Skip to content
BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
Page 2114Permalink

त्वया रणे सूतपुत्रं निहत्य ॥ ३१ ॥ अर्जुन! समरांगणमें जो सूतपुत्र कर्ण सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंमें तुम्हें पानेके लिये चक्कर लगाता था और तुम्हारा पता बतानेवालेको हाथीके समान छः बैल देना चाहता था, वही दुरात्मा सूतपुत्र क्या इस समय रणभूमिमें तुम्हारे द्वारा कंकपत्रयुक्त तीखे बाणोंसे मारा जाकर पृथ्वीपर सो रहा है? आज रणक्षेत्रमें सूतपुत्रको मारकर तुमने मेरा यह परम प्रिय कार्य पूर्ण किया है? ।। ३०-३१ ।।

यः सर्वतः पर्यपतत्त्वदर्थे सदार्चितो गर्वितः सूतपुत्रः । स शूरमानी समरे समेत्य कच्चित्त्वया निहतः संयुगेऽसौ ॥ ३२ ॥ जो सदा सम्मानित होकर घमंडमें भरा हुआ सूतपुत्र तुम्हारे लिये सब ओर धावा किया करता था, अपनेको शूरवीर माननेवाले उस कर्णको समरांगणमें उसके साथ युद्ध करके क्या तुमने मार डाला है? ।। ३२ ।।

रौक्मं वरं हस्तिगजाश्वयुक्तं रथं प्रदित्सुर्यः परेभ्यस्त्वदर्थे । सदा रणे स्पर्धते यः स पापः कच्चित्त्वया निहतस्तात युद्धे ॥ ३३ ॥ तात! जो रणक्षेत्रमें तुम्हारा पता बतानेके लिये दूसरोंको हाथी-घोड़ोंसे युक्त सोनेका बना हुआ सुन्दर रथ देनेका हौसला रखता और सदा तुमसे होड़ लगाता था, वह पापी क्या युद्धस्थलमें तुम्हारे द्वारा मार डाला गया? ।। ३३ ।।

योऽसौ सदा शूरमदेन मत्तो विकत्थते संसदि कौरवाणाम् । प्रियोऽत्यर्थं तस्य सुयोधनस्य कच्चित् सपापो निहतस्त्वयाद्य ॥ ३४ ॥ जो शौर्यके मदसे उन्मत्त हो कौरवोंकी सभामें सदा बढ़-बढ़कर बातें बनाया करता था और दुर्योधनको अत्यन्त प्रिय था, क्या उस पापी कर्णको तुमने आज मार डाला? ।।

कच्चित् समागम्य धनुःप्रयुक्तै- स्त्वत्प्रेषितैर्लोहिताङ्गैर्विहङ्गैः । शेते स पापः सुविभिन्नगात्रः कच्चिद् भग्नौ धार्तराष्ट्रस्य बाहू ॥ ३५ ॥ क्या आज युद्धमें तुमसे भिड़कर तुम्हारे द्वारा धनुषसे छोड़े गये लाल अंगोंवाले आकाशचारी बाणोंसे सारा शरीर छिन्न-भिन्न हो जोनेके कारण वह पापी कर्ण आज पृथ्वीपर पड़ा है? क्या उसके मरनेसे दुर्योधनकी दोनों बाँहें टूट गयीं? ।। ३५ ।।

Page 2115Permalink

योऽसौ सदा श्लाघते राजमध्ये दुर्योधनं हर्षयन् दर्पपूर्णः । अहं हन्ता फाल्गुनस्येति मोहात् कच्चिद्वचस्तस्य न वै तथा तत् ॥ ३६ ॥ जो राजाओंके बीचमें दुर्योधनका हर्ष बढ़ाता हुआ घमंडमें भरकर सदा मोहवश यह डींग हाँकता था कि मैं अर्जुनका वध कर सकता हूँ। क्या उसकी वह बात आज निष्फल हो गयी? ॥ ३६ ॥

नाहं पादौ धावयिष्ये कदाचित् यावत् स्थितः पार्थ इत्यल्पबुद्धेः । व्रतं तस्यैतत् सर्वदा शक्रसूनो कच्चित् त्वया निहतः सोऽद्य कर्णः ॥ ३७ ॥ इन्द्रकुमार! उस मन्दबुद्धि कर्णने सदाके लिये यह व्रत ले रखा था कि जबतक कुन्तीकुमार अर्जुन जीवित हैं तबतक मैं दूसरोंसे पैर नहीं धुलाऊँगा। क्या उस कर्णको तुमने आज मार डाला? ॥ ३७ ॥

योऽसौ कृष्णामब्रवीद् दुष्टबुद्धिः कर्णः सभायां कुरुवीरमध्ये । किं पाण्डवांस्त्वं न जहासि कृष्णे सुदुर्बलान् पतितान् हीनसत्त्वान् ॥ ३८ ॥ जिस दुष्टबुद्धिवाले कर्णने कौरव-वीरोंके बीच भरी सभामें द्रौपदीसे कहा था कि 'कृष्णे! तू इन अत्यन्त दुर्बल, पतित और शक्तिहीन पाण्डवोंको छोड़ क्यों नहीं देती?' ॥

योऽसौ कर्णः प्रत्यजानात्त्वदर्थे नाहं हत्वा सह कृष्णेन पार्थम् । इहोपयातेति स पापबुद्धिः कच्चिच्छेते शरसम्भिन्नगात्रः ॥ ३९ ॥ 'जिस कर्णने तुम्हारे लिये यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आज मैं श्रीकृष्णसहित अर्जुनको मारे बिना यहाँ नहीं लौटूँगा' क्या वह पापात्मा तुम्हारे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़ा है? ॥ ३९ ॥

कच्चित् संग्रामो विदितो वै तवायं समागमे सृञ्जयकौरवाणाम् । यत्रावस्थामीदृशीं प्रापितोऽहं कच्चित् त्वया सोऽद्य हतो दुरात्मा ॥ ४० ॥ क्या तुम्हें आजके संघर्षमें सृञ्जयों और कौरवोंका जो यह संग्राम हुआ था, उसका समाचार ज्ञात हुआ है, जिसमें मैं ऐसी दुर्दशाको पहुँचा दिया गया। क्या तुमने आज उस

Page 2116Permalink

दुरात्मा कर्णको मार डाला? ।। ४० ।। कच्चित्त्वया तस्य सुमन्दबुद्धे- र्गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैर्ज्वलद्भिः । सकुण्डलं भानुमदुत्तमाङ्गं कायात् प्रकृत्तं युधि सव्यसाचिन् ।। ४१ ।। सव्यसाची अर्जुन! क्या तुमने युद्धस्थलमें गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये प्रज्वलित बाणोंद्वारा उस मन्दबुद्धि कर्णके कुण्डलमण्डित तेजस्वी मस्तकको धड़से काट गिराया? ।। ४१ ।। यत्तन्मया बाणसमर्पितेन ध्यातोऽसि कर्णस्य वधाय वीर । तन्मे त्वया कच्चिदमोधमद्य ध्यानं कृतं कर्णनिपातनेन ।। ४२ ।। वीर! जिस समय मैं बाणोंसे घायल कर दिया गया, उस समय कर्णके वधके लिये मैंने तुम्हारा चिन्तन किया था। क्या तुमने कर्णको धराशायी करके मेरे उस चिन्तनको आज सफल बना दिया? ।। ४२ ।। यद् दर्पपूर्णः स सुयोधनोऽस्मा- नुदीक्षते कर्णसमाश्रयेण । कच्चित् त्वया सोऽद्य समाश्रयोऽस्य भग्नः पराक्रम्य सुयोधनस्य ।। ४३ ।। कर्णका आश्रय लेकर दुर्योधन जो बड़े घमंडमें भरकर हमलोगोंकी ओर देखा करता था। क्या तुमने दुर्योधनके उस महान् आश्रयको आज पराक्रम करके नष्ट कर दिया? ।। ४३ ।। यो नः पुरा षण्ढतिलानवोचत् सभामध्ये कौरवाणां समक्षम् । स दुर्मतिः कच्चिदुपेत्य संख्ये त्वया हतः सूतपुत्रो ह्यमर्षी ।। ४४ ।। जिसने पूर्वकालमें सभाभवनके भीतर कौरवोंकी आँखोंके सामने हमें थोथे तिलोंके समान नपुंसक बताया था वह अमर्षशील दुर्बुद्धि सूतपुत्र क्या आज युद्धमें आकर तुम्हारे हाथसे मारा गया? ।। ४४ ।। यः सूतपुत्रः प्रहसन् दुरात्मा पुराब्रवीन्निर्जितां सौबलेन । स्वयं प्रसह्यानय याज्ञसेनी- मपीह कच्चित् स हतस्त्वयाद्य ।। ४५ ।।

Page 2117Permalink

जिस दुरात्मा सूतपुत्र कर्णने हँसते-हँसते पहले दुःशासनसे यह बात कही थी कि 'सुबलपुत्रके द्वारा जीती हुई द्रुपदकुमारीको तुम स्वयं जाकर बलपूर्वक यहाँ ले आओ, क्या तुमने आज उसे मार डाला? ॥ ४५ ॥

यः शस्त्रभृच्छ्रेष्ठतमः पृथिव्यां पितामहं व्याक्षिपदल्पचेताः । संख्यायमानोऽर्धरथः स कच्चित् त्वया हतोऽद्याधिरथिर्महात्मन् ॥ ४६ ॥

महात्मन्! जो पृथ्वीपर समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठतम समझा जाता था तथा जिस मूर्खने अर्धरथी गिना जानेपर पितामह भीष्मके ऊपर महान् आक्षेप किया था, उस अधिरथपुत्रको क्या तुमने आज मार डाला? ॥ ४६ ॥

अमर्षजं निकृतिसमीरणेरितं हृदि स्थितं ज्वलनमिमं सदा मम । हतो मया सोऽद्य समेत्य कर्ण इति ब्रुवन् प्रशमयसेऽद्य फाल्गुन ॥ ४७ ॥

फाल्गुन! मेरे हृदयमें जिस कर्णकी शठतारूपी वायुसे प्रेरित हो अमर्षकी आग सदा प्रज्वलित रहती है 'उस कर्णको आज युद्धमें पाकर मैंने मार डाला' ऐसा कहते हुए क्या तुम आज मेरी उस अताको बुझा दोगे? ।।

ब्रवीहि मे दुर्लभमेतदद्य कथं त्वया निहतः सूतपुत्रः । अनुध्याये त्वां सततं प्रवीर वृत्रे हतेऽसौ भगवानिवेन्द्रः ॥ ४८ ॥

बोलो, मेरे लिये यह समाचार अत्यन्त दुर्लभ है। वीरवर! तुमने सूतपुत्रको कैसे मारा? मैं वृत्रासुरके मारे जानेपर भगवान् इन्द्रके समान सदा तुम्हारे विजयी स्वरूपका चिन्तन करता हूँ ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2118)

Page 2118Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनका युधिष्ठिरसे अबतक कर्णको न मार सकनेका कारण बताते हुए उसे मारनेके लिये प्रतिज्ञा करना

संजय उवाच

तद् धर्मशीलस्य वचो निशम्य
राज्ञः क्रुद्धस्यातिरथो महात्मा।
उवाच दुर्धर्षमदीनसत्त्वं
युधिष्ठिरं जिष्णुरनन्तवीर्यः॥ १॥

संजय कहते हैं— राजन्! क्रोधमें भरे हुए धर्मात्मा नरेशकी वह बात सुनकर अनन्त पराक्रमी अतिरथी महात्मा विजयशील अर्जुनने उदारचित्त एवं दुर्जय राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा॥ १॥

अर्जुन उवाच

संशप्तकैर्युध्यमानस्य मेऽद्य
सेनाग्रयायी कुरुसैन्येषु राजन्।
आशीविषाभान् खगमान् प्रमुञ्चन्
द्रौणिः पुरस्तात् सहसाभ्यतिष्ठत्॥ २॥

राजन्! आज जब मैं संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय कौरव-सेनाका अगुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंका प्रहार करता हुआ सहसा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया॥ २॥

दृष्ट्वा रथं मेघरवं ममैव
समस्तसेना च रणेऽभ्यतिष्ठत्।
तेषामहं पञ्च शतानि हत्वा
ततो द्रौणिमगमं पार्थिवाग्र्य॥ ३॥

भूपालशिरोमणे! इधर कौरवोंकी सारी सेना मेघके समान गम्भीर घर्घर ध्वनि करनेवाले मेरे रथको देखकर युद्धके लिये डटकर खड़ी हो गयी, तब मैंने उस सेनामेंसे पाँच सौ वीरोंका वध करके आचार्यपुत्रपर आक्रमण किया॥ ३॥

स मां समासाद्य नरेन्द्र यत्तः
समभ्ययात् सिंहमिव द्विपेन्द्रः।
अकार्षीच्च रथिनामुज्जिहीर्षां
महाराज वध्यतां कौरवाणाम्॥ ४॥

Page 2119Permalink

नरेन्द्र! जैसे गजराज सिंहकी ओर दौड़े, उसी प्रकार अश्वत्थामाने मुझे सामने पाकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो मुझपर आक्रमण किया। महाराज! उसने मारे जाते हुए कौरवरथियोंका उद्धार करनेकी इच्छा की ॥ ४ ॥

ततो रणे भारत दुष्प्रकम्प्य
आचार्यपुत्रः प्रवरः कुरूणाम् ।
मामर्दयामास शितैः पृषत्कै-
र्जनार्दनं चैव विषाग्निकल्पैः ॥ ५ ॥

भारत! तदनन्तर कौरवोंके प्रधान वीर दुर्धर्ष आचार्यपुत्रने रणक्षेत्रमें विष और अग्निके समान भयंकर तीखे बाणोंद्वारा मुझे और श्रीकृष्णको पीड़ित करना प्रारम्भ किया ॥ ५ ॥

अष्टागवाष्ट शतानि बाणान्
मया प्रयुद्धस्य वहन्ति तस्य ।
तांस्तेन मुक्तानहमस्य बाणै-
र्व्यनाशयं वायुरिवाभ्रजालम् ॥ ६ ॥

मेरे साथ युद्ध करते समय अश्वत्थामाके लिये आठ-आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़े सैकड़ों-हजारों बाण ढोते रहते थे। उसके चलाये हुए उन सभी बाणोंको मैंने अपने बाणोंसे मारकर उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे वायु मेघोंके समूहको छिन्न-भिन्न कर देती है ॥

ततोऽपरान् बाणसंघाननेका-
नाकर्णपूर्णायतविप्रमुक्तान् ।
ससर्ज शिक्षास्त्रबलप्रयत्नै-
स्तथा यथा प्रावृषि कालमेघः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी काली घटा जलकी वर्षा करती है, उसी प्रकार शिक्षा, अस्त्र, बल और प्रयत्नोंद्वारा धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये बहुत-से बाणसमूह उसने बरसाये ॥ ७ ॥

नैवाददानं न च संदधानं
जानीमहे कतरेणास्यतीति ।
वामेन वा यदि वा दक्षिणेन
स द्रोणपुत्रः समरे पर्यवर्तत् ॥ ८ ॥

द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरभूमिमें चारों ओर चक्कर लगाने लगा। वह कब बाण लेता, कब उसे धनुषपर रखता और कब किस हाथसे बायें अथवा दायेंसे छोड़ता था, यह हमलोग नहीं जान पाते थे ॥ ८ ॥

तस्याततं मण्डलमेव सज्यं
प्रदृश्यते कार्मुकं द्रोणसूनोः ।
सोऽविध्यन्मां पञ्चभिर्द्रोणपुत्रः

Page 2120Permalink

शितैः शरैः पञ्चभिर्वासुदेवम् ॥ ९ ॥
केवल प्रत्यंचासहित तना हुआ उस द्रोणपुत्रका मण्डलाकार धनुष ही दिखायी देता था। उसने पाँच तीखे बाणोंसे मुझको और पाँचसे श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया ॥ ९ ॥
अहं हि तं त्रिंशता वज्रकल्पैः
समार्दयं निमिषस्यान्तरेण ।
क्षणाच्छ्वावित्समरूपो बभूव
समार्दितो मद्विसृष्टैः पृषत्कैः ॥ १० ॥
तब मैंने पलक मारते-मारते वज्रके समान तीस सुदृढ़ बाणोंद्वारा उसे क्षणभरमें पीड़ित कर दिया। मेरे छोड़े हुए बाणोंसे घायल होनेपर उसका स्वरूप काँटोंसे भरे साहीके समान दिखायी देने लगा ॥ १० ॥
स विक्षरन् रुधिरं सर्वगात्रे
रथानीकं सूतसूनोर्विवेश ।
मयाभिभूतान् सैनिकानां प्रबर्हा-
नसौ प्रपश्यन् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ११ ॥
तब वह सारे शरीरसे खूनकी धारा बहाता हुआ मेरे द्वारा पीड़ित हुए समस्त सैनिक शिरोमणियोंको खूनसे लथपथ देखकर सूतपुत्र कर्णकी रथसेनामें घुस गया ॥ ११ ॥
ततोऽभिभूतं युधि वीक्ष्य सैन्यं
वित्रस्तयोधं द्रुतवाजिनागम् ।
पञ्चाशता रथमुख्यैः समेत्य
कर्णस्त्वरन् मामुपायात् प्रमाथी ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अपनी सेनाके योद्धाओंको भयसे आक्रान्त और हाथी-घोड़ोंको भागते देख पचास मुख्य-मुख्य रथियोंको साथ ले शत्रुओंको मथ डालनेवाला कर्ण बड़ी उतावलीके साथ मेरे पास आया ॥ १२ ॥
तान् सूदयित्वाहम्पास्य कर्ण
द्रष्टुं भवन्तं त्वरयाभियातः ।
सर्वे पञ्चाला ह्युद्विजन्ते स्म कर्णं
दृष्ट्वा गावः केसरिणं यथैव ॥ १३ ॥
उन पचासों रथियोंका संहार करके कर्णको छोड़कर मैं बड़ी उतावलीके साथ आपका दर्शन करनेके लिये चला आया हूँ। जैसे गौएँ सिंहको देखकर डर जाती हैं, उसी प्रकार सारे पांचाल-सैनिक कर्णको देखकर उद्विग्न हो उठते हैं ॥ १३ ॥
मृत्योरास्यं व्यात्तमिवाभिपद्य
प्रभद्रकाः कर्णमासाद्य राजन् ।
रथांस्तु तान् सप्तशतान् निमग्नां-

Page 2121Permalink

स्तदा कर्णः प्राहिणोन्मृत्युसङ्ग ॥ १४ ॥

राजन्! मृत्युके फैले हुए मुँहके समान कर्णके पास पहुँचकर प्रभद्रकगण भारी संकटमें

पड़ गये। कर्णने युद्धके समुद्रमें डूबे हुए उन सात सौ रथियोंको तत्काल मृत्युके लोकमें भेज

दिया था ॥ १४ ॥

न चाप्यभूत् क्लान्तमनाः स राजन्

यावन्नास्मान् दृष्टवान् सूतपुत्रः ।

श्रुत्वा तु त्वां तेन दृष्टं समेत-

मश्वत्थाम्ना पूर्वतरं क्षतं च ॥ १५ ॥

मन्ये कालमपयानस्य राजन्

क्रूरात् कर्णात् तेऽहमचिन्त्यकर्मन् ।

अचिन्त्यकर्मा नरेश्वर! जबतक सूतपुत्रने हमलोगोंको नहीं देखा था, तबतक उसके

मनमें उद्वेग या खेद नहीं हुआ था। मैंने जब सुना कि उसने पहले आपपर दृष्टिपात किया

था और आपसे उसका युद्ध भी हुआ था, साथ ही उससे भी पहले अश्वत्थामाने आपको

क्षत-विक्षत कर दिया था, तब क्रूरकर्मा कर्णके सामनेसे आपका यहाँ चला आना ही मुझे

समयोचित प्रतीत हुआ ॥

मया कर्णस्यास्त्रमिदं पुरस्ताद्

युद्धे दृष्टं पाण्डव चित्ररूपम् ॥ १६ ॥

न ह्यन्योद्धा विद्यते सृञ्जयानां

महारथं योऽद्य सहेत कर्णम् ।

पाण्डुनन्दन! मैंने युद्धमें अपने सामने कर्णके इस विचित्र अस्त्रको देखा था। सृंजयोंमें

दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो आज महारथी कर्णका सामना कर सके ॥

शैनेयो मे सात्यकिश्चक्ररक्षौ

धृष्टद्युम्नश्चापि तथैव राजन् ॥ १७ ॥

युधामन्युश्चोत्तमौजाश्च शूरौ

पृष्ठतो मां रक्षतां राजपुत्रौ ।

राजन्! शिनिपौत्र सात्यकि और धृष्टद्युम्न मेरे चक्ररक्षक हों; युधामन्यु और उत्तमौजा

—ये दोनों शूरवीर राजकुमार मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ १७१/२ ॥

रथप्रवीरेण महानुभाव

द्विषत्सैन्ये वर्तता दुस्तरेण ॥ १८ ॥

समेत्याहं सपुत्रेण संख्ये

वृत्रेण वज्रीव नरेन्द्रमुख्य ।

योत्स्याम्यहं भारत सूतपुत्र-

मस्मिन् संग्रामे यदि वै दृश्यतेऽद्य ॥ १९ ॥

Page 2122Permalink

महानुभाव! भरतवंशी नृपश्रेष्ठ! शत्रुसेनामें विद्यमान रथियोंमें प्रमुख वीर दुर्जय सूतपुत्र कर्णके साथ, यदि इस संग्राममें आज वह मुझे दीख जाय तो युद्धस्थलमें मिलकर मैं उसी तरह युद्ध करूँगा, जैसे वज्रधारी इन्द्रने वृत्रासुरके साथ किया था ।। १८-१९ ।।

आयाहि पश्याद्य युयुत्समानं
मां सूतपुत्रस्य रणे जयाय ।
महोरगस्येव मुखं प्रपन्नाः
प्रभद्रकाः कर्णमभिद्रवन्ति ।। २० ।।

आइये, देखिये, आज मैं रणभूमिमें सूतपुत्रपर विजय पानेके लिये युद्ध करना चाहता हूँ। प्रभद्रकगण कर्णपर धावा कर रहे हैं, ऐसा करके वे मानो अजगरके मुखमें पड़ गये हैं ।। २० ।।

षट्साहस्रा भारत राजपुत्राः
स्वर्गाय लोकाय रणे निमग्नाः ।
कर्णं न चेदद्य निहन्मि राजन्
सबान्धवं युध्यमानं प्रसह्य ।। २१ ।।
प्रतिश्रुत्याकुर्वतो वै गतिर्या
कष्टा याता तामहं राजसिंह ।

भारत! छः हजार राजकुमार स्वर्गलोकमें जानेके लिये युद्धके सागरमें मग्न हो गये हैं। राजन्! राजसिंह! यदि आज मैं बन्धुओंसहित युद्धमें तत्पर हुए कर्णको हठपूर्वक न मार डालूँ तो प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवालेको जो दुःखदायी गति प्राप्त होती है, उसीको मैं भी पाऊँगा ।।

आमन्त्रये त्वां ब्रूहि जयं रणे मे
पुरा भीमं धार्तराष्ट्रा ग्रसन्ते ।। २२ ।।
सौतिं हनिष्यामि नरेन्द्रसिंह
सैन्यं तथा शत्रुगणांश्च सर्वान् ।। २३ ।।

मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ। आप रणभूमिमें मेरी विजयका आशीर्वाद दीजिये। नरेन्द्रसिंह! धृतराष्ट्रके पुत्र भीमसेनको ग्रस लेनेकी चेष्टा कर रहे हैं। मैं इसके पहले ही सूतपुत्र कर्णको, उसकी सेनाको तथा सम्पूर्ण शत्रुओंको मार डालूँगा ।। २२-२३ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनवाक्ये सप्तषष्टितमोऽध्यायः ।। ६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2123)

Page 2123Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन

संजय उवाच

श्रुत्वा कर्णं कल्यमुदारवीर्यं
क्रुद्धः पार्थः फाल्गुनस्यामितौजाः ।
धनंजयं वाक्यमुवाच चेदं
युधिष्ठिरः कर्णशराभितप्तः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्णके बाणोंसे संतप्त हुए अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर अधिक बलशाली कर्णको सकुशल सुनकर अर्जुनपर कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

विप्रद्रुता तात चमूस्त्वदीया
तिरस्कृता चाद्य यथा न साधु ।
भीतो भीमं त्यज्य चायास्तथा त्वं
यन्नाशकः कर्णमथो निहन्तुम् ॥ २ ॥
‘तात! तुम्हारी सारी सेना भाग चली है। तुमने आज उसकी ऐसी उपेक्षा की है, जो किसी प्रकार अच्छी नहीं कही जा सकती। जब तुम कर्णको जीत नहीं सके तो भयभीत हो भीमसेनको वहीं छोड़कर यहाँ चले आये ॥ २ ॥

स्नेहस्त्वया पार्थ कृतः पृथाया
गर्भं समाविश्य यथा न साधु ।
त्यक्त्वा रणे यदपायाः स भीमं
यन्नाशकः सूतपुत्रं निहन्तुम् ॥ ३ ॥
‘पार्थ! तुमने कुन्तीके गर्भमें निवास करके भी अपने सगे भाईके प्रति ऐसा स्नेह निभाया, जिसे कोई अच्छा नहीं कह सकता; क्योंकि जब तुम सूतपुत्र कर्णके मारनेमें समर्थ न हो सके, तब भीमसेनको अकेले रणभूमिमें छोड़कर स्वयं वहाँसे चले आये ॥ ३ ॥

यत् तद् वाक्यं द्वैतवने त्वयोक्तं
कर्णं हन्तास्म्येकरथेन सत्यम् ।
त्यक्त्वा तं वै कथमद्यापयाततः
कर्णाद् भीतो भीमसेनं विहाय ॥ ४ ॥
‘तुमने द्वैतवनमें जो यह सत्य वचन कहा था कि ‘मैं एकमात्र रथके द्वारा युद्ध करके कर्णको मार डालूँगा’ उस प्रतिज्ञाको तोड़कर कर्णसे भयभीत हो भीमसेनको छोड़कर आज तुम रणभूमिसे लौट कैसे आये? ॥

Page 2124Permalink

इदं यदि द्वैतवनेऽप्यचक्षः कर्णं योद्धुं न प्रशक्ये नृपेति । वयं ततः प्राप्तकालं च सर्वे कृत्यान्युपैष्याम तथैव पार्थ ॥ ५ ॥ ‘पार्थ! यदि तुमने द्वैतवनमें यह कह दिया होता कि ‘राजन्! मैं कर्णके साथ युद्ध नहीं कर सकूँगा' तो हम सब लोग समयोचित कर्तव्यका निश्चय करके उसीके अनुसार कार्य करते ॥ ५ ॥

मयि प्रतिश्रुत्य वधं हि तस्य न वै कृतं तच्च तथैव वीर । आनीय नः शत्रुमध्यं स कस्मात् समुत्क्षिप्य स्थण्डिले प्रत्यपिंषाः ॥ ६ ॥ ‘वीर! तुमने मुझसे कर्णके वधकी प्रतिज्ञा करके उसका उसी रूपमें पालन नहीं किया। यदि ऐसा ही करना था तो हमें शत्रुओंके बीचमें लाकर पत्थरकी वेदीपर पटककर पीस क्यों डाला? ॥ ६ ॥

अप्याशिष्म वयमर्जुन त्वयि यियासवो बहु कल्याणमिष्टम् । तन्नः सर्वं विफलं राजपुत्र फलार्थिनां विफलं इवातिपुष्पः ॥ ७ ॥ ‘राजकुमार अर्जुन! हमने बहुत-से मंगलमय अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर तुमपर आशा लगा रखी थी; परंतु फल चाहनेवाले मनुष्योंको अधिक फूलोंवाला फलहीन वृक्ष जैसे निराश कर देता है, उसी प्रकार तुमसे हमारी सारी आशा निष्फल हो गयी ॥ ७ ॥

प्रच्छादितं बडिशमिवामिषेण संछादितं गरलमिवाशनेन । अनर्थकं मे दर्शितवानसि त्वं राज्यार्थिनो राज्यरूपं विनाशम् ॥ ८ ॥ ‘मैं राज्य पाना चाहता था; किंतु तुमने मांससे ढके हुए वंशीके काँटे और भोजनसामग्रीसे आच्छादित हुए विषके समान मुझे राज्यके रूपमें अनर्थकारी विनाशका ही दर्शन कराया है ॥ ८ ॥

त्रयोदशेमा हि समाः सदा वयं त्वामन्वजीविष्म धनंजयाशया । काले वर्षं देवमिवोप्तबीजं तन्नः सर्वान् नरके त्वं न्यमज्जः ॥ ९ ॥

Page 2125Permalink

'धनंजय! जैसे बोया हुआ बीज समयपर मेघद्वारा की हुई वर्षाकी प्रतीक्षामें जीवित रहता है, उसी प्रकार हमने तेरह वर्षोंतक सदा तुमपर ही आशा लगाकर जीवन धारण किया था; परंतु तुमने हम सब लोगोंको नरकमें डुबो दिया (भारी संकटमें डाल दिया) ॥ ९ ॥

यत्तत् पृथां वागुवाचान्तरिक्षे सप्ताहजाते त्वयि मन्दबुद्धे । जातः पुत्रो वासवविक्रमोऽयं सर्वान् शूरान् शात्रवान् जेष्यतीति ॥ १० ॥

'मन्दबुद्धि अर्जुन! तुम्हारे जन्म लिये अभी सात ही दिन बीते थे कि माता कुन्तीसे आकाशवाणीने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'देवि! तुम्हारा यह पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी पैदा हुआ है। यह अपने समस्त शूरवीर शत्रुओंको जीत लेगा' ॥ १० ॥

अयं जेता खाण्डवे देवसंघान् सर्वाणि भूतान्यपि चोत्तमौजाः । अयं जेता मद्रकलिङ्गकेकया- नयं कुरून् राजमध्ये निहन्ता ॥ ११ ॥

'यह उत्तम शक्तिसे सम्पन्न बालक खाण्डववनमें देवताओंके समूहों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर भी विजय प्राप्त करेगा। यह मद्र, कलिंग और केकयोंको जीतेगा तथा राजाओंकी मण्डलीमें कौरवोंका भी विनाश कर डालेगा ॥ ११ ॥

अस्मात् परो नो भविता धनुर्धरो नैनं भूतं किंचन जातु जेता । इच्छन्नयं सर्वभूतानि कुर्याद् वशे वशी सर्वसमाप्तविद्यः ॥ १२ ॥

'इससे बढ़कर दूसरा कोई धनुर्धर नहीं होगा। कोई भी प्राणी कभी भी इसे जीत नहीं सकेगा। यह अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखता हुआ सम्पूर्ण विद्याओंको प्राप्त कर लेगा और इच्छा करते ही सभी प्राणियोंको अपने अधीन कर सकेगा ॥ १२ ॥

कान्त्या शशाङ्कस्य जवेन वायोः स्थैर्येण मेरोः क्षमया पृथिव्याः । सूर्यस्य भासा धनदस्य लक्ष्म्या शौर्येण शक्रस्य बलेन विष्णोः ॥ १३ ॥

'यह चन्द्रमाकी कान्ति, वायुके वेग, मेरुकी स्थिरता, पृथ्वीकी क्षमा, सूर्यकी प्रभा, कुबेरकी लक्ष्मी, इन्द्रके शौर्य और भगवान् विष्णुके बलसे सम्पन्न होगा ॥ १३ ॥

तुल्यो महात्मा तव कुन्ति पुत्रो जातोऽदितेर्विष्णुरिवारिहन्ता ।

Page 2126Permalink

स्वेषां जयाय द्विषतां वधाय ख्यातोऽमितौजाः कुलतन्तुकर्ता ॥ १४ ॥ ‘कुन्ति! तुम्हारा यह महामनापुत्र अदितिके गर्भसे प्रकट हुए शत्रुहन्ता भगवान् विष्णुके समान उत्पन्न हुआ है। यह अमितबलशाली बालक स्वजनोंकी विजय और शत्रुओंके वधके लिये प्रसिद्ध एवं अपनी कुलपरम्पराका प्रवर्तक होगा ॥ १४ ॥’

इत्यन्तरिक्षे शतशृङ्गमूर्ध्नि तपस्विनां शृण्वतां वागुवाच । एवंविधं तच्च नाभूत् तथा च देवापि नूनमनृतं वदन्ति ॥ १५ ॥ ‘शतशृंग पर्वतके शिखरपर तपस्वी महात्माओंके सुनते हुए आकाशवाणीने ये बातें कही थीं; परंतु उसका यह कथन सफल नहीं हुआ। निश्चय ही देवतालोग भी झूठ बोलते हैं ॥ १५ ॥’

तथा परेषामृषिसत्तमानां श्रुत्वा गिरः पूजयतां सदा त्वाम् । न संनतिं प्रैमि सुयोधनस्य न त्वां जानाम्याधिरथेर्भयार्तम् ॥ १६ ॥ ‘इसी प्रकार दूसरे महर्षि भी सदा तुम्हारी प्रशंसा करते हुए ऐसी ही बातें कहा करते थे। उनकी बातें सुनकर ही मैं दुर्योधनके सामने कभी नतमस्तक न हो सका; परंतु मैं यह नहीं जानता था कि तुम अधिरथपुत्र कर्णके भयसे पीड़ित हो जाओगे ॥ १६ ॥’

पूर्वं यदुक्तं हि सुयोधनेन न फाल्गुनः प्रमुखे स्थास्यतीति । कर्णस्य युद्धे हि महाबलस्य मौर्ख्यात् तु तन्नावबुद्धं मयाऽऽसीत् ॥ १७ ॥ ‘दुर्योधनने पहले ही जो यह बात कह दी थी कि ‘अर्जुन युद्धमें महाबली कर्णके सामने नहीं खड़े हो सकेंगे’ उसके इस कथनपर मैंने मूर्खतावश विश्वास नहीं किया था ॥ १७ ॥’

तेनाद्य तप्स्ये भृशमप्रमेयं यच्छत्रुवर्गे नरकं प्रविष्टः । तदैव वाच्योऽस्मि ननु त्वयाहं न योत्स्येऽहं सूतपुत्रं कथंचित् ॥ १८ ॥ ततो नाहं सृञ्जयान् केकयांश्च समानयेयं सुहृदो रणाय ।

Page 2127Permalink

‘इसीलिये आज संतप्त हो रहा हूँ। शत्रुओंके समुदायमें फँसकर अत्यन्त असीम नरकतुल्य संकटमें पड़ गया हूँ। अर्जुन! तुम्हें पहले ही यह कह देना चाहिये था कि ‘मैं सूतपुत्र कर्णके साथ किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा’। वैसी दशामें मैं सृंजयों, केकयों तथा अन्यान्य सुहृदोंको युद्धके लिये आमन्त्रित नहीं करता।। १८½ ।।

एवं गते किंच मयाद्य शक्यं
कार्यं कर्तुं विग्रहे सूतजस्य ।। १९ ।।
तथैव राज्ञश्च सुयोधनस्य
ये वापि मां योद्धुकामाः समेताः ।
‘आज जब ऐसी परिस्थिति है, तब सूतपुत्र कर्ण, राजा दुर्योधन तथा अन्य जो लोग मेरे साथ युद्धकी इच्छासे एकत्र हुए हैं, उन सबके साथ छिड़े हुए इस संग्राममें मैं कौन-सा कार्य कर सकता हूँ।। १९½ ।।

धिगस्तु मज्जीवितमद्य कृष्ण
योऽहं वशं सूतपुत्रस्य यातः ।। २० ।।
मध्ये कुरूणां सुहृदां च मध्ये
ये चाप्यन्ये योद्धुकामाः समेताः ।
‘श्रीकृष्ण! मैं कौरवों, सुहृदों तथा अन्य जो लोग युद्धकी इच्छासे एकत्र हुए हैं, उन सबके बीचमें आज सूतपुत्र कर्णके अधीन हो गया। मेरे जीवनको धिक्कार है।।

(एकस्तु मे भीमसेनोऽद्य नाथो
येनाभिपन्नोऽस्मि रणे महाभये ।
विमोच्य मां चापि रुषान्वितस्ततः
शरेण तीक्ष्णेन बिभेद कर्णम् ।।
‘आज एकमात्र भीमसेन ही मेरे रक्षक हैं, जिन्होंने महान् भयदायक संग्राममें सब ओरसे मेरी रक्षा की है। उन्होंने मुझे संकटसे मुक्त करके अपने पैने बाणसे कर्णको बींध डाला था।

त्यक्त्वा प्राणान् समरे भीमसेन-
श्चक्रे युद्धं कुरुभिः समेतैः ।
गदाग्रहस्तो रुधिरोक्षिताङ्ग-
श्चरन् रणे काल इवान्तकाले ।।
असौ हि भीमस्य महान् निनादो
मुहुर्मुहुः श्रूयते धार्तराष्ट्रैः ॥)
‘भीमसेनका शरीर खूनसे नहा उठा था। फिर भी वे हाथमें गदा लेकर प्रलयकालके यमराजकी भाँति रणभूमिमें विचरते थे और प्राणोंका मोह छोड़कर समरांगणमें एकत्र हुए

Page 2128Permalink

कौरवोंके साथ युद्ध करते थे। धृतराष्ट्रके पुत्रोंके साथ युद्ध करते हुए भीमसेनका वह महान् सिंहनाद बारंबार सुनायी दे रहा है।

यदि स्म जीवेत् स भवेन्निहन्ता महारथानां प्रवरो रथोत्तमः । तवाभिमन्युस्तनयोऽद्य पार्थ न चास्मि गन्ता समरे पराभवम् ॥ २१ ॥ अथापि जीवेत् समरे घटोत्कच- स्तथापि नाहं समरे पराङ्मुखः ।

'पार्थ! यदि महारथियोंमें श्रेष्ठ और उत्तम रथी तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु जीवित होता तो वह शत्रुओंका वध अवश्य करता। फिर तो समरभूमिमें मुझे ऐसा अपमान नहीं उठाना पड़ता। यदि समरांगणमें घटोत्कच भी जीवित होता तो भी मुझे वहाँसे मुँह फेरकर भागना नहीं पड़ता ॥ २११/२ ॥

(भीमस्य पुत्रः समराग्रयायी महास्त्रविच्चापि तवानुरूपः । यत्नं समासाद्य रिपोर्बलं नो निमीलिताक्षं भयविप्लुतं भवेत् ॥

'भीमसेनका वह पुत्र समरभूमिमें आगे चलनेवाला, महान् अस्त्रवेत्ता और तुम्हारे समान ही पराक्रमी था। उसके होनेपर हमारे शत्रुओंकी सेना यत्न करके भी सफल न होती और भयसे व्याकुल होकर आँखें बंद कर लेती।

चकार योऽसौ निशि युद्धमेक- स्त्यक्त्वा रणं यस्य भयाद् द्रवन्ते । स चेत् समासाद्य महानुभावः कर्णं रणे बाणगणैः प्रमोह्य । धैर्ये स्थितेनापि च सूतजेन शक्त्या हतो वासवदत्तया तया ॥)

'उस महानुभाव वीरने अकेले ही रात्रिमें युद्ध किया था, जिससे शत्रुसैनिक भयके मारे रणभूमि छोड़कर भागने लगे थे। उसने कर्णपर आक्रमण करके रणभूमिमें अपने बाणसमूहोंद्वारा सबको मोहमें डाल दिया था; परंतु धैर्यमें स्थित हुए सूतपुत्र कर्णने इन्द्रकी दी हुई उस शक्तिके द्वारा उसे मार डाला।

मम ह्यभाग्यानि पुरा कृतानि पापानि नूनं बलवन्ति युद्धे ॥ २२ ॥ तृणं च कृत्वा समरे भवन्तं ततोऽहमेवं निकृतो दुरात्मना ।

Page 2129Permalink

वैकर्तनेनैव तथा कृतोऽहं यथा ह्यशक्तः क्रियते ह्यबान्धवः ॥ २३ ॥ ‘निश्चय ही मेरे अभाग्य और पूर्वकृत पाप इस युद्धमें प्रबल हो रहे हैं। दुरात्मा कर्णने संग्राममें तुम्हें तिनकेके समान समझकर मेरा ऐसा अपमान किया है। किसी शक्तिहीन तथा बन्धु-बान्धवोंसे रहित असहाय मनुष्यके साथ जैसा बर्ताव किया जाता है, कर्णने वैसा ही मेरे साथ किया है ॥ २२-२३ ॥

आपद्गतं कश्चन यो विमोक्षेत् स बान्धवः स्नेहयुक्तः सुहृच्च । एवं पुराणा मुनयो वदन्ति धर्मः सदा सद्द्भिरनुष्ठितश्च ॥ २४ ॥ ‘जो कोई पुरुष आपत्तिमें पड़े हुए मनुष्यको संकटसे छुड़ा देता है, वही बन्धु है और वही स्नेही सुहृद्। प्राचीन महर्षि ऐसा ही कहते हैं। यह सत्पुरुषोंद्वारा सदासे पालित होनेवाला धर्म है ॥ २४ ॥

त्वष्ट्रा कृतं वाहमकूजनाक्षं शुभं समास्थाय कपिध्वजं तम् । खड्गं गृहीत्वा हेमपट्टानुबद्धं धनुश्चेदं गाण्डिवं तालमात्रम् ॥ २५ ॥ स केशवेनोह्यमानः कथं त्वं कर्णाद् भीतो व्यपयातोऽसि पार्थ । ‘कुन्तीनन्दन! तुम्हारा रथ साक्षात् विश्वकर्माका बनाया हुआ है, उसके धुरेसे कोई आवाज नहीं होती। उसपर वानरध्वजा फहराती रहती है, ऐसे शुभलक्षण रथपर आरूढ़ हो सुवर्णजटित खड्ग और चार हाथके श्रेष्ठ धनुष गाण्डीवको लेकर तथा भगवान् श्रीकृष्णजैसे सारथिके द्वारा संचालित होकर भी तुम कर्णसे भयभीत होकर कैसे भाग आये? ॥ २५ १/२ ॥

धनुश्च तत् केशवाय प्रयच्छ यन्ता भविष्यस्त्वं रणे केशवस्य ॥ २६ ॥ तदाहनिष्यत् केशवः कर्णमुग्रं मरुत्पतिर्वृत्रमिवात्तवज्रः । ‘तुम अपना गाण्डीव धनुष भगवान् श्रीकृष्णको दे दो तथा रणभूमिमें स्वयं इनके सारथि बन जाओ। फिर जैसे इन्द्रने हाथमें वज्र लेकर वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार ये श्रीकृष्ण भयंकर वीर कर्णको मार डालेंगे ॥ २६ १/२ ॥

राधेयमेतं यदि नाद्य शक्त- श्चरन्तमुग्रं प्रतिबाधनाय ॥ २७ ॥

Page 2130Permalink

प्रयच्छान्यस्मै गाण्डीवमेतदद्य त्वत्तो योऽस्त्रैरभ्यधिको वा नरेन्द्रः । ‘यदि तुम आज रणभूमिमें विचरते हुए इस भयानक वीर राधापुत्र कर्णका सामना करनेकी शक्ति नहीं रखते तो अब यह गाण्डीव धनुष दूसरे किसी ऐसे राजाको दे दो जो अस्त्रबलमें तुमसे बढ़कर हो ।। २७ १/२ ।।'

अस्मान् नैवं पुत्रदारैर्विहीनान् सुखाद् भ्रष्टान् राज्यनाशाच्च भूयः ।। २८ ।। द्रष्टा लोकः पतितानप्यगाधे पापैर्जुष्टे नरके पाण्डवेय । ‘पाण्डुनन्दन! ऐसा हो जानेपर संसारके मनुष्य हमें फिर इस प्रकार स्त्री-पुत्रोंके संयोगसे रहित, राज्य नष्ट होनेके कारण सुखसे वंचित तथा पापियोंद्वारा सेवित अगाध नरकतुल्य कष्टमें गिरा हुआ नहीं देखेंगे ।। २८ १/२ ।।'

मासेऽपतिष्यः पञ्चमे त्वं सुकृच्छ्रे न वा गर्भे आभविष्यः पृथायाः ।। २९ ।। तत् ते श्रेयो राजपुत्राभविष्य- न्न चेत् संग्रामादपयानं दुरात्मन् । ‘दुरात्मा राजपुत्र! यदि तुम पाँचवें महीनेमें माताके गर्भसे गिर गये होते अथवा माता कुन्तीके अत्यन्त कष्टदायक गर्भमें आये ही नहीं होते तो वह तुम्हारे लिये अच्छा होता; क्योंकि उस दशामें तुम्हें युद्धसे भाग आनेका कलंक तो नहीं प्राप्त होता ।। २९ १/२ ।।'

धिग्गाण्डीवं धिक् च ते बाहुवीर्य- मसंख्येयान् बाणगणांश्च धिक् ते । धिक् ते केतुं केसरिणः सुतस्य कृशानुदत्तं च रथं च धिक् ते ।। ३० ।। ‘धिक्कार है तुम्हारे इस गाण्डीव धनुषको, धिक्कार है तुम्हारी भुजाओंके पराक्रमको, धिक्कार है तुम्हारे इन असंख्य बाणोंको, धिक्कार है हनुमान्‌जीके द्वारा उपलक्षित तुम्हारी इस ध्वजाको तथा धिक्कार है अग्निदेवके दिये हुए इस रथको’ ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरक्रोधवाक्येऽष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका क्रोधपूर्ण वचनविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं।)

युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना

Page 2131Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना

संजय उवाच

युधिष्ठिरेणैवमुक्तः कौन्तेयः श्वेतवाहनः ।
असिं जग्राह संक्रुद्धो जिघांसुर्भर्तर्षभम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर श्वेतवाहन कुन्तीकुमार अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे तलवार उठा ली ॥ १ ॥

तस्य कोपं समुद्वीक्ष्य चित्तज्ञः केशवस्तदा ।
उवाच किमिदं पार्थ गृहीतः खड्ग इत्युत ॥ २ ॥
उस समय उनका क्रोध देखकर सबके मनकी बात जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्णने पूछा—'पार्थ! यह क्या? तुमने तलवार कैसे उठा ली? ॥ २ ॥

न हि पश्यामि योद्धव्यं त्वया किञ्चिद् धनंजय ।
ते ग्रस्ता धार्तराष्ट्रा हि भीमसेनेन धीमता ॥ ३ ॥
'धनंजय! यहाँ तुम्हें किसीके साथ युद्ध करना हो, ऐसा तो नहीं दिखायी देता; क्योंकि धृतराष्ट्रके पुत्रोंको बुद्धिमान् भीमसेनने कालका ग्रास बना रखा है ॥ ३ ॥

अपयातोऽसि कौन्तेय राजा द्रष्टव्य इत्यपि ।
स राजा भवता दृष्टः कुशली च युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम तो यह सोचकर युद्धसे हट आये थे कि राजा युधिष्ठिरका दर्शन कर लूँ। सो तुमने राजाका दर्शन कर लिया। राजा युधिष्ठिर सब प्रकारसे सकुशल हैं ॥ ४ ॥

स दृष्ट्वा नृपशार्दूलं शार्दूलसमविक्रमम् ।
हर्षकाले च सम्प्राप्ते किमिदं मोहकारितम् ॥ ५ ॥
'सिंहके समान पराक्रमी नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको स्वस्थ देखकर जब तुम्हारे लिये हर्षका अवसर आया है, ऐसे समयमें यह मोहकारित कौन-सा कृत्य होने जा रहा है? ॥ ५ ॥

न तं पश्यामि कौन्तेय यस्ते वध्यो भविष्यति ।
प्रहर्तुमिच्छसे कस्मात् किं वा ते चित्तविभ्रमः ॥ ६ ॥
'कुन्तीनन्दन! मैं किसी ऐसे मनुष्यको भी यहाँ नहीं देखता, जो तुम्हारे द्वारा वध करनेके योग्य हो। फिर तुम प्रहार क्यों करना चाहते हो? तुम्हारे चित्तमें भ्रम तो नहीं हो गया

Page 2132Permalink

है? ॥ ६ ॥ कस्माद् भवान् महाखड्गं परिगृह्णाति सत्वरः । तत् त्वां पृच्छामि कौन्तेय किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥ ७ ॥ परामृशसि यत् क्रुद्धः खड्गमद्भुतविक्रम । ‘पार्थ! तुम क्यों इतने उतावले होकर विशाल खड्ग हाथमें ले रहे हो। अद्भुत पराक्रमी वीर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, इस समय तुम्हें यह क्या करनेकी इच्छा हुई है, जिससे कुपित होकर तलवार उठा रहे हो?’ ॥ ७ १/२ ॥ एवमुक्तस्तु कृष्णेन प्रेक्षमाणो युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥ अर्जुनः प्राह गोविन्दं क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुनने क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान युधिष्ठिरकी ओर देखकर श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ८ १/२ ॥ अन्यस्मै देहि गाण्डीवमिति मां योऽभिचोदयेत् ॥ ९ ॥ छिन्द्यामहं तस्य शिर इत्युपांशुव्रतं मम । तदुक्तं मम चानेन राज्ञामितपराक्रम ॥ १० ॥ समक्षं तव गोविन्द न तत् क्षन्तुमिहोत्सहे । तस्मादेनं वधिष्यामि राजानं धर्मभीरुकम् ॥ ११ ॥ ‘जो मुझसे यह कह दे कि तुम अपना गाण्डीव धनुष दूसरेको दे दो, उसका मैं सिर काट लूँगा।’ मैंने मन-ही-मन यह प्रतिज्ञा कर रखी है। अनन्त पराक्रमी गोविन्द! आपके सामने ही इन महाराजने मुझसे वह बात कही है, अतः मैं इन्हें क्षमा नहीं कर सकता; इन धर्मभीरु नरेशका वध करूँगा ॥ ९—११ ॥ प्रतिज्ञां पालयिष्यामि हत्वैनं नरसत्तमम् । एतदर्थं मया खड्गो गृहीतो यदुनन्दन ॥ १२ ॥ ‘यदुनन्दन! इन नरश्रेष्ठका वध करके मैं अपनी प्रतिज्ञाका पालन करूँगा; इसीलिये मैंने यह खड्ग हाथमें लिया है ॥ १२ ॥ सोऽहं युधिष्ठिरं हत्वा सत्यस्यानृण्यतां गतः । विशोको विज्वरश्चापि भविष्यामि जनार्दन ॥ १३ ॥ ‘जनार्दन! मैं युधिष्ठिरका वध करके उस सच्ची प्रतिज्ञाके भारसे उऋण हो शोक और चिन्तासे मुक्त हो जाऊँगा ॥ १३ ॥ किं वा त्वं मन्यसे प्राप्तमस्मिन् काल उपस्थिते । त्वमस्य जगतस्तात वेत्थ सर्वं गतागतम् ॥ १४ ॥ तत् तथा प्रकरिष्यामि यथा मां वक्ष्यते भवान् । ‘तात! आप इस अवसरपर क्या करना उचित समझते हैं? आप ही इस जगत्के भूत और भविष्यको जानते हैं, अतः आप मुझे जैसी आज्ञा देंगे, वैसा ही करूँगा’ ॥ १४ १/२ ॥

Page 2133Permalink

संजय उवाच

धिग् धिगित्येव गोविन्दः पार्थमुक्त्वाब्रवीत् पुनः ॥ १५ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे ‘धिक्कार है! धिक्कार है!!’ ऐसा कहकर पुनः इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

इदानीं पार्थ जानामि न वृद्धाः सेवितास्त्वया ।
काले न पुरुषव्याघ्र संरम्भं यद् भवानगात् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! इस समय मैं समझता हूँ कि तुमने वृद्ध पुरुषोंकी सेवा नहीं की है। पुरुषसिंह! इसीलिये तुम्हें बिना अवसरके ही क्रोध आ गया है ॥ १६ ॥

न हि धर्मविभागज्ञः कुर्यादेवं धनंजय ।
यथा त्वं पाण्डवाद्येह धर्मभीरुरपण्डितः ॥ १७ ॥
पाण्डुपुत्र धनंजय! जो धर्मके विभागको जाननेवाला है, वह कभी ऐसा नहीं कर सकता, जैसा कि यहाँ आज तुम करना चाहते हो। वास्तवमें तुम धर्मभीरु होनेके साथ ही बुद्धिहीन भी हो ॥ १७ ॥

अकार्याणां क्रियाणां च संयोगं यः करोति वै ।
कार्याणामक्रियाणां च स पार्थ पुरुषाधमः ॥ १८ ॥
पार्थ! जो करनेयोग्य होनेपर भी असाध्य हों तथा जो साध्य होनेपर भी निषिद्ध हों ऐसे कर्मोंसे जो सम्बन्ध जोड़ता है, वह पुरुषोंमें अधम माना गया है ॥ १८ ॥

अनुसृत्य तु ये धर्मं कथयेयुरुपस्थिताः ।
समासविस्तरविदां न तेषां वेत्सि निश्चयम् ॥ १९ ॥
जो स्वयं धर्मका अनुसरण एवं आचरण करके शिष्योंद्वारा उपासित होकर उन्हें धर्मका उपदेश देते हैं; धर्मके संक्षेप एवं विस्तारको जाननेवाले उन गुरुजनोंका इस विषयमें क्या निर्णय है, इसे तुम नहीं जानते ॥ १९ ॥

अनिश्चयज्ञो हि नरः कार्याकार्यविनिश्चये ।
अवशो मुह्यते पार्थ यथा त्वं मूढ एव तु ॥ २० ॥
पार्थ! उस निर्णयको न जाननेवाला मनुष्य कर्तव्य और अकर्तव्यके निश्चयमें तुम्हारे ही समान असमर्थ, विवेकशून्य एवं मोहित हो जाता है ॥ २० ॥

न हि कार्यमकार्यं वा सुखं ज्ञातुं कथंचन ।
श्रुतेन ज्ञायते सर्वं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥ २१ ॥
कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान किसी तरह भी अनायास ही नहीं हो जाता है। वह सब शास्त्रसे जाना जाता है और शास्त्रका तुम्हें पता ही नहीं है ॥ २१ ॥

अविज्ञानाद् भवान् यच्च धर्मं रक्षति धर्मवित् ।