हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
१५ पृष्ठ श्लोक कुमार्गी राजाके मंत्रीकी निन्दा २२७ १६ राजाको मंत्रीका अवलंबन २२७ १७ समानके साथभी मेलका उपदेश २२८ १९ ब्राह्मण क्षत्रिय आदिकी पूज्यता २२९ २० मेल करनेके योग्य ७ मनुष्य २२९ २१ संधि (मेल) की प्रशंसा २३०,२३१ २२ से २८ तक. संधि करनेके लिये \Bigg} २३२,२३३,२३४ ३४ से ४७ अयोग्य २० पुरुष अयोग्य पुरुषोंके साथ \Bigg} युद्ध न करनेका २३२,२३३,२३४ ३४ से ४७ तक. कारण तथा फल नीतिज्ञनकी प्रशंसा २३४ ४८ राजाका चक्रवर्ती होनेका उपाय २३५ ४९ विश्वास दे कर फँसाना २३६ ५१ अपने समान दुर्जनको भी \Bigg} २३६ ५२ सत्यवादी जाननेसे हानि सज्जनको दुष्टोंके वचनसे \Bigg} २३७ ५३ बुद्धिकी भ्रष्टता क्षुधापीडितका कर्तव्य २३९ ५४ धर्महीन पुरुषका लक्षण २३९ ५५ अभयप्रदानकी प्रशंसा २४० ५६ शरणागतके रक्षाकी प्रशंसा २४० ५७ कार्य पड़ने पर शत्रुको मित्र मानना २४१,२४२ ५९,६० संसारकी अनित्यता \Bigg} २४३-२४६ ६२ से ८२ तक. आदिका वर्णन रागियोंको वनका दोष और \Bigg} २४७ ८४,८५ विरक्तताका उपदेश जलसे अन्तरात्माका शुद्ध न होना २४८ ८६ २.
पृष्ठ श्लोक
१६ पृष्ठ श्लोक मनुष्यके लिये सुख २४८ ८८ सत्संग और रतिका उपदेश २४९ ८९,९० वृथा स्वयं गर्जनाकी निन्दा २५० ९१ एक साथ शत्रुसे युद्धकी निन्दा २५१ ९२ बातके भेदको बिना जाने ⎫ क्रोधकी अकर्तव्यता ⎭ २५१ ९३ शीघ्र नहीं किये कार्यकी नष्टता २५२ ९४ राजाको सुखके अर्थ ⎫ ६ विषयोंका त्याग ⎭ २५३ ९५ मंत्रीके मुख्य गुण २५३ ९६ कार्य एकाएक करनेसे हानि २५३ ९७ कार्यसाधनकी प्रशंसा २५३ ९८ अभिमानीकी सर्वदा अप्रसन्नता २५४ ९९ पुरुषोंका कर्मके फलसे निश्चय करना २५४ १०० दुर्जनसे वंचितका सुजनमें ⎫ अविश्वास करना ⎭ २५५ १०१,१०२ लोभी, अभिमानी, मूर्ख, पण्डित ⎫ स्त्रीपुत्रादिको वश करनेका उपाय ⎭ २५६ १०३,१०४ संधिका उपदेश २५६ १०५ १६ प्रकारकी संधियां ⎫ और उनके लक्षण ⎭ २५७-२६० १०६ से १२६ तक. धर्मकी दृढता २६० १२७,१२८ सज्जनके संग मेलका उपदेश २६० १२९ सत्यकी प्रशंसा २६० १३० आशीर्वाद २६१ १३१,१३२,१३३
हितोपदेशः भाषानुवादसमलंकृतः ꩜ प्र स्ता वि का सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः । जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला ॥ १ ॥ जिन्होंके ललाटपर चन्द्रमाकी कला गंगाजीके फेनकी रेखाके समान शोभाय- मान है उन चन्द्रशेखर महादेवजीकी कृपासे साधुजनोंका मनोरथ सिद्ध होय ॥ १ ॥ श्रुतो हितोपदेशोऽयं पाटवं संस्कृतोक्तिषु । वाचां सर्वत्र वैचित्र्यं नीतिविद्यां ददाति च ॥ २ ॥ यह हितोपदेश नामक ग्रंथ सुना हुआ ( सुननेसे ) संस्कृतके बोलने-चालनेमें चतुरताको, सब विषयोंमें वाक्योंकी विचित्रताको और नीतिविद्याको देता है ॥ २ ॥ अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥ ३ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य अपनेको कभी बूढ़ा न होऊँगा और कभी न मरूँगा ऐसा जानकर विद्या और धनसंचय का विचार करे, मृत्युने चोटीको आ पकड़ा है ऐसा सोच कर धर्म करे ॥ ३ ॥ सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् । अहार्यत्वादनर्घ्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥ ४ ॥ पण्डित लोग सब कालमें ( कभी ) चौरादिकोंसे नहीं चुराये जानेसे, अनमोल होनेसे और कभी क्षय न होनेसे, सब पदार्थोंमेंसे उत्तम पदार्थ विद्याकोही कहते हैं ॥ ४ ॥
समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ ५ ॥
२ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ५- संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् । समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ ५ ॥ जैसे नीच अर्थात् तुच्छ तृणादिसे मिलनेवाली नदी उस तृणादिकको अथाह समुद्रसे जा मिलाती है, उसी प्रकार विद्याभी नीच पुरुषको प्राप्त (वश) होकर राजासे जा मिलाती है, फिर सौभाग्य का उदय कराती है ॥ ५ ॥ विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥ ६ ॥ विद्या मनुष्यको नम्रता देती है और नम्रतासे योग्यता, योग्यतासे धन, धनसे धर्म, फिर धर्मसे सुख पाता है ॥ ६ ॥ विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य द्वे विद्ये प्रतिपत्तये । आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥ ७ ॥ शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या ये दोनों आदर करानेवाली हैं परंतु पहली अर्थात् शस्त्रविद्या बुढ़ापेमें “पुरुषार्थ न होनेसे” हँसी कराती है और दूसरी अर्थात् शास्त्रविद्या सदैव आदर कराती है ॥ ७ ॥ यन्नवे भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् । कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते ॥ ८ ॥ जैसे मृत्तिकाके कोरे बर्तनमें जिस वस्तुका संस्कार पहले होजाता है और पीछे वह उसमेंसे नहीं जाता है; उसी प्रकार मैं इस हितोपदेश ग्रन्थमें कथाके बहानेसे बालकों के लिये नीति कहता हूँ ॥ ८ ॥ मित्रलाभः सुहृद्भेदो विग्रहः संधिरेव च । पञ्चतन्त्रात्तथाऽन्यस्माद्ग्रन्थादाकृष्य लिख्यते ॥ ९ ॥ पंचतन्त्र तथा अन्य अन्य नीतिशास्त्रके ग्रन्थोंसे आशय लेकर, १ मित्रलाभ, २ सुहृद्भेद, ३ विग्रह और ४ सन्धि, ये चार भाग बनाये जाते हैं ॥ ९ ॥ अस्ति भागीरथीतीरे पाटलिपुत्रनामधेयं नगरम् । तत्र सर्व- १ यहां मनुष्य और तृणकी, विद्या और नदीकी, समुद्र और राजाकी समानता है. २ बालकोंका बचपन कोरे बर्तनके समान है. यदि इसमें कहानियोंके बहानेसे विद्याका संस्कार हो जाय तो वे जन्मपर्यंत शास्त्रसे विमुख न होंगे।
केनापि पठ्यमानं श्लोकद्वयं शुश्राव—
-१३ ] अनधीत पुत्रोंके लिये राजाकी चिंता ३ स्वामिगुणोपेतः सुदर्शनो नाम नरपतिरासीत् । स भूपतिरेकदा केनापि पठ्यमानं श्लोकद्वयं शुश्राव— गंगाजीके किनारेपर पटना नामका एक नगर है, वहाँ राजाके संपूर्ण गुणोंसे शोभायमान, सुदर्शन नामका एक राजा रहता था. एक समय उस राजाने किसीको पढ़ते हुए, ये दो श्लोक सुने— “अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् । सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥ १० ॥ “अनेक सन्देहोंको दूर करनेवाला और छिपे हुए अर्थको दिखाने वाला शास्त्र, सबका नेत्र है, ज्ञानरूपी जिसके पास वह शास्त्र नेत्र नहीं है वह अन्धा है ॥१०॥ यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय, किमु यत्र चतुष्टयम् ?” ॥ ११ ॥ यौवन, धन, प्रभुता और अविचारता, इनमेंसे एक एक भी हो तो अन- र्थके करने वाली है और जिसमें ये चारों होय वहांका क्या ठीक है ?” ॥११॥ इत्याकर्ण्यात्मनः पुत्राणामनधिगतशास्त्राणां नित्यमुन्मार्ग- गामिनां शास्त्राननुष्ठानेनोद्विग्नमनाः स राजा चिन्तयामास— इन दोनो श्लोकोंको सुनकर, वह राजा, शास्त्रको न पढ़नेवाले, तथा प्रतिदिन कुमार्गमें चलने वाले, अपने लड़कोंके, शास्त्र न पढनेसे मन व्याकुल होकर सोचने लगा— ‘कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न धार्मिकः । काणेन चक्षुषा किं वा, चक्षुःपीडैव केवलम् ॥ १२ ॥ जो न पण्डित है और न धर्मशील है, ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ किस कामका ? जैसे काणी आंखसे क्या सरता है ? केवल आँखकोही पीड़ा है ॥ १२ ॥ अजात-मृत-मूर्खाणां वरमाद्यौ न चान्तिमः । सकृद्दुःखकरावाद्यावन्तिमस्तु पदे पदे ॥ १३ ॥ उत्पन्न नहिं हुआ, तथा होकर मर गया और मूर्ख, इन तीनोंमेंसे पहले २ दो अच्छे हैं और अन्तिम(मूर्ख) अच्छा नहीं, क्योंकि पहले दोनों एकही १ शूरता, वीरता, दया और शील आदि. २ उत्पन्न नहीं हुआ और होकर मर गया.
४ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका १४- वार दुःखके करने वाले हैं. अंतिममें क्षण-क्षणमें (हमेशा) दुःख देता है ॥ १३ ॥ किंच,— वरं गर्भस्रावो वरमपि च नैवाभिगमनं वरं जातः प्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता । वरं वंध्या भार्या वरमपि च गर्भेषु वसति- र्न चाऽविद्वान् रूपद्रविणगुणयुक्तोऽपि तनयः ॥ १४ ॥ और गर्भका गिर पड़ना, स्त्रीका संसर्ग न करना, उत्पन्न होकर मर जाना, कन्याका होना, स्त्रीका बाँझ रहना, अथवा उसके गर्भमेंही रहना अच्छा है, परन्तु सुन्दरता तथा सुवर्णके आभूषणोंसे युक्त भी मूर्ख पुत्र होना अच्छा नहीं ॥ १४ ॥ किंच,— स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् । परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ? ॥ १५ ॥ और जिस पुत्रके उत्पन्न होनेसे वंशकी बड़ाई हो, वह जानों उत्पन्न हुआ, नहीं तो इस असार संसारमें मरकर कौन मनुष्य उत्पन्न नहीं होता है ? अर्थात् बहुत-से होते हैं और बहुत-से मरते हैं ॥ १५ ॥ गुणिगणगणनारम्भे न पतति कठिनी सुसंभ्रमाद्यस्य । तेनाम्बा यदि सुतिनी वद वन्ध्या कीदृशी नाम ॥ १६ ॥ गुणियोंकी गिनतीके आरंभमें जिसका नाम गौरवपूर्वक खडियासे नहीं लिखा जाय, ऐसे पुत्रसे जो माता पुत्रवती कहलावे तो कहो बाँझ कैसी होती है ? अर्थात् जिसका पुत्र निर्गुणी है वही सचमुच बाँझ है ॥ १६ ॥ अपि च,— दाने तपसि शौर्ये च यस्य न प्रथितं मनः । विद्यायामर्थलाभे च मातुरुच्चार एव सः ॥ १७ ॥ और भी कहा है कि—दानमें, तपमें, शूरतामें, विद्याके पढ़नेमें और धनके लाभमें जिसका मन नहीं लगा वह पुत्र अपनी माताके मलमूत्रके समान वृथा है ॥ १७ ॥ १ मूर्ख.
-२३ ] गुणवान् और मूर्ख पुत्रकी समीक्षा ५ अपरं च,- वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि । एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणा अपि ॥ १८ ॥ और दूसरे-गुणी एकही पुत्र अच्छा परंतु मूर्ख सौ अच्छे नहीं, क्योंकि अकेला चन्द्रमा अंधेरेको दूर कर देता है किंतु अनेक तारोंके समूह भी नहीं कर सकते हैं ॥ १८ ॥ पुण्यतीर्थे कृतं येन तपः क्वाप्यतिदुष्करम् । तस्य पुत्रो भवेद्वश्यः समृद्धो धार्मिकः सुधीः ॥ १९ ॥ जिस मनुष्यने किसी पुण्य तीर्थमें अतिकठिन तप किया है, उसीका पुत्र आज्ञाकारी, धनवान्, धर्मशील और पंडित होता है ॥ १९ ॥ अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ! ॥ २० ॥ हे राजा ! नित्य धनका लाभ, आरोग्य, प्रियतमा और मधुरभाषिणी स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धनका लाभ कराने वाली विद्या, ये संसारमें छः सुख हैं ॥ को धन्यो बहुभिः पुत्रैः कुशूलापूरणाढकैः ? । वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्रूयते पिता ॥ २१ ॥ कुशूल नाम पात्रोंसे भरेजाने वाले, अनाज रखनेके आढक नाम पात्रोंके समान अर्थात् बहुत भोजन करने वाले पुत्रोंसे कौन बड़ाई पाता है ? परंतु जिसके उत्पन्न होनेसे पिता संसारमें विख्यात हो ऐसा कुलदीपक एकही पुत्र अच्छा है ॥ २१ ॥ ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी । भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः ॥ २२ ॥ ऋणकर्ता पिता, व्यभिचारी याने बदचलन माता, अत्यंत सुन्दर स्त्री और मूर्ख पुत्र ये चारों शत्रुके समान हैं ॥ २२ ॥ अनभ्यासे विषं विद्या अजीर्णे भोजनं विषम् । विषं सभा दरिद्रस्य वृद्धस्य तरुणी विषम् ॥ २३ ॥
६ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका २४- अभ्यास न करनेसे विद्या, अजीर्ण होने पर भोजन, दरिद्रीको सभा और बूढेको तरुण स्त्री, विषके समान है ॥ २३ ॥ यस्य कस्य प्रसूतोऽपि गुणवान् पूज्यते नरः । धनुर्वंशविशुद्धोऽपि निर्गुणः किं करिष्यति ? ॥ २४ ॥ किसीसेभी उत्पन्न हुआ हो, किन्तु गुणवान् होनेसे प्रतिष्ठा पाता है; जैसे अच्छे बांसका बना हुआभी धनुष्य गुण अर्थात् डोरीके बिना क्या कर सकता है ? ॥ २४ ॥ तत्कथमिदानीमेते मम पुत्रा गुणवन्तः क्रियन्ताम् । आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ २५ ॥ इसलिये अब किसी प्रकारसे, इन मेरे पुत्रोंको गुणवान् कीजिये. आहार, निद्रा, भय और मैथुन, ये पशुओं और मनुष्योंमें समान हैं, केवल मनुष्योंमें धर्मही अधिक है और धर्महीन मनुष्य पशुके समान है ॥ २५ ॥ यतः,— धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥ २६ ॥ क्योंकि-जिस मनुष्यमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनमेंसे एक भी न हो, उसका जन्म बकरीके गलेके थनके समान वृथा ( निकम्मा ) है ॥ २६ ॥ यच्चोच्यते,— आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च । पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥ २७ ॥ जैसा कहा जाता है कि-आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु, ये पांच बातें मनुष्यकी गर्भहीमें लागू होती हैं ॥ २७ ॥ १ ज्ञान-दरिद्र ( मूर्ख ) या धनजानको. २ धर्मादि चार पुरुषार्थके उपाय.
-३२ ] दैव और प्रयत्नकी समीक्षा ७ किंच,— अवश्यंभाविनो भावा भवन्ति महतामपि । नग्नत्वं नीलकण्ठस्य महाहिशयनं हरेः ॥ २८ ॥ और, अवश्य होनहार विषय बड़े ( देवों ) कोभी होते हैं जैसे महादेवजीको नग्नता और विष्णुका शेषनागपर लोटना ॥ २८ ॥ अपि च,— यदभावि न तद्भावि, भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ? ॥ २९ ॥ और, जो होनहार नहीं है सो कभी न होगा और जो होनहार है उससे विपरीत न होगा, अर्थात् अवश्य होगा—इस चिन्तारूपी विषको नाश करने वाले औषधको क्यों नहीं पीते ? ॥ २९ ॥ एतत्का्र्याक्षमाणां केषांचिदालस्यवचनम् । न दैवमपि संचिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः । अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ? ॥ ३० ॥ यह तो कितनेही, कार्य करनेमें असमर्थोंका आलस्ययुक्त वचन है । भाग्यको विचार कर ( केवल दैवके उपरही भरोसा रख कर ) ही मनुष्यको अपना उद्योग नहीं छोडना चाहिये, क्योंकि विना उद्योगके तिलोंमेंसे तेल कौन निकाल सकता है ? ॥ ३० ॥ अन्यच्च,— उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी- 'दैवेन देय'मिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या, यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ? ॥ ३१ ॥ और भी, उद्योगी-जो पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी है ऐसे श्रेष्ठ मनुष्यको लक्ष्मी मिलती है और 'भाग्यमें होगा सो मिलेगा' इस प्रकार पुरुषार्थहीन मनुष्य कहते हैं; इसलिये भाग्यको छोड़, यथाशक्ति यत्न करना चाहिये और यत्न करनेपर भी जो कार्य सिद्ध न हो तो उसमें क्या दोष है ? ॥ ३१ ॥ यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् । एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ३२ ॥
०८ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ३३- और जैसे एक पहियेसे रथ नहीं चलता है वैसेही उद्योगके विना प्रारब्ध नहीं खुलती है ॥ ३२ ॥ तथा च,― पूर्वजन्मकृतं कर्म तद्दैवमिति कथ्यते । तस्मात्पुरुषकारेण यत्नं कुर्यादतन्द्रितः ॥ ३३ ॥ और पूर्व जन्ममें कियेहुए कामहीको प्रारब्ध कहते हैं, इसलिये मनुष्यको आलस्य छोड़कर पुरुषार्थ करना चाहिये ॥ ३३ ॥ यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद्यदिच्छति । एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥ जैसे कुम्हार मट्टीके लोंदेसे जो चाहता है सो बनाता है, उसी तरह मनुष्य भी अपना किया हुआ कर्म पाता है ॥ ३४ ॥ काकतालीयवत् प्राप्तं दृष्ट्वापि निधिमग्रतः । न स्वयं दैवमादत्ते पुरुषार्थमपेक्षते ॥ ३५ ॥ काकतालीय न्यायके समान अर्थात् अनायास इकट्ठे धनको सामने देखकर भी स्वयं भाग्य ग्रहण नहीं करता है, किंतु कुछ पुरुषार्थकी अपेक्षा होती है ॥३५॥ उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः । न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ ३६ ॥ उद्योगसे कार्य सिद्ध होते हैं, मनोरथोंसे नहीं, जैसे सोते हुए सिंहके मुखमें मृग अपने आप नहीं घुसते हैं ॥ ३६ ॥ मातृपितृकृताभ्यासो गुणितामेति बालकः । न गर्भच्युतिमात्रेण पुत्रो भवति पण्डितः ॥ ३७ ॥ माता-पितासे अभ्यास कराया गया बालक गुणवान् होता है, गर्भसे निकलतेही पुत्र पण्डित नहीं होता ॥ ३७ ॥ माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः । न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥ ३८ ॥ जिन माता-पिताने अपने बालकको नहीं पढ़ाया है, वे उसके वैरी हैं और वह बालक सभामें, हंसोंमें बगुलेकी तरह शोभा नहीं देता है ॥ ३८ ॥
-४२ ] सुदर्शनराजाको विष्णुशर्माका आश्वासन ९ रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसंभवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ ३९ ॥ सौन्दर्य तथा यौवनसे युक्त और बड़े कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य विद्याहीन होनेसे सुगन्धरहित टेसूके पुष्पोंके समान शोभा नहीं पाते हैं ॥ ३९ ॥ मूर्खोऽपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टितः । तावच्च शोभते मूर्खो यावत्किञ्चिन्न भाषते' ॥ ४० ॥ सुन्दर कपड़े पहिना हुआ मूर्ख भी सभामें तभीतक अच्छा लगता है कि जबतक वह कुछ न बोले' ॥ ४० ॥ एतच्चिन्तयित्वा स राजा पण्डितसभां कारितवान् । राजो- वाच—'भो भोः पण्डिताः ! श्रूयताम् । अस्ति कश्चिदेवंभूतो विद्वान् यो मम पुत्राणां नित्यमुन्मार्गगामिनामनधिगतशास्त्राणामिदानीं नीतिशास्त्रोपदेशेन पुनर्जन्म कारयितुं समर्थः ? यह सोच विचार कर उस राजाने पण्डितोंकी सभा कराई; (और) राजा बोला-'हे पण्डितमहाशयो ! सुनिये. (इस सभामें) कोई ऐसाभी पण्डित है जो मेरे नित्य कुमार्गी तथा शास्त्रको नहीं पढ़े हुए बेटोंका अब नीतिशास्त्रके उपदेशसे नया जन्म करानेको समर्थ हो ? यतः,— काचः काञ्चनसंसर्गाद्धत्ते मारकतीं द्युतिम् । तथा सत्संनिधानेन मूर्खो याति प्रवीणताम् ॥ ४१ ॥ क्योंकि—सुवर्णके संग होनेसे जैसे कांचकी मरकतमणिकी-सी शोभा हो जाती है, वैसेही अच्छे संगसे मूर्खभी चतुर हो जाता है ॥ ४१ ॥ उक्तं च,— हीयते हि मतिस्तात ! हीनैः सह समागमात् । समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम्' ॥ ४२ ॥ और कहा है कि-नीचोंके साथ रहनेसे बुद्धि घट जाती है, समान पुरुषोंके साथ रहनेसे समान रहती है और अधिक बुद्धिमानोंके साथ रहनेसे बढ़ जाती है' ४२ अत्रान्तरे विष्णुशर्मनामा महापण्डितः सकलनीतिशास्त्र-
१० हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ४३- तत्त्वज्ञो बृहस्पतिरिवाब्रवीत्—'देव ! महाकुलसंभूता एते राजपुत्राः । तन्मया नीतिं ग्राहयितुं शक्यन्ते । उस समय सम्पूर्ण नीतिशास्त्रके सारको जाननेवाले, बृहस्पतिजीके समान एक बड़े धुरंधर पण्डित विष्णुशर्माजी बोले-'महाराज ! ये बड़े सत्कुलमें उत्पन्न हुए राजपुत्र हैं, इसलिये मैं इनको नीति सिखा सकता हूं, क्योंकि,— यतः,— नाद्रव्ये निहिता काचित्क्रिया फलवती भवेत् । न व्यापारशतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः ॥ ४३ ॥ क्योंकि, अयोग्य वस्तुमें किया हुआ परिश्रम सफल नहीं होता है, जैसे अनेक उपाय करने परभी तोतेके समान बगुला नहीं पढ़ाया जा सकता है ॥ ४३ ॥ अन्यच्च,— अस्मिंस्तु निर्गुणं गोत्रे नापत्यमुपजायते । आकरे पद्मरागाणां जन्म काचमणेः कुतः ? ॥ ४४ ॥ और दूसरे—इस राजकुलमें गुणहीन सन्तान उत्पन्न नहीं होसकती है, जैसे पद्मरागमणियोंकी खानमें काचमणिका जन्म कैसा होसकता है ? ॥ ४४ ॥ अतोऽहं षण्मासाभ्यन्तरे तव पुत्रान्नीतिशास्त्राभिज्ञान्करिष्यामि' । राजा सविनयं पुनरुवाच— इसलिये मैं छः महीनोंके भीतर आपके पुत्रोंको नीतिशास्त्रमें निपुण कर दूंगा'. राजा फिर विनयसे बोला,— 'कीटोऽपि सुमनःसङ्गादारोहति सतां शिरः । अश्मापि याति देवत्वं महद्भिः सुप्रतिष्ठितः ॥ ४५ ॥ 'कीड़ाभी पुष्पोंके संगसे सज्जनके शिरपर पहुंच जाता है और बड़े मनुष्योंसे स्थापन किया हुआ पाषाणभी देवता मान कर पूजा जाता है ॥ ४५ ॥ अन्यच्च,— यथोदयगिरेर्द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते । तथा सत्संनिधानेन हीनवर्णोऽपि दीप्यते ॥ ४६ ॥ और दूसरे—जैसे उदयाचलकी वस्तु सूर्यकी किरणोंके गिरनेसे चमकती है उसी तरह सज्जनोंके पास रहनेसे मूर्ख भी शोभायमान लगता है ॥ ४६ ॥
·४७ ] राजपुत्रोंको सौंप देना ११ गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः । आस्वाद्यतोयाः प्रभवन्ति नद्यः समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः ॥ ४७ ॥ गुण, बुद्धिमानोंमें मिल जानेसे गुण हो जाते हैं और मूर्खोंमें मिल जानेसे वेही गुण दोष बन जाते हैं. जैसे मीठे जलवाली नदियां समुद्रसे मिलकर खारी बन जाती हैं ॥ ४७ ॥ तदेतेषामस्मत्पुत्राणां नीतिशास्त्रोपदेशाय भवन्तः प्रमाणम् ।' इत्युक्त्वा तस्य विष्णुशर्मणो बहुमानपुरःसरं पुत्रान्समर्पितवान् ॥ इसलिये इन मेरे पुत्रोंको नीतिशास्त्रके उपदेश करनेके लिये आप सब प्रका- रसे समर्थ हैं'—यह कहकर बडे आदरसत्कारसे विष्णुशर्माजीको पुत्र सौंप दिये. इति प्रस्ताविका ।
‘काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
हितोपदेशः • मित्रलाभः अथ प्रासादपृष्ठे सुखोपविष्टानां राजपुत्राणां पुरस्तात्प्रस्ताव- क्रमेण स पण्डितोऽब्रवीत्— फिर राजभवनके ऊपर आनन्दसे बैठे हुए, राजकुमारोंके सामने प्रसंगकी रीतिसे पंडितजी यों बोले— ‘काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा’ ॥ १ ॥ ‘काव्यशास्त्रके विनोदसे बुद्धिमानोंका और द्यूत आदि दुर्व्यसन, नींद अथवा कलहसे मूर्खोंका समय कटता है ॥ १ ॥ ‘तद्भवतां विनोदाय काककूर्मादीनां विचित्रां कथां कथयामि ?’ राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! कथ्यताम् ।’ विष्णुशर्मोवाच—‘शृणुत; संप्रति मित्रलाभः प्रस्तूयते । यस्यायमाद्यः श्लोकः— इसलिये आपकी प्रसन्नताके लिये काग, कछुआ आदिकी विचित्र कथा कहताहूं’ । राजपुत्र बोले—‘हे गुरुजी ! कहिये’ । विष्णुशर्मा बोले—‘सुनिये मैं अब मित्रलाभ कहता हूं कि जिसका प्रथम वाक्य यह है— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत्’ ॥ २ ॥ अस्त्र शस्त्र आदि उपायरहित, तथा धनहीन किन्तु बुद्धिमान् और आपसमें बड़े परम मित्र ( साथी ) काक, कूर्म, मृग और चूहेके समान शीघ्र कार्योंको सिद्ध कर लेते हैं’ ॥ २ ॥ राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’। विष्णुशर्मा कथयति,— राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसी है ?’ । विष्णुशर्मा कहने लगे— कथा १ [ काग, कछुआ, मृग और चूहेकी कहानी १ ] ‘अस्ति गोदावरीतीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र नानादिग्दे-
[ मित्रलाभः १-५ ] व्याधका जाल फैलाकर चुप बैठना १३ शादागत्य रात्रौ पक्षिणो निवसन्ति । अथ कदाचिदवसन्नायां रात्रावस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि लघुपतनकनामा वायसः प्रबुद्धः कृतान्तमिव द्वितीयमायान्तं व्याधमपश्यत् । तमवलोक्याचिन्तयत्—'अद्य प्रातरेवानिष्टदर्शनं जातम् , न जाने किमनभिमतं दर्शयिष्यति ।' इत्युक्त्वा तदनु- सरणक्रमेण व्याकुलश्चलितः । 'गोदावरीके तीरपर एक बड़ा सैमरका पेड़ है । वहां अनेक दिशाओंके देशोंसे आकर रातमें पक्षी बसेरा करते हैं । एक दिन जब थोड़ी रात रह गई और भगवान् कुमुदिनीके नायक चन्द्रमाने अस्ताचलकी चोटीकी शरण ली तब लघुपतनक नामक काग जगा और सामनेसे दूसरे यमराजके समान एक बहेलिएको आते हुए देखा; उसको देखकर सोचने लगा-कि 'आज प्रातःकालही बुरेका मुख देखा है । मैं नहीं जानता हूं कि क्या बुराई दिखावेगा ।' यह कहकर उसके पीछे पीछे घबराकर चल पड़ा । यतः,— शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ ३ ॥ क्योंकि—सहस्रों शोककी और सैकड़ों भयकी बातें मूर्ख पुरुषको दिन पर दिन दुःख देती हैं और पण्डितको नहीं ॥ ३ ॥ अन्यच्च, विषयिणामिदमवश्यं कर्तव्यम्,— और दूसरे-संसारके धंधोंमें लगे हुए मनुष्योंको यह अवश्य करना चाहिये कि— उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं महद्भयमुपस्थितम् । मरणव्याधिशोकानां किमद्य निपतिष्यति ॥ ४ ॥ नित्य उठतेही बड़ा भय आया ( आनेका संभव है ) ऐसा समझ लेना चाहिये, क्योंकि मरण आपत्ति और शोक, इनमेंसे न जाने कौनसा भी आ पड़े ॥ ४ ॥ अथ तेन व्याधेन तण्डुलकणान्विकीर्य जालं विस्तीर्णम् । स च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपो- तराजः सपरिवारो वियति विसर्पंस्तांस्तण्डुलकणानवलोक्या-
१४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ६-
मास। ततः कपोतराजस्तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान्प्रत्याह— 'कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां संभवः? तन्निरूप्यतां तावत्। भद्रमिदं न पश्यामि। प्रायेणानेन तण्डुलकणलोभेना- स्माभिरपि तथा भवितव्यम्,— फिर इस व्याधने चावलोंकी कनकीको बखेर कर जाल फैलाया और आप वहां छुप कर बैठ गया। उसी कालमें परिवारसहित आकाशमें उड़ते हुए चित्रग्रीव नामक कबूतरोंके राजाने चावलोंकी कनकीको देखा. फिर कपोतराज चावलके लोभी कबूतरोंसे बोला—'इस निर्जन वनमें चावलकी कनकी कहांसे आई ? पहले इसका निश्चय करो. मैं इसको कल्याणकारी नहीं देखता हूं, अवश्य इन चावलोंकी कनकीके लोभसे हमारीभी वैसी ही गति हो सकती जैसी कि— कङ्कणस्य तु लोभेन मग्नः पङ्के सुदुस्तरे। वृद्धव्याघ्रेण संप्राप्तः पथिकः स मृतो यथा' ॥ ५॥ कंगनके लोभसे गाढ़ी गाढ़ी कीचडमें फँसे हुए एक बटोहीको, बूढे बाघने पकड़ कर मार डाला' ॥ ५ ॥ कपोता ऊचुः—'कथमेतत् ?'। सोऽब्रवीत्— कबूतर बोले—'यह कथा कैसे है ?'—वह कहने लगा. कथा २ [ सुवर्णकंकणधारी बूढ़ा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ ] 'अहमेकदा दक्षिणारण्ये चरन्नपश्यम् । एको वृद्धव्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रूते —'भो भोः पान्थाः ! इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्य- ताम् ।' ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम्—भाग्येनैत- त्संभवति । किंतुत्वस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृत्तिर्न विधेया । 'एक समय मैंने दक्षिणके वनमें चलते हुए देखा कि एक बूढ़ा बाघ नहा धोकर कुशा हाथमें लिये सरोवरके किनारे पर ( बैठा हुआ ) बोला—'ओ बटोहियो ! यह सुवर्णका कंगन लो'. तब लोभके मारे किसी बटोहीने जीमें विचारा कि—'यह बात भाग्यसे होती है, परंतु इस आत्माके संदेहमें ( अर्थात कहीं मर तो न जाऊं ? इस सोचमें ) प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये ।
-७ ] बूढा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ १५
-७ ] बूढा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ १५ यतः— अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभां । यत्रास्ते विषसंसर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे ॥ ६ ॥ क्योंकि—दुर्जनसे मनोरथ पूरा भी हो जाय परन्तु परिणाम अच्छा नहीं होता है; जैसे अमृतमें विषके मिलनेसे वह अमृत भी मार डालता है ॥ ६ ॥ किंतु सर्वत्रार्थार्जने प्रवृत्तिः संदेह एव । परन्तु सर्वदा धनके उत्पन्न करनेमें तो संदेह होताही है । तथा चोक्तम्— न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति । संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ॥ ७ ॥ जैसा कहा है—मनुष्य सन्देहोंमें पडे विना कल्याण नहीं देखता है; परन्तु सन्देहोंमें पड़कर जो जीता रहता है वही देखता है ॥ ७ ॥ तन्निरूपयामि तावत् ।' प्रकाशं ब्रूते—'कुत्र तव कङ्कणम् ?' व्याघ्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति । पान्थोऽवदत्—'कथं मारात्मके त्वयि विश्वासः ?'। व्याघ्र उवाच—'शृणु रे पान्थ ! प्रागेव यौवन- दशायामतिदुर्वृत्त आसम् । अनेकगोमानुषाणां वधान्मे पुत्रा मृता दाराश्च । वंशहीनश्चाहम् । ततः केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः— “दानधर्मादिकं चरतु भवान् ।” तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तो कथं न विश्वासभूमिः ? इसलिये प्रथम इस बातका निश्चय करूं'. प्रकट बोला—'अरे ! तेरा कंगन कहां है ?' बाघने हाथ पसार कर दिखा दिया. बटोहीने कहा—'मैं तुझ हिंसकमें कैसे विश्वास करूं ?' बाघ बोला—'सुनरे बटोही ! पहले मैं युवावस्थामें बड़ा दुरा- चारी था, अनेक गौओं और मनुष्योंके मारनेसे मेरे स्त्री-पुत्र मर गये. और मैं वंशहीन होगया. तब किसी धर्मात्माने मुझे उपदेश किया कि—“आप दान, धर्म आदि करिये”. उसके उपदेशसे अब मैं स्नान करता हूं, दानी तथा वृद्ध हूं, नख और दांत भी मेरे गल गये हैं, मैं विश्वासके योग्य क्यों नहीं हूं ?
१६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८- यतः,— इज्याऽध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ८ ॥ क्योंकि—यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना, तप करना, सत्य बोलना, धीरज धरना, क्षमाशील होना और लोभ न करना, ये आठ धर्मके मार्ग हैं ॥ ८ ॥ तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते । उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ॥ ९ ॥ इनमेंसे पहले चार तो पाखंड रचनेके ( बाहरी दिखावेके ) लिये भी होते हैं परन्तु पिछले चार केवल महात्मामेंही होते हैं ॥ ९ ॥ मम चैतावांल्लोभविरहो येन स्वहस्तस्थमपि सुवर्णकङ्कणं यस्मै कस्मैचिद्दातुमिच्छामि । तथापि ‘व्याघ्रो मानुषं खादति’ इति लोकप्रवादो दुर्निवारः । मुझे यहां तक लोभ नहीं है कि अपने हाथका कंगनभी किसीको देना चाहता हूं, परन्तु ‘बाघ मनुष्यको खा जाता है’ यह लोकनिन्दा नहीं मिट सकती है। यतः,— गतानुगतिको लोकः कुट्टनीमुपदेशिनीम् । प्रमाणयति नो धर्मे यथा गोघ्नमपि द्विजम् ॥ १० ॥ क्योंकि—अपनी पुरानी लीकपर चलने वाला संसार धर्मके विषयमें कुट्टनीके उपदेशका ऐसा प्रमाण नहीं करता है कि जैसा गो-हिंसक ब्राह्मणका धर्ममें प्रमाण ( विश्वास ) करता है ॥ १० ॥ मया च धर्मशास्त्राण्यधीतानि । शृणु,— और मैंने धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं, सुन ऐसा कहा है कि— मरुस्थल्यां यथा वृष्टिः क्षुधार्ते भोजनं तथा । दरिद्रे दीयते दानं सफलं पाण्डुनन्दन ! ॥ ११ ॥ हे युधिष्ठिर ! जैसे मारवाड़देशमें वृष्टिका होना और भूखेको भोजन देना लाभदायक है, उसी प्रकार दरिद्रको दान देना लाभदायक होता है ॥ ११ ॥ प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा । आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ १२ ॥ जिस प्रकार अपने प्राण प्यारे हैं, वैसेही अन्य प्राणियोंकोभी अपने अपने
-१६ ] मुसाफिरके समक्ष बाघकी निजी क्रिया १७ प्राण प्यारे हैं, इसलिये साधुजन अपने प्राणोंके समान दूसरोंपर भी दया करते हैं ॥ १२ ॥ अपरं च,— प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ १३ ॥ और दूसरी यह बात है-प्रार्थनाका स्वीकार, दान, सुख तथा दुःख, शुभ और अशुभमें, पुरुष अपनी आत्माके समान प्रमाण करता है ॥ १३ ॥ अन्यच्च,— मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥ १४ ॥ और दूसरे—जो पराई स्त्रीको माताके समान, पराये धनको कंकड़के समान, और सब प्राणियोंको अपनी आत्माके समान समझता है, वही सच्चा पण्डित है॥ त्वं चातीव दुर्गतस्तेन तत्तुभ्यं दातुं सयत्नोऽहम् । तथा चोक्तम्— तू अत्यंत निर्धन है इसलिये मैं तुझे देनेको यत्नशील हूं; जैसा कहा है— दरिद्रान्भर कौन्तेय ! मा प्रयच्छेश्वरे धनम् । व्याधितस्यौषधं पथ्यं, नीरुजस्य किमौषधैः ? ॥ १५ ॥ हे युधिष्ठिर ! दरिद्रियोंका पालन और पोषण कर तथा धनवानको धन मत दे, क्यों कि, रोगीको औषध गुणदायक होती है और नीरोगको औषधियाँ वृथा हैं ॥ १५ ॥ अन्यच्च,— दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः ॥ १६ ॥ और-‘यह देना है’ इस निःस्पृह बुद्धिसे जो दान अनुपकारीको देश काल और सुपात्र विचार कर दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहलाता है ॥ १६ ॥ १ जिसके साथ प्रत्युपकार या कोई अन्य तरह स्वार्थका संबंध न हो ऐसे पुरुषको. हि० २
१८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १७- तदत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं गृहाण।' ततो यावदसौ तद्वचः- प्रतीतो लोभात्सरः स्नातुं प्रविशति तावन्महापङ्के निमग्नः पला- यितुमक्षमः । पङ्के पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत्—'अहह, महापङ्के पतितोऽसि । अतस्त्वामहमुत्थापयामि।' इत्युक्त्वा शनैः शनै- रुपगम्य तेन व्याघ्रेण धृतः; स पान्थोऽचिन्तयत्— इसलिये इस सरोवरमें नहाकर सोनेका कंगन ले। तब वह उसकी मीठी २ बातें सुन लोभवश होकर जैसेही सरोवरमें स्नान करनेके लिये उतरा वैसेही घनी कीचड़में फँस गया और भाग न सका। उसको कीचड़में फँसा देखकर व्याघ्रने कहा—'ओहो ! तू बड़ी भारी कीचड़में फँस गया है, इसलिये मैं तुझे बाहर निकालता हूं. यह कह कर और धीरे धीरे पास जाकर उस बाघने उसे पकड़ लिया, तब वह बटोही सोचने लगा— 'न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं , न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः । स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः ॥ १७ ॥ 'जो दुष्ट है उसे धर्मशास्त्र और वेद पढ़नेसे क्या होता है ? क्योंकि, स्वभाव ही सबसे प्रबल होता है, जैसे गौका दूध स्वभावसेही मीठा होता है' ॥ १७ ॥ किंच,— अवशेन्द्रियचित्तानां हस्तिस्नानमिव क्रिया । दुर्भागाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रियां विना ॥ १८ ॥ और जिनकी इन्द्रियां और चित्त वशमें नहीं है उनका व्यापार हाथीके स्नानके समान निष्फल है, और इसी प्रकार क्रियाके विना ज्ञान, वंध्या स्त्रियोंके पालन-पोषणके समान भार अर्थात् निष्फल है ॥ १८ ॥ १ वस्तुतः 'गजवत् स्नानमाचरेत्' यह उक्ति केवल स्नानकी रीत बता देती है, क्योंकि, हाथी नहानेके बाद तुरंतही शूंड़से अपने शरीरके ऊपर धूल फेंकता है, जिस वजहसे उसका स्नान निष्फलही है. २ विधवा स्त्रियोंके गहने पहननेके समान निष्फल है ऐसा अर्थ भी हो सकता है, अर्थात् जैसा कि संतति उत्पत्तिकी आशा न होनेसे वंध्याका पालन-पोषण भार है वैसेही बिना पतिके विधवाको अलंकार भार है.