतिको प्रसन्नता-पूर्वक देखा, जो रत्नसारनिर्मित रथपर बैठी थीं। उनके सौ भुजाएँ थीं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान देदीप्यमान थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थीं और उनके प्रसन्न-मुखपर मन्द हासकी छटा छा रही थी। उन जगन्माता सतीको देखकर विरहासक्त शंकरने पुनः शीघ्र ही उनकी स्तुति की और रोते हुए अपने विरहजनित दुःखको निवेदन किया। तदनन्तर उन्होंने सतीकी अस्थियोंसे बनी हुई अपनी माला उन्हें दिखायी और उनके शरीरजनित भस्मको, जो शिवने अपने अङ्गोंका भूषण बना रखा था; उसकी ओर भी उनकी दृष्टि आकर्षित
की। फिर अनेक प्रकारसे मनुहार करके उन्होंने सुन्दरी सतीको संतुष्ट किया। उस समय नारायण, ब्रह्मा, धर्म, शेषनाग, देवता और ऋषियोंने भी 'हे ईश्वर! शिवकी रक्षा करो' ऐसा कहकर उन देवीका स्तवन किया। उन सबके स्तवनसे वे देवी तत्काल प्रसन्न हो गयीं तथा शिवकी उन प्राणवल्लभाने प्राणेश्वर शम्भुसे कृपापूर्वक कहा।
प्रकृति बोलीं—महादेव! आप धैर्य धारण करें। प्रभो! आप मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। योगीश्वर! आप ही आत्मा तथा जन्म-जन्ममें मेरे स्वामी हैं। महेश्वर! मैं पर्वतराज हिमालयकी भार्या मेनकाके गर्भसे जन्म लेकर आपकी पत्नी बनूँगी; अतः आप इस विरह-ज्वरको त्याग दीजिये।
यों कह तथा शिवको आश्वासन दे वे अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी उन्हें सान्त्वना देकर चले गये। उस समय लज्जासे भगवान् शिवका मस्तक झुका हुआ था। उनका चित्त हर्षसे उत्फुल्ल हो रहा था। वे कैलास पर्वतपर चले गये और शीघ्र ही विरहज्वरको त्यागकर अपने गणोंके साथ प्रसन्नतासे नाचने लगे।
जो मनुष्य शिवद्वारा किये गये इस प्रकृतिके स्तोत्रका पाठ करता है, उसका प्रत्येक जन्ममें अपनी पत्नीसे कभी वियोग नहीं होता। इहलोकमें सुख भोगकर वह शिवलोकमें चला जाता है तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है। (अध्याय ४३)
• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६११ पार्वतीके विवाहकी तैयारी, हिमवान्के द्वारपर दूल्हा शिवके साथ बारातमें विष्णु आदि देवताओंका आगमन, हिमालयद्वारा उनका सत्कार, वरको देखनेके लिये स्त्रियोंका आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- वसिष्ठजीके पूर्वोक्त वचनको सुनकर सेवकगणों तथा पत्नीसहित हिमालयको बड़ा विस्मय हुआ; किंतु स्वयं पार्वती मन-ही-मन हँस रही थी। अरुन्धतीने भी उन मेनादेवीको, जो शोकसे कातर हो खाना-पीना छोड़कर रो रही थीं; समझाया। तब उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक शोकका त्याग कर दिया तथा अरुन्धतीको उत्तम भोजन कराकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे प्रसन्न- चित्तसे समस्त मङ्गलकार्योंका सम्पादन करने लगीं। प्रिये! तदनन्तर वसिष्ठजीकी आज्ञासे हिमालयने वैवाहिक सामग्री एकत्रित की और बड़ी उतावलीके साथ विभिन्न स्थानोंमें निमन्त्रणपत्र भेजवाया। तत्पश्चात् उन्होंने शिवके पास मङ्गलपत्रिका पठवायी। इसके बाद शैलराजने विवाहके लिये भोज्यपदार्थ, मिष्टान्न, दिव्य वस्त्र तथा स्वर्ण-रत्न आदिका अपार संग्रह किया। पार्वतीको स्नान करवाकर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत किया गया। उसके नेत्रोंमें काजल और पैरोंमें महावर लगाया गया। इधर देवेश्वरगण विविध वाहनोंपर सवार हो रत्नमय रथपर आरूढ़ हुए भगवान् शंकरको साथ लिये हिमालय-भवनके समीप पहुँचे। वहाँ भाँति- भाँतिसे सबका स्वागत-सत्कार किया गया। देवेश्वरोंको सामने देख हिमालयने उन्हें प्रणाम किया और सेवकोंको आज्ञा दी कि 'इन सम्माननीय अतिथियोंके लिये सिंहासन प्रस्तुत किये जायँ।' तत्पश्चात् विनतानन्दन गरुड़की पीठसे तत्काल ही उतरकर चार-भुजाधारी भगवान् नारायण अपने पार्षदोंसहित सिंहासनपर बैठे। रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित चतुर्भुज पार्षद रत्नमयी मुट्ठीमें बँधे हुए श्वेत चामरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे। उस समाजमें श्रेष्ठतम ऋषि और बड़े-बड़े देवता उनके गुण गा रहे थे। भगवान्का प्रसन्नमुख मन्द मुस्कानसे सुशोभित था और वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके पास ही देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी बैठे। ऋषि और मुनि भी मङ्गलमय स्थानपर विराजमान हुए। इसी समय भगवान् शिव रथसे उतरकर रत्नमय सिंहासनपर बैठे। बैठकर उन्होंने पर्वतराज हिमालयकी ओर देखा। तत्पश्चात् भगवान् शिवको देखनेके लिये वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो शैलेन्द्र-नगरकी स्त्रियाँ आयीं। उनमें बालिकाएँ, युवतियाँ और वृद्धाएँ भी थीं। ऋषियों, देवों, नागों, गन्धर्वों, पर्वतों और राजाओंकी भी मनोहर कन्याएँ वहाँ आ पहुँचीं। मेनाने कुमारी कन्याओंके साथ दूल्हा शंकरका दर्शन किया। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मनोहर चम्पाके समान गौर थी। वे एक मुख तथा तीन नेत्रोंसे सुशोभित थे। उनके प्रसन्न- मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके अङ्ग
६१२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुन्दर कुंकुमसे अलंकृत थे। उन्होंने मालतीकी माला धारण कर रखी थी। उनका मस्तक श्रेष्ठ रत्नमय मुकुटसे प्रकाशमान था। अग्निशोधित, अनुपम, अत्यन्त सूक्ष्म, सुन्दर, विचित्र और बहुमूल्य दो वस्त्रोंसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। उन्होंने हाथमें रत्नमय दर्पण ले रखा था। अञ्जनसे अञ्जित होनेके कारण उनके नेत्रोंकी शोभा बढ़ गयी थी। पूर्ण प्रभासे आच्छादित होनेके कारण वे अत्यन्त मनोहर दिखायी देते थे। उनकी अवस्था अत्यन्त तरुण (नवीन) थी। वे भूषणभूषित रमणीय अङ्गोंसे बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय उन्होंने भगवान् नारायणकी आज्ञासे परम सुन्दर अनुपम रूप धारण कर रखा था। भगवान् शंकर योगस्वरूप, योगेश्वर, योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु, स्वतन्त्र, गुणातीत तथा सनातन ब्रह्मज्योति हैं। वे गुणोंके भेदसे अनन्त भिन्न-भिन्न रूप धारण करते हैं, तथापि रूपरहित हैं। भवसागरमें डूबे हुए प्राणियोंका उद्धार करनेवाले हैं तथा जगत्की सृष्टि, पालन एवं संहारके कारण हैं। वे सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वेश्वर, सर्वजीवन तथा सबके साक्षी हैं। उनमें किसी प्रकारकी इच्छा या चेष्टा नहीं है। वे परमानन्दस्वरूप, अविनाशी, आदि, अन्त और मध्यसे रहित, सबके आदिकारण तथा सर्वरूप हैं। ऐसे दिव्य जामाताको देखकर आनन्दमग्न हुई मेनाने शोकको त्याग दिया। 'सती धन्य है, धन्य है'—कहकर वहाँ आयी हुई युवतियोंने पार्वतीके सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुछ कन्याएँ कहने लगीं—'अहो! दुर्गा बड़ी भाग्यशालिनी है।' कुछ कामिनियाँ कामभावसे युक्त हो मौन एवं स्तब्ध रह गयीं और कितनी ही बोल उठीं—'अरी सखी! हमने अपने जीवनमें ऐसा वर कभी नहीं देखा था।'
बाजे बजानेवालोंने भाँति-भाँतिकी कलाएँ दिखाते हुए वहाँ अनेक प्रकारके सुन्दर और मधुर वाद्य बजाये। इसी समय हिमवान्के अन्तःपुरकी परिचारिकाएँ दुर्गाको बाहर ले आयीं। वह रत्नमय सिंहासनपर बैठी थी। उसके सामने रत्नमयी वेदी शोभा पा रही थी। उसके मुख-मण्डलका कस्तूरी तथा स्निग्ध सिन्दूरके बिन्दुओंसे श्रृङ्गार किया गया था। चारु चन्दनसे चर्चित चन्द्रसदृश आभावाले आनम्र भालदेशसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। श्रेष्ठ रत्नोंके सारसे निर्मित हार उसके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रहा था। वह त्रिलोचन शिवकी ओर कनखियोंसे देख रही थी। उनके सिवा और कहीं उसकी दृष्टि नहीं जाती थी। उसके मुखपर अत्यन्त मन्द मुस्कानकी आभा बिखरी हुई थी। वह कटाक्षपूर्वक देखनेके कारण बड़ी मनोहर जान पड़ती थी। उसकी भुजाएँ और हाथ रत्ननिर्मित केयूर, कड़े तथा कंगनसे विभूषित थे। उसके कटिप्रदेशमें रत्नोंकी बनी हुई करधनी शोभा दे रही थी। झनकारते हुए मञ्जीर चरणोंका सौन्दर्य बढ़ाते थे। वह बहुमूल्य, तुलनारहित, विचित्र एवं कीमती दो वस्त्रोंसे सुशोभित थी। उसके सुन्दर कपोल श्रेष्ठ रत्नमय कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे। दन्तपङ्क्ति मणिके सारभागकी प्रभाको छीने लेती थी। वह एक हाथमें रत्नमय दर्पण लिये हुए थी और दूसरेमें क्रीड़ाकमल लेकर घुमा रही थी। उसके अङ्ग चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे चर्चित थे। ऐसी अलौकिक रूपवाली जगत्की आदिकारणभूता जगदम्बाको सब लोगोंने प्रसन्नताके साथ देखा। हर्षसे युक्त भगवान् त्रिलोचनने भी नेत्रके कोनेसे पार्वतीकी ओर देखा। देखकर वे आनन्द-विभोर हो उठे। उसकी सम्पूर्ण आकृति सतीसे सर्वथा मिलती-
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१३
जुलती थी। उसे देखकर भगवान् शंकरने विरह-ज्वरका परित्याग कर दिया। उन्होंने अपना मन दुर्गाको अर्पित कर दिया और स्वयं सब कुछ भूल गये। उनके सारे अङ्ग पुलकित हो गये तथा नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये।
इसी समय हर्षसे भरे हुए हिमवान्ने पुरोहितके साथ जाकर वस्त्र, चन्दन और आभूषणोंद्वारा उनका वरके रूपमें वरण किया। भक्तिभावसे पाद्य आदि उपचार अर्पित किये तथा दिव्य गन्धवाली मनोहर मालाओंसे दूल्हको अलंकृत किया। तत्पश्चात् यथासम्भव शीघ्र वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक उनके हाथमें अपनी कन्याका दान कर दिया। राधिके! तदनन्तर हर्षसे भरे हुए हिमालयने उदारतापूर्वक दहेजमें उन्हें अनेक प्रकारके रत्न, सुन्दर रत्नोंके बने हुए मनोहर पात्र, एक लाख गौ, रत्नजटित झूल और अंकुशसे युक्त एक सहस्र गजराज, सजे-सजाये तीन लाख घोड़े, श्रेष्ठ रत्नोंसे अलंकृत लाखों अनुरक्त दासियाँ, पार्वतीके लिये छोटे भाईके समान प्रिय एक सौ ब्राह्मण वटु और श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित सौ रमणीय रथ दिये। पूर्वोक्त वस्तुओंके साथ शैलराजद्वारा यत्नपूर्वक दी हुई पार्वतीको भगवान् शंकरने प्रसन्न-मनसे 'स्वस्ति' कहकर ग्रहण किया। हिमालयने कन्यादान करके भगवान् शंकरकी परिहार नामक स्तुति की। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ माध्यन्दिन-शाखामें वर्णित स्तोत्रको पढ़ते हुए उनका स्तवन किया।
हिमालय बोले—सर्वेश्वर शिव! आप दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले तथा शरणागतोंको नरकके समुद्रसे उबारनेवाले हैं, सबके आत्मस्वरूप हैं और आपका श्रीविग्रह परमानन्दमय है; आप मुझपर प्रसन्न हों; गुणवानोंमें श्रेष्ठ महाभाग शंकर! आप गुणोंके सागर होते हुए भी गुणातीत हैं; गुणोंसे युक्त, गुणोंके स्वामी और गुणोंके आदि कारण हैं; मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। प्रभो! आप योगके आश्रय, योगरूप, योगके ज्ञाता, योगके कारण, योगीश्वर तथा योगियोंके आदिकारण और गुरु हैं; आप मेरे ऊपर कृपा करें। भव! आपमें ही सब प्राणियोंका लय होता है, इसलिये आप 'प्रलय' हैं। प्रलयके एकमात्र आदि तथा उसके कारण हैं। फिर प्रलयके अन्तमें सृष्टिके बीजरूप हैं और उस सृष्टिका पूर्णतः परिपालन करनेवाले हैं; मुझपर प्रसन्न होवें। भयंकर संहार-कालमें सृष्टिका संहार करनेवाले आप ही हैं। आपके वेगको रोकना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है। आराधनाद्वारा आपको रिझा लेना भी सहज नहीं है तथापि आप भक्तोंपर शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं; प्रभो! आप मुझपर कृपा करें। आप कालस्वरूप, कालके स्वामी, कालानुसार फल देनेवाले, कालके एकमात्र आदिकारण तथा कालके नाशक एवं पोषक हैं; मुझपर प्रसन्न हों। आप कल्याणकी मूर्ति, कल्याणदाता तथा कल्याणके बीज और आश्रय हैं। आप ही कल्याणमय तथा कल्याणस्वरूप प्राण हैं; सबके परम आश्रय शिव! मुझपर कृपा करें।
इस प्रकार स्तुति कर हिमालय चुप हो गये, उस समय समस्त देवताओं और मुनियोंने गिरिराजके सौभाग्यकी सराहना की। राधिके! जो मनुष्य सावधान-चित्त होकर हिमालयद्वारा किये गये स्तोत्रका पाठ करता है, उसके लिये शिव निश्चय ही मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते हैं।
(अध्याय ४४)
४१- सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा
६१४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
शिव-पार्वतीके विवाहका होम, स्त्रियोंका नव-दम्पतिको कौतुकागारमें ले जाना, देवाङ्गनाओंका उनके साथ हास-विनोद, शिवके द्वारा कामदेवको जीवन-दान, वर-वधू और बारातकी विदाई, शिवधाममें पति-पत्नीकी एकान्त वार्ता, कैलासमें अतिथियोंका सत्कार और विदाई, सास-ससुरके बुलानेपर शिव-पार्वतीका वहाँ जाना तथा पार्षदोंसहित शिवका श्वशुर-गृहमें निवास
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! तदनन्तर महादेवजीने वैदिक विधिसे अग्निकी स्थापना करके पार्वतीको अपने वामभागमें बिठाकर वहीं यज्ञ (वैवाहिक होम) किया। वृन्दावन-विनोदिनि! उस यज्ञके विधिपूर्वक सम्पन्न हो जानेपर भगवान् शिवने ब्राह्मणको दक्षिणाके रूपमें सौ सुवर्ण दिये। तत्पश्चात् गिरिराजके नगरकी स्त्रियोंने प्रदीप लाकर माङ्गलिक कृत्यका सम्पादन किया। फिर वे नव-दम्पतिको घरमें ले गयीं। उन सबने प्रेमपूर्वक जयध्वनि तथा शुभ निर्मञ्छन आदि करके मन्द मुस्कराहटके साथ कटाक्षपूर्वक शिवकी ओर देखा। उस समय उनके अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। वास-भवनमें प्रवेश करके कामिनियोंने देखा—शंकर अत्यन्त सुन्दर रूप और वेश-भूषासे सुशोभित हैं। उनका प्रत्येक अङ्ग रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा कुंकुमसे अलंकृत है। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। वे कटाक्षपूर्वक देखते और मनको हर लेते हैं। उनकी वेश-भूषा अपूर्व एवं सूक्ष्म है। वे सिन्दूर-बिन्दुओंसे विभूषित हैं। उनकी गौर-कान्ति मनोहर चम्पाकी आभाको तिरस्कृत कर रही है। वे सर्वाङ्गसुन्दर, नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा मुनीन्द्रोंके भी चित्तको मोह लेनेवाले हैं। वहाँ सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, गङ्गा, रति, अदिति, शची, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, वसुन्धरादेवी, शतरूपा तथा संज्ञा—ये सोलह देवाङ्गनाएँ भी उपस्थित थीं। इनके सिवा और भी बहुत-सी मनोहर रूपवाली देवकन्याएँ, नागकन्याएँ तथा मुनिकन्याएँ वहाँ आयी थीं। उस समय जो देवाङ्गनाएँ गिरिराजके भवनमें विराजमान थीं, उन सबकी संख्या बतानेमें कौन समर्थ है?
उनके दिये हुए रत्नमय सिंहासनपर दूलह शिव प्रसन्नतापूर्वक बैठे। उस समय उन सोलह दिव्य देवियोंने सुधाके समान मधुर वाणीमें भगवान् शंकरको बधाई दी। उनके साथ विनोदभरी बातें कीं और पार्वतीको सुख पहुँचानेके लिये विनम्र अनुरोध किया। इसी समय भगवान् शंकरने रतिपर कृपा की। रतिने गाँठमें बँधी हुई कामदेवके शरीरकी भस्मराशि उनके सामने रख दी और शिवने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देखकर भस्मके उस ढेरसे पुनः कामदेवको प्रकट कर दिया। तत्पश्चात् योगियोंके परम गुरु निर्विकार भगवान् शंकरने उन परिहासपरायणा देवियोंसे कहा—'आप सब-की-सब साध्वी तथा जगन्माताएँ हैं, फिर मुझ पुत्रके प्रति यह चपलता क्यों?' शिवकी यह बात सुनकर वे देवियाँ सम्भ्रमपूर्वक चित्रलिखी-सी खड़ी रह गयीं। इसके बाद शंकरजीने भोजन किया। फिर उन्होंने मनोहर राजसिंहासनपर विराजमान हो उस दिव्य निवासगृहकी अनुपम शोभा एवं चित्रकारी देखी। यह सब देखकर उन्हें आश्चर्य और परम संतोष हुआ। रातको उन्होंने उसी दिव्य भवनमें विश्राम किया। प्राणवल्लभे! जब प्रातःकाल हुआ, तब नाना प्रकारके वाद्योंकी मधुर ध्वनि होने लगी। फिर तो सब देवता वेगपूर्वक उठे और वेश-भूषासे
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१५
सज्जित हो अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर कैलासकी यात्राके लिये उद्यत हो गये। उस समय नारायणकी आज्ञासे धर्म उस वासभवनमें गये और योगिश्वर शंकरसे समयोचित वचन बोले।
धर्मने कहा—प्रमथेश्वर! आपका कल्याण हो। उठिये, उठिये और श्रीहरिका स्मरण करते हुए माहेन्द्र-योगमें पार्वतीके साथ यात्रा कीजिये।
वृन्दावनविनोदिनि! धर्मकी बात सुनकर शंकरने पार्वतीके साथ माहेन्द्र-योगमें यात्रा आरम्भ की। पार्वतीके साथ देवेश्वर शंकरके यात्रा करते समय मेना उच्चस्वरसे रो पड़ीं और उन कृपानिधानसे बोलीं।
मेनाने कहा—कृपानिधे! कृपा करके मेरी बच्चीका पालन कीजियेगा। आप आशुतोष हैं। इसके सहस्रों दोषोंको क्षमा कीजियेगा। मेरी बेटी जन्म-जन्ममें आपके चरणकमलोंमें अनन्यभक्ति रखती आयी है। सोते-जागते हर समय इसे अपने स्वामी महादेवके सिवा दूसरे किसीकी याद नहीं आती है। आपके प्रति भक्तिकी बातें सुनते ही इसका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठता है और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। मृत्युञ्जय! आपकी निन्दा कानमें पड़नेपर यह ऐसी मौन हो जाती है, मानो मर गयी हो।
मेना यह कह ही रही थीं कि हिमवान् तत्काल वहाँ आ पहुँचे और अपनी बच्चीको छातीसे लगा फूट-फूटकर रोने लगे—'वत्से! हिमालयको—मेरे इस घरको सूना करके तू कहाँ चली जा रही है? तेरे गुणोंको याद करके मेरा हृदय अवश्य ही विदीर्ण हो जायगा।' यों कहकर शैलराजने अपनी शिवा शिवको सौंप दी और पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित वे बारंबार उच्चस्वरसे रोदन करने लगे। उस समय कृपानिधान साक्षात् भगवान् नारायणने उन सबको कृपापूर्वक अध्यात्मज्ञान देकर धीरज बँधाया। पार्वतीने भक्तिभावसे माता-पिता और गुरुको प्रणाम किया। वे महामायारूपिणी हैं; अतः मायाका आश्रय ले बारंबार जोर-जोरसे रोने लगीं। पार्वतीके रोनेसे ही वहाँ सब स्त्रियाँ रोने लगीं। पत्नियों तथा सेवकगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और मुनि भी रो पड़े। फिर वे मानसशायी देवता शीघ्र ही कैलासपर्वतको चल दिये तथा दो ही घड़ीमें शिवके निवासस्थानपर सानन्द जा पहुँचे। यह देखकर वहाँके मङ्गल-कृत्यका सम्पादन करनेके लिये देवताओं और मुनियोंकी पत्नियाँ भी दीप लिये शीघ्रतापूर्वक सहर्ष वहाँ आ गयीं। वायु, कुबेर और शुक्रकी स्त्रियाँ, बृहस्पतिकी पत्नी तारा, दुर्वासाकी स्त्री, अत्रि-भार्या अनसूया, चन्द्रमाकी पत्नियाँ, देवकन्या, नागकन्या तथा सहस्रों मुनिकन्याएँ वहाँ उपस्थित हुईं। वहाँ जिन असंख्य कामिनियोंका समूह आया था, उन सबकी गणना करनेमें कौन समर्थ है? उन सबने मिलकर नवदम्पतिका उनके निवास-मन्दिरमें प्रवेश कराया तथा उन महेश्वरको रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। वहाँ भगवान् शिवने सतीको उनका पहलेवाला घर दिखाया और प्रसन्नतापूर्वक पूछा—'प्रिये! क्या तुम्हें अपने इस घरकी याद आती है? यहींसे तुम अपने पिताके निवास-स्थानको गयी थीं। अन्तर इतना ही है कि इस समय तुम गिरिराजकुमारी हो और उस समय यहाँ दक्षकन्याके रूपमें निवास करती थीं। तुम्हें पूर्वजन्मकी बातोंका सदा स्मरण रहता है; इसीलिये पिछली बातोंकी याद दिला रहा हूँ। यदि तुम्हें उन बातोंका स्मरण है तो कहो।'
भगवान् शंकरकी बात सुनकर पार्वती मुस्करायीं और बोलीं—'प्राणनाथ! मुझे सब बातोंका स्मरण है; किंतु इस समय आप चुप रहें (उन बीती बातोंकी चर्चा न करें)।' तत्पश्चात् शिवने सामग्री एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको नाना प्रकारके मनोहर पदार्थ भोजन कराये। भोजनके पश्चात् भाँति-भाँतिके रत्नोंसे अलंकृत हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंसहित
४२- धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन
| ६१६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
सब देवता भगवान् चन्द्रशेखरको प्रणाम करके बिदा हुए। भगवान् नारायण और ब्रह्माको शंकरजीने स्वयं ही प्रणाम किया। वे दोनों उन्हें हृदयसे लगाकर आशीर्वाद दे अपने-अपने स्थानको चले गये।
इसके बाद हिमवान् और मेनाने मैनाकको बुलाया और कहा— 'बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शिव और पार्वतीको शीघ्र यहाँ बुला लाओ।' उनकी बात सुनकर मैनाक शीघ्र ही शिवधाममें गया और पार्वती एवं परमेश्वरको लिवाकर आ गया। पार्वतीका आगमन सुनकर बालक-बालिका, वृद्धा तथा युवती स्त्रियाँ भी उन्हें देखनेके लिये दौड़ी आयीं। पर्वतगण भी सानन्द भागे आये। मेना अपने पुत्रों और बहूके साथ मुस्कराती हुई दौड़ीं। हिमालय भी प्रसन्नतापूर्वक पुत्रीकी अगवानीके लिये दौड़े आये। देवी पार्वतीने रथसे उतरकर बड़े हर्षके साथ माता-पिता तथा गुरुजनोंको प्रणाम किया। उस समय वे आनन्दके समुद्रमें गोते लगा रही थीं। हर्ष-विह्वल मेना और मोदमग्न हिमालयने पार्वतीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें ऐसा लगा, मानो गये हुए प्राण वापस आ गये हों। पुत्रीको घरमें रखकर गिरिराजने उसके लिये रत्नसिंहासन दिया और शूलपाणि शिव तथा उनके पार्षदगणोंको मधुपर्क आदि दे सहर्ष उनका सत्कार किया। पार्षदोंसहित भगवान् चन्द्रशेखर अपने ससुरालके घरमें रहने लगे। वहाँ प्रतिदिन पत्नीसहित उनकी सोलह उपचारोंसे पूजा होने लगी। राधे ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् शंकरके मङ्गल-परिणयकी कथा कह सुनायी, जो हर्ष बढ़ानेवाली तथा शोकका नाश करनेवाली है। अब और क्या सुनना चाहती हो ?
(अध्याय ४५-४६)
इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतममुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विज-बालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमशमुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना
श्रीराधिकाने पूछा— जगद्गुरो ! मैंने शूलपाणि शिवके यश तथा दैववश उनके दर्प-भङ्गकी बात सुनी। पार्वतीके गर्वभंजनका और शिव-पार्वतीके विवाहका भी वर्णन सुना। अब इन्द्रके तथा अन्य लोगोंके भी अभिमानके चूर्ण होनेके प्रसङ्गोंको क्रमशः सुनना चाहती हूँ; कृपया विस्तारपूर्वक कहें।
श्रीकृष्ण बोले— सुन्दरि ! इन्द्रके दर्प-भङ्गकी बात तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह प्रसङ्ग सुन्दर, अनुपम तथा कानोंके लिये अमृतके समान मधुर है। प्राचीन कालकी बात है। इन्द्र सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके समस्त देवताओंके स्वामी तथा महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गये। तपस्याके फलसे प्रतिदिन उनके ऐश्वर्यकी वृद्धि होने लगी। बृहस्पतिजीने उन्हें सिद्ध-मन्त्रकी दीक्षा दी। उन्होंने पुष्करमें सौ वर्षोंतक उस महामन्त्रका जप किया। जपसे वह मन्त्र सिद्ध हो गया और इनका मनोरथ पूरा हुआ। मनुष्य सम्पत्तिसे मोहित हुआ ब्रह्मस्वरूपा प्रकृतिका आदर नहीं करता; अतः
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१७ प्रकृतिने इन्द्रको शाप दे दिया। इसीलिये उन्हें अपने गुरुकी ओरसे भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप मिला। एक दिन इन्द्र अपनी सभामें बैठे थे। प्रकृतिके शापसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; अतः वे गुरुको आते देखकर भी न तो उठे और न प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम ही किया। यह देख बृहस्पतिजी क्रोधसे युक्त हो उस सभामें नहीं बैठे, उलटे पाँव घर लौट आये। वहाँ भी वे ताराके निकट नहीं ठहरे, तपस्याके लिये वनमें चले गये। उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर कहा—'इन्द्रकी सम्पत्ति चली जाय।' तदनन्तर इन्द्रको सुबुद्धि प्राप्त हुई और वे बोले—'मेरे स्वामी यहाँसे कहाँ चले गये।' यों कहकर वे वेगपूर्वक सिंहासनसे उठे और ताराके पास गये। वहाँ उन्होंने भक्तिभावसे मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़कर माता ताराको प्रणाम किया और सारी बातें बतायीं। फिर वे उच्चस्वरसे बारंबार रोदन करने लगे। पुत्रको रोते देख माता तारा भी बहुत रोयीं और बोलीं—'बेटा! तू घर जा। इस समय तुझे गुरुदेवके दर्शन नहीं होंगे। जब दुर्दिनका अन्त होगा, तभी तुझे गुरुजी मिलेंगे और उनकी कृपासे पुनः लक्ष्मीकी प्राप्ति होगी। मूढ़! तेरा अन्तःकरण दूषित है; अतः अब अपने कर्मोंका फल भोग। दुर्दिनमें अपने गुरुपर दोषारोपण करता है और अच्छे दिनोंमें अपने- आपको ही संतुष्ट करनेमें लगा रहता है। (गुरुकी परवा नहीं करता।) इन्द्र! सुदिन और दुर्दिन ही सुख और दुःखके कारण हैं।' यों कहकर पतिव्रता तारादेवी चुप हो गयीं। तदनन्तर इन्द्र वहाँसे लौट आये और एक दिन मन्दाकिनीके तटपर स्नानके लिये गये। वहाँ उन्होंने स्नान करती हुई गौतमपत्नी अहल्याको देखा। इन्द्रकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। उन्होंने गौतमका रूप धारण करके अहल्याका शील भङ्ग कर दिया। इसी बीच गौतमजी भी वहाँ आ गये। इन्द्रने भयभीत होकर मुनिके चरण पकड़ लिये। तब गौतमजीने कुपित होकर उनसे कहा। गौतम बोले—इन्द्र! तुझे धिक्कार है। तू देवताओंमें श्रेष्ठ समझा जाता है। कश्यपजीका पुत्र है; ज्ञानी है और जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीका प्रपौत्र है तो भी तेरी ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? जिसके नाना साक्षात् प्रजापति दक्ष हैं और माता पतिव्रता अदिति देवी हैं, उसका इतना पतन आश्चर्यकी बात है! तू वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी कहलाता है; किंतु कर्मसे योनि-लम्पट है; अतः तेरे शरीरमें एक सहस्र योनियाँ प्रकट हो जायँ । पूरे एक वर्षतक तुझे सदा योनिकी ही दुर्गन्ध प्राप्त होती रहेगी। तत्पश्चात् सूर्यकी आराधना करनेपर तेरे शरीरकी योनियाँ नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगी। मेरे शाप और गुरुके क्रोधसे इस समय तू राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो जा। ओ मूढ़! तेरे गुरु बड़े तेजस्वी और मेरे अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं। हम दोनों बन्धुओंमें फूट न पड़ जाय; इस भयसे तेरे गुरुका ही खयाल करके मैंने इस समय तेरे प्राण नहीं लिये हैं। तदनन्तर पैरोंमें पड़ी हुई अहल्याको लक्ष्य करके मुनिवर गौतमने कहा—'प्रिये ! अब तू वनमें जा अपने शरीरको पत्थर बनाकर चिरकाल- तक उसी अवस्थामें रह। इस बातको मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तेरे मनमें कोई कामना नहीं थी। इन्द्रने स्वयं आसक्त होकर तेरे साथ छल किया है।' स्वामीकी ऐसी आज्ञा होनेपर अहल्या बहुत डर गयी और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती तथा रोती हुई वनमें चली गयी। साठ हजार वर्षोंतक कर्मफलका भोग करनेके बाद मुनिप्रिया अहल्या श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका स्पर्श पाकर तत्काल शुद्ध हो गयी। फिर वह अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके गौतमजीके पास गयी। मुनिने सुन्दरी अहल्याको पाकर प्रसन्नताका अनुभव किया।
| ६१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
सुन्दरि राधिके! अब इन्द्रका उत्तम वृत्तान्त सुनो, जो पुण्यका बीज तथा पापका नाशक है। मैं विस्तारपूर्वक उसका वर्णन करता हूँ। गुरुके कोप और प्रकृतिकी अवहेलनासे वज्रधारी इन्द्रकी विवेक-शक्ति नष्ट हो गयी थी; अतः उनसे एक दिन ब्रह्महत्याका पाप बन गया। गुरुको तो वे छोड़ ही चुके थे; दैवने भी उन्हें अपना ग्रास बनाया। दैत्योंका आक्रमण हुआ और वे उनसे पीड़ित एवं भयभीत हो जगद्गुरु ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन्होंने विश्वरूपको अपना पुरोहित बनाया। दैवसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये इन्द्रने विश्वरूपपर पूरा-पूरा विश्वास कर लिया। विश्वरूपकी माता दैत्यवंशकी कन्या थी; अतः उनके मनमें दैत्योंके प्रति भी पक्षपात था। बुद्धिमान् इन्द्र उनके इस मनोभावको ताड़ गये; अतः उन्होंने अनायास ही तीखे बाण मारकर पुरोहित विश्वरूपका सिर काट लिया। विश्वरूपके पिता त्वष्टाने जब यह बात सुनी तो वे तत्क्षण रोषके वशीभूत हो गये और ‘इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व’ (इन्द्रके शत्रु ! तुम बढ़ो) ऐसा कहकर यज्ञका अनुष्ठान करने लगे, उस यज्ञके कुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर प्रकट हुआ, जिसने अनायास ही समस्त देवताओंको क्रोधपूर्वक कुचल डाला। तब दैत्यमर्दन इन्द्रने महामुनि दधीचिकी हड्डियोंसे अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करके देवकण्टक वृत्रासुरका वध कर डाला। फिर तो इन्द्रपर ब्रह्महत्याने धावा बोल दिया। वे अचेत-से हो रहे थे। ब्रह्महत्या बूढ़ी स्त्रीका वेष धारण करके आयी थी। वह लाल कपड़े पहन रखी थी। उसके शरीरकी ऊँचाई सात ताड़ोंके बराबर थी तथा कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसके दाँत हरिसके समान लंबे थे। उसने इन्द्रको बहुत डरा दिया। वे जब दौड़ते थे तो उनके पीछे-पीछे वह भी दौड़ती थी। ब्रह्महत्या बलिष्ठ थी और इन्द्र अपनी चेतनातक खो बैठे थे। उसका स्वभाव निर्दय था और वह हाथमें तलवार लेकर बड़े वेगसे दौड़ रही थी। उस घोर ब्रह्महत्याको देखकर गुरुके चरणोंका स्मरण करते हुए वे कमलके नालके सूक्ष्म सूत्रके सहारे मानसरोवरमें प्रविष्ट हो गये। ब्रह्महत्या ब्रह्माजीके शापके कारण वहाँ पहुँचनेमें असमर्थ थी; अतः सरोवरके तटके निकट बरगदकी एक शाखापर जा बैठी। उन दिनों राजा नहुष इन्द्रकी जगह त्रिभुवनके स्वामी बनाये गये। नहुष बलिष्ठ थे और देवता दुर्बल। अतः इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए नहुषने देवताओंसे यह माँग की कि इन्द्राणी शची मुझ इन्द्रकी सेवाके लिये उपस्थित हों। यह समाचार सुनकर शचीको बड़ा भय हुआ। वे तारादेवीकी शरणमें गयीं। ताराने अपने पतिको बहुत फटकारा और शिष्य-पत्नीकी रक्षा की। तब शचीको आश्वासन दे गुरु बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक मानसरोवरको गये और वहाँ कातर एवं अचेत हुए देवेन्द्रको सम्बोधित करके बोले।
बृहस्पतिने कहा— बेटा! उठो, उठो। मेरे रहते हुए तुम्हें क्या भय हो सकता है? मैं तुम्हारा स्वामी एवं गुरु हूँ। मेरे स्वरसे ही मुझे पहचानो और भय छोड़ो।
बृहस्पतिके स्वरको पहचानकर सम्पूर्ण सिद्धियोंके स्वामी इन्द्रने सूक्ष्म रूपको त्याग अपना रूप धारण कर लिया और तत्काल उठकर वेगपूर्वक उन सूर्यतुल्य तेजस्वी गुरुको देखा और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। गुरुजी उस समय प्रसन्न थे और क्रोधका परित्याग कर चुके थे। पैरोंमें पड़कर भयविह्वल हो रोते हुए इन्द्रको खींचकर उन्होंने प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया और स्वयं भी प्रेमाकुल होकर रो पड़े! बृहस्पतिजीको संतुष्ट तथा रोते देख देवेश्वर इन्द्रका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। भक्तिभावसे उनका मस्तक झुक गया और वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।
४३- श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१९
इन्द्र बोले— भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। कृपानिधान! कृपा कीजिये। अच्छे स्वामी अपने सेवकके अपराधको हृदयमें स्थान नहीं देते। अपनी पत्नी, अपने शिष्य, अपने भृत्य तथा अपने पुत्रोंको दुर्बल या सबल कौन मनुष्य दण्ड देनेमें असमर्थ होता है? तीन करोड़ देवताओंमें मैं ही एक देवाधम और मूढ़ हूँ। सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे ही मैं उच्च पदपर प्रतिष्ठित हूँ। आपने ही दया करके मुझे आगे बढ़ाया है। आप सारे जगत्का संहार करनेकी शक्ति रखते हैं। आपके सामने मेरी क्या बिसात है? मैं वैसा ही हूँ, जैसा बावलीका कीट। आप साक्षात् विधाताके पौत्र हैं; अतः स्वयं दूसरी सृष्टि रचनेमें समर्थ हैं।
इन्द्रके मुखसे यह स्तवन सुनकर गुरु बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और वे प्रेमपूर्वक बोले।
बृहस्पतिने कहा— महाभाग! धैर्य धारण करो और पहलेसे भी चौगुना महान् ऐश्वर्य पाकर सुस्थिर लक्ष्मीका लाभ लो। वत्स पुरन्दर! मेरे प्रसादसे तुम्हारे शत्रु मारे गये। अब तुम अमरावतीमें जाकर राज्य करो और पतिव्रता शचीसे मिलो।
यों कहकर ज्यों ही शिष्यसहित गुरु वहाँसे चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही उन्होंने अत्यन्त दुःसह एवं भयंकर ब्रह्महत्याको सामने खड़ी देखा। उसपर दृष्टि पड़ते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो गुरुकी शरणमें गये। बृहस्पतिको भी बड़ा भय हुआ। उन्होंने मन-ही-मन मधुसूदनका स्मरण किया। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई, जिसमें अक्षर तो थोड़े थे, परंतु अर्थ बहुत। बृहस्पतिजीने वह आकाशवाणी सुनी— 'संसारविजय नामक जो राधिकाकवच है, वह समस्त अशुभोंका नाश करनेवाला है। इस समय उसीका उपदेश देकर तुम शिष्यकी रक्षा करो।' तब शिष्यवत्सल बृहस्पतिने शिष्यको उस कवचका उपदेश दिया और अनायास ही हुङ्कारमात्रसे ब्रह्महत्याको भस्म कर डाला। तदनन्तर शिष्यको साथ लेकर बृहस्पतिजी अमरावतीपुरीमें गये। इन्द्रने गुरुकी आज्ञासे उस पुरीकी दशा देखी। शत्रुने उस नगरीको तोड़-फोड़ डाला था।
पतिका आगमन सुनकर शचीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उसने भक्तिभावसे गुरुदेवको प्रणाम करके प्राणवल्लभके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। प्रिये! इन्द्रका शुभागमन सुनकर सब देवता, ऋषि और मुनि वहाँ आये। उनका चित्त हर्षसे गद्गद हो रहा था। इन्द्रने अमरावतीका निर्माण करनेके लिये एक श्रेष्ठ देवशिल्पीको नियुक्त किया। देवशिल्पीने पूरे सौ वर्षोंतक अमरावतीकी रचना की। नाना विचित्र रत्नोंसे सम्पन्न तथा श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित उस मनोहर पुरीकी कहीं उपमा नहीं थी। फिर भी उससे देवराज इन्द्र संतुष्ट नहीं हुए। विश्वकर्माको आज्ञा नहीं मिली। इसलिये वे घर जा तो नहीं सके; परंतु उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो उठा। वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीने उनके अभिप्रायको जानकर कहा— 'कल तुम्हारे प्रतिरोधक कर्मका क्षय हो जानेपर ही तुम्हें छुटकारा मिलेगा।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर विश्वकर्मा शीघ्र ही अमरावती लौट आये और ब्रह्माजी वैकुण्ठधाममें गये। वहाँ उन्होंने अपने माता-पिता श्रीहरिको प्रणाम करके उनसे सारी बातें कहीं। तब श्रीहरिने ब्रह्माजीको धैर्य देकर अपने घरको लौटाया और स्वयं ब्राह्मणका रूप धारण करके वे अमरावतीपुरीमें आये। ब्राह्मणकी अवस्था बहुत छोटी थी। शरीर भी अधिक नाटा था। उन्होंने दण्ड और छत्र धारण कर रखे थे। शरीरपर श्वेत वस्त्र और ललाटमें उज्ज्वल तिलकसे वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। मुस्कराते समय उनकी श्वेत दन्तावली चमक उठती थी। अवस्थामें छोटे होनेपर भी
| ६२० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
वे ज्ञान और बुद्धिमें बढ़े-चढ़े थे। विद्वान् तो थे ही, स्वयं विधाताके भी विधाता तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता थे। इन्द्रके द्वारपर खड़े हो वे द्वारपालसे बोले—'द्वाररक्षक! तुम इन्द्रसे जाकर कहो कि द्वारपर एक ब्राह्मण खड़े हैं, जो आपसे शीघ्र मिलनेके लिये आये हैं।' द्वारपालने उनकी बात सुनकर इन्द्रको सूचना दी और इन्द्र शीघ्र आकर उन ब्राह्मणकुमारसे मिले। हँसते हुए बालक और बालिकाओंके समूह उन्हें घेरकर खड़े थे। वे बड़े उत्साहसे मुस्करा रहे थे और उनका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी जान पड़ता था। इन्द्रने उन शिशुरूपधारी हरिको भक्तिभावसे प्रणाम किया और भक्तवत्सल श्रीहरिने प्रेमपूर्वक उन्हें आशीर्वाद दिया। इन्द्रने मधुपर्क आदि देकर उनकी पूजा की और ब्राह्मणबालकसे पूछा—'कहिये, किसलिये आपका शुभागमन हुआ है?' इन्द्रका वचन सुनकर ब्राह्मणबालकने जो बृहस्पतिके गुरुके भी गुरु थे, मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।
**ब्राह्मण बोले—**देवेन्द्र! मैंने सुना है कि तुम बड़े विचित्र और अद्भुत नगरका निर्माण करा रहे हो; अतः इस नगरको देखने तथा इसके विषयमें मनोवाञ्छित बातें पूछनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। कितने वर्षोंतक इसका निर्माण कराते रहनेके लिये तुमने संकल्प किया है? अथवा विश्वकर्मा कितने वर्षोंमें इसका निर्माणकार्य पूर्ण कर देंगे? ऐसा निर्माण तो किसी भी इन्द्रने नहीं किया था। ऐसे सुन्दर नगरके निर्माणमें दूसरा कोई विश्वकर्मा भी समर्थ नहीं है।
ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र हँसने लगे। वे सम्पत्तिके मदसे अत्यन्त मतवाले हो रहे थे; अतः उन्होंने उस द्विजकुमारसे पुनः पूछा—'ब्रह्मन्! आपने कितने इन्द्रोंका समूह देखा अथवा सुना है? तथा कितने प्रकारके विश्वकर्मा आपके देखने या सुननेमें आये हैं? यह मुझे इस समय बताइये।' इन्द्रका यह प्रश्न सुनकर ब्राह्मणकुमार हँसे और अमृतके समान मधुर एवं श्रवणसुखद वचन बोले।
**ब्राह्मणने कहा—**तात! मैं तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यपको जानता हूँ। उनके पिता तपोनिधि मरीचिमुनिसे भी परिचित हूँ। मरीचिके पिता देवेश्वर ब्रह्माजीको भी, जो भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, जानता हूँ और उनके रक्षक सत्त्वगुणशाली महाविष्णुका भी परिचय रखता हूँ। मुझे उस एकार्णव प्रलयका भी ज्ञान है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंसे शून्य एवं भयानक दिखायी देता है। इन्द्र! निश्चय ही सृष्टि कई प्रकारकी है। कल्प भी अनेक हैं तथा ब्रह्माण्ड भी कितने ही प्रकारके हैं। उन ब्रह्माण्डोंमें अनेकानेक ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र भी बहुतेरे हैं। उन सबकी गणना कौन कर सकता है? सुरेश्वर! भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर ली जाय तो भी इन्द्रोंकी गणना नहीं हो सकती है; ऐसा विद्वानोंका मत है। इन्द्रकी आयु और अधिकार इकहत्तर चतुर्युगतक है। अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर विधाताका एक दिन-रात पूरा होता है। इस तरह एक सौ आठ वर्षोंतक ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण आयु है। जहाँ विधाताकी भी संख्या नहीं है, वहाँ देवेन्द्रोंकी गणना क्या हो सकती है? जहाँ ब्रह्माण्डोंकी ही संख्या ज्ञात नहीं होती; वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी कहाँ गिनती है? महाविष्णुके रोमकूपजनित निर्मल जलमें ब्रह्माण्डकी स्थिति उसी तरह है, जैसे सांसारिक नदी-नद आदिके जलमें कृत्रिम नौका हुआ करती है। इस प्रकार महाविष्णुके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने ब्रह्माण्ड हैं; अतएव ब्रह्माण्ड असंख्य कहे गये हैं। एक-एक ब्रह्माण्डमें तुम्हारे-जैसे कितने ही देवता निवास करते हैं।
इसी बीचमें पुरुषोत्तम श्रीहरिने वहाँ चींटोंके समूहको देखा, जो सौ धनुषकी दूरीतक फैला
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६२१
हुआ था। बारी-बारीसे उन सबकी ओर देखकर वे ब्राह्मणबालकका रूप धरकर पधारे हुए भगवान् उच्चस्वरसे हँसने लगे। किंतु कुछ बोले नहीं। मौन रह गये। उनका हृदय समुद्रके समान गम्भीर था। ब्राह्मण-वटुककी गाथा सुनकर और उनका अट्टहास देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। तदनन्तर उनके विनयपूर्वक पूछनेपर ब्राह्मणरूपधारी जनार्दनने भाषण देना आरम्भ किया।
**ब्राह्मण बोले—**इन्द्र! मैंने क्रमशः एक-एक करके चींटोंके समुदायकी सृष्टि की है। वे सब चींटे अपने कर्मसे देवलोकमें इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित हो चुके थे; परंतु इस समय वे सब अपने कर्मानुसार क्रमशः भिन्न-भिन्न जीवयोनियोंमें जन्म लेते हुए चींटोंकी जातिमें उत्पन्न हुए हैं। कर्मसे ही जीव निरामय वैकुण्ठधाममें जाते हैं, कर्मसे ब्रह्मलोकमें और कर्मसे ही शिवलोकमें पहुँचते हैं। अपने कर्मसे ही वे स्वर्गमें तथा स्वर्गतुल्य स्थान पातालमें भी प्रवेश करते हैं। कर्मसे ही अपने लिये दुःखके एकमात्र कारण घोर नरकमें गिरते हैं। कर्मसूत्रसे ही विधाता जीवधारियोंको फल देते हैं। कर्म स्वभावसाध्य है और स्वभाव अभ्यासजन्य। देवेन्द्र! चराचर प्राणियोंसहित समस्त संसार स्वप्नके समान मिथ्या है। यहाँ कालयोगसे सबकी मौत सदा सिरपर सवार रहती है। जीवधारियोंके शुभ और अशुभ सब कुछ पानीके बुलबुलेके समान हैं। इन्द्र! विद्वान् पुरुष इसमें सदा विचरता है; परंतु कहीं भी आसक्त नहीं होता।
यों कहकर ब्राह्मणदेवता वहाँ मुस्कराते हुए बैठे रहे। उनकी बात सुनकर देवेश्वर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने-आपको अब अधिक महत्त्व नहीं दे रहे थे। इसी बीच एक मुनीश्वर वहाँ शीघ्रतापूर्वक आये जो ज्ञान और अवस्था दोनोंमें बड़े थे। उनका शरीर अत्यन्त वृद्ध था। वे महान् योगी जान पड़ते थे। वे कटिमें कृष्ण-मृगचर्म, मस्तकपर जटा, ललाटमें उज्ज्वल तिलक, वक्षःस्थलमें रोमचक्र तथा सिरपर चटाई धारण किये हुए थे। उनका सारा रोममण्डल विद्यमान था; केवल बीचमें कुछ रोम उखाड़े गये थे। वे मुनि ब्राह्मणबालक तथा इन्द्रके बीचमें आकर ठूँठे काठकी भाँति खड़े हो गये। महेन्द्रने ब्राह्मणको देखकर सहर्ष प्रणाम किया और मधुपर्क देकर भक्तिभावसे उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणसे कुशल-मङ्गल पूछा और सादर एवं सानन्द आतिथ्य करके उन्हें संतुष्ट किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणबालकने उनके साथ बातचीत की और विनयपूर्वक अपना सारा मनोभाव प्रकट किया।
**बालकने कहा—**विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं? और आपका नाम क्या है? यहाँ आनेका उद्देश्य क्या है? तथा आप कहाँके रहनेवाले हैं? आपने मस्तकपर चटाई किसलिये धारण कर रखी है? मुने! आपके वक्षःस्थलमें रोमचक्र कैसा है? यह बहुत बढ़ा हुआ है; किंतु बीचमेंसे कुछ रोम क्यों उखाड़ लिये गये हैं? ब्रह्मन्! यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो सब विस्तारपूर्वक कहिये। इन सब अद्भुत बातोंको सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है।
ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर वे महामुनि इन्द्रके सामने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा वृत्तान्त बताने लगे।
**मुनि बोले—**ब्रह्मन्! आयु बहुत थोड़ी होनेके कारण मैंने कहीं भी रहनेके लिये घर नहीं बनाया है; विवाह भी नहीं किया है और जीविकाका साधन भी नहीं जुटाया है। आजकल भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करता हूँ। मेरा नाम लोमश है। आप-जैसे ब्राह्मणका दर्शन ही यहाँ मेरे आगमनका प्रयोजन है। मेरे सिरपर जो चटाई है, वह वर्षा और धूपका निवारण करनेके लिये है। मेरे वक्षःस्थलमें जो रोमचक्र है, उसका भी
| ६२२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
कारण सुनिये, जो सांसारिक जीवोंको भय देनेवाला और उत्तम विवेकको उत्पन्न करनेवाला है। मेरे वक्षःस्थलका यह रोममण्डल ही मेरी आयुकी संख्याका प्रमाण है। ब्रह्मन्! जब एक इन्द्रका पतन हो जाता है, तब मेरे इस रोमचक्रका एक रोम उखाड़ दिया जाता है। इसी कारणसे बीचके बहुत-से रोएँ उखाड़ दिये गये हैं; तथापि अभी बहुत-से विद्यमान हैं। ब्रह्माका दूसरा परार्द्ध पूर्ण होनेपर मेरी मृत्यु बतायी गयी है। विप्रवर! असंख्य विधाता मर चुके हैं और मरेंगे। फिर इस छोटी-सी आयुके लिये स्त्री, पुत्र और घरकी क्या आवश्यकता है? ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भगवान् श्रीहरिकी एक पलक गिरती है; अतः मैं निरन्तर उन्हींके चरणारविन्दोंका दर्शन करता रहता हूँ। श्रीहरिका दास्यभाव दुर्लभ है। भक्तिका गौरव मुक्तिसे भी बढ़कर है। सारा ऐश्वर्य स्वप्नके समान मिथ्या और भगवान्की भक्तिमें व्यवधान डालनेवाला है। यह उत्तम ज्ञान मेरे गुरु भगवान् शंकरने दिया है; अतः मैं भक्तिके बिना सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी नहीं ग्रहण करना चाहता हूँ।
ऐसे कहकर वे मुनि भगवान् शंकरके समीप चले गये और बालकरूपधारी श्रीहरि भी वहीं अन्तर्धान हो गये। इन्द्र स्वप्नकी भाँति यह घटना देखकर बड़े विस्मित हुए। अब उन परमेश्वरके मनमें सम्पत्तिके लिये तृष्णा नहीं रह गयी। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर उनसे मीठी-मीठी बातें कीं तथा रत्न देकर पूजन करनेके पश्चात् उन्हें घर जानेकी आज्ञा दी। फिर सब कुछ अपने पुत्रको सौंपकर वे भगवान्की शरणमें जानेको उद्यत हो गये। उनका विवेक जाग उठा था; अतः वे शची तथा राजलक्ष्मीको त्यागकर प्रारब्ध-क्षयकी कामना करने लगे। अपने प्राणवल्लभको विवेक एवं वैराग्यसे युक्त हुआ देख शचीका हृदय व्यथित हो उठा। वे शोकसे व्याकुल एवं भयभीत हो गुरुकी शरणमें गयीं। वहाँ सब कुछ निवेदन करके बृहस्पतिजीको बुलाकर इन्द्रको नीतिके सार-तत्त्वका उपदेश कराया। गुरु बृहस्पतिने दाम्पत्य-प्रेमसे युक्त शास्त्र-विशेषकी रचना करके स्वयं प्रेमपूर्वक उन्हें पढ़ाया। बृहस्पतिजीने उस शास्त्र-विशेषका भाव इन्द्रको भलीभाँति समझा दिया। वृन्दावनविनोदिनि! तब इन्द्र पूर्ववत् राज्य करने लगे। सुरेश्वरि! इस प्रकार मैंने इन्द्रके अभिमान-भङ्गका सारा प्रसङ्ग कह सुनाया। पिता नन्दके यज्ञमें जो इन्द्रके दर्पका दलन हुआ था, उसे तो तुमने अपनी आँखों देखा ही था। (अध्याय ४७)
सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा
राधिका बोलीं— भगवन्! आपने इन्द्रके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग मुझसे कहा। अब मैं सूर्यदेवके गर्वगञ्जनकी बात यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— सुन्दरि! सूर्य एक ही बार उदय लेकर फिर अस्त हो गये, परंतु माली और सुमाली नामक दो दैत्यराज सूर्यास्त हो जानेके बाद भी वैसा ही प्रकाश बनाये रखनेके लिये उद्यत हुए। भगवान् शंकरके वरसे महान् ऐश्वर्य पाकर वे दोनों दैत्य मदसे उन्मत्त हो गये थे। उनकी प्रभासे रात्रि नहीं होने पाती थी। (रातके समय भी दिनका-सा प्रकाश छाया रहता था।) यह देख सूर्यदेव रुष्ट हो गये और उन्होंने अपने शूलसे अवहेलनापूर्वक उन दोनों दैत्योंको मारा। सूर्यके शूलसे आहत हो वे दोनों दैत्य मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भक्तोंका विनाश हुआ जान भक्तवत्सल शंकर आये और उन्होंने अपने महान् ज्ञानद्वारा उन दोनोंको जीवन-दान दिया। तब वे दोनों दैत्य भगवान् शिवको
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२३
भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपने घरको चले गये। इधर महादेवजी रोषसे आगबबूला हो उठे और सूर्यको मारनेके लिये दौड़े। संहारकर्ता हर मेरा विनाश करनेके लिये चले आ रहे हैं, यह देख सूर्यदेव भयसे भागते हुए तत्काल ब्रह्माजीकी शरणमें गये। तब महादेवजीने रोषसे शूल उठाकर ब्रह्माजीके भवनपर धावा किया। भगवान् शिव कालके भी काल और विधाताके भी विधाता हैं। उन परमेश्वर हरको रुष्ट हुआ देख लोकनाथ ब्रह्मा चारों मुखोंसे वेदोक्त स्तोत्र पढ़ते हुए उनकी स्तुति करने लगे।
**ब्रह्माजी बोले—**दक्ष-यज्ञ-विनाशक शिव ! सूर्यदेव मेरी शरणमें आये हैं; अतः आप इनपर कृपा कीजिये। जगद्गुरो ! सृष्टिके आरम्भमें आपने ही सूर्यकी सृष्टि की है। महाभाग आशुतोष ! भक्तवत्सल ! प्रसन्न होइये। कृपासिन्धो ! कृपापूर्वक दिन और रातकी रक्षा कीजिये। ब्रह्मस्वरूप भगवन् ! आप जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। क्या स्वयं ही सूर्यका निर्माण करके स्वयं ही इनका संहार करना चाहते हैं? आप स्वयं ही ब्रह्मा, शेषनाग, धर्म, सूर्य और अग्नि हैं। परात्पर परमेश्वर ! चन्द्र और इन्द्र आदि देवता आपसे भयभीत रहते हैं। ऋषि और मुनि आपकी ही आराधना करके तपस्याके धनी हुए हैं। आप ही तप हैं, आप ही तपस्याके फल हैं और आप ही तपस्याओंके फलदाता हैं।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी सूर्यको ले आये और भक्ति तथा प्रीतिके साथ दीनवत्सल शंकरको उन्हें सौंप दिया। भगवान् शिवका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन जगत्-विधाताने सूर्यको आशीर्वाद देकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और बड़े हर्षके साथ अपने धामको प्रस्थान किया।
जो मनुष्य संकटकालमें ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह भयभीत हो तो भयसे और बँधा हो तो बन्धनसे मुक्त हो जाता है। राजद्वारपर, श्मशान-भूमिमें और महासागरमें जहाज टूट जानेपर इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मनुष्य संकटमुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है।
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**तदनन्तर सूर्यदेव ब्रह्माजीको प्रणाम करके प्रसन्न हुए और उनकी आज्ञासे अभिमान छोड़ प्रेमपूर्वक विनयपूर्ण बर्ताव करने लगे। अब अग्निके मानभञ्जनका उपाख्यान सुनो। यह उत्तम प्रसङ्ग पुराणोंमें गोपनीय है और कानोंमें अमृतके समान मधुर प्रतीत होता है। एक समयकी बात है। अग्निदेव सौ ताड़ोंके बराबर ऊँची और भयंकर लपटें उठाकर तीनों लोकोंको भस्म कर डालनेके लिये उद्यत हो गये। महर्षि भृगुने उन्हें शाप दिया था; इसलिये वे क्षोभ और क्रोधसे भरे थे। अपनेको तेजस्वी और दूसरोंको तुच्छ मानकर वे त्रिलोकीको भस्म करना चाहते थे। इसी बीचमें मायासे शिशुरूपधारी जनार्दन भगवान् विष्णु लीलापूर्वक वहाँ आ पहुँचे और सामने खड़े हो अग्निकी उस दाहिका शक्तिको उन्होंने हर लिया। तत्पश्चात् मन्द-मन्द मुस्कराते हुए भक्तिसे मस्तक झुका वे विनयपूर्वक बोले।
**शिशुने कहा—**भगवन् ! आप क्यों रुष्ट हैं ? इसका कारण मुझे बताइये। व्यर्थ ही आप तीनों लोकोंको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए हैं ? भृगुजीने आपको शाप दिया है; अतः आप उनका ही दमन कीजिये। एकके अपराधसे तीनों लोकोंको भस्म कर डालना आपके लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्माजीने इस विश्वकी सृष्टि की है, साक्षात् श्रीहरि इसके पालक हैं और भगवान् रुद्र संहारक। ऐसा ही क्रम है। जगदीश्वर शंकरके रहते हुए आप स्वयं जगत्को भस्म करनेके लिये क्यों उद्यत हुए हैं? पहले जगत्का पालन करनेवाले भगवान् विष्णुको जीतिये। उसके बाद इसका शीघ्रतापूर्वक संहार कीजिये।
( उत्तरार्द्ध )
| ६२४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
ऐसा कहकर ब्राह्मणबालकने सामने पड़े हुए सरकंडेके एक पत्तेको, जो बहुत ही सूखा हुआ था, हाथमें उठा लिया और उसे जलानेके लिये अग्निको दिया। सूखा ईंधन देख अग्निदेव भयानकरूपसे जीभ लपलपाने लगे। उन्होंने अपनी लपटोंमें ब्राह्मणबालकको उसी तरह लपेट लिया, जैसे मेघोंकी घटासे चन्द्रमा छिप जाता है; परंतु उस समय न तो वह सूखा पत्ता जला और न उस शिशुका एक बाल भी बाँका हुआ। यह देख अग्निदेव उस बालकके सामने लज्जासे ठिठक गये। अग्निदेवका दर्प-भङ्ग करके वह शिशु वहीं अन्तर्धान हो गया तथा अग्निदेव अपनी मूर्तिको समेटकर डरे हुएकी भाँति अपने स्थानको चले गये।
इसी तरह राजा अम्बरीषके यहाँ महर्षि दुर्वासाके दर्पका दलन हुआ था। (वह कथा पहले आ चुकी है।)
**राधिका बोलीं—**जगद्गुरो! अब धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा सुनाइये।
**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! राधिकाका यह वचन सुनकर भगवान् मधुसूदन हँसे और उन्होंने उस श्रवणसुखद प्राचीन कथाको सुनाना आरम्भ किया।
(अध्याय ४८—५०)
धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**भगवान् धन्वन्तरि स्वयं महान् पुरुष हैं और साक्षात् नारायणके अंशस्वरूप हैं। पूर्वकालमें जब समुद्रका मन्थन हो रहा था, उस समय महासागरसे उनका प्रादुर्भाव हुआ। वे सम्पूर्ण वेदोंमें निष्णात तथा मन्त्र-तन्त्रविशारद हैं, विनतानन्दन गरुड़के शिष्य और भगवान् शंकरके उपशिष्य हैं। एक दिन वे सहस्रों शिष्योंसे घिरे हुए कैलास पर्वतपर आये। मार्गमें उन्हें भयानक तक्षक दिखायी दिया, जो जीभ लपलपा रहा था। भयानक विषसे भरा हुआ वह पर्वताकार नाग लाखों नागोंसे घिरा हुआ था और धन्वन्तरिको क्रोधपूर्वक काट खानेके लिये आगे बढ़ रहा था। यह देख धन्वन्तरिका शिष्य दम्भी हँसने लगा। उसने भयानक तक्षकको मन्त्रसे जृम्भित करके विषहीन बना दिया और उसके मस्तकमें विद्यमान बहुमूल्य मणिरत्नको हर लिया। इतना ही नहीं, उसने तक्षकको हाथसे घुमाकर दूर फेंक दिया। तक्षक उस मार्गमें मृतककी भाँति निश्चेष्ट पड़ गया। यह देख उसके गणोंने वासुकिके पास जाकर सब समाचार निवेदन किया। उसे सुनकर वासुकि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे। उन्होंने भयानक विषवाले असंख्य सर्पोंको वहाँ भेजा। समस्त सेनापतियोंमें पाँच मुख्य थे—द्रोण, कालिय, कर्कोटक, पुण्डरीक और धनञ्जय। ये सब नाग उस स्थानपर आये, जहाँ धन्वन्तरि विराजमान
४५- इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा—नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६२५
थे। उन असंख्य नागोंको देखकर धन्वन्तरिके शिष्योंको बड़ा भय हुआ। वे सब शिष्य नागोंके निःश्वास-वायुसे मृतक-तुल्य हो गये और निश्चेष्ट तथा ज्ञानशून्य हो पृथ्वीपर पड़ गये। भगवान् धन्वन्तरिने गुरुका स्मरण करते हुए मन्त्रका पाठ और अमृतकी वर्षा करके सब शिष्योंको जीवित कर दिया। उनमें चेतना उत्पन्न करके जगद्गुरु धन्वन्तरिने मन्त्रोंद्वारा भयानक विषवाले सर्पसमूहको जृम्भित कर दिया। फिर तो वे सब-के-सब ऐसे निश्चेष्ट हुए, मानो मर गये हों। उन नागगणोंमें कोई ऐसा भी नहीं रह गया, जो नागराजको समाचार दे सके; परंतु नागराज वासुकि सर्वज्ञ हैं, उन्होंने सर्पोंके उन समस्त संकटको जान लिया और अपनी ज्ञानरूपिणी बहिन जगद्गौरी मनसा (या जरत्कारु)-को बुलाया।
वासुकिने उससे कहा—मनसे! तुम जाओ और अत्यन्त संकटसे नागोंकी रक्षा करो। महाभागे! ऐसा करनेपर तुम्हारी तीनों लोकोंमें पूजा होगी।
वासुकिकी बात सुनकर वह नागकन्या हँस पड़ी और विनीत भावसे खड़ी हो अमृतके समान मधुर वचन बोली।
मनसाने कहा—नागराज ! मेरी बात सुनिये। मैं युद्धके लिये जाऊँगी। शुभ और अशुभ (जीत और हार) तो दैवके हाथमें है; परंतु मैं यथोचित कर्तव्यका पालन करूँगी। समराङ्गणमें लीलापूर्वक उस शत्रुका संहार कर डालूँगी। जिसे मैं मार दूँगी, उसकी रक्षा कौन कर सकता है? मेरे बड़े भाई और गुरु भगवान् शेषने मुझे जगदीश्वर नारायणका परम अद्भुत सिद्ध मन्त्र प्रदान किया है। मैं अपने कण्ठमें 'त्रैलोक्य-मङ्गल' नामक उत्तम कवच धारण करती हूँ; अतः संसारको भस्म करके पुनः उसकी सृष्टि करनेमें समर्थ हूँ। मन्त्रशास्त्रोंमें मैं भगवान् शंकरकी शिष्या हूँ। पूर्वकालमें भगवान् शिवने कृपापूर्वक मुझे महान् ज्ञान दिया था।
ऐसा कहकर श्रीहरि, शिव तथा शेषनागको प्रणाम करके मनमें हर्ष और उत्साह लिये मनसा अन्य नागोंको वहीं छोड़ अकेली ही रोषपूर्वक उस स्थानको गयी। उस समय मनसादेवीकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। वह उस स्थानपर आयी, जहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले धन्वन्तरिदेव विराजमान थे। सुन्दरी मनसाने दृष्टिमात्रसे ही सम्पूर्ण सर्पोंको जीवित कर दिया और अपनी विषपूर्ण दृष्टि डालकर शत्रुके शिष्योंको चेष्टाशून्य बना दिया। भगवान् धन्वन्तरि मन्त्र-शास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने मन्त्रद्वारा शिष्योंको उठानेका यत्न किया, परंतु वे सफल न हो सके। तब मनसादेवीने धन्वन्तरिकी ओर देख हँसकर अहंकारभरी बात कही।
मनसा बोली—सिद्धपुरुष! बताओ तो सही, क्या तुम मन्त्रका अर्थ, मन्त्रशिल्प, मन्त्रभेद और महान् औषधका ज्ञान रखते हो? गरुड़के शिष्य हो न? मैं और गरुड़ दोनों भगवान् शंकरके विख्यात शिष्य हैं और दीर्घकालतक गुरुके पास शिक्षा लेते रहे हैं।
यों कहकर जगदम्बा मनसा सरोवरसे कमल ले आयी और उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके क्रोधपूर्वक धन्वन्तरिकी ओर चलाया। प्रज्वलित अग्निशिखाके समान जलते हुए उस कमल-पुष्पको आते देख धन्वन्तरिने निःश्वासमात्रसे उसको भस्म कर दिया। तत्पश्चात् मन्त्रसे अभिमन्त्रित एक मुट्ठी धूल लेकर उसके द्वारा उन्होंने उस भस्मको भी निष्फल कर दिया। फिर वे अवहेलनापूर्वक हँसने लगे। तब मनसादेवीने ग्रीष्मकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाली शक्ति हाथमें ले ली और उसे मन्त्रसे आवेष्टित करके शत्रुके ओर चला दिया। उस जाज्वल्यमान शक्तिको आते देख धन्वन्तरिने भगवान् विष्णुके दिये हुए शूलसे अनायास ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। शक्तिको भी व्यर्थ हुई देख देवी मनसा
६२६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रोषसे जल उठी। अब उसने कभी व्यर्थ न जानेवाले दुःसह एवं भयंकर नागपाशको हाथमें लिया, जो एक लाख नागोंसे युक्त, सिद्धमन्त्रसे अभिमन्त्रित तथा काल और अन्तकके समान तेजस्वी था। उसने क्रोधपूर्वक उस नागपाशको चलाया। नागपाशको देखकर धन्वन्तरि प्रसन्नतासे मुस्करा उठे; उन्होंने तत्काल गरुड़का स्मरण किया और पक्षिराज गरुड़ वहाँ आ पहुँचे। नागास्त्रको आया देख दीर्घकालके भूखे हुए हरिवाहन गरुड़ने चोंचसे मार-मारकर सब नागोंको अपना आहार बना लिया। प्रिये! नागास्त्रको निष्फल हुआ देख मनसाके नेत्र रोषसे लाल हो उठे। उसने एक मुट्ठी भस्म उठाया, जिसे पूर्वकालमें भगवान् शिवने दिया था। मन्त्रसे पवित्र किये गये उस मुट्ठीभर भस्मको चलाया गया देख गरुड़ने शिष्य धन्वन्तरिको पीछे करके अपने पंखकी हवासे वह सारा भस्म बिखेर दिया। यह देख देवी मनसाको बड़ा क्रोध हुआ। उसने धन्वन्तरिका वध करनेके लिये स्वयं अमोघ शूल हाथमें लिया। उस शूलको भी भगवान् शिवने ही दिया था। उससे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभा फैल रही थी। वह अमोघ शूल तीनों लोकोंमें प्रलयाग्निके समान प्रकाशित होता था। इसी समय ब्रह्मा और शिव धन्वन्तरिकी रक्षा तथा गरुड़के सम्मानके लिये उस समराङ्गणमें आये। भगवान् शम्भु तथा जगदीश्वर ब्रह्माको उपस्थित देख मनसाने भक्तिभावसे उन दोनोंको नमस्कार किया। उस समय भी वह निःशङ्क-भावसे शूल धारण किये रही। धन्वन्तरि तथा गरुड़ने भी उन दोनों देवेश्वरोंको मस्तक झुकाया और बड़ी भक्तिसे उनकी स्तुति की। उन दोनोंने भी इन दोनोंको आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् लोकहितकी कामनासे मनसादेवीकी पूजाका प्रचार करनेके लिये ब्रह्माजीने धन्वन्तरिसे मधुर एवं हितकर वचन कहा।
ब्रह्माजी बोले— सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् महाभाग धन्वन्तरे! मनसादेवीके साथ तुम्हारा युद्ध हो, यह मुझे उचित नहीं जान पड़ता। इसके साथ तुम्हारी कोई समता ही नहीं है। यह देवेश्वरी मनसा शिवके दिये हुए अमोघ शूलसे तीनों लोकोंको जलाकर भस्म करनेकी शक्ति रखती है। कौथुम-शाखामें वर्णित ध्यानके अनुसार मनसादेवीका भक्तिभावसे ध्यान करके एकाग्रचित्त हो षोडशोपचार अर्पित करते हुए इसकी पूजा करो। फिर आस्तीकमुनिद्वारा किये गये स्तोत्रसे तुम्हें इसकी स्तुति करनी चाहिये। इससे संतुष्ट हो मनसादेवी तुम्हें वर प्रदान करेगी।
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर शिवजीने भी उसका अनुमोदन किया। फिर गरुड़ने प्रेमसे प्रयत्नपूर्वक उन्हें समझाया। इन सबकी बात सुनकर स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र और आभूषण धारण करके धन्वन्तरि ब्रह्माजीको पुरोहित बना मनसाकी पूजा करनेको उद्यत हुए।
धन्वन्तरि बोले— जगद्गौरी मनसे! यहाँ आओ और मेरी पूजा ग्रहण करो। कश्यपनन्दिनि! पहलेसे ही तीनों लोकोंमें तुम्हारी पूजा होती आयी है। देवि! तुम विष्णुस्वरूपा हो। तुमने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया है; इसीलिये रणभूमिमें अस्त्र-प्रयोग नहीं किया है।
ऐसा कहकर संयत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथमें श्वेत पुष्प ले वे ध्यान करनेको उद्यत हुए।
ध्यान
मनसादेवीकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके समान गौर है। उनके सभी अङ्ग मनको मोह लेनेवाले हैं। प्रसन्नमुखपर मन्द हासकी छटा छा रही है। महीन वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। परम सुन्दर केशोंकी वेणी अद्भुत शोभासे सम्पन्न है। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। सबको अभय देनेवाली वे देवी भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर देखी जाती हैं। सम्पूर्ण विद्याओंकी देनेवाली, शान्तस्वरूपा, सर्वविद्याविशारदा,
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२७
नागेन्द्रवाहना और नागोंकी स्वामिनी हैं; उन परा देवी मनसाका मैं भजन करता हूँ।
प्रिये! इस प्रकार ध्यानकर पुष्प दे नाना द्रव्योंसे युक्त षोडशोपचार चढ़ाकर धन्वन्तरिने उनका पूजन किया। तत्पश्चात् पुलकित-शरीर हो भक्तिसे मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़ उन्होंने यत्नपूर्वक मनसादेवीकी स्तुति की।
धन्वन्तरि बोले—सिद्धस्वरूपा मनसादेवीको नमस्कार है। उन सिद्धिदायिनी देवीको बारंबार मेरा प्रणाम है। वरदायिनी कश्यपकन्याको नमस्कार, नमस्कार और पुनः नमस्कार। कल्याणकारिणी शंकरकन्याको बारंबार नमस्कार। तुम नागोंपर सवार होनेवाली नागेश्वरी हो। तुम्हें नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार। तुम आस्तीककी माता और जगज्जननी हो; तुम्हें मेरा नमस्कार है। जगत्की कारणभूता जरत्कारुको नमस्कार है। जरत्कारु मुनिकी पत्नीको नमस्कार है। नागभगिनीको नमस्कार है। योगिनीको बारंबार नमस्कार है। चिरकालतक तपस्या करनेवाली सुखदायिनी मनसादेवीको बारंबार नमस्कार है। तपस्यारूपा देवीको नमस्कार है। फलदायिनी मनसादेवीको नमस्कार है। साध्वी, सुशीला एवं शान्तस्वरूपा देवीको बारंबार नमस्कार है।
ऐसा कहकर धन्वन्तरिने भक्तिभावसे यत्नपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। उस स्तुतिसे संतुष्ट हुई देवी मनसा धन्वन्तरिको वर देकर शीघ्र ही अपने घरको चली गयीं। ब्रह्मा, रुद्र और गरुड़ भी अपने-अपने धामको चले गये। भगवान् धन्वन्तरि भी अपने भवनको पधारे। फणोंसे सुशोभित नागगण प्रसन्नतापूर्वक पातालको चले गये। प्रिये! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण स्तवराज तुमसे कहा है। आस्तीकने विधिपूर्वक माताकी भक्ति की। इससे वह जगद्गौरी अपने पुत्र मुनिवर आस्तीकपर बहुत संतुष्ट हुईं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है; उसके वंशजोंको नागोंसे भय नहीं होता, इसमें संशय नहीं है।
(अध्याय ५१)
श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय
श्रीकृष्णने कहा—प्रिये! मैंने छोटे-बड़े सभी लोगोंके दर्प-भङ्गकी कहानी कही और तुमने सुनी। इसमें संदेह नहीं कि उन सबका अभिमान भङ्ग किया ही गया था। अब उठो और वृन्दावनमें चलो। सुन्दरि ! अब मैं विरहसे पीड़ित हुई गोपिकाओंको शीघ्र देखना चाहता हूँ।
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! श्यामसुन्दरकी यह बात सुनकर मानिनी रसिकेश्वरी राधाने उनसे कहा—'प्राणेश्वर ! मैं चलनेमें असमर्थ हो गयी हूँ; अतः तुम्हीं मुझे ले चलो।' राधाकी यह बात सुन मधुसूदन हँसकर बोले—'तब मुझपर ही सवार हो जाओ।' ऐसा कह वे तत्काल अदृश्य हो गये। राधा मनकी गतिसे चलनेवाली थीं। वे क्षणभर वहाँ रोती रहीं; फिर इधर-उधर श्यामसुन्दरको ढूँढ़ती हुई वृन्दावनमें जा पहुँचीं। शोकसे कातर हुई राधाने रोते-रोते चन्दनवनमें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने शोकाकुल गोपियोंको देखा, जो भयसे विह्वल थीं। उनके मुँह लाल हो गये थे।
६२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण आँखें इधर-उधर घूमती थीं। वे सम्पूर्ण वनमें भ्रमण करतीं और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती हुई बिना खाये-पीये रह रही थीं। उनके मनमें बड़ा रोष था। प्रेमविच्छेदसे कातर राधिकाने उन सबको देखकर उनसे मलयवनमें भ्रमण आदिका अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वे उन सबके साथ रोदन करने लगीं। विरहसे आतुर हो 'हा नाथ ! हा नाथ !' का उच्चारण करके बारंबार विलाप करती हुई सब गोपियाँ कुपित हो अपने शरीरका त्याग कर देनेको उद्यत हो गयीं। इसी समय वहाँ चन्दनवनमें पधारकर श्रीकृष्णने राधा तथा गोपियोंको दर्शन दिये। प्राणेश्वरको आया देख गोपाङ्गनाओंसहित राधा आनन्दसे मुस्करायीं और पुलकित-शरीर हो उनकी ओर दौड़ीं। पास जाकर वे सब गोपाङ्गनाएँ प्रेमसे विह्नल हो रोने लगीं। फिर उन सबने श्रीकृष्णसे विरहजनित अपने सारे दुःखको निवेदन किया। दिन-रात स्नान और खाना-पीना छोड़कर वन-वनमें निरन्तर भटकते रहना तथा अन्तमें शरीरको त्याग देनेका विचार करना आदि सब बातें बताकर उन सबने क्षणभर उन्हें बहुत फटकारा। फिर वे एक क्षणतक प्रसन्नतासे उनके गुण गाती रहीं। इसके बाद कुछ देर उन्हें आभूषण पहनाती तथा चन्दन लगाती रहीं। कोई-कोई गोपियाँ बोलीं- 'अरी सखि ! देखो, श्यामसुन्दर हमारे प्राणोंके चोर हैं। इनकी निरन्तर रखवाली करो। ये कहीं जाने न पावें।' यह सुनकर दूसरी बोल उठी- 'नहीं सखी ! अब ये फिर ऐसा अपराध कभी नहीं करेंगे।' कोई कहने लगी- 'अरी सखियो ! इन्हें शीघ्र ही चारों ओरसे घेरकर बीचमें कर लो।' दूसरी बोली- 'नहीं, नहीं सखी ! इन्हें प्रेमपाशसे बाँधकर हृदय-मन्दिरमें कैद कर लो।' कोई बोली- 'ये पुरुष हैं; इनपर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता।' अन्य बोल उठी- 'इन चित्तचोरकी यत्नपूर्वक देखभाल करो।' कोई-कोई कुपित होकर कहने लगीं- 'ये निष्ठुर हैं, नरघाती हैं।' कोई बोली- 'अब फिर इनसे बात न करो।' तदनन्तर जो-जो रमणीय और निर्जन वन थे, उन सबमें गोपियाँ श्रीकृष्णके साथ कौतूहलपूर्वक घूमती रहीं। इस तरह उन परमेश्वरको बीचमें करके वे सब गोपियाँ दूसरे वनमें गयीं, जहाँ सुरम्य रासमण्डल विद्यमान था। रासमण्डलमें जाकर रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वर्णसिंहासनपर विराजमान हुए। जैसे रातके समय आकाशमें तारागणोंके साथ चन्द्रमा शोभा पाते हैं; उसी प्रकार वे गोपियोंके साथ सुशोभित हो रहे थे। जनार्दनने अपनी अनेक मूर्तियाँ प्रकट करके गोपियोंके साथ पुनः रासक्रीड़ा की। नारदजीने पूछा- भक्तजनोंके प्रियतम नारायण ! विद्वान् पुरुष पहले 'राधा' शब्दका उच्चारण करके पीछे 'कृष्ण' का नाम लेते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझ भक्तको बताइये। श्रीनारायण बोले- नारद ! इसके तीन कारण हैं; बताता हूँ, सुनो ! प्रकृति जगत्की माता हैं और पुरुष जगत्के पिता। त्रिभुवनजननी प्रकृतिका गौरव पितृस्वरूप पुरुषकी अपेक्षा सौगुना अधिक है। श्रुतिमें 'राधाकृष्ण', 'गौरीशंकर' इत्यादि शब्द ही सुना गया है। 'कृष्ण-राधा' 'शंकर-गौरी' इत्यादिका प्रयोग कभी लोकमें भी नहीं सुना गया है। 'हे रोहिणीचन्द्र ! प्रसन्न होइये और इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये। संज्ञासहित सूर्यदेव ! मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको स्वीकार कीजिये। कमलाकान्त ! प्रसन्न होइये और मेरी पूजा ग्रहण कीजिये।' इत्यादि मन्त्र सामवेदकी