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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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शरैस्त्रिभिश्च यन्तारं चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ ७ ॥
इसी प्रकार राजा युधिष्ठिरने भी राधापुत्र कर्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। फिर तीन बाणोंसे सारथिको और चारसे चारों घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ ७ ॥
चक्ररक्षौ तु पार्थस्य माद्रीपुत्रौ परंतपौ ।
तावप्यधावतां कर्णं राजानं मा वधीरिति ॥ ८ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले माद्रीकुमार नकुल और सहदेव राजा युधिष्ठिरके चक्ररक्षक थे। वे दोनों भी यह सोचकर कर्णकी ओर दौड़े कि यह राजा युधिष्ठिरका वध न कर डाले ॥ ८ ॥
तौ पृथक् शरवर्षाभ्यां राधेयमभ्यवर्षताम् ।
नकुलः सहदेवश्च परं यत्नमास्थितौ ॥ ९ ॥
नकुल और सहदेव दोनों भाई उत्तम प्रयत्नका सहारा लेकर राधापुत्र कर्णपर पृथक्-पृथक् बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ९ ॥
तथैव तौ प्रत्यविध्यत् सूतपुत्रः प्रतापवान् ।
भल्लाभ्यां शितधाराभ्यां महात्मानावरंदमौ ॥ १० ॥
इसी प्रकार प्रतापी सूतपुत्रने भी तेज धारवाले दो भल्लोंद्वारा शत्रुओंका दमन करनेवाले उन दोनों महामनस्वी वीरोंको घायल कर दिया ॥ १० ॥
दन्तवर्णान्स्तु राधेयो निजघान मनोजवान् ।
युधिष्ठिरस्य संग्रामे कालवालान् हयोत्तमान् ॥ ११ ॥
जिनकी पूँछ और गर्दनके बाल काले तथा शरीरका रंग श्वेत था और जो मनके समान तीव्र वेगसे चलनेवाले थे, युधिष्ठिरके उन उत्तम घोड़ोंको संग्रामभूमिमें राधापुत्र कर्णने मार डाला ॥ ११ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन शिरस्त्राणमपातयत् ।
कौन्तेयस्य महेष्वासः प्रहसन्निव सूतजः ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् महाधनुर्धर सूतपुत्रने हँसते हुए-से एक दूसरे भल्लके द्वारा कुन्तीकुमारके शिरस्त्राणको नीचे गिरा दिया ॥ १२ ॥
तथैव नकुलस्यापि हयान् हत्वा प्रतापवान् ।
ईषां धनुश्च चिच्छेद माद्रीपुत्रस्य धीमतः ॥ १३ ॥
इसी प्रकार प्रतापी कर्णने बुद्धिमान् माद्रीकुमार नकुलके भी घोड़ोंको मारकर ईषादण्ड और धनुषको भी काट दिया ॥ १३ ॥
तौ हताश्वौ हतरथौ पाण्डवौ भृशविक्षतौ ।
भ्रातारावारुरुहतुः सहदेवरथं तदा ॥ १४ ॥
घोड़ों एवं रथोंके नष्ट हो जानेपर अत्यन्त घायल हुए वे दोनों भाई पाण्डव उस समय सहदेवके रथपर जा चढ़े ॥ १४ ॥

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तौ दृष्ट्वा मातुलस्तत्र विरथौ परवीरहा । अभ्यभाषत राधेयं मद्रराजोऽनुकम्पया ॥ १५ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मामा मद्रराज शल्यने उन दोनों भाइयोंको रथहीन हुआ देख कृपापूर्वक राधापुत्र कर्णसे कहा— ॥ १५ ॥

योद्धव्यमद्य पार्थेन फाल्गुनेन त्वया सह । किमर्थं धर्मराजेन युध्यसे भृशरोषितः ॥ १६ ॥ ‘कर्ण! आज तुम्हें कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ युद्ध करना है। फिर अत्यन्त रोषमें भरकर धर्मराजके साथ किसलिये जूझ रहे हो? ॥ १६ ॥

क्षीणशस्त्रास्त्रकवचः क्षीणबाणो विबाणधिः । श्रान्तसारथिवाहश्च च्छन्नोऽस्त्रैररिभिस्तथा ॥ १७ ॥ पार्थमासाद्य राधेय उपहास्यो भविष्यसि । ‘इनके अस्त्र-शस्त्र और कवच नष्ट हो गये हैं। तीर और तरकस भी कट गये हैं। सारथि और घोड़े भी थके हुए हैं तथा शत्रुओंने इन्हें अस्त्रोंद्वारा आच्छादित कर दिया है। राधानन्दन! अर्जुनके सामने पहुँचकर तुम उपहासके पात्र बन जाओगे’ ॥ १७ १/२ ॥

एवमुक्तोऽपि कर्णस्तु मद्रराजेन संयुगे ॥ १८ ॥ तथैव कर्णः संरब्धो युधिष्ठिरमताडयत् । शरैस्तीक्ष्णैः पराविध्य माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १९ ॥ प्रहस्य समरे कर्णश्चकार विमुखं शरैः । युद्धस्थलमें मद्रराज शल्यके ऐसा कहनेपर भी कर्ण पूर्ववत् रोषमें भरकर युधिष्ठिरको बाणोंद्वारा पीड़ित करता रहा। माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेवको तीखे बाणोंसे घायल करके कर्णने हँसकर समरांगणमें बाणोंके प्रहारसे युधिष्ठिरको युद्धसे विमुख कर दिया ॥ १८-१९ १/२ ॥

ततः शल्यः प्रहस्येदं कर्णं पुनरुवाच ह ॥ २० ॥ रथस्थमतिसंरब्धं युधिष्ठिरवधे धृतम् । तब शल्यने हँसकर युधिष्ठिरके वधका निश्चय किये अत्यन्त क्रोधमें भरकर रथपर बैठे हुए कर्णसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ २० १/२ ॥

यदर्थं धार्तराष्ट्रेण सततं मानितो भवान् ॥ २१ ॥ तं पार्थं जहि राधेय किं ते हत्वा युधिष्ठिरम् । ‘राधापुत्र! दुर्योधनने जिनसे जूझनेके लिये तुम्हारा सदा सम्मान किया है, उन कुन्तीकुमार अर्जुनको मारो। युधिष्ठिरका वध करनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? ॥ २१ १/२ ॥

(हते ह्यस्मिन् ध्रुवं पार्थः सर्वाञ्जेष्यति नो रथान् । तस्मिन् हि धार्तराष्ट्रस्य निहते तु ध्रुवो जयः ॥

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‘इनके मारे जानेपर अर्जुन निश्चय ही हमारे सारे महारथियोंको जीत लेंगे। परंतु अर्जुनके मारे जानेपर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी विजय अवश्यम्भावी है। ध्वजोऽसौ दृश्यते तस्य रोचमानोंऽशुमानिव । एनं जहि महाबाहो किं ते हत्वा युधिष्ठिरम् ॥) ‘महाबाहो! अर्जुनका यह सूर्यके समान प्रकाशमान ध्वज दिखायी देता है। तुम इन्हींको मारो, युधिष्ठिरका वध करनेसे तुम्हारा क्या लाभ है? शङ्खयोर्ध्यायतोः शब्दः सुमहानेष कृष्णयोः ।। २२ ।। श्रूयते चापघोषोऽयं प्रावृषीवाम्बुदस्य ह । ‘श्रीकृष्ण और अर्जुन शंख बजा रहे हैं, जिनका यह महान् शब्द सुनायी पड़ता है। वर्षाकालके मेघकी गर्जनाके समान उनके धनुषका यह गम्भीर घोष कानोंमें पड़ रहा है ।। २२ १/२ ।। असौ निघ्नन् रथोदारानर्जुनः शरवृष्टिभिः ।। २३ ।। सर्वां ग्रसति नः सेनां कर्ण पश्यैनमाहवे । ‘कर्ण! ये अर्जुन अपने बाणोंकी वर्षासे बड़े-बड़े रथियोंका संहार करते हुए हमारी सारी सेनाको कालका ग्रास बना रहे हैं। युद्धस्थलमें इनकी ओर तो देखो ।। २३ १/२ ।। पृष्ठरक्षौ च शूरस्य युधामन्यूत्तमौजसौ ।। २४ ।। उत्तरं चास्य वै शूरश्चक्रं रक्षति सात्यकिः । धृष्टद्युम्नस्तथा चास्य चक्रं रक्षति दक्षिणम् ।। २५ ।। ‘शूरवीर अर्जुनके पृष्ठभागकी रक्षा युधामन्यु और उत्तमौजा कर रहे हैं। शौर्यसम्पन्न सात्यकि उनके उत्तर (बायें) चक्रकी रक्षा करते हैं और धृष्टद्युम्न दाहिने चक्रकी ।। भीमसेनश्च वै राज्ञा धार्तराष्ट्रेण युध्यते । यथा न हन्यातं भीमः सर्वेषां नोऽद्य पश्यताम् ।। २६ ।। तथा राधेय क्रियतां राजा मुच्येत नो यथा । ‘भीमसेन राजा दुर्योधनके साथ युद्ध करते हैं। राधानन्दन! हम सब लोगोंके देखते-देखते आज भीमसेन जिस प्रकार उसे मार न डालें, वैसा प्रयत्न करो। जैसे भी सम्भव हो, हमारे राजाको भीमसेनसे छुटकारा मिलना ही चाहिये ।। २६ १/२ ।। पश्यैनं भीमसेनेन ग्रस्तमाहवशोभिनम् ।। २७ ।। यदि त्वासाद्य मुच्येत विस्मयः सुमहान् भवेत् । ‘देखो, युद्धमें शोभा पानेवाले दुर्योधनको भीमसेनने ग्रस लिया है। यदि तुम्हें पाकर वह संकटसे छूट जाय तो यह महान् आश्चर्यकी घटना होगी ।। २७ १/२ ।। परित्राह्येनमभ्येत्य संशयं परमं गतम् ।। २८ ।। किं नु माद्रीसुतौ हत्वा राजानं च युधिष्ठिरम् ।

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‘तुम चलकर जीवनके भारी संशयमें पड़े हुए राजा दुर्योधनको बचाओ। आज

माद्रीकुमार नकुल-सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरका वध करके क्या होगा?’ ।। २८१/२ ।।

इति शल्यवचः श्रुत्वा राधेयः पृथिवीपते ।। २९ ।।

दृष्ट्वा दुर्योधनं चैव भीमग्रस्तं महाहवे ।

राजगृद्धी भृशं चैव शल्यवाक्यप्रचोदितः ।। ३० ।।

अजातशत्रुमुत्सृज्य माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।

तव पुत्रं परित्रातुमभ्यधावत वीर्यवान् ।। ३१ ।।

पृथ्वीनाथ! शल्यकी यह बात सुनकर तथा महासमरमें दुर्योधनको भीमसेनसे ग्रस्त

हुआ देखकर शल्यके वचनोंसे प्रेरित हो राजाको अधिक चाहनेवाला पराक्रमी कर्ण

अजातशत्रु युधिष्ठिर और माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेवको छोड़कर आपके पुत्रकी

रक्षा करनेके लिये दौड़ा ।। २९–३१ ।।

मद्रराजप्रणुदितैरश्वैराकाशगैरिव ।

गते कर्णे तु कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ३२ ।।

अपायाज्जवनैरश्वैः सहदेवश्च मारिष ।

माननीय नरेश! मद्रराज शल्यके हाँके हुए घोड़े ऐसे भाग रहे थे, मानो आकाशमें उड़

रहे हों। कर्णके चले जानेपर कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर और सहदेव तीव्रगामी

घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग गये ।। ३२१/२ ।।

ताभ्यां स सहितस्तूर्णं व्रीडन्निव नरेश्वरः ।। ३३ ।।

प्राप्य सेनानिवेशं च मार्गणैः क्षतविक्षतः ।

अवतीर्णो रथात्तूर्णमाविशच्छयनं शुभम् ।। ३४ ।।

नकुल और सहदेवके साथ वे नरेश लज्जित होते हुए-से तुरंत छावनीमें पहुँचकर रथसे

उतर पड़े और सुन्दर शय्यापर लेट गये। उस समय उनका सारा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत

हो रहा था ।। ३३-३४ ।।

अपनीतशल्यः सुभृशं हृच्छल्याभिनिपीडितः ।

सोऽब्रवीद्भ्रातरौ राजा माद्रीपुत्रौ महारथौ ।। ३५ ।।

वहाँ उनके शरीरसे बाण निकाल दिये गये तो भी हृदयमें जो अपमानका काँटा गड़

गया था, उससे वे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उस समय राजा दोनों भाई माद्रीकुमार

महारथी नकुल-सहदेवसे इस प्रकार बोले— ।। ३५ ।।

(युधिष्ठिर उवाच

गच्छतां त्वरितौ वीरौ यत्र भीमो व्यवस्थितः ।।)

अनीकं भीमसेनस्य पाण्डवावाशु गच्छताम् ।

जीमूत इव नर्दंस्तु युध्यते स वृकोदरः ।। ३६ ।।

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**युधिष्ठिरने कहा—**वीर पाण्डुकुमारो! तुम दोनों शीघ्रतापूर्वक जहाँ भीमसेन खड़े हैं, वहाँ उनकी सेनामें जाओ। वहाँ भीमसेन मेघके समान गम्भीर गर्जना करते हुए युद्ध कर रहे हैं ॥ ३६ ॥

ततोऽन्यं रथमास्थाय नकुलो रथपुङ्गवः ।
सहदेवश्च तेजस्वी भ्रातरौ शत्रुकर्षणौ ॥ ३७ ॥
तुरगैरग्रयरंहोभिर्यात्वा भीमस्य शुष्मिणौ ।
अनीकैः सहितौ तत्र भ्रातरौ समवस्थितौ ॥ ३८ ॥

तदनन्तर दूसरे रथपर बैठकर रथियोंमें श्रेष्ठ नकुल और तेजस्वी सहदेव—वे दोनों शत्रुसूदन बन्धु तीव्र वेगवाले घोड़ोंद्वारा भीमसेनके पास जा पहुँचे। फिर वे दोनों बलवान् भाई भीमसेनके सैनिकोंके साथ खड़े होकर युद्ध करने लगे ॥ ३७-३८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धर्मापयाने त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका पलायनविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2093)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुःषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा अश्वत्थामाकी पराजय, कौरव-सेनामें भगदड़ एवं दुर्योधनसे प्रेरित कर्णद्वारा भार्गवास्त्रसे पांचालोंका संहार

संजय उवाच

द्रौणिस्तु रथवंशेन महता परिवारितः ।
अपतत् सहसा राजन् यत्र पार्थो व्यवस्थितः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा विशाल रथसेनासे घिरा सहसा वहाँ आ पहुँचा, जहाँ अर्जुन खड़े थे ॥ १ ॥

तमापतन्तं सहसा शूरः शौरिसहायवान् ।
दधार सहसा पार्थो वेलेव मकरालयम् ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सहायक थे, उन शूरवीर कुन्तीकुमार अर्जुनने सहसा अपनी ओर आते हुए अश्वत्थामाको तत्काल उसी तरह रोक दिया, जैसे तटभूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकती है ॥ २ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
अर्जुनं वासुदेवं च छादयामास सायकैः ॥ ३ ॥
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए प्रतापी द्रोणपुत्रने अर्जुन और श्रीकृष्णको अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ ३ ॥

अवच्छन्नौ ततः कृष्णौ दृष्ट्वा तत्र महारथाः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रैक्षन्त कुरवस्तदा ॥ ४ ॥
उस समय उन दोनोंको बाणोंद्वारा आच्छादित हुआ देख समस्त कौरव महारथी महान् आश्चर्यमें पड़कर उधर ही देखने लगे ॥ ४ ॥

अर्जुनस्तु ततो दिव्यमस्त्रं चक्रे हसन्निव ।
तदस्त्रं वारयामास ब्राह्मणो युधि भारत ॥ ५ ॥
भारत! तब अर्जुनने हँसते हुए-से दिव्यास्त्र प्रकट किया; परंतु ब्राह्मण अश्वत्थामाने युद्धस्थलमें उनके उस दिव्यास्त्रका निवारण कर दिया ॥ ५ ॥

यद् यद्धि व्याक्षिपद् युद्धे पाण्डवोऽस्त्रजिघांसया ।
तत् तदस्त्रं महेष्वासो द्रोणपुत्रो व्यशातयत् ॥ ६ ॥
रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुन अश्वत्थामाके अस्त्रोंको नष्ट करनेके लिये जो-जो अस्त्र चलाते थे, महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उनके उस-उस अस्त्रको काट गिराता था ॥ ६ ॥

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अस्त्रयुद्धे ततो राजन् वर्तमाने महाभये । अपश्याम रणे द्रौणिं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ७ ॥ राजन्! इस प्रकार महाभयंकर अस्त्र-युद्ध आरम्भ होनेपर हमलोगोंने रणक्षेत्रमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको मुँह बाये हुए यमराजके समान देखा था ॥ ७ ॥ स दिशः प्रदिशश्चैव छादयित्वा ह्यजिह्मगैः । वासुदेवं त्रिभिर्बाणैर्विध्यद् दक्षिणे भुजे ॥ ८ ॥ उसने सीधे जानेवाले बाणोंके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और कोणोंको आच्छादित करके श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजामें तीन बाण मारे ॥ ८ ॥ ततोऽर्जुनो हयान् हत्वा सर्वांस्तस्य महात्मनः । चकार समरे भूमिं शोणितौघतरङ्गिणीम् ॥ ९ ॥ तब अर्जुनने उस महामनस्वी वीरके समस्त घोड़ोंको मारकर समरभूमिमें खूनकी नदी-सी बहा दी ॥ सर्वलोकवहां रौद्रां परलोकवहां नदीम् । सरथान् रथिनः सर्वान् पार्थचापच्युतैः शरैः ॥ १० ॥ द्रौणेरपहतान् संख्ये ददृशुः स च तां तथा । प्रावर्तयन्महाघोरां नदीं परवहां तदा ॥ ११ ॥ वह रक्तमयी भयंकर सरिता परलोकवाहिनी थी और सब लोगोंको अपने प्रवाहमें बहाये लिये जाती थी। वहाँ खड़े हुए सब लोगोंने देखा कि अश्वत्थामाके सारे रथी अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा युद्धभूमिमें मारे गये। स्वयं अश्वत्थामाने भी उनकी वह अवस्था देखी। उस समय उसने भी महाभयंकर परलोकवाहिनी नदी बहा दी ॥ तयोस्तु व्याकुले युद्धे द्रौणेः पार्थस्य दारुणे । अमर्यादं योधयन्तः पर्यधावन्त पृष्ठतः ॥ १२ ॥ अश्वत्थामा और अर्जुनके उस भयंकर एवं घमासान युद्धमें सब योद्धा मर्यादारहित होकर युद्ध करते हुए आगे-पीछे सब ओर भागने लगे ॥ १२ ॥ रथैर्हताश्वसूतैश्च हतारोहैश्च वाजिभिः । द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः ॥ १३ ॥ पार्थेन समरे राजन् कृतो घोरो जनक्षयः । विहता रथिनः पेतुः पार्थचापच्युतैः शरैः ॥ १४ ॥ रथोंके घोड़े और सारथि मार दिये गये। घोड़ोंके सवार नष्ट हो गये। गजारोही मार डाले गये और हाथी बचे रहे एवं कहीं हाथी ही मार डाले गये तथा महावत बचे रहे। राजन्! इस प्रकार समरांगणमें अर्जुनने घोर जनसंहार मचा दिया। उनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा मारे जाकर बहुत-से रथी धराशायी हो गये ॥ १३-१४ ॥ हयाश्च पर्यधावन्त मुक्तयोक्त्रास्ततस्ततः ।

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तद् दृष्ट्वा कर्म पार्थस्य द्रौणिराहवशोभिनः ॥ १५ ॥ अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितोऽभ्येत्य वीर्यवान् । विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ॥ १६ ॥ अवाकिरत्ततो द्रौणिः समन्तान्निशितैः शरैः । घोड़ोंके बन्धन खुल गये और वे चारों ओर दौड़ लगाने लगे। युद्धमें शोभा पानेवाले अर्जुनका वह पराक्रम देखकर पराक्रमी द्रोणकुमार अश्वत्थामा तुरंत उनके पास आ गया और अपने सुवर्ण-भूषित विशाल धनुषको हिलाते हुए उसने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनको पैने बाणोंद्वारा सब ओरसे ढक दिया ॥ १५-१६ १/२ ॥

भूयोऽर्जुनं महाराज द्रौणिरायम्य पत्रिणा ॥ १७ ॥ वक्षोदेशे भृशं पार्थं ताडयामास निर्दयम् । महाराज! तदनन्तर द्रोणकुमारने धनुष खींचकर छोड़े हुए पंखयुक्त बाणसे कुन्तीकुमार अर्जुनकी छातीपर पुनः बड़े जोरसे निर्दयतापूर्वक प्रहार किया ॥ १७ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो रणे तेन द्रोणपुत्रेण भारत ॥ १८ ॥ गाण्डीवधन्वा प्रसभं शरवर्षैरुदारधीः । संछाद्य समरे द्रौणिं चिच्छेदास्य च कार्मुकम् ॥ १९ ॥ भारत! रणभूमिमें द्रोणपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल किये गये उदारबुद्धि गाण्डीवधारी अर्जुनने समरांगणमें बलपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके अश्वत्थामाको ढक दिया और उसके धनुषको भी काट डाला ॥ १८-१९ ॥

स छिन्नधन्वा परिघं वज्रस्पर्शसमं युधि । आदाय चिक्षेप तदा द्रोणपुत्रः किरीटिने ॥ २० ॥ धनुष कट जानेपर द्रोणपुत्रने युद्धस्थलमें एक ऐसा परिघ हाथमें लिया, जिसका स्पर्श वज्रके समान कठोर था। उसने उस परिघको तत्काल ही किरीटधारी अर्जुनपर दे मारा ॥ २० ॥

तमापतन्तं परिघं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । चिच्छेद सहसा राजन् प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ २१ ॥ राजन्! उस सुवर्णभूषित परिघको सहसा अपने ऊपर आते देख पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥

स पपात तदा भूमौ निकृत्तः पार्थसायकैः । विकीर्णः पर्वतो राजन् यथा वज्रेण ताडितः ॥ २२ ॥ नरेश्वर! जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वत टूट-फूटकर सब ओर बिखर जाता है, उसी प्रकार अर्जुनके बाणोंसे कटा हुआ वह परिघ उस समय पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २२ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज द्रोणपुत्रो महारथः । ऐन्द्रेण चास्त्रवेगेन बीभत्सुं समवाकिरत् ॥ २३ ॥

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महाराज! तब महारथी द्रोणपुत्रने कुपित होकर अर्जुनपर ऐन्द्रास्त्रद्वारा वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ तस्येन्द्रजालावततं समीक्ष्य पार्थो राजन् गाण्डिवमाददे सः । ऐन्द्रं जालं प्रत्यहरत् तरस्वी वरास्त्रमादाय महेन्द्रसृष्टम् ॥ २४ ॥ राजन्! अर्जुनने अश्वत्थामाद्वारा किये हुए इन्द्रजालका विस्तार देखकर बड़े वेगसे गाण्डीव धनुष हाथमें लिया और महेन्द्रद्वारा निर्मित उत्तम अस्त्रका आश्रय लेकर उस इन्द्रजालका संहार कर दिया ॥ २४ ॥ विदार्य तज्जालमथेन्द्रमुक्तं पार्थस्ततो द्रौणिरथं क्षणेन । प्रच्छादयामास ततोऽभ्युपेत्य द्रौणिस्तदा पार्थशराभिभूतः ॥ २५ ॥ इस प्रकार इन्द्रास्त्रद्वारा छोड़े गये उस बाण-जालको विदीर्ण करके अर्जुनने निकटवर्ती होकर क्षणभरमें अश्वत्थामाके रथको ढक दिया। उस समय अश्वत्थामा अर्जुनके बाणोंसे अभिभूत हो गया था ॥ २५ ॥ विगाह्य तां पाण्डवबाणवृष्टिं शरैः परं नाम ततः प्रकाश्य । शतेन कृष्णं सहसाभ्यविध्यत् त्रिभिः शतैरर्जुनं क्षुद्रकाणाम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा अर्जुनकी उस बाण-वर्षाका निवारण करके अपना नाम प्रकाशित करते हुए सहसा सौ बाणोंसे श्रीकृष्णको घायल कर दिया और अर्जुनपर भी तीन सौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ततोऽर्जुनः सायकानां शतेन गुरोः सुतं मर्मसु निर्बिभेद । अश्वांश्च सूतं च तथा धनुर्ज्या- मवाकिरत् पश्यतां तावकानाम् ॥ २७ ॥ इसके बाद अर्जुनने सौ बाणोंसे गुरुपुत्रके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर दिया तथा आपके पुत्रोंके देखते-देखते उसके घोड़ों, सारथि, धनुष और प्रत्यंचापर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २७ ॥ स विद्ध्वा मर्मसु द्रौणिं पाण्डवः परवीरहा । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ २८ ॥

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शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुपुत्र अर्जुनने अश्वत्थामाके मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचाकर एक भल्लसे उसके सारथिको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ २८ ॥
स संगृह्य स्वयं वाहान् कृष्णौ प्राच्छादयच्छरैः ।
तत्राद्भुतमपश्याम द्रौणेराशु पराक्रमम् ॥ २९ ॥
प्रायच्छत्तुरगान् यच्च फाल्गुनं चाप्ययोधयत् ।
यदस्य समरे राजन् सर्वे योधा अपूजयन् ॥ ३० ॥
तब उसने स्वयं ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंसे ढक दिया। वहाँ हमने द्रोणपुत्रका शीघ्र प्रकट होनेवाला वह अद्भुत पराक्रम देखा कि वह घोड़ोंको भी काबूमें रखता था और अर्जुनके साथ युद्ध भी करता था। राजन्! समरांगणमें सभी योद्धाओंने उसके इस कार्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥
ततः प्रहस्य बीभत्सुर्द्रोणपुत्रस्य संयुगे ।
क्षिप्रं रश्मीनथाश्वानां क्षुरप्रैश्चिच्छिदे जयः ॥ ३१ ॥
तदनन्तर विजयी अर्जुनने हँसकर युद्धस्थलमें द्रोणपुत्रके घोड़ोंकी बागडोरोंको क्षुरप्रोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक काट दिया ॥ ३१ ॥
प्राद्रवंस्तुरगास्ते तु शरवेगप्रपीडिताः ।
ततोऽभून्निन्दो घोरस्तव सैन्यस्य भारत ॥ ३२ ॥
भारत! इसके बाद बाणोंके वेगसे अत्यन्त पीड़ित हुए उसके घोड़े वहाँसे भाग चले। उस समय वहाँ आपकी सेनामें भयंकर कोलाहल मच गया ॥ ३२ ॥
पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा तव सैन्यं समाद्रवन् ।
समन्तान्निशितान् बाणान् विमुञ्चन्तो जयैषिणः ॥ ३३ ॥
पाण्डव विजय पाकर आपकी सेनापर टूट पड़े और पुनः विजयकी अभिलाषा ले चारों ओरसे पैने बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ ३३ ॥
पाण्डवैस्तु महाराज धार्तराष्ट्री महाचमूः ।
पुनः पुनरथो वीरैरभज्जि जितकाशिभिः ॥ ३४ ॥
महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंने दुर्योधनकी विशाल सेनामें बारंबार भगदड़ मचा दी ॥ ३४ ॥
पश्यतां ते महाराज पुत्राणां चित्रयोधिनाम् ।
शकुनेः सौबलेयस्य कर्णस्य च विशाम्पते ॥ ३५ ॥
नरेश्वर! प्रजानाथ! विचित्र युद्ध करनेवाले आपके पुत्रोंके, सुबलपुत्र शकुनिके तथा कर्णके देखते-देखते यह सब हो रहा था ॥ ३५ ॥
वार्यमाणा महासेना पुत्रैस्तव जनेश्वर ।
न चातिष्ठत संग्रामे पीड्यमाना समन्ततः ॥ ३६ ॥

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जनेश्वर! सब ओरसे पीड़ित हुई आपकी विशाल सेना आपके पुत्रोंके बहुत रोकनेपर भी युद्धभूमिमें खड़ी न रह सकी ॥ ३६ ॥

ततो योधैर्महाराज पलायद्भिः समन्ततः । अभवद् व्याकुलं भीतं पुत्राणां ते महत् बलम् ॥ ३७ ॥

महाराज! सब ओर भागनेवाले योद्धाओंके कारण आपके पुत्रोंकी वह विशाल सेना भयभीत और व्याकुल हो उठी ॥

तिष्ठ तिष्ठेति च ततः सूतपुत्रस्य जल्पतः । नावतिष्ठति सा सेना वध्यमाना महात्मभिः ॥ ३८ ॥

सूतपुत्र कर्ण 'ठहरो, ठहरो' की पुकार करता ही रह गया; परंतु महामनस्वी पाण्डवोंकी मार खाती हुई वह सेना किसी तरह ठहर न सकी ॥ ३८ ॥

अथोत्कृष्टं महाराज पाण्डवैर्जितकाशिभिः । धार्तराष्ट्रबलं दृष्ट्वा विद्रुतं वै समन्ततः ॥ ३९ ॥

महाराज! दुर्योधनकी सेनाको सब ओर भागती देख विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३९ ॥

ततो दुर्योधनः कर्णमब्रवीत् प्रणयादिव । पश्य कर्ण महासेना पञ्चालैरर्दिता भृशम् ॥ ४० ॥

उस समय दुर्योधनने कर्णसे प्रेमपूर्वक कहा—'कर्ण! देखो, पांचालोंने मेरी इस विशाल सेनाको अत्यन्त पीड़ित कर दिया है ॥ ४० ॥

त्वयि तिष्ठति संत्रासात् पलायनपरायणा । एतज्ज्ञात्वा महाबाहो कुरु प्राप्तमरिंदम ॥ ४१ ॥

'शत्रुदमन महाबाहु वीर! तुम्हारे रहते हुए भयके कारण मेरी सेना भाग रही है; यह जानकर इस समय जो कर्तव्य प्राप्त हो उसे करो ॥ ४१ ॥

सहस्राणि च योधानां त्वामेव पुरुषोत्तम । क्रोशन्ति समरे वीर द्राव्यमाणानि पाण्डवैः ॥ ४२ ॥

'पुरुषोत्तम! वीर! पाण्डवोंद्वारा खदेड़े जानेवाले सहस्रों कौरव-सैनिक समरांगणमें तुम्हें ही पुकार रहे हैं' ॥

एतच्छ्रुत्वापि राधेयो दुर्योधनवचो महान् । मद्रराजमिदं वाक्यमब्रवीत् प्रहसन्निव ॥ ४३ ॥

महावीर राधापुत्र कर्णने दुर्योधनकी यह बात सुनकर मद्रराज शल्यसे हँसते हुए-से इस प्रकार कहा— ॥

पश्य मे भुजयोर्वीर्यमस्त्राणां च जनेश्वर । अद्य हन्मि रणे सर्वान् पञ्चालान् पाण्डुभिः सह ॥ ४४ ॥ वाहयाश्वान् नरव्याघ्र भद्रेणैव न संशयः ।

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'नरेश्वर! आज तुम मेरी दोनों भुजाओं और अस्त्रोंका बल देखो। मैं रणभूमिमें पाण्डवोंसहित समस्त पांचालोंका वध किये देता हूँ, इसमें संशय नहीं है। पुरुषसिंह! आप कल्याणचिन्तनपूर्वक ही इन घोड़ोंको आगे बढ़ाइये' ।। एवमुक्त्वा महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ४५ ।। प्रगृह्य विजयं वीरो धनुः श्रेष्ठं पुरातनम् । सज्यं कृत्वा महाराज संगृह्य च पुनः पुनः ।। ४६ ।। संनिवार्य च योधान् स सत्येन शपथेन च । प्रायोजयदमेयात्मा भार्गवास्त्रं महाबलः ।। ४७ ।। महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी वीर सूतपुत्र कर्णने अपने विजय नामक श्रेष्ठ एवं पुरातन धनुषको लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी; फिर उसे बारंबार हाथमें लेकर सत्यकी शपथ दिलाते हुए समस्त योद्धाओंको रोका। इसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उस महाबली वीरने भार्गवास्त्रका प्रयोग किया ।। ततो राजन् सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । कोटिशश्च शरास्तीक्ष्णा निरगच्छन् महामृधे ।। ४८ ।। राजन्! फिर तो उस महासमरमें सहस्रों, लाखों, करोड़ों और अरबों तीखे बाण उस अस्त्रसे प्रकट होने लगे ।। ज्वलितैस्तैः शरैर्घोरैः कङ्कबर्हिणवाजितैः । संछन्ना पाण्डवी सेना न प्राज्ञायत किञ्चन ।। ४९ ।। कंक और मोरकी पाँखवाले उन प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंद्वारा पाण्डव-सेना आच्छादित हो गयी। कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ।। ४९ ।। हाहाकारो महानासीत् पञ्चालानां विशाम्पते । पीडितानां बलवता भार्गवास्त्रेण संयुगे ।। ५० ।। प्रजानाथ! प्रबल भार्गवास्त्रसे समरांगणमें पीड़ित होनेवाले पांचालोंका महान् हाहाकार सब ओर गूँजने लगा ।। निपतद्भिर्गजै राजन्नश्वैश्चापि सहस्रशः । रथैश्चापि नरव्याघ्र नरैश्चैव समन्ततः ।। ५१ ।। प्राकम्पत मही राजन् निहतैस्तैः समन्ततः । व्याकुलं सर्वमभवत् पाण्डवानां महद् बलम् ।। ५२ ।। राजन्! गिरते हुए हाथियों, सहस्रों घोड़ों, रथों और मारे गये पैदल मनुष्योंके गिरनेसे सारी पृथिवी सब ओर कम्पित होने लगी। पाण्डवोंकी सारी विशाल सेना व्याकुल हो गयी ।। कर्णस्त्वेको युधां श्रेष्ठो विधूम इव पावकः । दहन् शत्रून् नरव्याघ्र शुशुभे स परंतपः ।। ५३ ।।

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नरव्याघ्र! शत्रुओंको तपानेवाला योद्धाओंमें श्रेष्ठ एकमात्र कर्ण ही धूमरहित अग्निके समान शत्रुओंको दग्ध करता हुआ शोभा पा रहा था ॥ ५३ ॥ ते वध्यमानाः कर्णेन पञ्चालाश्चेदिभिः सह । तत्र तत्र व्यमुह्यन्त वनदाहे यथा द्विपाः ॥ ५४ ॥ जैसे वनमें आग लगनेपर उसमें रहनेवाले हाथी जहाँ-तहाँ दग्ध होकर मूर्च्छित हो जाते हैं, उसी प्रकार कर्णके द्वारा मारे जानेवाले पांचाल और चेदि योद्धा यत्र-तत्र मूर्च्छित होकर पड़े थे ॥ ५४ ॥ चुक्रुशुश्च नरव्याघ्र यथा व्याघ्रा नरोत्तमाः । तेषां तु क्रोशतामासीद् भीतानां रणमूर्धनि ॥ ५५ ॥ धावतां च ततो राजंस्त्रस्तानां च समन्ततः । आर्तनादो महांस्तत्र भूतानामिव सम्प्लवे ॥ ५६ ॥ पुरुषसिंह! वे श्रेष्ठ योद्धा व्याघ्रोंके समान चीत्कार करते थे। राजन्! युद्धके मुहानेपर भयभीत हो चिल्लाते और डरकर सब ओर भागते हुए उन सैनिकोंका महान् आर्तनाद प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंके चीत्कारके समान जान पड़ता था ॥ ५५-५६ ॥ वध्यमानांस्तु तान् दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष । वित्रसुः सर्वभूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ ५७ ॥ आर्य! सूतपुत्रके द्वारा मारे जाते हुए उन योद्धाओंको देखकर समस्त प्राणी पशु-पक्षी भी भयसे थर्रा उठे ॥ ५७ ॥ ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जयाः । अर्जुनं वासुदेवं च क्रोशन्ति च मुहुर्मुहुः ॥ ५८ ॥ प्रेतराजपुरे यद्वत् प्रेतराजं विचेतसः । सूतपुत्रद्वारा समरांगणमें मारे जाते हुए सृंजय बारंबार अर्जुन और श्रीकृष्णको पुकारते थे। ठीक उसी तरह, जैसे प्रेतराजके नगरमें क्लेशसे अचेत हुए प्राणी प्रेतराजको ही पुकारते हैं ॥ ५८ १/२ ॥ श्रुत्वा तु निनदं तेषां वध्यतां कर्णसायकैः ॥ ५९ ॥ अथाब्रवीद् वासुदेवं कुन्तीपुत्रो धनंजयः । भार्गवास्त्रं महाघोरं दृष्ट्वा तत्र समीरितम् ॥ ६० ॥ कर्णके बाणोंद्वारा मारे जाते हुए उन सैनिकोंका आर्तनाद सुनकर तथा वहाँ महाभयंकर भार्गवास्त्रका प्रयोग हुआ देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा — ॥ ५९-६० ॥ पश्य कृष्ण महाबाहो भार्गवास्त्रस्य विक्रमम् । नैतदस्त्रं हि समरे शक्यं हन्तुं कथञ्चन ॥ ६१ ॥

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‘महाबाहु श्रीकृष्ण! यह भार्गवास्त्रका पराक्रम देखिये। समरांगणमें किसी तरह इस अस्त्रको नष्ट नहीं किया जा सकता ॥ ६१ ॥ सूतपुत्रं च संरब्धं पश्य कृष्ण महारणे । अन्तकप्रतिमं वीर्ये कुर्वाणं कर्म दारुणम् ॥ ६२ ॥ ‘श्रीकृष्ण! देखिये, क्रोधमें भरा हुआ सूतपुत्र, जो पराक्रममें यमराजके समान है, महासमरमें कैसा दारुण कर्म कर रहा है ॥ ६२ ॥ अभीक्ष्णं चोदयन्नश्वान् प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुः । न च पश्यामि समरे कर्णं प्रति पलायितुम् ॥ ६३ ॥ ‘वह निरन्तर घोड़ोंको हाँकता हुआ बारंबार मेरी ही ओर देख रहा है। समरभूमिमें कर्णके सामनेसे पलायन करना मैं उचित नहीं समझता ॥ ६३ ॥ जीवन् प्राप्नोति पुरुषः संख्ये जयपराजयौ । मृतस्य तु हृषीकेश भङ्ग एव कुतो जयः ॥ ६४ ॥ ‘मनुष्य जीवित रहे तो वह युद्धमें विजय और पराजय दोनों पाता है। हृषीकेश! मरे हुए मनुष्यका तो नाश ही हो जाता है; फिर उसकी विजय कहाँसे हो सकती है’ ॥ ६४ ॥ एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णो मतिमतां वरम् । धनंजयमुवाचेदं प्राप्तकालमरिंदमम् ॥ ६५ ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शत्रुदमन अर्जुनसे यह समयोचित बात कही— ॥ ६५ ॥ कर्णेन हि दृढं राजा कुन्तीपुत्रः परिक्षतः । तं दृष्ट्वाऽऽश्वास्य च पुनः कर्णं पार्थ वधिष्यसि ॥ ६६ ॥ ‘पार्थ! कर्णने राजा युधिष्ठिरको अत्यन्त क्षत-विक्षत कर दिया है। उनसे मिलकर उन्हें धीरज बँधाकर फिर तुम कर्णका वध करना’ ॥ ६६ ॥ एवमुक्त्वा पुनः प्रायाद् द्रष्टुमिच्छन् युधिष्ठिरम् । श्रमेण ग्राहयिष्यंश्च युद्धे कर्णं विशाम्पते ॥ ६७ ॥ प्रजानाथ! ऐसा कहकर वे पुनः युधिष्ठिरसे मिलनेकी इच्छासे तथा कर्णको युद्धमें अधिक थकावट प्राप्त करानेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ ६७ ॥ ततो धनंजयो द्रष्टुं राजानं बाणपीडितम् । रथेन प्रययौ क्षिप्रं संग्रामात् केशवाज्ञया ॥ ६८ ॥ तत्पश्चात् अर्जुन श्रीकृष्णकी आज्ञासे बाणपीड़ित राजा युधिष्ठिरको देखनेके लिये रथके द्वारा युद्धस्थलसे शीघ्रतापूर्वक गये ॥ ६८ ॥ गच्छन्नेव तु कौन्तेयो धर्मराजदिदृक्षया । सैन्यमालोकयामास नापश्यत् तत्र चाग्रजम् ॥ ६९ ॥ युद्धं कृत्वा तु कौन्तेयो द्रोणपुत्रेण भारत ।

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दुःसहं वज्रिणा संख्ये पराजित्य गुरोः सुतम् ॥ ७० ॥

भारत! कुन्तीकुमार अर्जुनने द्रोणपुत्रके साथ युद्ध करके रणभूमिमें वज्रधारी इन्द्रके लिये भी दुःसह उस गुरुपुत्रको पराजित करनेके पश्चात् जाते समय धर्मराजको देखनेकी इच्छासे सारी सेनापर दृष्टिपात किया। परंतु वहाँ कहीं भी अपने बड़े भाईको नहीं देखा ॥ ६९-७० ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धर्मराजशोधने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरकी खोजविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2103)

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पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

भीमसेनको युद्धका भार सौंपकर श्रीकृष्ण और अर्जुनका युधिष्ठिरके पास जाना

संजय उवाच

द्रौणिं पराजित्य ततोऽग्रधन्वा
कृत्वा महत् दुष्करं शूरकर्म ।
आलोकयामास ततः स्वसैन्यं
धनंजयः शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर उत्तम धनुष धारण करनेवाले तथा शत्रुओंके लिये अजेय अर्जुनने दूसरोंके लिये दुष्कर वीरोचित कर्म करके अश्वत्थामाको हराकर फिर अपनी सेनाका निरीक्षण किया ॥ १ ॥

स युध्यमानान् पृतनामुखस्थान्-
शूरः शूरान् हर्षयन् सव्यसाची ।
पूर्वप्रहारैर्मथितान् प्रशंसन्
स्थिरांश्चकारात्मरथाननीके ॥ २ ॥

सव्यसाची शूरवीर अर्जुन युद्धके मुहानेपर खड़े होकर युद्ध करनेवाले अपने शूरवीर सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए तथा पहलेके प्रहारोंसे क्षत-विक्षत हुए अपने रथियोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन सबको अपनी सेनामें स्थिरतापूर्वक स्थापित किया ॥ २ ॥

अपश्यमानस्तु किरीटमाली
युधिष्ठिरं भ्रातरमाजमीढम् ।
उवाच भीमं तरसाभ्युपेत्य
राज्ञः प्रवृत्तिं त्विह कुत्र राजा ॥ ३ ॥

परंतु वहाँ अपने भाई अजमीढकुलनन्दन युधिष्ठिरको न देखकर किरीटधारी अर्जुनने बड़े वेगसे भीमसेनके पास जा उनसे राजाका समाचार पूछते हुए कहा—'भैया! इस समय हमारे महाराज कहाँ हैं?' ॥ ३ ॥

भीमसेन उवाच

अपयात इतो राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
कर्णबाणाभितप्ताङ्गो यदि जीवेत् कथञ्चन ॥ ४ ॥

**भीमसेनने कहा—**धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर यहाँसे हट गये हैं। कर्णके बाणोंसे उनके सारे अंग संतप्त हो रहे हैं। सम्भव है, वे किसी प्रकार जी रहे हों ॥ ४ ॥

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अर्जुन उवाच

तस्माद् भवान् शीघ्रमितः प्रयातु राज्ञः प्रवृत्त्यै कुरुसत्तमस्य । नूनं स विद्धोऽतिभृशं पृषत्कैः कर्णेन राजा शिविरं गतोऽसौ ॥ ५ ॥

अर्जुन बोले— यदि ऐसी बात है तो आप कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरका समाचार लानेके लिये शीघ्र ही यहाँसे जायँ। निश्चय ही कर्णके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर राजा शिविरमें चले गये हैं ॥ ५ ॥

यः सम्प्रहारैर्निशितैः पृषत्कै- र्द्रोणेन विद्धोऽतिभृशं तरस्वी । तस्थौ स तत्रापि जयप्रतीक्षो द्रोणोऽपि यावन्न हतः किलासीत् ॥ ६ ॥ स संशयं गमितः पाण्डवाग्र्यः संख्येऽद्य कर्णेन महानुभावः । ज्ञातुं प्रयाह्याशु तमद्य भीम स्थास्याम्यहं शत्रुगणान् निरुध्य ॥ ७ ॥

भैया भीमसेन! जो वेगशाली वीर युधिष्ठिर द्रोणाचार्यके द्वारा किये गये प्रहारों तथा अत्यन्त तीखे बाणोंसे अच्छी तरह घायल किये जानेपर भी विजयकी प्रतीक्षामें तबतक युद्धस्थलमें डटे रहे, जबतक कि आचार्य द्रोण मारे नहीं गये। वे महानुभाव पाण्डवशिरोमणि आज कर्णके द्वारा संग्राममें संशयापन्न अवस्थामें डाल दिये गये हैं; अतः आप शीघ्र ही उनका समाचार जाननेके लिये जाइये, मैं यहाँ शत्रुओंको रोके रहूँगा ॥ ६-७ ॥

भीमसेन उवाच

त्वमेव जानीहि महानुभाव राज्ञः प्रवृत्तिं भरतर्षभस्य । अहं हि यद्यर्जुन याम्यमित्रा वदन्ति मां भीत इति प्रवीराः ॥ ८ ॥

भीमसेनने कहा— महानुभाव! तुम्हीं जाकर भरतकुलभूषण नरेशका समाचार जानो। अर्जुन! यदि मैं यहाँसे जाऊँगा तो मेरे वीर शत्रु मुझे डरपोक कहेंगे ॥ ८ ॥

ततोऽब्रवीदर्जुनो भीमसेनं संशप्तकाः प्रत्यनीकं स्थिता मे । एतानहत्वाद्य मया न शक्य-

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मितोऽपयातुं रिपुसङ्घगोष्ठात् ॥ ९ ॥
तब अर्जुनने भीमसेनसे कहा—‘भैया! संशप्तकगण मेरे विपक्षमें खड़े हैं। इन्हें मारे बिना आज मैं इस शत्रु-समुदायरूपी गोष्ठसे बाहर नहीं जा सकता’ ॥ ९ ॥
अथाब्रवीदर्जुनं भीमसेनः
स्ववीर्यमासाद्य कुरुप्रवीर ।
संशप्तकान् प्रतियोत्स्यामि संख्ये
सर्वानहं याहि धनंजय त्वम् ॥ १० ॥
यह सुनकर भीमसेनने अर्जुनसे कहा—‘कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर धनंजय! मैं अपने ही बलका भरोसा करके संग्राम-भूमिमें सम्पूर्ण संशप्तकोंके साथ युद्ध करूँगा, तुम जाओ’ ॥ १० ॥

संजय उवाच
तद् भीमसेनस्य वचो निशम्य
सुदुष्करं भ्रातुरमित्रमध्ये ।
संशप्तकानीकमसह्यमेकः
सुदुष्करं धारयामीति पार्थः ॥ ११ ॥
उवाच नारायणमप्रमेयं
कपिध्वजः सत्यपराक्रमस्य ।
श्रुत्वा वचो भ्रातुरदीनसत्त्व-
स्तदाहवे सत्यवचो महात्मा ।
द्रष्टुं कुरुश्रेष्ठमभिप्रयास्यन्
प्रोवाच वृष्णिप्रवरं तदानीम् ॥ १२ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! शत्रुओंकी मण्डलीमें अपने भाई भीमसेनका यह अत्यन्त दुष्कर वचन सुनकर कि ‘मैं अकेला ही असह्य संशप्तक सेनाका सामना करूँगा’ उदार हृदयवाले महात्मा कपिध्वज अर्जुनने सत्यपराक्रमी भाई भीमके उस सत्य वचनको श्रवणगोचर करके उसे अप्रमेय, वृष्णिवंशावतंस नारायणावतार भगवान् श्रीकृष्णको बताया और उस समय कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरका दर्शन करनेकी इच्छासे जानेको उद्यत हो इस प्रकार कहा— ॥ ११-१२ ॥

अर्जुन उवाच
चोदयाश्वान् हृषीकेश विहायैतद् बलार्णवम् ।
अजातशत्रुं राजानं द्रष्टुमिच्छामि केशव ॥ १३ ॥
अर्जुन बोले— हृषीकेश! अब आप इस शत्रुसेनारूपी समुद्रको छोड़कर घोड़ोंको यहाँसे हाँक ले चलें। केशव! मैं अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरका दर्शन करना चाहता

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हूँ ।। १३ ।।

संजय उवाच

ततो हयान् सर्वदाशार्हमुख्यः

प्रचोदयन् भीममुवाच चेदम् ।

नैतच्चित्रं तव कर्माद्य भीम

यास्याम्यहं जहि पार्थारिसंघान् ।। १४ ।।

संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सम्पूर्ण दाशार्हवंशियोंमें प्रधान भगवान् श्रीकृष्ण

अपने घोड़े हाँकते हुए वहाँ भीमसेनसे इस प्रकार बोले—'कुन्तीनन्दन भीम! आज यह

पराक्रम तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। मैं जा रहा हूँ। तुम शत्रुसमूहोंका संहार

करो' ।। १४ ।।

ततो ययौ हृषीकेशो यत्र राजा युधिष्ठिरः ।

शीघ्राच्छीघ्रतरं राजन् वाजिभिर्गुरुडोपमैः ।। १५ ।।

राजन्! यह कहकर भगवान् हृषीकेश गरुड़के समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा शीघ्र-से-

शीघ्र वहाँ जा पहुँचे, जहाँ राजा युधिष्ठिर विश्राम कर रहे थे ।। १५ ।।

प्रत्यनीके व्यवस्थाप्य भीमसेनमरिंदमम् ।

संदिश्य चैतं राजेन्द्र युद्धं प्रति वृकोदरम् ।। १६ ।।

ततस्तु गत्वा पुरुषप्रवीरौ

राजानमासाद्य शयानमेकम् ।

रथादुभौ प्रत्यवरुह्य तस्माद्

ववन्दतुर्धर्मराजस्य पादौ ।। १७ ।।

राजेन्द्र! शत्रुओंका सामना करनेके लिये शत्रुदमन वृकोदर भीमसेनको स्थापित करके

और युद्धके विषयमें उन्हें पूर्वोक्त संदेश देकर वे दोनों पुरुषशिरोमणि अकेले सोये हुए राजा

युधिष्ठिरके पास जा रथसे नीचे उतरे और उन्होंने धर्मराजके चरणोंमें प्रणाम

किया ।। १६-१७ ।।

तं दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रं क्षेमिणं पुरुषर्षभम् ।

मुदाभ्युपगतौ कृष्णावश्विनाविव वासवम् ।। १८ ।।

तावभ्यनन्दद् राजापि विवस्वानश्विनाविव ।

हते महासुरे जम्भे शक्रविष्णू यथा गुरुः ।। १९ ।।

पुरुषसिंह पुरुषप्रवर श्रीकृष्ण एवं अर्जुनको सकुशल देखकर तथा दोनों कृष्णोंको

इन्द्रके पास गये हुए अश्विनीकुमारोंके समान प्रसन्नतापूर्वक अपने समीप आया जान राजा

युधिष्ठिरने उनका उसी तरह अभिनन्दन किया, जैसे सूर्य दोनों अश्विनीकुमारोंका स्वागत

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करते हैं। अथवा जैसे महान् असुर जम्भके मारे जानेपर बृहस्पतिने इन्द्र और विष्णुका अभिनन्दन किया था ॥ १८-१९ ॥
मन्यमानो हतं कर्णं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
हर्षगद्गदया वाचा प्रीतः प्राह परंतपः ॥ २० ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने कर्णको मारा गया मानकर हर्षगद्गद वाणीसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप आरम्भ किया ॥ २० ॥
अथोपयातौ पृथुलोहिताक्षौ
शराचिताङ्गौ रुधिरप्रदिग्धौ ।
समीक्ष्य सेनाग्रनरप्रवीरौ
युधिष्ठिरो वाक्यमिदं बभाषे ॥ २१ ॥
सेनाके अग्रभागमें युद्ध करनेवाले पुरुषोंमें प्रमुख वीर विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण और अर्जुन जब समीप आये, तब उनके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे। वे खूनसे लथपथ हो रहे थे; उन्हें देखकर युधिष्ठिरने निम्नांकित रूपसे बातचीत आरम्भ की ॥ २१ ॥