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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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अस्त्रयुद्धे ततो राजन् वर्तमाने महाभये । अपश्याम रणे द्रौणिं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ७ ॥ राजन्! इस प्रकार महाभयंकर अस्त्र-युद्ध आरम्भ होनेपर हमलोगोंने रणक्षेत्रमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको मुँह बाये हुए यमराजके समान देखा था ॥ ७ ॥ स दिशः प्रदिशश्चैव छादयित्वा ह्यजिह्मगैः । वासुदेवं त्रिभिर्बाणैर्विध्यद् दक्षिणे भुजे ॥ ८ ॥ उसने सीधे जानेवाले बाणोंके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और कोणोंको आच्छादित करके श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजामें तीन बाण मारे ॥ ८ ॥ ततोऽर्जुनो हयान् हत्वा सर्वांस्तस्य महात्मनः । चकार समरे भूमिं शोणितौघतरङ्गिणीम् ॥ ९ ॥ तब अर्जुनने उस महामनस्वी वीरके समस्त घोड़ोंको मारकर समरभूमिमें खूनकी नदी-सी बहा दी ॥ सर्वलोकवहां रौद्रां परलोकवहां नदीम् । सरथान् रथिनः सर्वान् पार्थचापच्युतैः शरैः ॥ १० ॥ द्रौणेरपहतान् संख्ये ददृशुः स च तां तथा । प्रावर्तयन्महाघोरां नदीं परवहां तदा ॥ ११ ॥ वह रक्तमयी भयंकर सरिता परलोकवाहिनी थी और सब लोगोंको अपने प्रवाहमें बहाये लिये जाती थी। वहाँ खड़े हुए सब लोगोंने देखा कि अश्वत्थामाके सारे रथी अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा युद्धभूमिमें मारे गये। स्वयं अश्वत्थामाने भी उनकी वह अवस्था देखी। उस समय उसने भी महाभयंकर परलोकवाहिनी नदी बहा दी ॥ तयोस्तु व्याकुले युद्धे द्रौणेः पार्थस्य दारुणे । अमर्यादं योधयन्तः पर्यधावन्त पृष्ठतः ॥ १२ ॥ अश्वत्थामा और अर्जुनके उस भयंकर एवं घमासान युद्धमें सब योद्धा मर्यादारहित होकर युद्ध करते हुए आगे-पीछे सब ओर भागने लगे ॥ १२ ॥ रथैर्हताश्वसूतैश्च हतारोहैश्च वाजिभिः । द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः ॥ १३ ॥ पार्थेन समरे राजन् कृतो घोरो जनक्षयः । विहता रथिनः पेतुः पार्थचापच्युतैः शरैः ॥ १४ ॥ रथोंके घोड़े और सारथि मार दिये गये। घोड़ोंके सवार नष्ट हो गये। गजारोही मार डाले गये और हाथी बचे रहे एवं कहीं हाथी ही मार डाले गये तथा महावत बचे रहे। राजन्! इस प्रकार समरांगणमें अर्जुनने घोर जनसंहार मचा दिया। उनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा मारे जाकर बहुत-से रथी धराशायी हो गये ॥ १३-१४ ॥ हयाश्च पर्यधावन्त मुक्तयोक्त्रास्ततस्ततः ।

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तद् दृष्ट्वा कर्म पार्थस्य द्रौणिराहवशोभिनः ॥ १५ ॥ अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितोऽभ्येत्य वीर्यवान् । विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ॥ १६ ॥ अवाकिरत्ततो द्रौणिः समन्तान्निशितैः शरैः । घोड़ोंके बन्धन खुल गये और वे चारों ओर दौड़ लगाने लगे। युद्धमें शोभा पानेवाले अर्जुनका वह पराक्रम देखकर पराक्रमी द्रोणकुमार अश्वत्थामा तुरंत उनके पास आ गया और अपने सुवर्ण-भूषित विशाल धनुषको हिलाते हुए उसने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनको पैने बाणोंद्वारा सब ओरसे ढक दिया ॥ १५-१६ १/२ ॥

भूयोऽर्जुनं महाराज द्रौणिरायम्य पत्रिणा ॥ १७ ॥ वक्षोदेशे भृशं पार्थं ताडयामास निर्दयम् । महाराज! तदनन्तर द्रोणकुमारने धनुष खींचकर छोड़े हुए पंखयुक्त बाणसे कुन्तीकुमार अर्जुनकी छातीपर पुनः बड़े जोरसे निर्दयतापूर्वक प्रहार किया ॥ १७ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो रणे तेन द्रोणपुत्रेण भारत ॥ १८ ॥ गाण्डीवधन्वा प्रसभं शरवर्षैरुदारधीः । संछाद्य समरे द्रौणिं चिच्छेदास्य च कार्मुकम् ॥ १९ ॥ भारत! रणभूमिमें द्रोणपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल किये गये उदारबुद्धि गाण्डीवधारी अर्जुनने समरांगणमें बलपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके अश्वत्थामाको ढक दिया और उसके धनुषको भी काट डाला ॥ १८-१९ ॥

स छिन्नधन्वा परिघं वज्रस्पर्शसमं युधि । आदाय चिक्षेप तदा द्रोणपुत्रः किरीटिने ॥ २० ॥ धनुष कट जानेपर द्रोणपुत्रने युद्धस्थलमें एक ऐसा परिघ हाथमें लिया, जिसका स्पर्श वज्रके समान कठोर था। उसने उस परिघको तत्काल ही किरीटधारी अर्जुनपर दे मारा ॥ २० ॥

तमापतन्तं परिघं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । चिच्छेद सहसा राजन् प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ २१ ॥ राजन्! उस सुवर्णभूषित परिघको सहसा अपने ऊपर आते देख पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥

स पपात तदा भूमौ निकृत्तः पार्थसायकैः । विकीर्णः पर्वतो राजन् यथा वज्रेण ताडितः ॥ २२ ॥ नरेश्वर! जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वत टूट-फूटकर सब ओर बिखर जाता है, उसी प्रकार अर्जुनके बाणोंसे कटा हुआ वह परिघ उस समय पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २२ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज द्रोणपुत्रो महारथः । ऐन्द्रेण चास्त्रवेगेन बीभत्सुं समवाकिरत् ॥ २३ ॥

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महाराज! तब महारथी द्रोणपुत्रने कुपित होकर अर्जुनपर ऐन्द्रास्त्रद्वारा वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ तस्येन्द्रजालावततं समीक्ष्य पार्थो राजन् गाण्डिवमाददे सः । ऐन्द्रं जालं प्रत्यहरत् तरस्वी वरास्त्रमादाय महेन्द्रसृष्टम् ॥ २४ ॥ राजन्! अर्जुनने अश्वत्थामाद्वारा किये हुए इन्द्रजालका विस्तार देखकर बड़े वेगसे गाण्डीव धनुष हाथमें लिया और महेन्द्रद्वारा निर्मित उत्तम अस्त्रका आश्रय लेकर उस इन्द्रजालका संहार कर दिया ॥ २४ ॥ विदार्य तज्जालमथेन्द्रमुक्तं पार्थस्ततो द्रौणिरथं क्षणेन । प्रच्छादयामास ततोऽभ्युपेत्य द्रौणिस्तदा पार्थशराभिभूतः ॥ २५ ॥ इस प्रकार इन्द्रास्त्रद्वारा छोड़े गये उस बाण-जालको विदीर्ण करके अर्जुनने निकटवर्ती होकर क्षणभरमें अश्वत्थामाके रथको ढक दिया। उस समय अश्वत्थामा अर्जुनके बाणोंसे अभिभूत हो गया था ॥ २५ ॥ विगाह्य तां पाण्डवबाणवृष्टिं शरैः परं नाम ततः प्रकाश्य । शतेन कृष्णं सहसाभ्यविध्यत् त्रिभिः शतैरर्जुनं क्षुद्रकाणाम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा अर्जुनकी उस बाण-वर्षाका निवारण करके अपना नाम प्रकाशित करते हुए सहसा सौ बाणोंसे श्रीकृष्णको घायल कर दिया और अर्जुनपर भी तीन सौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ततोऽर्जुनः सायकानां शतेन गुरोः सुतं मर्मसु निर्बिभेद । अश्वांश्च सूतं च तथा धनुर्ज्या- मवाकिरत् पश्यतां तावकानाम् ॥ २७ ॥ इसके बाद अर्जुनने सौ बाणोंसे गुरुपुत्रके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर दिया तथा आपके पुत्रोंके देखते-देखते उसके घोड़ों, सारथि, धनुष और प्रत्यंचापर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २७ ॥ स विद्ध्वा मर्मसु द्रौणिं पाण्डवः परवीरहा । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ २८ ॥

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शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुपुत्र अर्जुनने अश्वत्थामाके मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचाकर एक भल्लसे उसके सारथिको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ २८ ॥
स संगृह्य स्वयं वाहान् कृष्णौ प्राच्छादयच्छरैः ।
तत्राद्भुतमपश्याम द्रौणेराशु पराक्रमम् ॥ २९ ॥
प्रायच्छत्तुरगान् यच्च फाल्गुनं चाप्ययोधयत् ।
यदस्य समरे राजन् सर्वे योधा अपूजयन् ॥ ३० ॥
तब उसने स्वयं ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंसे ढक दिया। वहाँ हमने द्रोणपुत्रका शीघ्र प्रकट होनेवाला वह अद्भुत पराक्रम देखा कि वह घोड़ोंको भी काबूमें रखता था और अर्जुनके साथ युद्ध भी करता था। राजन्! समरांगणमें सभी योद्धाओंने उसके इस कार्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥
ततः प्रहस्य बीभत्सुर्द्रोणपुत्रस्य संयुगे ।
क्षिप्रं रश्मीनथाश्वानां क्षुरप्रैश्चिच्छिदे जयः ॥ ३१ ॥
तदनन्तर विजयी अर्जुनने हँसकर युद्धस्थलमें द्रोणपुत्रके घोड़ोंकी बागडोरोंको क्षुरप्रोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक काट दिया ॥ ३१ ॥
प्राद्रवंस्तुरगास्ते तु शरवेगप्रपीडिताः ।
ततोऽभून्निन्दो घोरस्तव सैन्यस्य भारत ॥ ३२ ॥
भारत! इसके बाद बाणोंके वेगसे अत्यन्त पीड़ित हुए उसके घोड़े वहाँसे भाग चले। उस समय वहाँ आपकी सेनामें भयंकर कोलाहल मच गया ॥ ३२ ॥
पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा तव सैन्यं समाद्रवन् ।
समन्तान्निशितान् बाणान् विमुञ्चन्तो जयैषिणः ॥ ३३ ॥
पाण्डव विजय पाकर आपकी सेनापर टूट पड़े और पुनः विजयकी अभिलाषा ले चारों ओरसे पैने बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ ३३ ॥
पाण्डवैस्तु महाराज धार्तराष्ट्री महाचमूः ।
पुनः पुनरथो वीरैरभज्जि जितकाशिभिः ॥ ३४ ॥
महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंने दुर्योधनकी विशाल सेनामें बारंबार भगदड़ मचा दी ॥ ३४ ॥
पश्यतां ते महाराज पुत्राणां चित्रयोधिनाम् ।
शकुनेः सौबलेयस्य कर्णस्य च विशाम्पते ॥ ३५ ॥
नरेश्वर! प्रजानाथ! विचित्र युद्ध करनेवाले आपके पुत्रोंके, सुबलपुत्र शकुनिके तथा कर्णके देखते-देखते यह सब हो रहा था ॥ ३५ ॥
वार्यमाणा महासेना पुत्रैस्तव जनेश्वर ।
न चातिष्ठत संग्रामे पीड्यमाना समन्ततः ॥ ३६ ॥

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जनेश्वर! सब ओरसे पीड़ित हुई आपकी विशाल सेना आपके पुत्रोंके बहुत रोकनेपर भी युद्धभूमिमें खड़ी न रह सकी ॥ ३६ ॥

ततो योधैर्महाराज पलायद्भिः समन्ततः । अभवद् व्याकुलं भीतं पुत्राणां ते महत् बलम् ॥ ३७ ॥

महाराज! सब ओर भागनेवाले योद्धाओंके कारण आपके पुत्रोंकी वह विशाल सेना भयभीत और व्याकुल हो उठी ॥

तिष्ठ तिष्ठेति च ततः सूतपुत्रस्य जल्पतः । नावतिष्ठति सा सेना वध्यमाना महात्मभिः ॥ ३८ ॥

सूतपुत्र कर्ण 'ठहरो, ठहरो' की पुकार करता ही रह गया; परंतु महामनस्वी पाण्डवोंकी मार खाती हुई वह सेना किसी तरह ठहर न सकी ॥ ३८ ॥

अथोत्कृष्टं महाराज पाण्डवैर्जितकाशिभिः । धार्तराष्ट्रबलं दृष्ट्वा विद्रुतं वै समन्ततः ॥ ३९ ॥

महाराज! दुर्योधनकी सेनाको सब ओर भागती देख विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३९ ॥

ततो दुर्योधनः कर्णमब्रवीत् प्रणयादिव । पश्य कर्ण महासेना पञ्चालैरर्दिता भृशम् ॥ ४० ॥

उस समय दुर्योधनने कर्णसे प्रेमपूर्वक कहा—'कर्ण! देखो, पांचालोंने मेरी इस विशाल सेनाको अत्यन्त पीड़ित कर दिया है ॥ ४० ॥

त्वयि तिष्ठति संत्रासात् पलायनपरायणा । एतज्ज्ञात्वा महाबाहो कुरु प्राप्तमरिंदम ॥ ४१ ॥

'शत्रुदमन महाबाहु वीर! तुम्हारे रहते हुए भयके कारण मेरी सेना भाग रही है; यह जानकर इस समय जो कर्तव्य प्राप्त हो उसे करो ॥ ४१ ॥

सहस्राणि च योधानां त्वामेव पुरुषोत्तम । क्रोशन्ति समरे वीर द्राव्यमाणानि पाण्डवैः ॥ ४२ ॥

'पुरुषोत्तम! वीर! पाण्डवोंद्वारा खदेड़े जानेवाले सहस्रों कौरव-सैनिक समरांगणमें तुम्हें ही पुकार रहे हैं' ॥

एतच्छ्रुत्वापि राधेयो दुर्योधनवचो महान् । मद्रराजमिदं वाक्यमब्रवीत् प्रहसन्निव ॥ ४३ ॥

महावीर राधापुत्र कर्णने दुर्योधनकी यह बात सुनकर मद्रराज शल्यसे हँसते हुए-से इस प्रकार कहा— ॥

पश्य मे भुजयोर्वीर्यमस्त्राणां च जनेश्वर । अद्य हन्मि रणे सर्वान् पञ्चालान् पाण्डुभिः सह ॥ ४४ ॥ वाहयाश्वान् नरव्याघ्र भद्रेणैव न संशयः ।

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'नरेश्वर! आज तुम मेरी दोनों भुजाओं और अस्त्रोंका बल देखो। मैं रणभूमिमें पाण्डवोंसहित समस्त पांचालोंका वध किये देता हूँ, इसमें संशय नहीं है। पुरुषसिंह! आप कल्याणचिन्तनपूर्वक ही इन घोड़ोंको आगे बढ़ाइये' ।। एवमुक्त्वा महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ४५ ।। प्रगृह्य विजयं वीरो धनुः श्रेष्ठं पुरातनम् । सज्यं कृत्वा महाराज संगृह्य च पुनः पुनः ।। ४६ ।। संनिवार्य च योधान् स सत्येन शपथेन च । प्रायोजयदमेयात्मा भार्गवास्त्रं महाबलः ।। ४७ ।। महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी वीर सूतपुत्र कर्णने अपने विजय नामक श्रेष्ठ एवं पुरातन धनुषको लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी; फिर उसे बारंबार हाथमें लेकर सत्यकी शपथ दिलाते हुए समस्त योद्धाओंको रोका। इसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उस महाबली वीरने भार्गवास्त्रका प्रयोग किया ।। ततो राजन् सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । कोटिशश्च शरास्तीक्ष्णा निरगच्छन् महामृधे ।। ४८ ।। राजन्! फिर तो उस महासमरमें सहस्रों, लाखों, करोड़ों और अरबों तीखे बाण उस अस्त्रसे प्रकट होने लगे ।। ज्वलितैस्तैः शरैर्घोरैः कङ्कबर्हिणवाजितैः । संछन्ना पाण्डवी सेना न प्राज्ञायत किञ्चन ।। ४९ ।। कंक और मोरकी पाँखवाले उन प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंद्वारा पाण्डव-सेना आच्छादित हो गयी। कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ।। ४९ ।। हाहाकारो महानासीत् पञ्चालानां विशाम्पते । पीडितानां बलवता भार्गवास्त्रेण संयुगे ।। ५० ।। प्रजानाथ! प्रबल भार्गवास्त्रसे समरांगणमें पीड़ित होनेवाले पांचालोंका महान् हाहाकार सब ओर गूँजने लगा ।। निपतद्भिर्गजै राजन्नश्वैश्चापि सहस्रशः । रथैश्चापि नरव्याघ्र नरैश्चैव समन्ततः ।। ५१ ।। प्राकम्पत मही राजन् निहतैस्तैः समन्ततः । व्याकुलं सर्वमभवत् पाण्डवानां महद् बलम् ।। ५२ ।। राजन्! गिरते हुए हाथियों, सहस्रों घोड़ों, रथों और मारे गये पैदल मनुष्योंके गिरनेसे सारी पृथिवी सब ओर कम्पित होने लगी। पाण्डवोंकी सारी विशाल सेना व्याकुल हो गयी ।। कर्णस्त्वेको युधां श्रेष्ठो विधूम इव पावकः । दहन् शत्रून् नरव्याघ्र शुशुभे स परंतपः ।। ५३ ।।

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नरव्याघ्र! शत्रुओंको तपानेवाला योद्धाओंमें श्रेष्ठ एकमात्र कर्ण ही धूमरहित अग्निके समान शत्रुओंको दग्ध करता हुआ शोभा पा रहा था ॥ ५३ ॥ ते वध्यमानाः कर्णेन पञ्चालाश्चेदिभिः सह । तत्र तत्र व्यमुह्यन्त वनदाहे यथा द्विपाः ॥ ५४ ॥ जैसे वनमें आग लगनेपर उसमें रहनेवाले हाथी जहाँ-तहाँ दग्ध होकर मूर्च्छित हो जाते हैं, उसी प्रकार कर्णके द्वारा मारे जानेवाले पांचाल और चेदि योद्धा यत्र-तत्र मूर्च्छित होकर पड़े थे ॥ ५४ ॥ चुक्रुशुश्च नरव्याघ्र यथा व्याघ्रा नरोत्तमाः । तेषां तु क्रोशतामासीद् भीतानां रणमूर्धनि ॥ ५५ ॥ धावतां च ततो राजंस्त्रस्तानां च समन्ततः । आर्तनादो महांस्तत्र भूतानामिव सम्प्लवे ॥ ५६ ॥ पुरुषसिंह! वे श्रेष्ठ योद्धा व्याघ्रोंके समान चीत्कार करते थे। राजन्! युद्धके मुहानेपर भयभीत हो चिल्लाते और डरकर सब ओर भागते हुए उन सैनिकोंका महान् आर्तनाद प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंके चीत्कारके समान जान पड़ता था ॥ ५५-५६ ॥ वध्यमानांस्तु तान् दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष । वित्रसुः सर्वभूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ ५७ ॥ आर्य! सूतपुत्रके द्वारा मारे जाते हुए उन योद्धाओंको देखकर समस्त प्राणी पशु-पक्षी भी भयसे थर्रा उठे ॥ ५७ ॥ ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जयाः । अर्जुनं वासुदेवं च क्रोशन्ति च मुहुर्मुहुः ॥ ५८ ॥ प्रेतराजपुरे यद्वत् प्रेतराजं विचेतसः । सूतपुत्रद्वारा समरांगणमें मारे जाते हुए सृंजय बारंबार अर्जुन और श्रीकृष्णको पुकारते थे। ठीक उसी तरह, जैसे प्रेतराजके नगरमें क्लेशसे अचेत हुए प्राणी प्रेतराजको ही पुकारते हैं ॥ ५८ १/२ ॥ श्रुत्वा तु निनदं तेषां वध्यतां कर्णसायकैः ॥ ५९ ॥ अथाब्रवीद् वासुदेवं कुन्तीपुत्रो धनंजयः । भार्गवास्त्रं महाघोरं दृष्ट्वा तत्र समीरितम् ॥ ६० ॥ कर्णके बाणोंद्वारा मारे जाते हुए उन सैनिकोंका आर्तनाद सुनकर तथा वहाँ महाभयंकर भार्गवास्त्रका प्रयोग हुआ देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा — ॥ ५९-६० ॥ पश्य कृष्ण महाबाहो भार्गवास्त्रस्य विक्रमम् । नैतदस्त्रं हि समरे शक्यं हन्तुं कथञ्चन ॥ ६१ ॥

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‘महाबाहु श्रीकृष्ण! यह भार्गवास्त्रका पराक्रम देखिये। समरांगणमें किसी तरह इस अस्त्रको नष्ट नहीं किया जा सकता ॥ ६१ ॥ सूतपुत्रं च संरब्धं पश्य कृष्ण महारणे । अन्तकप्रतिमं वीर्ये कुर्वाणं कर्म दारुणम् ॥ ६२ ॥ ‘श्रीकृष्ण! देखिये, क्रोधमें भरा हुआ सूतपुत्र, जो पराक्रममें यमराजके समान है, महासमरमें कैसा दारुण कर्म कर रहा है ॥ ६२ ॥ अभीक्ष्णं चोदयन्नश्वान् प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुः । न च पश्यामि समरे कर्णं प्रति पलायितुम् ॥ ६३ ॥ ‘वह निरन्तर घोड़ोंको हाँकता हुआ बारंबार मेरी ही ओर देख रहा है। समरभूमिमें कर्णके सामनेसे पलायन करना मैं उचित नहीं समझता ॥ ६३ ॥ जीवन् प्राप्नोति पुरुषः संख्ये जयपराजयौ । मृतस्य तु हृषीकेश भङ्ग एव कुतो जयः ॥ ६४ ॥ ‘मनुष्य जीवित रहे तो वह युद्धमें विजय और पराजय दोनों पाता है। हृषीकेश! मरे हुए मनुष्यका तो नाश ही हो जाता है; फिर उसकी विजय कहाँसे हो सकती है’ ॥ ६४ ॥ एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णो मतिमतां वरम् । धनंजयमुवाचेदं प्राप्तकालमरिंदमम् ॥ ६५ ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शत्रुदमन अर्जुनसे यह समयोचित बात कही— ॥ ६५ ॥ कर्णेन हि दृढं राजा कुन्तीपुत्रः परिक्षतः । तं दृष्ट्वाऽऽश्वास्य च पुनः कर्णं पार्थ वधिष्यसि ॥ ६६ ॥ ‘पार्थ! कर्णने राजा युधिष्ठिरको अत्यन्त क्षत-विक्षत कर दिया है। उनसे मिलकर उन्हें धीरज बँधाकर फिर तुम कर्णका वध करना’ ॥ ६६ ॥ एवमुक्त्वा पुनः प्रायाद् द्रष्टुमिच्छन् युधिष्ठिरम् । श्रमेण ग्राहयिष्यंश्च युद्धे कर्णं विशाम्पते ॥ ६७ ॥ प्रजानाथ! ऐसा कहकर वे पुनः युधिष्ठिरसे मिलनेकी इच्छासे तथा कर्णको युद्धमें अधिक थकावट प्राप्त करानेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ ६७ ॥ ततो धनंजयो द्रष्टुं राजानं बाणपीडितम् । रथेन प्रययौ क्षिप्रं संग्रामात् केशवाज्ञया ॥ ६८ ॥ तत्पश्चात् अर्जुन श्रीकृष्णकी आज्ञासे बाणपीड़ित राजा युधिष्ठिरको देखनेके लिये रथके द्वारा युद्धस्थलसे शीघ्रतापूर्वक गये ॥ ६८ ॥ गच्छन्नेव तु कौन्तेयो धर्मराजदिदृक्षया । सैन्यमालोकयामास नापश्यत् तत्र चाग्रजम् ॥ ६९ ॥ युद्धं कृत्वा तु कौन्तेयो द्रोणपुत्रेण भारत ।

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दुःसहं वज्रिणा संख्ये पराजित्य गुरोः सुतम् ॥ ७० ॥

भारत! कुन्तीकुमार अर्जुनने द्रोणपुत्रके साथ युद्ध करके रणभूमिमें वज्रधारी इन्द्रके लिये भी दुःसह उस गुरुपुत्रको पराजित करनेके पश्चात् जाते समय धर्मराजको देखनेकी इच्छासे सारी सेनापर दृष्टिपात किया। परंतु वहाँ कहीं भी अपने बड़े भाईको नहीं देखा ॥ ६९-७० ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धर्मराजशोधने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरकी खोजविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2103)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

भीमसेनको युद्धका भार सौंपकर श्रीकृष्ण और अर्जुनका युधिष्ठिरके पास जाना

संजय उवाच

द्रौणिं पराजित्य ततोऽग्रधन्वा
कृत्वा महत् दुष्करं शूरकर्म ।
आलोकयामास ततः स्वसैन्यं
धनंजयः शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर उत्तम धनुष धारण करनेवाले तथा शत्रुओंके लिये अजेय अर्जुनने दूसरोंके लिये दुष्कर वीरोचित कर्म करके अश्वत्थामाको हराकर फिर अपनी सेनाका निरीक्षण किया ॥ १ ॥

स युध्यमानान् पृतनामुखस्थान्-
शूरः शूरान् हर्षयन् सव्यसाची ।
पूर्वप्रहारैर्मथितान् प्रशंसन्
स्थिरांश्चकारात्मरथाननीके ॥ २ ॥

सव्यसाची शूरवीर अर्जुन युद्धके मुहानेपर खड़े होकर युद्ध करनेवाले अपने शूरवीर सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए तथा पहलेके प्रहारोंसे क्षत-विक्षत हुए अपने रथियोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन सबको अपनी सेनामें स्थिरतापूर्वक स्थापित किया ॥ २ ॥

अपश्यमानस्तु किरीटमाली
युधिष्ठिरं भ्रातरमाजमीढम् ।
उवाच भीमं तरसाभ्युपेत्य
राज्ञः प्रवृत्तिं त्विह कुत्र राजा ॥ ३ ॥

परंतु वहाँ अपने भाई अजमीढकुलनन्दन युधिष्ठिरको न देखकर किरीटधारी अर्जुनने बड़े वेगसे भीमसेनके पास जा उनसे राजाका समाचार पूछते हुए कहा—'भैया! इस समय हमारे महाराज कहाँ हैं?' ॥ ३ ॥

भीमसेन उवाच

अपयात इतो राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
कर्णबाणाभितप्ताङ्गो यदि जीवेत् कथञ्चन ॥ ४ ॥

**भीमसेनने कहा—**धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर यहाँसे हट गये हैं। कर्णके बाणोंसे उनके सारे अंग संतप्त हो रहे हैं। सम्भव है, वे किसी प्रकार जी रहे हों ॥ ४ ॥

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अर्जुन उवाच

तस्माद् भवान् शीघ्रमितः प्रयातु राज्ञः प्रवृत्त्यै कुरुसत्तमस्य । नूनं स विद्धोऽतिभृशं पृषत्कैः कर्णेन राजा शिविरं गतोऽसौ ॥ ५ ॥

अर्जुन बोले— यदि ऐसी बात है तो आप कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरका समाचार लानेके लिये शीघ्र ही यहाँसे जायँ। निश्चय ही कर्णके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर राजा शिविरमें चले गये हैं ॥ ५ ॥

यः सम्प्रहारैर्निशितैः पृषत्कै- र्द्रोणेन विद्धोऽतिभृशं तरस्वी । तस्थौ स तत्रापि जयप्रतीक्षो द्रोणोऽपि यावन्न हतः किलासीत् ॥ ६ ॥ स संशयं गमितः पाण्डवाग्र्यः संख्येऽद्य कर्णेन महानुभावः । ज्ञातुं प्रयाह्याशु तमद्य भीम स्थास्याम्यहं शत्रुगणान् निरुध्य ॥ ७ ॥

भैया भीमसेन! जो वेगशाली वीर युधिष्ठिर द्रोणाचार्यके द्वारा किये गये प्रहारों तथा अत्यन्त तीखे बाणोंसे अच्छी तरह घायल किये जानेपर भी विजयकी प्रतीक्षामें तबतक युद्धस्थलमें डटे रहे, जबतक कि आचार्य द्रोण मारे नहीं गये। वे महानुभाव पाण्डवशिरोमणि आज कर्णके द्वारा संग्राममें संशयापन्न अवस्थामें डाल दिये गये हैं; अतः आप शीघ्र ही उनका समाचार जाननेके लिये जाइये, मैं यहाँ शत्रुओंको रोके रहूँगा ॥ ६-७ ॥

भीमसेन उवाच

त्वमेव जानीहि महानुभाव राज्ञः प्रवृत्तिं भरतर्षभस्य । अहं हि यद्यर्जुन याम्यमित्रा वदन्ति मां भीत इति प्रवीराः ॥ ८ ॥

भीमसेनने कहा— महानुभाव! तुम्हीं जाकर भरतकुलभूषण नरेशका समाचार जानो। अर्जुन! यदि मैं यहाँसे जाऊँगा तो मेरे वीर शत्रु मुझे डरपोक कहेंगे ॥ ८ ॥

ततोऽब्रवीदर्जुनो भीमसेनं संशप्तकाः प्रत्यनीकं स्थिता मे । एतानहत्वाद्य मया न शक्य-

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मितोऽपयातुं रिपुसङ्घगोष्ठात् ॥ ९ ॥
तब अर्जुनने भीमसेनसे कहा—‘भैया! संशप्तकगण मेरे विपक्षमें खड़े हैं। इन्हें मारे बिना आज मैं इस शत्रु-समुदायरूपी गोष्ठसे बाहर नहीं जा सकता’ ॥ ९ ॥
अथाब्रवीदर्जुनं भीमसेनः
स्ववीर्यमासाद्य कुरुप्रवीर ।
संशप्तकान् प्रतियोत्स्यामि संख्ये
सर्वानहं याहि धनंजय त्वम् ॥ १० ॥
यह सुनकर भीमसेनने अर्जुनसे कहा—‘कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर धनंजय! मैं अपने ही बलका भरोसा करके संग्राम-भूमिमें सम्पूर्ण संशप्तकोंके साथ युद्ध करूँगा, तुम जाओ’ ॥ १० ॥

संजय उवाच
तद् भीमसेनस्य वचो निशम्य
सुदुष्करं भ्रातुरमित्रमध्ये ।
संशप्तकानीकमसह्यमेकः
सुदुष्करं धारयामीति पार्थः ॥ ११ ॥
उवाच नारायणमप्रमेयं
कपिध्वजः सत्यपराक्रमस्य ।
श्रुत्वा वचो भ्रातुरदीनसत्त्व-
स्तदाहवे सत्यवचो महात्मा ।
द्रष्टुं कुरुश्रेष्ठमभिप्रयास्यन्
प्रोवाच वृष्णिप्रवरं तदानीम् ॥ १२ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! शत्रुओंकी मण्डलीमें अपने भाई भीमसेनका यह अत्यन्त दुष्कर वचन सुनकर कि ‘मैं अकेला ही असह्य संशप्तक सेनाका सामना करूँगा’ उदार हृदयवाले महात्मा कपिध्वज अर्जुनने सत्यपराक्रमी भाई भीमके उस सत्य वचनको श्रवणगोचर करके उसे अप्रमेय, वृष्णिवंशावतंस नारायणावतार भगवान् श्रीकृष्णको बताया और उस समय कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरका दर्शन करनेकी इच्छासे जानेको उद्यत हो इस प्रकार कहा— ॥ ११-१२ ॥

अर्जुन उवाच
चोदयाश्वान् हृषीकेश विहायैतद् बलार्णवम् ।
अजातशत्रुं राजानं द्रष्टुमिच्छामि केशव ॥ १३ ॥
अर्जुन बोले— हृषीकेश! अब आप इस शत्रुसेनारूपी समुद्रको छोड़कर घोड़ोंको यहाँसे हाँक ले चलें। केशव! मैं अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरका दर्शन करना चाहता

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हूँ ।। १३ ।।

संजय उवाच

ततो हयान् सर्वदाशार्हमुख्यः

प्रचोदयन् भीममुवाच चेदम् ।

नैतच्चित्रं तव कर्माद्य भीम

यास्याम्यहं जहि पार्थारिसंघान् ।। १४ ।।

संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सम्पूर्ण दाशार्हवंशियोंमें प्रधान भगवान् श्रीकृष्ण

अपने घोड़े हाँकते हुए वहाँ भीमसेनसे इस प्रकार बोले—'कुन्तीनन्दन भीम! आज यह

पराक्रम तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। मैं जा रहा हूँ। तुम शत्रुसमूहोंका संहार

करो' ।। १४ ।।

ततो ययौ हृषीकेशो यत्र राजा युधिष्ठिरः ।

शीघ्राच्छीघ्रतरं राजन् वाजिभिर्गुरुडोपमैः ।। १५ ।।

राजन्! यह कहकर भगवान् हृषीकेश गरुड़के समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा शीघ्र-से-

शीघ्र वहाँ जा पहुँचे, जहाँ राजा युधिष्ठिर विश्राम कर रहे थे ।। १५ ।।

प्रत्यनीके व्यवस्थाप्य भीमसेनमरिंदमम् ।

संदिश्य चैतं राजेन्द्र युद्धं प्रति वृकोदरम् ।। १६ ।।

ततस्तु गत्वा पुरुषप्रवीरौ

राजानमासाद्य शयानमेकम् ।

रथादुभौ प्रत्यवरुह्य तस्माद्

ववन्दतुर्धर्मराजस्य पादौ ।। १७ ।।

राजेन्द्र! शत्रुओंका सामना करनेके लिये शत्रुदमन वृकोदर भीमसेनको स्थापित करके

और युद्धके विषयमें उन्हें पूर्वोक्त संदेश देकर वे दोनों पुरुषशिरोमणि अकेले सोये हुए राजा

युधिष्ठिरके पास जा रथसे नीचे उतरे और उन्होंने धर्मराजके चरणोंमें प्रणाम

किया ।। १६-१७ ।।

तं दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रं क्षेमिणं पुरुषर्षभम् ।

मुदाभ्युपगतौ कृष्णावश्विनाविव वासवम् ।। १८ ।।

तावभ्यनन्दद् राजापि विवस्वानश्विनाविव ।

हते महासुरे जम्भे शक्रविष्णू यथा गुरुः ।। १९ ।।

पुरुषसिंह पुरुषप्रवर श्रीकृष्ण एवं अर्जुनको सकुशल देखकर तथा दोनों कृष्णोंको

इन्द्रके पास गये हुए अश्विनीकुमारोंके समान प्रसन्नतापूर्वक अपने समीप आया जान राजा

युधिष्ठिरने उनका उसी तरह अभिनन्दन किया, जैसे सूर्य दोनों अश्विनीकुमारोंका स्वागत

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करते हैं। अथवा जैसे महान् असुर जम्भके मारे जानेपर बृहस्पतिने इन्द्र और विष्णुका अभिनन्दन किया था ॥ १८-१९ ॥
मन्यमानो हतं कर्णं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
हर्षगद्गदया वाचा प्रीतः प्राह परंतपः ॥ २० ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने कर्णको मारा गया मानकर हर्षगद्गद वाणीसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप आरम्भ किया ॥ २० ॥
अथोपयातौ पृथुलोहिताक्षौ
शराचिताङ्गौ रुधिरप्रदिग्धौ ।
समीक्ष्य सेनाग्रनरप्रवीरौ
युधिष्ठिरो वाक्यमिदं बभाषे ॥ २१ ॥
सेनाके अग्रभागमें युद्ध करनेवाले पुरुषोंमें प्रमुख वीर विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण और अर्जुन जब समीप आये, तब उनके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे। वे खूनसे लथपथ हो रहे थे; उन्हें देखकर युधिष्ठिरने निम्नांकित रूपसे बातचीत आरम्भ की ॥ २१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2108)

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धर्मराजके चरणोंमें श्रीकृष्ण एवं अर्जुन प्रणाम कर रहे हैं

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महासत्त्वौ हि तौ दृष्ट्वा सहितौ केशवार्जुनौ । हतमाधिरथिं मेने संख्ये गाण्डीवधन्वना ॥ २२ ॥ एक साथ आये हुए महान् शक्तिशाली श्रीकृष्ण और अर्जुनको देखकर उन्हें यह पक्का विश्वास हो गया था कि गाण्डीवधारी अर्जुनने युद्धस्थलमें अधिरथपुत्र कर्णको मार डाला है ॥ २२ ॥

तावभ्यनन्दत् कौन्तेयः साम्ना परमवल्गुना । स्मितपूर्वममित्रघ्नं पूजयन् भरतर्षभ ॥ २३ ॥ भरतश्रेष्ठ! यही सोचकर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने मुसकराकर शत्रुसूदन श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए परम मधुर और सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरं प्रति श्रीकृष्णार्जुनागमे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरके पास श्रीकृष्ण और अर्जुनका आगमनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2110)

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षट्षष्टितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका अर्जुनसे भ्रमवश कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त पूछना

युधिष्ठिर उवाच

स्वागतं देवकीमातः स्वागतं ते धनंजय ।
प्रियं मे दर्शनं गाढं युवयोरच्युतार्जुनौ ॥ १ ॥
अक्षताभ्यामरिष्टाभ्यां हतः कर्णो महारथः ।

युधिष्ठिर बोले—देवकीनन्दन! तुम्हारा स्वागत हो। धनंजय! तुम्हारा भी स्वागत है। श्रीकृष्ण और अर्जुन! इस समय तुम दोनोंका दर्शन मुझे अत्यन्त प्रिय लगा है; क्योंकि तुम दोनोंने स्वयं किसी प्रकारकी क्षति न उठाकर सकुशल रहते हुए महारथी कर्णको मार डाला है ॥ १ १/२ ॥

आशीविषसमं युद्धे सर्वशस्त्रविशारदम् ॥ २ ॥
अग्रगं धार्तराष्ट्राणां सर्वेषां शर्म वर्म च ।
रक्षितं वृषसेनेन सुषेणेन च धन्विना ॥ ३ ॥

कर्ण युद्धमें विषधर सर्पके समान भयंकर, सम्पूर्ण शस्त्र-विद्याओंमें निपुण तथा कौरवोंका अगुआ था। वह शत्रुपक्षमें सबका कल्याण-साधक और कवच बना हुआ था। वृषसेन और सुषेण-जैसे धनुर्धर उसकी रक्षा करते थे ॥ २-३ ॥

अनुज्ञातं महावीर्यं रामेणास्त्रे सुदुर्जयम् ।
अग्र्यं सर्वस्य लोकस्य रथिनं लोकविश्रुतम् ॥ ४ ॥

परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके वह महान् शक्तिशाली और अत्यन्त दुर्जय हो गया था। समस्त संसारका सर्वश्रेष्ठ रथी एवं विश्वविख्यात वीर था ॥

त्रातारं धार्तराष्ट्राणां गन्तारं वाहिनीमुखे ।
हन्तारं परसैन्यानाममित्रगणमर्दनम् ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्रपुत्रोंका रक्षक, सेनाके मुहानेपर जाकर युद्ध करनेवाला, शत्रुसैनिकोंका संहार करनेमें समर्थ तथा विरोधियोंका मान मर्दन करनेवाला था ॥ ५ ॥

दुर्योधनहिते युक्तमस्मद्दुःखाय चोद्यतम् ।
अप्रधृष्यं महायुद्धे देवैरपि सवासवैः ॥ ६ ॥

वह सदा दुर्योधनके हितमें संलग्न रहकर हम-लोगोंको दुःख देनेके लिये उद्यत रहता था। महायुद्धमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उसे परास्त नहीं कर सकते थे ॥ ६ ॥

अनलानिलयोस्तुल्यं तेजसा च बलेन च ।

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पातालमिव गम्भीरं सुहृदां नन्दिवर्धनम् ॥ ७ ॥
अन्तकं मम मित्राणां हत्वा कर्णं महामृधे ।
दिष्ट्या युवामनुप्राप्तौ जित्वासुरमिवामरौ ॥ ८ ॥
वह तेजमें अग्नि, बलमें वायु और गम्भीरतामें पातालके समान था। अपने मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाला और मेरे मित्रोंके लिये यमराजके समान था। किसी असुरको जीतकर आये हुए दो देवताओंके समान तुम दोनों मित्र महासमरमें कर्णको मारकर यहाँ आ गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ७-८ ॥
घोरं युद्धमदीनेन मया ह्यद्याच्युतार्जुनौ ।
कृतं तेनान्तकेनेव प्रजाः सर्वा जिघांसता ॥ ९ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन! सम्पूर्ण प्रजाका संहार करनेकी इच्छा रखनेवाले कालके समान उस कर्णने आज मेरे साथ घोर युद्ध किया था। फिर भी मैंने उसमें दीनता नहीं दिखायी ॥ ९ ॥
तेन केतुश्च मे छिन्नो हतौ च पार्ष्णिसारथी ।
हतवाहस्ततश्चास्मि युयुधानस्य पश्यतः ॥ १० ॥
धृष्टद्युम्नस्य यमयोर्वीरस्य च शिखण्डिनः ।
पश्यतां द्रौपदेयानां पञ्चालानां च सर्वशः ॥ ११ ॥
उसने सात्यकि, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव, वीर शिखण्डी, द्रौपदीपुत्र तथा पांचालोंके देखते-देखते मेरी ध्वजा काट डाली, पार्श्वरक्षकोंको मार डाला और मेरे घोड़ोंका भी संहार कर डाला था ॥ १०-११ ॥
एताञ्जित्वा महावीर्यः कर्णः शत्रुगणान् बहून् ।
जितवान् मां महाबाहो यतमानो महारणे ॥ १२ ॥
महाबाहो! महायुद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले महापराक्रमी कर्णने इन बहुसंख्यक शत्रुगणोंको परास्त करके मुझपर विजय पायी थी ॥ १२ ॥
अभिसृत्य च मां युद्धे परुषाण्युक्तवान् बहु ।
तत्र तत्र युधां श्रेष्ठ परिभूय न संशयः ॥ १३ ॥
भीमसेनप्रभावात्तु यज्जीवामि धनंजय ।
बहुनात्र किमुक्तेन नाहं तत् सोढुमुत्सहे ॥ १४ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ वीर! उसने युद्धमें मेरा पीछा करके जहाँ-तहाँ मुझे अपमानित करते हुए बहुत-से कटुवचन सुनाये हैं—इसमें संशय नहीं है। धनंजय! मैं इस समय भीमसेनके प्रभावसे ही जीवित हूँ। यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ? मैं उस अपमानको किसी प्रकार सह नहीं सकता ॥ १३-१४ ॥
त्रयोदशाहं वर्षाणि यस्माद् भीतो धनंजय ।
न स्म निद्रां लभे रात्रौ न चाहनि सुखं क्वचित् ॥ १५ ॥

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अर्जुन! मैं जिससे भयभीत होकर तेरह वर्षोंतक न तो रातमें अच्छी तरह नींद ले सका और न दिनमें ही कहीं सुख पा सका ॥ १५ ॥

तस्य द्वेषेण संयुक्तः परिदह्ये धनंजय ।
आत्मनो मरणे यातो वार्ध्रीणस इव द्विपः ॥ १६ ॥
धनंजय! मैं उसके द्वेषसे निरन्तर जलता रहा। जैसे वार्ध्रीणस नामक पशु अपनी मौतके लिये ही वधस्थानमें पहुँच जाय, उसी प्रकार मैं भी अपनी मृत्युके लिये कर्णका सामना करने चला गया था ॥ १६ ॥

तस्यायमगमत् कालश्चिन्तयानस्य मे चिरम् ।
कथं कर्णो मया शक्यो युद्धे क्षपयितुं भवेत् ॥ १७ ॥
मैं कर्णको युद्धमें कैसे मार सकता हूँ, यही सोचते हुए मेरा यह दीर्घकाल व्यतीत हुआ है ॥ १७ ॥

जाग्रत्स्वपंश्च कौन्तेय कर्णमेव सदा ह्यहम् ।
पश्यामि तत्र तत्रैव कर्णभूतमिदं जगत् ॥ १८ ॥
कुन्तीनन्दन! मैं जागते और सोते समय सदा कर्णको ही देखा करता था। यह सारा जगत् मेरे लिये जहाँ-तहाँ कर्णमय हो रहा था ॥ १८ ॥

यत्र यत्र हि गच्छामि कर्णाद् भीतो धनंजय ।
तत्र तत्र हि पश्यामि कर्णमेवाग्रतः स्थितम् ॥ १९ ॥
धनंजय! मैं जहाँ-जहाँ भी जाता, कर्णसे भयभीत होनेके कारण सदा उसीको अपने सामने खड़ा देखता था ॥

सोऽहं तेनैव वीरेण समरेष्वपलायिना ।
सहयः सरथः पार्थ जित्वा जीवन् विसर्जितः ॥ २० ॥
पार्थ! मैं समरभूमिमें कभी पीठ न दिखानेवाले उसी वीर कर्णके द्वारा रथ और घोड़ोंसहित परास्त करके केवल जीवित छोड़ दिया गया हूँ ॥ २० ॥

को नु मे जीवितेनार्थो राज्येनार्थो भवेत् पुनः ।
ममैवं विक्षतस्याद्य कर्णेनाहवशोभिना ॥ २१ ॥
अब मुझे इस जीवनसे तथा राज्यसे क्या प्रयोजन है? जब कि आज युद्धमें शोभा पानेवाले कर्णने मुझे इस प्रकार क्षत-विक्षत कर डाला है ॥ २१ ॥

न प्राप्तपूर्वं यद् भीष्मात् कृपद्रोणाच्च संयुगे ।
तत् प्राप्तमद्य मे युद्धे सूतपुत्रान्महारथात् ॥ २२ ॥
पहले कभी भीष्म, द्रोण और कृपाचार्यसे भी मुझे युद्धस्थलमें जो अपमान नहीं प्राप्त हुआ था, वही आज महारथी सूतपुत्रसे युद्धमें प्राप्त हो गया है ॥ २२ ॥

स त्वां पृच्छामि कौन्तेय यथाद्य कुशलं तथा ।
तन्ममाचक्ष्व कात्स्न्येन यथा कर्णो हतस्त्वया ॥ २३ ॥

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कुन्तीनन्दन! इसीलिये मैं तुमसे पूछता हूँ कि आज जिस प्रकार सकुशल रहकर तुमने कर्णको मारा है, वह सारा समाचार मुझे पूर्णरूपसे बताओ॥ २३॥

शक्रतुल्यबलो युद्धे यमतुल्यः पराक्रमे।
रामतुल्यस्तथास्त्रेण स कथं वै निषूदितः॥ २४॥

जो युद्धमें इन्द्रके समान बलवान्, यमराजके समान पराक्रमी और परशुरामजीके समान अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता था, वह कर्ण कैसे मारा गया॥ २४॥

महारथः समाख्यातः सर्वयुद्धविशारदः।
धनुर्धराणां प्रवरः सर्वेषामेकपूरुषः॥ २५॥
पूजितो धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण महाबलः।
त्वदर्थमेव राधेयः स कथं निहतस्त्वया॥ २६॥

जो सम्पूर्ण युद्धकी कलामें कुशल, विख्यात महारथी, धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ तथा सब शत्रुओंमें प्रधान पुरुष था, जिसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रने तुम्हारा सामना करनेके लिये ही सम्मानपूर्वक रखा था, वह महाबली राधापुत्र कर्ण तुम्हारे द्वारा कैसे मारा गया?॥ २५-२६॥

धार्तराष्ट्रो हि योधेषु सर्वेष्वेव सदारर्जुन।
तव मृत्युं रणे कर्णं मन्यते पुरुषर्षभ॥ २७॥

पुरुषप्रवर अर्जुन! दुर्योधन रणक्षेत्रमें सम्पूर्ण योद्धाओंमेंसे कर्णको ही तुम्हारी मृत्यु मानता था॥ २७॥

स त्वया पुरुषव्याघ्र कथं युद्धे निषूदितः।
तन्ममाचक्ष्व कौन्तेय यथा कर्णो हतस्त्वया॥ २८॥

कुन्तीपुत्र! पुरुषसिंह! तुमने कैसे युद्धमें उस कर्णको मारा है? कर्ण जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा मारा गया है, वह सब समाचार मुझे बताओ॥ २८॥

युध्यमानस्य च शिरः पश्यतां सुहृदां हृतम्।
त्वया पुरुषशार्दूल सिंहेनेव यथा रुरोः॥ २९॥

पुरुषसिंह! जैसे सिंह रुरु नामक मृगका मस्तक काट लेता है, उसी प्रकार तुमने समस्त सुहृदोंके देखते-देखते जो जूझते हुए कर्णका सिर धड़से अलग कर दिया है, वह किस प्रकार सम्भव हुआ॥ २९॥

यः पर्युपासीत् प्रदिशो दिशश्च
त्वां सूतपुत्रः समरे परीप्सन्।
दित्सुः कर्णः समरे हस्तिषड्गवं
स हीदानीं कङ्कपत्रैः सुतीक्ष्णैः॥ ३०॥
त्वया रणे निहतः सूतपुत्रः
कच्चिच्छेते भूमितले दुरात्मा।
प्रियश्च मे परमो वै कृतोऽयं