भारतकोश
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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन

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एकाधिकशततमोऽध्यायः

भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

किंशीलाः किंसमाचाराः कथंरूपाश्च भारत ।
किंसन्नाहाः कथंशस्त्रा जनाः स्युः संगरे क्षमाः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—‘भरतनन्दन! युद्धस्थलमें कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण और कैसे रूपवाले योद्धा ठीक समझे जाते हैं? उनके कवच और अस्त्र-शस्त्र भी कैसे होने चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

यथाऽऽचरितमेवात्र शस्त्रं पत्रं विधीयते ।
आचाराद् वीरपुरुषस्तथा कर्मसु वर्तते ॥ २ ॥

भीष्मजी बोले—‘राजन्! अस्त्र-शस्त्र और वाहन तो योद्धाओंके देश और कुलके आचारके अनुरूप ही होने चाहिये। वीर पुरुष अपने परम्परागत आचारके अनुसार ही सभी कार्योंमें प्रवृत्त होता है ॥ २ ॥

गान्धाराः सिन्धुसौवीरा नखरप्रासयोधिनः ।
अभीरवः सुबलिनस्तद्वलं सर्वपारगम् ॥ ३ ॥

गान्धार, सिन्धु और सौवीर देशके योद्धा नखर (बघनखे) और प्राससे युद्ध करनेवाले हैं। वे बड़े बलवान् और निडर होते हैं। उनकी सेना सबको लाँघ जानेवाली होती है ॥ ३ ॥

सर्वशस्त्रेषु कुशलाः सत्त्ववन्तो ह्युशीनराः ।
प्राच्या मातङ्गयुद्धेषु कुशलाः कूटयोधिनः ॥ ४ ॥

उशीनरदेशके वीर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंमें कुशल और बड़े बलशाली होते हैं। पूर्वदेशके योद्धा हाथीपर सवार होकर युद्ध करनेकी कलामें कुशल हैं। वे कपटयुद्धके भी ज्ञाता हैं ॥ ४ ॥

तथा यवनकाम्बोजा मथुरामभितश्च ये ।
एते नियुद्धकुशला दाक्षिणात्यासिपाणयः ॥ ५ ॥

यवन, काम्बोज और मथुराके आस-पासके रहनेवाले योद्धा मल्लयुद्धमें निपुण होते हैं। तथा दक्षिण देशोंके निवासी हाथोंमें तलवार लिये रहते हैं। (वे तलवार चलाना अच्छा जानते हैं) ॥ ५ ॥

सर्वत्र शूरा जायन्ते महासत्त्वा महाबलाः ।

प्राय एव समुद्दिष्ट लक्षणानि तु मे शृणु ॥ ६ ॥ प्रायः सभी देशोंमें महान् धैर्यशाली, महाबली एवं शूरवीर पैदा होते हैं। उन सबका उल्लेख अधिकतर किया जा चुका है। अब तुम मुझसे उनके लक्षण सुनो ॥

सिंहशार्दूलवाङ्नेत्राः सिंहशार्दूलगामिनः । पारावतकुलिङ्गाक्षाः सर्वे शूराः प्रमाथिनः ॥ ७ ॥ जिनकी वाणी, नेत्र तथा चाल-ढाल सिंहों या बाघोंके समान होती है और जिनकी आँखें कबूतर या गौरैयेके समान होती हैं, वे सभी शूरवीर एवं शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥

मृगस्वरा द्वीपिनेत्रा ऋषभाक्षास्तरस्विनः । प्रमादिनश्च मन्दाश्च क्रोधनाः किङ्किणीस्वनाः ॥ ८ ॥ जिनका कण्ठस्वर मृगोंके समान और नेत्र बाघ एवं बैलोंके तुल्य होते हैं, वे वीर वेगशाली, असावधान और मूर्ख हुआ करते हैं। जिनका कण्ठनाद किंकिणीके समान मधुर हो, वे स्वभावके बड़े क्रोधी होते हैं ॥ ८ ॥

मेघस्वनाः क्रोधमुखाः केचित् करभसंनिभाः । जिह्मनासाग्रजिह्वाश्च दूरगा दूरपातिनः ॥ ९ ॥ जिनकी गर्जना मेघके समान, मुख क्रोधयुक्त, शरीर ऊँटकी तरह तथा नाक और जीभ टेढ़ी हो, वे बहुत दूरतक दौड़नेवाले तथा सुदूरवर्ती लक्ष्यको भी मार गिरानेवाले होते हैं ॥ ९ ॥

बिडालकुब्जतनवस्तनुकेशास्तनुत्वचः । शीघ्राश्चपलवृत्ताश्च ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १० ॥ जिनका शरीर बिलावके समान कुबड़ा तथा सिरके बाल और देहकी खाल पतले होते हैं, वे शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले चंचल और दुर्जय होते हैं ॥ १० ॥

गोधानिमीलिताः केचिन्मृदुप्रकृतयस्तथा । तरङ्गगतिनिर्घोषास्ते नराः पारयिष्णवः ॥ ११ ॥ जो गोहटीके समान आँखें बन्द किये रहते हैं, जिनका स्वभाव कोमल होता है तथा जिनके चलनेपर घोड़ेकी टाप पड़ने-जैसी आवाज होती है, वे मनुष्य युद्धके पार पहुँच जाते हैं ॥ ११ ॥

सुसंहताः सुतनवो व्यूढोरस्काः सुसंस्थिताः । प्रवादितेषु कुप्यन्ति हृष्यन्ति कलहेषु च ॥ १२ ॥ जिनके शरीर गठीले, छाती चौड़ी और अंग-प्रत्यंग सुडौल होते हैं, जो युद्धमें डटकर खड़े होनेवाले हैं, वे वीर पुरुष युद्धका धौंसा सुनते ही कुपित हो उठते हैं। उन्हें लड़ने-भिड़नेमें ही आनन्द आता है ॥ १२ ॥

गम्भीराक्षा निःसृताक्षाः पिङ्गाक्षा भ्रुकुटीमुखाः ।

नकुलाक्षास्तथा चैव सर्वे शूरास्तनुत्यजः ॥ १३ ॥
जिनकी आँखें गहरी हैं अथवा बड़ी होनेके कारण निकली हुई-सी प्रतीत होती हैं या जिनके नेत्र पिंगलवर्णके हैं अथवा जिनकी आँखें नेवलेके समान भूरी-भूरी हैं और जिनके मुखपर भौंहें तनी रहती हैं, ऐसे लक्षणोंवाले सभी मनुष्य शूरवीर तथा रणभूमिमें शरीरका त्याग करनेवाले होते हैं ॥ १३ ॥

जिह्माक्षाः प्रललाटाश्च निर्मांसहनवोऽपि च ।
वज्रबाह्वंगुलीचक्राः कृशा धमनिसंतताः ॥ १४ ॥
प्रविशन्ति च वेगेन साम्पराये ह्युपस्थिते ।
वारणा इव सम्मत्तास्ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १५ ॥

जिनकी आँखें तिरछी, ललाट ऊँचे और ठोड़ी मांसहीन एवं दुबली-पतली है, जिनकी भुजाओंपर वज्रका और अंगुलियोंपर चक्रका चिह्न होता है तथा जिनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं, वे युद्ध उपस्थित होते ही बड़े वेगसे शत्रुओंकी सेनामें घुस जाते हैं और मतवाले हाथियोंके समान शत्रुओंके लिये दुर्जय होते हैं ॥ १४-१५ ॥

दीप्तस्फुटितकेशान्ताः स्थूलपार्श्वहनुमुखाः ।
उन्नतांसाः पृथुग्रीवा विकटाः स्थूलपिण्डिकाः ॥ १६ ॥
उद्धता इव सुग्रीवा विनताविहगा इव ।
पिण्डशीर्षातिवक्त्राश्च वृषदंशमुखास्तथा ॥ १७ ॥
उग्रस्वरा मन्युमन्तो युद्धेष्वारावसारिणः ।
अधर्मज्ञावलिप्ताश्च घोरा रौद्रप्रदर्शनाः ॥ १८ ॥

जिनके केशोंके अग्रभाग पीले और छितराये हुए हैं, पसलियाँ, ठोड़ी और मुँह लंबे एवं मोटे हैं, कंधे ऊँचे, गर्दन मोटी और पिण्डली भारी हैं, जो देखनेमें विकट जान पड़ते हैं, सुग्रीव जातिवाले अश्वोंके समान तथा गरुड़ पक्षीकी भाँति उद्धत स्वभावके हैं, जिनके सिर गोल और मुख विशाल हैं, जो बिलाव-जैसा मुख धारण करते हैं तथा जिनके स्वरमें कठोरता है, वे बड़े क्रोधी होते हैं और युद्धमें गर्जना करते हुए विचरते हैं। उन्हें धर्मका ज्ञान नहीं होता। वे घमंडमें भरे हुए घोर आकृतिवाले दिखायी देते हैं। उनका दर्शन ही बड़ा भयंकर है ॥ १६—१८ ॥

त्यक्तात्मानः सर्व एते अन्त्यजा ह्यनिवर्तिनः ।
पुरस्कार्याः सदा सैन्ये हन्यन्ते घ्नन्ति चापि ये ॥ १९ ॥

ये सब-के-सब अन्त्यज (कोल-भील आदि) हैं, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते और शरीरका मोह छोड़कर लड़ते हैं। सेनामें ऐसे लोगोंको सदा पुरस्कार देना चाहिये और इन्हें सदा आगे-आगे रखना चाहिये। ये धैर्यपूर्वक शत्रुओंकी मार सहते और उन्हें भी मारते हैं ॥

अधार्मिका भिन्नवृत्ताः सान्त्वेनैषां पराभवः ।
एवमेव प्रकुप्यन्ति राज्ञोऽप्येते ह्यभीक्ष्णशः ॥ २० ॥

ये अधर्मी होते हैं, धर्मकी मर्यादा भंग कर देते हैं। इसी तरह ये बारंबार राजापर भी कुपित हो उठते हैं; अतः इन्हें मीठी-मीठी बातोंसे समझा-बुझाकर ही काबूमें करना चाहिये ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥

विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश

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द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश

युधिष्ठिर उवाच
जयित्र्याः कानि रूपाणि भवन्ति भरतर्षभ ।
पृतनायाः प्रशस्तानि तानि चेच्छामि वेदितुम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— 'भरतश्रेष्ठ! विजय पानेवाली सेनाके कौन-कौन-से शुभ लक्षण होते हैं? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच
जयित्र्या यानि रूपाणि भवन्ति भरतर्षभ ।
पृतनायाः प्रशस्तानि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतभूषण! विजय पानेवाली सेनाके समक्ष जो-जो शुभ लक्षण प्रकट होते हैं, उन सबका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
दैवे पूर्वं प्रकुपिते मानुषे कालचोदिते ।
तद्विद्वांसोऽनुपश्यन्ति ज्ञानदिव्येन चक्षुषा ॥ ३ ॥
प्रायश्चित्तविधिं चात्र जपहोमांश्च तद्विदः ।
मङ्गलानि च कुर्वन्ति शमयन्त्यहितानि च ॥ ४ ॥
कालसे प्रेरित हुए मनुष्यपर पहले दैवका प्रकोप होता है। उसे विद्वान् पुरुष जब ज्ञानमयी दिव्यदृष्टिसे देख लेते हैं, तब उसके प्रतीकारको जाननेवाले वे पुरुष उसके प्रायश्चित्तका विधान—जप, होम आदि मांगलिक कृत्य करते हैं और उस अहितकारक दैवी उपद्रवको शान्त कर देते हैं ॥ ३-४ ॥
उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत ।
यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां परो जयः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! जिस सेनाके योद्धा और वाहन मनमें प्रसन्न एवं उत्साहयुक्त होते हैं, उसकी उत्तम विजय अवश्य होती है ॥ ५ ॥
अन्वेतान् वायवो यान्ति तथैवेन्द्रधनूंषि च ।
अनुप्लवन्तो मेघाश्च तथाऽऽदित्यस्य रश्मयः ॥ ६ ॥
गोमायवश्चानुकूला बलगृध्राश्च सर्वशः ।
अर्हयेयुर्यदा सेनां तदा सिद्धिरनुत्तमा ॥ ७ ॥

यदि सेनाकी रणयात्राके समय सैनिकोंके पीछेसे मन्द-मन्द वायु प्रवाहित हो, सामने इन्द्रधनुषका उदय हो, बार-बार बादलोंकी छाया होती रहे और सूर्यकी किरणोंका भी प्रकाश फैलता रहे तथा गीदड़, गीध और कौए भी अनुकूल दिशामें आ जायँ तो निश्चय ही उस सेनाको परम उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६-७ ॥

प्रसन्नभाः पावकश्चोर्ध्वरश्मिः
प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः ।
पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां भवन्ति
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ८ ॥
यदि बिना धुएँकी आग प्रज्वलित हो, उसकी ज्वाला निर्मल हो और लपटें ऊपरकी ओर उठ रही हों अथवा उस अग्निकी शिखाएँ दाहिनी ओर जाती दिखायी देती हों तथा आहुतियोंकी पवित्र गन्ध प्रकट हो रही हो तो इन सबको भावी विजयका शुभ चिह्न बताया गया है ॥ ८ ॥

गम्भीरशब्दाश्च महास्वनाश्च
शङ्खाश्च भेर्यश्च नदन्ति यत्र ।
युयुत्सवश्चाप्रतीपा भवन्ति
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ९ ॥
जहाँ शंखोंकी गम्भीर ध्वनि और रणभेरीकी ऊँची आवाज फैल रही हो, युद्धकी इच्छा रखनेवाले सैनिक सर्वथा अनुकूल हों तो वहाँके लिये इसे भी भावी विजयका सूचक शुभ लक्षण कहा गया है ॥ ९ ॥

इष्टा मृगाः पृष्ठतो वामतश्च
सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च ।
जिघांसतां दक्षिणाः सिद्धिमाहु-
र्ये त्वग्रतस्ते प्रतिषेधयन्ति ॥ १० ॥
सेनाके प्रस्थान करते समय अथवा जानेके लिये तैयारी करते समय यदि इष्ट मृग पीछे और बायें आ जायँ तो इच्छित फल प्रदान करते हैं। तथा युद्ध करते समय दाहिने हो जायँ तो वे सिद्धिकी सूचना देते हैं; किंतु यदि सामने आ जायँ तो उस युद्धकी यात्राका निषेध करते हैं ॥ १० ॥

माङ्गल्यशब्दान् शकुना वदन्ति
हंसाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च चाषाः ।
हृष्टा योधाः सत्त्ववन्तो भवन्ति
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ११ ॥
जब हंस, क्रौंच, शतपत्र और नीलकण्ठ आदि पक्षी मंगलसूचक शब्द करते हों और सैनिक हर्ष तथा उत्साहसे सम्पन्न दिखायी देते हों तो यह भी भावी विजयका शुभ लक्षण

बताया गया है ॥ ११ ॥
शस्त्रैर्यन्त्रैः कवचैः केतुभिश्च
सुभानुभिर्मुखवर्णैश्च यूनाम् ।
भ्राजिष्मती दुष्प्रतिवीक्षणीया
येषां चमूस्तेऽभिभवन्ति शत्रून् ॥ १२ ॥
जिनकी सेना भाँति-भाँतिके शस्त्र, कवच, यन्त्र तथा ध्वजाओंसे सुशोभित हो, जिनके नौजवान सैनिकोंके मुखकी सुन्दर प्रभामयी कान्तिसे प्रकाशित होती हुई सेनाकी ओर शत्रुओंको देखनेका भी साहस न होता हो, वे निश्चय ही शत्रुदलको परास्त कर सकते हैं ॥ १२ ॥
शुश्रूषवश्चानभिमानिनश्च
परस्परं सौहृदमास्थिताश्च ।
येषां योधाः शौचमनुष्ठिताश्च
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ १३ ॥
जिनके योद्धा स्वामीकी सेवामें उत्साह रखनेवाले, अहंकाररहित, आपसमें एक-दूसरेका हित चाहनेवाले तथा शौचाचारका पालन करनेवाले हों, उनकी होनेवाली विजयका यही शुभ लक्षण बताया गया है ॥ १३ ॥
शब्दाः स्पर्शास्तथा गन्धा विचरन्ति मनःप्रियाः ।
धैर्यं चाविशते योधान् विजयस्य मुखं च तत् ॥ १४ ॥
जब योद्धाओंके मनको प्रिय लगनेवाले शब्द, स्पर्श और गन्ध सब ओर फैल रहे हों तथा उनके भीतर धैर्यका संचार हो रहा हो तो वह विजयका द्वार माना जाता है ॥ १४ ॥
इष्टो वामः प्रविष्टस्य दक्षिणः प्रविविक्षतः ।
पश्चात्संसाधयत्यर्थं पुरस्ताच्च निषेधति ॥ १५ ॥
यदि कौआ युद्धमें प्रवेश करते समय दाहिने भागमें और प्रविष्ट हो जानेके बाद बायें भागमें आ जाय तो शुभ है। पीछेकी ओर होनेसे भी वह कार्यकी सिद्धि करता है; परंतु सामने होनेपर विजयमें बाधा डालता है ॥ १५ ॥
सम्भृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां युधिष्ठिर ।
साम्नैव वर्तयेः पूर्वं प्रयतेथास्ततो युधि ॥ १६ ॥
युधिष्ठिर! विशाल चतुरंगिणी सेना एकत्र कर लेनेके बाद भी तुम्हें पहले सामनीतिके द्वारा शत्रुसे सन्धि करनेका ही प्रयास करना चाहिये। यदि वह सफल न हो तो युद्धके लिये प्रयत्न करना उचित है ॥
जघन्य एष विजयो यद् युद्धं नाम भारत ।
यादृच्छिको युधि जयो दैवो वेति विचारणम् ॥ १७ ॥

भरतनन्दन! युद्ध करके जो विजय प्राप्त होती है, उसे निकृष्ट ही माना गया है। युद्धसम्बन्धी विजय अचानक प्राप्त होती है या दैवेच्छासे; यह बात विचारणीय ही होती है। इसका पहलेसे कोई निश्चय नहीं रहता ।। १७ ।।

अपामिव महावेगस्त्रस्ता इव महामृगाः ।
दुर्निवार्यतमा चैव प्रभग्ना महती चमूः ।। १८ ।।
यदि विशाल सेनामें भगदड़ मच जाती है तो उसे जलके महान् वेगके समान तथा भयभीत हुए महामृगोंके समान रोकना अत्यन्त कठिन हो जाता है ।। १८ ।।

भग्ना इत्येव भज्यन्ते विद्वांसोऽपि न कारणम् ।
उदारसारा महती रुरुसंघोपमा चमूः ।। १९ ।।
विशाल सेना मृगोंके झुंडके समान होती है। उसमें कितने ही बलवान् वीर क्यों न भरे हों, कुछ लोग भाग रहे हैं—इतना ही देखकर सब भागने लगते हैं। यद्यपि उन्हें भागनेका कारण नहीं मालूम रहता है ।। १९ ।।

परस्परज्ञाः संहृष्टास्त्यक्तप्राणाः सुनिश्चिताः ।
अपि पञ्चाशतं शूरा निघ्नन्ति परवाहिनीम् ।। २० ।।
एक-दूसरेको जाननेवाले, हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण, प्राणोंका मोह छोड़ देनेवाले तथा मरने-मारनेके दृढ़ निश्चयसे युक्त पचास शूरवीर भी सारी शत्रु-सेनाका संहार कर सकते हैं ।। २० ।।

अपि वा पञ्च षट् सप्त संहताः कृतनिश्चयाः ।
कुलीनाः पूजिताः सम्यग् विजयन्तीह शात्रवान् ।। २१ ।।
अच्छे कुलमें उत्पन्न, परस्पर संगठित तथा राजाद्वारा सम्मानित पाँच, छः या सात वीर भी यदि दृढ़ निश्चयके साथ युद्धस्थलमें डटे रहें तो युद्धमें शत्रुओंपर भलीभाँति विजय पा सकते हैं ।। २१ ।।

संनिपातो न मन्तव्यः शक्ये सति कथंचन ।
सान्त्वभेदप्रदानानां युद्धमुत्तरमुच्यते ।। २२ ।।
जबतक किसी तरह सन्धि हो सकती हो, तबतक युद्धको स्वीकार नहीं करना चाहिये। पहले सामनीतिसे समझावे। इससे काम न चले तो भेदनीतिके अनुसार शत्रुओंमें फूट डाले। इसमें भी सफलता न मिले तो दाननीतिका प्रयोग करे—धन देकर शत्रुके सहायकोंको वशमें करनेकी चेष्टा करे। इन तीनों उपायोंके सफल न होनेपर अन्तमें युद्धका आश्रय लेना उचित बताया गया है ।। २२ ।।

संदर्शनेनैव सेनाया भयं भीरून् प्रबाधते ।
वज्रादिव प्रज्वलितादियं क्व नु पतिष्यति ।। २३ ।।
शत्रुकी सेनाको देखते ही कायरोंको भय सताने लगता है, मानो उनके ऊपर प्रज्वलित वज्र गिरनेवाला हो। वे सोचते हैं, न जाने यह सेना किसके ऊपर पड़ेगी? ।। २३ ।।

अभिप्रयातां समितिं ज्ञात्वा ये प्रतियान्त्यथ ।
तेषां स्यन्दन्ति गात्राणि योधानां विजयस्य च ॥ २४ ॥
जो युद्धको उपस्थित हुआ जानकर उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, उन वीरोंके शरीरमें विजयकी आशासे आनन्दजनित पसीनेके बिन्दु प्रकट हो जाते हैं ॥ २४ ॥
विषयो व्यथते राजन् सर्वः सस्थाणुजङ्गमः ।
अस्य प्रतापतप्तानां मज्जा सीदति देहिनाम् ॥ २५ ॥
राजन्! युद्ध उपस्थित होनेपर स्थावर-जंगम प्राणियोंसहित समस्त देश ही व्यथित हो उठता है और अस्त्रोंके प्रतापसे संतप्त हुए देहधारियोंकी मज्जा भी सूखने लगती है ॥ २५ ॥
तेषां सान्त्वं क्रूरमिश्रं प्रणेतव्यं पुनः पुनः ।
सम्पीड्यमाना हि परैर्योगमायान्ति सर्वतः ॥ २६ ॥
उन देशवासियोंके प्रति कठोरताके साथ-साथ सान्त्वनापूर्ण मधुर वचनोंका बारंबार प्रयोग करना चाहिये; अन्यथा केवल कठोर वचनोंसे पीड़ित हो वे सब ओरसे जाकर शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं ॥ २६ ॥
आन्तराणां च भेदार्थं चरानभ्यवचारयेत् ।
यश्च तस्मात् परो राजा तेन सन्धिः प्रशस्यते ॥ २७ ॥
शत्रुके मित्रोंमें फूट डालनेके लिये गुप्तचरोंको भेजना चाहिये और जो शत्रुसे भी बलवान् राजा हो, उसके साथ सन्धि करना श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
न हि तस्यान्यथा पीडा शक्या कर्तुं तथाविधा ।
यथा सार्धममित्रेण सर्वतः प्रतिबाधनम् ॥ २८ ॥
अन्यथा उसको वैसी पीड़ा नहीं दी जा सकती, जैसी कि उसके शत्रुके साथ सन्धि करके दी जा सकती है। युद्ध इस प्रकार करना चाहिये, जिससे शत्रुपक्ष सब ओरसे संकटमें पड़ जाय ॥ २८ ॥
क्षमा वै साधुमायाति न ह्यसाधूंन्क्षमा सदा ।
क्षमायाश्चाक्षमायाश्च पार्थ विद्धि प्रयोजनम् ॥ २९ ॥
कुन्तीनन्दन! सत्पुरुषोंको ही सदा क्षमा करना आता है, दुष्टोंको नहीं। क्षमा करने और न करनेका प्रयोजन बताता हूँ; इसे सुनो और समझो ॥ २९ ॥
विजित्य क्षममाणस्य यशो राज्ञो विवर्धते ।
महापराधे ह्यप्यस्मिन् विश्वसन्त्यपि शत्रवः ॥ ३० ॥
जो राजा शत्रुओंको जीत लेनेके बाद उनके अपराध क्षमा कर देता है, उसका यश बढ़ता है। उसके प्रति महान् अपराध करनेपर भी शत्रु उसपर विश्वास करते हैं ॥ ३० ॥
मन्यते कर्षयित्वा तु क्षमा साध्वीति शम्बरः ।
असंतप्तं तु यद् दारु प्रत्येति प्रकृतिं पुनः ॥ ३१ ॥

शम्बरासुरका मत है कि पहले शत्रुको पीड़ाद्वारा अत्यन्त दुर्बल करके फिर उसके प्रति क्षमाका प्रयोग करना ठीक है; क्योंकि यदि टेढ़ी लकड़ीको बिना गर्म किये ही सीधी किया जाय तो वह फिर ज्यों-की-त्यों हो जाती है ॥ ३१ ॥ नैतत् प्रशंसन्त्याचार्या न च साधुनिदर्शनम् । अक्रोधेनाविनाशेन नियन्तव्याः स्वपुत्रवत् ॥ ३२ ॥ परंतु आचार्यगण इस बातकी प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि यह साधु पुरुषोंका दृष्टान्त नहीं है। राजाको चाहिये कि वह पुत्रकी ही भाँति अपने शत्रुको भी बिना क्रोध किये ही वशमें करे; उसका विनाश न करे ॥ ३२ ॥ द्वेष्यो भवति भूतानामुग्रो राजा युधिष्ठिर । मृदुमप्यवमन्यन्ते तस्मादुभयमाचरेत् ॥ ३३ ॥ युधिष्ठिर! राजा यदि उग्रस्वभावका हो जाय तो वह समस्त प्राणियोंके द्वेषका पात्र बन जाता है और यदि सर्वथा कोमल हो जाय तो सभी उसकी अवहेलना करने लगते हैं; इसलिये उसे आवश्यकतानुसार उग्रता और कोमलता दोनोंसे काम लेना चाहिये ॥ ३३ ॥ प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहरन्नपि भारत । प्रहृत्य च कृपायीत शोचन्निव रुदन्निव ॥ ३४ ॥ भरतनन्दन! राजा शत्रुपर प्रहार करनेसे पहले और प्रहार करते समय भी उससे प्रिय वचन ही बोले। प्रहारके बाद भी शोक प्रकट करते और रोते हुए-से उसके प्रति दया दिखावे ॥ ३४ ॥ न मे प्रियं यन्निहताः संग्रामे मामकैर्नरैः । न च कुर्वन्ति मे वाक्यमुच्यमानाः पुनः पुनः ॥ ३५ ॥ वह शत्रुको सुनाकर इस प्रकार कहे—‘ओह! इस युद्धमें मेरे सिपाहियोंने जो इतने वीरोंको मार डाला है, यह मुझे अच्छा नहीं लगा है; परंतु क्या करूँ? बारंबार कहनेपर भी ये मेरी बात नहीं मानते हैं ॥ ३५ ॥ अहो जीवितमाकाङ्क्षेन्नेदृशो वधमर्हति । सुदुर्लभाः सुपुरुषाः संग्रामेष्वपलायिनः ॥ ३६ ॥ कृतं ममाप्रियं तेन तेनायं निहतो मृधे । इति वाचा बदन् हन्तॄन् पूजयेत रहोगतः ॥ ३७ ॥ ‘अहो! सभी लोग अपने प्राणोंकी रक्षा करना चाहते हैं; अतः ऐसे पुरुषका वध करना उचित नहीं है। संग्राममें पीठ न दिखानेवाले सत्पुरुष इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ हैं। मेरे जिन सैनिकोंने युद्धमें इस श्रेष्ठ वीरका वध किया है, उनके द्वारा मेरा बड़ा अप्रिय कार्य हुआ है। शत्रुपक्षके सामने वाणीद्वारा इस प्रकार खेद प्रकट करके राजा एकान्तमें जानेपर अपने उन बहादुर सिपाहियोंकी प्रशंसा करे, जिन्होंने शत्रुपक्षके प्रमुख वीरोंका वध किया हो ॥ ३६-३७ ॥

हन्तॄणामाहतानां च यत् कुर्युंरपराधिनः ।
क्रोशद् बाहुं प्रगृह्यापि चिकीर्षन् जनसंग्रहम् ॥ ३८ ॥
इसी तरह शत्रुओंको मारनेवाले अपने पक्षके वीरोंमेंसे जो हताहत हुए हों, उनकी हानिके लिये इस प्रकार दुःख प्रकट करे, जैसे अपराधी किया करते हैं। जनमतको अपने अनुकूल करनेकी इच्छासे जिसकी हानि हुई हो, उसकी बाँह पकड़कर सहानुभूति प्रकट करते हुए जोर-जोरसे रोवे और विलाप करे ॥ ३८ ॥
एवं सर्वास्ववस्थासु सान्त्वपूर्वं समाचरेत् ।
प्रियो भवति भूतानां धर्मज्ञो वीतभीर्नृपः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार सब अवस्थाओंमें जो सान्त्वनापूर्ण बर्ताव करता है, वह धर्मज्ञ राजा सब लोगोंका प्रिय एवं निर्भय हो जाता है ॥ ३९ ॥
विश्वासं चात्र गच्छन्ति सर्वभूतानि भारत ।
विश्वस्तः शक्यते भोक्तुं यथाकाममुपस्थितः ॥ ४० ॥
भरतनन्दन! उसके ऊपर सब प्राणी विश्वास करने लगते हैं। विश्वासपात्र हो जानेपर वह सबके निकट रहकर इच्छानुसार सारे राष्ट्रका उपभोग कर सकता है ॥ ४० ॥
तस्माद् विश्वासयेद् राजा सर्वभूतान्यमायया ।
सर्वतः परिरक्षेच्च यो महीं भोक्तुमिच्छति ॥ ४१ ॥
अतः जो राजा इस पृथ्वीका राज्य भोगना चाहता है, उसे चाहिये कि छल-कपट छोड़कर अपने ऊपर समस्त प्राणियोंका विश्वास उत्पन्न करे और इस भूमण्डलकी सब ओरसे पूर्णरूपसे रक्षा करे ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनानीतिकथने द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनानीतिका वर्णनविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥

शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद

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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

कथं मृदौ कथं तीक्ष्णे महापक्षे च पार्थिव ।
आदौ वर्तेत नृपतिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! पृथ्वीपते! जिसका पक्ष प्रबल और महान् हो, वह शत्रु यदि कोमल स्वभावका हो तो उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये और यदि वह तीक्ष्ण स्वभावका हो तो उसके साथ पहले किस तरहका बर्ताव करना राजाके लिये उचित है, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—'युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष बृहस्पति और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

बृहस्पतिं देवपतिरभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
उपसंगम्य पप्रच्छ वासवः परवीरहा ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीके पास जा उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा ॥ ३ ॥

इन्द्र उवाच

अहितेषु कथं ब्रह्मन् प्रवर्तेयमतन्द्रितः ।
असमुच्छिद्य चैवैतान् नियच्छेयमुपायतः ॥ ४ ॥
**इन्द्र बोले—**ब्रह्मन्! मैं आलस्यरहित हो अपने शत्रुओंके प्रति कैसा बर्ताव करूँ? उन सबका समूलोच्छेद किये बिना ही उन्हें किस उपायसे वशमें करूँ? ॥ ४ ॥

सेनयोर्व्यतिषङ्गेण जयः साधारणो भवेत् ।
किंकुर्वाणं न मां जह्याज्ज्वलिता श्रीःप्रतापिनी ॥ ५ ॥
दो सेनाओंमें परस्पर भिड़न्त हो जानेपर विजय दोनों पक्षोंके लिये साधारण-सी वस्तु हो जाती है (अमुक पक्षकी ही जीत होगी, यह नियम नहीं रह जाता)। अतः मुझे क्या

करना चाहिये, जिससे शत्रुओंको संताप देनेवाली यह समुज्ज्वल राज्यलक्ष्मी मुझे कभी न छोड़े ॥ ५ ॥ ततो धर्मार्थकामानां कुशलः प्रतिभानवान् । राजधर्मविधानज्ञः प्रत्युवाच पुरंदरम् ॥ ६ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्म, अर्थ और कामके प्रतिपादनमें कुशल, प्रतिभाशाली तथा राजधर्मके विधानको जाननेवाले बृहस्पतिने इन्द्रको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ६ ॥ बृहस्पतिरुवाच न जातु कलहेनेच्छेन्नियन्तुमपकारिणः । बालैरासेवितं ह्येतद् यदमर्षो यदक्षमा ॥ ७ ॥ **बृहस्पतिजी बोले—**राजन्! कोई भी राजा कभी कलह या युद्धके द्वारा शत्रुओंको वशमें करनेकी इच्छा न करे। असहनशीलता अथवा क्षमाको छोड़ना, यह बालकों या मूर्खोंद्वारा सेवित मार्ग है ॥ ७ ॥ न शत्रुर्विवृतः कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता । क्रोधं भयं च हर्षं च नियम्य स्वयमात्मनि ॥ ८ ॥ शत्रुके वधकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह क्रोध, भय और हर्षको अपने मनमें ही रोक ले तथा शत्रुको सावधान न करे ॥ ८ ॥ अमित्रमुपसेवेत विश्वस्तवदविश्वसन् । प्रियमेव वदेन्नित्यं नाप्रियं किंचिदाचरेत् ॥ ९ ॥ भीतरसे विश्वास न करते हुए भी बाहरसे विश्वस्त पुरुषकी भाँति अपना भाव प्रदर्शित करते हुए शत्रुको सेवा करे। सदा उससे प्रिय वचन ही बोले, कभी कोई अप्रिय बर्ताव न करे ॥ ९ ॥ विरमेच्छुष्कवैरेभ्यः कण्ठायासांश्च वर्जयेत् । यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वनः ॥ १० ॥ तान् द्विजान् कुरुते वश्यांस्तथा युक्तो महीपतिः । वश चोप नयेच्छत्रून् निहन्याच्च पुरंदर ॥ ११ ॥ पुरंदर! सूखे वैरसे अलग रहे, कण्ठको पीड़ा देनेवाले वाद-विवादको त्याग दे। जैसे व्याध अपने कार्यमें सावधानीके साथ संलग्न हो पक्षियोंको फँसानेके लिये उन्हींके समान बोली बोलता है और मौका पाकर उन पक्षियोंको वशमें कर लेता है, उसी प्रकार उद्योगशील राजा धीरे-धीरे शत्रुओंको वशमें कर ले। तत्पश्चात् उन्हें मार डाले ॥ १०-११ ॥ न नित्यं परिभूयारीन् सुखं स्वपिति वासव । जागत्र्येव हि दुष्टात्मा संकरेऽग्निरिवोत्थितः ॥ १२ ॥

इन्द्र! जो सदा शत्रुओंका तिरस्कार ही करता है, वह सुखसे सोने नहीं पाता। वह दुष्टात्मा नरेश बाँस और घास-फूसमें प्रज्वलित हो चट-चट शब्द करनेवाली आगके समान सदा जागता ही रहता है ॥ १२ ॥
न संनिपातः कर्तव्यः सामान्ये विजये सति ।
विश्वास्यैवोपसन्नार्थो वशे कृत्वा रिपुः प्रभो ॥ १३ ॥
प्रभो! जब युद्धमें विजय एक सामान्य वस्तु है (किसीको भी वह मिल सकती है), तब उसके लिये पहले ही युद्ध नहीं करना चाहिये, अपितु शत्रुको अच्छी तरह विश्वास दिलाकर वशमें कर लेनेके पश्चात् अवसर देखकर उसके सारे मनसूबेको नष्ट कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
सम्प्रधार्य सहामात्यैर्मन्त्रविद्भिर्महात्मभिः ।
उपेक्ष्यमाणोऽवज्ञातो हृदयेनापराजितः ॥ १४ ॥
अथास्य प्रहरेत् काले किंचिद्विचलिते पदे ।
दण्डं च दूषयेदस्य पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ १५ ॥
शत्रुके द्वारा उपेक्षा अथवा अवहेलना की जानेपर भी राजा अपने मनमें हिम्मत न हारे। वह मन्त्रियोंसहित मन्त्रवेत्ता महापुरुषोंके साथ कर्त्तव्यका निश्चय करके समय आनेपर जब शत्रुकी स्थिति कुछ डाँवाडोल हो जाय, तब उसपर प्रहार करे और विश्वासपात्र पुरुषोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुकी सेनामें फूट डलवा दे ॥
आदिमध्यावसानज्ञः प्रच्छन्नं च विधारयेत् ।
बलानि दूषयेदस्य जानन्नेव प्रमाणतः ॥ १६ ॥
राजा शत्रुके राज्यकी आदि, मध्य और अन्तिम सीमाको जानकर गुप्तरूपसे मन्त्रियोंके साथ बैठकर अपने कर्तव्यका निश्चय कर तथा शत्रुकी सेनाकी संख्या कितनी है, इसको अच्छी तरह जानते हुए ही उसमें फूट डलवानेकी चेष्टा करे ॥ १६ ॥
भेदेनोप्रदानेन संसृजेदौषधैस्तथा ।
न त्वेवं खलु संसर्गं रोचयेदरिभिः सह ॥ १७ ॥
राजाको चाहिये कि वह दूर रहकर गुप्तचरोंद्वारा शत्रुकी सेनामें मतभेद पैदा करे। घूस देकर लोगोंको अपने पक्षमें करनेकी चेष्टा करे अथवा उनके ऊपर विभिन्न औषधोंका प्रयोग करे; परंतु किसी तरह भी शत्रुओंके साथ प्रकटरूपसे साक्षात् सम्बन्ध स्थापित करनेकी इच्छा न करे ॥ १७ ॥
दीर्घकालमपीक्षेत निहन्यादेव शात्रवान् ।
कालाकाङ्क्षी हि क्षपयेद् यथा विश्रम्भमाप्नुयुः ॥ १८ ॥
अनुकूल अवसर पानेके लिये कालक्षेप ही करता रहे। उसके लिये दीर्घ कालतक भी प्रतीक्षा करनी पड़े तो करे, जिससे शत्रुओंको भलीभाँति विश्वास हो जाय। तदनन्तर मौका पाकर उन्हें मार ही डाले ॥ १८ ॥

न सद्योऽरीन् विहन्याच्च द्रष्टव्यो विजयो ध्रुवः ।
न शल्यं वा घटयति न वाचा कुरुते व्रणम् ॥ १९ ॥
राजा शत्रुओंपर तत्काल आक्रमण न करे। अवश्यम्भावी विजयके उपायपर विचार करे। न तो उसपर विषका प्रयोग करे और न उसे कठोर वचनोंद्वारा ही घायल करे ॥ १९ ॥

प्राप्ते च प्रहरेत् काले न च संवर्तते पुनः ।
हन्तुकामस्य देवेन्द्र पुरुषस्य रिपून् प्रति ॥ २० ॥
देवेन्द्र! जो शत्रुको मारना चाहता है, उस पुरुषके लिये बारंबार मौका हाथमें नहीं लगता; अतः जब कभी अवसर मिल जाय, उस समय उसपर अवश्य प्रहार करे ॥

यो हि कालो व्यतिक्रामेत् पुरुषं कालकांक्षिणम् ।
दुर्लभः स पुनस्तेन कालः कर्मचिकीर्षुणा ॥ २१ ॥
समयकी प्रतीक्षा करनेवाले पुरुषके लिये जो उपयुक्त अवसर आकर भी चला जाता है, वह अभीष्ट कार्य करनेकी इच्छावाले उस पुरुषके लिये फिर दुर्लभ हो जाता है ॥ २१ ॥

ओजश्च जनयेदेव संगृह्णन् साधुसम्मतम् ।
अकाले साधयेन्मित्रं न च प्राप्ते प्रपीडयेत् ॥ २२ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर अपने बलको सदा बढ़ाता रहे। जबतक अनुकूल अवसर न आये, तबतक अपने मित्रोंकी संख्या बढ़ावे और शत्रुको भी पीड़ा न दे; परंतु अवसर आ जाय तो शत्रुपर प्रहार करनेसे न चूके ॥ २२ ॥

विहाय कामं क्रोधं च तथाहंकारमेव च ।
युक्तो विवरमन्विच्छेदहितानां पुनः पुनः ॥ २३ ॥
काम, क्रोध तथा अहंकारको त्यागकर सावधानीके साथ बारंबार शत्रुओंके छिद्रोंको देखता रहे ॥ २३ ॥

मार्दवं दण्ड आलस्यं प्रमादश्च सुरोत्तम ।
मायाः सुविहिताः शक्र सादयन्त्यविचक्षणम् ॥ २४ ॥
सुरश्रेष्ठ इन्द्र! कोमलता, दण्ड, आलस्य, असावधानी और शत्रुओंद्वारा अच्छी तरह प्रयोग की हुई माया—ये अनभिज्ञ राजाको बड़े कष्टमें डाल देते हैं ॥ २४ ॥

निहत्यैतानि चत्वारि मायां प्रति विधाय च ।
ततः शक्नोति शत्रूणां प्रहर्तुमविचारयन् ॥ २५ ॥
कोमलता, दण्ड, आलस्य और प्रमाद—इन चारोंको नष्ट करके शत्रुको मायाका भी प्रतीकार करे। तत्पश्चात् वह बिना विचारे शत्रुओंपर प्रहार कर सकता है ॥ २५ ॥

यदैकैकेन शक्येत गुह्यं कर्तुं तदाचरेत् ।
यच्छन्ति सचिवा गुह्यं मिथो विश्रावयन्त्यपि ॥ २६ ॥

राजा अकेला ही जिस गुप्त कार्यको कर सके, उसे अवश्य कर डाले; क्योंकि मन्त्रीलोग कभी-कभी गुप्त विषयको प्रकाशित कर देते हैं और नहीं तो आपसमें ही एक-दूसरेको सुना देते हैं ॥ २६ ॥ अशक्यमिति कृत्वा वा ततोऽन्यैः संविदं चरेत् । ब्रह्मदण्डमदृष्टेषु दृष्टेषु चतुरङ्गिणीम् ॥ २७ ॥ जो कार्य अकेले करना असम्भव हो जाय, उसीके लिये दूसरोंके साथ बैठकर विचार-विमर्श करे। यदि शत्रु दूरस्थ होनेके कारण दृष्टिगोचर न हो तो उसपर ब्रह्मदण्डका प्रयोग करे और यदि शत्रु निकटवर्ती होनेके कारण दृष्टिगोचर हो तो उसपर चतुरङ्गिणी सेना भेजकर आक्रमण करे ॥ २७ ॥ भेदं च प्रथमं युञ्ज्यात् तूष्णीं दण्डं तथैव च । काले प्रयोजयेद् राजा तस्मिंस्तस्मिंस्तदा तदा ॥ २८ ॥ राजा शत्रुके प्रति पहले भेदनीतिका प्रयोग करे। तत्पश्चात् वह उपयुक्त अवसर आनेपर भिन्न-भिन्न शत्रुके प्रति भिन्न-भिन्न समयमें चुपचाप दण्डनीतिका प्रयोग करे ॥ २८ ॥ प्रणिपातं च गच्छेत काले शत्रोर्बलीयसः । युक्तोऽस्य वधमन्विच्छेदप्रमत्तः प्रमाद्यतः ॥ २९ ॥ यदि बलवान् शत्रुसे पाला पड़ जाय और समय उसीके अनुकूल हो तो राजा उसके सामने नतमस्तक हो जाय और जब वह शत्रु असावधान हो, तब स्वयं सावधान और उद्योगशील होकर उसके वधके उपायका अन्वेषण करे ॥ २९ ॥ प्रणिपातेन दानेन वाचा मधुरया ब्रुवन् । अमित्रमपि सेवेत न च जातु विशङ्कयेत् ॥ ३० ॥ राजाको चाहिये कि वह मस्तक झुकाकर, दान देकर तथा मीठे वचन बोलकर शत्रुं का भी मित्रके समान ही सेवन करे। उसके मनमें कभी संदेह न उत्पन्न होने दे ॥ ३० ॥ स्थानानि शङ्कितानां च नित्यमेव विवर्जयेत् । न च तेष्वाश्वसेद् राजा जाग्रतीह निराकृताः ॥ ३१ ॥ जिन शत्रुओंके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया हो, उनके निकटवर्ती स्थानोंमें रहना या आना-जाना सदाके लिये त्याग दे। राजा उनपर कभी विश्वास न करे; क्योंकि इस जगत्में उसके द्वारा तिरस्कृत या क्षतिग्रस्त हुए शत्रुगण सदा बदला लेनेके लिये सजग रहते हैं ॥ ३१ ॥ न ह्यतो दुष्करं कर्म किंचिदस्ति सुरोत्तम । यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप ॥ ३२ ॥ देवेश्वर! सुरश्रेष्ठ! नाना प्रकारके व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर शासन करना जितना कठिन काम है, उससे बढ़कर दुष्कर कर्म दूसरा कोई नहीं है ॥ ३२ ॥ तथा विविधवृत्तानामपि सम्भव उच्यते ।

यतते योगमास्थाय मित्रामित्रं विचारयेत् ॥ ३३ ॥ वैसे भिन्न-भिन्न व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर भी शासन करना तभी सम्भव बताया गया है, जब कि राजा मनोयोगका आश्रय ले सदा इसके लिये प्रयत्नशील रहे और कौन मित्र है तथा कौन शत्रु; इसका विचार करता रहे ॥ ३३ ॥

मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः । मा तीक्ष्णो मा मृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ॥ ३४ ॥ मनुष्य कोमल स्वभाववाले राजाका अपमान करते हैं और अत्यन्त कठोर स्वभाववालेसे भी उद्विग्न हो उठते हैं; अतः तुम न कठोर बनो, न कोमल। समय-समयपर कठोरता भी धारण करो और कोमल भी हो जाओ ॥ ३४ ॥

यथा वप्रे वेगवति सर्वतः सम्प्लुतोदके । नित्यं विवरणाद् बाधस्तथा राज्यं प्रमाद्यतः ॥ ३५ ॥ जैसे जलका प्रवाह बड़े वेगसे बह रहा हो और सब ओर जल-ही-जल फैल रहा हो, उस समय नदीतटके विदीर्ण होकर गिर जानेका सदा ही भय रहता है। उसी प्रकार यदि राजा सावधान न रहे तो उसके राज्यके नष्ट होनेका खतरा बना रहता है ॥ ३५ ॥

न बहूनभियुञ्जीत यौगपद्येन शात्रवान् । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन च पुरंदर ॥ ३६ ॥ एकैकमेषां निष्पिष्य शिष्टेषु निपुणं चरेत् । न तु शक्तोऽपि मेधावी सर्वानैवारभेन्नृपः ॥ ३७ ॥ पुरंदर! बहुत-से शत्रुओंपर एक ही साथ आक्रमण नहीं करना चाहिये। साम, दान, भेद और दण्डके द्वारा इन शत्रुओंमेंसे एक-एकको बारी-बारीसे कुचलकर शेष बचे हुए शत्रुको पीस डालनेके लिये कुशलतापूर्वक प्रयत्न आरम्भ करे। बुद्धिमान् राजा शक्तिशाली होनेपर भी सब शत्रुओंको कुचलनेका कार्य एक ही साथ आरम्भ न करे ॥ ३६-३७ ॥

यदा स्यान्महती सेना हयनागरथाकुला । पदातियन्त्रबहुला अनुरक्ता षडङ्गिनी ॥ ३८ ॥ यदा बहुविधां वृद्धिं मन्येत प्रतिलोमतः । तदा विवृत्य प्रहरेद् दस्यूनामविचारयन् ॥ ३९ ॥ जब हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई और बहुत-से पैदलों तथा यन्त्रोंसे सम्पन्न, छः-* अंगोंवाली विशाल सेना स्वामीके प्रति अनुरक्त हो, जब शत्रुकि अपेक्षा अपनी अनेक प्रकारसे उन्नति होती जान पड़े, उस समय राजा दूसरा कोई विचार मनमें न लाकर प्रकटरूपसे डाकू और लुटेरोंपर प्रहार आरम्भ कर दे ॥ ३८-३९ ॥

न सामदण्डोपनिषत् प्रशस्यते । न मार्दवं शत्रुषु यात्रिकं सदा । न सस्यघातो न च संकरक्रिया

न चापि भूयः प्रकृतेर्विचारणा ॥ ४० ॥ शत्रुके प्रति सामनीतिका प्रयोग अच्छा नहीं माना जाता, बल्कि गुप्तरूपसे दण्डनीतिका प्रयोग ही श्रेष्ठ समझा जाता है। शत्रुओंके प्रति न तो कोमलता और न उनपर आक्रमण करना ही सदा ठीक माना जाता है। उनकी खेतीको चौपट करना तथा वहाँके जल आदिमें विष मिला देना भी अच्छा नहीं है। इसके सिवा, सात प्रकृतियोंपर विचार करना भी उपयोगी नहीं है (उसके लिये तो गुप्त दण्डका प्रयोग ही श्रेष्ठ है) ॥ ४० ॥

मायाविभेदानुपसर्जनानि तथैव पापं न यशःप्रयोगात् । आप्तैर्मनुष्यैरुपचारयेत पुरेषु राष्ट्रेषु च सम्प्रयुक्तान् ॥ ४१ ॥ राजा विश्वस्त मनुष्योंद्वारा शत्रुके नगर और राज्यमें नाना प्रकारके छल और परस्पर वैर-विरोधकी सृष्टि कर दे। इसी तरह छद्मवेषमें वहाँ अपने गुप्तचर नियुक्त कर दे; परंतु अपने यशकी रक्षाके लिये वहाँ अपनी ओरसे चोरी या गुप्त हत्या आदि कोई पापकर्म न होने दे ॥ ४१ ॥

पुरापि चैषामनुसृत्य भूमिपाः पुरेषु भोगानखिलान् जयन्ति । पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि प्रयोजयन्तो बलवृत्रसूदन ॥ ४२ ॥ बल और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्र! पृथ्वीका पालन करनेवाले राजालोग पहले इन शत्रुओंके नगरोंमें विधिपूर्वक व्यवहारमें लायी हुई नीतिका प्रयोग करके दिखावें। इस प्रकार उनके अनुकूल व्यवहार करके वे उनकी राजधानीमें सारे भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥

प्रदाय गूढानि वसूनि राजन् प्रच्छिद्य भोगानवधाय च स्वान् । दुष्टान् स्वदोषैरिति कीर्तयित्वा पुरेषु राष्ट्रेषु च योजयन्ति ॥ ४३ ॥ देवराज! राजा अपने ही आदमियोंके विषयमें यह प्रचार कर देते हैं कि 'ये लोग दोषसे दूषित हो गये हैं; अतः मैंने इन दुष्टोंको राज्यसे बाहर निकाल दिया है। ये दूसरे देशमें चले गये हैं। ऐसा करके उन्हें वह शत्रुओंके राज्यों और नगरोंका भेद लेनेके कार्यमें नियुक्त कर देते हैं। ऊपरसे तो वे उनकी सारी भोग-सामग्री छीन लेते हैं; परंतु गुप्तरूपसे उन्हें प्रचुर धन अर्पित करके उनके साथ कुछ अन्य आत्मीय जनोंको भी लगा देते हैं ॥ ४३ ॥

तथैव चान्यैरपि शास्त्रवेदिभिः स्वलंकृतैः शास्त्रविधानदृष्टिभिः ।

सुशिक्षितैर्भाष्यकथाविशारदैः
परेषु कृत्यामुपधारयेच्च ॥ ४४ ॥
इसी तरह अन्यान्य शास्त्रज्ञ शास्त्रीय विधिके ज्ञाता सुशिक्षित तथा भाष्यकथाविशारद विद्वानोंको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके उनके द्वारा शत्रुओंपर कृत्याका प्रयोग करावे ॥ ४४ ॥

इन्द्र उवाच
कानि लिङ्गानि दुष्टस्य भवन्ति द्विजसत्तम ।
कथं दुष्टं विजानीयामेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ ४५ ॥
इन्द्रने पूछा—‘द्विजश्रेष्ठ! दुष्टके कौन-कौन-से लक्षण हैं? मैं दुष्टको कैसे पहचानूँ? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ॥ ४५ ॥

बृहस्पतिरुवाच
परोक्षमगुणानाह सद्गुणानभ्यसूयते ।
परैर्वा कीर्त्यमानेषु तूष्णीमास्ते पराङ्मुखः ॥ ४६ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**देवराज! जो परोक्षमें किसी व्यक्तिके दोष-ही-दोष बताता है, उसके सद्गुणोंमें भी दोषारोपण करता रहता है और यदि दूसरे लोग उसके गुणोंका वर्णन करते हैं तो जो मुँह फेरकर चुप बैठ जाता है, वही दुष्ट माना जाता है ॥ ४६ ॥
तूष्णीम्भावेऽपि विज्ञेयं न भेदं भवति कारणम् ।
निःश्वासं चोष्ठसंदंशं शिरसश्च प्रकम्पनम् ॥ ४७ ॥
चुप बैठनेपर भी उस व्यक्तिकी दुष्टताको इस प्रकार जाना जा सकता है। निःश्वास छोड़नेका कोई कारण न होनेपर भी जो किसीके गुणोंका वर्णन होते समय लंबी-लंबी साँस छोड़े, ओठ चबाये और सिर हिलाये, वह दुष्ट है ॥ ४७ ॥
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते ।
अदृष्टितो न कुरुते दृष्टो नैवाभिभाषते ॥ ४८ ॥
जो बारंबार आकर संसर्ग स्थापित करता है, दूर जानेपर दोष बताता है, कोई कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके भी आँखसे ओझल होनेपर उस कार्यको नहीं करता है और आँखके सामने होनेपर भी कोई बातचीत नहीं करता, उसके मनमें भी दुष्टता भरी है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४८ ॥
पृथगेत्य समश्नाति नेदमद्य यथाविधि ।
आसने शयने याने भावा लक्ष्या विशेषतः ॥ ४९ ॥
जो कहींसे आकर साथ नहीं, अलग बैठकर खाता है और कहता है, आजका जैसा भोजन चाहिये, वैसा नहीं बना है (वह भी दुष्ट है)। इस प्रकार बैठने, सोने और चलने-फिरने आदिमें दुष्ट व्यक्तिके दुष्टतापूर्ण भाव विशेषरूपसे देखे जाते हैं ॥ ४९ ॥

आर्तिरार्ते प्रिये प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् ।
विपरीतं तु बोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ॥ ५० ॥
यदि मित्रके पीड़ित होनेपर किसीको स्वयं भी पीड़ा होती हो और मित्रके प्रसन्न रहनेपर उसके मनमें भी प्रसन्नता छायी रहती हो तो यही मित्रके लक्षण हैं। इसके विपरीत जो किसीको पीड़ित देखकर प्रसन्न होता और प्रसन्न देखकर पीड़ाका अनुभव करता है तो समझना चाहिये कि यह शत्रुके लक्षण हैं ॥ ५० ॥
एतान्येव यथोक्तानि बुध्येथास्त्रिदशाधिप ।
पुरुषाणां प्रदुष्टानां स्वभावो बलवत्तरः ॥ ५१ ॥
देवेश्वर! इस प्रकार जो मनुष्योंके लक्षण बताये गये हैं, उनको समझना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंका स्वभाव अत्यन्त प्रबल होता है ॥ ५१ ॥
इति दुष्टस्य विज्ञानमुक्तं ते सुरसत्तम ।
निशम्य शास्त्रतत्त्वार्थं यथावदमरेश्वर ॥ ५२ ॥
सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! शास्त्रके सिद्धान्तका यथावत् रूपसे विचार करके ये मैंने तुमसे दुष्ट पुरुषकी पहचान करानेवाले लक्षण बताये हैं ॥ ५२ ॥

भीष्म उवाच

स तद्वचः शत्रुनिबर्हणे रत-
स्तथा चकारावितथं बृहस्पतेः ।
चचार काले विजयाय चारिहा
वशं च शत्रूननयत् पुरंदरः ॥ ५३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! शत्रुओंके संहारमें तत्पर रहनेवाले शत्रुनाशक इन्द्रने बृहस्पतिजीका वह यथार्थ वचन सुनकर वैसा ही किया। उन्होंने उपयुक्त समयपर विजयके लिये यात्रा की और समस्त शत्रुओंको अपने अधीन कर लिया ॥ ५३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥


* हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, कोश और धनी वैश्य—ये सेनाके छः अंग हैं।