BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन, राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन

Page 1263Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन, राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

कालमृत्युयमानां ते इक्ष्वाकोर्ब्राह्मणस्य च ।
विवादो व्याहृतः पूर्वं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आपने काल, मृत्यु, यम, इक्ष्वाकु और ब्राह्मणके विवादकी पहले चर्चा की थी; अतः उसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इक्ष्वाकोः सूर्यपुत्रस्य यद् वृत्तं ब्राह्मणस्य च ॥ २ ॥
कालस्य मृत्योश्च तथा यद् वृत्तं तन्निबोध मे ।
यथा स तेषां संवादो यस्मिन् स्थानेऽपि चाभवत् ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इसी प्रसंगमें उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें राजा इक्ष्वाकु, सूर्यपुत्र यम, ब्राह्मण, काल और मृत्युके वृत्तान्तका उल्लेख है। जिस स्थानपर और जिस रूपमें उनका वह संवाद हुआ था, उसे बताता हूँ, मुझसे सुनो ॥ २-३ ॥

ब्राह्मणो जापकः कश्चिद् धर्मवृत्तो महायशाः ।
षडङ्गविन्महाप्राज्ञः पैप्पलादिः स कौशिकः ॥ ४ ॥
तस्यापरोक्षं विज्ञानं षडङ्गेषु बभूव ह ।
वेदेषु चैव निष्णातो हिमवत्पादसंश्रयः ॥ ५ ॥

कहते हैं कि हिमालय पर्वतके निकटवर्ती पहाड़ियोंपर एक महायशस्वी धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, परम बुद्धिमान् तथा जपमें तत्पर रहनेवाला था। वह पिप्पलादका पुत्र था और कौशिक वंशमें उसका जन्म हुआ था। वेदके छहों अंगोंका विज्ञान उसे प्रत्यक्ष हो गया था, अतः वह वेदोंका पारंगत विद्वान् था ॥ ४-५ ॥

सोऽयं ब्राह्मं तपस्तेपे संहितां संयतो जपन् ।

Page 1264Permalink

तस्य वर्षसहस्रं तु नियमेन तथा गतम् ॥ ६ ॥
वह अर्थज्ञानपूर्वक संहिताका जप करता हुआ इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मणोचित तपस्या करने लगा। नियमपूर्वक जप-तप करते हुए उसके एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ६ ॥
स देव्या दर्शितः साक्षात् प्रीतास्मीति तदा किल ।
जप्यमावर्तयंस्तूष्णीं न स तां किञ्चिदब्रवीत् ॥ ७ ॥
कहते हैं, उसके उस जपसे प्रसन्न होकर देवी सावित्रीने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा कि मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। ब्राह्मण अपने जपनीय वेद-संहिताके गायत्रीमन्त्रकी आवृत्ति कर रहा था; इसलिये सावित्रीदेवीके आनेपर भी चुपचाप बैठा ही रह गया। उनसे कुछ न बोला ॥ ७ ॥
तस्यानुकम्पया देवी प्रीता समभवत् तदा ।
वेदमाता ततस्तस्य तज्जप्यं समपूजयत् ॥ ८ ॥
देवी सावित्रीकी उसपर कृपा हो गयी थी; अतः वे उसके उस समयके व्यवहारसे भी प्रसन्न ही हुईं। वेदमाताने ब्राह्मणके उस नियमानुकूल जपकी मन-ही-मन प्रशंसा की ॥ ८ ॥
समाप्तजप्यस्तूत्थाय शिरसा पादयोस्तदा ।
पपात देव्या धर्मात्मा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
जब जप समाप्त हो गया, तब धर्मात्मा ब्राह्मणने उठकर देवी सावित्रीके चरणोंमें मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥
दिष्ट्या देवि प्रसन्ना त्वं दर्शनं चागता मम ।
यदि चापि प्रसन्नासि जप्ये मे रमतां मनः ॥ १० ॥
'देवि! आज मेरा अहोभाग्य है कि आपने प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दिया। यदि वास्तवमें आप मुझपर संतुष्ट हैं तो ऐसी कृपा कीजिये जिससे मेरा मन जपमें लगा रहे' ॥ १० ॥

सावित्र्युवाच
किं प्रार्थयसि विप्रर्षे किं चेष्टं करवाणि ते ।
प्रब्रूहि जपतां श्रेष्ठ सर्वं तत् ते भविष्यति ॥ ११ ॥
**सावित्रीने कहा—**ब्रह्मर्षे! तुम क्या चाहते हो? कौन-सी वस्तु तुम्हें अभीष्ट है? बताओ। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगी। जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम अपनी अभिलाषा बताओ। तुम्हारी वह सारी इच्छा पूर्ण हो जायगी ॥ ११ ॥
इत्युक्तः स तदा देव्या विप्रः प्रोवाच धर्मवित् ।
जप्यं प्रति ममेच्छेयं वर्धत्विति पुनः पुनः ॥ १२ ॥
मनसश्च समाधिर्मे वर्धेताहरहः शुभे ।

Page 1265Permalink

सावित्रीदेवीके ऐसा कहनेपर वह धर्मात्मा ब्राह्मण बोला—'शुभे! इस मन्त्रके जपमें मेरी यह इच्छा बराबर बढ़ती रहे और मेरे मनकी एकाग्रता भी प्रतिदिन बढ़े' ॥ १२½ ॥ तत् तथेति ततो देवी मधुरं प्रत्यभाषत ॥ १३ ॥ इदं चैवापरं प्राह देवी तत्प्रियकाम्यया । निरयं नैव याता त्वं यत्र याता द्विजर्षभाः ॥ १४ ॥ यास्यसि ब्रह्मणः स्थानमनिमित्तमनिन्दितम् । साधये भविता चैतद् यत्त्वयाहमिहार्थिता ॥ १५ ॥ नियतो जप चैकाग्रो धर्मस्त्वां समुपैष्यति । कालो मृत्युर्यमश्चैव समायास्यन्ति तेऽन्तिकम् ॥ १६ ॥ भविता च विवादोऽत्र तव तेषां च धर्मतः । तब सावित्रीदेवीने मधुर वाणीमें 'तथास्तु' कहा। इसके बाद देवीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे यह दूसरा वचन और कहा—'विप्रवर! जहाँ दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण गये हैं, उन स्वर्गादि निम्नश्रेणीके लोकोंमें तुम नहीं जाओगे। तुम्हें स्वभावसिद्ध एवं निर्दोष ब्रह्मपदकी प्राप्ति होगी। तुमने मुझसे जो यहाँ प्रार्थना की है, वह पूरी होगी। मैं उसे पूर्ण करनेकी चेष्टा करूँगी। तुम नियमपूर्वक एकाग्रचित्त होकर जप करो। धर्म स्वयं तुम्हारी सेवामें उपस्थित होगा। काल, मृत्यु और यम भी तुम्हारे निकट पधारेंगे, तुम्हारा उन सबके साथ यहाँ धर्मानुकूल वाद-विवाद भी होगा ॥ १३—१६½ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा भगवती जगाम भवनं स्वकम् ॥ १७ ॥ ब्राह्मणोऽपि जपन्नास्ते दिव्यं वर्षशतं तथा । भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर भगवती सावित्री देवी अपने धामको चली गयीं और ब्राह्मण भी दिव्य सौ वर्षोंतक पूर्ववत् जपमें संलग्न रहा ॥ १७½ ॥ सदा दान्तो जितक्रोधः सत्यसंधोऽनसूयकः ॥ १८ ॥ समाप्ते नियमे तस्मिन्नथ विप्रस्य धीमतः । साक्षात् प्रीतस्तदा धर्मो दर्शयामास तं द्विजम् ॥ १९ ॥ वह सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखता था, क्रोधको जीत चुका था। अपनी की हुई प्रतिज्ञाका सच्चाईके साथ पालन करता था और किसीके दोष नहीं देखता था। बुद्धिमान् ब्राह्मणका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात् भगवान् धर्म उस समय उसपर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ १८-१९ ॥

धर्म उवाच

द्विजाते पश्य मां धर्ममहं त्वां द्रष्टुमागतः । जप्यस्यास्य फलं यत्तत् सम्प्राप्तं तच्च मे शृणु ॥ २० ॥

Page 1266Permalink

**धर्म बोले—**विप्रवर! तुम मेरी ओर देखो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारा दर्शन करनेके लिये आया हूँ। तुम्हें इस झपका जो फल प्राप्त हुआ है, वह सब मुझसे सुन लो ॥ २० ॥
जिता लोकास्त्वया सर्वे ये दिव्या ये च मानुषाः ।
देवानां निलयान् साधो सर्वानुत्क्रम्य यास्यसि ॥ २१ ॥
तुमने दिव्य और मानुष सभी लोकोंपर विजय प्राप्त की है। साधो! तुम सम्पूर्ण देवताओंके लोकोंको लाँघकर उनसे भी ऊपर जाओगे ॥ २१ ॥
प्राणत्यागं कुरु मुने गच्छ लोकान् यथेप्सितान् ।
त्यक्त्वाऽऽत्मनः शरीरं च ततो लोकानवाप्स्यसि ॥ २२ ॥
मुने! अब तुम अपने प्राणोंका परित्याग करो और अभीष्ट लोकोंमें जाओ। अपने शरीरका परित्याग करनेके पश्चात् ही तुम उन पुण्यलोकोंमें जाओगे ॥ २२ ॥

ब्राह्मण उवाच

किं नु लोकैर्हि मे धर्म गच्छ त्वं च यथासुखम् ।
बहुदुःखसुखं देहं नोत्सृजेयमहं विभो ॥ २३ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**धर्म! मुझे उन लोकोंको लेकर क्या करना है? आप सुखपूर्वक यहाँसे अपने स्थानको पधारिये। प्रभो! मैंने इस शरीरके साथ बहुत दुःख और सुख उठाया है; अतः इसका त्याग नहीं कर सकता ॥ २३ ॥

धर्म उवाच

अवश्यं भोः शरीरं ते त्यक्तव्यं मुनिपुङ्गव ।
स्वर्गमारोह भो विप्र किं वा वै रोचतेऽनघ ॥ २४ ॥
**धर्म बोले—**निष्पाप मुनिश्रेष्ठ! शरीर तो तुम्हें अवश्य त्यागना पड़ेगा। विप्रवर! अब स्वर्गलोकपर आरूढ़ हो जाओ अथवा तुम्हारी क्या रुचि है? बताओ ॥ २४ ॥

ब्राह्मण उवाच

न रोचये स्वर्गवासं विना देहमहं विभो ।
गच्छ धर्म न मे श्रद्धा स्वर्गं गन्तुं विनाऽऽत्मना ॥ २५ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**प्रभो! मैं इस शरीरके बिना स्वर्गलोकमें निवास करना नहीं चाहता; अतः धर्मदेव! आप यहाँसे जाइये। इस शरीरको छोड़कर स्वर्गलोकमें जानेके लिये मेरे मनमें तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ २५ ॥

धर्म उवाच

अलं देहे मनः कृत्वा त्यक्त्वा देहं सुखी भव ।
गच्छ लोकानरजसो यत्र गत्वा न शोचसि ॥ २६ ॥

Page 1267Permalink

धर्म बोले—मुने! शरीरमें मनको आसक्त रखना ठीक नहीं है। तुम देह त्यागकर सुखी हो जाओ। उन रजोगुणरहित निर्मल लोकोंमें जाओ, जहाँ जाकर फिर तुम्हें शोक नहीं करना पड़ेगा॥ २६॥

ब्राह्मण उवाच

रमे जपन् महाभाग किं नु लोकैः सनातनैः।
सशरीरेण गन्तव्यं मया स्वर्गं न वा विभो॥ २७॥
ब्राह्मणने कहा—महाभाग! मैं तो जपमें ही सुख मानता हूँ। मुझे सनातन लोकोंको लेकर क्या करना है? भगवन्! यह बताइये, मैं सशरीर स्वर्गलोकमें जा सकता हूँ या नहीं?॥ २७॥

धर्म उवाच

यदि त्वं नेच्छसे त्यक्तुं शरीरं पश्य वै द्विज।
एष कालस्तथा मृत्युर्यमश्च त्वामुपागताः॥ २८॥
धर्म बोले—ब्रह्मन्! यदि तुम शरीर छोड़ना नहीं चाहते हो तो देखो, ये काल, मृत्यु और यम तुम्हारे पास आये हैं॥ २८॥

भीष्म उवाच

अथ वैवस्वतः कालो मृत्युश्च त्रितयं विभो।
ब्राह्मणं तं महाभागमुपगम्येदमब्रुवन्॥ २९॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वैवस्वत यम, काल और मृत्यु—तीनों उस महाभाग ब्राह्मणके पास जाकर इस प्रकार बोले—॥ २९॥

यम उवाच

तपसोऽस्य सुतप्तस्य तथा सुचरितस्य च।
फलप्राप्तिस्तव श्रेष्ठा यमोऽहं त्वामुपब्रुवे॥ ३०॥
यमराज बोले—ब्रह्मन्! तुम्हारेद्वारा भलीभाँति की हुई इस तपस्याका तथा शुभ आचरणोंका भी तुम्हें उत्तम फल प्राप्त हुआ है। मैं यमराज हूँ और स्वयं तुमसे यह बात कहता हूँ॥ ३०॥

काल उवाच

यथावदस्य जप्यस्य फलं प्राप्तमनुत्तमम्।
कालस्ते स्वर्गमारोढुं कालोऽहं त्वामुपागतः॥ ३१॥
कालने कहा—विप्रवर! तुम्हारे इस जपका यथायोग्य सर्वोत्तम फल प्राप्त हुआ है। अतः अब तुम्हारे लिये स्वर्गलोकमें जानेका समय आया है। यही सूचित करनेके लिये मैं

Page 1268Permalink

साक्षात् काल तुम्हारे पास आया हूँ॥

मृत्‍युरुवाच

मृत्युं मां विद्धि धर्मज्ञ रूपिणं स्वयमागतम्।
कालेन चोदितो विप्र त्वामितो नेतुमद्य वै ॥ ३२ ॥
मृत्युने कहा— धर्मज्ञ ब्राह्मण! मुझे मृत्यु समझो। मैं स्वयं ही शरीर धारण करके यहाँ आया हूँ। विप्रवर! मैं कालसे प्रेरित होकर आज तुम्हें यहाँसे ले जानेके लिये उपस्थित हुआ हूँ ॥ ३२ ॥

ब्राह्मण उवाच

स्वागतं सूर्यपुत्राय कालाय च महात्मने।
मृत्युवे चाथ धर्माय किं कार्यं करवाणि वः ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणने कहा— सूर्यपुत्र यम, महामना काल, मृत्यु तथा धर्म—इन सबका स्वागत है। बताइये, मैं आपलोगोंका कौन-सा कार्य करूँ? ॥ ३३ ॥

भीष्म उवाच

अर्घ्यं पाद्यं च दत्त्वा स तेभ्यस्तत्र समागमे।
अब्रवीत् परमप्रीतः स्वशक्त्या किं करोमि वः ॥ ३४ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वहाँ उन सबका समागम होनेपर ब्राह्मणने उनके लिये अर्घ्य और पाद्य देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा—'देवताओ! मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?' ॥ ३४ ॥

तस्मिन्नेवाथ काले तु तीर्थयात्रामुपागतः।
इक्ष्वाकुरगमत् तत्र समेता यत्र ते विभो ॥ ३५ ॥
इसी समय तीर्थयात्राके लिये आये हुए राजा इक्ष्वाकु भी उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ वे सब लोग एकत्र हुए थे ॥ ३५ ॥

सर्वानेव तु राजर्षिः सम्पूज्याथ प्रणम्य च।
कुशलप्रश्नमकरोत् सर्वेषां राजसत्तमः ॥ ३६ ॥
नृपश्रेष्ठ राजर्षि इक्ष्वाकुने उन सबको प्रणाम करके उनकी पूजा की और उन सबका कुशल-समाचार पूछा ॥ ३६ ॥

तस्मै सोऽथासनं दत्त्वा पाद्यमर्घ्यं तथैव च।
अब्रवीद् ब्राह्मणो वाक्यं कृत्वा कुशलसंविदम् ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणने भी राजाको अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर कुशल-मंगल पूछनेके बाद इस प्रकार कहा— ॥

Page 1269Permalink

स्वागतं ते महाराज ब्रूहि यद् यदिहेच्छसि ।
स्वशक्त्या किं करोमीह तद् भवान् प्रब्रवीतु माम् ॥ ३८ ॥
‘महाराज! आपका स्वागत है! आपकी जो-जो इच्छा हो, उसे यहाँ बताइये। मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपकी क्या सेवा करूँ? यह आप मुझे बतावें’ ॥ ३८ ॥

राजोवाच
राजाहं ब्राह्मणश्च त्वं यदा षट्कर्मसंस्थितः ।
ददानि वसु किंचित्ते प्रथितं तद् वदस्व मे ॥ ३९ ॥
**राजाने कहा—**विप्रवर! मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप छः कर्मोंमें स्थित रहनेवाले ब्राह्मण। अतः मैं आपको कुछ धन देना चाहता हूँ। आप प्रसिद्ध धनरत्न मुझसे माँगिये ॥ ३९ ॥

ब्राह्मण उवाच
द्विविधा ब्राह्मणा राजन् धर्मश्च द्विविधः स्मृतः ।
प्रवृत्ताश्च निवृत्ताश्च निवृत्तोऽहं प्रतिग्रहात् ॥ ४० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! ब्राह्मण दो प्रकारके होते हैं और धर्म भी दो प्रकारका माना गया है—प्रवृत्ति और निवृत्ति। मैं प्रतिग्रहसे निवृत्त ब्राह्मण हूँ ॥ ४० ॥

Page 1270Permalink

तेभ्यः प्रयच्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप ।
अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददामि ते ।
ब्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधयामि किम् ॥ ४१ ॥
नरेश्वर! आप उन ब्राह्मणोंको दान दीजिये, जो प्रवृत्तिमार्गमें हों। मैं आपसे दान नहीं लूँगा। नृपश्रेष्ठ! इस समय आपको क्या अभीष्ट है? मैं आपको क्या दूँ? बताइये, मैं अपनी तपस्याद्वारा आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? ॥ ४१ ॥

राजोवाच

क्षत्रियोऽहं न जानामि देहीति वचनं क्वचित् ।
प्रयच्छ युद्धमित्येवंवादिनः स्मो द्विजोत्तम ॥ ४२ ॥
**राजा बोले—**द्विजश्रेष्ठ! मैं क्षत्रिय हूँ। 'दीजिये' ऐसा कहकर याचना करनेकी बातको मैं कभी नहीं जानता। माँगनेके नामपर तो हमलोग यही कहना जानते हैं कि 'युद्ध दो' ॥ ४२ ॥

ब्राह्मण उवाच

तुष्यसि त्वं स्वधर्मेण तथा तुष्टा वयं नृप ।
अन्योन्यस्यान्तरं नास्ति यदिष्टं तत् समाचर ॥ ४३ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**नरेश्वर! जैसे आप अपने धर्मसे संतुष्ट हैं, उसी तरह हम भी अपने धर्मसे संतुष्ट हैं। हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। अतः आपको जो अच्छा लगे, वह कीजिये ॥ ४३ ॥

राजोवाच

स्वशक्त्याहं ददानीति त्वया पूर्वमुदाहृतम् ।
याचे त्वां दीयतां मह्यं जप्यस्यास्य फलं द्विज ॥ ४४ ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! आपने मुझसे पहले कहा है कि 'मैं अपनी शक्तिके अनुसार दान दूँगा' तो मैं आपसे यही माँगता हूँ कि आप अपने जपका फल मुझे दे दीजिये ॥ ४४ ॥

ब्राह्मण उवाच

युद्धं मम सदा वाणी याचतीति विकत्थसे ।
न च युद्धं मया सार्धं किमर्थं याचसे पुनः ॥ ४५ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! आप तो बहुत बढ़-बढ़कर बातें बना रहे थे कि मेरी वाणी सदा युद्धकी ही याचना करती है। तब आप मेरे साथ भी युद्धकी ही याचना क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥ ४५ ॥

राजोवाच

Page 1271Permalink

वाग्वज्रा ब्राह्मणाः प्रोक्ताः क्षत्रिया बाहुजीविनः ।
वाग्युद्धं तदिदं तीव्रं मम विप्र त्वया सह ॥ ४६ ॥
**राजाने कहा—**विप्रवर! ब्राह्मणोंकी वाणी ही वज्रके समान प्रभाव डालनेवाली होती है और क्षत्रिय बाहुबलसे जीवन-निर्वाह करनेवाले होते हैं। अतः आपके साथ मेरा यह तीव्र वाग्युद्ध उपस्थित हुआ है ॥

ब्राह्मण उवाच
सैवाद्यापि प्रतिज्ञा मे स्वशक्त्या किं प्रदीयताम् ।
ब्रूहि दास्यामि राजेन्द्र विभवे सति मा चिरम् ॥ ४७ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजेन्द्र! मेरी वही प्रतिज्ञा इस समय भी है। मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपको क्या दूँ? बोलिये, विलम्ब न कीजिये। मैं शक्ति रहते आपको मुँहमाँगी वस्तु अवश्य प्रदान करूँगा ॥ ४७ ॥

राजोवाच
यत्तद् वर्षशतं पूर्णं जप्यं वै जपता त्वया ।
फलं प्राप्तं तत् प्रयच्छ मम दित्सुर्भवान् यदि ॥ ४८ ॥
**राजाने कहा—**मुने! यदि आप देना ही चाहते हैं तो पूरे सौ वर्षोंतक जप करके आपने जिस फलको प्राप्त किया है, वही मुझे दे दीजिये ॥ ४८ ॥

ब्राह्मण उवाच
परमं गृह्यतां तस्य फलं यज्जपितं मया ।
अर्धं त्वमविचारेण फलं तस्य ह्यवाप्नुहि ॥ ४९ ॥
अथवा सर्वमेवेह मामकं जापकं फलम् ।
राजन् प्राप्नुहि कामं त्वं यदि सर्वमिहेच्छसि ॥ ५० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! मैंने जो जप किया है उसका उत्तम फल आप ग्रहण करें। मेरे झपका आधा फल तो आप बिना विचारे ही प्राप्त करें अथवा यदि आप मेरेद्वारा किये हुए जपका सारा ही फल लेना चाहते हों तो अवश्य अपनी इच्छाके अनुसार वह सब प्राप्त कर लें ॥ ४९-५० ॥

राजोवाच
कृतं सर्वेण भद्रं ते जप्यं यद् याचितं मया ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि किञ्च तस्य फलं वद ॥ ५१ ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने जो जपका फल माँगा है, उन सबकी पूर्ति हो गयी। आपका भला हो, कल्याण हो। मैं चला जाऊँगा; किंतु यह तो बता दीजिये कि उसका फल क्या है? ॥ ५१ ॥

Page 1272Permalink

ब्राह्मण उवाच

फलप्राप्तिं न जानामि दत्तं यज्जपितं मया ।
अयं धर्मश्च कालश्च यमो मृत्युश्च साक्षिणः ॥ ५२ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! इस जपका फल क्या मिलेगा? इसको मैं नहीं जानता; परंतु मैंने जो कुछ जप किया था, वह सब आपको दे दिया। ये धर्म, यम, मृत्यु और काल इस बातके साक्षी हैं ॥ ५२ ॥

राजोवाच

अज्ञातमस्य धर्मस्य फलं किं मे करिष्यति ।
फलं ब्रवीषि धर्मस्य न चेज्जप्यकृतस्य माम् ।
प्राप्नोतु तत् फलं विप्रो नाहमिच्छे ससंशयम् ॥ ५३ ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! यदि आप मुझे अपने जपजनित धर्मका फल नहीं बता रहे हैं तो इस धर्मका अज्ञात फल मेरे किस काम आयेगा? वह सारा फल आपहीके पास रहे। मैं संदिग्ध फल नहीं चाहता ॥ ५३ ॥

ब्राह्मण उवाच

नाददेऽपरवक्तव्यं दत्तं चास्य फलं मया ।
वाक्यं प्रमाणं राजर्षे ममाद्य तव चैव हि ॥ ५४ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजर्षे! अब तो मैं अपने जपका फल दे चुका; अतः दूसरी कोई बात नहीं स्वीकार करूँगा। इस विषयमें आज मेरी और आपकी बातें ही प्रमाणस्वरूप हैं (हम दोनोंको अपनी-अपनी बातोंपर दृढ़ रहना चाहिये) ॥ ५४ ॥
नाभिसंधिर्मया जप्ये कृतपूर्वः कदाचन ।
जप्यस्य राजशार्दूल कथं वेत्स्याम्यहं फलम् ॥ ५५ ॥
राजसिंह! मैंने जप करते समय कभी फलकी कामना नहीं की थी; अतः इस जपका क्या फल होगा, यह कैसे जान सकूँगा? ॥ ५५ ॥
ददस्वेति त्वया चोक्तं ददानीति मया तथा ।
न वाचं दूषयिष्यामि सत्यं रक्ष स्थिरो भव ॥ ५६ ॥
आपने कहा था कि ‘दीजिये’ और मैंने कहा था कि ‘दूँगा’—ऐसी दशामें मैं अपनी बात झूठी नहीं करूँगा। आप सत्यकी रक्षा कीजिये और इसके लिये सुस्थिर हो जाइये ॥ ५६ ॥
अथैवं वदतो मेऽद्य वचनं न करिष्यसि ।
महानधर्मो भविता तव राजन् मृषा कृतः ॥ ५७ ॥
राजन्! यदि इस तरह स्पष्ट बात करनेपर भी आप आज मेरे वचनका पालन नहीं करेंगे तो आपको असत्यका महान् पाप लगेगा ॥ ५७ ॥

Page 1273Permalink

न युक्तं तु मृषा वाणी त्वया वक्तुमरंदम । तथा मयाप्यभिहितं मिथ्या कर्तुं न शक्यते ॥ ५८ ॥ शत्रुदमन नरेश! आपके लिये भी झूठ बोलना उचित नहीं है और मैं भी अपनी कही हुई बातको मिथ्या नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥

संश्रुतं च मया पूर्वं ददानीत्यविचारितम् । तद् गृहीष्वाविचारेण यदि सत्ये स्थितो भवान् ॥ ५९ ॥ मैंने बिना कुछ सोच-विचार किये ही पहले देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; अतः आप भी बिना विचारे मेरा दिया हुआ जप ग्रहण करें। यदि आप सत्यपर दृढ़ हैं तो आपको ऐसा अवश्य करना चाहिये ॥ ५९ ॥

इहागम्य हि मां राजन् जाप्यं फलमयाचथाः । तन्मे निसृष्टं गृहीष्व भव सत्ये स्थिरोऽपि च ॥ ६० ॥ राजन्! आपने स्वयं यहाँ आकर मुझसे जपके फलकी याचना की है और मैंने उसे आपके लिये दे दिया है; अतः आप उसे ग्रहण करें और सत्यपर डटे रहें ॥

नायं लोकोऽस्ति न परो न च पूर्वान् स तारयेत् । कुत एव जनिष्यांस्तु मृषावादपरायणः ॥ ६१ ॥ जो झूठ बोलनेवाला है, उस मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। वह अपने पूर्वजोंको भी नहीं तार सकता; फिर भविष्यमें होनेवाली संततिका उद्धार तो कर ही कैसे सकता है? ॥

न यज्ञाध्ययने दानं नियमास्तारयन्ति हि । यथा सत्यं परे लोके तथेह पुरुषर्षभ ॥ ६२ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! परलोकमें सत्य जिस प्रकार जीवोंका उद्धार करता है, उस प्रकार यज्ञ, वेदाध्ययन, दान और नियम भी नहीं तार सकते हैं ॥ ६२ ॥

तपांसि यानि चीर्णानि चरिष्यन्ति च यत् तपः । शतैः शतसहस्रैश्च तैः सत्यान्न विशिष्यते ॥ ६३ ॥ लोगोंने अबतक जितनी तपस्याएँ की हैं और भविष्यमें भी जितनी करेंगे, उन सबको सौगुना या लाखगुना करके एकत्र किया जाय तो भी उनका महत्त्व सत्यसे बढ़कर नहीं सिद्ध होगा ॥ ६३ ॥

सत्यमेकाक्षरं ब्रह्म सत्यमेकाक्षरं तपः । सत्यमेकाक्षरो यज्ञः सत्यमेकाक्षरं श्रुतम् ॥ ६४ ॥ सत्य ही एकमात्र अविनाशी ब्रह्म है। सत्य ही एकमात्र अक्षय तप है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी यज्ञ है, सत्य ही एकमात्र नाशरहित सनातन वेद है ॥ ६४ ॥

सत्यं वेदेषु जागर्ति फलं सत्ये परं स्मृतम् । सत्याद् धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ६५ ॥

Page 1274Permalink

वेदोंमें सत्य ही जागता है—उसीकी महिमा बतायी गयी है। सत्यका ही सबसे श्रेष्ठ फल माना गया है। धर्म और इन्द्रिय-संयमकी सिद्धि भी सत्यसे ही होती है। सत्यके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ।। ६५ ।। सत्यं वेदास्तथाङ्गानि सत्यं विद्यास्तथा विधिः । व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च ।। ६६ ।। सत्य ही वेद और वेदांग है। सत्य ही विद्या तथा विधि है। सत्य ही व्रतचर्या तथा सत्य ही ओंकार है ।। ६६ ।। प्राणिनां जननं सत्यं सत्यं संततिरेव च । सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः ।। ६७ ।। सत्य प्राणियोंको जन्म देनेवाला (पिता) है, सत्य ही संतति है, सत्यसे ही वायु चलती है और सत्यसे ही सूर्य तपता है ।। ६७ ।। सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्यं यज्ञस्तपो वेदाः स्तोभा मन्त्राः सरस्वती ।। ६८ ।। सत्यसे ही आग जलती है तथा सत्यपर ही स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है। यज्ञ, तप, वेद, स्तोभ, मन्त्र और सरस्वती—सब सत्यके ही स्वरूप हैं ।। ६८ ।। तुलामारोपितो धर्मः सत्यं चैवेति नः श्रुतम् । समकक्षां तुलयतो यतः सत्यं ततोऽधिकम् ।। ६९ ।। मैंने सुना है कि किसी समय धर्म और सत्यको तराजूपर, जिसके दोनों पलड़े बराबर थे, रखा और तौला गया; उस समय जिस ओर सत्य था, उधरका ही पलड़ा भारी हुआ ।। ६९ ।। यतो धर्मस्ततः सत्यं सर्वं सत्येन वर्धते । किमर्थमनृतं कर्म कर्तुं राजंस्त्वमिच्छसि ।। ७० ।। जहाँ धर्म है वहाँ सत्य है। सत्यसे ही सबकी वृद्धि होती है। राजन्! आप क्यों असत्यपूर्ण बर्ताव करना चाहते हैं? ।। ७० ।। सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाः । कस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम् ।। ७१ ।। महाराज! आप सत्यमें ही अपने मनको स्थिर कीजिये। मिथ्यापूर्ण बर्ताव न कीजिये। यदि लेना ही नहीं था तो आपने ‘दीजिये’ यह झूठा और अशुभ वचन क्यों मुँहसे निकाला था ।। ७१ ।। यदि जप्यफलं दत्तं मया नैषिष्यसे नृप । धर्मेभ्यः सम्परिभ्रष्टो लोकाननुचरिष्यसि ।। ७२ ।। नरेश्वर! यदि आप मेरे दिये हुए इस जपके फलको नहीं स्वीकार करेंगे तो धर्मभ्रष्ट होकर सम्पूर्ण लोकोंमें भटकते फिरेंगे ।। ७२ ।।

Page 1275Permalink

संश्रुत्य यो न दित्सेत याचित्वा यश्च नेच्छति ।
उभावानृतिकावेतौ न मृषा कर्तुमर्हसि ॥ ७३ ॥
जो पहले देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर देना नहीं चाहता तथा जो याचना तो करता है, किन्तु मिलनेपर उसे लेना नहीं चाहता, वे दोनों ही मिथ्यावादी होते हैं; अतः आप अपनी और मेरी भी बात मिथ्या न कीजिये ॥ ७३ ॥

राजोवाच
योद्धव्यं रक्षितव्यं च क्षत्रधर्मः किल द्विज ।
दातारः क्षत्रियाः प्रोक्ता गृह्णीयां भवतः कथम् ॥ ७४ ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! क्षत्रियका धर्म तो प्रजाकी रक्षा और युद्ध करना है। क्षत्रियोंको दाता कहा गया है; फिर मैं उलटे ही आपसे दान कैसे ले सकता हूँ? ॥ ७४ ॥

ब्राह्मण उवाच
न च्छन्दयामि ते राजन्नापि ते गृहमाव्रजम् ।
इहागम्य तु याचित्वा न गृह्णीषे पुनः कथम् ॥ ७५ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! दान लेनेके लिये मैंने आपसे अनुरोध या आग्रह नहीं किया था और न मैं देनेके लिये आपके घर ही गया था। आपने स्वयं यहाँ आकर याचना की है; फिर लेनेसे कैसे इनकार करते हैं? ॥ ७५ ॥

धर्म उवाच
अविवादोऽस्तु युवयोर्वित्त मां धर्ममागतम् ।
द्विजो दानफलैर्युक्तो राजा सत्यफलेन च ॥ ७६ ॥
**धर्म बोले—**आप दोनोंमें विवाद न हो। आपको विदित होना चाहिये कि मैं साक्षात् धर्म यहाँ आया हूँ। ब्राह्मणदेवता दानके फलसे युक्त हो जायँ और राजा भी सत्यके फलसे सम्पन्न हों ॥ ७६ ॥

स्वर्ग उवाच
स्वर्गं मां विद्धि राजेन्द्र रूपिणं स्वयमागतम् ।
अविवादोऽस्तु युवयोरुभौ तुल्यफलौ युवाम् ॥ ७७ ॥
**स्वर्ग बोला—**राजेन्द्र! आपको विदित हो कि मैं स्वर्ग हूँ और स्वयं ही शरीर धारण करके यहाँ आया हूँ। आप दोनोंमें विवाद न हो। आप दोनों समान फलके भागी हों ॥ ७७ ॥

राजोवाच
कृतं स्वर्गेण मे कार्यं गच्छ स्वर्ग यथागतम् ।

Page 1276Permalink

विप्रो यदीच्छते गन्तुं चीर्णं गृह्णातु मे फलम् ॥ ७८ ॥ राजाने कहा— मुझे स्वर्गकी कोई आवश्यकता नहीं है। स्वर्ग! तुम जैसे आये थे, वैसे ही लौट जाओ। यदि ये ब्राह्मणदेवता स्वर्गमें जाना चाहते हों तो मेरे किये हुए पुण्यफलको ग्रहण करें ॥ ७८ ॥

ब्राह्मण उवाच

बाल्ये यदि स्यादज्ञानान्मया हस्तः प्रसारितः ।
निवृत्तलक्षणं धर्ममुपासे संहितां जपन् ॥ ७९ ॥
ब्राह्मणने कहा— यदि बाल्यावस्थामें अज्ञानवश मैंने कभी किसीके सामने हाथ फैलाया हो तो उसका मुझे स्मरण नहीं है; परंतु अब तो संहिता—गायत्रीमन्त्रका जप करता हुआ निवृत्तिधर्मकी उपासना करता हूँ ॥ ७९ ॥
निवृत्तं मां चिराद्राजन् विप्रलोभयसे कथम् ।
स्वेन कार्यं करिष्यामि त्वत्तो नेच्छे फलं नृप ।
तपःस्वाध्यायशीलोऽहं निवृत्तश्च प्रतिग्रहात् ॥ ८० ॥
राजन्! मैं निवृत्तिमार्गका पथिक हूँ, आप बहुत देरसे मुझे लुभानेका प्रयत्न क्यों करते हैं? नरेश्वर! मैं स्वयं ही अपना कर्तव्य करूँगा, आपसे कोई फल नहीं लेना चाहता। मैं प्रतिग्रहसे निवृत्त होकर तप और स्वाध्यायमें लगा हुआ हूँ ॥ ८० ॥

राजोवाच

यदि विप्र विसृष्टं ते जप्यस्य फलमुत्तमम् ।
आवयोर्यत् फलं किञ्चित् सहितं नौ तदस्त्विह ॥ ८१ ॥
राजाने कहा— विप्रवर! यदि आपने अपने जपका उत्तम फल दे ही दिया है तो ऐसा कीजिये कि हम दोनोंके जो भी पुण्यफल हों, उन्हें एकत्र करके हम दोनों साथ ही भोगें—हम दोनोंका उनपर समान अधिकार रहे ॥ ८१ ॥
द्विजाः प्रतिग्रहे युक्ता दातारो राजवंशजाः ।
यदि धर्मः श्रुतो विप्र सहैव फलमस्तु नौ ॥ ८२ ॥
ब्राह्मणोंको दान लेनेका अधिकार है और क्षत्रिय केवल दान देते हैं, लेते नहीं; यह धर्म आपने भी सुना होगा; अतः विप्रवर! हम दोनोंके कार्यका फल साथ ही हम दोनोंके उपयोगमें आवे ॥ ८२ ॥
मा वा भूत् सहभोज्यं नौ मदीयं फलमाप्नुहि ।
प्रतीच्छ मत्कृतं धर्मं यदि ते मय्यनुग्रहः ॥ ८३ ॥
अथवा यदि आपकी इच्छा न हो तो हमें साथ रहकर कर्मफल भोगनेकी आवश्यकता नहीं है। उस अवस्थामें मैं यही प्रार्थना करूँगा कि यदि आपका मुझपर अनुग्रह हो तो आप

Page 1277Permalink

ही मेरे शुभकर्मोंका पूरा-पूरा फल ग्रहण कर लें। मैंने जो कुछ भी धर्म किया है, वह सब आप स्वीकार कर लें॥ ८३॥

भीष्म उवाच

ततो विकृतवेषौ द्वौ पुरुषौ समुपस्थितौ।
गृहीत्वान्योन्यमावेष्ट्य कुचैलावूचतुर्वचः ॥ ८४ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इसी समय वहाँ विकराल वेषधारी दो पुरुष उपस्थित हुए। दोनोंने एक-दूसरेको पकड़कर अपने हाथोंसे आवेष्टित कर रखा था। दोनोंके शरीरपर मैले वस्त्र थे (उनमेंसे एकका नाम विकृत था और दूसरेका नाम विरूप)। वे दोनों बारंबार इस प्रकार कह रहे थे॥ ८४ ॥

न मे धारयसीत्येको धारयामीति चापरः।
इहास्ति नौ विवादोऽयमयं राजानुशासकः ॥ ८५ ॥
एकने कहा—भाई! तुम्हारे ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है। दूसरा कहता—नहीं, मैं तुम्हारा ऋणी हूँ। पहलेने कहा—यहाँ जो हम दोनोंका विवाद है, इसका निर्णय ये सबका शासन करनेवाले राजा करेंगे॥ ८५ ॥

सत्यं ब्रवीम्यहमिदं न मे धारयते भवान्।
अनृतं वदसीह त्वमृणं ते धारयाम्यहम्॥ ८६ ॥
दूसरा बोला—मैं सच कहता हूँ कि तुमपर मेरा कोई ऋण नहीं है। पहलेने कहा—तुम झूठ बोलते हो। मुझपर तुम्हारा ऋण है॥ ८६ ॥

तावुभौ सुभृशं तप्तौ राजानमिदमूचतुः।
परीक्ष्य त्वं यथा स्यावो नावामिह विगर्हितौ॥ ८७ ॥
तब वे दोनों अत्यन्त संतप्त होकर राजासे इस प्रकार बोले—आप हमारे मामलेकी जाँच-पड़ताल करके फैसला कर दें, जिससे हम दोनों यहाँ दोषके भागी और निन्दाके पात्र न हों॥ ८७ ॥

विरूप उवाच

धारयामि नरव्याघ्र विकृतस्येह गोः फलम्।
ददतश्च न गृह्णाति विकृतो मे महीपते॥ ८८ ॥
विरूप बोला—पुरुषसिंह! मैं विकृतके एक गोदानका फल ऋणके तौरपर अपने यहाँ रखता हूँ। पृथ्वीनाथ! उस ऋणको आज मैं दे रहा हूँ; परंतु यह विकृत ले नहीं रहा है॥ ८८ ॥

विकृत उवाच

न मे धारयते किञ्चिद् विरूपोऽयं नराधिप।

Page 1278Permalink

मिथ्या ब्रवीत्ययं हि त्वां सत्याभासं नराधिप ॥ ८९ ॥ **विकृतने कहा—**नरेश्वर! इस विरूपपर मेरा कोई ऋण नहीं है। यह आपसे झूठ बोलता है। इसकी बातमें सत्यका आभासमात्र है ॥ ८९ ॥

राजोवाच

विरूप किं धारयते भवानस्य ब्रवीतु मे । श्रुत्वा तथा करिष्येऽहमिति मे धीयते मनः ॥ ९० ॥ **राजा बोले—**विरूप! तुम्हारे ऊपर विकृतका कौन-सा ऋण है। बताओ, मैं उसे सुनकर कोई निर्णय करूँगा। मेरे मनका ऐसा ही निश्चय है ॥ ९० ॥

विरूप उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् यथैतद् धारयाम्यहम् । विकृतस्यास्य राजर्षे निखिलेन नराधिप ॥ ९१ ॥ **विरूप बोला—**राजन्! नरेश्वर! आप सावधान होकर सुनें, राजर्षे! इस विकृतका ऋण जिस प्रकार मैं धारण करता हूँ, वह सब पूर्णरूपसे बता रहा हूँ ॥ ९१ ॥ अनेन धर्मप्राप्त्यर्थं शुभा दत्ता पुरानघ । धेनुर्विप्राय राजर्षे तपःस्वाध्यायशीलिने ॥ ९२ ॥ निष्पाप राजर्षे! इसने धर्मकी प्राप्तिके लिये एक तपस्वी और स्वाध्यायशील ब्राह्मणको एक दूध देनेवाली उत्तम गाय दी थी ॥ ९२ ॥ तस्याश्चायं मया राजन् फलमभ्येत्य याचितः । विकृतेन च मे दत्तं विशुद्धेनान्तरात्मना ॥ ९३ ॥ राजन्! मैंने इसके घर जाकर इससे उसी गोदानका फल माँगा था और विकृतने शुद्ध हृदयसे मुझे वह दे दिया था ॥ ९३ ॥ ततो मे सुकृतं कर्म कृतमात्मविशुद्धये । गावौ च कपिले क्रीत्वा वत्सले बहुदोहने ॥ ९४ ॥ ते चोञ्छवृत्तये राजन् मया समपवर्जिते । यथाविधि यथाश्रद्धं तदस्याहं पुनः प्रभो ॥ ९५ ॥ तदनन्तर मैंने भी अपनी शुद्धिके लिये पुण्यकर्म किया। राजन्! दो अधिक दूध देनेवाली कपिला गौएँ, जिनके साथ उनके बछड़े भी थे, खरीदकर उन्हें मैंने एक उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको विधि और श्रद्धा-पूर्वक दे दिया। प्रभो! उसी गोदानका फल मैं पुनः इसे वापस करना चाहता हूँ ॥ ९४-९५ ॥ इहाद्यैव गृहीत्वा तु प्रयच्छे द्विगुणं फलम् । एवं स्यात् पुरुषव्याघ्र कः शुद्धः कोऽत्र दोषवान् ॥ ९६ ॥

Page 1279Permalink

पुरुषसिंह! इससे एक गोदानका फल लेकर आज मैं इसे दूना फल लौटा रहा हूँ। ऐसी परिस्थितिमें आप स्वयं निर्णय कीजिये कि हम दोनोंमेंसे कौन शुद्ध है और कौन दोषी? ॥ ९६ ॥

एवं विवदमानौ स्वस्वामिहाभ्यागतौ नृप ।
कुरु धर्ममधर्मं वा विनये नौ समादध ॥ ९७ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपसमें विवाद करते हुए हम दोनों यहाँ आपके समीप आये हैं। आप निर्णय कीजिये। अब आप चाहे न्याय करें या अन्याय। इस झगड़ेका निपटारा कर दें। हम दोनोंको विशिष्ट न्यायके मार्गपर लगा दें ॥ ९७ ॥

यदि नेच्छति मे दानं यथा दत्तमनेन वै ।
भवानत्र स्थिरो भूत्वा मार्गे स्थापयिताद्य नौ ॥ ९८ ॥
इसने जिस तरह मुझे दान दिया है, उसी तरह यदि स्वयं भी मुझसे लेना नहीं चाहता है तो आप स्वयं सुस्थिर होकर हम दोनोंको धर्मके मार्गपर स्थापित कर दें ॥ ९८ ॥

राजोवाच

दीयमानं न गृह्णासि ऋणं कस्मात् त्वमद्य वै ।
यथैव तेऽभ्यनुज्ञातं तथा गृह्णीष्व मा चिरम् ॥ ९९ ॥
**राजाने कहा—**विकृत! जब विरूप तुम्हें तुम्हारा दिया हुआ ऋण लौटा रहा है, तब तुम उसे आज ग्रहण क्यों नहीं करते? जैसे इसने तुम्हारी दी हुई वस्तु स्वीकार कर ली थी, उसी प्रकार तुम भी इसकी दी हुई वस्तुको ले लो। विलम्ब न करो ॥ ९९ ॥

विकृत उवाच

धारयामीत्यनेनोक्तं ददानीति तथा मया ।
नायं मे धारयत्यद्य गच्छतां यत्र वाञ्छति ॥ १०० ॥
**विकृत बोला—**राजन्! विरूपने अभी आपसे कहा है कि मैं ऋण धारण करता हूँ; परंतु मैंने उस समय 'दान' कह करके वह वस्तु इसे दी थी; इसलिये इसके ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है। अब यह जहाँ जाना चाहे, जा सकता है ॥ १०० ॥

राजोवाच

ददतोऽस्य न गृह्णासि विषमं प्रतिभाति मे ।
दण्ड्यो हि त्वं मम मतो नास्त्यत्र खलु संशयः ॥ १०१ ॥
**राजाने कहा—**विकृत! यह तुम्हें तुम्हारी वस्तु दे रहा है और तुम लेते नहीं हो। यह मुझे अनुचित जान पड़ता है; अतः मेरे मतमें तुम दण्डनीय हो; इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १०१ ॥

विकृत उवाच

Page 1280Permalink

मयास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीयां तत् कथं पुनः । काममत्रापराधो मे दण्डमाज्ञापय प्रभो ॥ १०२ ॥ **विकृत बोला—**राजर्षे! मैंने इसे दान दिया था; फिर वह दान इससे वापस कैसे ले लूँ। भले, इसमें मेरा अपराध समझा जाय; परंतु मैं दिया हुआ दान वापस नहीं ले सकता। प्रभो! मुझे दण्ड भोगनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ १०२ ॥

विरूप उवाच

दीयमानं यदि मया नेषिष्यसि कथञ्चन । नियंस्यति त्वां नृपतिरयं धर्मानुशासकः ॥ १०३ ॥ **विरूपने कहा—**विकृत! यदि तुम मेरी दी हुई वस्तु स्वीकार नहीं करोगे तो ये धर्मपूर्ण शासन करनेवाले नरेश तुम्हें कैद कर लेंगे ॥ १०३ ॥

विकृत उवाच

स्वं मया याचितेनेह दत्तं कथमिहाद्य तत् । गृह्णीयां गच्छतु भवानभ्यनुज्ञां ददानि ते ॥ १०४ ॥ **विकृत बोला—**तुम्हारे माँगनेपर मैंने अपना धन दानके रूपमें दिया था; फिर आज उसे वापस कैसे ले सकता हूँ? तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ भी पावना नहीं है। मैं तुम्हें जानेके लिये आज्ञा देता हूँ, तुम जाओ ॥ १०४ ॥

ब्राह्मण उवाच

श्रुतमेतत्त्वया राजन्ननयोः कथितं द्वयोः । प्रतिज्ञातं मया यत्ते तद् गृहाणाविचारितम् ॥ १०५ ॥ **इसी बीचमें जापक ब्राह्मण बोल उठा—**राजन्! आपने इन दोनोंकी बातें सुन लीं। मैंने आपको देनेके लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आप मेरा दान बिना विचारे ग्रहण करें ॥ १०५ ॥

राजोवाच

प्रस्तुतं सुमहत् कार्यमनयोर्गह्वरं यथा । जापकस्य दृढीकारः कथमेतद् भविष्यति ॥ १०६ ॥ **राजाने मन-ही-मन कहा—**इन दोनोंका बड़ा भारी और गहन कार्य सामने आ गया है। इधर जापक ब्राह्मणका सुदृढ़ आग्रह ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। इससे निपटारा कैसे होगा ॥ १०६ ॥

यदि तावन्न गृह्णामि ब्राह्मणेनापवर्जितम् । कथं न लिप्येयमहं पापेन महताद्य वै ॥ १०७ ॥

Page 1281Permalink

यदि मैं आज ब्राह्मणकी दी हुई वस्तु ग्रहण न करूँ तो किस प्रकार महान् पापसे निर्लिप्त रह सकूँगा ॥ १०७ ॥
तौ चोवाच स राजर्षिः कृतकार्यों गमिष्यथः ।
नेदानीं मामिहासाद्य राजधर्मो भवेन्मृषा ॥ १०८ ॥
इसके बाद राजर्षि इक्ष्वाकुने उन दोनोंसे कहा—'तुम दोनों अपने विवादका निपटारा हो जानेपर ही यहाँसे जाना। इस समय मेरे पास आकर अपना कार्य पूर्ण हुए बिना न जाना। मुझे भय है कि राजधर्म मिथ्या अथवा कलंकित न हो जाय ॥ १०८ ॥
स्वधर्मः परिपाल्यस्तु राज्ञामिति विनिश्चयः ।
विप्रधर्मश्च गहनो मामनात्मानमाविशत् ॥ १०९ ॥
राजाओंको अपने धर्मका पालन करना चाहिये, यही शास्त्रका सिद्धान्त है। इधर मुझ अजितात्माके भीतर गहन ब्राह्मणधर्मने प्रवेश किया है ॥ १०९ ॥

ब्राह्मण उवाच

गृहाण धारयेऽहं च याचितं संश्रुतं मया ।
न चेद् ग्रहीष्यसे राजन् शपिष्ये त्वां न संशयः ॥ ११० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! आपने जो वस्तु माँगी थी और जिसे देनेकी मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी, उसे मैं आपकी धरोहरके रूपमें अपने पास रखता हूँ; अतः शीघ्र उसे ले लें। यदि नहीं लेंगे तो निस्संदेह मैं आपको शाप दे दूँगा ॥ ११० ॥

राजोवाच

धिग्राजधर्मं यस्यायं कार्यस्येह विनिश्चयः ।
इत्यर्थं मे ग्रहीतव्यं कथं तुल्यं भवेदिति ॥ १११ ॥
**राजाने कहा—**धिक्कार है राजधर्मको, जिसके कार्यका यहाँ यह परिणाम निकला। ब्राह्मणको और मुझको समान फलकी प्राप्ति कैसे हो, इसी उद्देश्यसे मुझे यह दान ग्रहण करना है ॥ १११ ॥
एष पाणिरपूर्वं मे निक्षेपार्थं प्रसारितः ।
यन्मे धारयसे विप्र तदिदानीं प्रदीयताम् ॥ ११२ ॥
ब्रह्मन्! यह मेरा हाथ जो आजसे पहले किसीके सामने नहीं फैलाया गया था, आज आपसे धरोहर लेनेके लिये आपके सामने फैला है। आप मेरा जो कुछ भी धरोहर धारण करते हैं, उसे इस समय मुझे दे दीजिये ॥

ब्राह्मण उवाच

संहितां जपता यावान् गुणः कश्चित् कृतो मया ।
तत् सर्वं प्रतिगृह्णीष्व यदि किञ्चिदिहास्ति मे ॥ ११३ ॥

Page 1282Permalink

ब्राह्मणने कहा-राजन्! मैंने संहिताका जप करते हुए कहींसे जितना भी पुण्य

अथवा सद्गुण संग्रह किया है, वह सब आप ले लें। इसके सिवा भी मेरे पास जो कुछ पुण्य

हो, उसे ग्रहण करें ।। ११३ ।।

राजोवाच

जलमेतन्निपतितं मम पाणौ द्विजोत्तम ।

सममस्तु सहैवास्तु प्रतिगृह्णातु वै भवान् ।। ११४ ।।

राजाने कहा- द्विजश्रेष्ठ! मेरे हाथपर यह संकल्पका जल पड़ा हुआ है। मेरा और

आपका सारा पुण्य हम दोनों के लिये समान हो और हम साथ-साथ उसका उपभोग करें;

इस उद्देश्यसे आप मेरा दिया हुआ दान भी ग्रहण करें ।। ११४ ।।

विरूप उवाच

कामक्रोधौ विद्धि नौ त्वमावाभ्यां कारितो भवान् ।

सहेति च यदुक्तं ते समा लोकास्तवास्य च ।। ११५ ।।

विरूपने कहा- राजन्! आपको विदित हो कि हम दोनों काम और क्रोध हैं। हमने ही

आपको इस कार्यमें लगाया है। आपने जो साथ-साथ फल भोगनेकी बात कही है, इससे

आपको और इस ब्राह्मणको एक समान लोक प्राप्त होंगे ।। ११५ ।।

नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।

कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ।। ११६ ।।

सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।

गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ।। ११७ ।।

यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है।

यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था। काल, धर्म, मृत्यु, काम,

क्रोध और आप दोनों-ये सब-के-सब एक-दूसरेकी कसौटीपर आपके देखते-देखते कसे

गये हैं। अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें

जाइये ।। ११६-११७ ।।

जापकानां फलावाप्तिर्मया ते सम्प्रदर्शिता ।

गतिः स्थानं च लोकाश्च जापकेन यथा जिताः ।। ११८ ।।

भीष्मजी कहते हैं- राजन्! जापकोंको किस प्रकार फलकी प्राप्ति होती है? इस

बातका दिग्दर्शन मैंने तुम्हें करा दिया। जापक ब्राह्मणने कौन-सी गति प्राप्त की? किस

स्थानपर अधिकार किया? कौन-कौन-से लोक उसके लिये सुलभ हुए? और यह सब किस

प्रकार सम्भव हुआ? ये बातें बतायी जायँगी ।। ११८ ।।

प्रयाति संहिताध्यायी ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।

अथवाग्निं समायाति सूर्यमाविशतेऽपि वा ।। ११९ ।।