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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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धृष्टद्युम्न, युधामन्यु, पराक्रमी उत्तमौजा, कोसलराज बृहद्वल, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, सुबलपुत्र शकुनि, अचल, वृषक, राजा भगदत्त, पुत्रोंसहित अमर्षशील वैकर्तन कर्ण, महाधनुर्धर पाँचों केकयराजकुमार, महारथी त्रिगर्त, राक्षसराज घटोत्कच, बकके भाई राक्षसप्रवर अलम्बुष और राजा जलसंध—इनका तथा अन्य बहुतेरे सहस्रों भूपालोंका घीकी धारासे प्रज्वलित हुई अग्नियोंद्वारा उन लोगोंने दाह-कर्म कराया ।। ३१—३८ ।।

पितृमेधाश्च केषांचित् प्रावर्तन्त महात्मनाम् ।
सामभिश्चाप्यगायन्त तेऽन्वशोचन्त चापरैः ॥ ३९ ॥
किन्हीं महामनस्वी वीरोंके लिये पितृमेध (श्राद्धकर्म) भी आरम्भ कर दिये गये। कुछ लोगोंने वहाँ सामगान किया तथा कितने ही मनुष्योंने वहाँ मरे हुए विभिन्न जनोंके लिये महान् शोक प्रकट किया ।। ३९ ।।

साम्नामृचां च नादेन स्त्रीणां च रुदितस्वनैः ।
कश्मलं सर्वभूतानां निशायां समपद्यत ॥ ४० ॥
सामवेदीय मन्त्रों तथा ऋचाओंके घोष और स्त्रियोंके रोनेकी आवाजसे वहाँ रातमें सभी प्राणियोंको बड़ा कष्ट हुआ ।। ४० ।।

ते विधूमाः प्रदीप्ताश्च दीप्यमानाश्च पावकाः ।
नभसीवान्वदृश्यन्त ग्रहास्तन्वभ्रसंवृताः ॥ ४१ ॥
उस समय स्वल्प धूमयुक्त, प्रज्वलित तथा जलायी जाती हुई चिताकी अग्नियाँ आकाशमें सूक्ष्म बादलोंसे ढँके हुए ग्रहोंके समान दिखायी देती थीं ।। ४१ ।।

ये चाप्यनाथास्तत्रासन् नानादेशसमागताः ।
तांश्च सर्वान् समानाय्य राशीन् कृत्वा सहस्रशः ॥ ४२ ॥
चित्त्वा दारुभिरव्यग्रैः प्रभूतैः स्नेहपाचितैः ।
दाहयामास तान् सर्वान् विदुरो राजशासनात् ॥ ४३ ॥
इसके बाद वहाँ अनेक देशोंसे आये हुए जो अनाथ लोग मारे गये, उन सबकी लाशोंको मँगवाकर उनके सहस्रों ढेर लगाये। फिर घी-तेलमें भिगोयी हुई बहुत-सी लकड़ियोंद्वारा स्थिरचित्तवाले लोगोंसे चिता बनाकर उन सबको विदुरजीने राजाकी आज्ञाके अनुसार दग्ध करवा दिया ।। ४२-४३ ।।

कारयित्वा क्रियास्तेषां कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गङ्गामभिमुखोऽगमत् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार उन सबका दाहकर्म कराकर कुरुराज युधिष्ठिर धृतराष्ट्रको आगे करके गंगाजीकी ओर चले गये ।। ४४ ।।

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि श्राद्धपर्वणि कुरूणामौर्ध्वदेहिके षड्विंशोऽध्यायः ॥
२६ ॥

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इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत श्राद्धपर्वमें कौरवोंका और्ध्वदैहिक संस्कारविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६ ।।

अध्याय (पृष्ठ 3230)

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सप्तविंशोऽध्यायः

सभी स्त्री-पुरुषोंका अपने मरे हुए सम्बन्धियोंको जलांजलि देना, कुन्तीका अपने गर्भसे कर्णके जन्म होनेका रहस्य प्रकट करना तथा युधिष्ठिरका कर्णके लिये शोक प्रकट करते हुए उनका प्रेतकृत्य सम्पन्न करना और स्त्रियोंके मनमें रहस्यकी बात न छिपनेका शाप देना

वैशम्पायन उवाच

ते समासाद्य गङ्गां तु शिवां पुण्यजलोचिताम् ।
ह्रदिनीं च प्रसन्नां च महारूपां महावनाम् ॥ १ ॥
भूषणान्युत्तरीयाणि वेष्टनान्यवमुच्य च ।
ततः पितॄणां भ्रातॄणां पौत्राणां स्वजनस्य च ॥ २ ॥
पुत्राणामार्यकाणां च पतीनां च कुरुस्त्रियः ।
उदकं चक्रिरे सर्वा रुदत्यो भृशदुःखिताः ॥ ३ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! वे युधिष्ठिर आदि सब लोग कल्याणमयी, पुण्यसलिला, अनेक जलकुण्डोंसे सुशोभित, स्वच्छ, विशाल रूपधारिणी तथा तटप्रदेशमें महान् वनवाली गङ्गाजीके तटपर आकर अपने सारे आभूषण, दुपट्टे तथा पगड़ी आदि उतार डाले और पिताओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, स्वजनों तथा आर्य वीरोंके लिये जलांजलि प्रदान की। अत्यन्त दुःखसे रोती हुई कुरुकुलकी सभी स्त्रियोंने भी अपने पिता आदिके साथ-साथ पतियोंके लिये जल अर्पण किये ॥

सुहृदां चापि धर्मज्ञाः प्रचक्रुः सलिलक्रियाः ।
उदके क्रियमाणे तु वीराणां वीरपत्निभिः ॥ ४ ॥
सूपतीर्था भवद्गङ्गा भूयो विप्रससार च ।

धर्मज्ञ पुरुषोंने अपने हितैषी सुहृदोंके लिये भी जलांजलि देनेका कार्य सम्पन्न किया। वीरोंकी पत्नियोंद्वारा जब उन वीरोंके लिये जलांजलि दी जा रही थी, उस समय गङ्गाजीके जलमें उतरनेके लिये बड़ा सुन्दर मार्ग बन गया और गङ्गाका पाट अधिक चौड़ा हो गया ॥ ४ ½ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3231)

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युद्धमें काम आये हुए वीरोंको उनके सम्बन्धियोंद्वारा जलदान

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तन्महोदधिसंकाशं निरानन्दमनुत्सवम् ॥ ५ ॥
वीरपत्नीभिराकीर्णं गङ्गातीरमशोभत ।
महासागरके समान विशाल वह गंगातट आनन्द और उत्सवसे शून्य होनेपर भी उन वीर-पत्नियोंसे व्याप्त होनेके कारण बड़ी शोभा पाने लगा ॥ ५१/२ ॥
ततः कुन्ती महाराज सहसा शोककर्शिता ॥ ६ ॥
रुदती मन्दया वाचा पुत्रान् वचनमब्रवीत् ।
महाराज! तदनन्तर कुन्तीदेवी सहसा शोकसे कातर हो रोती हुई मन्द वाणीमें अपने पुत्रोंसे बोलीं— ॥ ६१/२ ॥
यः स वीरो महेष्वासो रथयूथपयूथपः ॥ ७ ॥
अर्जुनेन जितः संख्ये वीरलक्षणलक्षितः ।
यं सूतपुत्रं मन्यध्वं राधेयमिति पाण्डवाः ॥ ८ ॥
यो व्यराजच्च मूमध्ये दिवाकर इव प्रभुः ।
प्रत्ययुध्यत वः सर्वान् पुरा यः सपदानुगान् ॥ ९ ॥
दुर्योधनबलं सर्वं यः प्रकर्षन् व्यरोचत ।
यस्य नास्ति समो वीर्ये पृथिव्यामपि पार्थिवः ॥ १० ॥
योऽवृणीत यशः शूरः प्राणैरपि सदा भुवि ।
कर्णस्य सत्यसंधस्य संग्रामेष्वपलायिनः ॥ ११ ॥
कुरुध्वमुदकं तस्य भ्रातुरक्लिष्टकर्मणः ।
स हि वः पूर्वजो भ्राता भास्करान्मय्यजायत ॥ १२ ॥
कुण्डली कवची शूरो दिवाकरसमप्रभः ।
'पाण्डवो! जो महाधनुर्धर वीर रथ-यूथपतियोंका भी यूथपति तथा वीरोचित शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था, जिसे युद्धमें अर्जुनने परास्त किया है तथा जिसे तुमलोग सूतपुत्र एवं राधापुत्रके रूपमें मानते-जानते हो, जो सेनाके मध्यभागमें भगवान् सूर्यके समान प्रकाशित होता था, जिसने पहले सेवकोंसहित तुम सब लोगोंका अच्छी तरह सामना किया था, जो दुर्योधनकी सारी सेनाको अपने पीछे खींचता हुआ बड़ी शोभा पाता था, बल और पराक्रममें जिसकी समानता करनेवाला इस भूतलपर दूसरा कोई राजा नहीं है, जिस शूरवीरने अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर भी भूमण्डलमें सदा यशका ही उपार्जन किया है, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अपने उस सत्यप्रतिज्ञ भ्राता कर्णके लिये भी तुमलोग जल-दान करो। वह तुमलोगोंका बड़ा भाई था। भगवान् सूर्यके अंशसे वह वीर मेरे ही गर्भसे उत्पन्न हुआ था। जन्मके साथ ही उस शूरवीरके शरीरमें कवच-कुंडल शोभा पाते थे। वह सूर्यदेवके समान ही तेजस्वी था ॥ ७—१२१/२ ॥
श्रुत्वा तु पाण्डवाः सर्वे मातृवचनमप्रियम् ॥ १३ ॥

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कर्णमेवानुशोचन्तो भूयः क्लान्ततराभवन् ।
माताका यह अप्रिय वचन सुनकर समस्त पाण्डव कर्णके लिये ही बारंबार शोक करते हुए अत्यन्त कष्टमें पड़ गये ॥ १३ ½ ॥
ततः स पुरुषव्याघ्रः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥
उवाच मातरं वीरो निःश्वसन्निव पन्नगः ।
तदनन्तर पुरुषसिंह वीर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए अपनी मातासे बोले— ॥
यः शरोर्मिर्ध्वजावर्तो महाभुजमहाग्रहः ॥ १५ ॥
तलशब्दानुनदितो महारथमहाह्रदः ।
यस्येषुपातमासाद्य नान्यस्तिष्ठेद् धनंजयात् ॥ १६ ॥
कथं पुत्रो भवत्याः स देवगर्भः पुराभवत् ।
‘माँ! जो बड़े-बड़े महारथियोंको डुबो देनेके लिये अत्यन्त गहरे जलाशयके समान थे, बाण ही जिनकी लहर, ध्वजा भँवर, बड़ी-बड़ी भुजाएँ महान् ग्राह और हथेलीका शब्द ही गम्भीर गर्जन था, जिनके बाणोंके गिरनेकी सीमामें आकर अर्जुनके सिवा दूसरा कोई वीर नहीं टिक सकता था, वे सूर्यकुमार तेजस्वी कर्ण पूर्वकालमें आपके पुत्र कैसे हुए? ॥ १५-१६ ½ ॥
यस्य बाहुप्रतापेन तापिताः सर्वतो वयम् ॥ १७ ॥
तमग्निमिव वस्त्रेण कथं छादितवत्यसि ।
‘जिनकी भुजाओंके प्रतापसे हम सब ओरसे संतप्त रहते थे, कपड़ेमें ढकी हुई आगके समान उन्हें अबतक आपने कैसे छिपा रखा था? ॥ १७ ½ ॥
यस्य बाहुबलं नित्यं धार्तराष्ट्रैरुपासितम् ॥ १८ ॥
उपासितं यथास्माभिर्बलं गाण्डीवधन्वनः ।
‘धृतराष्ट्रके पुत्रोंने सदा उन्हींके बाहुबलका भरोसा कर रखा था, जैसे कि हमलोगोंंने गाण्डीवधारी अर्जुनके बलका आश्रय लिया था ॥ १८ ½ ॥
भूमिपानां च सर्वेषां बलं बलवतां वरः ॥ १९ ॥
नान्यः कुन्तीसुतात् कर्णादगृह्लाद् रथिनां रथी ।
‘कुन्तीपुत्र कर्णके सिवा दूसरा कोई रथी ऐसा बड़ा बलवान् नहीं हुआ है, जिसने समस्त राजाओंकी सेनाको रोक दिया हो ॥ १९ ½ ॥
स नः प्रथमजो भ्राता सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २० ॥
असूत तं भवत्यग्रे कथमद्भुतविक्रमम् ।
‘वे समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण क्या सचमुच हमारे बड़े भाई थे? आपने पहले उन अद्भुत पराक्रमी वीरको कैसे उत्पन्न किया था? ॥ २० ½ ॥

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अहो भवत्या मन्त्रस्य गूहनेन वयं हताः ॥ २१ ॥
निधनेन हि कर्णस्य पीडितास्तु सबान्धवाः ।
‘अहो! आपने इस गूढ़ रहस्यको छिपाकर हमलोगोंको मार डाला। कर्णकी मृत्युसे भाइयोंसहित हमें बड़ी पीड़ा हो रही है॥ २१ १/२॥’
अभिमन्योर्विनाशेन द्रौपदेयवधेन च ॥ २२ ॥
पञ्चालानां विनाशेन कुरूणां पतनेन च ।
ततः शतगुणं दुःखमिदं मामस्पृशद् भृशम् ॥ २३ ॥
‘अभिमन्यु, द्रौपदीके पुत्र और पांचालोंके विनाशसे तथा कुरुकुलके इस पतनसे हमें जितना दुःख हुआ था, उससे सौ गुना यह दुःख इस समय मुझे अत्यन्त व्यथित कर रहा है॥ २२-२३॥’
कर्णमेवानुशोचामि दह्याम्यग्नाविवाहितः ।
नेह स्म किंचिदप्राप्यं भवेदपि दिवि स्थितम् ॥ २४ ॥
न चेदं वैशसं घोरं कौरवान्तकरं भवेत् ।
‘अब तो मैं केवल कर्णके ही शोकमें डूब गया हूँ और इस तरह जल रहा हूँ, मानो मुझे किसीने जलती आगमें रख दिया हो। यदि पहले ही यह बात मुझे मालूम हो गयी होती तो कर्णको पाकर हमारे लिये इस जगत्‌में कोई स्वर्गीय वस्तु भी अलभ्य नहीं होती तथा कुरुकुलका अन्त कर देनेवाला यह घोर संग्राम भी नहीं हुआ होता’॥ २४ १/२॥
एवं विलप्य बहुलं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
व्यरुदच्छनकै राजंश्चकारास्योदकं प्रभुः ।
ततो विनेदुः सहसा स्त्रियस्ताः खलु सर्वशः ॥ २६ ॥
अभितो याः स्थितास्तत्र तस्मिन्नुदककर्मणि ।
राजन्! इस प्रकार बहुत विलाप करके धर्मराज युधिष्ठिर फूट-फूटकर रोने लगे। रोते-ही-रोते उन्होंने धीरे-धीरे कर्णके लिये जलदान किया। यह सब सुनकर वहाँ एकत्र हुई सारी स्त्रियाँ, जो वहाँ जलांजलि देनेके लिये सब ओर खड़ी थीं, सहसा जोर-जोरसे रोने लगीं॥ २५-२६ १/२॥
तत आनाययामास कर्णस्य सपरिच्छदाः ॥ २७ ॥
स्त्रियः कुरुपतिर्धीमान् भ्रातुः प्रेम्णा युधिष्ठिरः ।
स ताभिः सह धर्मात्मा प्रेतकृत्यमनन्तरम् ॥ २८ ॥
चकार विधिवद् धीमान् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
तदनन्तर बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरने भाईके प्रेमसे कर्णकी स्त्रियोंको परिवारसहित बुलवा लिया और उन सबके साथ रहकर उन धर्मात्मा बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने विधिपूर्वक कर्णका प्रेतकृत्य सम्पन्न किया॥ २७-२८ १/२॥
पापेनासौ मया श्रेष्ठो भ्राता ज्ञातिर्निपातितः ।

।। स्त्रीपर्व सम्पूर्णम् ।।

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अतो मनसि यद् गुह्यं स्त्रीणां तन्न भविष्यति ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे बोले—'मुझ पापीने इस रहस्यको न जाननेके कारण अपने बड़े भाईको मरवा दिया; अतः आजसे स्त्रियोंके मनमें कोई गुप्त रहस्य नहीं छिपा रह सकेगा' ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा स तु गङ्गाया उत्ताराकुलेन्द्रियः । भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्गङ्गातीरमुपेयिवान् ॥ ३० ॥ ऐसा कहकर व्याकुल इन्द्रियोंवाले राजा युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे निकले और समस्त भाइयोंके साथ तटपर आये ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि श्राद्धपर्वणि कर्णगूढजत्वकथने सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत श्राद्धपर्वमें कर्णके जन्मके गूढ़ रहस्यका कथनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥


।। स्त्रीपर्व सम्पूर्णम् ।।


अनुष्टुप्,बड़े श्लोकबड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपरकुल
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये८२२(५)६ ।। । =८२८ ।। । =
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये..........
स्त्रीपर्वकी कुल श्लोकसंख्या८२९ ।। । =
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