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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

अध्याय (पृष्ठ 2108)

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धर्मराजके चरणोंमें श्रीकृष्ण एवं अर्जुन प्रणाम कर रहे हैं

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महासत्त्वौ हि तौ दृष्ट्वा सहितौ केशवार्जुनौ । हतमाधिरथिं मेने संख्ये गाण्डीवधन्वना ॥ २२ ॥ एक साथ आये हुए महान् शक्तिशाली श्रीकृष्ण और अर्जुनको देखकर उन्हें यह पक्का विश्वास हो गया था कि गाण्डीवधारी अर्जुनने युद्धस्थलमें अधिरथपुत्र कर्णको मार डाला है ॥ २२ ॥

तावभ्यनन्दत् कौन्तेयः साम्ना परमवल्गुना । स्मितपूर्वममित्रघ्नं पूजयन् भरतर्षभ ॥ २३ ॥ भरतश्रेष्ठ! यही सोचकर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने मुसकराकर शत्रुसूदन श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए परम मधुर और सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरं प्रति श्रीकृष्णार्जुनागमे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरके पास श्रीकृष्ण और अर्जुनका आगमनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2110)

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षट्षष्टितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका अर्जुनसे भ्रमवश कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त पूछना

युधिष्ठिर उवाच

स्वागतं देवकीमातः स्वागतं ते धनंजय ।
प्रियं मे दर्शनं गाढं युवयोरच्युतार्जुनौ ॥ १ ॥
अक्षताभ्यामरिष्टाभ्यां हतः कर्णो महारथः ।

युधिष्ठिर बोले—देवकीनन्दन! तुम्हारा स्वागत हो। धनंजय! तुम्हारा भी स्वागत है। श्रीकृष्ण और अर्जुन! इस समय तुम दोनोंका दर्शन मुझे अत्यन्त प्रिय लगा है; क्योंकि तुम दोनोंने स्वयं किसी प्रकारकी क्षति न उठाकर सकुशल रहते हुए महारथी कर्णको मार डाला है ॥ १ १/२ ॥

आशीविषसमं युद्धे सर्वशस्त्रविशारदम् ॥ २ ॥
अग्रगं धार्तराष्ट्राणां सर्वेषां शर्म वर्म च ।
रक्षितं वृषसेनेन सुषेणेन च धन्विना ॥ ३ ॥

कर्ण युद्धमें विषधर सर्पके समान भयंकर, सम्पूर्ण शस्त्र-विद्याओंमें निपुण तथा कौरवोंका अगुआ था। वह शत्रुपक्षमें सबका कल्याण-साधक और कवच बना हुआ था। वृषसेन और सुषेण-जैसे धनुर्धर उसकी रक्षा करते थे ॥ २-३ ॥

अनुज्ञातं महावीर्यं रामेणास्त्रे सुदुर्जयम् ।
अग्र्यं सर्वस्य लोकस्य रथिनं लोकविश्रुतम् ॥ ४ ॥

परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके वह महान् शक्तिशाली और अत्यन्त दुर्जय हो गया था। समस्त संसारका सर्वश्रेष्ठ रथी एवं विश्वविख्यात वीर था ॥

त्रातारं धार्तराष्ट्राणां गन्तारं वाहिनीमुखे ।
हन्तारं परसैन्यानाममित्रगणमर्दनम् ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्रपुत्रोंका रक्षक, सेनाके मुहानेपर जाकर युद्ध करनेवाला, शत्रुसैनिकोंका संहार करनेमें समर्थ तथा विरोधियोंका मान मर्दन करनेवाला था ॥ ५ ॥

दुर्योधनहिते युक्तमस्मद्दुःखाय चोद्यतम् ।
अप्रधृष्यं महायुद्धे देवैरपि सवासवैः ॥ ६ ॥

वह सदा दुर्योधनके हितमें संलग्न रहकर हम-लोगोंको दुःख देनेके लिये उद्यत रहता था। महायुद्धमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उसे परास्त नहीं कर सकते थे ॥ ६ ॥

अनलानिलयोस्तुल्यं तेजसा च बलेन च ।

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पातालमिव गम्भीरं सुहृदां नन्दिवर्धनम् ॥ ७ ॥
अन्तकं मम मित्राणां हत्वा कर्णं महामृधे ।
दिष्ट्या युवामनुप्राप्तौ जित्वासुरमिवामरौ ॥ ८ ॥
वह तेजमें अग्नि, बलमें वायु और गम्भीरतामें पातालके समान था। अपने मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाला और मेरे मित्रोंके लिये यमराजके समान था। किसी असुरको जीतकर आये हुए दो देवताओंके समान तुम दोनों मित्र महासमरमें कर्णको मारकर यहाँ आ गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ७-८ ॥
घोरं युद्धमदीनेन मया ह्यद्याच्युतार्जुनौ ।
कृतं तेनान्तकेनेव प्रजाः सर्वा जिघांसता ॥ ९ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन! सम्पूर्ण प्रजाका संहार करनेकी इच्छा रखनेवाले कालके समान उस कर्णने आज मेरे साथ घोर युद्ध किया था। फिर भी मैंने उसमें दीनता नहीं दिखायी ॥ ९ ॥
तेन केतुश्च मे छिन्नो हतौ च पार्ष्णिसारथी ।
हतवाहस्ततश्चास्मि युयुधानस्य पश्यतः ॥ १० ॥
धृष्टद्युम्नस्य यमयोर्वीरस्य च शिखण्डिनः ।
पश्यतां द्रौपदेयानां पञ्चालानां च सर्वशः ॥ ११ ॥
उसने सात्यकि, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव, वीर शिखण्डी, द्रौपदीपुत्र तथा पांचालोंके देखते-देखते मेरी ध्वजा काट डाली, पार्श्वरक्षकोंको मार डाला और मेरे घोड़ोंका भी संहार कर डाला था ॥ १०-११ ॥
एताञ्जित्वा महावीर्यः कर्णः शत्रुगणान् बहून् ।
जितवान् मां महाबाहो यतमानो महारणे ॥ १२ ॥
महाबाहो! महायुद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले महापराक्रमी कर्णने इन बहुसंख्यक शत्रुगणोंको परास्त करके मुझपर विजय पायी थी ॥ १२ ॥
अभिसृत्य च मां युद्धे परुषाण्युक्तवान् बहु ।
तत्र तत्र युधां श्रेष्ठ परिभूय न संशयः ॥ १३ ॥
भीमसेनप्रभावात्तु यज्जीवामि धनंजय ।
बहुनात्र किमुक्तेन नाहं तत् सोढुमुत्सहे ॥ १४ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ वीर! उसने युद्धमें मेरा पीछा करके जहाँ-तहाँ मुझे अपमानित करते हुए बहुत-से कटुवचन सुनाये हैं—इसमें संशय नहीं है। धनंजय! मैं इस समय भीमसेनके प्रभावसे ही जीवित हूँ। यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ? मैं उस अपमानको किसी प्रकार सह नहीं सकता ॥ १३-१४ ॥
त्रयोदशाहं वर्षाणि यस्माद् भीतो धनंजय ।
न स्म निद्रां लभे रात्रौ न चाहनि सुखं क्वचित् ॥ १५ ॥

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अर्जुन! मैं जिससे भयभीत होकर तेरह वर्षोंतक न तो रातमें अच्छी तरह नींद ले सका और न दिनमें ही कहीं सुख पा सका ॥ १५ ॥

तस्य द्वेषेण संयुक्तः परिदह्ये धनंजय ।
आत्मनो मरणे यातो वार्ध्रीणस इव द्विपः ॥ १६ ॥
धनंजय! मैं उसके द्वेषसे निरन्तर जलता रहा। जैसे वार्ध्रीणस नामक पशु अपनी मौतके लिये ही वधस्थानमें पहुँच जाय, उसी प्रकार मैं भी अपनी मृत्युके लिये कर्णका सामना करने चला गया था ॥ १६ ॥

तस्यायमगमत् कालश्चिन्तयानस्य मे चिरम् ।
कथं कर्णो मया शक्यो युद्धे क्षपयितुं भवेत् ॥ १७ ॥
मैं कर्णको युद्धमें कैसे मार सकता हूँ, यही सोचते हुए मेरा यह दीर्घकाल व्यतीत हुआ है ॥ १७ ॥

जाग्रत्स्वपंश्च कौन्तेय कर्णमेव सदा ह्यहम् ।
पश्यामि तत्र तत्रैव कर्णभूतमिदं जगत् ॥ १८ ॥
कुन्तीनन्दन! मैं जागते और सोते समय सदा कर्णको ही देखा करता था। यह सारा जगत् मेरे लिये जहाँ-तहाँ कर्णमय हो रहा था ॥ १८ ॥

यत्र यत्र हि गच्छामि कर्णाद् भीतो धनंजय ।
तत्र तत्र हि पश्यामि कर्णमेवाग्रतः स्थितम् ॥ १९ ॥
धनंजय! मैं जहाँ-जहाँ भी जाता, कर्णसे भयभीत होनेके कारण सदा उसीको अपने सामने खड़ा देखता था ॥

सोऽहं तेनैव वीरेण समरेष्वपलायिना ।
सहयः सरथः पार्थ जित्वा जीवन् विसर्जितः ॥ २० ॥
पार्थ! मैं समरभूमिमें कभी पीठ न दिखानेवाले उसी वीर कर्णके द्वारा रथ और घोड़ोंसहित परास्त करके केवल जीवित छोड़ दिया गया हूँ ॥ २० ॥

को नु मे जीवितेनार्थो राज्येनार्थो भवेत् पुनः ।
ममैवं विक्षतस्याद्य कर्णेनाहवशोभिना ॥ २१ ॥
अब मुझे इस जीवनसे तथा राज्यसे क्या प्रयोजन है? जब कि आज युद्धमें शोभा पानेवाले कर्णने मुझे इस प्रकार क्षत-विक्षत कर डाला है ॥ २१ ॥

न प्राप्तपूर्वं यद् भीष्मात् कृपद्रोणाच्च संयुगे ।
तत् प्राप्तमद्य मे युद्धे सूतपुत्रान्महारथात् ॥ २२ ॥
पहले कभी भीष्म, द्रोण और कृपाचार्यसे भी मुझे युद्धस्थलमें जो अपमान नहीं प्राप्त हुआ था, वही आज महारथी सूतपुत्रसे युद्धमें प्राप्त हो गया है ॥ २२ ॥

स त्वां पृच्छामि कौन्तेय यथाद्य कुशलं तथा ।
तन्ममाचक्ष्व कात्स्न्येन यथा कर्णो हतस्त्वया ॥ २३ ॥

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कुन्तीनन्दन! इसीलिये मैं तुमसे पूछता हूँ कि आज जिस प्रकार सकुशल रहकर तुमने कर्णको मारा है, वह सारा समाचार मुझे पूर्णरूपसे बताओ॥ २३॥

शक्रतुल्यबलो युद्धे यमतुल्यः पराक्रमे।
रामतुल्यस्तथास्त्रेण स कथं वै निषूदितः॥ २४॥

जो युद्धमें इन्द्रके समान बलवान्, यमराजके समान पराक्रमी और परशुरामजीके समान अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता था, वह कर्ण कैसे मारा गया॥ २४॥

महारथः समाख्यातः सर्वयुद्धविशारदः।
धनुर्धराणां प्रवरः सर्वेषामेकपूरुषः॥ २५॥
पूजितो धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण महाबलः।
त्वदर्थमेव राधेयः स कथं निहतस्त्वया॥ २६॥

जो सम्पूर्ण युद्धकी कलामें कुशल, विख्यात महारथी, धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ तथा सब शत्रुओंमें प्रधान पुरुष था, जिसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रने तुम्हारा सामना करनेके लिये ही सम्मानपूर्वक रखा था, वह महाबली राधापुत्र कर्ण तुम्हारे द्वारा कैसे मारा गया?॥ २५-२६॥

धार्तराष्ट्रो हि योधेषु सर्वेष्वेव सदारर्जुन।
तव मृत्युं रणे कर्णं मन्यते पुरुषर्षभ॥ २७॥

पुरुषप्रवर अर्जुन! दुर्योधन रणक्षेत्रमें सम्पूर्ण योद्धाओंमेंसे कर्णको ही तुम्हारी मृत्यु मानता था॥ २७॥

स त्वया पुरुषव्याघ्र कथं युद्धे निषूदितः।
तन्ममाचक्ष्व कौन्तेय यथा कर्णो हतस्त्वया॥ २८॥

कुन्तीपुत्र! पुरुषसिंह! तुमने कैसे युद्धमें उस कर्णको मारा है? कर्ण जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा मारा गया है, वह सब समाचार मुझे बताओ॥ २८॥

युध्यमानस्य च शिरः पश्यतां सुहृदां हृतम्।
त्वया पुरुषशार्दूल सिंहेनेव यथा रुरोः॥ २९॥

पुरुषसिंह! जैसे सिंह रुरु नामक मृगका मस्तक काट लेता है, उसी प्रकार तुमने समस्त सुहृदोंके देखते-देखते जो जूझते हुए कर्णका सिर धड़से अलग कर दिया है, वह किस प्रकार सम्भव हुआ॥ २९॥

यः पर्युपासीत् प्रदिशो दिशश्च
त्वां सूतपुत्रः समरे परीप्सन्।
दित्सुः कर्णः समरे हस्तिषड्गवं
स हीदानीं कङ्कपत्रैः सुतीक्ष्णैः॥ ३०॥
त्वया रणे निहतः सूतपुत्रः
कच्चिच्छेते भूमितले दुरात्मा।
प्रियश्च मे परमो वै कृतोऽयं

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त्वया रणे सूतपुत्रं निहत्य ॥ ३१ ॥ अर्जुन! समरांगणमें जो सूतपुत्र कर्ण सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंमें तुम्हें पानेके लिये चक्कर लगाता था और तुम्हारा पता बतानेवालेको हाथीके समान छः बैल देना चाहता था, वही दुरात्मा सूतपुत्र क्या इस समय रणभूमिमें तुम्हारे द्वारा कंकपत्रयुक्त तीखे बाणोंसे मारा जाकर पृथ्वीपर सो रहा है? आज रणक्षेत्रमें सूतपुत्रको मारकर तुमने मेरा यह परम प्रिय कार्य पूर्ण किया है? ।। ३०-३१ ।।

यः सर्वतः पर्यपतत्त्वदर्थे सदार्चितो गर्वितः सूतपुत्रः । स शूरमानी समरे समेत्य कच्चित्त्वया निहतः संयुगेऽसौ ॥ ३२ ॥ जो सदा सम्मानित होकर घमंडमें भरा हुआ सूतपुत्र तुम्हारे लिये सब ओर धावा किया करता था, अपनेको शूरवीर माननेवाले उस कर्णको समरांगणमें उसके साथ युद्ध करके क्या तुमने मार डाला है? ।। ३२ ।।

रौक्मं वरं हस्तिगजाश्वयुक्तं रथं प्रदित्सुर्यः परेभ्यस्त्वदर्थे । सदा रणे स्पर्धते यः स पापः कच्चित्त्वया निहतस्तात युद्धे ॥ ३३ ॥ तात! जो रणक्षेत्रमें तुम्हारा पता बतानेके लिये दूसरोंको हाथी-घोड़ोंसे युक्त सोनेका बना हुआ सुन्दर रथ देनेका हौसला रखता और सदा तुमसे होड़ लगाता था, वह पापी क्या युद्धस्थलमें तुम्हारे द्वारा मार डाला गया? ।। ३३ ।।

योऽसौ सदा शूरमदेन मत्तो विकत्थते संसदि कौरवाणाम् । प्रियोऽत्यर्थं तस्य सुयोधनस्य कच्चित् सपापो निहतस्त्वयाद्य ॥ ३४ ॥ जो शौर्यके मदसे उन्मत्त हो कौरवोंकी सभामें सदा बढ़-बढ़कर बातें बनाया करता था और दुर्योधनको अत्यन्त प्रिय था, क्या उस पापी कर्णको तुमने आज मार डाला? ।।

कच्चित् समागम्य धनुःप्रयुक्तै- स्त्वत्प्रेषितैर्लोहिताङ्गैर्विहङ्गैः । शेते स पापः सुविभिन्नगात्रः कच्चिद् भग्नौ धार्तराष्ट्रस्य बाहू ॥ ३५ ॥ क्या आज युद्धमें तुमसे भिड़कर तुम्हारे द्वारा धनुषसे छोड़े गये लाल अंगोंवाले आकाशचारी बाणोंसे सारा शरीर छिन्न-भिन्न हो जोनेके कारण वह पापी कर्ण आज पृथ्वीपर पड़ा है? क्या उसके मरनेसे दुर्योधनकी दोनों बाँहें टूट गयीं? ।। ३५ ।।

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योऽसौ सदा श्लाघते राजमध्ये दुर्योधनं हर्षयन् दर्पपूर्णः । अहं हन्ता फाल्गुनस्येति मोहात् कच्चिद्वचस्तस्य न वै तथा तत् ॥ ३६ ॥ जो राजाओंके बीचमें दुर्योधनका हर्ष बढ़ाता हुआ घमंडमें भरकर सदा मोहवश यह डींग हाँकता था कि मैं अर्जुनका वध कर सकता हूँ। क्या उसकी वह बात आज निष्फल हो गयी? ॥ ३६ ॥

नाहं पादौ धावयिष्ये कदाचित् यावत् स्थितः पार्थ इत्यल्पबुद्धेः । व्रतं तस्यैतत् सर्वदा शक्रसूनो कच्चित् त्वया निहतः सोऽद्य कर्णः ॥ ३७ ॥ इन्द्रकुमार! उस मन्दबुद्धि कर्णने सदाके लिये यह व्रत ले रखा था कि जबतक कुन्तीकुमार अर्जुन जीवित हैं तबतक मैं दूसरोंसे पैर नहीं धुलाऊँगा। क्या उस कर्णको तुमने आज मार डाला? ॥ ३७ ॥

योऽसौ कृष्णामब्रवीद् दुष्टबुद्धिः कर्णः सभायां कुरुवीरमध्ये । किं पाण्डवांस्त्वं न जहासि कृष्णे सुदुर्बलान् पतितान् हीनसत्त्वान् ॥ ३८ ॥ जिस दुष्टबुद्धिवाले कर्णने कौरव-वीरोंके बीच भरी सभामें द्रौपदीसे कहा था कि 'कृष्णे! तू इन अत्यन्त दुर्बल, पतित और शक्तिहीन पाण्डवोंको छोड़ क्यों नहीं देती?' ॥

योऽसौ कर्णः प्रत्यजानात्त्वदर्थे नाहं हत्वा सह कृष्णेन पार्थम् । इहोपयातेति स पापबुद्धिः कच्चिच्छेते शरसम्भिन्नगात्रः ॥ ३९ ॥ 'जिस कर्णने तुम्हारे लिये यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आज मैं श्रीकृष्णसहित अर्जुनको मारे बिना यहाँ नहीं लौटूँगा' क्या वह पापात्मा तुम्हारे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़ा है? ॥ ३९ ॥

कच्चित् संग्रामो विदितो वै तवायं समागमे सृञ्जयकौरवाणाम् । यत्रावस्थामीदृशीं प्रापितोऽहं कच्चित् त्वया सोऽद्य हतो दुरात्मा ॥ ४० ॥ क्या तुम्हें आजके संघर्षमें सृञ्जयों और कौरवोंका जो यह संग्राम हुआ था, उसका समाचार ज्ञात हुआ है, जिसमें मैं ऐसी दुर्दशाको पहुँचा दिया गया। क्या तुमने आज उस

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दुरात्मा कर्णको मार डाला? ।। ४० ।। कच्चित्त्वया तस्य सुमन्दबुद्धे- र्गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैर्ज्वलद्भिः । सकुण्डलं भानुमदुत्तमाङ्गं कायात् प्रकृत्तं युधि सव्यसाचिन् ।। ४१ ।। सव्यसाची अर्जुन! क्या तुमने युद्धस्थलमें गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये प्रज्वलित बाणोंद्वारा उस मन्दबुद्धि कर्णके कुण्डलमण्डित तेजस्वी मस्तकको धड़से काट गिराया? ।। ४१ ।। यत्तन्मया बाणसमर्पितेन ध्यातोऽसि कर्णस्य वधाय वीर । तन्मे त्वया कच्चिदमोधमद्य ध्यानं कृतं कर्णनिपातनेन ।। ४२ ।। वीर! जिस समय मैं बाणोंसे घायल कर दिया गया, उस समय कर्णके वधके लिये मैंने तुम्हारा चिन्तन किया था। क्या तुमने कर्णको धराशायी करके मेरे उस चिन्तनको आज सफल बना दिया? ।। ४२ ।। यद् दर्पपूर्णः स सुयोधनोऽस्मा- नुदीक्षते कर्णसमाश्रयेण । कच्चित् त्वया सोऽद्य समाश्रयोऽस्य भग्नः पराक्रम्य सुयोधनस्य ।। ४३ ।। कर्णका आश्रय लेकर दुर्योधन जो बड़े घमंडमें भरकर हमलोगोंकी ओर देखा करता था। क्या तुमने दुर्योधनके उस महान् आश्रयको आज पराक्रम करके नष्ट कर दिया? ।। ४३ ।। यो नः पुरा षण्ढतिलानवोचत् सभामध्ये कौरवाणां समक्षम् । स दुर्मतिः कच्चिदुपेत्य संख्ये त्वया हतः सूतपुत्रो ह्यमर्षी ।। ४४ ।। जिसने पूर्वकालमें सभाभवनके भीतर कौरवोंकी आँखोंके सामने हमें थोथे तिलोंके समान नपुंसक बताया था वह अमर्षशील दुर्बुद्धि सूतपुत्र क्या आज युद्धमें आकर तुम्हारे हाथसे मारा गया? ।। ४४ ।। यः सूतपुत्रः प्रहसन् दुरात्मा पुराब्रवीन्निर्जितां सौबलेन । स्वयं प्रसह्यानय याज्ञसेनी- मपीह कच्चित् स हतस्त्वयाद्य ।। ४५ ।।

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जिस दुरात्मा सूतपुत्र कर्णने हँसते-हँसते पहले दुःशासनसे यह बात कही थी कि 'सुबलपुत्रके द्वारा जीती हुई द्रुपदकुमारीको तुम स्वयं जाकर बलपूर्वक यहाँ ले आओ, क्या तुमने आज उसे मार डाला? ॥ ४५ ॥

यः शस्त्रभृच्छ्रेष्ठतमः पृथिव्यां पितामहं व्याक्षिपदल्पचेताः । संख्यायमानोऽर्धरथः स कच्चित् त्वया हतोऽद्याधिरथिर्महात्मन् ॥ ४६ ॥

महात्मन्! जो पृथ्वीपर समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठतम समझा जाता था तथा जिस मूर्खने अर्धरथी गिना जानेपर पितामह भीष्मके ऊपर महान् आक्षेप किया था, उस अधिरथपुत्रको क्या तुमने आज मार डाला? ॥ ४६ ॥

अमर्षजं निकृतिसमीरणेरितं हृदि स्थितं ज्वलनमिमं सदा मम । हतो मया सोऽद्य समेत्य कर्ण इति ब्रुवन् प्रशमयसेऽद्य फाल्गुन ॥ ४७ ॥

फाल्गुन! मेरे हृदयमें जिस कर्णकी शठतारूपी वायुसे प्रेरित हो अमर्षकी आग सदा प्रज्वलित रहती है 'उस कर्णको आज युद्धमें पाकर मैंने मार डाला' ऐसा कहते हुए क्या तुम आज मेरी उस अताको बुझा दोगे? ।।

ब्रवीहि मे दुर्लभमेतदद्य कथं त्वया निहतः सूतपुत्रः । अनुध्याये त्वां सततं प्रवीर वृत्रे हतेऽसौ भगवानिवेन्द्रः ॥ ४८ ॥

बोलो, मेरे लिये यह समाचार अत्यन्त दुर्लभ है। वीरवर! तुमने सूतपुत्रको कैसे मारा? मैं वृत्रासुरके मारे जानेपर भगवान् इन्द्रके समान सदा तुम्हारे विजयी स्वरूपका चिन्तन करता हूँ ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2118)

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सप्तषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनका युधिष्ठिरसे अबतक कर्णको न मार सकनेका कारण बताते हुए उसे मारनेके लिये प्रतिज्ञा करना

संजय उवाच

तद् धर्मशीलस्य वचो निशम्य
राज्ञः क्रुद्धस्यातिरथो महात्मा।
उवाच दुर्धर्षमदीनसत्त्वं
युधिष्ठिरं जिष्णुरनन्तवीर्यः॥ १॥

संजय कहते हैं— राजन्! क्रोधमें भरे हुए धर्मात्मा नरेशकी वह बात सुनकर अनन्त पराक्रमी अतिरथी महात्मा विजयशील अर्जुनने उदारचित्त एवं दुर्जय राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा॥ १॥

अर्जुन उवाच

संशप्तकैर्युध्यमानस्य मेऽद्य
सेनाग्रयायी कुरुसैन्येषु राजन्।
आशीविषाभान् खगमान् प्रमुञ्चन्
द्रौणिः पुरस्तात् सहसाभ्यतिष्ठत्॥ २॥

राजन्! आज जब मैं संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय कौरव-सेनाका अगुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंका प्रहार करता हुआ सहसा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया॥ २॥

दृष्ट्वा रथं मेघरवं ममैव
समस्तसेना च रणेऽभ्यतिष्ठत्।
तेषामहं पञ्च शतानि हत्वा
ततो द्रौणिमगमं पार्थिवाग्र्य॥ ३॥

भूपालशिरोमणे! इधर कौरवोंकी सारी सेना मेघके समान गम्भीर घर्घर ध्वनि करनेवाले मेरे रथको देखकर युद्धके लिये डटकर खड़ी हो गयी, तब मैंने उस सेनामेंसे पाँच सौ वीरोंका वध करके आचार्यपुत्रपर आक्रमण किया॥ ३॥

स मां समासाद्य नरेन्द्र यत्तः
समभ्ययात् सिंहमिव द्विपेन्द्रः।
अकार्षीच्च रथिनामुज्जिहीर्षां
महाराज वध्यतां कौरवाणाम्॥ ४॥

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नरेन्द्र! जैसे गजराज सिंहकी ओर दौड़े, उसी प्रकार अश्वत्थामाने मुझे सामने पाकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो मुझपर आक्रमण किया। महाराज! उसने मारे जाते हुए कौरवरथियोंका उद्धार करनेकी इच्छा की ॥ ४ ॥

ततो रणे भारत दुष्प्रकम्प्य
आचार्यपुत्रः प्रवरः कुरूणाम् ।
मामर्दयामास शितैः पृषत्कै-
र्जनार्दनं चैव विषाग्निकल्पैः ॥ ५ ॥

भारत! तदनन्तर कौरवोंके प्रधान वीर दुर्धर्ष आचार्यपुत्रने रणक्षेत्रमें विष और अग्निके समान भयंकर तीखे बाणोंद्वारा मुझे और श्रीकृष्णको पीड़ित करना प्रारम्भ किया ॥ ५ ॥

अष्टागवाष्ट शतानि बाणान्
मया प्रयुद्धस्य वहन्ति तस्य ।
तांस्तेन मुक्तानहमस्य बाणै-
र्व्यनाशयं वायुरिवाभ्रजालम् ॥ ६ ॥

मेरे साथ युद्ध करते समय अश्वत्थामाके लिये आठ-आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़े सैकड़ों-हजारों बाण ढोते रहते थे। उसके चलाये हुए उन सभी बाणोंको मैंने अपने बाणोंसे मारकर उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे वायु मेघोंके समूहको छिन्न-भिन्न कर देती है ॥

ततोऽपरान् बाणसंघाननेका-
नाकर्णपूर्णायतविप्रमुक्तान् ।
ससर्ज शिक्षास्त्रबलप्रयत्नै-
स्तथा यथा प्रावृषि कालमेघः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी काली घटा जलकी वर्षा करती है, उसी प्रकार शिक्षा, अस्त्र, बल और प्रयत्नोंद्वारा धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये बहुत-से बाणसमूह उसने बरसाये ॥ ७ ॥

नैवाददानं न च संदधानं
जानीमहे कतरेणास्यतीति ।
वामेन वा यदि वा दक्षिणेन
स द्रोणपुत्रः समरे पर्यवर्तत् ॥ ८ ॥

द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरभूमिमें चारों ओर चक्कर लगाने लगा। वह कब बाण लेता, कब उसे धनुषपर रखता और कब किस हाथसे बायें अथवा दायेंसे छोड़ता था, यह हमलोग नहीं जान पाते थे ॥ ८ ॥

तस्याततं मण्डलमेव सज्यं
प्रदृश्यते कार्मुकं द्रोणसूनोः ।
सोऽविध्यन्मां पञ्चभिर्द्रोणपुत्रः

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शितैः शरैः पञ्चभिर्वासुदेवम् ॥ ९ ॥
केवल प्रत्यंचासहित तना हुआ उस द्रोणपुत्रका मण्डलाकार धनुष ही दिखायी देता था। उसने पाँच तीखे बाणोंसे मुझको और पाँचसे श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया ॥ ९ ॥
अहं हि तं त्रिंशता वज्रकल्पैः
समार्दयं निमिषस्यान्तरेण ।
क्षणाच्छ्वावित्समरूपो बभूव
समार्दितो मद्विसृष्टैः पृषत्कैः ॥ १० ॥
तब मैंने पलक मारते-मारते वज्रके समान तीस सुदृढ़ बाणोंद्वारा उसे क्षणभरमें पीड़ित कर दिया। मेरे छोड़े हुए बाणोंसे घायल होनेपर उसका स्वरूप काँटोंसे भरे साहीके समान दिखायी देने लगा ॥ १० ॥
स विक्षरन् रुधिरं सर्वगात्रे
रथानीकं सूतसूनोर्विवेश ।
मयाभिभूतान् सैनिकानां प्रबर्हा-
नसौ प्रपश्यन् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ११ ॥
तब वह सारे शरीरसे खूनकी धारा बहाता हुआ मेरे द्वारा पीड़ित हुए समस्त सैनिक शिरोमणियोंको खूनसे लथपथ देखकर सूतपुत्र कर्णकी रथसेनामें घुस गया ॥ ११ ॥
ततोऽभिभूतं युधि वीक्ष्य सैन्यं
वित्रस्तयोधं द्रुतवाजिनागम् ।
पञ्चाशता रथमुख्यैः समेत्य
कर्णस्त्वरन् मामुपायात् प्रमाथी ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अपनी सेनाके योद्धाओंको भयसे आक्रान्त और हाथी-घोड़ोंको भागते देख पचास मुख्य-मुख्य रथियोंको साथ ले शत्रुओंको मथ डालनेवाला कर्ण बड़ी उतावलीके साथ मेरे पास आया ॥ १२ ॥
तान् सूदयित्वाहम्पास्य कर्ण
द्रष्टुं भवन्तं त्वरयाभियातः ।
सर्वे पञ्चाला ह्युद्विजन्ते स्म कर्णं
दृष्ट्वा गावः केसरिणं यथैव ॥ १३ ॥
उन पचासों रथियोंका संहार करके कर्णको छोड़कर मैं बड़ी उतावलीके साथ आपका दर्शन करनेके लिये चला आया हूँ। जैसे गौएँ सिंहको देखकर डर जाती हैं, उसी प्रकार सारे पांचाल-सैनिक कर्णको देखकर उद्विग्न हो उठते हैं ॥ १३ ॥
मृत्योरास्यं व्यात्तमिवाभिपद्य
प्रभद्रकाः कर्णमासाद्य राजन् ।
रथांस्तु तान् सप्तशतान् निमग्नां-

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स्तदा कर्णः प्राहिणोन्मृत्युसङ्ग ॥ १४ ॥

राजन्! मृत्युके फैले हुए मुँहके समान कर्णके पास पहुँचकर प्रभद्रकगण भारी संकटमें

पड़ गये। कर्णने युद्धके समुद्रमें डूबे हुए उन सात सौ रथियोंको तत्काल मृत्युके लोकमें भेज

दिया था ॥ १४ ॥

न चाप्यभूत् क्लान्तमनाः स राजन्

यावन्नास्मान् दृष्टवान् सूतपुत्रः ।

श्रुत्वा तु त्वां तेन दृष्टं समेत-

मश्वत्थाम्ना पूर्वतरं क्षतं च ॥ १५ ॥

मन्ये कालमपयानस्य राजन्

क्रूरात् कर्णात् तेऽहमचिन्त्यकर्मन् ।

अचिन्त्यकर्मा नरेश्वर! जबतक सूतपुत्रने हमलोगोंको नहीं देखा था, तबतक उसके

मनमें उद्वेग या खेद नहीं हुआ था। मैंने जब सुना कि उसने पहले आपपर दृष्टिपात किया

था और आपसे उसका युद्ध भी हुआ था, साथ ही उससे भी पहले अश्वत्थामाने आपको

क्षत-विक्षत कर दिया था, तब क्रूरकर्मा कर्णके सामनेसे आपका यहाँ चला आना ही मुझे

समयोचित प्रतीत हुआ ॥

मया कर्णस्यास्त्रमिदं पुरस्ताद्

युद्धे दृष्टं पाण्डव चित्ररूपम् ॥ १६ ॥

न ह्यन्योद्धा विद्यते सृञ्जयानां

महारथं योऽद्य सहेत कर्णम् ।

पाण्डुनन्दन! मैंने युद्धमें अपने सामने कर्णके इस विचित्र अस्त्रको देखा था। सृंजयोंमें

दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो आज महारथी कर्णका सामना कर सके ॥

शैनेयो मे सात्यकिश्चक्ररक्षौ

धृष्टद्युम्नश्चापि तथैव राजन् ॥ १७ ॥

युधामन्युश्चोत्तमौजाश्च शूरौ

पृष्ठतो मां रक्षतां राजपुत्रौ ।

राजन्! शिनिपौत्र सात्यकि और धृष्टद्युम्न मेरे चक्ररक्षक हों; युधामन्यु और उत्तमौजा

—ये दोनों शूरवीर राजकुमार मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ १७१/२ ॥

रथप्रवीरेण महानुभाव

द्विषत्सैन्ये वर्तता दुस्तरेण ॥ १८ ॥

समेत्याहं सपुत्रेण संख्ये

वृत्रेण वज्रीव नरेन्द्रमुख्य ।

योत्स्याम्यहं भारत सूतपुत्र-

मस्मिन् संग्रामे यदि वै दृश्यतेऽद्य ॥ १९ ॥

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महानुभाव! भरतवंशी नृपश्रेष्ठ! शत्रुसेनामें विद्यमान रथियोंमें प्रमुख वीर दुर्जय सूतपुत्र कर्णके साथ, यदि इस संग्राममें आज वह मुझे दीख जाय तो युद्धस्थलमें मिलकर मैं उसी तरह युद्ध करूँगा, जैसे वज्रधारी इन्द्रने वृत्रासुरके साथ किया था ।। १८-१९ ।।

आयाहि पश्याद्य युयुत्समानं
मां सूतपुत्रस्य रणे जयाय ।
महोरगस्येव मुखं प्रपन्नाः
प्रभद्रकाः कर्णमभिद्रवन्ति ।। २० ।।

आइये, देखिये, आज मैं रणभूमिमें सूतपुत्रपर विजय पानेके लिये युद्ध करना चाहता हूँ। प्रभद्रकगण कर्णपर धावा कर रहे हैं, ऐसा करके वे मानो अजगरके मुखमें पड़ गये हैं ।। २० ।।

षट्साहस्रा भारत राजपुत्राः
स्वर्गाय लोकाय रणे निमग्नाः ।
कर्णं न चेदद्य निहन्मि राजन्
सबान्धवं युध्यमानं प्रसह्य ।। २१ ।।
प्रतिश्रुत्याकुर्वतो वै गतिर्या
कष्टा याता तामहं राजसिंह ।

भारत! छः हजार राजकुमार स्वर्गलोकमें जानेके लिये युद्धके सागरमें मग्न हो गये हैं। राजन्! राजसिंह! यदि आज मैं बन्धुओंसहित युद्धमें तत्पर हुए कर्णको हठपूर्वक न मार डालूँ तो प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवालेको जो दुःखदायी गति प्राप्त होती है, उसीको मैं भी पाऊँगा ।।

आमन्त्रये त्वां ब्रूहि जयं रणे मे
पुरा भीमं धार्तराष्ट्रा ग्रसन्ते ।। २२ ।।
सौतिं हनिष्यामि नरेन्द्रसिंह
सैन्यं तथा शत्रुगणांश्च सर्वान् ।। २३ ।।

मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ। आप रणभूमिमें मेरी विजयका आशीर्वाद दीजिये। नरेन्द्रसिंह! धृतराष्ट्रके पुत्र भीमसेनको ग्रस लेनेकी चेष्टा कर रहे हैं। मैं इसके पहले ही सूतपुत्र कर्णको, उसकी सेनाको तथा सम्पूर्ण शत्रुओंको मार डालूँगा ।। २२-२३ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनवाक्ये सप्तषष्टितमोऽध्यायः ।। ६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2123)

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन

संजय उवाच

श्रुत्वा कर्णं कल्यमुदारवीर्यं
क्रुद्धः पार्थः फाल्गुनस्यामितौजाः ।
धनंजयं वाक्यमुवाच चेदं
युधिष्ठिरः कर्णशराभितप्तः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्णके बाणोंसे संतप्त हुए अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर अधिक बलशाली कर्णको सकुशल सुनकर अर्जुनपर कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

विप्रद्रुता तात चमूस्त्वदीया
तिरस्कृता चाद्य यथा न साधु ।
भीतो भीमं त्यज्य चायास्तथा त्वं
यन्नाशकः कर्णमथो निहन्तुम् ॥ २ ॥
‘तात! तुम्हारी सारी सेना भाग चली है। तुमने आज उसकी ऐसी उपेक्षा की है, जो किसी प्रकार अच्छी नहीं कही जा सकती। जब तुम कर्णको जीत नहीं सके तो भयभीत हो भीमसेनको वहीं छोड़कर यहाँ चले आये ॥ २ ॥

स्नेहस्त्वया पार्थ कृतः पृथाया
गर्भं समाविश्य यथा न साधु ।
त्यक्त्वा रणे यदपायाः स भीमं
यन्नाशकः सूतपुत्रं निहन्तुम् ॥ ३ ॥
‘पार्थ! तुमने कुन्तीके गर्भमें निवास करके भी अपने सगे भाईके प्रति ऐसा स्नेह निभाया, जिसे कोई अच्छा नहीं कह सकता; क्योंकि जब तुम सूतपुत्र कर्णके मारनेमें समर्थ न हो सके, तब भीमसेनको अकेले रणभूमिमें छोड़कर स्वयं वहाँसे चले आये ॥ ३ ॥

यत् तद् वाक्यं द्वैतवने त्वयोक्तं
कर्णं हन्तास्म्येकरथेन सत्यम् ।
त्यक्त्वा तं वै कथमद्यापयाततः
कर्णाद् भीतो भीमसेनं विहाय ॥ ४ ॥
‘तुमने द्वैतवनमें जो यह सत्य वचन कहा था कि ‘मैं एकमात्र रथके द्वारा युद्ध करके कर्णको मार डालूँगा’ उस प्रतिज्ञाको तोड़कर कर्णसे भयभीत हो भीमसेनको छोड़कर आज तुम रणभूमिसे लौट कैसे आये? ॥

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इदं यदि द्वैतवनेऽप्यचक्षः कर्णं योद्धुं न प्रशक्ये नृपेति । वयं ततः प्राप्तकालं च सर्वे कृत्यान्युपैष्याम तथैव पार्थ ॥ ५ ॥ ‘पार्थ! यदि तुमने द्वैतवनमें यह कह दिया होता कि ‘राजन्! मैं कर्णके साथ युद्ध नहीं कर सकूँगा' तो हम सब लोग समयोचित कर्तव्यका निश्चय करके उसीके अनुसार कार्य करते ॥ ५ ॥

मयि प्रतिश्रुत्य वधं हि तस्य न वै कृतं तच्च तथैव वीर । आनीय नः शत्रुमध्यं स कस्मात् समुत्क्षिप्य स्थण्डिले प्रत्यपिंषाः ॥ ६ ॥ ‘वीर! तुमने मुझसे कर्णके वधकी प्रतिज्ञा करके उसका उसी रूपमें पालन नहीं किया। यदि ऐसा ही करना था तो हमें शत्रुओंके बीचमें लाकर पत्थरकी वेदीपर पटककर पीस क्यों डाला? ॥ ६ ॥

अप्याशिष्म वयमर्जुन त्वयि यियासवो बहु कल्याणमिष्टम् । तन्नः सर्वं विफलं राजपुत्र फलार्थिनां विफलं इवातिपुष्पः ॥ ७ ॥ ‘राजकुमार अर्जुन! हमने बहुत-से मंगलमय अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर तुमपर आशा लगा रखी थी; परंतु फल चाहनेवाले मनुष्योंको अधिक फूलोंवाला फलहीन वृक्ष जैसे निराश कर देता है, उसी प्रकार तुमसे हमारी सारी आशा निष्फल हो गयी ॥ ७ ॥

प्रच्छादितं बडिशमिवामिषेण संछादितं गरलमिवाशनेन । अनर्थकं मे दर्शितवानसि त्वं राज्यार्थिनो राज्यरूपं विनाशम् ॥ ८ ॥ ‘मैं राज्य पाना चाहता था; किंतु तुमने मांससे ढके हुए वंशीके काँटे और भोजनसामग्रीसे आच्छादित हुए विषके समान मुझे राज्यके रूपमें अनर्थकारी विनाशका ही दर्शन कराया है ॥ ८ ॥

त्रयोदशेमा हि समाः सदा वयं त्वामन्वजीविष्म धनंजयाशया । काले वर्षं देवमिवोप्तबीजं तन्नः सर्वान् नरके त्वं न्यमज्जः ॥ ९ ॥

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'धनंजय! जैसे बोया हुआ बीज समयपर मेघद्वारा की हुई वर्षाकी प्रतीक्षामें जीवित रहता है, उसी प्रकार हमने तेरह वर्षोंतक सदा तुमपर ही आशा लगाकर जीवन धारण किया था; परंतु तुमने हम सब लोगोंको नरकमें डुबो दिया (भारी संकटमें डाल दिया) ॥ ९ ॥

यत्तत् पृथां वागुवाचान्तरिक्षे सप्ताहजाते त्वयि मन्दबुद्धे । जातः पुत्रो वासवविक्रमोऽयं सर्वान् शूरान् शात्रवान् जेष्यतीति ॥ १० ॥

'मन्दबुद्धि अर्जुन! तुम्हारे जन्म लिये अभी सात ही दिन बीते थे कि माता कुन्तीसे आकाशवाणीने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'देवि! तुम्हारा यह पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी पैदा हुआ है। यह अपने समस्त शूरवीर शत्रुओंको जीत लेगा' ॥ १० ॥

अयं जेता खाण्डवे देवसंघान् सर्वाणि भूतान्यपि चोत्तमौजाः । अयं जेता मद्रकलिङ्गकेकया- नयं कुरून् राजमध्ये निहन्ता ॥ ११ ॥

'यह उत्तम शक्तिसे सम्पन्न बालक खाण्डववनमें देवताओंके समूहों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर भी विजय प्राप्त करेगा। यह मद्र, कलिंग और केकयोंको जीतेगा तथा राजाओंकी मण्डलीमें कौरवोंका भी विनाश कर डालेगा ॥ ११ ॥

अस्मात् परो नो भविता धनुर्धरो नैनं भूतं किंचन जातु जेता । इच्छन्नयं सर्वभूतानि कुर्याद् वशे वशी सर्वसमाप्तविद्यः ॥ १२ ॥

'इससे बढ़कर दूसरा कोई धनुर्धर नहीं होगा। कोई भी प्राणी कभी भी इसे जीत नहीं सकेगा। यह अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखता हुआ सम्पूर्ण विद्याओंको प्राप्त कर लेगा और इच्छा करते ही सभी प्राणियोंको अपने अधीन कर सकेगा ॥ १२ ॥

कान्त्या शशाङ्कस्य जवेन वायोः स्थैर्येण मेरोः क्षमया पृथिव्याः । सूर्यस्य भासा धनदस्य लक्ष्म्या शौर्येण शक्रस्य बलेन विष्णोः ॥ १३ ॥

'यह चन्द्रमाकी कान्ति, वायुके वेग, मेरुकी स्थिरता, पृथ्वीकी क्षमा, सूर्यकी प्रभा, कुबेरकी लक्ष्मी, इन्द्रके शौर्य और भगवान् विष्णुके बलसे सम्पन्न होगा ॥ १३ ॥

तुल्यो महात्मा तव कुन्ति पुत्रो जातोऽदितेर्विष्णुरिवारिहन्ता ।

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स्वेषां जयाय द्विषतां वधाय ख्यातोऽमितौजाः कुलतन्तुकर्ता ॥ १४ ॥ ‘कुन्ति! तुम्हारा यह महामनापुत्र अदितिके गर्भसे प्रकट हुए शत्रुहन्ता भगवान् विष्णुके समान उत्पन्न हुआ है। यह अमितबलशाली बालक स्वजनोंकी विजय और शत्रुओंके वधके लिये प्रसिद्ध एवं अपनी कुलपरम्पराका प्रवर्तक होगा ॥ १४ ॥’

इत्यन्तरिक्षे शतशृङ्गमूर्ध्नि तपस्विनां शृण्वतां वागुवाच । एवंविधं तच्च नाभूत् तथा च देवापि नूनमनृतं वदन्ति ॥ १५ ॥ ‘शतशृंग पर्वतके शिखरपर तपस्वी महात्माओंके सुनते हुए आकाशवाणीने ये बातें कही थीं; परंतु उसका यह कथन सफल नहीं हुआ। निश्चय ही देवतालोग भी झूठ बोलते हैं ॥ १५ ॥’

तथा परेषामृषिसत्तमानां श्रुत्वा गिरः पूजयतां सदा त्वाम् । न संनतिं प्रैमि सुयोधनस्य न त्वां जानाम्याधिरथेर्भयार्तम् ॥ १६ ॥ ‘इसी प्रकार दूसरे महर्षि भी सदा तुम्हारी प्रशंसा करते हुए ऐसी ही बातें कहा करते थे। उनकी बातें सुनकर ही मैं दुर्योधनके सामने कभी नतमस्तक न हो सका; परंतु मैं यह नहीं जानता था कि तुम अधिरथपुत्र कर्णके भयसे पीड़ित हो जाओगे ॥ १६ ॥’

पूर्वं यदुक्तं हि सुयोधनेन न फाल्गुनः प्रमुखे स्थास्यतीति । कर्णस्य युद्धे हि महाबलस्य मौर्ख्यात् तु तन्नावबुद्धं मयाऽऽसीत् ॥ १७ ॥ ‘दुर्योधनने पहले ही जो यह बात कह दी थी कि ‘अर्जुन युद्धमें महाबली कर्णके सामने नहीं खड़े हो सकेंगे’ उसके इस कथनपर मैंने मूर्खतावश विश्वास नहीं किया था ॥ १७ ॥’

तेनाद्य तप्स्ये भृशमप्रमेयं यच्छत्रुवर्गे नरकं प्रविष्टः । तदैव वाच्योऽस्मि ननु त्वयाहं न योत्स्येऽहं सूतपुत्रं कथंचित् ॥ १८ ॥ ततो नाहं सृञ्जयान् केकयांश्च समानयेयं सुहृदो रणाय ।

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‘इसीलिये आज संतप्त हो रहा हूँ। शत्रुओंके समुदायमें फँसकर अत्यन्त असीम नरकतुल्य संकटमें पड़ गया हूँ। अर्जुन! तुम्हें पहले ही यह कह देना चाहिये था कि ‘मैं सूतपुत्र कर्णके साथ किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा’। वैसी दशामें मैं सृंजयों, केकयों तथा अन्यान्य सुहृदोंको युद्धके लिये आमन्त्रित नहीं करता।। १८½ ।।

एवं गते किंच मयाद्य शक्यं
कार्यं कर्तुं विग्रहे सूतजस्य ।। १९ ।।
तथैव राज्ञश्च सुयोधनस्य
ये वापि मां योद्धुकामाः समेताः ।
‘आज जब ऐसी परिस्थिति है, तब सूतपुत्र कर्ण, राजा दुर्योधन तथा अन्य जो लोग मेरे साथ युद्धकी इच्छासे एकत्र हुए हैं, उन सबके साथ छिड़े हुए इस संग्राममें मैं कौन-सा कार्य कर सकता हूँ।। १९½ ।।

धिगस्तु मज्जीवितमद्य कृष्ण
योऽहं वशं सूतपुत्रस्य यातः ।। २० ।।
मध्ये कुरूणां सुहृदां च मध्ये
ये चाप्यन्ये योद्धुकामाः समेताः ।
‘श्रीकृष्ण! मैं कौरवों, सुहृदों तथा अन्य जो लोग युद्धकी इच्छासे एकत्र हुए हैं, उन सबके बीचमें आज सूतपुत्र कर्णके अधीन हो गया। मेरे जीवनको धिक्कार है।।

(एकस्तु मे भीमसेनोऽद्य नाथो
येनाभिपन्नोऽस्मि रणे महाभये ।
विमोच्य मां चापि रुषान्वितस्ततः
शरेण तीक्ष्णेन बिभेद कर्णम् ।।
‘आज एकमात्र भीमसेन ही मेरे रक्षक हैं, जिन्होंने महान् भयदायक संग्राममें सब ओरसे मेरी रक्षा की है। उन्होंने मुझे संकटसे मुक्त करके अपने पैने बाणसे कर्णको बींध डाला था।

त्यक्त्वा प्राणान् समरे भीमसेन-
श्चक्रे युद्धं कुरुभिः समेतैः ।
गदाग्रहस्तो रुधिरोक्षिताङ्ग-
श्चरन् रणे काल इवान्तकाले ।।
असौ हि भीमस्य महान् निनादो
मुहुर्मुहुः श्रूयते धार्तराष्ट्रैः ॥)
‘भीमसेनका शरीर खूनसे नहा उठा था। फिर भी वे हाथमें गदा लेकर प्रलयकालके यमराजकी भाँति रणभूमिमें विचरते थे और प्राणोंका मोह छोड़कर समरांगणमें एकत्र हुए