गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१४६- वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा
काण्ड ] कृमि-निदान २९१
कृमि-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! बाह्य और आभ्यन्तर भेदके कारण कृमियोंके दो प्रकार हैं। उनमें बाह्यगत जो कृमि (कीड़े) होते हैं, उनका जन्म बाहरी मल, कफ, रक्त और विष्ठासे होता है। जन्मगत भेदके कारण उनके चार भेद हो जाते हैं, किंतु नाम-भेदसे कृमियोंके बीस प्रकार माने गये हैं। बाह्य कृमि बाह्य मलसे उत्पन्न होते हैं। इनका परिमाण, आकार और वर्ण तिलके समान होता है। इनका निवास प्राणियोंकी केशराशि तथा उनके वस्त्रोंमें होता है। अनेक पैरोंवाले उन कृमियोंकी आकृति सूक्ष्म होती है। नामतः उन्हें जूँ और लीख कहा जाता है। इन दोनों प्रकारवाले कृमियोंके द्वारा प्राणियोंके बाह्य शरीरपर कोष्ठ (चकत्ते), पिडिका (फुंसी), कण्डू (खुजली) तथा गण्ड (गाँठ)नामक रोग कहे जाते हैं।
कुष्ठरोगका एकमात्र कारण शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें उत्पन्न होनेवाला श्लेष्मज कृमि है। यह प्राणीके बाह्य श्लेष्ममें भी उत्पन्न हो सकता है। मधुर अन्न, गुड़, दूध, दही, मछली और नये चावलका भात खानेसे प्राणीके आभ्यन्तरिक भागमें कफ उत्पन्न होता है, उसी कफसे उत्पन्न होकर कृमिवर्ग आमाशयमें पहुँच जाता है। उसीमें इस कृमिवर्गकी अभिवृद्धि होती है और उसीसे निकलकर शरीरमें यह सब ओर फैल जाता है। उनमें कुछ चमड़ेकी मोटी ताँतके समान, कुछ केंचुएके सदृश, कुछ धान्याङ्कुरके समान छोटे-बड़े और कुछ अणुकी भाँति होते हैं। इनका वर्ण श्वेत तथा ताँबे-जैसा होता है। नामतः इन कृमियोंके सात प्रकार हैं—अन्नाद, उदरावेष्ट, हृदयाद, महागुद, च्युरव, दर्भकुसुम और सुगन्ध।
इन कृमियोंके उत्पन्न होनेसे प्राणीके हल्लास, मुखस्राव (लार), अपच, अरुचि, मूर्च्छा, वमन, ज्वर, आनाह, कृशता, शोथ तथा पीनस नामक रोगोंकी उत्पत्ति होती है।
रक्तवाही शिराओंमें स्थित रक्तसे उत्पन्न होनेवाले कृमि अणुरूप, पादविहीन, वृत्ताकार और ताम्रवर्णके होते हैं। अपनी सूक्ष्मताके कारण उनमेंसे कुछ कृमि तो दृष्टिगोचर ही नहीं होते। इनके केशाद, रोमविध्वंस, रोमद्वीप, उदुम्बर, सौरस तथा मातर—ये छः भेद हैं। इन सभी कृमियोंका एकमात्र कार्य कुष्ठरोग उत्पन्न करना है।
पक्वाशयमें गुदा-भागसे बाहर निकलनेवाले विष्ठाजन्य कृमियोंका उद्भव होता है। वहींपर बढ़कर जब ये आमाशयकी ओर उन्मुख होते हैं, तब प्राणियोंके डकार और श्वासमें विष्ठा-सदृश दुर्गन्ध आती है। वे कृमि लम्बे, गोल, छोटे और मोटे होते हैं। उनका वर्ण श्याम, पीत, श्वेत और कृष्ण होता है। उन कृमियोंके ककेरुक, मकेरुक, सौसुराद, शूलाख्य तथा लेलिह—ये पाँच नामभेद हैं। जब ये प्रकुपित हो उठते हैं तो प्राणीके शरीरमें मलभेद, शूल, विष्टम्भ, कृशता, कर्कशता, पाण्डुता, रोमाञ्च, मन्दाग्नि और पाण्डु तथा गुदामें खुजलाहट का दोष उत्पन्न हो जाता है।
(अध्याय १६५)
१-वा० नि० अ० १४। २-सु० उ० तं० अ० ५४ ।
३०० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
वातव्याधि-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपको वातव्याधिका निदान सुना रहा हूँ, उसे आप सुनें।
शरीरमें विशेष रूपसे सर्वथा अनर्थ और विघ्नोंका एकमात्र कारण न दिखायी देनेवाला दुष्ट (प्रकुपित) पवन ही है। वह वायु ही विश्वकर्मा, विश्वात्मा, विश्वरूप, प्रजापति, स्रष्टा, धाता, विभु, विष्णु, संहर्ता, मृत्यु और अन्तक-रूप है। इसलिये उस वायुको सम रखनेके लिये विशेष रूपसे प्रयत्न करना चाहिये।
उस वातबाधित शरीरसे सम्बद्ध, कहे गये दोष-विज्ञानमें कर्म दो प्रकारका माना गया है। उनमें एक है प्राकृत कर्म और दूसरा है वैकृत कर्म। संक्षेपमें प्रतिपादित दोष-भेदोंका विचार करके प्रत्येक कर्मके पाँच-पाँच दोष सिद्ध किये गये हैं। इनमें वैकृत कर्म-दोष प्राकृतकी अपेक्षा शक्तिशाली और गतिमान् होता है। अब यहाँ यथाविभाग लक्षणसहित उसके निदानको कहा जा रहा है।
शरीरकी धातुओंको क्षीण करनेवाले द्रव्य-पदार्थोंके उपभोग तथा आचार-विचारसे क्रुद्ध वायु अत्यधिक समरूपमें प्रवहमान नहीं रहता। वह रस आदिके चारों स्रोतोंसे प्रवाहित होकर पुनः उनमें तज्जनित दोषोंको परिपूर्ण कर देता है। उसके बाद उन दोषपूर्ण स्रोतोंसे निकलकर वह संक्षुब्ध वायु उसके मुखको विधिवत् आच्छादित करके रोगीके शरीरमें शूल, आनाह, आन्त्रकूजन, मलावरोध, स्वरभंग, दृष्टिभेद, पीठ तथा कटि-प्रदेशमें पीड़ादायक उपद्रवोंको जन्म देता है। उसीके प्रभावसे रोगीके शरीरमें अन्य ऐसे उपद्रवोंका जन्म होता है, जो कष्टसाध्य हैं।
आमाशयमें वात-दोष होनेपर वमन, श्वास, खाँसी, विषूचिका, कण्ठावरोध तथा नाभिके ऊपरके भागमें अनेक व्याधियोंका जन्म होता है। कुपित वायु नेत्र-कान आदि इन्द्रियोंमें विघ्न तथा त्वचा-भागमें प्रविष्ट होकर पककर फूटनेवाले फोड़े और रूक्षताका कारण बन जाती है। रक्तमें वायुके प्रविष्ट होनेसे रोगीको अत्यन्त कष्टदायक पीड़ा होती है, श्वास तथा गलेमें जलन और स्वरभेदका रोग होता है। आँतके मध्य प्रदूषित वायुके पहुँचनेपर विष्टम्भ, अरुचि, कृशता और भ्रमके रोगोंकी उत्पत्ति होती है। मांस और मेदामें प्रकुपित हुआ वायु शरीरमें ग्रन्थि, कर्कशता, भारीपन, लाठी एवं मुष्टि-प्रहारसे होनेवाली पीड़ाके समान पीड़ा उत्पन्नकर रोगीको अत्यधिक कष्ट देता है। अस्थियोंमें प्रविष्ट हुए संक्षुब्ध वायुसे सक्थि तथा संधि-स्थानोंमें रहनेवाली अस्थियोंके अन्तर्गत तीव्र शूल उठनेसे रोगीको कष्ट होता है।
मज्जागत कुपित वायु रोगीकी अस्थियोंमें क्षरण एवं अनिद्रा उत्पन्न करता है, जिससे रोगीको पीड़ा होती है। शुक्रगत कुपित वायु वीर्य और गर्भका शीघ्र पतन करता है अथवा वह विकृत हो जाता है। शिरागत वायु सिरमें पीड़ा और रिक्तताका अनुभव कराता है। स्नायु-स्थित क्रुद्ध वायु रोगीके शरीरमें शोथ उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण उसको अधिक कष्ट होता है।
शरीरके संधि-स्थानोंमें प्रवहमान प्रकुपित वायुके कारण रोगी जलसे परिपूर्ण दृति (गलगण्ड), स्पर्श तथा शुष्कताके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है। शरीरके समस्त अङ्गोंमें कुपित वायुके प्रविष्ट हो जानेपर पीड़ा, टूटन और स्फुरणका दोष होता है। स्वप्नावस्थामें विकार होनेसे वायु-स्तम्भन, आक्षेपण, संधिभंग तथा कम्पनका दोष प्राणीके शरीरमें उत्पन्न कर
काण्ड ] वातव्याधि-निदान ३०१
देता है। जब क्रुद्ध वायु शरीरकी सम्पूर्ण धमनियोंमें बारम्बार प्रवाहित होने लगता है तो उस समय शरीरके अङ्ग विक्षिप्त हो उठते हैं। इस व्याधिको आक्षेपण नामसे कहा गया है।
जब नीचेसे ताड़ित वायु कुपित होकर ऊपर चढ़ता है और फिर ऊर्ध्वभागकी ओर प्रवाहित होने लगता है, तब वह रोगीके हृदयको पीड़ितकर सिर और मस्तककी अस्थिमें पीड़ा उत्पन्न कर देता है। वह चारों ओरसे शरीरपर प्रहार करता है, जिससे शरीर विक्षिप्त हो उठता है। वह हनु और मुखकी शक्तिको भी क्षीण करके रोगीको व्यथित करनेका प्रयास करता है। रोगी बड़े ही कष्टसे श्वास लेता और उसका परित्याग करता है। उसके दोनों नेत्र बंद होने लगते हैं। कण्ठसे कबूतरके समान ध्वनि होने लगती है और रोगी ज्ञानशून्य होने लगता है। चिकित्सा-क्षेत्रमें इसका नाम अपतन्त्रक रोग है। हृदयमें स्थित दोषपूर्ण वायुके द्वारा प्रेरित वह रोग जब रोगीकी वाम नासिकाके छिद्रमें जाकर आश्रय लेता है, तब उसके कारण रोगी बार-बार स्वस्थता और बार-बार अस्वस्थताका अनुभव करता है।
अभिघातजन्य वातव्याधि (अपतानक रोग) अत्यन्त दुश्चिकित्स्य है।
जब कुपित वायु ग्रीवा और पार्श्वमें स्थित मन्या नामवाली दोनों शिराओंको जकड़कर और सम्पूर्ण धमनियोंका आश्रय लेकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाती है, जिससे गर्दन तथा कक्षकी संधियाँ टेढ़ी पड़ जाती हैं और शरीर भीतरकी ओर धनुषकी तरह झुक जाता है, रोगीके नेत्र स्तम्भित हो जाते हैं, वह जँभाई लेने लगता है, दाँतोंको चबाने लगता है, कफयुक्त वमन करता है, दोनों पसलियोंमें वेदना होती है, वाणी रुक जाती है तथा हनु, पृष्ठ और मस्तक जकड़ जाते हैं, तब इसको अन्तरायाम वातरोग कहते हैं।
बहिरायाम रोगमें शरीर बाहरकी ओर धनुषके सदृश झुक जाता है। वक्षःस्थल ऊँचा हो जाता है और सिर तथा कंधा पीछेकी ओर झुक जाता है। दाँतों तथा मुखका रंग बदल जाता है, पसीना अधिक आता है, शरीर शिथिल हो जाता है। इस वातव्याधिको बाह्यायाम या धनुस्तम्भ कहा जाता है।
रोगीके मल, मूत्र और रक्तमें प्रविष्ट हुआ वात-दोष सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर शरीरमें अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न करता है। इस रोगको व्रणायाम कहते हैं। जिस व्रणायाम रोगमें रोगीको अत्यन्त तृषा हो और उसका शरीर पीला पड़ गया हो, वह असाध्य होनेसे वर्जित है। सभी प्रकारके आक्षेपक रोगोंमें वायुका वेग शान्त हो जानेपर रोगी स्वस्थ हो जाता है।
जिह्वाको* अत्यधिक रगड़ने और उष्ण भोजन करनेसे हनु अर्थात् ठोड़ीमें स्थित वायु कुपित होकर हनुभागमें स्तम्भन-दोष उत्पन्न करके मुखको खोल देता है अथवा बंद कर देता है। इसीको वातव्याधिमें हनुस्तम्भ-व्याधि कहते हैं। इसके कारण रोगीको खाने-चबाने तथा बोलनेमें अधिक कठिनाई होती है।
कुपित वायु वाग्वाहिनी शिरामें स्थित होकर जिह्वाको स्तम्भित कर देता है। यह जिह्वास्तम्भ नामक वातव्याधिका भेद माना गया है। इसके दुष्प्रभावसे रोगीके मुखमें खाने-पीने तथा बोलने-चालनेकी सामर्थ्य नहीं रह जाती। सिरके द्वारा भार ढोने, अत्यन्त हँसने और बोलने, ऊबड़-खाबड़ स्थानपर सोने तथा कठोर पदार्थोंके चबानेसे वायु विकारयुक्त होकर शरीरमें बढ़ता है और ऊर्ध्वभागमें पहुँचकर आश्रित हो जाता है। इससे रोगीका मुख
* सु०शा०अ० ९।
३०२ संक्षिप्त गरुड़पुराण [ आचार-
टेढ़ा हो जाता है। वह ऊँचे स्वरमें अट्टहास करता है तथा किसी ओर अपने नेत्रोंको एकटक लगाकर ध्यानमग्न होकर देखता है। उसके बाद उसी दोषसे रोगीकी वाक्शक्ति शिथिल पड़ जाती है, नेत्रोंमें स्तब्धता छा जाती है, दाँत किटकिटाते हैं, स्वरभंग हो जाता है, बहरापन तथा अन्धत्वका दोष आ जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त गन्धकी अज्ञानता, स्मृतिध्वंस, भय, श्वास, थूक, पार्श्वभेद, एक नेत्रकी शक्तिका ह्रास, दाढ़के ऊर्ध्वभागमें, शरीरके आधे भागमें या नीचेके भागमें प्रबल वेदना होती है। कुछ लोग इसे अर्दित और कुछ एकाङ्गदोष कहते हैं।
जब प्रकुपित वायु रक्तका आश्रय लेकर मूर्धमें स्थित शिराओंको रूक्ष, शूलयुक्त और कृष्णवर्णका कर देता है, तब उसे शिरोग्रह दोष कहते हैं और यह असाध्य है।
जब प्रकुपित वायु शरीरको अपने अधिकारमें करके उसमें निहित शिराओं तथा स्नायु-तन्त्रिकाओंको अपने अधिकारमें कर लेता है और उनमें अवरोध उत्पन्न करके वह रोगीके शरीरके एक पक्ष अथवा अन्य किसी विशेष भागपर प्रहार करता है, जिससे वह भाग चेतना-शून्य अथवा अकर्मण्य हो जाता है, तब उस दोषको लोग पक्षाघात कहते हैं। कुछ लोगोंने तो उसको एकाङ्ग या अर्धाङ्ग रोग और कुछ अन्य लोगोंने कक्षव्याधिके नामसे स्वीकार किया है। परंतु सम्पूर्ण शरीरमें प्रकुपित वायुका आश्रय होनेपर सर्वाङ्गरोध (सर्वाङ्ग-पक्षाघात) और जकड़न नामक रोग होता है।
जो पक्षाघातरोग केवल वातके कारण होता है, वह अत्यन्त कष्ट-साध्य है। जब वह वातरोग पित्तादि अन्य दोषोंके संयोगसे होता है, तब कष्ट- साध्य तथा जो वातरोग धातुओंके क्षय हो जानेसे होता है, वह असाध्य होनेसे वर्ज्य है।
कफसे युक्त वात जब आमाशयमें अवरुद्ध हो जाता है, तब उस समय रोगीके शरीरको वह जकड़ देता है। उसके कारण रोगीका शरीर डंडेके समान सीधा हो जाता है। इसीलिये इसको दण्डापतानक कहा जाता है। यह सम्पूर्ण दोषोंसे समन्वित होनेपर निश्चित ही असाध्य बन जाता है।
स्कन्ध-प्रदेशके मूलभागसे उठा हुआ प्रकुपित वायु उसकी शिराओंको संकुचित करके बाहुओंकी स्पन्दन-शक्तिको नष्ट कर देता है, उसे अवबाहुक रोग कहते हैं। भुजाओंके पृष्ठभागसे होकर प्रत्येक अँगुलीके तलप्रदेशतक जो एक मोटी नाड़ी जाती है, उसका नाम कण्डरा है। उसमें कुपित हुआ वात उसके कर्म-सामर्थ्यको समाप्त कर देता है, उसको विषूची कहा जाता है। रोगीके कटिप्रदेशमें रहनेवाला वायु जब जंघाप्रदेशतक जाता है, तो अपनी उस मोटी कण्डरा नाड़ीको आक्षिप्त कर देता है अर्थात् उसे जकड़ लेता है, इससे रोगी खञ्ज (लँगड़ा) हो जाता है। जब दोनों जंघाओंकी नसोंको जकड़कर दोनों पैरोंकी कण्डराएँ आक्षिप्त हो उठती हैं, तब उस रोगको पङ्गु कहा जाता है। जब रोगी चलनेमें काँपने लगता है और खञ्जन पक्षीकी भाँति लँगड़ाते हुए चलता है, उसके संधि-बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं तो उस दोषको कलायखञ्ज नामक रोग मानना चाहिये।
जीर्ण या अजीर्ण-अवस्थामें शीतल, उष्ण, द्रव-पदार्थ, शुष्क, गुरु, स्निग्ध भोज्य-पदार्थका सेवन, अधिक परिश्रम, संक्षोभ, शैथिल्य तथा अधिक जागरण करनेसे वात-कफयुक्त मेद अत्यधिक मात्रामें संचित होकर पित्तका पराभव करके शरीरको परिव्याप्त कर लेता है।
अन्तःश्लेष्मके द्वारा जंघाप्रदेशकी हड्डियोंके दोष-समन्वित होनेपर स्तम्भन-रोग उन्हें ग्रसित करता है। उस समय शीत-वात-दोषके प्रभावसे
१४७- पदार्थोंके गुण-दोष और औषधि-सेवनमें अनुपानका महत्त्व
काण्ड ] वातरक्त-निदान ३०३
जंघाओंकी हड्डी शिथिल पड़ जाती है। उस दोषके प्रभावके कारण रोगीका वह अङ्ग श्यामवर्णका हो जाता है। उसमें जड़ता आ जाती है। रोगी तन्द्रा, मूर्च्छा, अरुचि और ज्वरके उपद्रवोंसे ग्रस्त हो उठता है। इस रोगको ऊरुस्तम्भ कहते हैं। दूसरे लोग इसको बाह्यवात भी कहते हैं।
वायु और रक्त दोनोंके कुपित होनेसे जानुमें (घुटनोंके मध्य) जो शोथ उत्पन्न होता है, वह महाभयंकर पीड़ादायक रोग है। इसमें शोथ सियारके सिरके समान स्थूल माना गया है, इसलिये इसको क्रोष्टुकशीर्षके नामसे कहा जाता है। जब ऊँचे-नीचे पीड़ादायक विषम स्थानपर पैर रखनेसे अथवा अत्यन्त परिश्रमसे वायु कुपित होकर गुल्फ (टखने)-में आश्रित हो जाता है, तो उसे वातकण्टक रोग कहा जाता है।
जब पार्ष्णि-भागके सम्मुख अँगुलीकी शिराओंको प्रकुपित वायु पीड़ा उत्पन्न करते हुए पाँवोंकी गमनशक्ति नष्ट कर देती है, तब उसे गृध्रसी रोग कहते हैं। कफ और वायुके प्रकुपित होनेसे जब दोनों पैर झुनझुनाने लगते हैं और सुन्न भी हो जाते हैं, तब उस दोषको पादहर्ष कहा गया है। पित्त तथा रक्तसे संश्रित वात प्राणीके दोनों पैरोंमें दाह उत्पन्न कर देता है, विशेष रूपसे वैसी अवस्था अधिक चलनेसे ही आती है। वात-दोषमें इस दोषभेदको पाददाह नामसे सम्बोधित किया गया है।
(अध्याय १६६)
वातरक्त-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपसे वातरक्त-निदान बतलाऊँगा, उसे सुनें।
प्रायः स्वास्थ्य-विरुद्ध भोजन तथा क्रोध करनेवाले, दिनमें सोने और रात्रिमें जागरण करनेवाले तथा सुकुमार एवं मिथ्या आहार-विहार करनेवाले, स्थूल शरीरवाले और सुखीजनोँका रक्त वृद्धवातसे प्रकुपित हो जाता है। चोट लगनेसे अथवा वमन एवं विरेचन आदिद्वारा शुद्ध न होनेवाले मनुष्योंका रक्त दूषित हो जाता है। वात-दोष पैदा करनेवाले एवं शीतल पदार्थोंके सेवनसे वायु-वृद्धि होती है, वह क्रुद्ध होकर विमार्गगामी हो जाता है। इस प्रकारसे प्रवहमान वह वायु रक्त-स्रोतोंसे अवरुद्ध होकर पहले रक्तको ही दूषित करता है। तदनन्तर मांसादिक अन्य धातुओंको भी दूषित करता है। पहले गुदाभागको पीड़ितकर बादमें यह सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। इस वात-दूषित रक्तको वातरक्त कहा जाता है। विशेष रूपसे यह दोष वमनादि उपद्रवों तथा पाँव लटकाकर बैठनेवाली सवारी आदिसे होता है।
कुष्ठरोगके जो पूर्वरूप होते हैं, प्रायः वे ही वातरक्त-रोगके भी होते हैं। इस रोगके होनेपर घुटना, जंघा, ऊरु, कटि, स्कन्ध, हाथ, पैर और संधि-स्थानोंमें खुजली, स्फुरण, सूचिकाभेद, गुरुता और इन्द्रियसुप्तताके दोष होते हैं। ये दोष बार-बार उत्पन्न होकर शान्त हो जाते हैं और पुनः उभर भी जाते हैं।
कभी दोनों पैरोंके मूलभागमें आश्रय लेकर अथवा कभी दोनों हाथोंके मूलमें स्थित होकर, यह कुपित वातरक्त-दोष प्राणीके सम्पूर्ण शरीरको वैसे ही परिव्याप्त कर लेता है, जैसे चूहेका विष कुपित होकर धीरे-धीरे पूरे शरीरमें व्याप्त हो जाता है। वह वातरक्त सर्वप्रथम रोगीके चर्म-
१-सु०नि०अ० १; वा० नि० १५; च०चि० २८। २-च०चि० २९; सु० चि० १; अ०स० नि०अ० १६।
| ३०४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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भागपर उत्पन्न होकर मांस-भागमें आश्रय ग्रहण करता है। उसके बाद सभी धातुओंको आश्रय बना लेता है। इसे गम्भीर नामक वातरक्त कहते हैं। उत्तान वातरोगमें रोगीके कटि आदि स्थानोंका चर्म, ताम्र या श्यामवर्णका हो जाता है। वहाँपर शोथ तथा ग्रथित पाक उत्पन्न होता है। वह प्रकुपित वायु रोगीकी हड्डियों और मज्जा-भागमें जाकर वहाँ आश्रय लेकर छेदनेके समान पीड़ा करता हुआ चक्रके समान घूमता हुआ शरीरके अङ्गोंको टेढ़ा-मेढ़ा कर देता है। तदनन्तर सब ओरसे शरीरमें प्रवहमान वह वायु अन्तमें रोगीको खञ्ज अथवा लँगड़ा बना देता है।
शरीरमें वाताधिक्य वातरक्त-रोग होनेपर अत्यधिक शूल, फड़कन तथा टूटन-भरी पीड़ाकी अनुभूति होती है। उभरे हुए शोथमें रूक्षता, कृष्ण या श्यामवर्णता आ जाती है। इसमें शोथ कभी बढ़ जाता है और कभी घट जाता है। रोगीकी धमनियों और अँगुलियोंके संधि-स्थानोंमें संकुचन, अङ्गग्रह तथा अत्यन्त वेदनाजन्य कष्ट होता है। इसमें शीतल पदार्थोंसे अरुचि एवं उसके सेवनसे वृद्धि, स्तम्भन, कम्पन और इन्द्रियशून्यताके दोष भी आ जाते हैं।
रक्ताधिक वातरक्त-रोगमें शोथ अत्यन्त पीड़ासे युक्त होता है। इसमें सूचिका-भेदजन्य पीड़ा भी होती है। इसका वर्ण ताँबेके समान होता है। यह चुनचुनाता भी रहता है। इसमें ललाई रहती है तथा खुजली और क्लेद होता है। स्निग्ध पदार्थ लगानेसे या उसे रूक्ष रखनेसे शान्ति नहीं मिलती।
पित्ताधिक वातरक्तमें अत्यन्त दाह, सम्मोह, स्वेद, मूर्च्छा, मद, तृष्णा, स्पर्श, असहत्व, अत्यधिक पीड़ा, शोथ, पककर फूटनेवाला फोड़ा तथा अत्यन्त ऊष्माके लक्षण दिखायी देते हैं।
कफाधिक वातरक्तमें कठोरता, भारीपन, शून्यता, स्निग्धता, शीतलता, खुजली और मन्द पीड़ा होती है। द्वन्द्वज दोषमें दो तथा त्रिदोषजमें तीनों दोषोंके लक्षण उभरते हैं। इनमें एक दोषजन्य रोग अपेक्षित चिकित्सासे साध्य है। द्वन्द्वज दोष नामक वातरक्त-रोग अथक चिकित्सोपचारके द्वारा रोका जा सकता है। किंतु जो रोग त्रिदोषजन्य है, उसे तो छोड़ देना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये प्रयास करना व्यर्थ है, वह असाध्य होता है। इनमें रक्तपित्तजन्य वातरोग तो बड़ा ही कठिन माना गया है।
प्रकुपित वायु रोगीके शरीरस्थ अङ्ग-विशेषके रक्तको नष्ट करके उसके संधि-स्थानोंमें प्रविष्ट हो जाता है। तदनन्तर परस्पर एक-दूसरेको भली प्रकारसे अवरुद्ध करके तज्जनित वेदनासे वह रोगीके प्राणोंका अपहरण करता है।
प्राण, व्यान, समान, अपान और उदान—इस पञ्चात्मक वायु-समूहके बीच प्राणवायु जब रूक्षता, चञ्चलता, लंघन, अतिशय आहार, अभिघात, मलमूत्रादिक वेगावरोध तथा कृत्रिम वेग-संचालनके प्रयासमें कुपित होकर नेत्रादिक इन्द्रियोंमें उपघात करता है तो उसके कारण पीनस, दाह, तृष्णा, खाँसी और श्वासादिके रोग उत्पन्न होते हैं।
कुपित उदानवायु जत्रु (ठोढ़ी) और मूर्द्धामें आश्रय लेकर कण्ठावरोध, मलभेद, वमन, अरुचि, पीनस तथा गलगण्डादिक दोषोंको जन्म देता है।
अत्यधिक दूरकी यात्रा, स्नान, अतिशय क्रीड़ा, अत्यन्त विषय-भोगकी चेष्टा, स्वास्थ्य-विरुद्ध व्यवहार, रूक्षता, भय, हर्ष तथा विषादके कारण प्राणीके शरीरमें स्थित व्यान नामक वायु दूषित हो उठता है। तदनन्तर वह रोगीके पुंसत्व (पुरुषत्व), उत्साह और शक्तिका ह्रास कर देता है। उसके चित्तमें शोक तथा विभ्रमकी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उसे ज्वर, सम्पूर्ण शरीरमें सूचिका-भेदके समान वेदना, रोमाञ्च, स्पर्श-शून्यता, कुष्ठ, विसर्प और सभी अङ्गोंमें पीड़ा होती है।
काण्ड ] वातरक्त-निदान ३०५
स्वास्थ्य-विरुद्ध अजीर्णकर, शीतल तथा संकीर्ण दोषसे पूर्ण भोजन, असामयिक शयन और जागरण आदिसे समान नामक वायु दूषित हो जाता है। इसके प्रकुपित होनेसे शूल, गुल्म, ग्रहणी आदि सामान्य यकृतजन्य तथा कामाश्चित रोगोंकी उत्पत्ति होती है।
अत्यन्त रूक्ष तथा भारी अन्नके सेवन, मल-मूत्रका वेग रोकने, अतिशय भार ढोने, वाहनकी अधिक सवारी करने, मदिरापान, अत्यधिक देरतक खड़े होने तथा अधिक घूमने-फिरनेसे अपानवायु कुपित हो जाता है। वह प्रकुपित वायु प्राणीके शरीरमें पक्वाशयसे आश्रित समस्त रोगोंको उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त रोगीके शरीरमें मूत्र, वीर्य, अर्श तथा मलावरोध आदिसे सम्बन्धित बहुतसे रोग प्रकट हो जाते हैं।
तन्द्रा, स्तिमिता, गुरुता, स्निग्धता, अरुचि, आलस्य, शैत्य, शोथ, अग्निमान्द्य, कटु और रूक्ष पदार्थोंकी अभिलाषा आदि लक्षणोंसे युक्त वायुको साम अर्थात् आम-सदृश कहते हैं। जिसमें तन्द्रा आदिके विपरीत लक्षण होते हैं, वह वायु निराम कहलाता है।
साम-निरामके लक्षण बताकर अब वायुके आवरण और भेदोंका वर्णन किया जाता है। पित्तदोषसे आवृत वात-विकार होनेपर दाह, तृष्णा, शूल, भ्रम और आँखोंके आगे अन्धकार छा जाता है। कटु, उष्ण, अम्ल तथा लवणके प्रयोगसे रोगीमें विदाह और शीतकी अभिलाषा बढ़ जाती है। कफावृत वात-विकारमें रोगी शीतल, रूक्ष और उष्ण भोजन करनेका इच्छुक होता है। उसको शीतलता, भारीपन, शूल, लंघन, अग्निदाह, कटु घृतयुक्तमुख तथा अधिक तृष्णाके दोष घेर लेते हैं। इस कफावृत रोगमें अङ्ग-दर्द, उबकाई और अरुचि भी होती है।
रक्तावृत वातरोग होनेपर रोगीके चर्म तथा मांसमें दाह और पीड़ा अधिक होती है। रोगीके शरीरमें लाल वर्णका शोथ हो जाता है और मण्डलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। वायुके मांसाश्रित होनेपर शोथ बड़ा कठोर लगता है। उस रोगीको उबकाई आती है और शरीरमें छोटी-छोटी फुंसियाँ निकलने लगती हैं। ऐसे शोथमें रोमाञ्च भी होता है और शरीर चींटियोंसे व्याप्त हुएके समान प्रतीत होता है। मेदसे आवृत वायु-विकारमें यह शोथ शरीरमें चलायमान, मृदु तथा शीतल होता है और अरुचिकर भी होता है। मेदासे आवृत वात अन्य वातरोगोंकी अपेक्षा अत्यन्त कष्टसाध्य है। इसको आढ्यवातके समान समझना चाहिये। इस रोगके होनेपर उत्पन्न हुआ शोथ स्पर्श तथा आच्छादन करनेसे उष्ण तथा आवरण हटा देनेपर शीतल लगने लगता है।
वायुके मज्जावृत शोथ होनेपर उक्त लक्षणके विपरीत लक्षण दिखायी देते हैं। उसमें फैलाव और कसाव होता है, शूलजनित पीड़ा होती है तथा दोनों हाथोंसे मर्दन करनेपर रोगीको सुख प्राप्त होता है।
शुक्रावृत वात-शोथ होनेपर शुक्रमें अधिक वेग नहीं रह जाता। वायुके अन्नसे आवृत होनेपर भोजन करनेपर रोगीके कुक्षिभागमें पीड़ा होती है और भोजनके पच जानेपर पीड़ा शान्त हो जाती है। मूत्रसे वायुके आवृत हो जानेपर मूत्रका निकलना बंद हो जाता है और वस्ति-स्थानमें वेदना होने लगती है। वायुके द्वारा पुरीषके आवृत होनेपर गुह्यभागमें विशेष प्रकारका विबन्ध हो जाता है। आरेसे काटनेपर होनेवाली पीड़ाके समान रोगीको पीड़ा होती है। ऐसे वातरक्त-दोषके आवरण-रोगमें ज्वरसे पीड़ित रोगी यथाशीघ्र धराशायी होकर मूर्च्छित हो जाता है। विबन्धद्वारा मल
३०६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
पीड़ित होकर सूखा हुआ बड़ी कठिनतासे और बहुत देरमें निकलता है।
वायुद्वारा सभी धातुओंके आवृत्त होनेपर रोगीके कटि-प्रदेश, वंक्षण और पीठमें पीड़ा होती है। विलोम भावको प्राप्त हुआ वायु रोगीके हृदयको पीड़ित करता है। पित्तज दोषसे प्राणवायुके आवृत्त होनेपर भ्रम, मूर्च्छा, पीड़ा तथा दाहका उपद्रव रोगीके शरीरमें होता है।
पित्तसे व्यानवायुके आक्रान्त होनेपर पीड़ा, तन्द्रा, स्वरभ्रंश और सम्पूर्ण शरीरमें दाहकी उत्पत्ति होती है। समानवायुके आवृत्त होनेपर क्रमशः अङ्गचेष्टा, अङ्गभङ्ग, वेदनासहित संताप, तापविनाश, पसीना, रूक्षता और तृष्णाका उपद्रव होता है। अपानवायुके आवृत्त होनेसे रोगीके शरीरमें दाह होता है और उसके मलका वर्ण हल्दीके समान पीला हो जाता है। स्त्रियोंमें रजवृद्धि (या रोगवृद्धि), ताप, आनाह तथा प्रमेह नामक रोग भी उसके शरीरमें जन्म ग्रहण कर लेते हैं।
श्लेष्मके द्वारा प्राणवायुके आवृत्त होनेपर नादस्रोतमें अवरोध, खखार, स्वेद, श्वास तथा निःश्वास—इनमें विविधता होती है। उदानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर शरीरमें भारीपन, अरुचि, वाकरोध, स्वरक्षय, बल और वर्णका नाश होता है। व्यानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर पर्व और अस्थियोंमें जकड़न, सम्पूर्ण शरीरमें भारीपन, अत्यधिक स्थूलता आ जाती है। समानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर कर्मेन्द्रियोंमें अज्ञानता, शरीरमें पसीनेकी कमी, अग्निमन्दता तथा अपानवायुके कफसे आवृत्त होनेपर मल-मूत्रकी अधिक प्रवृत्ति होती है।
इस प्रकार वातरक्त-रोग बाईस प्रकारका माना गया है। क्रमशः प्राणादि वायु परस्पर आक्रान्त होनेसे बीस प्रकारके आवरण होते हैं। प्राणवायु जब अपानवायुको आवृत्त कर लेता है, तब उबकाई, श्वासरोध, प्रतिश्याय, शिरोग्रह, हृदयरोग और मुखशोष—ये उपद्रव होते हैं। उदानवायुके द्वारा प्राणवायुके आवृत्त होनेपर रोगीकी शक्तिका विनाश होता है। वैद्यको यथोचित विचार करके ही सभी प्रकारके वात-आवरणोंके भेदोंको जानना चाहिये। सभी वात-दोषोंके स्थानोंकी विवेचना करके उसके दुष्ट कर्मोंकी वृद्धि और हानिपर चिन्तन करके भी आवरणोंका विभाग समझना चाहिये।
प्राणादिक पाँचों वायु-समूहोंके (पृथक्-पृथक्) पित्त-दोषजन्य आवरण होते हैं। वातमिश्रित पित्तादिके जिन निवास-स्थानोंकी चर्चा ऊपर की गयी है, वे उन्हीं अपने दोषोंसे मिश्रित हैं। मिश्रित पित्तादिक दोषोंके कारण वे भी अनेक प्रकारके आवरण रोग माने गये हैं। अतः विद्वान् चिकित्सक सचेत होकर अपने लक्षण-ज्ञानके अनुसार उन दोषोंका चिन्तन करे। चिकित्सकके लिये अपेक्षित है कि धीरे-धीरे अपने लक्षणोंके अभ्युदयसे निश्चित एवं दृढ़ हुए उन रोगोंका बार-बार परीक्षण करके ही उपचार करे।
प्राणवायु प्राणीके जीवनका आधार तथा उदानवायु बलका आधार कहा गया है। शरीरमें उन दोनोंके पीड़ित होनेसे प्राणीके आयु और बल दोनोंकी हानि होती है।
आवृत्त हुए सभी वायु-दोष अपने-अपने लक्षणोंसे शरीरपर स्पष्ट हो गये हों अथवा स्पष्ट न हुए हों या वे स्थानच्युत होनेके कारण समझसे परे हो रहे हों अथवा उपद्रवविहीन हो गये हों, वे असाध्य ही होते हैं। चिकित्सकके द्वारा किये जानेवाले प्रयाससे भी वे कष्ट-साध्य ही होते हैं।
उपर्युक्त उन आवृत्त वायु-दोषोंकी उपेक्षा करनेसे प्राणियोंके शरीरमें विद्रधि, प्लीहा, हृद्रोग, गुल्म तथा अग्निमन्दता आदिके उपद्रवोंका आविर्भाव होता है।
१४८- ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार
| काण्ड ] | वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा | ३०७ |
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हे सुश्रुत! सभी रोगोंके ज्ञान एवं मनुष्यादि समस्त प्राणियोंकी आयुवृद्धिके लिये मैंने आत्रेय मुनिद्वारा कथित उनके निदानको भली प्रकारसे बतला दिया है। अतः उसी प्रकारसे सभी रोगोंका विचार करके चिकित्सकको तत्सम्बन्धित रोगकी चिकित्सा करनी चाहिये।
मधु, घृत और गुड़से संयुक्त त्रिफला (हरीतकी, आमलकी और बहेड़ा)-चूर्ण सभी रोगोंका विनाशक है। त्रिफला-चूर्णको यदि केवल जलके साथ नित्य-प्रातः प्रयोगमें लाया जाय, तब भी वह सभी रोगोंका नाश करनेवाला होता है। शतावरी, गुडूची, चित्रक और विडंगके साथ भी प्रयुक्त त्रिफला सभी रोगोंको विनष्ट कर देती है। शतावरी, गुडूची, अग्निमन्थ, चित्रा, सोंठ, मूसली, बला, पुनर्नवा, बृहती, निर्गुण्डी, निम्बपत्र, भृंगराज, आँवला तथा वासक अथवा उसके ही रससे सात बार या एक बार भावित त्रिफला सभी रोगोंका निवारक है। पूर्वोक्त कही गयी औषधियोंकी जैसी प्राप्ति हो, उसी प्रकारसे उनके द्वारा तैयार चूर्ण, मोदक, वटी, घृत, तेल अथवा क्वाथ भी सर्वरोगहर्ता है। उनकी आनुपातिक मात्रा एक पल, आधा पल, एक कर्ष अथवा आधा कर्ष रोगीके लिये उपादेय मानी गयी है।
(अध्याय १६७)
वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! प्राणियोंके जीवनकी रक्षाके कारणस्वरूप, समस्त रोग-विनाशक, सिद्ध, औषधीय योगसारका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ, उसे आप सुनें।
वर्षा-ऋतुमें कसैले, कटु, तिक्त और रूक्षादि गुणोंवाले खाद्य-पदार्थोंके सेवनसे, चिंता, मैथुन, व्यायाम, भय, शोक, रात्रि-जागरण करने तथा उच्च स्वरमें बोलनेसे, अधिक भार-वहन तथा सामर्थ्यसे अधिक शारीरिक शक्तिका प्रयोग करनेसे एवं भोजनके पाचनकालमें और संध्यासमयमें प्राणियोंके शरीरकी वायु कुपित हो जाती है।
ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुके मध्याह्नकालमें उष्ण, अम्ल, लवण, क्षार, कटु एवं अजीर्ण भोजन, तेज धूप, अग्नि-संताप, मद्यपान तथा क्रोधावेगका अवरोध करनेसे प्राणियोंका पित्त प्रकुपित होता है। यह दोष ग्रीष्मकालकी अर्द्ध रात्रियोंमें भी हो सकता है।
वसन्त-ऋतुमें स्वादिष्ट, अम्ल, लवण, स्निग्ध, भारी और शीतल भोजनका अधिक प्रयोग, नवान्न, चिकने पदार्थ तथा दलदलवाले स्थानोंमें विचरण, मांसादि सेवन, सहसा व्यायामसे विरक्ति, दिनमें शयन, शय्या और आसनादिक सुखोपभोग प्राप्त करनेसे और भोजनके अन्तमें प्राणियोंका कफ संक्षुब्ध हो उठता है।
शारीरिक कर्कशता, संकोच, सूचिकाभेद पीड़ा, विष्टम्भ, अनिद्रा, रोमाञ्च, स्तम्भ, शुष्कता, श्यामलत्व, अङ्ग-विभ्रंश, बलहानि और परिश्रमजन्य थकान आदिके उपद्रव वात-दोषके लक्षण हैं। अतः उन सभी उपद्रवोंसे समन्वित रोगको वातात्मक रोग कहना चाहिये।
दाह, पैरमें जलन, पसीना, क्रोध, परिश्रम, कटु, अम्ल, शव-समान दुर्गन्ध, स्वेदराहित्य, मूर्च्छा, अत्यन्त तृष्णा, भ्रम, हल्दीके समान पीला और हरा रंग होना—ऐसे लक्षणोंवाला मनुष्य पित्त-दोषसे समन्वित माना जाता है।
शरीरमें स्निग्धता, माधुर्य, बन्धनके समान पीड़ा होना, निश्चेष्टता, तृप्ति, संघात, शोथ, शीतलताकी अनुभूति, भारीपन, मलाधिक्य, खुजली और अधिक निद्रा—ये सब लक्षण कफसे उत्पन्न होते हैं।
| ३०८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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कारण, लक्षण और संसर्गसे रोगको पहचानना चाहिये। जो रोग वात, पित्तादि दोषोंमेंसे किन्हीं दो दोषोंसे उत्पन्न हो, वह द्विदोषज रोग कहलाता है और जिस रोगमें सभी वात, पित्त तथा कफजन्य दोषोंके लक्षण व्यक्त हों, उसे त्रिलिंग या संनिपातिक रोग कहा जाता है।
प्राणियोंका यह शरीर दोष, धातु तथा मलका आधार कहा जाता है। उन सभीका शरीरमें समत्व भावसे रहना आरोग्य या निरोगता है। उनमें कमी और वृद्धि रोगका कारण है। वसा, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र—ये सात धातुएँ हैं। वात, पित्त तथा कफ—ये तीन दोष हैं और विष्ठा तथा मूत्र आदि मल कहे जाते हैं।
वायु शीतल, रूक्ष, लघु, सूक्ष्म, स्वरविहीन, स्थिर तथा बली होता है। पित्त अम्ल (खट्टा), कटु (तीक्ष्ण), उष्ण और पङ्किल रोगोंका कारण है। कफ मधुर, लवण, स्निग्ध, भारी तथा अधिक चिकना होता है।
वायु शरीरमें गुदाभाग और कटिप्रदेशका आश्रय लेता है। पित्त पक्वाशयमें स्थित रहता है और कफका आश्रय-स्थान आमाशय, कण्ठ तथा मस्तकका संधि-भाग है।
कटु, तिक्त और कसैले पदार्थोंका सेवन करनेसे वायु प्रकुपित होता है। कटु, अम्ल तथा लवण पित्तको स्वादिष्ट, उष्ण और लवण पदार्थ कफको प्रकुपित करते हैं। अतः इन सभीका विपर्यय शरीरमें उन दोषोंकी शान्तिके लिये ही प्रयुक्त होना चाहिये। यथापेक्षित अपने-अपने स्थानपर प्रयुक्त सुखके कारणभूत पदार्थ रोगियोंके रोगका उपशमन करते हैं।
मधुर भोज्य पदार्थ नेत्रशक्ति, रस और धातुके अभिवर्धक हैं। अम्लमिश्रित होनेपर वे ही मन और हृदयकी संतृप्ति, जठराग्निका उद्दीपन तथा पाचनशक्तिको प्रबल बनाते हैं। तिक्त पदार्थ अग्निके उद्दीपक, ज्वर, तृष्णा-विनाशक, शोधन और शोषण करनेवाले हैं। कषाय पदार्थ पित्तवर्धक, स्तम्भक, कण्ठग्रहादि दोष-विनाशक तथा शरीर-शोषक होते हैं।
जो द्रव्य-पदार्थ प्राणियोंके शरीरमें स्थित रस और वीर्यको विशेष रूपसे परिपक्व करनेका आधार होता है, वह उत्तम माना गया है। रस-परिपाकके मध्य स्थायी रूपसे स्थित वह पदार्थ यथाशीघ्र ही अन्य सभी द्रव्योंका भी आश्रय बन जाता है। शीतलता, उष्णता और लवणताके गुणोंको धारण करनेवाला पदार्थ वीर्य अथवा शक्ति ही है।
रस-परिपाक दो प्रकारका होता है। एक है मधुर और दूसरा है कटु।
वैद्य, औषधि, रोगी तथा परिचारक (रोगीकी सेवा करनेवाला)—की सम्पत्ति—ये चार चिकित्साके अङ्ग हैं। इन चारोंकी उत्तमता होनेपर रोग यथाशीघ्र दूर हो जाता है और इनके विपरीत हो जानेपर तो रोगकी असिद्धि ही होती है।
देश, काल, रोगीकी आयु, शरीरमें अग्निका बलाबल, प्रकृति, त्रिदोषों (कफ-पित्त और वायु)—का साम्य-वैषम्य, रोगीका स्वभाव, औषधि, रोगीके शरीरका सत्त्व, सहनशक्ति तथा रोगका भलीभाँति विवेचन करके ही विद्वान् चिकित्सकोंको चिकित्सा-कार्यमें प्रवृत्त होना चाहिये।
अधिक जलाशय तथा पर्वतोंवाला देश अनूप कहलाता है। यह देश कफ तथा वायुको प्रकुपित करता है। वनाच्छादित अथवा अन्यान्य शिखर तथा शाखाओंवाला देश रक्त-पित्तज दोषोंका जनक है। इन सभी लक्षणोंसे जो देश समन्वित होता है, वह सामान्य देश कहा गया है। मनुष्य सोलह वर्षपर्यन्त बालक, सत्तर वर्षतक मध्यम (युवा एवं प्रौढ़) और सत्तर वर्षके पश्चात् वृद्ध कहा जाता है।
काण्ड ] वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा ३०९
प्रायः कफ, पित्त और वायु जैसा क्रम दिया गया है, वैसे ही शरीरमें ये उद्दीप्त होते हैं। शरीरके शक्तिहीन होनेपर अथवा विशेष वृद्धावस्थाके आ जानेपर रोगी क्षारक्रिया, अग्निचिकित्सा और शल्यकर्म-रहित होता है। कृशकाय रोगीका बृंहण, स्थूल शरीरवाले रोगीका कर्षण और मध्य शरीरवाले रोगीका रक्षण-कार्य करना चाहिये। शरीरके ये ही तीन भेद माने गये हैं। चिकित्सा-कार्यमें इस त्रिविध क्षमताका विवेचन भी अपेक्षित होता है।
स्थिरता, व्यायाम और संतोष-धारण करनेकी प्रवृत्तिसे रोगीके बलको समझना चाहिये। जो मनुष्य विकार-रहित, उत्साह-सम्पन्न तथा महासाहसिक होता है, वह बलवान् माना गया है। जिस प्राणीके खान-पान भी प्रकृतिके विरुद्ध हैं, यदि वे रोगीके शरीरमें आनेवाले कलके सुखकी कल्पनाको साकार करते हैं तो उसको प्रकृतिकी साम्यावस्था कहा जाता है।
कफजन्य पदार्थोंका भक्षण करनेसे गर्भिणी स्त्रीके गर्भसे कफ-रोगसे युक्त संतान ही उत्पन्न होती है। इसी प्रकार वातजनक तथा पित्तोत्पादक पदार्थोंसे भी होता है, किंतु हितैषी भोजन करनेसे समान धातुवाली संतानका जन्म होता है।
कृशकाय, रूक्ष, अल्पकेश, चञ्चलचित्त तथा स्वप्नमें बहुत बोलनेवाला व्यक्ति वात-प्रकृतिवाला होता है। असमयमें ही जिसका बाल सफेद हो गया हो, गौर वर्णवाला, स्वेद एवं क्रोधयुक्त, बुद्धिमान् और स्वप्नमें भी तेज देखनेवाला मनुष्य पित्त-प्रकृतिसे समन्वित कहा गया है। स्थिरचित्त, सूक्ष्मस्वर, प्रसन्न, स्निग्धकेश तथा स्वप्नमें जल और पत्थर देखनेवाला पुरुष कफ-प्रकृतिसे सम्बन्धित होता है। मिश्रित लक्षणोंके होनेपर प्राणीको द्विदोषज तथा त्रिदोषज मानना चाहिये। प्राणीमें उक्त दोषोंका इतर भाव होनेपर जिस दोषके अधिक लक्षण दिखायी देते हों, उसीके अनुसार उसकी प्रकृतिका निर्धारण होता है।
मन्द, तीक्ष्ण, विषम और सम—ये वात-पित्त आदिकी चार अवस्थाएँ हैं। कफ, पित्त तथा वायुकी अधिकता और समतासे जठराग्नि भी भिन्न प्रकारकी हो जाती है। शरीरमें सदैव जठराग्निकी समताकी रक्षा करनी चाहिये। विषम स्थिति आनेपर वातनिग्रह करना चाहिये। तीक्ष्णावस्था होनेपर पित्त-दोषका प्रतीकार और मन्दावस्थामें कफका शोधन आवश्यक माना गया है।
सभी रोगोंकी उत्पत्तिके कारण अजीर्ण और मन्दाग्नि-दोष हैं। आम, अम्ल, रस तथा विष्टम्भ—ये चार उसके लक्षण हैं। आम-दोष होनेपर विषूचिका, हृदयरोग और आलस्यादिके उपद्रव होते हैं। ऐसा विकार होनेपर वच, कटुफल और लवणमिश्रित जलपान कराकर रोगीको वमन कराना चाहिये। अम्ल-दोष होनेपर प्राणीमें शुक्रका अभाव, भ्रम, मूर्च्छा और तृष्णा आदिके दोष जन्म लेते हैं। इस अवस्थामें अग्निपर बिना पकाया हुआ शीतल जल, वायुका सेवन रोगीके लिये अपेक्षित है। रस-दोष होनेपर शरीरभंग, शिरोजाड्य तथा भोजनकी अनिच्छा आदिसे सम्बन्धित उपद्रव होते हैं। इस दोषके होनेपर दिनमें निद्रा और उपवासका परित्याग करना चाहिये। विष्टम्भ-दोष होनेपर शूल, गुल्म, अरुचि और मलमूत्रजनित उपद्रव होते हैं। इस दोषकी वृद्धि होनेपर स्वेदन-क्रिया तथा लवणमिश्रित जलपान करनेका विधान है।
आम, अम्ल और विष्टब्धके लक्षणोंका जन्म क्रमशः—कफ, पित्त तथा वायु-दोषके कारण होता है। विद्वान् व्यक्तिको इन दोषोंके होनेपर हींग, त्रिकटु (शुण्ठी, पिप्पली और मरिच) एवं सेंधा नमकका लेप उदरभागपर करके उसका निवारण करना चाहिये। दिनमें सोनेसे सभी प्रकारके अजीर्ण रोगोंका विनाश होता है। अहितकर अन्नोंका प्रयोग करनेसे शरीरमें उनके रोग-समूहोंकी
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उत्पत्ति होती है; अतएव अहितकर अन्नका सदैव परित्याग करना चाहिये।
केवल उष्ण जल अथवा मधु (माक्षिकभस्म)-के साथ उष्ण जलका पान करनेसे रोगीकी पाचन-क्रिया शुद्ध रहती है। बंसांकुर, दही और मछलीसे प्रायः दूधका विरोध होता है। बिल्व, शोणा (श्योनाक), गम्भारी (श्रीपर्णी), पाटला (पाढर) और अग्निमन्थ—इन पाँच वृक्षोंके मूल संग्रहको आयुर्वेदमें 'पञ्चमूल' कहा गया है। ये पञ्चमूल मन्दाग्निको तीव्र करनेवाले, कफ और वातके दोषका विनाश करनेवाले हैं। शालपर्णी (एकाङ्गी नामक औषधि), पृश्निपर्णी (पेठवन), दो प्रकारकी बृहती (भटकटैया) तथा गोक्षुर (गोखरू)—इन पाँचोंको 'लघुपञ्चमूल' कहा जाता है। यह औषधि वात-पित्त-विनाशक तथा ओजवर्धक है। इन दोनों पञ्चमूलोंका संग्रह होनेपर दशमूल औषधिका निर्माण होता है। यह औषधि संनिपातिक ज्वरका विनाश करनेमें समर्थ होती है। खाँसी, श्वास, तन्द्रा और पार्श्वशूल-रोगमें यह अधिक लाभकारी होती है। इन सभी औषधियोंको तेल और घृतमें परिपक्व करके केशरोगका निवारण किया जा सकता है।
क्वाथसे चौगुना पानी पात्रमें भरकर उसको आगपर पकाना चाहिये। जब वह चतुर्थांश पानी रह जाय, तब उस क्वाथके समान मात्रामें स्नेहिल द्रव्य—पदार्थका पाक तैयार करे। यह स्नेहपाक* दूधसे भी तैयार किया जाता है। अतः उस क्वाथमें दूधकी मात्रा समान होनी चाहिये। कल्क बनानेके लिये स्नेहकी मात्रासे औषधिकी मात्रा चतुर्थांश ही होती है। पाक समान मात्रामें औषधियोंको लेकर तैयार होता है। वस्ति-पाक और पाय-पाकमें भी जलकी मात्रा और विधि समान ही होती है। अभ्यङ्ग अर्थात् शरीरमें मालिश करनेके लिये तैयार किया गया पाक खर तथा नस्यके लिये मृदु होना अपेक्षित है।
अन्यान्य दोषोंसे सदैव सुरक्षित रखनेके लिये चिन्तनीय स्थूल कर्मेन्द्रियोंके बीच प्राणीकी जो प्रकृति अपनी बलवत्ताके साथ विद्यमान रहती है, उसीको आरोग्य कहते हैं। अतः प्राणीको आयुष्मान् बने रहनेके लिये तत्सम्बन्धित आचरण करना चाहिये। जो मनुष्य अपनी इन्द्रियोंके द्वारा स्वास्थ्य-विपरीत पदार्थोंको ग्रहण करता है, वह मृत्युका पात्र बन जाता है। जो चिकित्सक, मित्र और गुरुके साथ द्वेष करनेवाला तथा शत्रुस्नेही होता है, जिसके गुल्फ, जानु, ललाट, हनु (ठोढ़ी) और गण्डस्थल भ्रष्ट तथा स्थानच्युत हो जाते हैं, वह व्यक्ति कुछ ही कालमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देता है।
जिस रोगी मनुष्यकी बायीं आँख बैठ गयी हो, जिह्वाका वर्ण श्याम पड़ गया हो, नासिका-भाग विकारयुक्त हो गया हो, दोनों ओष्ठ स्थानच्युत और कृष्णवर्णके हो गये हों तथा मुख भी कृष्णवर्णका हो गया हो तो चिकित्सकको चाहिये कि उसका परित्याग कर दे; क्योंकि उसकी मृत्यु संनिकट ही होती है। (अध्याय १६८)
* आयुर्वेदमें स्नेहपाकके तीन प्रकार बताये गये हैं—मृदु, मध्यम और खर।
तत्र स्नेहौषधिविवेकेमात्रं यत्र भेषजं मृदुः।
मधूच्छिष्टमिव विशदमविलेपि यत्र भेषजं स मध्यम। वृष्णमवसन्नमपिद्विशदं चिक्कणं च पत्र भेषजं स खरः॥
स्नेहपाकोऽथ कल्के स्यान्मृदुरङ्गुलिलेपिनि। न गृह्णात्यङ्गुलिं मध्यः शीर्यमाणः खरः स्मृतः॥
जब स्नेहकार्तमें प्रयुक्त औषधि पकाते-पकाते यह सिद्ध हो जाय कि यह पक गयी है अर्थात् औषधि कलछीसे लगने लगे तो उसको मृदु-पाक कहते हैं। जब वह कल्क मोमके समान कड़ाहीमें फैल जाय और कलछीमें चिपके नहीं, तब वह मध्यम-पाक कहा जाता है। जब कल्क कठिन और कुछ चिकना हो जाता है तो उसको खर-पाक कहते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य लोगोंका विचार है कि जब कल्क अँगुलीपर चिपके और उसमें नरमी हो तो वह मृदु-पाक है। जो कल्क अँगुलीपर न चिपके और नरम हो, वह मध्यम तथा जो कल्क पककर कठिन हो जाय, वह खर होता है।
१४९- नाडीव्रण, कुष्ठ आदि रोगोंकी चिकित्सा
काण्ड ] पदार्थोंके गुण-दोष और औषधि-सेवनमें अनुपानका महत्त्व ३११
पदार्थोंके गुण-दोष और औषधि-सेवनमें अनुपानका महत्त्व
धन्वन्तरिजीने कहा—[हे सुश्रुत!] अब मैं शरीरके लिये हितकारी एवं अहितकारी ज्ञान प्रदान करनेके निमित्त अनुपान-विधिका वर्णन करता हूँ, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनिये।
लाल साठी चावल वात-पित्त एवं कफजन्य त्रिदोषोंका विनाशक तथा तृष्णा और मेदाको दूर करनेवाला है। महाशालि अत्यन्त शक्तिशाली होता है। कलम अर्थात् अधिक पानीमें होनेवाला जड़हनी चावल कफ तथा पित्तके दोषका शमन करता है। सफेद साठी चावल प्रायः शीतल, भारी और वात, पित्त एवं कफ—इन तीनों दोषोंको दूर करता है।
श्यामाक अर्थात् साँवाँ शरीरशोषक, रूक्ष, वातदोषोत्पादक, कफ तथा पित्तजनित दोषका निवारक है। उसी प्रकार प्रियंगु, नीवार और कोदो नामक अन्न भी शरीरके दोषोंको दूर करते हैं। यव (जौ) शीतल, कफ और पित्तज दोषका अपहारक होता है। गेहूँ शक्तिशाली, शीतल, भारी, मधुर और वातनाशक होता है। मूँग कफ, पित्त तथा रक्तको जीतनेवाला, कषाय, मधुर और लघु होता है। उड़द अत्यन्त शक्तिशाली, ओज-वृद्धि करनेवाला, पित्त-कफ-विनाशक तथा भारी होता है। राजमाष अर्थात् राजमा शुक्रनाशक, पित्तश्लेष्मकारक और वायुरोगका अपहारक है।
कुलथी<sup>१</sup> प्राणीके श्वास, हिचकी, शुक्राश्मरी, हृदयस्थ कफ, गुल्म एवं वात-दोषको दूर करनेमें समर्थ होती है। मकुष्ठक अर्थात् मकुनी रक्त, पित्त तथा ज्वरको दूर करनेवाला, शीतल और ग्राह्य है। चना पुरुषत्व, रक्त, कफ और पित्तका अपहर्ता तथा वात-दोषका वर्धक माना जाता है। मसूर मधुर, शीतल, संग्राही और कफ तथा पित्तका निवारक है। मसूर-जैसे ही सभी गुणोंकी अधिकता कलाय (मटर)-में भी होती है—यह अधिक वायुवर्धक होता है। अरहर कफ तथा पित्त-विनाशक और शुक्रवर्धक है। अलसी पित्त-वृद्धिकारक और सरसों कफ तथा वायुके दोषका निवारक है।
तिल<sup>३</sup> क्षार, मधुर और स्निग्ध-गुणसे युक्त होता है। यह बलवर्धक, उष्ण तथा पित्तकारक भी है। अन्य विभिन्न प्रकारके अन्नोंकी जो प्रजातियाँ हैं, वे बलनाशक, रूक्ष और शीतल होती हैं।
चित्रक, इंगुदी (हिंगोट), कमलनाल, पिप्पली, मधु, सहिजन, चव्याचरण (गजपिप्पली), निर्गुण्डी, तर्कारी (जयन्ती), काशमर्दक और बिल्व—ये कफ-पित्त तथा कृमिनाशक, लघु और जठराग्निको उद्दीप्त करते हैं। वर्षाभू (पुनर्नवा) तथा मार्कर (मकरा) वात और कफ-दोषका विनाश करते हैं। एरण्ड तिक्त और रसयुक्त एवं काकमाची (मकोय) त्रिदोषनाशक होता है। चांगेरी कफ और वातविनाशक है। सरसों सभी दोषोंसे युक्त होता है। सरसोंके समान कुसुम्भ (बर्रे) भी होता है। राजिका (काला सरसों) वात और पित्तको बढ़ानेवाला है। नाडीच कफ-पित्त-विनाशक तथा चुचु (पालकीकी जातिका एक शाक) मधुर और शीतल होता है। कमल-पत्र सभी दोषोंका हन्ता और त्रिपुट (मटरकी एक जाति) अत्यन्त वातकारक है। वास्तुक अर्थात् बथुआ क्षारयुक्त, अतिशय रुचिकारक और कृमिनाशक होता है। इसमें सभी दोषोंको विनष्ट करनेकी क्षमता होती है।
तण्डुलीय (चौलाई)-का शाक विषनाशक होता है। पालक तथा अन्य इसी प्रकारके शाकोंमें
१-च०सू०अ० २७, सु०सू०अ० ४६, अ०सं० सू०अ० ७। १२, च०सू०अ०२५। २-अ०हृ०सू०अ० ६। १८।
३-अ०हृ०सू०अ० ६। २१।
३१२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
भी यह गुण रहता है। मूलक (मूली) आम-दोषका उत्पादक तथा वात-कफनाशक है। जब यह शाक अग्निपर पक जाता है तो सभी दोषोंको दूर करनेमें समर्थ तथा हृदय और कण्ठको प्रिय होता है। कर्कोटक (ककड़ी), बैगन, परवल और करैला कुष्ठ, मेह, ज्वर, श्वास, कास, पित्त तथा कफके नाशक हैं। कुम्हड़ा सर्वदोषविनाशक, वस्तिशोधक और स्वादयुक्त होता है। कलिंगा (तरबूज) और अलाबुनी (लौकी) पित्तविनाशिनी और वातकारिणी होती है। त्रपुष (खीरा) तथा उर्वारुक (ककड़ी-फूट) वात और कफ बढ़ानेवाली तथा पित्त-दोषको दूर करनेवाली है।
वृक्षाम्ल (अमलवेंत) और जम्बीर (नीबू) कफ तथा वात-दोष-निवारक हैं। दाडिम वात-दोषका नाशक तथा स्वादिष्ट होता है। नारंगीके फलमें भारीपनका दोष रहता है। केशर और मातुलुंग (बिजौरा नीबू) कफ-वात-विनाशक एवं जठराग्निको प्रदीप्त करते हैं। माष (उड़द) वात और पित्तका नाशक होता है। इसके सेवनसे त्वचाभागमें स्निग्धता आती है और शरीरके अंदर विद्यमान उष्णता तथा वात-दोष विनष्ट हो जाता है। आँवला बलकारी, मधुर, रोचक और अम्लरससे युक्त होता है। हरीतकी (हर्रे) भोजनको भली प्रकारसे पचानेवाली, पुण्यदायिनी अमृतके समान तथा कफ और वात-दोषको दूर करनेमें समर्थ एवं विरेचक है। बहेड़ा भी उसी प्रकारका होता है। इसमें वात, पित्त और कफ—इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करनेकी क्षमता होती है। तिन्तिडी<sup>१</sup> (इमली)-फल वात तथा कफका विनाशक, अम्लरससे युक्त और विरेचक होता है।
लकुच अर्थात् बड़हल दोषोत्पादक तथा स्वादयुक्त, बकुल कफ-वात-विनाशक, बीजपूरक (बिजौरा नीबू) गुल्म, वात, कफ, श्वास और कासरोगोंका नाशक है। कपित्थ (कैथ) ग्राह्य तथा सभी दोषोंका हरण करनेवाला होता है। पकनेपर यह भारी एवं विषको दूर करनेवाला होता है। पकनेके पूर्व अपने बाल्यकालमें यह कफ और पित्तको उत्पन्न करता है। उसके बाद प्रौढावस्थामें यह पित्तवर्धक है।
पका हुआ आम<sup>२</sup> वात-दोषको उत्पन्न करनेवाला तथा मांस, वीर्य, वर्ण और शक्तिको बढ़ानेवाला होता है। जामुन वात, पित्त और कफका विनाशक तथा विष्टम्भ-दोषका उत्पादक होता है। तिन्दुक कफ-वातका नाशक और बेर वात तथा पित्तदोषको दूर करता है। बिल्व विष्टम्भ-दोषमें वात-दोषको बढ़ानेवाला है। प्रियाल (चिरौंजी) वातज दोषका नाशक है। राजादन (खिरनी), मोच (केला), कटहल और नारियल स्वादयुक्त, स्निग्ध तथा भारी होते हैं। ये सभी वीर्य और मांसके अभिवर्धक कहे जाते हैं।
द्राक्षा (अंगूर), मधूक (महुआ), खर्जूर (खजूर) तथा कुंकुम वात और रक्त-दोषको जीतनेवाले होते हैं। मागधी (पिप्पली) माधुर्य-गुणसे युक्त होती है। यह पकनेपर श्वास तथा पित्त-दोषको दूर करनेमें श्रेष्ठ है। आर्द्रक (अदरक) रोचक, पुष्टिकारक, अग्निदीपक तथा कफ और वात-विनाशक होता है। सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च कफ तथा वात-दोषको जीतनेवाले माने गये हैं। लाल मिर्च शरीरको पौष्टिक तत्त्व देनेमें असमर्थ होता है, ऐसा वैद्यक-शास्त्रका मत है। हींग गुल्म, शूल तथा मलावरोधको दूर करनेवाली और वात तथा कफकी विनाशिनी है।
यमानी, धनिया और अजाघृत वात तथा कफज दोषको दूर करनेमें विशेष रूपसे गुणकारी
१-सु० सू० ४६, च० सू० २७। २-सु० सू० ४६, च० सू० २७ भा० प्र०।
काण्ड ] पदार्थोंके गुण-दोष और औषधि-सेवनमें अनुपानका महत्त्व ३१३
हैं। सेंधा नमक नेत्रज्योतिवर्धक, पुष्टिकारक और वात-पित्त तथा कफ—इन तीनों दोषोंका शमन करनेवाला माना गया है। सौवर्चल अर्थात् काला नमक वायु-अवरोधका विनाशक, उष्ण और हृदय-शूलका शामक है। विडंग उष्ण, तीक्ष्ण, शूलनाशक तथा वातदोषका अपहारक है। रोमक लवण वातवर्धक, स्वादिष्ट, रोचक, गलानेवाला और भारी होता है। इसके द्वारा हृदय-रोग, पाण्डु और गलेका दोष दूर हो जाता है। यवक्षार अग्निदीपक है। सर्जिक्षार (रेह) पाचक, अग्निदीपक, तीक्ष्ण और विदारक होता है।
वर्षाका जल तीनों दोषोंका नाशक, लघु, स्वादिष्ट विषापहारक है। नदीका जल वातवर्धक, रूक्ष, सरस, मधुर और लघु होता है। वापीका जल वात-कफ-विनाशक तथा पोखरका जल वातवर्धक माना गया है। झरनेका जल रुचिकर, अग्निदीपक, रूक्ष, कफनाशक और लघु होता है। कुएँका जल अग्निदीपक, पित्तवर्धक तथा उद्भिज (पातालतोड़ कुआँ)-का जल पित्तविनाशक है। यह जल दिनमें सूर्य-किरण और रात्रिमें चन्द्र-किरणसे सम्पृक्त होकर सभी दोषोंसे विमुक्त हो जाता है। इसकी तुलना तो आकाशसे गिरनेवाले जलसे ही की जा सकती है।
गरम जल ज्वर, श्वास, मेदा-दोष तथा वात और कफ-विनाशक है। जलको गर्म करके ठंडा करनेके पश्चात् वह प्राणीके वात-पित्त तथा कफ—इन तीनों दोषोंका विनाश करता है, किंतु बासी हो जानेपर वही जल दोषयुक्त हो जाता है।
गोदुग्ध वात और पित्तका विनाशक, स्निग्ध और गुरुपाकी रसायन है। भैंसका दूध गोदुग्धकी अपेक्षा अत्यधिक भारी, स्निग्ध तथा मन्दाग्नि-दोषका उत्पादक होता है। बकरीका दूध रक्तातिसार, कास, श्वास तथा कफका अपहारक है। स्त्रियोंका दूध नेत्रोंकी ज्योतिको तीव्र करनेवाला, जीवनस्वरूप और रक्त-पित्त-विनाशक है।
दही परम गुणकारी होता है। यह वात-दोषको दूर करनेवाला पौष्टिक तथा पित्त एवं कफका वर्धक है। मट्ठा तीनों दोषोंका नाशक और उसकी मही (छाछ) रक्तादिक स्रोतोंका शोधक होता है। नया निकाला गया नवनीत (मक्खन) ग्रहणी-बवासीर और अर्दित रोगजन्य पीड़ाका अपहारक है। दूधके किलाट (दुग्धविकार विशेष) आदि विकार भारी तथा कुष्ठरोगके कारण हैं। प्राचीन विद्वान् तक्रको ग्रहणी, शोथ, बवासीर, पाण्डुरोग, अतिसार और गुल्मरोगका विनाशक तथा वात-पित्त एवं कफजन्य त्रिदोषका उत्तम शामक मानते हैं।
घृत पौष्टिक, मधुर और वात-पित्त तथा कफका अपहारक होता है। गोघृत बुद्धिवर्धक और नेत्रज्योति-प्रदायक है। अग्निपर तप्त करनेके बाद तो यह तीनों दोषोंको दूर करनेमें पूर्ण समर्थ हो जाता है। संस्कृत घृतसे अपस्मार-रोगमें होनेवाले उन्माद तथा मूर्च्छाजनित दोष दूर हो जाते हैं। बकरी और भेड़ आदिसे प्राप्त होनेवाला घृत भी गोदुग्धसे तैयार होनेवाले घृतके समान ही गुणकारी होता है। ये घृत कफ तथा वात-विनाशक और मूत्रदोषके अपहर्ता तथा सभी प्रकारके कृमि और विषजनित दोषोंके निवारक हैं।
तिलका तेल बलशाली, केशमें लगाने लायक, वात और कफका विनाशक, पाण्डुत्व, उदररोग, कुष्ठ, अर्श, शोथ, गुल्म तथा प्रमेह-रोगका नाशक होता है। सरसोंका तेल कृमि और पाण्डुरोगको दूर करनेवाला तथा कफ, मेदा और वात-दोषका भी नाशक है। अलसीका तेल नेत्रशक्तिको हानि पहुँचानेवाला तथा वात और पित्तका विनाशक है। बहेड़ेका तेल कफ-पित्तको दूर करनेवाला, केशवर्धक, त्वक् और कर्णदोषका निवारक होता है। इसे त्रिदोषका शमन करनेवाला, मधुर और वातवर्धक
| ३१४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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कहा जाता है। इसके प्रयोगसे हिचकी, श्वास, कृमि, छर्दि, मेह, तृष्णा और विष-दोष भी दूर हो जाते हैं।
'इक्षुरस' रक्त और पित्त-दोषनाशक, बलप्रद, पौष्टिक तथा कफवर्धक होता है। इस रसका दूध-मिश्रित बना हुआ सिखरन पित्तवर्धक, उसकी मदिरा तीव्र (उत्तेजक) तथा शर्करा मछलीके अंडेके समान श्वेत और हल्की होती है। इसकी खाँड पौष्टिक, स्निग्ध, स्वादिष्ट तथा रक्त-पित्त और वात-दोषपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ होती है। गुड़ वात-पित्तहर्ता, रूक्ष तथा कफवर्धक होता है। यह पित्त-विनाशक तो है ही, जो गुड़ पुराना हो गया है, वह अधिक प्रशस्त और पथ्य है। इसके सेवनसे रक्तकी शुद्धि हो जाती है। गुड़ और शर्करा दोनों रक्त एवं पित्त-दोषके अपहर्ता, पौष्टिक तथा स्नेहयुक्त होते हैं। इसकी मदिरा सब प्रकारसे पित्त-दोषको उत्पन्न करनेवाली तथा अपनी अम्लताके कारण कफ और वात-दोषको दूर करनेवाली है। सौवीर प्रान्तमें प्राप्त होनेवाली सभी प्रकारकी मदिराएँ रक्त-पित्तकारक तथा तीक्ष्ण गुणवाली होती हैं।
माँड़ और भूना हुआ चावल पथ्य है, यह अग्निदीपक और पाचक होता है। तक्रके साथ दाडिम, त्रिकटु, गुड़, मधु तथा पिप्पलीके मिश्रणसे तैयार किया गया पेय पदार्थ वात-दोष-विनाशक, लघु और वस्तिभागका शोधक है, किंतु मनुष्यको इस सुन्दर पेयका परित्याग कर देना चाहिये, जो कास, श्वास और नाड़ी-रोगको बल प्रदान करनेवाला है।
पायस अर्थात् खीर कफोत्पादक तथा बलवर्धक होता है। खिचड़ी वातनाशक है। सुधौत अर्थात् दालका सूप स्निग्ध, उष्ण, लघु और रुचिकर होता है। कन्द, मूल और फलसे तैयार किया गया सूप भारी और पाचक माना गया है। कुछ उष्ण सेवन करनेसे वह सूप हल्का हो जाता है और यथाशीघ्र पच जाता है। शाकको उबालकर उसे निचोड़ना चाहिये। तदनन्तर उसको घृत या तेलसे संस्कारित करके प्रयोग करना हितकारी होता है।
दाडिम तथा आँवलेसे तैयार किया गया सूप हृदयको प्रिय अग्निवर्धक और वात-पित्त-विनाशक होता है। मूलीसे बनाये गये सूपके द्वारा श्वास, कास, प्रतिश्याय तथा कफज दोष दूर हो जाते हैं। यव, कोल और कुलथीका रस सुस्वादु तथा वात-विनाशक होता है। मूँग तथा आँवलेसे तैयार हुआ सूप ग्राह्य है। यह कफ और पित्तका विनाश करनेवाला है।
गुड़मिश्रित दही वातनाशक होता है। सभी प्रकारके सत्तू रूक्ष एवं वातवर्धक होते हैं। पूड़ी पौष्टिक और पाचनमें भारी होती है। मांसयुक्त भोजन बृंहण और भक्ष्यपिष्टक (चावल एवं दाल आदिको पीसकर बनाया पीठा) भारी माना जाता है। तेलमें तलकर तैयार किये गये पिष्टक दृष्टिनाशक हैं। अत्यन्त उष्ण मण्डक पथ्य है। शीतल होनेपर इसे भारी माना जाता है।
उक्त द्रव्य-पदार्थोंके गुणावगुणका विवेचन करके ही मनुष्यको अनुपानकी व्यवस्था करनी चाहिये। अनुपानके साथ औषधका सेवन करनेसे श्रम और तृष्णाका नाश स्वतः ही हो जाता है। यथोचित अन्नपान आदि करनेसे प्राणीमें कोई रोग नहीं होता। वह सभी रोगोंसे विमुक्त हो जाता है।
विष उष्णतारहित तथा मोरके कण्ठके समान नीले वर्णका होता है। वह प्राणीके नैसर्गिक वर्णको परिवर्तित कर देता है। इसका गन्ध, स्पर्श और रस तीव्र होता है। यह खानेवाले व्यक्तिके मनको व्यथित कर देता है। इसे सूँघनेपर नेत्ररोग उत्पन्न हो जाता है। श्रेष्ठ वैद्योंके द्वारा भी इसका शमन अत्यन्त कठिन है। कम्पन तथा जँभाई आदि इसके लक्षण हैं।
(अध्याय १६९)
१५०- स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ
काण्ड ] ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार ३१५
ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार
धन्वन्तरिजीने पुनः कहा—वातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वातकफज, पित्तकफज, संनिपातज और आगन्तुज-रूपमें आठ प्रकारका ज्वर माना गया है। मुस्त (मोथा), पर्पटक (पित्तपापड़ा), उशीर (खस), चन्दन तथा उदीच्यनागर (सोंठ)-के सहित जलको पकाकर तैयार किया गया शीतल क्वाथ ज्वर-जनित प्यासकी शान्तिके लिये देना चाहिये।
नागर, देवदारु, धान्यक, बृहतीद्वय और कण्टकारीका क्वाथ ज्वर-रोगीको सबसे पहले देना चाहिये। आरग्वध (अमलतास), अभया (पिप्पलीमूल), मुस्त (मोथा), अतितिक्ता (कुटकी) तथा ग्रन्थिक (हरीतकी)-द्वारा जलमें पकाकर तैयार किया गया क्वाथ उद्वेग, शूल और ज्वरमें हितकारी है। मधुकसार (मधु), सेंधा नमक, वच, काली मिर्च और पिप्पली—इन सभीको समान मात्रामें जलके साथ महीन पीसकर कपड़छान कर लेना चाहिये। इसका नस्य देनेसे ज्वरके प्रभावसे मूर्च्छित हुआ रोगी होशमें आ जाता है। त्रिवृद्धिशाला (निसोत-इन्द्रायण), त्रिफला, कटुकी और अमलताससे बने हुए क्वाथमें सेंधा नमक डालकर उसको पीनेसे सभी प्रकारका ज्वर विनष्ट होता है। सोंठ, मोथा, रक्तचन्दन, खस तथा धान्यक (धनिया)-से बने क्वाथमें शर्करा और मधु मिलाना चाहिये। इसका पान करनेसे तृतीयक (तिजरिया)-ज्वर विनष्ट हो जाता है।
रविवारको अपामार्ग (चिचड़े)-की जड़ लाल सूत्रसे बाँधकर कमरमें सात बार घुमाकर बाँधनेसे निश्चित ही इस तिजरिया-ज्वरका नाश होता है। 'गङ्गाया उत्तरे कूले अपुत्रस्तापसो मृतः'—(गङ्गाके उत्तरी तटपर पुत्रविहीन तपस्वी ब्राह्मणकी मृत्यु हो गयी है।) कहकर उसे तिलोदक देना चाहिये। ऐसा करनेसे एक आह्निक ज्वर रोगीको छोड़ देता है।
गुडूची (गिलोय)-का क्वाथ और कल्क*, त्रिफला तथा वासक (अडूसा)-का क्वाथ एवं कल्क, द्राक्षा और बला (वरियारा)-का क्वाथ और कल्कसे सिद्ध घृत सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाशक है। आँवला, हरीतकी और पिप्पली-चिताका क्वाथ सभी प्रकारके ज्वरोंको विनष्ट करनेवाला है।
इसके बाद अब मैं ज्वरातिसारनाशक औषधिका वर्णन करता हूँ।
पृश्निपर्णी (पिठवन लता), बला, बिल्व, सोंठ, कमल, धान्यक, पाठा, इन्द्रयव, भूनिम्ब (चिरायता), मुस्त तथा पर्पटकसे बना हुआ क्वाथ आमातिसार तथा ज्वरको विनष्ट करता है। नागर, अतिविषा (अतसी या अलसी), मुस्त, भूनिम्ब (चिरायता) और अमृतवत्सकसे बना क्वाथ सभी ज्वर तथा सभी अतिसार-रोगोंका नाशक है। मुस्त, पित्तपापड़ा और सोंठ-मिश्रित दूध भी अतिसार-रोगका विनाश करता है। शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारी, बला, गोखरू, बिल्व, पाठा, सोंठ तथा धनियाका क्वाथ सभी प्रकारके अतिसार-रोगोंमें हितकारी होता है। बिल्व और आमकी गुठलीके क्वाथका मिश्री तथा मधुके साथ सेवन अतिसारका नाशक है। अतिसारमें कुटज-वृक्षका छाल भी हितकारी होता है। इन्द्रयव, अलसी, सोंठ और पिप्पलीमूलका क्वाथ प्रयोग करनेसे आमशूलसे युक्त खूनी अतिसारमें लाभ होता है।
अब मैं ग्रहणी-रोगकी चिकित्सा कह रहा हूँ।
* कूटकर लुगदी बनानेको कल्क कहा जाता है।
| ३१६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ग्रहणी जठराग्निको विनष्ट कर देती है। चित्रक अर्थात् चित्ताके द्वारा बने हुए क्वाथ और कल्कके साथ पका हुआ घृत ग्रहणी-रोगका विनाशक है। यह गुल्म, शोथ, उदर, प्लीहा, शूल तथा अर्शरोगको भी नष्ट कर देता है। इसके सेवनसे पेटकी अग्नि प्रदीप्त हो उठती है। सौवर्च (काला नमक), सैन्धव (सेंधा नमक), विडंग (लवण-विशेष), उद्भिद (रेह) और समुद्र-फेन—इन पाँचों लवणोंके समान भागमें मिश्रित चूर्णका प्रयोग करनेसे लाभ होता है।
शस्त्र, क्षार तथा अग्नि इस त्रिविध चिकित्साके द्वारा अर्श-रोगका विनाश होता है। यदि नया तैयार किया हुआ तक्र हो तो उसको भी अर्श-विनाशक ही मानना चाहिये। घीमें भूनी गुडूची, पिप्पली और हरीतकीका चूर्ण अम्ल तथा लवणके साथ रसोतका चूर्ण खानेसे भी यह रोग दूर हो जाता है। तिल और ईखके रसका प्रयोग करनेसे अर्श तथा कुष्ठ-रोगका विनाश होता है। पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चीता तथा सोंठ)-के साथ काली मिर्च और त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च)-का चूर्ण अग्निवर्धक है। सोंठ, गुड़ अथवा सेंधा नमकके साथ हरीतकीका चूर्ण निरन्तर खाना चाहिये; क्योंकि यह अग्निवर्धक होती है। त्रिफला, गिलोय, वासक, चिरायता, नीमकी छाल और नीमकी गिरीका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे कामला तथा पाण्डु-रोग समाप्त हो जाता है। त्रिवृत, त्रिफला, श्यामा, पिप्पली, शर्करा और मधुमिश्रित बना मोदक संनिपात-ज्वरका विनाशक तथा रक्त-पित्तज ज्वरको भी नष्ट करता है।
वासक (अडूसाँ)-का रस उदरभागमें पहुँचनेपर जीवनकी आशा बनी रहती है। ऐसी स्थितिमें रक्त और पित्तका क्षय होता है, तब खाँसीके रोगसे व्यथित प्राणी किसलिये दुखित होता है (अर्थात् वासकके रहते खाँसीके रोगीको जीवनसे निराश नहीं होना चाहिये।) शर्करासे युक्त जंगली अडूसा और मृद्धीक^२ रसका बना क्वाथ पथ्य है। इसको मिश्रीके साथ पान करनेसे कास, निःश्वास और रक्तपित्तज दोष विनष्ट हो जाता है। मिश्री अथवा मधुके साथ अडूसेका रस पान करनेसे रोगी रक्तज दोषपर सफलता प्राप्त कर लेता है। शाल्लकी (सलई), बेर, जामुन, प्रियाक, आम, अर्जुन और धव नामक वृक्षकी छालका क्वाथ दूध और मधुके साथ पान करनेसे रक्त-सम्बन्धित रोग दूर हो जाता है। अपने ही रसमें भावित, मूल, फल और पत्रसहित निर्गुण्डीका सिद्ध घृत पान करके क्षय-रोगसे क्षीण हुआ रोगी व्याधिरहित होकर देवताओंके समान कान्तिमान् हो उठता है।
हरीतकी, सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च और गुड़ मिलाकर बनाये गये मोदकको कासनाशक कहा गया है। इसको खानेसे तृष्णा एवं अरुचिका भी नाश होता है। कण्टकारी तथा गुडूचीसे पृथक्-पृथक् निकाले गये तीस-तीस पल रसमें सिद्ध किया गया एक प्रस्थ घृत कासरोगका नाश और अग्निका दीपन करता है। कृष्णा (काली पत्तियोंवाली तुलसी), धात्री (आँवला), श्वेत सोंठका चूर्ण मधुके साथ मिलाकर खाना हिक्का (हिचकी)-रोगका विनाशक बन जाता है। जो प्राणी हिचकी और श्वास-रोगके रोगी हैं, उनको विश्वा अर्थात् सोंठके साथ भार्गी (भारंगी)-का रस गरम जलसे पीना चाहिये।
स्वरभेद होनेपर मुखमें तिलके तेलमें सिद्ध खदिर (कत्थे)-का रस रखना लाभप्रद होता है
१-वासायां विद्यमानायामाशायां जीवितस्य च। रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थमवसीदति॥
२-मृद्धीक—मुनक्का
काण्ड ] ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार ३१७
अथवा सोंठके साथ हरीतकी और पिप्पलीका चूर्ण इस रोगमें लाभकारी है। मधुके साथ विडंग तथा त्रिफलाका चूर्ण वमन-रोगको दूर करता है। आम और जामुनकी छालका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे सभी प्रकारके वमन नष्ट हो जाते हैं। यह तृष्णाको भी समाप्त कर देता है अथवा इस रोगमें मधुके साथ त्रिफलाचूर्णका ही सेवन करना चाहिये। यह औषधि तो भ्रम और मूर्च्छाको भी दूर कर देती है। गायके दूध, दही, घृत, मूत्र और गोमयसे बना पञ्चगव्य हितकारी होता है। इसका अनुपान अपस्मार (मिरगी) और मलग्रहादि रोगोंको नष्ट करता है। कूष्माण्ड (कुम्हड़ा)-का रस ब्रह्मयष्टी तथा घृतके साथ पान करनेसे भी उक्त अपस्मार और मलग्रहादिके रोग दूर होते हैं। ब्राह्मी रस, वचकुष्ठ और शंखपुष्पीके साथ प्रयुक्त पुराना घृत प्राणियोंके लिये सेव्य है, क्योंकि यह उन्माद, ग्रहणी और अपस्मार-रोगोंका विनाशक है।
अश्वगन्ध क्वाथका कल्क बनाकर उसमें चौगुना दूध डालकर पकाना चाहिये। तदनन्तर उस योगमें घृतपाक तैयार करके उसका सेवन करे। यह घृत वातनाशक, बल-मांस-वर्धक और पुत्रोत्पादक होता है। नीली<sup>१</sup> और मुण्डीका चूर्ण मधु एवं घृतके साथ मिलाकर सेवन करनेसे अथवा छिन्ना (गिलोय)-का क्वाथ पान करनेसे वह अत्यन्त असाध्य वात-रक्तको दूर कर देता है। गुड़के सहित हरीतकी आदि पाँच औषधियोंका सेवन कुष्ठ, अर्श तथा वातरोगका विनाशक है। गुडूचीका रस, कल्क, चूर्ण अथवा क्वाथ वात-रक्तरोगका हन्ता है। गुडूची लताके क्वाथसे बने कल्कका उपयोग करनेसे कुष्ठ और व्रणरोगका उपशमन होता है। इस कल्कका प्रयोग गोघृत या गोदुग्धके साथ करना चाहिये।
त्रिफला तथा गुग्गुल वात-रक्त और मूर्च्छाका नाशक है। गोमूत्रके साथ प्रयुक्त गुग्गुल ऊरुस्तम्भ नामक रोगका शमन करता है। सोंठ और गोखरूका क्वाथ सामवात तथा शूलरोगका विनाशक है। दशमूल<sup>२</sup>, हरीतकी, एरण्ड, रास्ना, सोंठ और देवदारु नामक औषधियोंसे बना हुआ क्वाथ काली मिर्च एवं गुड़के साथ सेवन करनेपर महाशोथको दूर करता है। कण्टकारी और गुडूचीके पृथक्-पृथक् तीस-तीस पल रसको निकालकर उसमें एक प्रस्थ सिद्ध किया गया घृत कासरोग-विनाशक तथा जठराग्नि-दीपक होता है। काली तुलसी, आँवला, सफेद सोंठ, काली मिर्च और सेंधा नमकसे बना हुआ क्वाथ एरण्ड-तेलके साथ पान करनेपर वह आमदोष तथा प्रबल वायु-विकारको दूर करता है।
बला, पुनर्नवा, एरण्ड, बृहतीद्वय, कण्टकारी और गोखरूका क्वाथ हींग और सेंधा नमक मिलाकर पान करनेसे वातशूल विनष्ट हो जाता है। दाह और शूलरोगकी शान्तिके लिये त्रिफला, निम्ब, मुलेठी, कटुकी तथा अमलताससे बने क्वाथको मधु मिलाकर पान करना चाहिये। जेठी मधुके साथ त्रिफलाका क्वाथ पीनेपर शूलसे होनेवाला दुःख दूर होता है। त्रिफलाचूर्ण गोमूत्र और शुद्ध मण्डूर, मधु तथा घृतके साथ चाटनेपर त्रिदोषजन्य शूलको विनष्ट करता है।
त्रिवृत, काली तुलसी और हरीतकीके चूर्णको क्रमशः दो भाग, चार भाग तथा पाँच भाग गुड़-समन्वित करके उसकी समान गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे मलकाठिन्य-दोष दूर हो जाता है। हरीतकी, यवक्षार, पिप्पली और त्रिवृत अर्थात्
१-नीली (नील), २-बिल्व, श्योणाक, गम्भारी, पाटला, गणकारिका, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहतीद्वय, कण्टकारी तथा गोखरू-इन दस वृक्षोंके मूल दशमूल कहलाते हैं।
१५१- मधुर, अम्ल और तिक्त आदि द्रव्योंका वर्ग तथा उनका औषधीय उपयोग
३१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
निसोथका चूर्ण घृतके साथ पान करनेके योग्य है, क्योंकि यह उदावर्त-रोगका विनाश करता है। त्रिवृत, हरीतकी और काली तुलसीकी पत्तीका मिश्रित चूर्ण स्नुहीक्षीर अर्थात् सेहुँड़के दूधसे भावित करके उससे बनायी गयी वटीका गोमूत्रके साथ पान करनेसे अनाह-रोग नष्ट हो जाता है। त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च), त्रिफला (हरीतकी, आँवला तथा बहेड़ा), धनिया, विडंग, चव्य (गजपिप्पली) तथा चित्रक (चित्ता) नामक औषधियोंके चूर्णको कल्कसे सिद्ध घृत वातगुल्म-रोगका विनाशक है।
दुग्धमें प्रयुक्त सोंठके चूर्णका अनुपान हृदयगत पीड़ाका नाश करता है। काला नमक तथा उसका आधा भाग हरीतकी-चूर्ण घृतमें मिलाकर पान करनेसे भी यह रोग दूर हो जाता है। कणा (पिप्पली), पाषाणभेदी (पथरचट्टा)-के रसमें शिलाजीतका चूर्ण मिलाकर उसको चावलके जल और गुड़के साथ पान करनेसे मूत्रकृच्छ्ररोगी रोग-विमुक्त हो जाता है। गिलोय, सोंठ, आँवला, अश्वगन्धा और त्रिकण्टक (गोखरू)-का अनुपान वातरोगी, शूलग्रस्त तथा मूत्रकृच्छ्रके रोगीको करना चाहिये। शर्करा अथवा मिश्रीके साथ समान भागमें प्रयुक्त यवक्षार सभी प्रकारके कृच्छ्ररोगोंका विनाशक है अथवा मधुके साथ निदिग्धिका (इलायची)-का रस पान करनेसे भी सब प्रकारके कृच्छ्ररोग विनष्ट हो जाते हैं।
त्रिफला-कल्कके साथ प्रयोगमें लाये गये सेंधा नमकको भी मूत्राघातका विनाशक माना गया है। मूत्रमें अवरोध होनेपर कर्पूरका चूर्ण लिंगमें प्रविष्ट करना चाहिये। मधुके साथ प्रयुक्त आँवलेका रस सभी प्रकारके मेहरोगोंको विनष्ट करनेवाला है। त्रिफला, देवदारु, दारुहल्दी और कमलमूलका क्वाथ भी मधुके साथ पान करनेसे वह प्रमेहरोगको दूर करता है।
शरीरकी पुष्टि चाहनेवाले व्यक्तिको अनिद्रा, मैथुन, व्यायाम तथा चिंताका परित्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे शरीर धीरे-धीरे पुष्ट होने लगता है। यव और साँवाँ खानेवाला प्राणी स्थूल हो जाता है। मधुके साथ जल पीनेसे भी प्राणीके शरीरमें स्थूलता आ जाती है। उष्ण अन्न अथवा माँडयुक्त चावलका भोजन करनेसे शरीर कृश हो जाता है। गजपिप्पली, जीरा, त्रिकटु, हींग, काला नमक तथा आँवलाचूर्ण-समन्वित सत्तूको मधुके साथ पान करनेसे मेदा-विकारका नाश और अग्निका उद्दीपन होता है।
चौगुने जल और दोगुने गोमूत्रमें चित्रक नामक औषधिका कल्क पाक करके उसके द्वारा उदररोगीको एक प्रस्थ घृत सिद्ध करना चाहिये। तदनन्तर वह दूधके साथ उस घृतका पान करे। ऐसा करनेसे उसकी जठराग्नि उद्दीप्त हो उठती है। अनुपानमें दूधके साथ क्रमशः एक-एक पिप्पलीकी अभिवृद्धि करते हुए रोगी दस दिनतक उसका सेवन करे, पुनः उसी क्रमसे एक-एक पिप्पलीको घटाते हुए बीसवें दिन मात्र एक पिप्पलीका सेवन करे तो उससे भी उस रोगीकी जठराग्नि प्रबल हो जाती है। पुनर्नवाके क्वाथ एवं कल्कसे सिद्ध किया गया घृत शोथ-रोगका विनाश करनेमें समर्थ होता है। शोथ-रोगीको गोमूत्र या गोदुग्धके साथ पिप्पली अथवा गुड़के साथ समान भागमें हरीतकी या सोंठका सेवन करना चाहिये।
मनुष्य बला नामक औषधिके रसमें सिद्ध दूधके साथ एरण्ड-तेलका पान करके आध्मान तथा शूलजनित पीड़ासे युक्त आन्त्रवृद्धिके रोगपर विजय प्राप्त कर सकता है। अग्निशोधित अरुचक अर्थात् एरण्ड-तेलसे सिद्ध पथ्या (हरीतकी)-का कल्क, काला नमक एवं सेंधा नमकसे समन्वित