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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
Page 2296Permalink

आदि सब वीरोंको लक्ष्य करके कहा—'कर्ण! आज युद्धस्थलमें मैं तुम्हारे देखते-देखते उस उग्रपराक्रमी वीर वृषसेनको अपने पैने बाणोंद्वारा यमलोक भेज दूँगा।।

ऊनं च तावद्धि जना वदन्ति सर्वैर्भवद्भिर्मम सूनुर्हतोऽसौ। एको रथो मद्विहीनस्तरस्वी अहं हनिष्ये भवतां समक्षम्॥ ३२॥ संरक्ष्यतां रथसंस्थाः सुतोऽय- महं हनिष्ये वृषसेनमुग्रम्। पश्चाद् वधिष्ये त्वामपि सम्प्रमूढ- महं हनिष्येऽर्जुन आजिमध्ये॥ ३३॥

'मेरा वेगशाली वीर पुत्र महारथी अभिमन्यु अकेला था। मैं उसके साथ नहीं था। उस अवस्थामें तुम सब लोगोंने मिलकर उसका वध किया था। तुम्हारे उस कर्मको सब लोग खोटा बताते हैं; परंतु आज मैं तुम सब लोगोंके सामने वृषसेनका वध करूँगा। रथपर बैठे हुए महारथियो! अपने इस पुत्रको बचा सको तो बचाओ। मैं अर्जुन आज रणभूमिमें पहले उग्रवीर वृषसेनको मारूँगा; फिर तुझ विवेकशून्य सूतपुत्रका भी वध कर डालूँगा॥ ३२-३३॥

तमद्य मूलं कलहस्य संख्ये दुर्योधनापाश्रयजातदर्पम्। त्वामद्य हन्तास्मि रणे प्रसह्य अस्यैव हन्ता युधि भीमसेनः॥ ३४॥ दुर्योधनस्याधमपूरुषस्य यस्यानयादेष महान् क्षयोऽभवत्।

'कर्ण! तू ही इस कलहकी जड़ है। दुर्योधनका सहारा मिल जानेसे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। आज रणक्षेत्रमें मैं हठपूर्वक तेरा वध करूँगा और जिसके अन्यायसे यह महान् संहार हुआ है, उस नराधम दुर्योधनका वध युद्धमें भीमसेन करेंगे'॥ ३४ १/२॥

स एवमुक्त्वा विनिमृज्य चापं लक्ष्यं हि कृत्वा वृषसेनमाजौ॥ ३५॥ ससर्ज बाणान् विशिखान् महात्मा वधाय राजन् कर्णसुतस्य संख्ये।

राजन्! ऐसा कहकर महात्मा अर्जुनने अपने धनुषको पोंछा और कर्णपुत्र वृषसेनका वध करनेके लिये युद्धमें उसीको लक्ष्य बनाकर बाणोंका प्रहार आरम्भ किया॥ ३५ १/२॥

विव्याध चैनं दशभिः पृषत्कै- र्मर्मस्वशङ्कं प्रहसन् किरीटी॥ ३६॥

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चिच्छेद चास्येष्वसनं भुजौ च
क्षुरैश्चतुर्भिर्निशितैः शिरश्च ।
किरीटधारी अर्जुनने हँसते हुए-से दस बाणोंसे उसके मर्मस्थानोंमें निर्भीक होकर आघात किया। फिर चार तीखे छुरोंसे उसके धनुषको, दोनों भुजाओंको तथा मस्तकको भी काट डाला ॥ ३६ १/२ ॥

स पार्थबाणाभिहतः पपात
रथाद् विबाहुर्विशिरा धरायाम् ॥ ३७ ॥
सुपुष्पितो वृक्षवरोऽतिकायो
वातेरितः शाल इवाद्रिशृङ्गात् ।
अर्जुनके बाणोंसे आहत हो बाहु और मस्तकसे रहित होकर वृषसेन उसी प्रकार रथसे नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे सुन्दर फूलोंसे भरा हुआ श्रेष्ठ एवं विशाल शालवृक्ष हवाके झोंके खाकर पर्वतशिखरसे नीचे जा गिरा हो ॥

सम्प्रेक्ष्य बाणाभिहतं पतन्तं
रथात् सुतं सूतजः क्षिप्रकारी ॥ ३८ ॥
रथं रथेनाशु जगाम रोषात्
किरीटिनः पुत्रवधाभितप्तः ।
शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेवाला सूतपुत्र कर्ण अपने बेटेको बाणविद्ध हो रथसे नीचे गिरते देख पुत्रके वधसे संतप्त हो उठा और रोषमें भरकर रथके द्वारा अर्जुनके रथकी ओर तीव्र वेगसे चला ॥ ३८ १/२ ॥

ततः समक्षं स्वसुतं विलोक्य
कर्णो हतं श्वेतहयेन संख्ये ।
संरम्भमागम्य परं महात्मा
कृष्णार्जुनौ सहसाभ्यधावत् ॥ ३९ ॥
अपने पुत्रको अपनी आँखोंके सामने ही युद्धमें श्वेतवाहन अर्जुनद्वारा मारा गया देख महामनस्वी कर्णको महान् क्रोध हुआ तथा उसने श्रीकृष्ण और अर्जुनपर सहसा आक्रमण कर दिया ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि वृषसेनवधे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें वृषसेनका वधविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2298)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

षडशीतितमोऽध्यायः

कर्णके साथ युद्ध करनेके विषयमें श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनका कर्णके सामने उपस्थित होना

संजय उवाच

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य वेलोद्वृत्तमिवार्णवम् ।
गर्जन्तं सुमहाकायं दुर्निवारं सुरैरपि ॥ १ ॥
अर्जुनं प्राह दाशार्हः प्रहस्य पुरुषर्षभः ।
अयं सरथ आयाति श्वेताश्वः शल्यसारथिः ॥ २ ॥

संजय कहते हैं—राजन्! सीमाको लाँघकर आगे बढ़ते हुए महासागरके सदृश विशालकाय कर्ण गर्जना करता हुआ आगे बढ़ा। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय था। उसे आते देख दशार्हकुलनन्दन पुरुषश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णने हँसकर अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! जिसके सारथि शल्य हैं और रथमें श्वेत घोड़े जुते हैं, वही यह कर्ण रथसहित इधर आ रहा है ॥ १-२ ॥

येन ते सह योद्धव्यं स्थिरो भव धनंजय ।
पश्य चैनं समायुक्तं रथं कर्णस्य पाण्डव ॥ ३ ॥
श्वेतवाजिसमायुक्तं युक्तं राधासुतेन च ।

‘धनंजय! तुम्हें जिसके साथ युद्ध करना है, वह कर्ण आ गया। अब स्थिर हो जाओ। पाण्डुनन्दन! श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए कर्णके इस सजे-सजाये रथको, जिसपर वह स्वयं विराजमान है, देखो ॥ ३ १/२ ॥

नानापताकाकलिलं किङ्किणीजालमालिनम् ॥ ४ ॥
उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हयैः ।
ध्वजं च पश्य कर्णस्य नागकक्षं महात्मनः ॥ ५ ॥

‘इसपर भाँति-भाँतिकी पताकाएँ फहरा रही हैं तथा वह छोटी-छोटी घंटियोंवाली झालरसे अलंकृत है। ये सफेद घोड़े आकाशमें विमानके समान इस रथको लेकर मानो उड़े जा रहे हैं। महामनस्वी कर्णकी इस ध्वजाको तो देखो, जिसमें हाथीके रस्सेका चिह्न बना हुआ है ॥ ४-५ ॥

आखण्डलधनुःप्रख्यमुल्लिखन्तमिवाम्बरम् ।
पश्य कर्णं समायान्तं धार्तराष्ट्रप्रियैषिणम् ॥ ६ ॥
शरधारा विमुञ्चन्तं धारासारमिवाम्बुदम् ।

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वह ध्वज इन्द्रधनुषके समान प्रकाशित होता हुआ आकाशमें रेखा-सा खींच रहा है। देखो, दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाला कर्ण इधर ही आ रहा है। वह जलकी धारा गिरानेवाले बादलके समान बाणधाराकी वर्षा कर रहा है ॥ ६ १/२ ॥
एष मद्रेश्वरो राजा रथाग्रे पर्यवस्थितः ॥ ७ ॥
नियच्छति हयानस्य राधेयस्यामितौजसः ।
‘ये मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य रथके अग्रभागमें बैठकर अमित बलशाली इस राधापुत्र कर्णके घोड़ोंको काबूमें रख रहे हैं ॥ ७ १/२ ॥
शृणु दुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खशब्दं च दारुणम् ॥ ८ ॥
सिंहनादांश्च विविधान् शृणु पाण्डव सर्वतः ।
‘पाण्डुनन्दन! सुनो, दुन्दुभिका गम्भीर घोष और भयंकर शंखध्वनि हो रही है। चारों ओर नाना प्रकारके सिंहनाद भी होने लगे हैं, इन्हें सुनो ॥ ८ १/२ ॥
अन्तर्धाय महाशब्दान् कर्णेनामिततेजसा ॥ ९ ॥
दोधूयमानस्य भृशं धनुषः शृणु निःस्वनम् ।
‘अमित तेजस्वी कर्ण अपने धनुषको बड़े वेगसे हिला रहा है। उसकी टंकारध्वनि बड़ी भारी आवाजको भी दबाकर सुनायी पड़ रही है, सुनो ॥ ९ १/२ ॥
एते दीर्यन्ति सगणाः पञ्चालानां महारथाः ॥ १० ॥
दृष्ट्वा केसरिणं क्रुद्धं मृगा इव महावने ।
‘जैसे महान् वनमें मृग कुपित हुए सिंहको देखकर भागने लगते हैं, उसी प्रकार ये पांचाल महारथी अपने सैन्यदलके साथ कर्णको देखकर भागे जा रहे हैं ॥
सर्वयत्नेन कौन्तेय हन्तुमर्हसि सूतजम् ॥ ११ ॥
न हि कर्णशरानन्यः सोढुमुत्सहते नरः ।
‘कुन्तीनन्दन! तुम्हें पूर्ण प्रयत्न करके सूतपुत्र कर्णका वध करना चाहिये। दूसरा कोई मनुष्य कर्णके बाणोंको नहीं सह सकता है ॥ ११ १/२ ॥
सदेवासुरगन्धर्वांस्त्रीँल्लोकान् सचराचरान् ॥ १२ ॥
त्वं हि जेतुं रणे शक्तस्तथैव विदितं मम ।
‘देवता, असुर, गन्धर्व तथा चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको तुम रणभूमिमें जीत सकते हो; यह मुझे अच्छी तरह मालूम है ॥ १२ १/२ ॥
भीममुग्रं महात्मानं त्र्यक्षं शर्वं कपर्दिनम् ॥ १३ ॥
न शक्ता द्रष्टुमीशानं किं पुनर्योधितुं प्रभुम् ।
त्वया साक्षान्महादेवः सर्वभूतशिवः शिवः ॥ १४ ॥
युद्धेनाराधितः स्थाणुर्देवाश्च वरदास्तव ।
तस्य पार्थ प्रसादेन देवदेवस्य शूलिनः ॥ १५ ॥

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जहि कर्णं महाबाहो नमुचिं वृत्रहा यथा । श्रेयस्तेऽस्तु सदा पार्थ युद्धे जयमवाप्नुहि ॥ १६ ॥ ‘जिनकी मूर्ति बड़ी ही उग्र और भयंकर है, जो महात्मा हैं, जिनके तीन नेत्र और मस्तकपर जटाजूट है, उन सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शंकरको दूसरे लोग देख भी नहीं सकते फिर उनके साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? परंतु तुमने सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण करनेवाले उन्हीं स्थाणुस्वरूप महादेव साक्षात् भगवान् शिवकी युद्धके द्वारा आराधना की है, अन्य देवताओंने भी तुम्हें वरदान दिये है; इसलिये महाबाहु पार्थ! तुम उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शंकरकी कृपासे कर्णको उसी प्रकार मार डालो, जैसे वृत्रविनाशक इन्द्रने नमुचिका वध किया था। कुन्तीनन्दन! तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। तुम युद्धमें विजय प्राप्त करो’ ।। १३—१६ ।।

अर्जुन उवाच

ध्रुव एव जयः कृष्ण मम नास्त्यत्र संशयः । सर्वलोकगुरुर्यस्त्वं तुष्टोऽसि मधुसूदन ॥ १७ ॥ **अर्जुनने कहा—**मधुसूदन श्रीकृष्ण! मेरी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्‌के गुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं ।। १७ ।।

चोदयाश्वान् हृषीकेश रथं मम महारथ । नाहत्वा समरे कर्णं निवर्तिष्यति फाल्गुनः ॥ १८ ॥ महारथी हृषीकेश! आप मेरे रथ और घोड़ोंको आगे बढ़ाइये। अब अर्जुन समरांगणमें कर्णका वध किये बिना पीछे नहीं लौटेगा ।। १८ ।।

अद्य कर्णं हतं पश्य मच्छेरैः शकलीकृतम् । मां वा द्रक्ष्यसि गोविन्द कर्णेन निहतं शरैः ॥ १९ ॥ गोविन्द! आज आप मेरे बाणोंसे भरकर टुकड़े-टुकड़े हुए कर्णको देखिये। अथवा मुझे ही कर्णके बाणोंसे मरा हुआ देखियेगा ।। १९ ।।

उपस्थितमिदं घोरं युद्धं त्रैलोक्यमोहनम् । यज्जनाः कथयिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ २० ॥ आज तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला यह घोर युद्ध उपस्थित है। जबतक पृथ्वी कायम रहेगी तबतक संसारके लोग इस युद्धकी चर्चा करेंगे ।। २० ।।

एवं ब्रुवंस्तदा पार्थः कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रत्युद्ययौ रथेनाशु गजं प्रतिगजो यथा ॥ २१ ॥ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहते हुए कुन्तीकुमार अर्जुन उस समय रथके द्वारा शीघ्रतापूर्वक कर्णके सामने गये, मानो किसी हाथीका सामना करनेके लिये प्रतिद्वन्द्वी हाथी जा रहा हो ।। २१ ।।

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पुनरप्याह तेजस्वी पार्थः कृष्णमरिंदमम् ।
चोदयाश्वान् हृषीकेश कालोऽयमतिवर्तते ॥ २२ ॥
उस समय तेजस्वी पार्थने शत्रुदमन श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार कहा—‘हृषीकेश! मेरे घोड़ोंको हाँकिये, यह समय बीता जा रहा है’ ॥ २२ ॥

एवमुक्तस्तदा तेन पाण्डवेन महात्मना ।
जयेन सम्पूज्य स पाण्डवं तदा
प्रचोदयामास हयान् मनोजवान् ।
स पाण्डुपुत्रस्य रथो मनोजवः
क्षणेन कर्णस्य रथाग्रतोऽभवत् ॥ २३ ॥
महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने विजयसूचक आशीर्वादके द्वारा उनका आदर करके उस समय मनके समान वेगशाली घोड़ोंको तीव्रवेगसे आगे बढ़ाया। पाण्डुपुत्र अर्जुनका वह मनोजव रथ एक ही क्षणमें कर्णके रथके सामने जाकर खड़ा हो गया ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनद्वैरथे वासुदेववाक्ये षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अर्जुनके द्वैरथयुद्धके प्रसंगमें भगवान् श्रीकृष्णका वाक्यविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2302)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ताशीतितमोऽध्यायः

कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता

संजय उवाच

वृषसेनं हतं दृष्ट्वा शोकामर्षसमन्वितः ।
पुत्रशोकोद्भवं वारि नेत्राभ्यां समवासृजत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब कर्णने वृषसेनको मारा गया देखा, तब वह शोक और अमर्षके वशीभूत हो अपने दोनों नेत्रोंसे पुत्रशोकजनित आँसू बहाने लगा ॥ १ ॥

रथेन कर्णस्तेजस्वी जगामाभिमुखो रिपुम् ।
युद्धायामर्शताम्राक्षः समाहूय धनंजयम् ॥ २ ॥
फिर तेजस्वी कर्ण क्रोधसे लाल आँखें करके अपने शत्रु धनंजयको युद्धके लिये ललकारता हुआ रथके द्वारा उनके सामने आया ॥ २ ॥

तौ रथौ सूर्यसंकाशौ वैयाघ्रपरिवारितौ ।
समेतौ ददृशुस्तत्र द्वाविवाकौ समुद्गतौ ॥ ३ ॥
व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और सूर्यके समान तेजस्वी वे दोनों रथ जब एकत्र हुए, तब लोगोंने वहाँ उन्हें इस प्रकार देखा, मानो दो सूर्य उदित हुए हों ॥ ३ ॥

श्वेताश्वौ पुरुषौ दिव्यावास्थितावरिमर्दनौ ।
शुशुभाते महात्मानौ चन्द्रादित्यौ यथा दिवि ॥ ४ ॥
दोनोंके घोड़े सफेद रंगके थे। दोनों ही दिव्य पुरुष और शत्रुओंका मर्दन करनेमें समर्थ थे। वे दोनों महामनस्वी वीर आकाशमें चन्द्रमा और सूर्यके समान रणभूमिमें शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥

तौ दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुः सर्वसैन्यानि मारिष ।
त्रैलोक्यविजये यत्ताविन्द्रवैरोचनाविव ॥ ५ ॥
मान्यवर! तीनों लोकोंपर विजय पानेके लिये प्रयत्नशील हुए इन्द्र और बलिके समान उन दोनों वीरोंको आमने-सामने देखकर समस्त सेनाओंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५ ॥

रथज्यातलनिर्ह्रादैर्बाणसिंहरवैस्तथा ।
तौ रथावभिधावन्तौ समालोक्य महीक्षिताम् ॥ ६ ॥
ध्वजौ च दृष्ट्वा संसक्तौ विस्मयः समपद्यत ।

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हस्तिकक्षं च कर्णस्य वानरं च किरीटिनः ॥ ७ ॥ रथ, धनुषकी प्रत्यंचा और हथेलीके शब्द, बाणोंकी सनसनाहट तथा सिंहनादके साथ एक-दूसरेके सम्मुख दौड़ते हुए उन दोनों रथोंको देखकर एवं उनकी परस्पर सटी हुई ध्वजाओंका अवलोकन करके वहाँ आये हुए राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ। कर्णकी ध्वजामें हाथीके साँकलका चिह्न था और किरीटधारी अर्जुनकी ध्वजापर मूर्तिमान् वानर बैठा था ॥ ६-७ ॥ तौ रथौ सम्प्रसक्तौ तु दृष्ट्वा भारत पार्थिवाः । सिंहनादवांश्चक्रुः साधुवादांश्च पुष्कलान् ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! उन दोनों रथोंको एक-दूसरेसे सटा देख सब राजा सिंहनाद करने और प्रचुर साधुवाद देने लगे ॥ दृष्ट्वा च द्वैरथं ताभ्यां तत्र योधाः सहस्रशः । चक्रुर्बाहुस्वनांश्चैव तथा चैलावधूननम् ॥ ९ ॥ उन दोनोंका द्वैरथ युद्ध प्रस्तुत देख वहाँ खड़े हुए सहस्रों योद्धा अपनी भुजाओंपर ताल ठोकने और कपड़े हिलाने लगे ॥ ९ ॥ आजघ्नुः कुरवस्तत्र वादित्राणि समन्ततः । कर्णं प्रहर्षयिष्यन्तः शङ्खान् दध्मुश्च सर्वशः ॥ १० ॥ तदनन्तर कर्णका हर्ष बढ़ानेके लिये कौरव-सैनिक वहाँ सब ओर बाजे बजाने और शंखध्वनि करने लगे ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे हर्षयन्तो धनंजयम् । तूर्यशङ्खनिनादेन दिशः सर्वा व्यनादयन् ॥ ११ ॥ इसी प्रकार समस्त पाण्डव भी अर्जुनका हर्ष बढ़ाते हुए वाद्यों और शंखोंकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे ॥ ११ ॥ क्ष्वेडितास्फोटितोत्कृष्टैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् । बाहुशब्दैश्च शूराणां कर्णार्जुनसमागमे ॥ १२ ॥ कर्ण और अर्जुनके उस संघर्षमें शूरवीरोंके सिंहनाद करने, ताली बजाने, गर्जने और भुजाओंपर ताल ठोकनेसे सब ओर भयानक आवाज गूँज उठी ॥ १२ ॥ तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ रथस्थौ रथिनां वरौ । प्रगृहीतमहाचापौ शरशक्तिध्वजायुतौ ॥ १३ ॥ वर्मिणौ बद्धनिस्त्रिंशौ श्वेताश्वौ शङ्खशोभितौ । तूणीरवरसम्पन्नौ द्वावप्येतौ सुदर्शनौ ॥ १४ ॥ रक्तचन्दनदिग्धाङ्गौ समदौ गोवृषाविव । चापविद्युद्ध्वजोपेतौ शस्त्रसम्पत्तियोधिनौ ॥ १५ ॥ चामरव्यजनोपेतौ श्वेतच्छत्रोपशोभितौ ।

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कृष्णशल्यरथोपेतौ तुल्यरूपौ महारथौ ॥ १६ ॥ सिंहस्कन्धौ दीर्घभुजौ रक्ताक्षौ हेममालिनौ । सिंहस्कन्धप्रतीकाशौ व्यूढोरस्कौ महाबलौ ॥ १७ ॥ अन्योन्यवधमिच्छन्तावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । अन्योन्यमभिधावन्तौ गोष्ठे गोवृषभाविव । प्रभिन्नाविव मातङ्गौ सुसंरब्धाविवाचलौ ॥ १८ ॥ आशीविषशिशुप्रख्यौ यमकालान्तकोपमौ । इन्द्रवृत्राविव क्रुद्धौ सूर्याचन्द्रसमप्रभौ ॥ १९ ॥ महाग्रहाविव क्रुद्धौ युगान्ताय समुत्थितौ । देवगर्भौ देवबलौ देवतुल्यौ च रूपतः ॥ २० ॥ यदृच्छया समायातौ सूर्याचन्द्रमसौ यथा । बलिनौ समरे दृप्तौ नानाशस्त्रधरौ युधि ॥ २१ ॥ तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ शार्दूलाविव धिष्ठितौ । बभूव परमो हर्षस्तावकानां विशाम्पते ॥ २२ ॥

वे दोनों पुरुषसिंह रथपर विराजमान और रथियोंमें श्रेष्ठ थे। दोनोंने विशाल धनुष धारण किये थे। दोनों ही बाण, शक्ति और ध्वजसे सम्पन्न थे। दोनों कवचधारी थे और कमरमें तलवार बाँधे हुए थे। उन दोनोंके घोड़े श्वेत रंगके थे। वे दोनों ही शंखसे सुशोभित, उत्तम तरकससे सम्पन्न और देखनेमें सुन्दर थे। दोनोंके ही अंगोंमें लाल चन्दनका अनुलेप लगा हुआ था। दोनों ही साँड़ोंके समान मदमत्त थे। दोनोंके धनुष और ध्वज विद्युत्के समान कान्तिमान् थे। दोनों ही शस्त्रसमूहोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल थे। दोनों ही चँवर और व्यजनोंसे युक्त तथा श्वेत छत्रसे सुशोभित थे। एकके सारथि श्रीकृष्ण थे तो दूसरेके शल्य। उन दोनों महारथियोंके रूप एक-से ही थे। उनके कंधे सिंहके समान, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और आँखें लाल थीं। दोनोंने सुवर्णकी मालाएँ पहन रखी थीं। दोनों सिंहके समान उन्नत कंधोंसे प्रकाशित होते थे। दोनोंकी छाती चौड़ी थी और दोनों ही महान् बलशाली थे। दोनों एक-दूसरेका वध चाहते और परस्पर विजय पानेकी अभिलाषा रखते थे। गोशालामें लड़नेवाले दो साँड़ोंके समान वे दोनों एक-दूसरेपर धावा करते थे। मद बहानेवाले मदोन्मत्त हाथियोंके समान दोनों ही रोषावेशमें भरे हुए थे। पर्वतके समान अविचल थे। विषधर सर्पोंके शिशुओं-जैसे जान पड़ते थे। यम, काल और अन्तकके समान भयंकर प्रतीत होते थे। इन्द्र और वृत्रासुरके समान वे एक-दूसरेपर कुपित थे। सूर्य और चन्द्रमाके समान अपनी प्रभा बिखेर रहे थे। क्रोधमें भरे हुए दो महान् ग्रहोंके समान प्रलय मचानेके लिये उठ खड़े हुए थे। दोनों ही देवताओंके बालक, देवताओंके समान बली और देवतुल्य रूपवान् थे। दैवेच्छासे भूतलपर उतरे हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे। दोनों ही समरांगणमें बलवान् और अभिमानी थे। युद्धके लिये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए थे।

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प्रजानाथ! आमने-सामने खड़े हुए दो सिंहोंके समान उन दोनों नरव्याघ्र वीरोंको देखकर आपके सैनिकोंको महान् हर्ष हुआ ।। १३—२२ ।।
संशयः सर्वभूतानां विजये समपद्यत ।
समेतौ पुरुषव्याघ्रौ प्रेक्ष्य कर्णधनंजयौ ।। २३ ।।
पुरुषसिंह कर्ण और धनंजयको एकत्र हुआ देखकर समस्त प्राणियोंको किसी एककी विजयमें संदेह होने लगा ।। २३ ।।
उभौ वरायुधधरावुभौ रणकृतश्रमौ ।
उभौ च बाहुशब्देन नादयन्तौ नभस्तलम् ।। २४ ।।
दोनोंने श्रेष्ठ आयुध धारण कर रखे थे, दोनोंने ही युद्धकी कला सीखनेमें परिश्रम किया था और दोनों अपनी भुजाओंके शब्दसे आकाशको प्रतिध्वनित कर रहे थे ।। २४ ।।
उभौ विश्रुतकर्माणौ पौरुषेण बलेन च ।
उभौ च सदृशौ युद्धे शम्बरामरराजयोः ।। २५ ।।
दोनोंके कर्म विख्यात थे। युद्धमें पुरुषार्थ और बलकी दृष्टिसे दोनों ही शम्बरासुर और देवराज इन्द्रके समान थे ।।
कार्तवीर्यसमौ चोभौ तथा दाशरथेः समौ ।
विष्णुवीर्यसमौ चोभौ तथा भवसमौ युधि ।। २६ ।।
दोनों ही युद्धमें कार्तवीर्य अर्जुन, दशरथनन्दन श्रीराम, भगवान् विष्णु और भगवान् शंकरके समान पराक्रमी थे ।। २६ ।।
उभौ श्वेतहयौ राजन् रथप्रवरवाहिनौ ।
सारथी प्रवरौ चैव तयोरास्तां महारणे ।। २७ ।।
‘राजन्! दोनोंके घोड़े सफेद रंगके थे। दोनों ही श्रेष्ठ रथपर सवार थे और उस महासमरमें दोनोंके सारथि श्रेष्ठ पुरुष थे ।। २७ ।।
ततो दृष्ट्वा महाराज राजमानौ महारथौ ।
सिद्धचारणसंघानां विस्मयः समपद्यत ।। २८ ।।
महाराज! वहाँ सुशोभित होनेवाले दोनों महारथियों-को देखकर सिद्धों और चारणोंके समुदायोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। २८ ।।
तव पुत्रास्ततः कर्णं सबला भरतर्षभ ।
परिवव्रुर्महात्मानं क्षिप्रमाहवशौभिनम् ।। २९ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर सेनासहित आपके पुत्र युद्धमें शोभा पानेवाले महामनस्वी कर्णको शीघ्र ही सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। २९ ।।
तथैव पाण्डवा हृष्टा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
परिवव्रुर्महात्मानं पार्थमप्रतिमं युधि ।। ३० ।।

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इसी प्रकार हर्षमें भरे हुए धृष्टद्युम्न आदि पाण्डववीर युद्धमें अपना सानी न रखनेवाले महात्मा कुन्तीकुमार अर्जुनको घेरकर खड़े हुए ।। ३० ।। (यमौ च चेकितानश्च प्रहृष्टाश्च प्रभद्रकाः । नानादेश्याश्च ये शूराः शिष्टा युद्धाभिनन्दिनः ।। ते सर्वे सहिता हृष्टाः परिवव्रुर्धनंजयम् । रिरक्षिषन्तः शत्रुघ्नं पत्त्यश्वरथकुञ्जरैः ।। धनंजयस्य विजये धृताः कर्णवधेऽपि च । नकुल, सहदेव, चेकितान, हर्षमें भरे हुए प्रभद्रकगण, नाना देशोंके निवासी और युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अवशिष्ट शूरवीर—ये सब-के-सब हर्षमें भरकर एक साथ अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। वे पैदल, घुड़सवार, रथों और हाथियोंद्वारा शत्रुसूदन अर्जुनकी रक्षा करना चाहते थे। उन्होंने अर्जुनकी विजय और कर्णके वधके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था। तथैव तावकाः सर्वे यत्ताः सेनाप्रहारिणः । दुर्योधनमुखा राजन् कर्णं जुगुपुराहवे ।) राजन्! इसी प्रकार दुर्योधन आदि आपके सभी पुत्र सावधान एवं शत्रुसेनाओंपर प्रहार करनेके लिये उद्यत हो युद्धस्थलमें कर्णकी रक्षा करने लगे। तावकानां रणे कर्णो ग्लहो ह्यासीद् विशाम्पते । तथैव पाण्डवेयानां ग्लहः पार्थोऽभवत् तदा ।। ३१ ।। प्रजानाथ! आपकी ओरसे युद्धरूपी जूएमं कर्णको दाँवपर लगा दिया गया था। इसी प्रकार पाण्डवपक्षकी ओरसे कुन्तीकुमार अर्जुन दाँवपर चढ़ गये थे ।। ३१ ।। त एव सभ्यास्तत्रासन् प्रेक्षकाश्चाभवन् स्म ते । तत्रैषां ग्लहमानानां ध्रुवौ जयपराजयौ ।। ३२ ।। जो पहलेके जूएमं दर्शक थे, वे ही वहाँ भी सभासद् बने हुए थे। वहाँ युद्धरूपी जूआ खेलते हुए इन वीरोंमेंसे एककी जय और दूसरेकी पराजय अवश्यम्भावी थी ।। ३२ ।। ताभ्यां द्यूतं समासक्तं विजयायेतराय च । अस्माकं पाण्डवानां च स्थितानां रणमूर्धनि ।। ३३ ।। उन दोनोंने युद्धके मुहानेपर खड़े हुए हमलोगों तथा पाण्डवोंकी विजय अथवा पराजयके लिये रणद्यूत आरम्भ किया था ।। ३३ ।। तौ तु स्थितौ महाराज समरे युद्धशालिनौ । अन्योन्यं प्रतिसंरब्धावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।। ३४ ।। महाराज! युद्धमें शोभा पानेवाले वे दोनों वीर परस्पर कुपित हो एक-दूसरेके वधकी इच्छासे संग्रामके लिये खड़े हुए थे ।। ३४ ।। तावुभौ प्रजिहीर्षन्ताविन्द्रवृत्राविव प्रभो ।

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भीमरूपधरावास्तां महाधूमाविव ग्रहौ ॥ ३५ ॥
प्रभो! इन्द्र और वृत्रासुरके समान वे दोनों एक-दूसरेपर प्रहारकी इच्छा रखते थे। उस समय उन दोनोंने दो महान् केतु—ग्रहोंके समान अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर लिया था ॥ ३५ ॥
ततोऽन्तरिक्षे साक्षेपा विवादा भरतर्षभ ।
मिथो भेदाश्च भूतानामासन् कर्णार्जुनन्तरे ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अन्तरिक्षमें स्थित हुए समस्त भूतोंमें कर्ण और अर्जुनकी जय-पराजयको लेकर परस्पर आक्षेपयुक्त विवाद और मतभेद पैदा हो गया ॥ ३६ ॥
व्यश्रूयन्त मिथो भिन्नाः सर्वलोकास्तु मारिष ।
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥ ३७ ॥
प्रतिपक्षग्रहं चक्रुः कर्णार्जुनसमागमे ।
मान्यवर! सब लोग परस्पर भिन्न विचार व्यक्त करते सुनायी देते थे। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस—इन सबने कर्ण और अर्जुनके युद्धके विषयमें पक्ष और विपक्ष ग्रहण कर लिया ॥ ३७ १/२ ॥
द्यौरासीत् सूतपुत्रस्य पक्षे मातेव धिष्ठिता ॥ ३८ ॥
भूमिर्धनंजयस्यासीन्मातेव जयकाङ्क्षिणी ।
द्यौ (आकाशकी अधिष्ठात्री देवी) माताके समान सूतपुत्र कर्णके पक्षमें खड़ी थी; परंतु भूदेवी माताकी भाँति धनंजयकी विजय चाहती थी ॥ ३८ १/२ ॥
गिरयः सागराश्चैव नद्यश्च सजलास्तथा ॥ ३९ ॥
वृक्षाश्चौषधयश्चैव व्याश्रयन्त किरीटिनम् ।
पर्वत, समुद्र, सजल नदियाँ, वृक्ष तथा ओषधियाँ—इन सबने अर्जुनके पक्षका आश्रय ले रखा था ॥ ३९ १/२ ॥
असुरा यातुधानाश्च गुह्यकाश्च परंतप ॥ ४० ॥
ते कर्णं समपद्यन्त हृष्टरूपाः समन्ततः ।
शत्रुओंको तपानेवाले वीर! असुर, यातुधान और गुह्यक—ये सब ओरसे प्रसन्नचित्त हो कर्णके ही पक्षमें आ गये थे ॥ ४० १/२ ॥
मुनयश्चारणाः सिद्धा वैनतेया वयांसि च ॥ ४१ ॥
रत्नानि निधयः सर्वे वेदाश्चाख्यानपञ्चमाः ।
सोपवेदोपनिषदः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥ ४२ ॥
वासुकिश्चित्रसेनश्च तक्षको मणिकस्तथा ।
सर्पाश्चैव तथा सर्वे काद्रवेयाश्च सान्वयाः ॥ ४३ ॥
विषवन्तो महाराज नागाश्चार्जुनतोऽभवन् ।
ऐरावताः सौरभेया वैशालेयाश्च भोगिनः ॥ ४४ ॥

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एतेऽभवन्नर्जुनतः क्षुद्रसर्पाश्च कर्णतः । महाराज! मुनि, चारण, सिद्ध, गरुड़, पक्षी, रत्न, निधियाँ, उपवेद, उपनिषद्, रहस्य, संग्रह और इतिहास-पुराणसहित सम्पूर्ण वेद, वासुकि, चित्रसेन, तक्षक, मणिक, सम्पूर्ण सर्पगण, अपने वंशजोंसहित कद्रूकी संतानें, विषैले नाग, ऐरावत, सौरभेय और वैशालेय सर्प—ये सब अर्जुनके पक्षमें हो गये। छोटे-छोटे सर्प कर्णका साथ देने लगे ॥ ४१—४४ १/२ ॥

ईहामृगा व्यालमृगा माङ्गल्याश्च मृगद्विजाः ॥ ४५ ॥ पार्थस्य विजये राजन् सर्व एवाभिसंसृताः । राजन्! ईहामृग, व्यालमृग, मंगलसूचक मृग, पशु और पक्षी, सिंह तथा व्याघ्र—ये सब-के-सब अर्जुनकी ही विजयका आग्रह रखने लगे ॥ ४५ १/२ ॥

वसवो मरुतः साध्या रुद्रा विश्वेऽश्विनौ तथा ॥ ४६ ॥ अग्निरिन्द्रश्च सोमश्च पवनोऽथ दिशो दश । धनंजयस्य ते पक्षे आदित्याः कर्णतोऽभवन् ॥ ४७ ॥ विशः शूद्राश्च सूताश्च ये च संकरजातयः । सर्वशस्ते महाराज राधेयमभजंस्तदा ॥ ४८ ॥ वसु, मरुद्गण, साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, सोम, पवन और दसों दिशाएँ अर्जुनके पक्षमें हो गये एवं (इन्द्रके सिवा अन्य) आदित्यगण कर्णके पक्षमें हो गये। महाराज! वैश्य, शूद्र, सूत तथा संकर जातिके लोग सब प्रकारसे उस समय राधापुत्र कर्णको ही अपनाने लगे ॥ ४६—४८ ॥

देवास्तु पितृभिः सार्धं सगणाः सपदानुगाः । यमो वैश्रवणश्चैव वरुणश्च यतोऽर्जुनः ॥ ४९ ॥ ब्रह्म क्षत्रं च यज्ञाश्च दक्षिणाश्चार्जुनं श्रिताः । अपने गणों और सेवकोंसहित देवता, पितर, यम, कुबेर और वरुण अर्जुनके पक्षमें थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, यज्ञ और दक्षिणा आदिने भी अर्जुनका ही साथ दिया ॥ ४९ १/२ ॥

प्रेताश्चैव पिशाचाश्च क्रव्यादाश्च मृगाण्डजाः ॥ ५० ॥ राक्षसाः सह यादोभिः श्वसृगालाश्च कर्णतः । प्रेत, पिशाच, मांसभोजी पशु-पक्षी, राक्षस, जल-जन्तु, कुत्ते और सियार—ये कर्णके पक्षमें हो गये ॥ ५० १/२ ॥

देवब्रह्मन्नृपर्षीणां गणाः पाण्डवतोऽभवन् ॥ ५१ ॥ तुम्बुरुप्रमुखा राजन् गन्धर्वाश्च यतोऽर्जुनः । प्राधेयाः सहमौनेया गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ ५२ ॥ राजन्! देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंके समुदाय पाण्डुपुत्र अर्जुनके पक्षमें थे। तुम्बुरु आदि गन्धर्व, प्राधा और मुनिसे उत्पन्न हुए गन्धर्व एवं अप्सराओंके समुदाय भी अर्जुनकी

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ही ओर थे ॥ ५१-५२ ॥
(सहाप्सरोभिः शुद्धाभिर्देवदूताश्च गुह्यकाः ।
किरीटिनं संश्रिताः स्म पुण्यगन्धा मनोरमाः ॥
अमनोज्ञाश्च ये गन्धास्ते सर्वे कर्णमाश्रिताः ।

शुद्ध अप्सराओंसहित देवदूत, गुह्यक और मनोरम पवित्र सुगन्ध—ये सब किरीटधारी अर्जुनके पक्षमें आ गये तथा मनको प्रिय न लगनेवाले जो दुर्गन्धयुक्त पदार्थ थे, उन सबने कर्णका आश्रय लिया था।
विपरीतान्यरिष्टानि भवन्ति विनशिष्यताम् ॥
ये त्वन्तकाले पुरुषं विपरीतमुपाश्रितम् ।
प्रविशन्ति नरं क्षिप्रं मृत्युकालेऽभ्युपागते ॥
ते भावाः सहिताः कर्णं प्रविष्टाः सूतनन्दनम् ।

विनाशोन्मुख प्राणियोंके समक्ष जो विपरीत अनिष्ट प्रकट होते हैं, अन्तकालमें विपरीतभावका आश्रय लेनेवाले पुरुषमें उसकी मृत्युकी घड़ी आनेपर जो भाव प्रवेश करते हैं, वे सभी भाव और अरिष्ट एक साथ सूतपुत्र कर्णके भीतर प्रविष्ट हुए।
ओजस्तेजश्च सिद्धिश्च प्रहर्षः सत्यविक्रमौ ॥
मनस्तुष्टिर्जयश्चापि तथाऽऽनन्दो नृपोत्तम ।
ईदृशानि नरव्याघ्र तस्मिन् संग्रामसागरे ॥
निमित्तानि च शुभ्राणि विविशुर्जिष्णुमाहवे ।

नरव्याघ्र! नृपश्रेष्ठ! ओज, तेज, सिद्धि, हर्ष, सत्य, पराक्रम, मानसिक संतोष, विजय तथा आनन्द—ऐसे ही भाव और शुभ निमित्त उस युद्धसागरमें विजयशील अर्जुनके भीतर प्रविष्ट हुए थे।
ऋषयो ब्राह्मणैः सार्धमभजन्त किरीटिनम् ॥
ततो देवगणैः सार्धं सिद्धाश्च सह चारणैः ।
द्विधाभूता महाराज व्याश्रयन्त नरोत्तमौ ॥

ब्राह्मणोंसहित ऋषियोंने किरीटधारी अर्जुनका साथ दिया। महाराज! देवसमुदायों और चारणोंके साथ सिद्धगण दो दलोंमें विभक्त होकर उन दोनों नरश्रेष्ठ अर्जुन और कर्णका पक्ष लेने लगे।
विमानानि विचित्राणि गुणवन्ति च सर्वशः ।
समारुह्य समाजग्मुर्द्वैरथं कर्णपार्थयोः ॥)

वे सब लोग विचित्र एवं गुणवान् विमानोंपर बैठकर कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्ध देखनेके लिये आये थे।
ईहामृगाः पक्षिगणा द्विपाश्चरथपत्तिभिः ।
उह्यमानास्तथा मेघैर्वायुना च मनीषिणः ॥ ५३ ॥

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दिदृक्षवः समाजग्मुः कर्णार्जुनसमागमम् । क्रीड़ामृग, पक्षीसमुदाय तथा हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित दिव्य मनीषी पुरुष वायु तथा बादलोंको वाहन बनाकर कर्ण और अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ५३ १/२ ॥ देवदानवगन्धर्वा नागयक्षाः पतत्रिणः ॥ ५४ ॥ महर्षयो वेदविदः पितरश्च स्वधाभुजः । तपोविद्यास्तथौषध्यो नानारूपबलान्विताः ॥ ५५ ॥ अन्तरिक्षे महाराज विनदन्तोऽवतस्थिरे । महाराज! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, पक्षी, वेदज्ञ महर्षि, स्वधाभोजी पितर, तप, विद्या तथा नाना प्रकारके रूप और बलसे सम्पन्न ओषधियाँ—ये सब-के-सब कोलाहल मचाते हुए अन्तरिक्षमें खड़े हुए थे॥ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च ॥ ५६ ॥ भवश्चैव स्थितो याने दिव्ये तं देशमागमत् । ब्रह्मर्षियों तथा प्रजापतियोंके साथ ब्रह्मा और महादेवजी भी दिव्य विमानपर स्थित हो उस प्रदेशमें आये॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ ॥ ५७ ॥ अर्जुनो जयतां कर्णमिति शक्रोऽब्रवीत्तदा । उन दोनों महामनस्वी वीर कर्ण और अर्जुनको एकत्र हुआ देख उस समय इन्द्र बोल उठे—‘अर्जुन कर्णपर विजय प्राप्त करें’॥ ५७ १/२ ॥ जयतामर्जुनं कर्ण इति सूर्योऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥ हत्वार्जुनं मम सुतः कर्णो जयतु संयुगे । हत्वा कर्णं जयत्वद्य मम पुत्रो धनंजयः ॥ ५९ ॥ यह सुनकर सूर्यदेव कहने लगे—‘नहीं, कर्ण ही अर्जुनको जीत ले। मेरा पुत्र कर्ण युद्धस्थलमें अर्जुनको मारकर विजय प्राप्त करे।’ (इन्द्र बोले—) ‘नहीं, मेरा पुत्र अर्जुन ही आज कर्णका वध करके विजयश्रीका वरण करे’॥ ५८-५९॥ इति सूर्यस्य चैवासीद् विवादो वासवस्य च । पक्षसंस्थितयोस्तत्र तयोर्विबुधसिंहयोः । द्वैपक्ष्यमासीद् देवानामसुराणां च भारत ॥ ६० ॥ इस प्रकार सूर्य और इन्द्रमें विवाद होने लगा। वे दोनों देवश्रेष्ठ वहाँ एक-एक पक्षमें खड़े थे। भारत! देवताओं और असुरोंमें भी वहाँ दो पक्ष हो गये थे॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ । अकम्पन्त त्रयो लोकाः सहदेवर्षिचारणाः ॥ ६१ ॥

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महामना कर्ण और अर्जुनको युद्धके लिये एकत्र हुआ देख देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंसहित तीनों लोकके प्राणी काँपने लगे ॥ ६१ ॥

सर्वे देवगणाश्चैव सर्वभूतानि यानि च ।
यतः पार्थस्ततो देवा यतः कर्णस्ततोऽसुराः ॥ ६२ ॥
सम्पूर्ण देवता तथा समस्त प्राणी भी भयभीत हो उठे थे। जिस ओर अर्जुन थे, उधर देवता और जिस ओर कर्ण था, उधर असुर खड़े थे ॥ ६२ ॥

रथयूथपयोः पक्षौ कुरुपाण्डववीरयोः ।
दृष्ट्वा प्रजापतिं देवाः स्वयम्भुवमचोदयन् ॥ ६३ ॥
रथयूथपति कर्ण और अर्जुन कौरव तथा पाण्डव दलके प्रमुख वीर थे। उनके विषयमें दो पक्ष देखकर देवताओंने प्रजापति स्वयम्भू ब्रह्माजीसे पूछा— ॥ ६३ ॥

कोऽनयोर्विजयी देव कुरुपाण्डवयोधयोः ।
समोऽस्तु विजयो देव एतयोर्नरसिंहयोः ॥ ६४ ॥
‘देव! इन कौरव-पाण्डव योद्धाओंमें कौन विजयी होगा? भगवन्! हम चाहते हैं कि इन दोनों पुरुषसिंहोंकी एक-सी ही विजय हो ॥ ६४ ॥

कर्णार्जुनविवादेन सर्वं संशयितं जगत् ।
स्वयम्भो ब्रूहि नस्तथ्यमेतयोर्विजयं प्रभो ॥ ६५ ॥
स्वयम्भो ब्रूहि तद्वाक्यं समोऽस्तु विजयोऽनयोः ।
‘प्रभो! कर्ण और अर्जुनके विवादसे सारा संसार संशयमें पड़ गया। स्वयम्भू! आप हमें इनके विजयके सम्बन्धमें सच्ची बात बताइये। आप ऐसा वचन बोलिये, जिससे इन दोनोंकी समान विजय सूचित हो’ ॥ ६५ ½ ॥

तदुपश्रुत्य मघवा प्रणिपत्य पितामहम् ॥ ६६ ॥
व्यज्ञापयत देवेशमिदं मतिमतां वरः ।
देवताओंकी वह बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ इन्द्रने देवेश्वर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम करके यह निवेदन किया ॥

पूर्वं भगवता प्रोक्तं कृष्णयोर्विजयो ध्रुवः ॥ ६७ ॥
तत् तथास्तु नमस्तेऽस्तु प्रसीद भगवन् मम ।
‘भगवन्! आपने पहले कहा था कि ‘इन दोनों कृष्णोंकी विजय अटल है।’ आपका वह कथन सत्य हो। आपको नमस्कार है। आप मुझपर प्रसन्न होइये’ ॥ ६७ ½ ॥

ब्रह्मेशानावथो वाक्यमूचतुस्त्रिदशेश्वरम् ॥ ६८ ॥
विजयो ध्रुवमेवास्य विजयस्य महात्मनः ।
खाण्डवे येन हुतभुक्तोषितः सव्यसाचिना ॥ ६९ ॥
स्वर्गं च समनुप्राप्य साहाय्यं शक्र ते कृतम् ।

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तब ब्रह्मा और महादेवजीने देवेश्वर इन्द्रसे कहा—‘महात्मा अर्जुनकी विजय तो निश्चित ही है। इन्द्र! इन्हीं सव्यसाची अर्जुनने खाण्डववनमें अग्निदेवको संतुष्ट किया और स्वर्गलोकमें जाकर तुम्हारी भी सहायता की।। ६८-६९½ ।। कर्णश्च दानवः पक्ष अतः कार्यः पराजयः ॥ ७० ॥ एवं कृते भवेत् कार्यं देवानामेव निश्चितम् । आत्मकार्यं च सर्वेषां गरीयस्त्रिदशेश्वर ॥ ७१ ॥ ‘कर्ण दानव-पक्षका पुरुष है; अतः उसकी पराजय करनी चाहिये—ऐसा करनेपर निश्चितरूपसे देवताओंका ही कार्य सिद्ध होगा। देवेश्वर! अपना कार्य सभीके लिये गुरुतर होता है।। ७०-७१ ।। महात्मा फाल्गुनश्चापि सत्यधर्मरतः सदा । विजयस्तस्य नियतं जायते नात्र संशयः ॥ ७२ ॥ ‘महात्मा अर्जुन सदा सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः उनकी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है।। ७२ ।। तोषिता भगवान् येन महात्मा वृषभध्वजः । कथं वा तस्य न जयो जायते शतलोचन ॥ ७३ ॥ ‘शतलोचन! जिन्होंने महात्मा भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट किया है, उनकी विजय कैसे नहीं होगी।। ७३ ।। यस्य चक्रे स्वयं विष्णुः सारथ्यं जगतः प्रभुः । मनस्वी बलवान् शूरः कृतास्त्रोऽथ तपोधनः ॥ ७४ ॥ ‘साक्षात् जगदीश्वर भगवान् विष्णुने जिनका सारथ्य किया है, जो मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और तपस्याके धनी हैं, उनकी विजय क्यों न होगी?।। बिभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः । पार्थः सर्वगुणोपेतो देवकार्यमिदं यतः ॥ ७५ ॥ ‘सर्वगुणसम्पन्न महातेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्वेदको धारण करते हैं; अतः उनकी विजय होगी ही; क्योंकि यह देवताओंका ही कार्य है।। ७५ ।। क्लिश्यन्ते पाण्डवा नित्यं वनवासादिभिर्भृशम् । सम्पन्नस्तपसा चैव पर्याप्तः पुरुषर्षभः ॥ ७६ ॥ ‘पाण्डव वनवास आदिके द्वारा सदा महान् कष्ट उठाते आये हैं। पुरुषप्रवर अर्जुन तपोबलसे सम्पन्न और पर्याप्त शक्तिशाली हैं।। ७६ ।। अतिक्रमेच्च माहात्म्याद् दिष्टमप्यर्थपर्ययम् । अतिक्रान्ते च लोकानामभावो नियतं भवेत् ॥ ७७ ॥ ‘ये अपनी महिमासे दैवके भी निश्चित विधानको पलट सकते हैं; यदि ऐसा हुआ तो सम्पूर्ण लोकोंका अवश्य ही अन्त हो जायगा।। ७७ ।।

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न विद्यते व्यवस्थानं क्रुद्धयोः कृष्णयोः क्वचित् । स्रष्टारौ जगतश्चैव सततं पुरुषर्षभौ ॥ ७८ ॥ 'श्रीकृष्ण और अर्जुनके कुपित होनेपर यह संसार कहीं टिक नहीं सकता; पुरुषप्रवर श्रीकृष्ण और अर्जुन ही निरन्तर जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ ७८ ॥

नरनारायणावेतौ पुराणावृषिसत्तमौ । अनियम्यौ नियन्तारावेतौ तस्मात् परंतपौ ॥ ७९ ॥ 'ये ही प्राचीन ऋषिश्रेष्ठ नर और नारायण हैं; इनपर किसीका शासन नहीं चलता। ये ही सबके नियन्ता हैं; अतः ये शत्रुओंको संताप देनेमें समर्थ हैं ॥ ७९ ॥

नैतयोस्तु समः कश्चिद् दिवि वा मानुषेषु वा । अनुगम्यास्त्रयो लोकाः सह देवर्षिचारणैः ॥ ८० ॥ सर्वदेवगणाश्चापि सर्वभूतानि यानि च । अनयोस्तु प्रभावेण वर्तते निखिलं जगत् ॥ ८१ ॥ 'देवलोक अथवा मनुष्यलोकमें कोई भी इन दोनोंकी समानता करनेवाला नहीं है। देवता, ऋषि और चारणोंके साथ तीनों लोक, समस्त देवगण और सम्पूर्ण भूत इनके ही नियन्त्रणमें रहनेवाले हैं। इन्हींके प्रभावसे सम्पूर्ण जगत् अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त होता है ॥ ८०-८१ ॥

कर्णो लोकानयं मुख्यानाप्नोतु पुरुषर्षभः । कर्णो वैकर्तनः शूरो विजयस्त्वस्तु कृष्णयोः ॥ ८२ ॥ 'शूरवीर पुरुषप्रवर वैकर्तन कर्ण श्रेष्ठ लोक प्राप्त करे; परंतु विजय तो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ही हो ॥ ८२ ॥

वसूनां समलोकत्वं मरुतां वा समाप्नुयात् । सहितो द्रोणभीष्माभ्यां नाकलोकमवाप्नुयात् ॥ ८३ ॥ 'कर्ण द्रोणाचार्य और भीष्मजीके साथ वसुओं अथवा मरुद्गणोंके लोकमें जाय अथवा स्वर्गलोक ही प्राप्त करे' ॥ ८३ ॥

इत्युक्तो देवदेवाभ्यां सहस्राक्षोऽब्रवीद् वचः । आमन्त्र्य सर्वभूतानि ब्रह्मेशानानुशासनम् ॥ ८४ ॥ देवाधिदेव ब्रह्मा और महादेवजीके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सम्पूर्ण प्राणियोंको बुलाकर उन दोनोंकी आज्ञा सुनायी ॥

श्रुतं भवद्भैर्यत् प्रोक्तं भगवद्भ्यां जगद्धितम् । तत्तथा नान्यथा तद्धि तिष्ठध्वं विगतज्वराः ॥ ८५ ॥ वे बोले—'हमारे पूज्य प्रभुओंने संसारके हितके लिये जो कुछ कहा है, वह सब तुमलोगोंने सुन ही लिया होगा। वह वैसे ही होगा। उसके विपरीत होना असम्भव है; अतः अब निश्चिन्त हो जाओ' ॥ ८५ ॥

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इति श्रुत्वेन्द्रवचनं सर्वभूतानि मारिष । विस्मितान्यभवन् राजन् पूजयांचक्रिरे तदा ॥ ८६ ॥ व्यसृजंश्च सुगन्धीनि पुष्पवर्षाणि हर्षिताः । नानारूपाणि विबुधा देवतूर्याण्यवादयन् ॥ ८७ ॥ माननीय नरेश! इन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त प्राणी विस्मित हो गये और हर्षमें भरकर श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे। साथ ही उन दोनोंके ऊपर उन्होंने दिव्य सुगन्धित फूलोंकी वर्षा की। देवताओंने नाना प्रकारके दिव्य बाजे बजाने आरम्भ कर दिये ॥

दिदृक्षवश्चाप्रतिमं द्वैरथं नरसिंहयोः । देवदानवगन्धर्वाः सर्व एवावतस्थिरे ॥ ८८ ॥ पुरुषसिंह कर्ण और अर्जुनका अनुपम द्वैरथ युद्ध देखनेकी इच्छासे देवता, दानव और गन्धर्व सभी वहाँ खड़े हो गये ॥ ८८ ॥

रथौ तयोः श्वेतहयौ दिव्यौ युक्तौ महात्मनोः । यौ तौ कर्णार्जुनौ राजन् प्रहृष्टावभ्यतिष्ठताम् ॥ ८९ ॥ राजन्! कर्ण और अर्जुन हर्षमें भरकर जिन रथोंपर बैठे हुए थे, उन महामनस्वी वीरोंके वे दोनों रथ श्वेत घोड़ोंसे युक्त, दिव्य और आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न थे ॥ ८९ ॥

समागता लोकवीराः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् । वासुदेवार्जुनौ वीरौ कर्णशल्यौ च भारत ॥ ९० ॥ भरतनन्दन! वहाँ एकत्र हुए सम्पूर्ण जगत्के वीर पृथक्-पृथक् शंखध्वनि करने लगे। वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनने तथा शल्य और कर्णने भी अपना-अपना शंख बजाया ॥

तद् भीरुसंत्रासकरं युद्धं समभवत्तदा । अन्योन्यस्पर्धिनोरुग्रं शक्रशम्बरयोरिव ॥ ९१ ॥ इन्द्र और शम्बरासुरके समान एक-दूसरेसे डाह रखनेवाले उन दोनों वीरोंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हुआ, जो कायरोंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥

तयोर्ध्वजौ वीतमलौ शुशुभाते रथे स्थितौ । राहुकेतू यथाऽऽकाशे उदितौ जगतः क्षये ॥ ९२ ॥ उन दोनोंके रथोंपर निर्मल ध्वजाएँ शोभा पा रही थीं, मानो संसारके प्रलयकालमें आकाशमें राहु और केतु दोनों ग्रह उदित हुए हों ॥ ९२ ॥

कर्णस्याशीविषनिभा रत्नसारमयी दृढा । पुरन्दरधनुःप्रख्या हस्तिकक्ष्या व्यराजत ॥ ९३ ॥ कर्णके ध्वजकी पताकामें हाथीकी साँकलका चिह्न था, वह साँकल रत्नसारमयी, सुदृढ़ और विषधर सर्पके समान आकारवाली थी। वह आकाशमें इन्द्रधनुषके समान शोभा पाती थी ॥ ९३ ॥

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कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्य इवान्तकः । दंष्ट्राभिर्भीषयन् भाभिर्दुर्निरीक्ष्यो रविर्यथा ॥ ९४ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनके रथपर मुँह बाये हुए यमराजके समान एक श्रेष्ठ वानर बैठा हुआ था, जो अपनी दाढ़ोंसे सबको डराया करता था। वह अपनी प्रभासे सूर्यके समान जान पड़ता था। उसकी ओर देखना कठिन था ॥ ९४ ॥

युद्धाभिलाषुको भूत्वा ध्वजो गाण्डीवधन्वनः । कर्णध्वजमुपातिष्ठत् स्वस्थानाद् वेगवान् कपिः ॥ ९५ ॥ उत्पपात महावेगः कक्ष्यामभ्याहनत्तदा । नखैश्च दशनैश्चैव गरुडः पन्नगं यथा ॥ ९६ ॥ गाण्डीवधारी अर्जुनका ध्वज मानो युद्धका इच्छुक होकर कर्णके ध्वजपर आक्रमण करने लगा। अर्जुनकी ध्वजाका महान् वेगशाली वानर उस समय अपने स्थानसे उछला और कर्णकी ध्वजाकी साँकलपर चोट करने लगा, जैसे गरुड़ अपने पंजों और चोंचसे सर्पपर प्रहार कर रहे हों ॥

सा किङ्किणीकाभरणा कालपाशोपमाऽऽयसी । अभ्यद्रवत् सुसंरब्धा हस्तिकक्ष्याथ तं कपिम् ॥ ९७ ॥ कर्णके ध्वजपर जो हाथीकी साँकल थी, वह कालपाशके समान जान पड़ती थी। वह लोहनिर्मित हाथीकी साँकल छोटी-छोटी घण्टियोंसे विभूषित थी। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस वानरपर धावा किया ॥

तयोर्घोरतरे युद्धे द्वैरथे द्यूत आहिते । प्रकुर्वाते ध्वजौ युद्धं पूर्वं पूर्वतरं तदा ॥ ९८ ॥ उन दोनोंमें घोरतर द्वैरथ युद्धरूपी जूएका अवसर उपस्थित था, इसीलिये उन दोनोंकी ध्वजाओंने पहले स्वयं ही युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ९८ ॥

हया हयानभ्यहेषन् स्पर्धमानाः परस्परम् । अविध्यत् पुण्डरीकाक्षः शल्यं नयनसायकैः ॥ ९९ ॥ एकके घोड़े दूसरेके घोड़ोंको देखकर परस्पर लाग-डाँट रखते हुए हिनहिनाने लगे। इसी समय कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने शल्यकी ओर त्यौरी चढ़ाकर देखा, मानो वे उसे नेत्ररूपी बाणोंसे बींध रहे हों ॥ ९९ ॥

शल्यश्च पुण्डरीकाक्षं तथैवाभिसमैक्षत । तत्राजयद् वासुदेवः शल्यं नयनसायकैः ॥ १०० ॥ इसी प्रकार शल्यने भी कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर दृष्टिपात किया; परंतु वहाँ विजय श्रीकृष्णकी ही हुई। उन्होंने अपने नेत्ररूपी बाणोंसे शल्यको पराजित कर दिया ॥

कर्णं चाप्यजयद् दृष्ट्या कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अथाब्रवीत् सूतपुत्रः शल्यमाभाष्य सस्मितम् ॥ १०१ ॥