गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१९३- नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन
काण्ड ] स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि ३९१
अञ्जलिमें जल लेकर पहले मार्जन करे, फिर शेष जलको बाहर फेंके। तदनन्तर दोनों चरण, जंघा और कटिप्रदेशमें तीन-तीन बार मिट्टी लगाये। इसके पश्चात् दोनों हाथ धोकर आचमन करके जलको नमस्कार करे। इसके बाद 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' का पाठ करके 'ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा' इत्यादि महाव्याहृतिमन्त्रसे आचमन और 'ॐ इदं विष्णु०' आदि मन्त्रसे मिट्टीद्वारा अङ्गोंका मार्जन करे। फिर सूर्याभिमुख होकर 'ॐ आपो अस्मान्०' इत्यादि मन्त्रसे जलमें डुबकी लगाये। तदनन्तर शरीरको मल-मलकर स्वच्छ करे और धीरे-धीरे डुबकी लगाते हुए स्नान करे।
इसके बाद 'ॐ मा नस्तोके तनये मा न०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके गोमयके द्वारा अङ्गका लेपन करे। फिर 'ॐ इमं मे वरुण०' इत्यादि वारुणमन्त्रसे यथाक्रम अपने मस्तक आदिका अभिषेक करे। पूर्वोक्त मन्त्रोंसे विधिवत् आत्माभिषेक करके जलमें डुबकी लगाकर पुनः आचमन करे। 'ॐ आपो हि ष्ठा०', 'ॐ इदं आपो हविष्मती०', 'ॐ देवी राप०', 'ॐ द्रुपदादिव०' तथा 'ॐ शं नो देवी०' इत्यादि पावमानी मन्त्रोंसे समाहित होकर मार्जन करे। 'ॐ हिरण्यवर्णा०', 'ॐ पवमानसूक्तम्०', 'ॐ तरत्सामाः०' तथा 'ॐ शुद्धवत्यः०' आदि पवित्र करनेवाले मन्त्रों एवं वारुणमन्त्रोंसे यथाशक्ति जलाभिषेक करे।
ओंकार और व्याहृतिसमन्वित गायत्री-मन्त्रका पाठ करते हुए स्नानके आदि और अन्तमें जलाभिषेक करे। जलके मध्यमें रहकर ही मार्जन करनेका विधान है। जलमें डूबकर अघमर्षण-मन्त्रको तीन बार पढ़ना चाहिये। इसके बाद 'ॐ द्रुपदा०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके 'ॐ आयं गौः०' इत्यादि तीन ऋचाओंका पाठ करे। तदनन्तर स्मृतियोंमें निर्दिष्ट स्नानाङ्ग-मन्त्रोंका समाहितचित्तसे पाठ करे अथवा महाव्याहृति और प्रणवसे युक्त गायत्रीका जप करे या प्रणवकी आवृत्ति करे अथवा अव्यय विष्णुका स्मरण करे। जल ही विष्णुका आयतन है। विष्णु ही जलके अधिपति कहे गये हैं। जलमें विष्णुका स्मरण करे। 'ॐ तद् विष्णोः परमं पदम्०' इत्यादि कहकर बार-बार स्नान करे। यह वैष्णवी गायत्री विष्णुके सर्वाङ्ग-स्मरणमें निमित्त है। 'ॐ इदमपः प्रवहतः०' इत्यादि पवित्र मन्त्रोंसे अपने मलका निवारण करते हुए मार्जन करे और अपनेको निर्मल शरीरवाला बना ले। फिर 'ॐ तद्विष्णोः परमं पदम्०' इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करे।
यथाविधि स्नानक्रियाको सम्पन्नकर धोये हुए अखण्डित पवित्र दो वस्त्रोंको पहनकर मिट्टी और जलके द्वारा हाथ तथा पैरका प्रक्षालन करके संध्या एवं तर्पण करना चाहिये। स्नान और भोजनके आरम्भमें आचमनकर पुनः मन्त्रके द्वारा अन्तमें आचमन करना चाहिये। आचमनके बाद तीन बार 'ॐ द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर जलद्वारा मूर्धाभिषेक तथा अघमर्षण करे। पुनः आचमन और मार्जन तथा तीन बार आचमनकर धीरे-धीरे प्राणायाम करे। इसके बाद अञ्जलिमें जल एवं पुष्प धारण करके सूर्यार्घ्य दे और ऊर्ध्वबाहु होकर समाहितचित्त हो सूर्यका निरीक्षण करते हुए 'ॐ उदु त्यं०', 'ॐ चित्रं देवानां०', तथा 'ॐ तच्चक्षुर्देवहितं०' एवं 'ॐ हंसः शुचिषद्०' इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करते हुए सूर्योपस्थापन करे। इस प्रकार सूर्योपस्थापन करके यथाशक्ति गायत्रीका जप करना चाहिये। इसके पश्चात् 'ॐ बिभ्राट्०' अनुवाक, पुरुषसूक्त, शिवसंकल्पसूक्त, मण्डलब्राह्मण इत्यादि सूर्यके मन्त्रोंका सभी देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यथाशक्ति जप करे अथवा जपकी साङ्गोपाङ्ग
१९४- सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि
| ३१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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पूर्णताके लिये विधिवत् अध्यात्मविद्याका जप करे। तदनन्तर सव्य होकर तीन बार आचमनकर श्री, मेधा, धृति, क्षिति, वाक्, वागीश्वरी, पुष्टि, तुष्टि, उमा, अरुन्धती, शची, मातृगण, जया, विजया, सावित्री, शान्ति, स्वाहा, स्वधा, धृति, श्रेष्ठ अदिति, ऋषिपत्नियों, ऋषिकन्याओं और अन्य काम्य देवताओंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त होकर सभीकी मङ्गलकामनासे सर्वमङ्गलादेवीको तृप्त करे और ‘ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यत्विति’ इस मन्त्रसे तीन अञ्जलि जल देते हुए तर्पण-क्रियाकी सम्पन्नताकी कामना करे।
(अध्याय २१४)
तर्पण-विधिका वर्णन
ब्रह्माजीने कहा—इसके बाद तर्पणविधिका वर्णन करता हूँ। इस विधिके अनुसार तर्पण करनेसे देवगण और पितृगण तुष्ट होते हैं। सर्वप्रथम ‘ॐ मोदास्तृप्यन्ताम्’ इत्यादि मन्त्रोंसे एक-एक अञ्जलि जल प्रदान करे। तर्पणके मन्त्र इस प्रकार हैं—
ॐ मोदास्तृप्यन्ताम्। ॐ प्रमोदास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुमुखास्तृप्यन्ताम्। ॐ दुर्मुखास्तृप्यन्ताम्। ॐ विघ्नास्तृप्यन्ताम्। ॐ विघ्नकर्तारस्तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरस्सावयवस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवान्धकास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरिन्मनुष्या यक्षास्तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामाश्चतुर्विधास्तृप्यन्ताम्। ॐ दक्षस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ विश्वामित्रस्तृप्यताम्। ॐ कश्यपस्तृप्यताम्। ॐ जमदग्निस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ स्वायम्भुवस्तृप्यताम्। ॐ स्वारोचिषस्तृप्यताम्। ॐ तामसस्तृप्यताम्। ॐ रैवतस्तृप्यताम्। ॐ चाक्षुषस्तृप्यताम्। ॐ महातेजास्तृप्यताम्। ॐ वैवस्वतस्तृप्यताम्। ॐ ध्रुवस्तृप्यताम्। ॐ धवस्तृप्यताम्। ॐ अनिलस्तृप्यताम्। ॐ प्रभासस्तृप्यताम्।
इसके बाद निवीती होकर अर्थात् यज्ञोपवीतको मालाके रूपमें गलेमें धारणकर ‘ॐ सनकस्तृप्यताम्’ इत्यादि निम्न मन्त्रोंसे तर्पण करे—
ॐ सनकस्तृप्यताम्। ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्। ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ कपिलस्तृप्यताम्। ॐ आसुरिस्तृप्यताम्। ॐ वोढुस्तृप्यताम्। ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्। ॐ मनुष्याणां कव्यवाहस्तृप्यताम्। ॐ अनलस्तृप्यताम्। ॐ सोमस्तृप्यताम्। ॐ यमस्तृप्यताम्। ॐ अर्यमा तृप्यताम्।
तदनन्तर प्राचीनावीती होकर अर्थात् दाहिने कंधेपर यज्ञोपवीत धारणकर अधोलिखित मन्त्रोंसे तर्पण करे—
ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्। ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्।
* इस अध्यायमें तर्पणकी अवश्यकर्तव्यता एवं उसकी दिशाका संकेतमात्र किया गया है। तर्पणक्रम एवं विधिका ज्ञान अपनी शाखाके ग्रन्थोंसे करना चाहिये। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंको ‘नित्यकर्म-पूजाप्रकाश’ (प्रकाशित गीताप्रेस)-से सरलतम प्रामाणिक तर्पणविधि जान लेनी चाहिये।
काण्ड ] बलिवैश्वदेवनिरूपण ३१३
ॐ यमाय नमः। ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः। ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः। ॐ कालाय नमः। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः। ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः। ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः। ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः। ॐ चित्रगुप्ताय नमः। ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगत्तृप्यतु। ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। तृप्यतामिति।
अधोलिखित मन्त्रोंका पारायण पितरोंका ध्यान करते हुए करे—
'ॐ उदीरतामवर०', 'ॐ अग्निरसो नः०', 'ॐ आयन्तु नः०', 'ॐ ऊर्जां०', 'ॐ पितृभ्य०', 'ॐ ये चेह०' तत्पश्चात् 'ॐ मधुवाता०' इसके बाद 'ॐ नमो वः पितरो०' इत्यादि मन्त्रसे ध्यान करते हुए अधोलिखित मन्त्रसे जल दे—
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। आदि·····।
ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते तृप्यन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥
इस मन्त्रका पाठकर वस्त्रनिष्पीडित जलसे अपने कुलमें उत्पन्न पुत्र-हीनजनोंके लिये तर्पण करे।
(अध्याय २१५)
बलिवैश्वदेवनिरूपण
ब्रह्माजीने कहा— अब मैं वैश्वदेव-बलिविधिक विधान बतलाता हूँ। यह होमका एक प्रारम्भिक उत्तम स्वरूप है। पहले अग्निको जलाकर अग्निका पर्युक्षण करे, तदनन्तर 'ॐ कव्यादमग्निं०' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके लिये कुछ हव्यांशका परित्याग करे। इसके बाद 'ॐ पावक वैश्वानर०' मन्त्रको पढ़कर अग्निका आवाहन करे और ॐ प्रजापतये स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ बृहस्पतये स्वाहा। ॐ अग्निषोमाभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहा। ॐ द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ अद्भ्यः स्वाहा। ॐ ओषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा। ॐ गृहाय स्वाहा। ॐ देवदेवताभ्यः स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ इन्द्रपुरुषेभ्यः स्वाहा। ॐ यमाय स्वाहा। ॐ यमपुरुषाय स्वाहा। ॐ सर्वेभ्यो भूतेभ्यो दिवाचारिभ्यः स्वाहा। ॐ वसुधापितृभ्यः स्वाहा—इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे। तदनन्तर 'ॐ ये भूता॑ प्रचरन्ति०'<sup>१</sup> का पाठ करते हुए बलि और पुष्टि प्रदान करनेकी प्रार्थना करे। अन्तमें 'ॐ आचाण्डालपतितवायसेभ्यो नमः' इस मन्त्रसे भी काक आदिको बलि प्रदान करे<sup>२</sup>।
(अध्याय २१६)
१-ये भूताः प्रचरन्ति दीनाश्च निमिहन्तो भुवनस्य मध्ये। तेभ्यो बलिं पुष्टिकामो ददामि मयि पुष्टिं पुष्टिपतिर्दधातु॥ (२१६।२)
२-इस अध्यायमें बलिवैश्वदेवकी विधि अन्य शाखाके अनुसार है। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंके लिये 'पारस्करगृह्यसूत्र' के अनुसार संक्षिप्त एवं प्रामाणिक 'बलिवैश्वदेवविधि' गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' में द्रष्टव्य है।
१९५- धर्मसारका कथन
| ३९४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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संध्याविधि<sup>१</sup>
श्रीब्रह्माजीने कहा— अब द्विजातियोंके लिये संध्या-विधिका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम इस मन्त्रसे बाह्य तथा आभ्यन्तर शुद्धि करे—
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
अर्थात् पवित्र हो या अपवित्र किसी भी अवस्थामें क्यों न हो, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारकी शुद्धि हो जाती है।
उपनयन-संस्कारके समय जिस गायत्रीमन्त्रका उपदेश प्राप्त होता है, उसीका जप संध्योपासनमें होता है। उपनयनकालमें गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार होता है—'ॐ गायत्री छन्दः, विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप्, समुद्राः कुक्षिः, चन्द्रादित्यौ लोचनौ, अग्निर्मुखम्, विष्णुर्हृदयम्, ब्रह्मरुद्रौ शिरः, रुद्रः शिखा उपनयने विनियोगः'।
संध्योपासनके समय गायत्रीमन्त्रके जपसे पहले 'ॐ भूः' से पैरमें, 'ॐ भुवः' से जानुओंमें, 'ॐ स्वः' से हृदयमें, 'ॐ महः' से सिरमें, 'ॐ जनः' से शिखामें, 'ॐ तपः' से कण्ठमें और 'ॐ सत्यम्' से ललाटमें न्यास करना चाहिये। आगेके मन्त्रोंसे हृदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र आदिमें न्यास करे—ॐ हृदयाय नमः, ॐ भूः शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वौषट्, ॐ स्वः कवचाय हुम्, ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्। इसके बाद ॐ भूः, ॐ भुवः इत्यादि सप्तव्याहृतियोंके साथ गायत्रीके तृतीय पाद 'ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतम् भूर्भुवः स्वरोम्' का जप करते हुए प्राणायाम करे। प्राणायामके बाद 'ॐ सूर्यश्च०' इस मन्त्रसे प्रातःकालकी, 'ॐ आपः पुनन्तु०' इस मन्त्रसे मध्याह्नकालकी तथा 'ॐ अग्निश्च०' इस मन्त्रसे सायंकालीन संध्यामें आचमन करे। तत्पश्चात् आवाहनपूर्वक भगवती गायत्रीके प्रातः, मध्याह्न तथा सायं-स्वरूपोंका ध्यान करे। फिर 'ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः०' और 'ॐ सुमित्रिया न आपः०' एवं 'ॐ द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा जलसे मार्जन करे और 'ॐ ऋतं च सत्यं०' इस मन्त्रसे अघमर्षण करे। तदनन्तर गायत्रीजपसे पूर्व गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार करे—'ॐ गायत्र्या विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः'। 'ॐ उदु त्यं जातवेदसं०', 'ॐ चित्रं देवानां०', 'ॐ तच्चक्षुः०'—ये सूर्योपस्थानके मन्त्र हैं। गायत्रीका जप करनेके अनन्तर 'ॐ विश्वतश्चक्षु०', 'ॐ देवागातु०' तथा 'ॐ उत्तरे शिखरे०' इन मन्त्रोंसे जपसमर्पणपूर्वक गायत्रीदेवीका विसर्जन करे।
(अध्याय २१७)
पार्वणश्राद्धविधि<sup>२</sup>
श्रीब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! अब मैं श्राद्धविधिका वर्णन करता हूँ। इस विधिके अनुसार पितरोंका श्राद्ध करनेसे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति होती है। श्राद्धकर्ता श्राद्धके एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। ब्रह्मचारीको निमन्त्रित करनेसे विशेष फल होता है।
<sup>१</sup>इस अध्यायमें संध्याकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त दी गयी है। अतः सविधि विस्तारपूर्वक 'संध्योपासनविधि' जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' पुस्तक देखना चाहिये।
<sup>२</sup>श्राद्ध दो प्रकारका होता है—सपात्रकश्राद्ध तथा अपात्रकश्राद्ध। सपात्रकश्राद्धमें विश्वेदेव एवं पितरोंके रूपमें साक्षात् ब्राह्मणोंको ही आसनपर बिठाकर समस्त श्राद्धविधि सम्पन्न की जाती है। यहाँ इसी सपात्रकश्राद्धकी विधिका निर्देश किया गया है। ऐसे श्राद्धके लिये पूर्ण सात्त्विक, जाति, विद्या, तप आदिकी दृष्टिसे अति पवित्र एवं उत्कृष्ट ब्राह्मण ही उपादेय है। कलियुगमें ऐसे ब्राह्मण दुर्लभ हैं। इसीलिये अपात्रक-श्राद्ध ही वर्तमानमें किया जाता है। अपात्रकश्राद्धमें साक्षात् ब्राह्मण आसनपर नहीं बिठाये जाते हैं। विश्वेदेव एवं पितरोंके आसनोंपर उनके प्रतिनिधिरूपमें कुश (दण्ड-विधान त्रिकुश, पटवेल एवं मोटक) ही रखा जाता है।
काण्ड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१५
सव्य होकर देवताओं (विश्वेदेवों)-को एवं अपसव्य होकर पितरोंको निमन्त्रित (आवाहित) करे। श्राद्धकर्ता 'ॐ स्वागतं भवद्भिः' (भवद्भिः स्वागतं स्वीक्रियताम्) आपलोग मेरा स्वागत स्वीकार करें—यह निवेदन विश्वेदेवों एवं पितरोंसे करे। तदनन्तर 'ॐ सुस्वागतम्' इस प्रकार विश्वेदेवों एवं पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण बोलें। श्राद्धकर्ता 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतत्पादोदकमर्घ्यं स्वाहा' कहकर देव-ब्राह्मणोंके चरणोंपर देवतीर्थसे समूल कुशोंके सहित जल प्रदान करे। यह कुश द्विगुणभुग्न (पितरोंके कार्यके लिये विहित मोटक)-रूपमें नहीं होना चाहिये। इसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर दाहिने कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर (अपसव्य होकर) पिता, पितामहके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'ॐ एतत्पादोदकमर्घ्यं स्वधा' इस मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंके चरणोंमें पितृतीर्थसे द्विगुण-भुग्न कुश (मोटक) एवं पुष्पसहित जल प्रदान करे।
इसी प्रकार मातामह आदिके लिये उद्दिष्ट ब्राह्मणोंके चरणोंमें पादोदक और अर्घ्य समर्पित करे। इसके बाद 'ॐ एतदाचमनीयं स्वाहा' कहकर ब्राह्मणके हाथमें जल एवं 'ॐ एष वोऽर्घ्यः' मन्त्रसे अर्घ्य तथा पुष्प दे। तत्पश्चात् 'ॐ सिद्धमिदमासनम्' से (सिद्धमिदमासनं गृह्यताम्)—आसन सम्पन्न है, कृपया ग्रहण करें—ऐसा निवेदन करे। 'इह सिद्धमिदमासनम्।' (यहाँ हम लोगोंके लिये आसन सम्पन्न है) ऐसा कहकर प्रतिनिधि ब्राह्मण प्रतिवचन दें।
इसके बाद 'ॐ भूः', 'ॐ भुवः' इत्यादि सव्याहृतियोंका पाठकर देव-ब्राह्मणको पूर्वमुख और पितृब्राह्मणको उत्तरमुख बैठाकर निम्नलिखित मन्त्रका तीन बार जप करे—
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते॥
(२१८।६)
तदनन्तर मास, पक्ष, तिथि, देश तथा पिता, पितामहका नाम एवं गोत्रका उच्चारण कर 'विश्वेदेवपूर्वकं श्राद्धं करिष्ये' यह संकल्प करे तथा 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा' का उच्चारण करे। इसके बाद 'ॐ विश्वेदेवानावाहयिष्ये' से प्रार्थना करके 'ॐ आवाहय' के द्वारा ब्राह्मणकी आज्ञा प्राप्त होनेपर 'ॐ विश्वेदेवा०', 'ॐ ओषधयः०' एवं—
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
ये अत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते॥
(२१८।७)
—इत्यादि मन्त्रोंसे श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंका आवाहन करे तथा 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः'—मन्त्रका तीन बार उच्चारणकर यव बिखेरे। श्राद्धकर्ता 'ॐ पात्रमहं करिष्ये' इस वाक्यसे अनुज्ञा प्राप्त करे तथा 'ॐ कुरुष्व' इससे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर अग्रभागसे युक्त दो कुश ग्रहण करे। एक प्रादेश* (लम्बे) कुशके दो पत्रोंको लेकर 'ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ०' आदि मन्त्रसे दूसरे कुशपत्रके द्वारा उसका छेदन करे। इसके बाद 'ॐ विष्णोर्मनसा पूतेस्थ' से उन दो कुशपत्रोंका अभ्युक्षण कर दूसरे कुशपत्रके द्वारा त्रिर्वेष्टनपूर्वक उसे अर्घ्यपात्रमें स्थापित करे। तत्पश्चात् 'ॐ शं नो देवीरभिष्टय०' से उस पात्रमें जल तथा 'ॐ यवोऽसि०' इत्यादि मन्त्रसे जौ एवं 'ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां०' से उसी पात्रमें चन्दन प्रदान करे। फिर 'ॐ या दिव्या आपः पयसा०' इस मन्त्रके पाठके साथ 'ॐ एषोऽर्घो नमः' से ब्राह्मणोंके हाथमें अर्घ्यपात्रसे जल दे।
तदनन्तर श्राद्धकर्ता अर्घ्यपात्रस्थ अवशिष्ट संस्रवजल और पवित्रकको ग्रहणकर (अर्घ्यपात्रमें रखकर) ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखे और अर्घ्यपात्रको
*अँगूठे और तर्जनीको पूरा फैलानेपर बीचकी दूरीको प्रादेश कहते हैं।
१९६- प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान
| ३९६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ऊर्ध्वमुख कुशके ऊपर स्थापित करके उसमें जल तथा पवित्रक भी (जो ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखा था) रख दे।
तत्पश्चात् 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मयज्ञोपवीतानि नमः' से विश्वेदेवोंको गन्धादि प्रदानकर समर्पित गन्ध आदिकी पूर्णताकी कामना 'गन्धादिदानमच्छिद्रमस्तु'—कहकर करे। विश्वेदेवोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से समर्पित चन्दनादिकी परिपूर्णता स्वीकार करे। ऋत्विक् ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से प्रत्युत्तर दे। श्राद्धकर्ता 'पितृपितामहप्रपितामहानां मातामह-प्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां सपत्नीकानां श्राद्धमहं करिष्ये' ऐसा कहकर पितरोंके श्राद्धकी अनुज्ञा माँगे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'कुरुष्व' इस वाक्यसे अनुज्ञात होनेपर 'ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च०' मन्त्रका तीन बार जप करे।
तदनन्तर पित्रादि एवं मातामहादिका नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'इदमासनं स्वधा' पदसे ब्राह्मणोंके वामपार्श्वमें आसन दानकर 'ॐ पितॄन् आवाहयिष्ये' से ब्राह्मणोंसे अनुज्ञाकी प्रार्थना करे और 'ॐ आवाहय' इस वाक्यसे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ उशन्तस्त्वा०' एवं 'ॐ आयान्तु नः पितरः०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितरोंका आवाहन करे। 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तिलका विकरण करे। पूर्वकी भाँति क्रमसे स्थापित अर्घ्यपात्रमें उदक दे तथा 'ॐ तिलोऽसि सोमदेवत्यो०' आदि मन्त्रोंसे तिल-दान करे।
इसके बाद दोनों हाथसे गन्ध, पुष्प प्रदानकर पितृपात्रको उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करके अन्तमें पित्रादिका गोत्र, नामका उल्लेख कर 'एष तेऽर्घ्यः स्वधा' से पवित्रीके साथ अर्घ्यपात्रको ग्रहण करनेके बाद वामपार्श्वमें कुशाके ऊपर 'ॐ पितृभ्यः स्थानमसि' मन्त्रसे अधोमुख अर्घ्यपात्रको स्थापित करे, फिर 'ॐ शुन्धन्तां लोकाः पितृसदनाः०' का पाठकर उस अधोमुख पात्रका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद पितृतीर्थसे पित्रादिके आसनपर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप वस्त्रयुग्म एवं यज्ञोपवीतादि देकर गोत्रनामोच्चारणपूर्वक सपत्नीक पितृ, पितामह एवं प्रपितामहको 'एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मसोत्तरीययज्ञोपवीतानि वः स्वधा' इस वाक्यको पढ़कर पितृतीर्थसे जल छोड़े। 'गन्धादिदानम् अक्षय्यम् अस्तु' ऐसा श्राद्धकर्ताके कहनेपर 'संकल्पसिद्धिरस्तु' इस प्रकार ब्राह्मण कहे। इसी प्रकार मातामहादिके लिये भी अनुज्ञापनादि कर्म करे। 'ॐ या दिव्या०' इस मन्त्रसे भूमिका सम्मार्जन करे। तदनन्तर घृतमिश्रित अन्न ग्रहणकर सव्य होकर 'ॐ अग्नौ करणमहं करिष्ये' द्वारा पितृब्राह्मणकी सेवामें अनुज्ञाकी प्रार्थना करे। 'ॐ कुरुष्व' इस वाक्यसे ब्राह्मणके द्वारा अनुज्ञात हो, 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें दो आहुति प्रदान करे। अवशिष्ट अन्न पिण्डार्थ स्थापित करके अन्नका आधा भाग पित्रादिके पात्रमें और मातामहादिके पात्रमें समर्पित करे।
इसके बाद जलपात्र मुद्रादि दक्षिणास्थापनपूर्वक भोजनपात्रके ऊपर कुशदान कर अधोमुख दोनों हाथोंके द्वारा भोजनपात्र स्पर्श करे। 'ॐ पृथिवी ते पात्रं०' इत्यादि मन्त्रपाठपूर्वक उस पात्रको अभिमन्त्रितकर उसपर अन्न परोसते हुए 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' मन्त्रका पाठ करे। 'विष्णो हव्यं रक्षस्व' से अन्नके मध्यमें अधोमुख अंगुष्ठसे स्पर्श करके 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तीन बार जौ एवं 'ॐ निहन्मि सर्वं०' से पीली सरसोंका विकरण करना चाहिये। तदनन्तर 'धूरिलोचनसंज्ञकेभ्यो देवेभ्य एतदन्नं सघृतं पानीयं सव्यञ्जनं स्वाहा' कहकर विश्वेदेवोंको अन्न निवेदन
कांड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१७
करते हुए उसके ऊपर सजल कुशपत्र रखकर श्राद्धकर्ता ‘ॐ अन्नमिदम् अक्षय्यम् अस्तु’ ऐसा उच्चारण करे एवं निमन्त्रित ब्राह्मण ‘ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’ इस प्रकार कहें।
तत्पश्चात् अपसव्य होकर पित्रादि-पात्रमें व्यञ्जनसहित घी मिले हुए अन्नको परोसकर उसके ऊपर भूमि-संलग्न कुशका स्थापन कर दोनों उत्तान हाथोंसे भोजनपात्र स्पर्श करते हुए ‘ॐ पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रका पाठ करे। ‘ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ एवं ‘ॐ विष्णोः कव्यं रक्षस्व’ इन मन्त्रोंसे समर्पित अन्नमें अंगुष्ठका स्पर्श करे। ‘ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः’ से अन्नके ऊपर तिल फैलाकर पृथ्वीपर बायाँ घुटना टिकाकर ‘अमुकगोत्रेभ्यः अस्मत् पितृपितामहेभ्यः सपत्नीकेभ्यः एतदन्नं सघृतं सपानीयं सव्यञ्जनं प्रतिषिद्धवर्जितं स्वधा’ इत्यादि वाक्यसे सपत्नीक पिता-पितामहादिको नाम-गोत्र-उच्चारणपूर्वक अन्नका निवेदन करे। अन्नका संकल्प करके ‘ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं०’ मन्त्रसे दक्षिणमुख होकर जलकी धारा प्रदान करे। ‘ॐ श्राद्धमिदमच्छिद्रमस्तु एवं ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’—इन दोनों मन्त्रोंका पाठकर ‘ॐ भूर्भुवः स्वः०’—इस व्याहृति-मन्त्रसे युक्त गायत्रीका उच्चारण कर विसर्जन करे। तदनन्तर ‘ॐ मधुवाता०’ मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करना चाहिये।
इसके साथ ‘यथासुखं वाग्यता जुषध्वम्’ का पाठकर ब्राह्मणोंके भोजन करते समय भक्तिपूर्वक ‘सप्तव्याधा०’ इत्यादि पितृस्तोत्रका पाठ करे<sup>१</sup>। इसके बाद ‘तृप्यस्व’ इस वाक्यका उच्चारण कर दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर ‘ॐ अग्निदग्धाश्च०<sup>२</sup>’ मन्त्रको पढ़कर भूमिमें कुशके ऊपर घीके साथ जलयुक्त अन्नको विकरित करे।
तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको मुखप्रक्षालनके लिये जल देकर प्रणवपूर्वक व्याहृतिके साथ गायत्री तथा ‘ॐ मधुवाता०’ इत्यादि मन्त्रोंका पाठकर मधु शब्दका तीन बार उच्चारण करे। ‘ॐ रुचितां भवद्भिः’ यह कहकर देव-ब्राह्मणोंसे विनम्रभावपूर्वक भोजनके रुचिपूर्ण (स्वादिष्ट) होनेका प्रश्न करे। देव-ब्राह्मणोंके द्वारा ‘सुरुचितम्’ यह उत्तर देनेपर ‘ॐ शेषमन्नम्’ यह विनम्रतासे प्रश्न करनेपर ब्राह्मण ‘ॐ इष्टैः सह भोजनम्’ अर्थात् इष्टजनोंके साथ आप भी भोजन करें—यह प्रत्युत्तर दें। तदनन्तर वामोपवीती (अपसव्य) होकर पित्रादि ब्राह्मणोंसे ‘ॐ तृप्ताः स्थ’ यह जिज्ञासा करे और उनके द्वारा ‘ॐ तृप्ताः स्मः’ इस वाक्यसे अनुज्ञात होकर भूमिका अभ्युक्षण और चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसमें तिल विकरित करे। ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः अमुकदेवशर्मन् सपत्नीकः एतत्ते पिण्डासनं स्वधा’ ऐसा कहकर पिण्डके लिये आसन दे और रेखाकरण करे। सप्रणव तथा व्याहृतिके साथ गाय्रीमन्त्र और ‘ॐ मधुवाता०’ आदि मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करते हुए घृतयुक्त अन्नसे पिण्डका निर्माण कर ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०’ इत्यादि वाक्यसे कुशोंके ऊपर पिता आदिके लिये पिण्ड प्रदान करे। पुनः रेखामध्यमें पहलेके समान पितामहको पिण्डदान तथा व्याहृतिपूर्वक गायत्री और ‘मधुवाता०’ का तीन बार जप करके पिण्डके समीपमें शेषान्नका विकरण करके ‘ॐ लेपभुजः पितरः प्रीयन्ताम्’ इस वाक्यसे (पिण्डाधार कुशमें)
१-सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्ीपे हंसाः सरसि मानसे॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं किमवसीदथ॥ (२१८।२०-२१)
२-अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम्॥ (२१८।२२)
| ३१८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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हाथका मार्जन करे। प्रक्षालित पिण्डजलसे 'ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०' इत्यादि वाक्यसे जलद्वारा पिण्डसेचन कर पिण्डपात्रको अधोमुख करके कृताञ्जलिपूर्वक 'ॐ पितरो मादयध्वं०' मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् जलस्पर्श करते हुए वामावर्तसे उत्तरमुख होकर प्राणवायुका तीन बार संयम करके 'ॐ षड्भ्य ऋतुभ्यो नमः' इस मन्त्रका पाठ करे।
इसके बाद वामावर्तसे दक्षिणमुख होकर भोजनपात्रमें पुष्प तथा 'अक्षतं चारिष्टं चास्तु०' से अक्षत दे। 'अमी मदन्तः पितरो यथाभागमावृषायिषत' इस मन्त्रका पाठ करते हुए वस्त्रको शिथिलकर अञ्जलि बनाकर 'ॐ नमो वः पितरो नमो वः०' इस मन्त्रका पाठ करे। तत्पश्चात् 'गृहान्नः पितरो दत्त' इस मन्त्रसे गृहका निरीक्षण करे। 'सदा वः पितरो द्वेष्मः' इस मन्त्रसे निरीक्षणकर 'एतद्वः पितरो वासः' यह मन्त्र पढ़कर 'अमुकगोत्र पितः एतत्ते वासः स्वधा' वाक्यसे पिण्डपर सूत्रदान करे।
तदनन्तर बायें हाथसे उदकपात्र ग्रहणकर 'ऊर्जं वहन्ती०' मन्त्रसे पिण्डके ऊपर जलधारा देकर पूर्वमें स्थापित अर्घ्यपात्रके बचे हुए जलसे प्रत्येक पिण्डका सेचन करे। फिर पिण्डावाहनपूर्वक पिण्डोंके ऊपर गन्ध और कुशदानकर 'अक्षन्नमीमदन्त०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। मातामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको आचमन कराये। 'ॐ सुप्रोक्षितमस्तु' इस वाक्यसे श्राद्धभूमिका भलीभाँति अभ्युक्षणकर 'अपां मध्ये स्थिता देवा सर्वमप्सु०' का उच्चारण करके 'शिवा आपः सन्तु' कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल दे। 'लक्ष्मीर्वसति०' आदिका पाठकर 'ॐ सौमनस्यमस्तु' यह मन्त्र पढ़कर ब्राह्मणोंके हाथमें पुष्प समर्पित करे। इसके बाद 'अक्षतं चास्तु०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर 'अक्षतं चारिष्टं चास्तु' यह कहते हुए यव और तण्डुल भी ब्राह्मणोंके हाथमें दे। तदनन्तर 'अमुकगोत्राणामस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां सपत्नीकानामिदमन्नपानादिकमक्षय्यमस्तु' इस वाक्यसे पित्रादि ब्राह्मणके हाथमें तिल और जलका दान करे। ब्राह्मण 'अस्तु' कहकर प्रतिवचन बोलें। इसी क्रममें मातामह आदिको अक्षत आदि दानकर उनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। तत्पश्चात् 'ॐ अघोराः पितरः सन्तु', 'गोत्रं नो वर्द्धतां०', 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे।
श्राद्धकर्ता 'सौमनस्यमस्तु' इस वाक्यका उच्चारण करे। ब्राह्मण 'अस्तु' यह कहें। तदनन्तर दिये गये पिण्डोंके स्थानमें अर्घ्यपात्रोंमें पवित्रकोंको छोड़ दे। बादमें कुशनिर्मित पवित्रक लेकर उससे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंका स्पर्शकर 'ॐ स्वधां वाचयिष्ये' इस वाक्यसे स्वधावाचनकी आज्ञा प्राप्त करे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'ॐ वाच्यताम्' इस वचनसे अनुज्ञात हो श्राद्धकर्ता 'ॐ पितृपितामहेभ्यो यथानामशर्मभ्यः सपत्नीकेभ्यः स्वधा उच्चताम्' ऐसा कहे। तदनन्तर ब्राह्मण 'अस्तु स्वधा' का उच्चारण करें।
श्राद्धकर्ता 'अस्तु स्वधा' इस वाक्यसे अनुज्ञात हो 'ऊर्जं वहन्तीरमृतं०' इस मन्त्रसे पिण्डके ऊपर जलधारा दे। फिर 'ॐ विश्वेदेवा अस्मिन् यज्ञे प्रीयन्ताम्' से देव-ब्राह्मणोंके हाथमें यव और जल प्रदान करे। 'ॐ प्रीयन्ताम्' इस वाक्यसे ब्राह्मणद्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ देवताभ्यः०' मन्त्रका तीन बार जप करे।
अधोमुख होकर पिण्डपात्रको हिलाकर आचमनपूर्वक दक्षिणोपवीती (सव्य) होकर पूर्वाभिमुख 'ॐ अमुकगोत्राय अमुकदेवशर्मणे०' इत्यादि मन्त्रसे देव-ब्राह्मणको दक्षिणा दे। तत्पश्चात् पितृ-ब्राह्मणोंकी सेवामें 'ॐ पिण्डाः सम्पन्नाः' यह निवेदन करनेपर 'ॐ सुसम्पन्नाः' इस प्रकार
१९७- भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य
| काण्ड ] | नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन | ३९९ |
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ब्राह्मणसे अनुज्ञात हो पिण्डके ऊपर श्राद्धकर्ता दुग्धधारा प्रदान करे। फिर पिण्डको हिलाकर पिण्डके समीप रखे अर्घ्यपात्रको सीधा स्थापित कर दे। इसके बाद 'ॐ वाजे वाजे०' मन्त्रसे पिण्डके अधिष्ठाता पितरोंका विसर्जन करे। 'आमा वाजस्य०' आदि मन्त्रसे देव तथा 'अभिरम्यताम्' से पितृ-ब्राह्मणका विसर्जन करके ब्राह्मणसे अनुज्ञा प्राप्तकर गौ आदिको पिण्ड प्रदान करे। इस प्रकार यहाँ श्राद्धविधि बतलायी गयी। इसका पाठ करनेमात्रसे भी पापका नाश होता है। किसी भी स्थानमें उक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करनेपर पितरोंको अक्षय स्वर्ग एवं ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है<sup>१</sup>।
(अध्याय २१८)
नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन
**श्रीब्रह्माजीने कहा—**अब मैं नित्यश्राद्धका वर्णन करता हूँ। पूर्वमें जिस तरह श्राद्धविधि कही गयी है, उस विधिके अनुसार ही नित्यश्राद्ध करे। विशेषता यह है कि नित्यश्राद्धमें 'ॐ अमुकगोत्राणामस्मत्पितृपितामहानाम् अमुकशर्मणां सपत्नीकानां श्राद्धं सिद्धान्नेन युष्मास्वहं करिष्ये' ऐसा कहकर श्राद्धका संकल्प करना चाहिये। आसन-दानादि सभी कार्य पूर्ववत् करे। इस श्राद्धमें विश्वेदेव वर्जित हैं।
अब मैं वृद्धिश्राद्धका विधान बतलाता हूँ। वृद्धिश्राद्धमें<sup>२</sup> भी श्राद्धकी ही भाँति प्रायः सभी कार्य करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो विशेष है, उसे कहता हूँ। पैदा हुए पुत्रके मुखको देखनेके पहले वृद्धिश्राद्ध करना चाहिये। यह श्राद्ध पूर्वाभिमुख और दक्षिणोपवीती (सव्य) होकर यव, बेर, कुश, देवतीर्थके द्वारा नमस्कार तथा दक्षिणा आदि उपचारपूर्वक करे।
दक्षिण जाँनु<sup>३</sup>को ग्रहण कर विश्वेदेवोंका ब्राह्मणोंमें आवाहन करे। आमन्त्रणसे पूर्व ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा प्राप्त करनेके लिये इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे—अपने कुलके अमुककी उत्पत्तिके शुभ अवसरपर अपने पितृपक्ष एवं मातृपक्षके पितरोंका श्राद्ध करनेके लिये वसु, सत्य नामके विश्वेदेवोंका आप लोगोंमें आवाहन कर सिद्ध अन्नसे उनका श्राद्ध करना चाहता हूँ। ब्राह्मणोंके द्वारा अपनेमें विश्वेदेवोंके आवाहनकी आज्ञा मिलनेपर उन ब्राह्मणोंमें वसु, सत्य नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। (यहाँ मूल ग्रन्थके अनुसार संस्कृतवाक्योंका ही प्रयोग होना चाहिये।) इसी प्रकार अन्य ब्राह्मणोंमें पितरोंका भी आवाहन करना चाहिये। बादमें 'ॐ विश्वेदेवा स आगत०' इत्यादि मन्त्रसे वसु तथा सत्य नामवाले विश्वेदेवोंका आवाहन कर उन्हें आसन तथा गन्धादि दानकर 'अच्छिद्रावधारण<sup>४</sup>' का वाचन करे। इसके बाद प्रपितामही आदिका अनुज्ञापन, आसनदान, गन्धादि-दान और अच्छिद्रावधारण-वाचन करना चाहिये।
इसी प्रकार पितामही, माता और प्रपितामहकी अनुज्ञा ग्रहणकर आसन, आवाहन और गन्धादि-दान तथा अच्छिद्रावधारण करके प्रपितामह एवं वृद्धप्रमातामह आदिकी अनुज्ञा ग्रहण कर आसन, आवाहन एवं गन्धादिका दान करे। तदनन्तर
१-इस अध्यायसे पार्वणश्राद्ध करनेकी प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिये। श्राद्धकी विधि, सम्पूर्ण मन्त्र एवं क्रमका ज्ञान श्राद्धकी पद्धतियोंसे करना चाहिये।
२-इस श्राद्धको माङ्गलिक, आभ्युदयिक तथा नान्दीमुखश्राद्ध भी कहते हैं।
३-जानु जङ्घाको कहते हैं। बायें जङ्घेको मोड़कर और दाहिने जङ्घेको ऊपरकर बैठनेसे दाहिने जङ्घेपर दाहिना हाथ होता है। यहाँ इसी आसनसे तात्पर्य है।
४-श्राद्धमें समर्पित वस्तुकी पूर्णताका वचन ब्राह्मणोंसे लेना ही 'अच्छिद्रावधारणवचन' है।
४०० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
'ॐ वसुसत्यसंज्ञकेभ्यः०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर इसी प्रकार पितामही और मातामह, प्रमातामहके लिये अन्नसंकल्पनादि क्रिया करनी चाहिये।
एकोद्दिष्टश्राद्धमें<sup>१</sup> पूर्वके समान सभी कार्य करना चाहिये। इसमें विशेष यह है कि प्रथम ब्राह्मण-निमन्त्रण, पादप्रक्षालन, आसनदान करके 'अद्य अमुकगोत्रस्य मत्पितुरमुकदेवशर्मणः प्रतिसांवत्सरिकमेकोद्दिष्टश्राद्धं सिद्धान्नेन युष्मास्वहं करिष्ये' इस संकल्प-वाक्यसे अनुज्ञाग्रहणपूर्वक आसनदान और गन्धादि तथा पक्वान्न प्रदान करना चाहिये।
इसके बाद रुचिर-स्तवादिका पाठकर तथा यज्ञसूत्र (यज्ञोपवीत) कण्ठमें धारणकर उत्तराभिमुख होकर अतिथिश्राद्ध करे। पितरोंकी तृप्ति जानकर दक्षिणाभिमुख हो वामोपवीती (अपसव्य) होकर कर्मसे उच्छिष्ट अन्नके समीपमें 'अग्निदग्धाश्च०' इत्यादि मन्त्रसे अन्न विकरण करे। तदनन्तर 'अमुकगोत्र मत्पितः०' से मण्डलरेखाके ऊपर जलधारा दे। अन्य कार्य पूर्वके समान ही समझना चाहिये। (अध्याय २१९)
सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि
श्रीब्रह्माजीने कहा— हे व्यासजी! अब मैं सपिण्डीकरणश्राद्धका वर्णन करता हूँ। मृत्युके सालभर बाद मृत्यु-तिथिपर यह श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धको यथासमय विधिवत् करनेसे प्रेतको पितृलोककी प्राप्ति होती है। सपिण्डीकरणश्राद्ध अपराह्नमें करना चाहिये, सभी अनुष्ठान प्रायः अन्य श्राद्धोंके समान करे। (इसमें जो विशेष है वही कहा जा रहा है।) पितामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको निमन्त्रित कर 'ॐ पुरूरवोमाद्रवसंज्ञकेभ्यो०' से वामपार्श्वमें आसन रखकर पुरूरवा और माद्रव नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। 'पितामहप्रपितामहानां०' इत्यादि वाक्यसे श्राद्धकी पितामह आदिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा ग्रहणकर तीन पात्र स्थापित करे। उन पात्रोंके ऊपर कुश रखकर दूसरे पात्रसे उन्हें ढक दे और आवाहन करे। इसके बाद अन्य श्राद्धोंके समान अच्छिद्रावधारणतककी<sup>२</sup> क्रिया करके सपत्नीक पिताको प्रेतपद अन्तमें प्रयुक्तकर उनका नाम उच्चारण करे। श्राद्धकी अनुज्ञा ले ले। तदनन्तर देव<sup>३</sup> पात्राच्छिद्रावधारण करे। यथाविधान कार्योंको सम्पन्नकर पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामहके पात्रोंका क्रमसे संचालन और उद्घाटनकर 'ॐ ये समानाः समनसो०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितृपात्रका जल पितामह और प्रपितामहके पात्रमें छोड़े। वृद्धप्रपितामहके पात्रको छोड़कर पितामह, प्रपितामहके पात्रका जल और पवित्रक पितृ-पात्रमें निक्षिप्त करे। तदनन्तर पितृ-ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्यपात्रस्थ पवित्रक देकर उसमें स्थित पुष्प ब्राह्मणोंके सिर, हाथ और चरणोंमें समर्पित करना चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणोंके हाथमें जल देकर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर 'अमुक गोत्र मत्पितामह०' इस वाक्यसे पितृ-पात्रसे कुछ अर्घ्योदक पितामहके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें प्रदान करे तथा पवित्रकके सहित अवशिष्ट कुछ जल पिण्डसेचनके लिये रखकर अन्य पात्रसे आच्छादितकर पितृ-ब्राह्मणके
१-इस श्राद्धका भी यथोचित क्रम एवं विस्तृत विवरण श्राद्धपद्धतियोंमें देखना चाहिये।
२-पितरोंके उद्देश्यसे की गयी विधिकी पूर्णताकी प्रार्थना ही 'अच्छिद्रावधारण' है।
३-अर्घ्यपात्रके छिद्ररहित होनेका निश्चय करना ही 'देवपात्राच्छिद्रावधारण' है।
काण्ड ] सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि ४०१
वामपार्श्वमें दक्षिणाग्रकुशके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि' यह पढ़कर अधोमुख स्थापित करे।
इसके बाद पितामह-प्रपितामह आदिको गन्धादि देकर 'अग्नौकरणं'<sup>१</sup> करे तथा अवशिष्ट अन्नको प्रपितामह आदिके पात्रमें डाल दे। इसी प्रकार पितामहादिका पात्राभिमन्त्रणपर्यन्त कर्म सम्पन्नकर ब्राह्मणपात्राभिमन्त्रण, अंगुष्ठनिवेशन, तिल-विकरणपूर्वक 'अमुक गोत्र०' इत्यादि वाक्य कहकर घृताक्त अन्न आदिका निवेदन करे।
तत्पश्चात् देवादिक्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे, यही 'अपोशन' विधि है। अतिथिके आनेपर अतिथिश्राद्ध करते हुए इस समय भी विकरणके लिये अन्न प्रदान करना चाहिये। पितामहादि ब्राह्मणसे 'ॐ स्वदितं भवद्भिः' से सुतृप्तिकी जिज्ञासा कर संतुष्टिका आश्वासन प्राप्त करे। 'अमुक गोत्र०' इत्यादि वाक्यसे पिण्डदान और 'पिण्डपात्रमच्छिद्रमस्तु' कहकर सभी कार्योंकी समाप्तिके बाद पिण्डके दो हिस्से कर 'ये समानाः समनसः०' आदि मन्त्रोंका पाठ करे और पितामह, वृद्धप्रपितामह-पिण्डके साथ पिताका पिण्ड मिला दे। पिण्डके ऊपर गन्धादि रखकर पिण्डचालन करना चाहिये। अतिथि और ब्राह्मणसे स्वदितादि (सुतृप्ति)-का प्रश्न करके ब्राह्मणोंको आचमन एवं ताम्बूल प्रदान करे।
तदनन्तर यजमान 'सुप्रोक्षितमस्तु', 'शिवा आपः सन्तु'—इन दो मन्त्रोंका उच्चारण करके वृद्धप्रपितामहादि-क्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे और 'गोत्रस्याक्षय्यमस्तु' से पितृ-ब्राह्मणके हाथमें अक्षय्यदान करके 'उपत्तिष्ठताम्' आदि वाक्यसे सतिल जल देना चाहिये।
तत्पश्चात् 'अघोराः पितरः सन्तु' इस वाक्यका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण 'अस्तु' इस वाक्यसे प्रतिवचन प्रदान करें एवं 'स्वधां वाचयिष्ये' इस पदका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण 'ॐ वाच्यताम्' इस अनुज्ञा-वाक्यसे प्रत्युत्तर दें। 'पितामहादिभ्यः स्वधा उच्चताम्' इस प्रकार यजमानके कहनेपर 'अस्तु स्वधा' ऐसा ब्राह्मण बोलें। फिर 'पितृभ्यः स्वधा उच्चताम्' ऐसा कहकर आज्ञा प्राप्त करे।
तदनन्तर 'ॐ ऊर्जं वहन्ती०' इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणाभिमुख होकर जलधारा दे, पुनः 'ॐ विश्वेदेवा अस्मिन् यज्ञे प्रीयन्ताम्' यह मन्त्र पढ़कर देवब्राह्मणके हाथमें यव और जल देकर 'ॐ देवताभ्यः०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। पिण्डपात्रोंको परिचालितकर आचमनपूर्वक पितामहादि-क्रमसे दक्षिणा दे। पितृ-ब्राह्मणसे 'आशिषो मे प्रदीयन्ताम्' इस वचनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। ब्राह्मण 'प्रतिगृह्यन्ताम्' इस वाक्यसे प्रत्युत्तर प्रदान करें। पुनः 'दातारो नोऽभिवर्धन्ताम्०' आदि मन्त्रका पाठकर अर्घ्यपात्रको ऊर्ध्वमुख कर 'वाजे वाजे०' इत्यादि मन्त्रसे देवब्राह्मण एवं 'अभिरम्यताम्' इस मन्त्रसे पितृब्राह्मणका विसर्जन करना चाहिये।
हे व्यास! मैंने आपको सपिण्डीकरणश्राद्धका विधान बताया। श्राद्ध, श्राद्धकर्ता और श्राद्धफल—इन तीनोंको विष्णुरूप जानना चाहिये<sup>२</sup>।
(अध्याय २२०)
१-अग्नौकरण—एक विशेष विधि है। इसमें अपसव्य होकर जलमें दो आहुति दी जाती है।
२-सपिण्डीकरणश्राद्धकी विस्तृत विधि श्राद्धपद्धतियोंसे जानना चाहिये। यहाँ संक्षिप्तरूपमें वर्णन है।
१९८- नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव
| ४०२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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धर्मसारका कथन
श्रीब्रह्माजीने कहा— हे शंकर! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले अतिशय सूक्ष्म धर्मसारको संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें।
शोक शास्त्रीय ज्ञान, धर्म, बल, धैर्य, सुख और उत्साह—इन सबका हरण कर लेता है। अर्थात् शोकके प्रभावसे सभी सात्त्विक वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसीलिये सर्वतोभावसे शोकका परित्याग करना चाहिये।
कर्म ही दारा (स्त्री) है, कर्म ही लोक है, कर्म ही सम्बन्धी है, कर्म ही बान्धव है। (अर्थात् स्त्री, लोक, सम्बन्धी एवं बान्धव आदि कर्मके अनुसार ही मिलते हैं।) कर्म ही सुख-दुःखका मूल कारण है। (अतः उत्तम कर्म करनेके लिये सदा सावधान रहना चाहिये।) दान ही परमधर्म है। दानसे ही पुरुषको सभी अभीष्ट प्राप्त होते हैं। दान ही पुरुषको स्वर्ग और राज्य प्रदान करता है। इसलिये मनुष्यको दान अवश्य करना चाहिये—
दानमेव परो धर्मो दानात्सर्वमवाप्यते।
दानात्स्वर्गश्च राज्यं च दद्याद्दानं ततो नरः॥
(२२१।४)
विधिपूर्वक प्रशस्त दक्षिणाके साथ दान तथा भयभीत प्राणीकी प्राणरक्षा—ये दोनों समान हैं। यथाविधि तपस्या, ब्रह्मचर्य, विविध यज्ञ एवं स्नानमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य भयभीत प्राणीके प्राणोंकी रक्षासे प्राप्त होता है। जो लोग धर्मका नाश करते हैं, वे नरकमें जाते हैं।
जो होम, जप, स्नान, देवतार्चन आदि सत्कार्यमें तत्पर रहकर सत्य, क्षमा, दया आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न रहते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं<sup>१</sup>। कोई भी किसीको सुख या दुःख नहीं देता है और न किसीका सुख-दुःख हरण कर सकता है। सभी अपने किये हुए कर्मके अनुसार सुख-दुःखका भोग करते हैं—
न दाता सुखदुःखानां न च हर्तास्ति कश्चन।
भुङ्क्ते स्वकृतान्येव दुःखानि च सुखानि च॥
(२२१।८)
जो धर्मकी रक्षाके लिये जीवनदान करता है, वह सभी विषम परिस्थितियों (कठिनाइयों)-को पार कर जाता है। जिनका चित्त सदा संतुष्ट रहता है, वे फल, मूल, शाक आदिके द्वारा जीवनधारण करके भी सुखकी अनुभूति करते हैं—
धर्मार्थं जीवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते।
सन्तुष्टः को न शक्नोति फलमूलैश्च वर्तितुम्॥
(२२१।९)
सुखकी लालसामें सभी मनुष्य संकटकी स्थितिमें पड़ते हैं। यह लोभका ही परिणाम है, जो अत्यन्त दुष्कर है।
मनुष्यके चित्तमें लोभ उपस्थित होनेसे ही क्रोध उत्पन्न होता है। लोभके कारण ही मनुष्य हिंसा आदि गर्हित कार्योंमें प्रवृत्त होता है। मोह, माया, अभिमान, मात्सर्य, राग, द्वेष, असत्यभाषण एवं मिथ्याचरण—ये सभी लोभसे उत्पन्न होते हैं। लोभसे ही मनुष्य मोह और मदसे उन्मत्त हो जाता है। (इसलिये लोभका परित्याग करना चाहिये) जो शान्त व्यक्ति लोभका परित्याग करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे रहित होकर परमलोकको प्राप्त करता है<sup>२</sup>।
१-ये च होमजपस्नानदेवतार्चनतत्पराः। सत्यक्षमादयायुक्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ (२२१।७)
२-लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभाद् द्रोहः प्रवर्तते। लोभान्मोहश्च माया च मानो मत्सर एव च॥
रागद्वेषानृतक्रोधलोभमोहमदोज्झितः। यः स शान्तः परं लोकं याति पापविवर्जितः॥ (२२१।११-१२)
१९९- कर्मविपाकका कथन
काण्ड ] धर्मसारका कथन ४०३
हे महादेव! देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व, गुह्यकगण—ये सभी धार्मिकोंकी पूजा करते हैं, धनाढ्य और कामी व्यक्तिकी अर्चना कोई भी नहीं करता है—
देवता मुनयो नागा गन्धर्वा गुह्यका हर।
धार्मिकं पूजयन्तीह न धनाढ्यं न कामिनम्॥
(२२१।१३)
अनन्त बल, वीर्य, प्रज्ञा और पौरुषके द्वारा किसी दुर्लभ वस्तुको यदि मनुष्य प्राप्त कर लेता है तो इसके कारण किसीको ईर्ष्यावश शोकाकुल या दुःखी नहीं होना चाहिये।
सभी प्राणियोंके प्रति दयाका भाव रखना, सभी इन्द्रियोंका निग्रह करना और सर्वत्र अनित्यबुद्धि रखना यह प्राणियोंके लिये परम श्रेयस्कर है। मृत्यु सामने वर्तमान है, यह समझकर जो व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता, उसका जीवन बकरीके गलेमें स्थित स्तनके समान निरर्थक है—
सर्वसत्त्वदयालुत्वं सर्वेन्द्रियविनिग्रहः।
सर्वत्रानित्यबुद्धित्वं श्रेयः परमिदं स्मृतम्॥
पश्यन्निवाग्रतो मृत्युं यो धर्मं नाचरेन्नरः।
अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥
(२२१।१५-१६)
हे वृषध्वज! इस लोकमें गोदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। जो न्यायोपार्जित धनसे प्राप्त गौका दान करते हैं, वे अपने सम्पूर्ण कुलको तार देते हैं।
हे वृषध्वज! अन्न-दानसे श्रेष्ठ और कुछ भी दान नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण चराचर जगत् अन्नके द्वारा ही प्रतिष्ठित है<sup>१</sup>। कन्यादान, वृषोत्सर्ग, जप, तीर्थ, सेवा, वेदाध्ययन, हाथी, घोड़ा, रथ आदिका दान, मणिरत्न और पृथ्वीदान—ये सभी दान अन्नदानके सोलहवें अंशकी भी बराबरी नहीं कर सकते हैं। अन्नसे ही प्राणियोंके प्राण, बल, तेज, वीर्य, धृति और स्मृति—ये सभी प्रतिष्ठित रहते हैं। जो कूप, वापी, तडाग और उपवनका निर्माणकर लोगोंकी संतुष्टिके लिये प्रदान करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं<sup>२</sup>।
साधुओंका दर्शन करना अतिशय पुण्यदायक है। यह सभी प्रकारके तीर्थोंसे भी उत्तम है। तीर्थ तो समय आनेपर फल प्रदान करता है, किंतु सज्जनोंका संग उसी क्षण फल प्रदान कर देता है—
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थादपि विशिष्यते।
कालेन तीर्थं फलति सद्यः साधुसमागमः॥
(२२१।२३)
सत्य, दम, तपस्या, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, शम, दया और दान—इनको सनातनधर्म माना गया है—
सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषश्च क्षमार्जवम्।
ज्ञानं शमो दया दानमेष धर्मः सनातनः॥
(२२१।२४)
(अध्याय २२१)
<sup>१</sup>-न गोदानात्परं दानं किञ्चिदस्तीति मे मतिः। या गौर्न्यायार्जिता दत्ता कृत्स्नं तारयते कुलम्॥
नान्नदानात्परं दानं किञ्चिदस्ति वृषध्वज। अन्नेन धार्यते सर्वं चराचरमिदं जगत्॥ (२२१।१८-१९)
<sup>२</sup>-कूपवापीतडागादीनारामांश्चैव कारयेत्। त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते॥ (२२१।२२)
४०४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान
श्रीब्रह्माजीने कहा— अब मैं नारकीय पापोंको विनष्ट करनेवाले प्रायश्चित्त आदि कर्मोंका वर्णन करूँगा।
मक्खी, जलकण, स्त्री, पृथ्वीपर प्राकृतिकरूपसे एकत्र जल, अग्नि, बिल्ली और नेवला—ये सदैव पवित्र माने गये हैं। जो द्विज प्रमादवश शूद्रद्वारा उच्छिष्ट<sup>२</sup> (जूँठ) तथा छुआ हुआ भोजन ग्रहण करता है, वह एक दिन-रात्रिका उपवास करके पञ्चगव्यप्राशनसे शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण अन्य किसी ब्राह्मणके द्वारा उच्छिष्ट तथा स्पर्श किया हुआ भोजन करता है तो उसे प्रायश्चित्तके रूपमें स्नान, जप तथा पूरे दिन उपवास करके रात्रिमें भोजन करना चाहिये। मक्खी और केशयुक्त भोजन करनेपर तत्काल 'वमन-क्रिया' करनेसे शुद्धि हो जाती है। जो मनुष्य किसी भोज्य पदार्थको एक हथेलीमें रखकर दूसरे हाथकी एक अंगुली या पूरे हाथसे खाता है और उसके बाद जल नहीं पीता है तो उसे एक दिन और एक रात्रिका उपवास करना चाहिये। एक हथेलीमें रखकर दूसरे हाथसे भोजन कर जल भी पी लिया जाय तो और कठिन प्रायश्चित्त विहित है; क्योंकि ऐसे भोजनमें बिना संकोच पूर्ण संतुष्ट होनेका भाव स्पष्ट है। पीनेसे बचे हुए तथा बाँयें हाथसे ग्रहण किये गये जलका पान करना मदिरापानके समान होता है।
चमड़ेके पात्रमें रखा गया जल अपवित्र होता है, उसे नहीं पीना चाहिये। यदि किसी द्विजके घर अज्ञानवश ही कोई अन्त्यज निवास कर ले तो उस द्विजको शुद्धिके लिये चान्द्रायण अथवा पराकव्रत करना आवश्यक है। ब्राह्मणके घरमें शूद्रका प्रवेश होनेपर तथा बादमें जानकारी होनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रत करके प्रायश्चित्त करना चाहिये। जो ब्राह्मण घरमें शूद्रके प्रविष्ट होनेपर पक्वान्नका भोजन करता है, उसे अर्द्धकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। अर्धकृच्छ्रव्रतके योग्य जो अशुचि है उसके घरमें अन्य कोई ब्राह्मण यदि भोजन करता है तो उसको भी एक चौथाई कृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये।
जो द्विज धोबी, नट एवं बाँस और चमड़ेसे जीविकोपार्जन करनेवालोंके द्वारा अर्जित अन्नका भोजन करता है, उसे चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। चाण्डालके कुएँ अथवा पात्रमें स्थित जलका पान अज्ञानवश भी जो ब्राह्मण कर लेता है, उसे 'सान्तपनव्रत' करना चाहिये। वैश्यके लिये यह प्रायश्चित्त आधा ही माना गया है। यदि कोई शूद्र उक्त निषिद्ध जलका पान करता है तो उसको तत्सम्बन्धित व्रतका एक चौथाई प्रायश्चित्त करना चाहिये। अज्ञानवश ब्राह्मणके घर अन्त्यजके प्रवेश हो जानेपर उस ब्राह्मणको तीन कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। अन्त्यजके घरमें आ जानेमात्रसे उत्पन्न अपवित्रताका निराकरण पराकव्रतके अनुष्ठानसे होता है। अन्त्यजके द्वारा उच्छिष्ट भोजन करनेपर द्विज 'चान्द्रायणव्रत' करनेसे शुद्ध हो जाता है। जब कभी प्रमादवश कोई ब्राह्मण चाण्डालद्वारा दिये गये अन्नका भोजन कर लेता है तो उसे चान्द्रायण (ऐन्दव)-व्रत करना चाहिये। ऐसी ही अपवित्रतामें
१-इस अध्यायमें जिन व्रतोंकी चर्चा है, संक्षेपमें उनका स्वरूप अध्यायके अन्तमें वर्णित है।
२-उच्छिष्टका अर्थ है—सिद्ध अन्नमेंसे निकालकर शूद्रने पहले भोजन कर लिया है, उसके बादका शेष अन्न। यहाँ घृणाका भाव नहीं है। पवित्रताकी दृष्टिसे यह एक निष्पक्ष व्यवस्था है।
२००- अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य
काण्ड ] प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान ४०५
क्षत्रियको छः दिन और वैश्यको दो दिनका सान्तपनव्रत करना चाहिये। यदि प्रमादवश ब्राह्मण और चाण्डाल एक ही वृक्षके नीचे एक साथ फल खा लेते हैं तो वह ब्राह्मण एक दिन-रातके उपवाससे शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण भोजनोपरान्त बिना आचमन इत्यादि किये चाण्डालका स्पर्श कर लेता है तो उसे आठ हजार गायत्री अथवा एक सौ 'द्रुपदादिव ०' मन्त्रका जप करना चाहिये। चाण्डाल अथवा श्वपचके द्वारा किये गये विष्ठा और मूत्रके स्पर्श हो जानेपर ब्राह्मणको तीन रातका उपवास करना चाहिये। द्विजको अन्त्यजकी स्त्रीके साथ गमन करनेपर पराकव्रत करना चाहिये। परस्त्रीके साथ बिना कामनाके गमन करनेपर पराकव्रत करना चाहिये।
जो द्विज मद्यादिसे अशुद्ध पात्रमें रखे हुए जलका पान करता है, वह कृच्छ्रपादव्रत तथा पुनः संस्कारसे शुद्ध होता है। जो ब्राह्मण वज्र (विद्युत्)-पात अथवा अग्नि, वायुके कारण अकस्मात् उत्पन्न उपद्रवसे ग्रस्त होनेके कारण अपना घर छोड़ने तथा अन्नपानादिको लेकर किसी अन्त्यजके घरमें रहनेके लिये विवश होते हैं तो उन्हें तीन कृच्छ्र और तीन चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। मुनि वसिष्ठने तो उक्त निषिद्ध कर्म करनेपर ब्राह्मणके लिये पुनः जातकर्मादि संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होनेका विधान बताया है। कोई स्वयं उच्छिष्ट (भोजनके बाद मुख एवं हाथका प्रक्षालन नहीं किया) है, उसके उच्छिष्ट (भोजन करनेके बाद शेष अन्न)-का भक्षण करनेपर अथवा कुत्ते या शूद्रसे स्पृष्ट सिद्ध अन्नका भक्षण करनेपर द्विज एक दिन-रात्रिपर्यन्त उपवास तथा पञ्चगव्यप्राशनसे शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण किसी वर्णबहिष्कृत व्यक्तिके द्वारा छू लिया जाता है तो उसे पाँच रात्रियोंका उपवास करना चाहिये। अविच्छिन्नगतिसे गिरनेवाली जलधारा, वायुके झोंकोंसे उड़ायी गयी धूलिके कण, स्त्री, बालक और वृद्ध कभी दूषित नहीं होते। स्त्रियोंका मुख, पक्षियोंके द्वारा गिराया गया फल, प्रसवकालमें बछड़ा तथा हरिणका शिकार करते समय कुत्ता सदैव पवित्र रहता है। जलमें रहनेवाली वस्तु जलमें और स्थलमें पायी जानेवाली वस्तु स्थलमें अपवित्र नहीं होती है। धार्मिक कृत्य करते समय पैरका स्पर्श हो जानेपर द्विज आचमनद्वारा शुद्ध हो जाता है।
जिस कांस्यपात्रमें मदिरा नहीं लगी है, यदि वह अन्य किसी कारणसे अपवित्र हो गया हो तो पवित्र भस्मके द्वारा माँजे जानेपर शुद्ध हो जाता है। मूत्र या मदिराके द्वारा अशुद्ध पात्रको अग्निमें डालकर शुद्ध किया जा सकता है। गौके द्वारा सूँघे गये, शूद्रके द्वारा छुए गये तथा कौए और कुत्तेके द्वारा जूठे किये गये कांस्यपात्र दस बार शुद्ध भस्मसे माँजनेपर शुद्ध होते हैं। जो ब्राह्मण शूद्रके पात्रमें भोजन कर लेता है, वह तीन दिनतक उपवास रखकर पञ्चगव्य-पान करनेसे शुद्ध होता है। जो ब्राह्मण उच्छिष्ट पदार्थ या उच्छिष्ट प्राणीका स्पर्श करता है अथवा कुत्ते या शूद्रका स्पर्श करनेसे अपवित्र हो गया हो, वह भी तीन दिनके उपवास और पञ्चगव्यके पानसे शुद्ध हो जाता है। रजस्वला स्त्रीका स्पर्श करनेपर उपवास करके पञ्चगव्य-पान करनेसे शुद्धि होती है। जलरहित प्रदेश, चोर और हिंसक व्याघ्रादि जीवोंसे परिव्याप्त मार्गमें किसी अशुद्ध होनेयोग्य द्रव्यको हाथमें लिये हुए यदि मल, मूत्रका परित्याग किया जाता है तो वह द्रव्य अशुद्ध नहीं होता है। भूमिपर उस द्रव्यको रखकर शौच कर्म करना चाहिये।
काँजी, दही, दूध, मट्ठा, कृसरान्न शूद्रसे भी ग्राह्य है। मधु अन्त्यजसे भी ग्रहण किया जा सकता है। जो ब्राह्मणादि गुड़ की बनी हुई, पीठीकी बनी
| ४०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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हुई या महुआकी बनी हुई मदिरा पान करते हैं, उन्हें अग्निके समान संतप्त सुराका पान करके शुद्ध होना चाहिये। जो ब्राह्मण और क्षत्रिय सूतकयुक्त घरके पात्रमें जल अथवा भोजन ग्रहण कर लेते हैं, उन्हें क्रमशः पाँच सौ और एक सौ गायत्री-मन्त्रोंका जप करना चाहिये। (जब घरमें सूतक पड़ जाता है तो उस समय) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः—दस दिन, बारह दिन, पंद्रह दिन तथा एक मासके बाद शुद्ध हो जाते हैं। युद्धरत राजाओंकी, यज्ञदीक्षितकी तथा परदेशमें गये हुए लोगोंकी सूतक होनेपर तत्काल स्नानसे शुद्धि हो जाती है। एक मासके बालककी मृत्यु होनेपर भी स्नानसे सद्यः शुद्धिका विधान है। अविवाहित कन्या, यज्ञोपवीत-संस्काररहित द्विज, दाँत निकल आये हुए बालक तथा तीन वर्षीया कन्याकी मृत्यु होनेपर तीन रात्रियोंका अशौच होता है। जननाशौचमें गर्भस्राव होनेपर भी तीन रात्रियोंका अशौच माताके लिये माना गया है। प्रसूता स्त्रियाँ एक मासतक अशुद्ध रहती हैं। रजस्वला स्त्री चौथे दिन शुद्ध हो जाती है।
देशमें दुर्भिक्ष एवं किसी आकस्मिक कारणवश विप्लव होनेकी स्थितिमें जन्म अथवा मृत्युका अशौच होनेपर भी देशहितके लिये दान आदि धर्म यथानियम किये जा सकते हैं। दीक्षाकालमें, विवाहादिमें, देव-पितृनिमन्त्रणमें, देवताओं तथा ब्राह्मणोंके निमन्त्रित हो जानेपर या पूर्व संकल्पित कार्योंके बीच भी यदि घरके किसी व्यक्तिकी मृत्यु हो जाती है अथवा कोई बच्चा जन्म लेता है तो उस समय अशौच नहीं होता है। द्विज प्रसूता पत्नीका स्पर्श करनेसे अशौचयुक्त हो जाता है। जहाँ अग्नियोंका आवाहन होता है, जहाँ वेदोंका पठन-पाठन होता है अथवा जहाँ वैश्वदेव, यज्ञ आदि धार्मिक कृत्योंका सम्पादन होता है, वहाँ सूतक-दोष नहीं होता।
अशुद्ध घरमें भोजन करनेपर ब्राह्मण तीन रात्रि उपवासके पश्चात् शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी स्त्री रजस्वला हो जाय और परस्पर एक-दूसरेका स्पर्श करे तो ब्राह्मणी तीन रातमें, क्षत्रियकी स्त्री दो रातमें, वैश्यकी स्त्री एक दिनमें उपवास करनेके पश्चात् शुद्ध होती है। शूद्रकी स्त्री तो सद्यः स्नान करनेके बाद ही शुद्ध हो जाती है।
कुत्ते, सियार और बन्दरको कुएँमें गिरा हुआ देखकर उस कूपका जल पीनेसे ब्राह्मण तीन दिन, क्षत्रिय दो दिन तथा वैश्य एक दिनके उपवासके पश्चात् शुद्ध होता है। यदि कुएँमें हड्डी, चमड़ा, किसी प्रकारका मल या चूहा आदि गिर जाय तो उसे कुएँसे बाहर निकाल कर कुएँका कुछ जल निकाल देना चाहिये तथा पञ्चगव्य डालकर कुएँको शुद्ध करना चाहिये। यदि तडाग या पुष्करिणी आदिका जल दूषित हो गया हो तो उसमें शुद्ध भस्मादि डाल देना चाहिये और छः घड़ा जल उसमेंसे निकालकर पञ्चगव्य डाल देना चाहिये। ऐसा करनेसे वह शुद्ध हो जाता है। यदि रजस्वला स्त्रीका रजःस्राव कूपजलके मध्य हो जाता है तो उसमेंसे तीस घड़ा जल निकाल देना चाहिये।
अगम्या स्त्रीका गमन, मद्य तथा गोमांसका भक्षण करके ब्राह्मण चान्द्रायणव्रत, क्षत्रिय प्राजापत्यव्रत, वैश्य सान्तपनव्रत करनेसे और शूद्र पाँच दिन उपवासके बाद शुद्ध हो जाता है, किंतु प्रायश्चित्त करनेके बाद ऐसे सभी व्यक्तियोंके लिये अपेक्षित है कि वे गोदान करें और ब्राह्मणभोजन भी करायें। क्रीड़ा तथा शयनादिके समय नील लगा हुआ वस्त्र दूषित नहीं होता। (अन्य कार्योंमें तो) नील लगे हुए वस्त्रोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये। ऐसे वस्त्रोंको धारण करनेवाले नरकमें जाते हैं।
२०१- भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा
काण्ड ] भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण ४०७
जो मनुष्य अवरोध उत्पन्न करनेके लिये पशुके दो पैरोंमें बन्धन लगानेका पाप करता है और उस पशुकी मृत्यु जलाशयके समीप, वनमें अथवा घरमें जलनेसे या कण्ठमें रस्सी बाँधने, घण्टी, घुँघरू आदि आभूषणोंके पहनानेसे हो जाती है तो उस मनुष्यको कृच्छ्रपादव्रत करना चाहिये।
गायके शरीरकी हड्डी तोड़नेपर, सींग तोड़नेपर, चमड़ा भेदन करनेपर तथा पूँछ काटनेपर लगे हुए पापका प्रायश्चित्त आधे मासतक 'यावक पान' करनेसे होता है। हाथी, घोड़े और शस्त्र आदिसे गौकी ऐसी क्षति होनेपर कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यदि अनजानमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मल, मूत्र, मदिरासे संस्पृष्ट पदार्थका भोजन कर लें तो उन्हें पुनः 'द्विजातीय संस्कार' करना चाहिये। पुनः द्विजातीय संस्कारके समय केशमुण्डन, मेखलाधारण, दण्डग्रहण और भिक्षाचरणादिकी आवश्यकता नहीं है।
अन्त्यजके पात्रमें रखा हुआ कच्चा मांस, घृत, मधु तथा यथासमय उत्पन्न स्निग्ध पदार्थ तैल आदि उसके पात्रसे निकाले जानेके बाद शुद्ध हो जाते हैं।
क्रमशः प्रथम दिन एकभक्तव्रत<sup>१</sup>, दूसरे दिन नक्तव्रत<sup>२</sup>, तीसरे दिन अयाचितव्रत<sup>३</sup> करते हुए जो उपवास किया जाता है, वह पादकृच्छ्रव्रत है। कृच्छ्रार्धका द्विगुण प्राजापत्यव्रत कहा जाता है। यह सभी पापोंका विनाशक है। सात उपवास करनेसे कृच्छ्रव्रत पूर्ण होता है। इसीको महासान्तपनव्रतके नामसे स्वीकार किया गया है। तीन दिन गरम जलमात्र, उसके बाद तीन दिन गरम दूधमात्र और उसके बाद तीन दिन गरम घृतमात्र पान करते हुए जो व्रत किया जाता है, वह तप्तकृच्छ्रव्रत है। यह समस्त पापोंको विनष्ट करनेवाला है। बारह दिनोंतक जलमात्र ग्रहण कर उपवास करनेसे एक पराकव्रत सम्पन्न होता है। यह व्रत सभी पापोंका विनाशक है। जिस व्रतमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको एक ग्रासमात्र भोजन करके क्रमशः पूर्णिमापर्यन्त प्रत्येक तिथिको एक-एक ग्रास भोजनकी वृद्धि की जाती है और उसके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे प्रतिदिन अमावास्या तिथितक एक-एक ग्रास भोजनकी मात्रा कम की जाती है, उसे चान्द्रायणव्रत कहते हैं।
सोनेके समान वर्णवाली गायका दूध, श्वेतवर्णवाली गायका गोबर, ताम्रवर्णवाली गायका मूत्र, नीलवर्णवाली गायका घृत तथा कृष्णवर्णवाली गायका दही प्रशस्त है। इन चारोंके साथ कुशोदक मिलाकर जो पदार्थ तैयार किया जाता है, उसको पञ्चगव्य कहते हैं। इस मिश्रणमें गोमूत्रकी मात्रा आठ माशा, गोबरकी मात्रा चार माशा, दूधकी मात्रा बारह माशा, दहीकी मात्रा दस माशा और घृतकी मात्रा पाँच माशा कही गयी है। इस विधिसे तैयार किया गया पञ्चगव्य सभी मलोंका विनाशक होता है।
(अध्याय २२२)
भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य
**श्रीब्रह्माजीने कहा—**हे व्यास! मुनियोंद्वारा भक्तिपूर्वक आचरण किये गये उन धर्मोंको मैंने कहा, जिनसे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। सूर्यादि देवोंकी पूजा, पितृतर्पण, होम तथा संध्यावन्दनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थचतुष्टयकी सिद्धि प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु स्वयं भक्तोंको
<sup>१</sup> १-एक समय मात्र हविष्यान्न-ग्रहण। <sup>२</sup> २-रात्रिमें उपवास। <sup>३</sup> ३-बिना याचनाके जो प्राप्त हो उसीका ग्रहण।
| ४०८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् विष्णु धर्मस्वरूप ही हैं। पूजा, तर्पण, हवन, संध्या, ध्यान, धारणा आदि जो भी सत्कर्म हैं, वे सब हरि ही हैं।
सूतजीने कहा—हे शौनक ! मैं चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनें।
चार हजार युगोंका एक कल्प होता है, इसको ब्रह्माका एक दिन माना गया है। कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि—ये चार युग होते हैं। कृतयुगमें सत्य, दान, तप तथा दया—इन चार पादोंसे धर्म अवस्थित रहता है। धर्मका संरक्षण करनेवाले हरि ही हैं। इस रहस्यको जानकर जो लोग संतुष्ट रहते हैं, वे ही ज्ञानी हैं। सत्ययुग (कृतयुग)-में मनुष्य चार हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। सत्ययुगके अन्तमें धर्मपालनकी दृष्टिसे क्षत्रिय उत्कर्षकी स्थितिमें रहते हैं। शूद्रोंकी अपेक्षा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य धर्मपालनमें उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सर्वाधिक बलशाली एवं शूर भगवान् विष्णु ही राक्षसोंका विनाश करते हैं।
त्रेतायुगमें धर्म सत्य, दान और दया—इन तीन पादोंपर ही अवस्थित रह जाता है। इस कालके मनुष्य यज्ञपरायण होते हैं। सम्पूर्ण संसार क्षत्रियोंसे सुरक्षित रहता है। रक्तवर्णके भगवान् हरि मनुष्योंद्वारा इस युगमें पूजित होते हैं। मनुष्योंकी आयु एक हजार वर्षकी होती है। इस युगमें विष्णु भीमरथ कहलाते हैं और क्षत्रियोंके द्वारा राक्षसोंका संहार होता है।
द्वापरमें धर्मकी मूर्ति दो पादोंपर अवस्थित रहती है। इस युगमें अच्युत भगवान् विष्णु पीतवर्ण धारण करते हैं। लोगोंकी आयु चार सौ वर्षकी होती है। ब्राह्मण और क्षत्रिय-वर्णसे उत्पन्न प्रजासे पृथिवी व्याप्त रहती है। इस युगके लोगोंकी अल्प बुद्धिको देखकर वेदव्यासका रूप धारण कर भगवान् विष्णुने एक ही रूपमें विद्यमान वेदको चार भागोंमें विभक्त किया और अपने समस्त शिष्योंको उन चारों वेदोंका अध्ययन कराया। भगवान् वेदव्यासने ऋग्वेदकी शिक्षा 'पैल' नामक शिष्यको, सामवेदकी शिक्षा 'जैमिनि' नामक शिष्यको, अथर्ववेदकी शिक्षा 'सुमन्तु' नामक शिष्यको और यजुर्वेदकी शिक्षा 'महामुनि वैशम्पायन' नामक शिष्यको प्रदान की तथा वेदाङ्गों और पुराणोंका अध्ययन सूतजीको कराया। इन पुराणोंके एकमात्र वेद्य हरि ही हैं। ये अठारह पुराणोंके रूपमें विभक्त हैं।
सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं। ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, भविष्यत्, नारदीय, स्कन्द, लिङ्ग, वराह, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, कूर्म, मत्स्य, गरुड, वायु तथा ब्रह्माण्ड नामक अठारह पुराण प्रसिद्ध हैं। मुनियोंने अनेक उपपुराणोंकी भी बात बतायी है। उनमें सबसे पहला उपपुराण सनत्कुमारके द्वारा कथित है। भगवान् नरसिंहके द्वारा उपदिष्ट एक दूसरा उपपुराण है, जो नरसिंहपुराणके नामसे प्रसिद्ध है। तीसरा उपपुराण स्कन्द है, इसको भगवान् शिवके पुत्र कुमार कार्तिकेयजीने कहा है। चौथा उपपुराण शिवधर्म (शिवधर्मोत्तर) नामक है, जिसे भगवान् नन्दीश्वरने कहा है। महर्षि दुर्वासाद्वारा प्रोक्त आश्चर्य (अद्भुत) पुराण तथा देवर्षि नारदजीद्वारा कथित नारद उपपुराण है। इसी प्रकार कपिल, वामन तथा उशनस् उपपुराण महर्षि कपिल, वामन तथा उशनस्द्वारा उपदिष्ट हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब, पराशर, मारीच तथा भार्गव नामक उपपुराण भी हैं। पुराण, धर्मशास्त्र, चारों वेद, शिक्षा, कल्पादि, छः वेदाङ्ग, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, गन्धर्वशास्त्र तथा धनुर्वेदशास्त्र—ये अठारह विद्याएँ हैं—
पुराणं धर्मशास्त्रं च वेदास्त्वंगानि यन्मुने।
न्यायः शौनक मीमांसा आयुर्वेदार्थशास्त्रकम्॥
(२२३।२१)
काण्ड ] भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण ४०९
द्वापरयुगके अन्तमें भगवान् श्रीहरि पृथ्वीके भारका हरण करते हैं।
कलियुगमें धर्म एक पादपर अवस्थित रह जाता है। भगवान् अच्युत कृष्णवर्णके होते हैं। उस कालमें लोग दुराचारी और निर्दय होने लगते हैं। मनुष्योंमें सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण दिखायी देते हैं। कालकी प्रेरणासे ये सभी गुण मनमें उत्पन्न होते हैं और परिवर्तित होते रहते हैं।
हे शौनक! जब प्रवृद्ध सत्त्वगुणसे मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ व्याप्त हो जाती हैं और लोगोंकी अनुरक्ति ज्ञानार्जन तथा तपश्चरणमें बढ़ जाती है तब सत्ययुग जानना चाहिये। जब मनुष्योंकी आसक्ति काम्यकर्म और यशमें होती है, उस समय रजोगुणकी प्रवृत्तिसे त्रेतायुग जानना चाहिये और तमोगुणकी प्रबलताके साथ रजोगुणकी वृद्धिके कारण जब लोगोंमें लोभ, असंतोष, मान, दम्भ और मत्सरके भाव प्रबल होते हैं और काम्य कर्मोंमें आसक्ति बढ़ जाती है तब द्वापरयुग समझना चाहिये। जब सदा असत्य बोलने, आलस्य, नींद और हिंसा आदि साधनोंमें ही प्रवृत्ति हो जाती है, शोक, मोह, भय और दीनताका भाव जब बढ़ जाता है, तब तमोगुणको सर्वाधिक प्रबल मानना चाहिये। यही काल कलियुग है*।
इसी प्रकार जब लोग कामी हो जाते हैं, सदैव कटुवाणी बोलते हैं, जनपद चोर, डाकुओंसे भर जाते हैं, वेद पाखण्डियोंसे दूषित हो जाते हैं, राजा प्रजाओंका सर्वस्व हरण करते हैं, लोग मैथुन और पेट पालनके कर्मसे स्वतः पराजित होने लगते हैं, ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यव्रतका परित्याग करके अशुचि हो जाते हैं, कुटुम्बी अर्थात् गृहस्थ भिक्षाटन करने लगते हैं, तपस्वी गाँवोंमें रहना प्रारम्भ कर देते हैं, संन्यासी अर्थलोभमें फँस जाते हैं, लोग लघु शरीर होनेपर भी अत्यधिक भोजन करते हैं और जो चोर हैं, उन्हें साधुके रूपमें लोग स्वीकार करने लगते हैं, तब कलियुग ही मानना चाहिये।
इस कलिकालमें भृत्यगण अपने स्वामीका तिरस्कार करते हैं, तपस्वी अपने व्रतोंका परित्याग कर देते हैं, शूद्र प्रतिग्रह लेने लगते हैं, वैश्य ब्राह्मणोंकी सेवाकी उपेक्षा कर स्वयं व्रत-परायण हो जाते हैं, धार्मिक भाव कम होनेसे सभी लोग बेचैन रहते हैं, संतानें धार्मिक शिक्षाका अभाव होनेसे पिशाचके समान बन जाती हैं, अन्यायसे अर्जित भोजनके द्वारा अग्निदेवको आहुति, देवताओंको नैवेद्य तथा द्वारपर आये हुए अतिथि देवकी पूजा होती है, तब कलियुग समझना चाहिये।
हे शौनक! कलियुगके आ जानेपर लोग अपने पितरोंको जलतक नहीं देंगे। सभी प्राणी स्त्रीके वशमें हो जायँगे। सबके कर्म शूद्रवत् होंगे। इस कलिकालमें स्त्रियाँ अत्यधिक संतानोत्पत्ति करनेवाली और दुर्बल भाग्यवाली होंगी तथा बड़ोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन उनका स्वभाव होगा। ऐसा स्वभाव हो जानेपर यदि उनकी निन्दा की जायगी तो वे उसके प्रति गम्भीर न होकर उपेक्षाभाव अपनायेंगी। वे इस उपेक्षाभावको अपना सिर खुजलाकर व्यक्त करेंगी।
कलियुगके मनुष्य भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करेंगे। उन सभीका विश्वास पाखण्डमें बढ़ जायगा। हे ब्राह्मणो! यह कलिकाल दोषोंसे भरा हुआ है, किंतु इस दोषपूर्ण युगमें एक महान् गुण भी है। वह
* प्रभूतञ्च यदा सत्त्वं मनो बुद्धीन्द्रियाणि च। तदा कृतयुगं विद्याज्ज्ञाने तपसि यद्रतिः॥
यदा कर्मसु काम्येषु शक्तिर्यशसि देहिनाम्। तदा त्रेता रजोभूतिरिति जानीहि शौनक ॥
यदा लोभस्त्वसन्तोषो मानो दम्भश्च मत्सरः। कर्मणां चापि काम्यानां द्वापरं तद्रजस्तमः ॥
यदा सदानृतं तन्द्रा निद्रा हिंसादिसाधनम्। शोकमोहौ भयं दैन्यं स कलिस्तमसि स्मृतः ॥
४१० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
गुण है भगवान् श्रीकृष्णका संकीर्तन। उनका संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य संसारके महाबन्धन अर्थात् आवागमनके जालसे मुक्त हो जाता है। हे शौनक! कृतयुगमें प्राणीको जो फल भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे प्राप्त होता है, त्रेतायुगमें जो फल उनका जप करनेसे प्राप्त होता है और द्वापरयुगमें जो फल उन विष्णुदेवकी सेवा करनेसे प्राप्त होता है, वही फल कलिकालमें भगवान्के गुण, लीला और नाम-संकीर्तनसे ही प्राप्त हो जाता है। इसलिये नित्य ही भगवान् श्रीहरिका ध्यान, पूजन और संकीर्तन करना चाहिये—
कलेर्दोषनिधेर्विप्रा अस्ति ह्येको महागुणः ॥
कीर्तनादेव कृष्णस्य महाबन्धं परित्यजेत्।
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां जपत: फलम्॥
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।
तस्माद्ध्येयो हरिर्नित्यं गेयः पूज्यश्च शौनक ॥
(२२३ । ३५-३७)
(अध्याय २२३)
नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव
सूतजीने कहा—चार हजार युगोंके बीतनेपर ब्रह्माका नैमित्तिक प्रलयकाल आता है। कल्पके अन्तमें सौ वर्षतक अनावृष्टि होती है। आकाशमण्डलमें प्रचण्ड रूपसे संतप्त करनेवाले भयंकर सात सूर्य उदित हो जाते हैं। वे अपनी प्रखर रश्मियोंसे सम्पूर्ण जलराशिका पानकर तीनों लोकोंको सुखा देते हैं।
भगवान् विष्णु रुद्रस्वरूप धारण करके भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक तथा पाताललोककी समस्त चराचर सृष्टिको जला देते हैं। भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको जलानेके बाद संवर्तक नामके मेघोंकी सृष्टि करते हैं। नाना प्रकारके महामेघ सौ वर्षोंतक बरसते हैं। विष्णुरूपमें स्थित वायु अत्यन्त तेजगतिसे सौ वर्षोंतक चलती है। उस जलवृष्टिसे समुद्रके समान उत्ताल तरंगोंवाले संसारके इस प्रलयकालमें स्थावर-जंगमके नष्ट होनेपर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णु अनन्तशय्यापर शयन करते हैं। एक हजार वर्षतक सोनेके पश्चात् जब वे जागते हैं तो पुनः उन्हींके द्वारा इस जगत्की सृष्टि होती है।
हे शौनक! इसके बाद मैं प्राकृतिक प्रलयका वर्णन करता हूँ, उसको आप सुनें। ब्रह्माके एक सौ वर्ष बीत जानेपर भगवान् हरि अपने योगबलसे समस्त सृष्टिको अपनेमें लीन करके ब्रह्माको धारण कर लेते हैं। इस कालमें जो प्राणी ब्रह्मलोकमें स्थित रहते हैं, वे भी भगवान् विष्णुमें लीन हो जाते हैं।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! उस कालमें अनावृष्टि करनेवाले सूर्योंसे सम्पन्न मेघ थे। मेघोंके लगातार सौ वर्षतक बरसते रहनेसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलसे भर उठता है। अंदर प्रविष्ट हुई उस जलराशिसे ब्रह्माण्ड फट जाता है। ब्रह्माकी आयु पूर्ण होते ही सब कुछ जलमें ही लय हो जाता है। संसारमें कुछ भी शेष नहीं रहता। संसारको आधार प्रदान करनेवाली यह पृथ्वी भी उस जलराशिमें डूब जाती है। उस समय जल तेजमें, तेज वायुमें, वायु आकाशमें और आकाश भूतादि महत्तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है और वह महत्तत्त्व प्रकृतिमें तथा प्रकृति अव्यक्त परमपुरुषमें लीन हो जाती है। वे हरि (अव्यक्त पुरुष) सौ वर्षतक सोते हैं। तदनन्तर (ब्रह्माका) दिन आनेपर अव्यक्तादि क्रमसे पुनः व्यक्तिभूत चराचर जगत्की सृष्टि करते हैं। (अध्याय २२४)