BharatKosha
Back to the archive

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages
Page 440Permalink

४२४ [ २.६ २३८ ग्रहण किया। उसके पुत्र ने जब वह बच्चा ही था गोदी में बैठे बैठे पूछा— तात ! मुझे अनेक़ार्थ वाला एक कारण, एक बात कहें। यह पूछते हुए उसने यह गाथा कही— इङ्घ एकपदं तात अनेकत्थपदनिस्सितं, किञ्चि सङ्ग्राहिकं ब्रूहि येनत्थे साधयामसे ॥ [तात ! अनेक अर्थपदो से युक्त कोई एक सङ्ग्राहक पद कहें, जिससे अर्थ की प्राप्ति हो।] इङ्घ याचना के या प्रेरणा के अर्थ में निपात है। एकपदं एक पद वा एक बात से युक्त पद। अनेकत्थपदनिस्सितं अनेक अर्थों वा बातो से युक्त। किञ्चि सङ्ग्राहिकं ब्रूहि कोई एक बहुत से पदो का सङ्ग्राहक पद कहें। अथवा यही पाठ है। येनत्थे साधयामसे जिस अनेक़ार्थ युक्त एक पद से ही हम अपनी वृद्धि सिद्ध करे, वह हमे कहें—यही पूछता है। उसके पिता ने कहते हुए दूसरी गाथा कही— दक्खेय्येकपदं तात अनेकत्थपदनिस्सितं, तञ्च सीलेन संयुत्तं खन्तिया उपपादितं; अलं मित्ते सुखापेतुं अमितानं दुखाय च ॥ [तात ! दक्षता अनेक अर्थपदो से युक्त एक पद है। वह शील और क्षमा के सहित हो तो मित्रो को सुख तथा शत्रुओं को दुख देने के लिए पर्याप्त है।] दक्खेय्येकपदं दक्षता एक पद है। दक्षता कहते हैं लाभ उत्पन्न करने वाले, हुशियार कुशल आदमी का ज्ञानपूर्ण प्रयत्न (=वीर्य्य)। अनेकत्थपद निस्सितं इस प्रकार कहा गया वीर्य्य अनेक अर्थ पदो से युक्त। किससे ? शीलादि से। इसलिए तञ्च सीलेन संयुत्तं आदि कहा। उसका अर्थ है कि वह वीर्य्य आचारशील तथा सहनशक्ति से युक्त। मित्ते सुखापेतुं अमितानञ्च दुखाय अलं, समर्थ है। कौन है जो लाभ उत्पन्न करने वाले, ज्ञानपूर्ण कुशल

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक

Page 441Permalink

हरितमात ] ४२५ वीर्य से युक्त हो, आचार-शील तथा क्षमा से युक्त हो और मित्रो को सुख देने तथा शत्रुओं को दुख देने में समर्थ न हो ? इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पुत्र के प्रश्न का उत्तर दिया। वह भी पिता के कथनानुसार अपनी उन्नति कर यथाकर्म परलोक गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के प्रकाशन के अन्त मे पिता पुत्र सोतापत्ति फल मे प्रतिष्ठित हुए। उस समय पुत्र यही था। बाराणसी सेठ तो मैं ही था। २३६. हरितमात जातक “आसिविस मम सन्त ” यह शास्ता ने वेळुवन म रहते समय अजातशत्रु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशलराज के पिता महाकोशल ने राजा बिम्बिसार को अपनी लडकी देने के समय लडकी का स्नान-मूल्य काशीगांव दिया। अजातशत्रु द्वारा पिता मार दिए जाने से वह राजा के प्रति स्नेह होने के कारण शीघ्र ही मर गई। माता के मर जाने पर भी अजातशत्रु उस गांव का उपभोग करता ही था। कोशलराज उससे लडता था कि मैं पिता की हत्या करने वाले चोर को अपने कुल का गांव न दूंगा। कभी मामा विजयी होता, कभी भानजा। जब अजातशत्रु जीतता तब रथ पर ध्वजा बँधवा बडी शान के साथ नगर मे प्रवेश करता। जब पराजित होता तब दुखी मन से चुपचाप बिना किसी को खबर किए प्रवेश करता।

कथा कही—

Page 442Permalink

४२६ [ २६२ ] ६ एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, अजात- शत्रु मामा को हराकर प्रसन्न होता है, हारने पर चिन्तित होता है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, केवल अभी नहीं, यह पहले भी जीतने पर प्रसन्न होता था, हारने पर दुखी होता था।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व नीले मेण्डक होकर पैदा हुए। उस समय मनुष्यों ने नदी कन्दरा आदि में जहाँ तहाँ मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल¹ फैलाए थे। एक जाल में बहुत सी मछ्- लियाँ दाखिल हुईं। एक जल-सर्प भी मछलियाँ खाता हुआ उसी जाल में फँसा। बहुत सी मछलियो ने इकट्ठे हो उसे खा लहू-लहान कर दिया। जब उसे कही शरण न दिखाई दी तो मृत्यु से भयभीत हो वह जाल से निकल वेदना से बेहोश हो पानी के किनारे जा पडा। नील मेण्डक भी उस समय उछल कर जाल के सिरे पर आ पडा था। सर्प को कोई दूसरा निर्णायक न दिखाई दिया तो उसने उस मेण्डक को वहाँ पड़े देख पूछा—'सौम्य नील मेण्डक ! क्या तुझे इन मछलियो की यह करतूत अच्छी लगती है ?' उसने यह पहली गाथा कही— आसीविसं ममं सन्तं पविट्ठं कुभिनामुखं, रुच्चते हरितामाता यं मं खादन्ति मच्छका ॥ [ हे हरी माता वाले ! यह जो जाल में दाखिल होने पर मुझ सर्प को मछलियाँ खाती हैं, क्या यह तुझे अच्छा लगता है ? ] आसिविसं ममं सन्तं मुझ सर्प को। रुच्चते हरितामाता यं मं खादन्ति मच्छका कहता है कि हे हरे मेण्डकपुत्र क्या यह तुझे अच्छा लगता है ? ¹मछलियाँ पकड़ने का बाँस का फंदा।

Page 443Permalink

हरितमात ] ४२७ हरे मेण्डक ने उत्तर दिया—हां, मित्र अच्छा लगता है। किस कारण से ? यदि तू अपने प्रदेश मे आने पर मछलियो को खाता है तो मछलियाँ भी तुझे अपने प्रदेश में आने पर खाती है। अपने अपने प्रदेश में, विषय मे, गोचर भूमि मे कोई कमजोर नही होता। यह कहकर दूसरी गाथा कही— विलुम्पतेव पुरिसो यावस्स उपकप्पति, यदा चञ्ञे विलुम्पन्ति सो विलुत्तो विलुम्पति ॥ [ जब तक सामर्थ्य होती है आदमी (दूसरो) को लूटता ही है। जब दूसरे लूटते है, तो वह लूटने वाला लुटता है। ] विलुम्पतेव पुरिसो यावस्स उपकप्पति जब तक पुरुष का ऐश्वर्य रहता है तब तक वह दूसरो को लूटता ही है। याव सो उपकप्पति यह भी पाठ है। जितने समय तक वह आदमी लूट सकता है, अर्थ है। यदा चञ्ञे विलुम्पन्ति जब दूसरे ऐश्वर्य्यशाली होकर लूटते है। सो विलुत्तो विलुम्पति वह लुटेरा लूटा जाता है। विलुम्पते भी पाठ है। अर्थ यही है। विलुम्पन भी पढते हैं। उसका अर्थ ठीक नही बैठता। इस प्रकार लूटने वाला फिर लूटा जाता है। वोधिसत्व के मुकद्दमे का निर्णय देने पर मछलियो ने जल-सर्प की दुर्बलता जान, शत्रु को धर पकडने के लिए जाल से निकल उसे वही मार डाला और चली गईं। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय जल- सर्प अजातशत्रु था। नील मेण्डक तो में ही था।

२४०. महापिङ्गल जातक

Page 444Permalink

४२८ [ २.६ २४० २४०. महापिङ्गल जातक “सब्बो जनो ..” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा देवदत्त के शास्ता के प्रति बैर बांध लेने के नौ महीने बाद जेतवन के द्वार-कोठे पर (उसके) पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर जेतवनवासी तथा सकल नगर के निवासी यह सोच कि बुद्ध के मार्ग का कण्टक देवदत्त पृथ्वी के द्वारा निगल लिया गया और अब सम्यक सम्बुद्ध का शत्रु मर गया बड़े सन्तुष्ट हुए। उनसे परम्परा-घोष¹ से सुनकर सारे जम्बूद्वीपवासी तथा यक्ष भूत और देवगण भी बड़े हर्षित हुए। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त के पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर महा-जन-समूह यह सोचकर कि बुद्ध का विरोधी देवदत्त पृथ्वी द्वारा निगल लिया गया हर्षित हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त के मरने पर जन- समूह हर्षित होता है और प्रसन्न होता है, पहले भी हर्षित हुआ है और प्रसन्न हुआ है।" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में महापिङ्गल नाम का राजा अधर्म से, अनुचित ¹एक से दूसरा और फिर उससे तीसरा सुने।

Page 445Permalink

महापिङ्गल ] ४२६ तौर पर राज्य करता था। छन्द आदि के वशीभूत हो पापकर्म करता हुआ दण्डबलि जङ्घ-कार्षापण आदि ले जनता को ऐसे पीडता था जैसे ऊख-यन्त्र ऊख को। वह रौद्र स्वभाव का था, कठोर था और दुस्साहसी था। उसमें दूसरो के लिए तनिक भी दया नही थी। घर मे स्त्रियो या, लडके लडकियो का, अमात्य ब्राह्मणो का तथा गृहपति आदि का भी अप्रिय था। वह ऐसा था मानो आँख में धल हो, भात के कौर मे ककर हो अथवा ऐडी को बीध कर काँटा घुस गया हो। उस समय बोधिसत्त्व महापिङ्गल का पुत्र होकर पैदा हुए। महापिङ्गल चिरकाल तक राज्य करके मर गया। उसके मरने पर सभी वाराणसी वासियो ने हर्षित हो, सन्तुष्ट हो, खूब प्रसन्न हो एक हजार गाडी लकडी से महापिङ्गल को जलाकर अनेक सहस्र घडो से आग बुझाई। फिर बोधिसत्त्व को राज्य पर अभिषिक्त कर 'हमे धार्मिक राजा मिला' सोच (वे) प्रसन्न हो नगर मे उत्सव-भेरी बजवा, ऊँची ध्वजाओ तथा पताकाओ से नगर को अलङ्कृत कर, दरवाजे दरवाजे पर मण्डप बनवा, लाज-पुष्प बिखरे सजे हुए मण्डपो मे बैठ कर खाने पीने लगे। बोधिसत्त्व भी अलङ्कृत महान् तल पर (बिछे) श्रेष्ठ आसन के बीच मे, जिस पर श्वेत छत्र छाया हुआ था बैठे। अमात्य, ब्राह्मण, गृहपति, राष्ट्रिक तथा द्वारपाल आदि राजा को घेर कर खडे थे। एक द्वारपाल थोडी ही दूर पर खडा हो आस्वास-प्रश्वास लेता हुआ रोने लगा। बोधिसत्त्व ने उसे देख पूछा—सोम्य ! मेरे पिता के मरने पर सभी प्रसन्न हो उत्सव मना रहे है। लेकिन तू खडा रो रहा है। क्या मेरा पिता तुम्हे ही प्रिय था ? यह पूछते हुए पहली गाथा कही— सब्बो जनो हिंसितो पिङ्गलेन तस्मि गते पच्चयं वेदयन्ति, पियो नु ते आसि अकण्हनेत्तो कस्मा नु त्वं रोदसि द्वारपाल ॥ [ पिङ्गल ने सब जना को कष्ट दिया । उसके मरने पर सभी आनन्द का अनुभव करते है। हे द्वारपाल ! क्या वह तेरा ही प्रिय था ? तू क्यो रोता है ? ]

कारण से रोता है ? अट्टकथा में कस्मा तुवं पाठ है।

Page 446Permalink

[ २.६.२४० हिंसितो नाना प्रकार के दण्ड बलि आदि से पीडा दी। पिङ्गलेन पिङ्गल आँख वाले ने, उसकी दोनो आँखें एकदम पिङ्गल वर्ण की, बिल्ली की आँखो के समान थी। इसीसे उसका नाम पिङ्गल हुआ। पच्चयं वेदयन्ति प्रीति अनुभव करते हैं। अकण्हनेत्तो पिङ्गल आँख वाला। कस्मा नु त्वं तू किस कारण से रोता है ? अट्टकथा में कस्मा तुवं पाठ है। उसने उसकी बात सुन उत्तर दिया—मैं इस शोक से नही रोता हूँ कि महापिङ्गल मर गया। मेरे सिर को तो सुख हुआ है। पिङ्गल राजा प्रासाद से उतरते हुए और चढ़ते हुए हथौडी से चोट लगाने की तरह मेरे सिर पर आठ आठ टोके लगाता था। वह परलोक जाकर भी जैसे मेरे सिर में टोके लगाता था उसी तरह निरयपालको तथा यमराज के सिर में भी टोके लगाएगा। 'यह हमे बहुत कष्ट देता है' सोच वह इसे फिर यहाँ लाकर छोड जा सकते हैं। वह मेरे सिर में फिर टोके मारेगा। मैं इस भय के कारण रोता हूँ। यह अर्थ प्रकट करते हुए दूसरी गाथा कही— न मे पियो आसि अकण्हनेत्तो भायामि पच्चागमनाय तस्स, इतो गतो हिंसेय्य मच्चुराजं सो हिंसितो आनेय्य पुन इध ॥ [ मुझे पिङ्गल नेत्र प्रिय न था। मुझे डर है कि वह फिर न लौट आए। यहाँ से जाकर वह यमराज को कष्ट दे। और (कही) यमराज कष्ट पाकर उसे फिर यहाँ ले आए । ] बोधिसत्त्व ने उसे आश्वासन दिया—वह राजा लकडी के हजार भारो से जला दिया गया है। सैकडो घडो से (चिता) बुझा दी गई है। जिस जगह जलाया गया, वह जगह चारो ओर से खन दी गई है। जो परलोक जाते हैं उनका यह स्वभाव है कि वह दूसरी जगह जन्म ग्रहण करते हैं। फिर उसी शरीर से नही आते हैं। इसलिए तू मत डर। यह गाथा कही—

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिङ्गल

Page 447Permalink

महापिङ्गल ] ४३१ दड्ढो वाहसहस्सेहि सित्तो घटसतेहि सो, परिक्खता च सा भूमि मा भायि नागमिस्सति ॥ [ हजार भारो से जला दिया गया है। सैकडो घडो से (चिता) ठडी कर दी गई है। वह भूमि खन दी गई है। मत डर, वह नही आएगा। ] तब द्वारपाल को सन्तोष हुआ। बोधिसत्त्व धर्म से राज्य करके दान आदि पुण्य कर यथाकर्म (परलोक) गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिङ्गल देवदत्त था। पुत्र तो मै ही था।

२४१. सब्बदाठ जातक

Page 448Permalink

दूसरा परिच्छेद १०. सिगाल वर्ग २४१. सब्बदाठ जातक “सिगालोमानत्यट्ठो...” यह शास्ता ने वेळुवन मे विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा अजातशत्रु को प्रसन्न कर देवदत्त ने जो लाभ सत्कार पैदा किया था वह उसे देर तक स्थिर न रख सका। नालागिरि (हाथी) का प्रयोग करने के समय जो आश्चर्य देखा गया उस समय से वह लाभ-सत्कार नष्ट हो गया। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त लाभ-सत्कार पैदा करके चिरकाल तक स्थिर न रख सका। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने लाभ-सत्कार को नष्ट किया है, पहले भी नष्ट किया ही है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व उसका पुरोहित था, तीनो वेदो तथा अठारह शिल्पो में पारङ्गत। वह पृथ्वीजय मन्त्र जानता था। पृथ्वीजय मन्त्र जापमन्त्र है। एक दिन बोधिसत्व उस मन्त्र को सिद्ध करने की इच्छा से एक खुली जगह में एक पत्थर पर बैठकर मन्त्र जाप करने लगा। वह मन्त्र किसी दूसरे

Page 449Permalink

सब्बदाठ ] ४३३

विधिरहित व्यक्ति को नहीं सुनाया जा सकता था, इसीलिए वह वैसी जगह जाप करने लगा था। उसके पाठ करने के समय एक गीदड़ ने एक बिल में पड़े पड़े उस मन्त्र को सुनकर अभ्यास कर लिया। वह अपने पूर्व-जन्म में पृथ्वीजय मन्त्र का अभ्यासी एक ब्राह्मण था। बोधिसत्त्व ने पाठ कर चुकने पर कहा—मुझे इस मन्त्र का अभ्यास हो गया। गीदड़ ने बिल से निकल कर कहा—भो ब्राह्मण ! मुझे इस मन्त्र का तुझ से भी अधिक अभ्यास है। इतना कहकर वह भाग गया। बोधिसत्त्व ने यह सोच कि यह गीदड़ बहुत खराबी करेगा 'पकड़ो पकड़ो' कहते हुए उसका पीछा किया। गीदड़ भागकर जंगल में जा घुसा। वहाँ जाकर उसने एक गीदड़ी के शरीर में थोड़ा सा बुडका भरा। वह बोली— स्वामी ! क्या है ? 'मुझे पहचानती है या नहीं ?' उसने कहा—स्वामी ! पहचानती हूँ। उसने पृथ्वीजय मन्त्र का जाप कर सैकड़ों गीदड़ों को आज्ञा दे सब हाथी, अश्व, सिंह, व्याघ्र, सूअर, मृग आदि चौपायों को अपने पास बुलाया। सब को अपने अधीन कर स्वयं सब्बदाठ नामक राजा बन एक गीदड़ी को पटरानी बनाया। दो हाथियों की पीठ पर सिंह बैठता। सिंह की पीठ पर पटरानी सहित सब्बदाठ राजा बैठता। बड़ी शान थी। वह ऐश्वर्य-मद में चूर हो, अभिमान के मारे वाराणसी राज्य जीतने की इच्छा से सब चौपायों को ले वाराणसी से कुछ ही दूर पर आ पहुँचा। बारह योजन की परिषद थी। उसने कुछ ही दूर से ही राजा के पास सन्देश भेजा—राज्य दे अथवा युद्ध करे। वाराणसी निवासिया ने भयभीत हो डर के मारे नगर के द्वार बन्द कर लिए। बोधिसत्त्व ने राजा के पास आकर कहा—महाराज ! मत डरें। सब्ब- दाठ गीदड़ के साथ युद्ध करने की जिम्मेवारी मेरी है। मेरे अतिरिक्त और कोई उससे युद्ध नहीं कर सकता। उसने राजा तथा नगर वासियों को आश्वा- सन दे सब्बदाठ क्या करके राज्य जीतेगा पूछने की इच्छा से नगर-द्वार की अट्टालिका पर चढ़कर पूछा—सब्बदाठ ! क्या करके इस राज्य को लेगा ? “सिंहनाद कराकर, जनसमूह को शब्द से भयभीत कर राज्य लूँगा।” २८

Page 450Permalink

[४३४] [ २.१०.२४१

बोधिसत्त्व ने “यह है” जान अट्टालिका पर चढ मुनादी करवा दी कि सारी बारह योजन वाराणसी के नगर निवासी अपने अपने कानो के छिद्रो को माष (की दाल) के आटे से लीप लें। जनता ने मुनादी सुन बिल्लियो से लेकर सभी जानवरो के तथा अपने कानो के छिद्र माष के आटे से इस प्रकार लीप लिए कि दूसरे का शब्द न सुन सके। बोधिसत्त्व ने फिर अट्टालिका पर चढकर पुकारा--- “सब्बदाठ !” “ब्राह्मण ! क्या है।” “इस राज्य को कैसे ग्रहण करेगा।” “सिंहनाद करवा कर, मनुष्यो को डरा कर, जान मरवा कर ग्रहण करूँगा।” “सिंहनाद नही करवा सकेगा। जाति-सम्पन्न, लाल हाथ पाँव वाले, केशर सिंह राज तेरे जैसे नीच गीदड की आज्ञा नही मानेंगे।” गीदड ने अभिमान से चूर हो कहा--दूसरे सिंह रहें। जिस सिंह की पीठ पर मै बैठा हूँ उसीसे सिंहनाद करवाऊँगा। “यदि सामर्थ्य है तो सिंहनाद करवा।” जिस सिंह पर बैठा था उसने उसे पांव से इशारा किया कि सिंहनाद कर। सिंह ने हाथी के सिर पर मुंह रख तीन बार ऐसा सिंहनाद किया, जैसा कोई न कर सके। हाथियो ने डरकर गीदड़ को पैरो मे गिरा पाँव से उसके सिर को कुचल चूर्ण विचूर्ण कर दिया। सब्बदाठ वही मर गया। वे हाथी भी सिंह- नाद सुनकर भय के मारे एक दूसरे से भिडकर वही मर गए। सिंहो को छोड़ कर शेष जितने भी खरगोश और बिल्ला से लेकर मृग सूअर आदि थे सभी जानवर वही मर गए। सिंह भाग कर अरण्य मे चले गए। बारह योजन में मास का ढेर लग गया। बोधिसत्त्व ने अटारी से उतर नगर द्वारो को खोल मुनादी करा दी कि सभी अपने कानो में से माष के आटे को निकाल दें और जिन्हे मास की जरूरत हो मास ले जाएं। मनुष्यो ने गीला मास खाया और बाकी को सुखा कर बल्लूर¹ बना लिया। कहते हैं उसी समय से मास सुखाना प्रारम्भ हुआ।

¹ बल्लूर=सूखा मांस।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला यह अभिसम्बुद्ध गाथाएँ कह जातक का

Page 451Permalink

सुनख ] ४३५

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला यह अभिसम्बुद्ध गाथाएँ कह जातक का मेल बैठाया— सिगालो मानत्थद्धोव परिवारेन श्रत्थिको, पापुणी महतिं भूमिं राजासि सब्बदाठिनं ॥ एवमेवं मनुस्सेसु यो होति परिवारवा, सो हि तत्थ महा होति सिगालो विय दाठिनं ॥ [गीदड़ अभिमान मे चूर था। उसे और भी "परिवार" चाहिए था। यह महान् पद को प्राप्त हो गया—सभी चौपायो का राजा हो गया। इसी प्रकार मनुष्यो मे भी जिसका "परिवार" बडा होता है वह भी महान् हो जाता है जैसे गीदड जानवरो मे।] मानत्थद्धो अनुचरो के कारण उत्पन्न अभिमान से चूर। परिवारेन अत्थिको और भी "परिवार" की इच्छा वाला होकर। महतिं भूमि महा- सम्पत्ति को। राजासि सब्बदाठिन सब चौपायो का राजा था। सो हि तत्थ महा होति जो परिवार युक्त आदमी है वह उन परिवारो में महान् होता है। सिगालो विय दाठिन जैसे गीदड चौपायो मे महान् हुआ उसी प्रकार महान् होता है। वह उस गीदड की तरह प्रमाद के कारण विनाश को प्राप्त होता है। उस समय गीदड देवदत्त था। राजा सारिपुत्र था। पुरोहित तो में ही था।

२४२. सुनख जातक “बालो वतायं सुनखो . ” यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय अम्बल-कोष्ठक आसनशाला में भात खाने वाले कुत्ते के बारे मे कही।

क. वर्तमान कथा

Page 452Permalink

४३६ [ २.१० २४२ क. वर्तमान कथा उसके जन्म के समय से ही बहारो ने उसे वहाँ पोसा था। वह वहाँ भात खाता हुआ आगे चलकर मोटा गया। एक दिन एक ग्रामवासी वहाँ आया। उसने कुत्ते को देखा और बहारो को चादर तथा कार्षापण दे कुत्ते को चमड़े के पट्टे से बाँध कर ले गया। वह ले जाने के समय भौंका नहीं। जो जो दिया गया खाता हुआ पीछे पीछे गया। तब उस आदमी ने सोचा कि अब यह मुझसे प्रेम करता है और पट्टा खोल दिया। वह छूटते ही एक दौड़ में आसनशाला आकर पहुँचा। भिक्षुओं ने उसे देख और उसका किया जान शाम को धर्मसभा में बातचीत चलाई— 'आयुष्मानो ! आसनशाला का कुत्ता बन्धन से मुक्त होने में चतुर है। छूटते ही फिर आ गया है। शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?' 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, वह कुत्ता केवल अभी बन्धन से मुक्त होने में चतुर नहीं है, पहले भी चतुर ही था।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी राष्ट्र के एक बड़े सम्पन्न घराने में पैदा हुए। बड़े होने पर गृहस्थी बसाई। उस समय वाराणसी में एक आदमी के पास एक कुत्ता था। वह भात के कौर खा खाकर मोटा गया। एक ग्रामवासी वाराणसी आया। उस कुत्ते को देख, उस आदमी को चादर और कार्षापण दे, कुत्ते को चमड़े की डोरी से बाँध डोरी के एक सिरे को पकड़ कर ले चला। चलते चलते जंगल के द्वार पर एक शाला में दाखिल हो कुत्ते को बाँध एक तख्ते पर लेट कर सो गया। उस समय बोधिसत्त्व ने किसी काम से उस जंगल में प्रवेश होते वक्त उस कुत्ते को चमड़े की डोरी से बँधे बैठे देख पहली गाथा कही— बालो बतायं सुनखो यो वरत्तं न खादति, बन्धना च पमुञ्चेय्य असितो च घरं वजे ॥

Page 453Permalink

गुगल ] ४३७ [ यह कुत्ता मूर्ख है जो चमड़े की डोरी को नहीं खाता है । (यदि खा डाले) तो बन्धन से छूट जाए और भरे पेट ही घर चला जाए । ] पमुञ्चेय्य मुखं घरं; अथवा पमोच्चेय्य ही पाठ है । असितो च घरं वने भरे पेट ही अपने निवास-स्थान पर चला जाए । उसे सुन कुत्ते ने दूसरी गाथा कही— अट्ठितं मे मनस्मिं मे अथो मे हृदये कतं, कालञ्च पतिकङ्खामि याव पस्सुपतु जनो ॥ [ यह मेरा अधिष्ठान था, यह मेरे मन में था; और यह (तुम्हारा) कहना भी हृदय में रख लिया। मैं समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जबकि लोग सो जाएँ । ] अट्ठितं मे मनस्मिं मे जो तुम कहते हो वह पहले से मेरा सङ्कल्प है, वह मेरे मन ही में है । अथो मे हृदये कतं तुम्हारा वचन भी मैने हृदय में कर लिया है । कालञ्च पतिकङ्खामि समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । याव पस्सुपतु जनो जब तक यह लोग सो जाते हैं, इन्हें नींद आ जाती है, तब तक मैं समय की प्रतीक्षा करता हूँ । नही तो हल्ला हो जाएगा कि यह कुत्ता भाग रहा है। इसलिए रात को जब सब सो जाएँगे चमड़े की डोरी खाकर भाग जाऊँगा । यह कहकर वह लोगो के सो जाने पर चमडे की डोरी खा, पेट भर कर, भागा और अपने स्वामी के ही घर गया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय का कुत्ता इस समय का कुत्ता है । पण्डित पुरुष तो मैं ही था ।

'२४३. गुत्तिल जातक

Page 454Permalink

४३८ [ २.१०.२४३ ] '२४३. गुत्तिल जातक "सत्ततन्ति सुमधुरं..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय भिक्षुओं ने देवदत्त से पूछा—आयुष्मान् देवदत्त ! सम्यक् सम्बुद्ध तेरे आचार्य हैं। तूने सम्यक् सम्बुद्ध के कारण तीनो पिटक सीखे, चारो ध्यान प्राप्त किए, अब आचार्य का विरोधी बनना उचित नहीं। देवदत्त ने आचार्य का प्रत्याख्यान करते हुए कहा—आयुष्मान श्रमण गौतम मेरे कैसे आचार्य हैं ? क्या मैंने अपनी सामर्थ्य से ही तीनो पिटक नहीं सीखे हैं तथा चारो ध्यान नहीं प्राप्त किए हैं ? भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! देवदत्त अपने आचार्य का प्रत्याख्यान कर सम्यक् सम्बुद्ध का विरोधी बन महाविनाश को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त आचार्य का प्रत्याख्यान कर मेरा शत्रु बन नष्ट होता है, पहले भी विनष्ट हुआ ही है।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य-करने के समय बोधिसत्त्व गन्धर्व कुल में पैदा हुआ। उसका नाम हुआ गुत्तिल कुमार। यह बड़े होने पर गन्धर्व-शिल्प में ऐसा पारङ्गत हुआ कि सारे जम्बूद्वीप में गुत्तिल गन्धर्व ही सब गन्धर्वों से बढ़ गया। वह स्त्री का पालन न कर अपने अन्धे मातापिता का पालन करता था।

Page 455Permalink

गुत्तिल ] ४३६ उस समय वाराणसी निवासी बनियो ने व्यापार के लिए उज्जैनि जाकर उत्सव घोषित होने पर चन्दा करके बहुत सा माला गन्ध विलेपन आदि तथा खाद्य भोज्य ले क्रीडा-स्थान पर इकट्ठे हो कहा—कि वेतन देकर एक गन्धर्व को लाओ । उस समय उज्जैनि मे मूसिल नामक ज्येष्ठ गन्धर्व था । उन्होने उसे बुलवाकर अपना गन्धर्व बनाया । मूसिल वीणा भी बजाता था । उसने वीणा को स्वर चढ़ा कर बजाया । गुत्तिल गन्धर्व के गन्धर्व से परिचित उन लोगो को मूसिल का बजाना चटाई खुजलाने जैसा प्रतीत हुआ । कोई भी कुछ न बोला । उन्होने अपनी प्रसन्नता न प्रकट की । मूसिल ने उनकी प्रसन्नता न देखी तो सोचा—मालूम होता है मै बहुत तीखा बजाता हूँ । उसने मध्यम स्वर चढा मध्यम स्वर से बजाया । वे तब भी उपेक्षावान् ही रहे । उसने सोचा—मालूम होता है यह कुछ नही जानते । स्वय भी कुछ न जानने वाला बन उसने वीणा के तारों को ढीला र बजाया । उन्होने तब भी कुछ न कहा । मूसिल बोला—भो व्यापारियो ! क्या आप लोग मेरे वीणा-वादन से सन्न नही होते ? "क्या तू वीणा बजाता था ? हम तो समझते रहे कि तू वीणा को कस रहा है ।" "क्या तुम मुझसे बढ़कर आचार्य को जानते हो ? अथवा अपने अज्ञान के कारण प्रसन्न नही होते हो ?" “वाराणसी मे जिन्होने गुत्तिल गन्धर्व का वीणा-वादन सुना है उन्हें तुम्हारा वीणा बजाना ऐसा ही लगता है जैस स्त्रियाँ बच्चो को सन्तुष्ट कर रही हों।" "अच्छा, तो आपने जो खर्चा दिया है उसे वापिस ले । मुझे यह नही चाहिए । लेकिन हाँ, वाराणसी जाते समय मुझे साथ लेकर जाएँ ।" उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । जाते समय उसे साथ वाराणसी ले गए । वहीं 'यह गुत्तिल का निवासस्थान है' बताकर अपने अपने घर चले गए । मूसिल ने बोधिसत्व के घर में प्रवेश कर वहाँ टँगी हुई बोधिसत्व की बहुत ही अच्छी वीणा देख उतारकर बजाई । बोधिसत्व के माता पिता

Page 456Permalink

४४० [ २४३ अन्धे होने के कारण उसे न देख सके। वे समझे चूहे वीणा खा रहे हैं। इसलिए उन्होंने कहा—सू सू चूहे वीणा खा रहे हैं। उस समय मूसिल ने वीणा रखकर बोधिसत्त्व के माता पिता को प्रणाम किया। उन्होंने पूछा—कहाँ से आया ? “उज्जेनी से आचार्य के पास शिल्प सीखने आया हूँ।” “अच्छा।” “आचार्य कहाँ हैं ?” “तात ! बाहर गया है। आज आ जाएगा।” यह सुन मूसिल वहीं बैठ गया। बोधिसत्त्व के आने पर, उसके द्वारा कुशल समाचार पूछे जा चुकने पर उसने अपने आने का कारण कहा। बोधि- सत्त्व अङ्गविद्या के जानकार थे। वे जान गए कि यह सत्पुरुष नहीं है। उन्होंने अस्वीकार किया—तात ! जा तेरे लिए शिल्प नहीं है। मूसिल ने बोधिसत्त्व के माता पिता के चरण पकड़े। उन्हें अपनी सेवा से सन्तुष्ट कर उसने उनसे याचना की कि मुझे शिल्प सिखलवा दें। बोधिसत्त्व ने माता पिता के बारबार कहने पर उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन न कर सकने के कारण उसे शिल्प सिखा दिया। वह बोधिसत्त्व के साथ राजदरबार जाता। राजा ने उसे देखकर पूछा— आचार्य ! यह कौन है ? “महाराज !• मेरा शिष्य है।” वह शनै शनै राजा का विश्वासी हो गया। बोधिसत्त्व ने बिना कुछ छिपाए अपना जाना सारा शिल्प सिखाकर कहा—तात ! शिल्प समाप्त हो गया। उसने सोचा—मैंने शिल्प सीख लिया। यह वाराणसी नगर सारे जम्बूद्वीप में श्रेष्ठ नगर है। और आचार्य भी बूढ़े हो गए हैं। मुझे यहीं रहना चाहिए। उसने आचार्य से कहा—आचार्य ! मैं राजा की सेवा करूँगा। आचार्य बोला—अच्छा तात ! मैं राजा से कहूँगा। उसने राजा से जाकर कहा—“महाराज ! हमारा शिष्य देव की सेवा में रहना चाहता है। उसको जो देना हो, जान।” राजा बोला—‘आपको जितना मिलता है, आपके शिष्य को उसका आधा मिलेगा।’ उसने मूसिल को वह बात कही। मूसिल बोला—“मुझे

Page 457Permalink

४४२ [ २.१०.२४३ ] "आचार्य्य ! जगल में क्यो दाखिल हुए हो ?" "तू कौन है ?" "मै शक्र हूँ।" बोधिसत्त्व ने उसे 'देवराज ! मैं शिष्य के भय से जगल में दाखिल हुआ हूँ' यह पहली गाथा कही— सत्ततन्ति सुमधुर रामणेय्य अवाचायि, सो म रङ्गमन्हि अव्हेति सरणम्मे होहि कोसिय ॥ अर्थ—हे देवराज ! मैने मूसिल नाम के शिष्य को सात तारो वाली सुमधुर रमणीक वीणा जितनी मै जानता था उतनी सिखाई । अब वह मुझे रङ्गमंच पर ललवारता है। हे कोसिय गोत्र (इन्द्र) ! तू मुझे शरण में ले। शक्र उसकी बात सुन बोला—डरे मत । मै तुम्हारा त्राण करूँगा । मैं तुम्हें शरण दूंगा। यह कह उसने दूसरी गाथा कही— अह त सरण सम्म अहमाचरियपूजको, न त जयिस्सति सिस्सो सिस्समाचरिय जेस्सति ॥ [ सौम्य ! मै तेरा शरणदाता हूँ। मै आचार्य्य की पूजा करने वाला हूँ। शिष्य तुझे नही जीतेगा। आचार्य्य ही शिष्य को जीतेगा।] अह त सरण मै शरण (-दाता हूँ), सहायक होकर, प्रतिष्ठा देकर त्राण करूंगा। सम्म प्रिय वचन है। सिस्समाचरिय जेस्सति आचार्य्य ! तू वीणा बजाता हुआ शिष्य को जीतेगा। शक्र ने और भी कहा—"तुम वीणा बजाते हुए एक तार तोडकर छ , बजाना। वीणा से स्वाभाविक स्वर निकलेगा। मूसिल भी तार तोड देगा। उसकी वीणा से स्वर न निकलेगा। उसी क्षण पराजित हो जाएगा। उसका पराजित होना जान दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छटी और सातवी तार भी तोड कर केवल वीणा-दण्ड ही बजाना। तार रहित खूंटियो से स्वर निकल कर सारी बारह योजन की वाराणसी नगरी को ढक लेगा।" इतना कहकर

Page 458Permalink

गुत्तिल ] ४४३ शक्र ने बोधिसत्त्व को तीन गोटियाँ दी और कहा—"सारे नगर पर वीणा शब्द के छा जाने पर इनमें से एक गोटी आकाश में फेंकना। तुम्हारे सामने तीनसौ अप्सराएं उतर कर नाचने लगेगी। उनके नाचने के समय दूसरी फेंकना। दूसरी तीन सौ उतर कर वीणा के सिरे पर नाचने लगेगी। तब तीसरी भी फेंकना। और तीन सौ उतर कर रङ्गमण्डप में नाचेंगी। मैं भी तुम्हारे पास आऊँगा। जाएँ। डरे मत।" बोधिसत्त्व पूर्वाह्ण समय घर गए। राजदरबार में भी मण्डप बनाकर राजासन तैयार कर दिया गया। राजा प्रासाद से उतर सजे मण्डप में आसन के बीच में बैठा। दस हजार अलङ्कृत स्त्रियो तथा अमात्य ब्राह्मण राष्ट्रिक आदि ने राजा को घेर लिया। सभी नगरवासी इकट्ठे हो गए। राजाङ्गण में चवको के साथ चक्के तथा मञ्चो के साथ मञ्च बँध गए। बोधिसत्त्व भी स्नान करके, लेप कर, नाना प्रकार के श्रेष्ठ भोजन खा वीणा ले, अपने लिए बिछे आसन पर बैठे। शक्र गुप्त रूप से आकाश में आकर ठहरा। केवल बोधिसत्त्व ही उसे देख सकते थे। मूसिल भी आकर अपने आसन पर बैठा। जनता घेर कर खडी हुई। आरम्भ में दोनो ने बराबर बराबर बजाया। जनता ने दोनो के बजाने से सन्तुष्ट हो हजारो हर्ष-नाद किए। शक्र ने आकाश में ठहर कर बोधिसत्त्व को ही सुनाते हुए कहा—एक तार तोड दें। बोधिसत्त्व ने भ्रमर-तार तोड दी। वह टूटने पर भी टूटे हुए सिरे से स्वर देती थी। देवगन्धर्व का सा स्वर निकलता था। मूसिल ने भी तार तोड दी। उसमे से स्वर न निकला। आचार्य ने दूसरी—तीसरी करके सातो तारे तोड दी। केवल दण्डे को बजाने से जो स्वर निकला उसने सारे नगर को छा लिया। हजारो वस्त्र फेंके गए तथा हजारो हर्षनाद हुए। बोधि- सत्त्व ने एक गोटी आकाश में फेंकी। तीन सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगी। इस प्रकार दूसरी और तीसरी गोटी के फेंकने पर जैसे कहा गया उसी तरह नौ सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगीं। उस समय राजा ने जनता को इशारा किया। जनता ने उठकर 'तू आचार्य से विरोध कर उसकी बराबरी का प्रयत्न करता है। अपनी सामर्थ्य नही देखता' कहते हुए मूसिल को डरा, जो जो हाथ में आया पत्थर डण्डे आदि से चूर चूर कर, जान मार पैरो से पकड कूडे के ढेर पर फेक दिया। राजा

Page 459Permalink

४४४ [ २.१०.२४३

ने सन्तुष्ट हो घनी वर्षा बरसाते हुए की तरह बोधिसत्त्व को बहुत धन दिया। नगरवासियो ने भी वैसे ही किया। शक्र ने भी उससे विदा लेते हुए कहा—"पण्डित ! मैं सहस्र घोड़ो वाले आजानीय रथ के साथ मातली को भेजूंगा। तू सहस्र घोड़ो वाले श्रेष्ठ वैजयन्त रथ पर चढ़कर देवलोक आना।" उसके वहाँ जाकर पाण्डुकम्बलशिलातल पर बैठने पर देवकन्याओ ने पूछा—महाराज ! वहाँ गए थे ? शक्र ने उनको यह बात विस्तार से बनाई और बोधिसत्त्व के सदाचार तथा प्रज्ञा की प्रशंसा की। देवकन्याएँ बोली—महाराज ! हम आचार्य्य को देखना चाहती हैं। उसे यहाँ लाएं। शक्र ने मातली को बुला कर कहा—तात ! देवप्सराएँ गुत्तिल गन्धर्व को देखना चाहती हैं। जा उसे वैजयन्त रथ में बिठाकर ला। उसने 'अच्छा' कहा और जाकर बोधिसत्त्व को ले आया। शक्र ने बोधिसत्त्व का कुशल क्षेम पूछ कहा—आचार्य्य ! देवकन्याएँ तुम्हारा गन्धर्व सुनना चाहती है। "महाराज ! हम गन्धर्व लोग शिल्प से ही जीविका चलाते हैं। मूल्य मिले तो गाऊँगा।" "बजाएँ। मै तुम्हे मूल्य दूंगा।" "मुझे और मूल्य की जरूरत नहीं। यह देवकन्याएँ अपना अपना सुकृत कहें। ऐसा होने से मैं बजाऊँगा।" देवकन्याएँ बोली—"आचार्य्य ! हम अपने किए सुकृत पीछे सन्तुष्ट होकर कहेंगी। गन्धर्व करे।" बोधिसत्व ने सप्ताह पर्य्यन्त देवताओ को गन्धर्व सुनाया। वह दिव्य- वाद्य से भी बढ़ गया। सातवे दिन आरम्भ से देवकन्याओ का सुकृत पूछा। काश्यप बुद्ध के समय एक भिक्षु को उत्तम वस्त्र देकर शक्र की परिचारिका होकर उत्पन्न हुई, हजारो अप्सराओ से घिरी एक उत्तम देवकन्या से पूछा— तू पूर्व जन्म में क्या कर्म करके (यहाँ) उत्पन्न हुई ? उससे पूछा गया प्रश्न तथा उसका उत्तर विमानवत्थु¹ में आया है। वहाँ कहा है—


¹खुद्दक निकाय का एक ग्रन्थ।