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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता

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नवतितमोऽध्यायः

उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता

भीष्म उवाच

यानङ्गिराः क्षत्रधर्मानुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
मान्धात्रे यौवनाश्वाय प्रीतिमानभ्यभाषत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अंगिरापुत्र उतथ्यने युवनाश्वके पुत्र मान्धातासे प्रसन्नतापूर्वक जिन क्षत्रिय-धर्मोंका वर्णन किया था, उन्हें सुनो ॥ १ ॥

स यथानुशशासैनमुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि निखिलेन युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्मज्ञानियोंमें शिरोमणि उतथ्यने जिस प्रकार उन्हें उपदेश दिया था, वह सब प्रसंग पूरा-पूरा तुम्हें बता रहा हूँ, श्रवण करो ॥ २ ॥

उतथ्य उवाच

धर्माय राजा भवति न कामकरणाय तु ।
मान्धातरिति जानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ॥ ३ ॥
**उतथ्य बोले—**मान्धाता! राजा धर्मका पालन और प्रचार करनेके लिये ही होता है, विषय-सुखोंका उपभोग करनेके लिये नहीं। तुम्हें यह जानना चाहिये कि राजा सम्पूर्ण जगत्का रक्षक है ॥ ३ ॥

राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वायैव कल्पते ।
स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥ ४ ॥
यदि राजा धर्माचरण करता है तो देवता बन जाता है, और यदि वह अधर्माचरण करता है तो नरकमें ही गिरता है ॥ ४ ॥

धर्मे तिष्ठन्ति भूतानि धर्मो राजनि तिष्ठति ।
तं राजा साधु यः शास्ति स राजा पृथिवीपतिः ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण प्राणी धर्मके ही आधारपर स्थित हैं और धर्म राजाके ऊपर प्रतिष्ठित है। जो राजा अच्छी तरह धर्मका पालन और उसके अनुकूल शासन करता है वही दीर्घकालतक इस पृथ्वीका स्वामी बना रहता है ॥

राजा परमधर्मात्मा लक्ष्मीवान् धर्म उच्यते ।
देवाश्च गर्हा गच्छन्ति धर्मो नास्तीति चोच्यते ॥ ६ ॥

परम धर्मात्मा और श्रीसम्पन्न राजा धर्मका साक्षात् स्वरूप कहलाता है। यदि वह धर्मका पालन नहीं करता तो लोग देवताओंकी भी निन्दा करते हैं और वह धर्मात्मा नहीं, पापात्मा कहलाता है ॥ ६ ॥

स्वधर्मे वर्तमानानामर्थसिद्धिः प्रदृश्यते । तदेव मङ्गलं लोकः सर्वः समनुवर्तते ॥ ७ ॥ जो अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन्हींसे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती देखी जाती है। सारा संसार उसी मंगलमय धर्मका अनुसरण करता है ॥ ७ ॥

उच्छिद्यते धर्मवृत्तमधर्मो वर्तते महान् । भयमाहुर्दिवारात्रं यदा पापो न वार्यते ॥ ८ ॥ जब पापको रोका नहीं जाता, तब जगत्में धार्मिक बर्तावका उच्छेद हो जाता है और सब ओर महान् अधर्म फैल जाता है, जिससे प्रजाको दिन-रात भय बना रहता है ॥ ८ ॥

ममेदमिति नैवैतत् साधूनां तात धर्मतः । न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते ॥ ९ ॥ तात! यदि पापकी प्रवृत्तिका निवारण न किया जाय तो यह मेरी वस्तु है, ऐसा कहना श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये असम्भव हो जाता है और उस समय कोई भी धार्मिक व्यवस्था टिकने नहीं पाती है ॥ ९ ॥

नैव भार्या न पशवो न क्षेत्रं न निवेशनम् । संदृश्येत मनुष्याणां यदा पापबलं भवेत् ॥ १० ॥ जब जगत्में पापका बल बढ़ जाता है, तब मनुष्योंके लिये अपनी स्त्री, अपने पशु और अपने खेत या घरका भी कुछ ठिकाना दिखायी नहीं देता ॥ १० ॥

देवाः पूजां न जानन्ति न स्वधां पितरस्तदा । न पूज्यन्ते ह्यतिथयो यदा पापो न वार्यते ॥ ११ ॥ जब पापको रोका नहीं जाता, तब देवता पूजाको नहीं जानते हैं, पितरोंको स्वधा (श्राद्ध) का अनुभव नहीं होता है तथा अतिथियोंकी कहीं पूजा नहीं होती है ॥ ११ ॥

न वेदानधिगच्छन्ति व्रतवन्तो द्विजातयः । न यज्ञांस्तन्वते विप्रा यदा पापो न वार्यते ॥ १२ ॥ जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले द्विज वेदोंका अध्ययन छोड़ देते हैं और ब्राह्मण यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं कर पाते हैं ॥ १२ ॥

वृद्धानामिव सत्त्वानां मनो भवति विह्वलम् । मनुष्याणां महाराज यदा पापो न वार्यते ॥ १३ ॥ महाराज! जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब बूढ़े जन्तुओंकी भाँति मनुष्योंका मन घबराहटमें पड़ा रहता है ॥ १३ ॥

उभौ लोकावभिप्रेक्ष्य राजानमृषयः स्वयम् ।

असृजन् सुमहद् भूतमयं धर्मो भविष्यति ॥ १४ ॥
लोक और परलोक दोनोंको दृष्टिमें रखकर महर्षियोंने स्वयं ही राजा नामक एक महान् शक्तिशाली मनुष्यकी सृष्टि की। उन्होंने सोचा था कि 'यह साक्षात् धर्मस्वरूप होगा' ॥ १४ ॥

यस्मिन् धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते ।
यस्मिन् विलीयते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ॥ १५ ॥
अतः जिसमें धर्म विराज रहा हो, उसीको राजा कहते हैं और जिसमें धर्म (वृष) का लय हो गया हो, उसे देवतालोग 'वृषल' मानते हैं ॥ १५ ॥

वृषो हि भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥ १६ ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका। जो धर्मके विषयमें 'अलम्' (बस) कह देता है, उसे देवता 'वृषल' समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥

धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा ।
तस्मिन् ह्रसति ह्रीयन्ते तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ॥ १७ ॥
धर्मकी वृद्धि होनेपर सदा समस्त प्राणियोंका अभ्युदय होता है और उसका ह्रास होनेपर सबका ह्रास हो जाता है; अतः धर्मका कभी लोप नहीं होने देना चाहिये ॥ १७ ॥

धनात् स्रवति धर्मो हि धारणाद् वेति निश्चयः ।
अकार्याणां मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ॥ १८ ॥
नरेन्द्र! धनसे धर्मकी उत्पत्ति होती है। सबको धारण करनेके कारण वह निश्चितरूपसे धर्म कहा गया है। वह धर्म अकर्तव्य (पाप) की सीमाका अन्त करनेवाला माना गया है ॥ १८ ॥

प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयम्भुवा ।
तस्मात् प्रवर्तयेद् धर्मं प्रजानुग्रहकारणात् ॥ १९ ॥
ब्रह्माजीने प्राणियोंके कल्याणार्थ ही धर्मकी सृष्टि की है, इसलिये राजाको चाहिये कि अपने देशमें प्रजा-जनोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका प्रचार करे ॥ १९ ॥

तस्माद्धि राजशार्दूल धर्मः श्रेष्ठतरः स्मृतः ।
स राजा यः प्रजाः शास्ति साधुकृत् पुरुषर्षभ ॥ २० ॥
राजसिंह! इसी कारणसे धर्मको सबसे श्रेष्ठ माना गया है। पुरुषप्रवर! जो सद्धर्मके पालनपूर्वक प्रजाका शासन करता है, वही राजा है ॥ २० ॥

कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय ।
धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥ २१ ॥
भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोधकी अवहेलना करके निरन्तर धर्मका ही पालन करो। धर्म ही राजाओंके लिये सबसे बढ़कर कल्याण करनेवाला है ॥ २१ ॥

धर्मस्य ब्राह्मणो योनिस्तस्मात् तान् पूजयेत् सदा ।
ब्राह्मणानां च मान्धातः कुर्यात् कामानमत्सरी ॥ २२ ॥
मान्धाता! धर्मका मूल है ब्राह्मण; इसलिये ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करना चाहिये, ब्राह्मणोंकी प्रत्येक कामनाको ईर्ष्यारहित होकर पूर्ण करना उचित है ॥ २२ ॥
तेषां ह्यकामकरणाद् राज्ञः संजायते भयम् ।
मित्राणि न च वर्धन्ते तथामित्रीभवन्त्यपि ॥ २३ ॥
उनकी इच्छा पूर्ण न करनेसे राजाओंके ऊपर भय आता है। राजाके मित्रोंकी वृद्धि नहीं होती, उलटे शत्रु बनते जाते हैं ॥ २३ ॥
ब्राह्मणानां सदासूयाद् बाल्याद् वैरोचनो बलिः ।
अथास्माच्छ्रीरपाक्रामद् याऽस्मिन्नासीत् प्रतापिनी ॥ २४ ॥
विरोचनकुमार बलि बाल्यकालसे ही सदा ब्राह्मणोंपर दोषारोपण करते थे; इसलिये उनकी राजलक्ष्मी, जो शत्रुओंको संताप देनेवाली थी, उनके पाससे हट गयी ॥ २४ ॥
ततस्तस्मादपाक्रम्य सागच्छत् पाकशासनम् ।
अथ सोऽन्वतपत् पश्चाच्छ्रियं दृष्ट्वा पुरन्दरे ॥ २५ ॥
बलिसे हटकर वह राजलक्ष्मी देवराज इन्द्रके पास चली गयी। फिर इन्द्रके पास उस लक्ष्मीको देखकर राजा बलिको बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥
एतत् फलमसूयाया अभिमानस्य वा विभो ।
तस्माद् बुध्यस्व मान्धातर्मा त्वां जह्यात् प्रतापिनी ॥ २६ ॥
प्रभो! यह अभिमान और असूयाका फल है, अतः मान्धाता! तुम सचेत हो जाओ, कहीं तुम्हारी भी शत्रुतापिनी लक्ष्मी तुमको छोड़ न दे ॥ २६ ॥
दर्पो नाम श्रियः पुत्रो जज्ञेऽधर्मादिति श्रुतिः ।
तेन देवासुरा राजन् नीताः सुबहवो व्ययम् ॥ २७ ॥
राजर्षयश्च बहवस्तथा बुध्यस्व पार्थिव ।
राजा भवति तं जित्वा दासस्तेन पराजितः ॥ २८ ॥
राजन्! सम्पत्तिका पुत्र है दर्प, जो अधर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ है, यह श्रुतिका कथन है। उस दर्पने बहुतसे देवताओं, असुरों और राजर्षियोंका विनाश कर डाला है। अतः भूपाल! अब भी चेतो। जो दर्पको जीत लेता है, वह राजा होता है और जो उससे पराजित हो जाता है, वह दास बन जाता है ॥ २७-२८ ॥
स यथा दर्पसहितमधर्मं नानुसेवते ।
तथा वर्तस्व मान्धातश्चिरं चेत् स्थातुमिच्छसि ॥ २९ ॥
मान्धाता! यदि तुम चिरकालतक राजसिंहासनपर विराजमान रहना चाहते हो तो ऐसा बर्ताव करो, जिससे तुम्हारे द्वारा दर्प और अधर्मका सेवन न हो ॥ २९ ॥
मत्तात्प्रमत्तात् पौगण्डादुन्मत्ताच्च विशेषतः ।

तदभ्यासादुपावर्त संहितानां च सेवनात् ॥ ३० ॥ मतवाले, प्रमादी, बालक तथा विशेषतः पागलोंसे बचो। उनके निकट-सम्पर्कसे भी दूर रहो और यदि वे एक साथ रहकर सेवा करना चाहें तो उनकी उस सेवासे भी सर्वथा बचे रहो ॥ ३० ॥ निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः । पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ॥ ३१ ॥ एतेभ्यो नित्ययत्तः स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत् । अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥ ३२ ॥ इसी तरह जिसको एक बार कैद किया हो, उस मन्त्रीसे, विशेषतः परायी स्त्रियोंसे, ऊँचे-नीचे और दुर्गम पर्वतसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे राजाको बचकर रहना चाहिये। इनकी ओरसे सदा सावधान रहे और रातमें घूमना-फिरना छोड़ दे। कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोधका भी सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१-३२ ॥ अविज्ञातासु च स्त्रीषु क्लीबासु स्वैरिणीषु च । परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृपः ॥ ३३ ॥ अपरिचित स्त्रियों, बाँझ स्त्रियों, वेश्याओं, परायी स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंके साथ राजा मैथुन न करे ॥ कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् । अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥ ३४ ॥ एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति । तस्माद् राज्ञा विशेषेण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥ ३५ ॥ जब राजा धर्मकी ओरसे प्रमाद करता है, तब वर्णसंकरताके कारण उत्तम कुलोंमें पापी और राक्षस जन्म लेते हैं। नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालकोंकी उत्पत्ति होती है। ये तथा और भी बहुत-सी कुत्सित संतानें जन्म लेती हैं। इसलिये राजाको विशेषरूपसे धर्मपरायण एवं सावधान होकर प्रजाके हितसाधनमें तत्पर रहना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः संजायते महान् । अधर्माः सम्प्रवर्धन्ते प्रजासंकरकारकाः ॥ ३६ ॥ क्षत्रियके प्रमादसे बड़े-बड़े दोष प्रकट होते हैं। वर्णसंकरोंको जन्म देनेवाले पापकर्मोंकी वृद्धि होती है ॥ अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते । अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाप्याविशेत् प्रजाः ॥ ३७ ॥ गर्मीके मौसममें सर्दी और सर्दीके मौसममें गर्मी पड़ने लगती है। कभी सूखा पड़ जाता है, कभी अधिक वर्षा होती है तथा प्रजामें नाना प्रकारके रोग फैल जाते हैं ॥ ३७ ॥

नक्षत्राण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथागते । उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते बहवो राजनाशनाः ॥ ३८ ॥ आकाशमें भयानक ग्रह और धूमकेतु आदि तारे उगते हैं तथा राष्ट्रके विनाशकी सूचना देनेवाले बहुतसे उत्पात दिखायी देने लगते हैं ॥ ३८ ॥ अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति । प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनुविनश्यति ॥ ३९ ॥ जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता, वह प्रजाकी भी रक्षा नहीं कर सकता। पहले उसकी प्रजाएँ क्षीण होती हैं; फिर वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥ द्वावाददाते ह्येकस्य द्वयोः सुबहवोऽपरे । कुमार्यः सम्प्रलुप्यन्ते तदाहुर्नृपदूषणम् ॥ ४० ॥ जब दो मनुष्य मिलकर एककी वस्तु छीन लेते हैं, बहुत-से मिलकर दोको लूटते हैं तथा कुमारी कन्याओंपर बलात्कार होने लगता है, उस समय इन सारे अपराधोंका कारण राजाको ही बताया जाता है ॥ ४० ॥ ममेदमिति नैकस्य मनुष्येष्ववतिष्ठति । त्यक्त्वा धर्मं यदा राजा प्रमादमनुतिष्ठति ॥ ४१ ॥ जब राजा धर्म छोड़कर प्रमादमें पड़ जाता है, तब मनुष्योंमेंसे एक भी अपने धनको ‘यह मेरा है’ ऐसा समझकर स्थिर नहीं रह सकता ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥

उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन

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एकनवतितमोऽध्यायः

उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन

उतथ्य उवाच

कालवर्षी च पर्जन्यो धर्मचारी च पार्थिवः।
सम्पद् यदेषा भवति सा बिभर्ति सुखं प्रजाः ॥ १ ॥
उतथ्य कहते हैं—राजन्! राजा धर्मका आचरण करे और मेघ समयपर वर्षा करता रहे। इस प्रकार जो सम्पत्ति बढ़ती है, वह प्रजावर्गका सुखपूर्वक भरण-पोषण करती है॥ १ ॥

यो न जानाति हर्तुं वा वस्त्राणां रजको मलम्।
रक्तानां वा शोधयितुं यथा नास्ति तथैव सः ॥ २ ॥
यदि धोबी कपड़ोंकी मैल उतारना नहीं जानता अथवा रँगे हुए वस्त्रोंको धोकर शुद्ध एवं उज्ज्वल बनानेकी कला उसे नहीं ज्ञात है तो उसका होना न होना बराबर है॥ २ ॥

एवमेतद् द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां विशां तथा।
शूद्रश्चतुर्थो वर्णानां नानाकर्मस्ववस्थितः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा चौथे शूद्र वर्णके मनुष्य यदि अपने-अपने पृथक्-पृथक् कर्मोंको जानकर उनमें संलग्न नहीं रहते हैं, तो उनका होना न होना एक-सा ही है॥ ३ ॥

कर्म शूद्रे कृषिवैश्ये दण्डनीतिश्च राजनि।
ब्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं चापि द्विजातिषु ॥ ४ ॥
शूद्रमें द्विजोंकी सेवा, वैश्यमें कृषि, राजा या क्षत्रियमें दण्डनीति तथा ब्राह्मणोंमें ब्रह्मचर्य, तपस्या, वेदमन्त्र और सत्यकी प्रधानता है॥ ४ ॥

तेषां यः क्षत्रियो वेद वस्त्राणामिव शोधनम्।
शीलदोषान् विनिर्हर्तुं स पिता स प्रजापतिः ॥ ५ ॥
इनमें जो क्षत्रिय वस्त्रोंकी मैल दूर करनेवाले धोबीके समान चरित्रदोषको दूर करना जानता है, वही प्रजावर्गका पिता और वही प्रजाका अधिपति है॥ ५ ॥

कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्च भरतर्षभ।
राजवृत्तानि सर्वाणि राजैव युगमुच्यते ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये सब-के-सब राजाके आचरणोंमें स्थित हैं। राजा ही युगोंका प्रवर्तक होनेके कारण युग कहलाता है॥ ६ ॥

चातुर्वर्ण्यं तथा वेदाश्चातुराश्रम्यमेव च । सर्वं प्रमुह्यते ह्येतद् यदा राजा प्रमाद्यति ॥ ७ ॥ जब राजा प्रमाद करता है, तब चारों वर्ण, चारों वेद और चारों आश्रम सभी मोहमें पड़ जाते हैं ॥ ७ ॥

अग्नित्रेता त्रयी विद्या यज्ञाश्च सहदक्षिणाः । सर्व एव प्रमाद्यन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥ ८ ॥ जब राजा प्रमादी हो जाता है, तब गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि—ये तीन अग्नि; ऋक्, साम और यजु—ये तीन वेद एवं दक्षिणाओंके साथ सम्पूर्ण यज्ञ भी विकृत हो जाते हैं ॥ ८ ॥

राजैव कर्ता भूतानां राजैव च विनाशकः । धर्मात्मा यः स कर्तास्यादधर्मात्मा विनाशकः ॥ ९ ॥ राजा ही प्राणियोंका कर्ता (जीवनदाता) और राजा ही उनका विनाश करनेवाला है। जो धर्मात्मा है, वह प्रजाका जीवनदाता है और जो पापात्मा है, वह उसका विनाश करनेवाला है ॥ ९ ॥

राज्ञो भार्याश्च पुत्राश्च बान्धवाः सुहृदस्तथा । समेत्य सर्वे शोचन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥ १० ॥ जब राजा प्रमाद करने लगता है, तब उसकी स्त्री, पुत्र, बान्धव तथा सुहृद् सब मिलकर शोक करते हैं ॥

हस्तिनोऽश्वाश्च गावश्चाप्युष्ट्राश्वतरगर्दभाः । अधर्मभूते नृपतौ सर्वे सीदन्ति जन्तवः ॥ ११ ॥ राजाके पापपरायण हो जानेपर उसके हाथी, घोड़े, गौ, ऊँट, खच्चर और गदहे आदि सभी पशु दुःख पाते हैं ॥ ११ ॥

दुर्बलार्थं बलं सृष्टं धात्रा मान्धातुरुच्यते । अबलं तु महद्भूतं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १२ ॥ मान्धाता! कहते हैं कि विधाताने दुर्बल प्राणियोंकी रक्षाके लिये ही बलसम्पन्न राजाकी सृष्टि की है। निर्बल प्राणियोंका महान् समुदाय राजाके बलपर टिका हुआ है ॥ १२ ॥

यच्च भूतं सम्भजते ये च भूतास्तदन्वयाः । अधर्मस्थे हि नृपतौ सर्वे शोचन्ति पार्थिव ॥ १३ ॥ भूपाल! राजा जिन प्राणियोंको अन्न आदि देकर उनकी सेवा करता है और जो प्राणी राजासे सम्बन्ध रखते हैं, वे सब-के-सब उस राजाके अधर्मपरायण होनेपर शोक प्रकट करने लगते हैं ॥ १३ ॥

दुर्बलस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च । अविषह्यतमं मन्ये मा स्म दुर्बलमासदः ॥ १४ ॥

दुर्बल मनुष्य, मुनि और विषधर सर्प—इन सबकी दृष्टिको मैं अत्यन्त दुःसह मानता हूँ; इसलिये तुम किसी दुर्बल प्राणीको न सताना ॥ १४ ॥ दुर्बलांस्तात बुध्येथा नित्यमेवाविमानितान् । मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि प्रदहेयुः सबान्धवम् ॥ १५ ॥ तात! तुम दुर्बल प्राणियोंको सदा ही अपमानका पात्र न समझना, दुर्बलोंकी आँखें तुम्हें बन्धु-बान्धवों-सहित जलाकर भस्म न कर डालें, इसके लिये सदा सावधान रहना ॥ १५ ॥ न हि दुर्बलदग्धस्य कुले किंचित् प्ररोहति । आमूलं निर्दहन्त्येव मा स्म दुर्बलमासदः ॥ १६ ॥ दुर्बल मनुष्य जिसको अपनी क्रोधाग्निसे जला डालते हैं, उसके कुलमें फिर कोई अंकुर नहीं जमता। वे जड़मूलसहित दग्ध कर देते हैं; अतः तुम दुर्बलोंको कभी न सताना ॥ १६ ॥ अबलं वै बलाच्छ्रेयो यच्चातिबलवद्वलम् । बलस्याबलदग्धस्य न किंचिदवशिष्यते ॥ १७ ॥ निर्बल प्राणी बलवान्‌से श्रेष्ठ है, क्योंकि जो अत्यन्त बलवान् है, उसके बलसे भी निर्बलका बल अधिक है। निर्बलके द्वारा दग्ध किये गये बलवान्‌का कुछ भी शेष नहीं रह जाता ॥ १७ ॥ विमानितो हतः क्रुष्टस्त्रातारं चेन्न विन्दति । अमानुषकृतस्तत्र दण्डो हन्ति नराधिपम् ॥ १८ ॥ यदि अपमानित, हताहत तथा गाली-गलौजसे तिरस्कृत होनेवाला दुर्बल मनुष्य राजाको अपने रक्षकके रूपमें नहीं उपलब्ध कर पाता तो वहाँ दैवका दिया हुआ दण्ड राजाको मार डालता है ॥ १८ ॥ मा स्म तात रणे स्थित्वा भुञ्जीथा दुर्बलं जनम् । मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि दहन्त्वग्निरिवाश्रयम् ॥ १९ ॥ तात! तुम युद्धमें संलग्न होकर दुर्बल मनुष्यको कर लेनेके द्वारा अपने उपभोगका विषय न बनाना। जैसे आग अपने आश्रयभूत काष्ठको जला देती है, उसी प्रकार दुर्बलोंकी दृष्टि तुम्हें दग्ध न कर डाले ॥ १९ ॥ यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदताम् । तानि पुत्रान् पशून् घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसनात् ॥ २० ॥ झूठे अपराध लगाये जानेपर रोते हुए दीन-दुर्बल मनुष्योंके नेत्रोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे मिथ्या कलंक लगानेके कारण उन अपराधियोंके पुत्रों और पशुओंका नाश कर डालते हैं ॥ २० ॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पौत्रेषु नप्तृषु । न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिव ॥ २१ ॥

यदि पापका फल अपनेको नहीं मिला तो वह पुत्रों तथा नाती-पोतोंको अवश्य मिलता है। जैसे पृथ्वीमें बोया हुआ बीज तुरंत फल नहीं देता, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी तत्काल फल नहीं देता (समय आनेपर ही उसका फल मिलता है) ॥ २१ ॥ यत्राबलो वध्यमानस्त्रातारं नाधिगच्छति । महान् दैवकृतस्तत्र दण्डः पतति दारुणः ॥ २२ ॥ सताया जानेवाला दुर्बल मनुष्य जहाँ अपने लिये कोई रक्षक नहीं पाता है, वहाँ सतानेवाले पापीको दैवकी ओरसे भयंकर दण्ड प्राप्त होता है ॥ २२ ॥ युक्ता यदा जानपदा भिक्षन्ते ब्राह्मणा इव । अभीक्ष्णं भिक्षुरूपेण राजानं घ्नन्ति तादृशाः ॥ २३ ॥ जब बाहर गावोंके लोग एक समूह बनाकर भिक्षुकरूपसे ब्राह्मणोंके समान भिक्षा माँगने लगते हैं, तब वैसे लोग एक दिन राजाका विनाश कर डालते हैं ॥ २३ ॥ राज्ञो यदा जनपदे बहवो राजपूरुषाः । अनयेनोपवर्तन्ते तद् राज्ञः किल्बिषं महत् ॥ २४ ॥ जब राजाके बहुत-से कर्मचारी देशमें अन्यायपूर्ण बर्ताव करने लगते हैं, तब वह महान् पाप राजाको ही लगता है ॥ २४ ॥ यदा युक्त्या नयेदर्थान् कामादर्थवशेन वा । कृपणं याचमानानां तद् राज्ञो वैशसं महत् ॥ २५ ॥ यदि कोई राजा या राजकीय कर्मचारी दीनतापूर्ण याचना करती हुई प्रजाओंकी उस प्रार्थनाको ठुकराकर स्वेच्छासे अथवा धनके लोभवश कोई-न-कोई युक्ति करके उनके धनका अपहरण कर ले तो वह राजाके महान् विनाशका सूचक है ॥ २५ ॥ महान् वृक्षो जायते वर्धते च तं चैव भूतानि समाश्रयन्ति । यदा वृक्षश्छिद्यते दह्यते च तदाश्रया अनिकेता भवन्ति ॥ २६ ॥ जब कोई महान् वृक्ष पैदा होता और क्रमशः बढ़ता है, तब बहुत-से प्राणी (पक्षी) आकर उसपर बसेरे लेते हैं और जब उस वृक्षको काटा या जला दिया जाता है, तब उसपर रहनेवाले सभी जीव निराश्रय हो जाते हैं ॥ २६ ॥ यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति संस्कारं वा राजगुणं ब्रुवाणाः । तैरेवाधर्मश्चरितो धर्ममोहात् तूर्णं जह्यात् सुकृतं दुष्कृतं च ॥ २७ ॥ जब राज्यमें रहनेवाले लोग राजाके गुणोंका बखान करते हुए वैदिक संस्कारोंके साथ उत्तम धर्मका आचरण करते हैं, उस समय राजा पापमुक्त हो जाता है तथा जब वे ही लोग

धर्मके विषयमें मोहित हो जानेके कारण अधर्माचरण करने लगते हैं, उस समय राजा शीघ्र ही पुण्यसे हीन हो जाता है ।। २७ ।। यत्र पापा ज्ञायमानाश्चरन्ति सतां कलिर्विन्दते तत्र राज्ञः । यदा राजा शास्ति नरानशिष्टां- स्तदा राज्यं वर्धते भूमिपस्य ।। २८ ।। जहाँ पापी मनुष्य प्रकटरूपसे निर्भय विचरते हैं, वहाँ सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें समझा जाता है कि राजाको कलियुगने घेर लिया है; किंतु जब राजा दुष्ट मनुष्योंको दण्ड देता है, तब उसका राज्य सब ओरसे उन्नत होने लगता है ।। २८ ।। यश्चामात्यान् मानयित्वा यथार्थं मन्त्रे च युद्धे च नृपो नियुञ्ज्यात् । विवर्धते तस्य राष्ट्रं नृपस्य भुङ्क्ते महीं चाप्यखिलां चिराय ।। २९ ।। जो राजा अपने मन्त्रियोंका यथार्थरूपसे सम्मान करके उन्हें मन्त्रणा अथवा युद्धके काममें नियुक्त करता है, उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता है और वह चिरकालतक समूची पृथ्वीका राज्य भोगता है ।। २९ ।। यच्चापि सुकृतं कर्म वाचं चैव सुभाषिताम् । समीक्ष्य पूजयन् राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।। ३० ।। जो राजा अपने कर्मचारी अथवा प्रजाका पुण्यकर्म देखकर तथा उनकी सुन्दर वाणी सुनकर उन सबका यथायोग्य सम्मान करता है, वह परम उत्तम धर्मको प्राप्त कर लेता है ।। ३० ।। संविभज्य यदा भुङ्क्ते नामात्यानवमन्यते । निहन्ति बलिनं दृप्तं स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३१ ।। राजा जब उसको यथायोग्य विभाग देकर स्वयं उपभोग करता है, मन्त्रियोंका अनादर नहीं करता है और बलके घमंडमें चूर रहनेवाले दुष्ट पुरुष या शत्रुको मार डालता है, तब उसका यह सब कार्य राजधर्म कहलाता है ।। ३१ ।। त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा । पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३२ ।। जब वह मन, वाणी और शरीरके द्वारा सबकी रक्षा करता है और पुत्रके भी अपराधको क्षमा नहीं करता, तब उसका वह बर्ताव भी 'राजाका धर्म' कहा जाता है ।। ३२ ।। संविभज्य यदा भुङ्क्ते नृपतिर्दुर्बलान् नरान् । तदा भवन्ति बलिनः स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३३ ।।

जब राजा दुर्बल मनुष्योंको यथावश्यक वस्तुएँ देकर पीछे स्वयं भोजन करता है, तब वे दुर्बल मनुष्य बलवान् हो जाते हैं। वह त्याग राजाका धर्म कहा गया है ।। ३३ ।।

यदा रक्षति राष्ट्राणि यदा दस्यूनपोहति । यदा जयति संग्रामे स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३४ ।। जब राजा समूचे राष्ट्रकी रक्षा करता है, डाकू और लुटेरोंको मार भगाता है तथा संग्राममें विजयी होता है, तब वह सब राजाका धर्म कहा जाता है ।। ३४ ।।

पापमाचरतो यत्र कर्मणा व्याहृतेन वा । प्रियस्यापि न मृष्येत स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३५ ।। प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति भी यदि क्रिया अथवा वाणीद्वारा पाप करे तो राजाको चाहिये कि उसे भी क्षमा न करे अर्थात् उसे भी यथायोग्य दण्ड दे। जो ऐसा बर्ताव है, वह राजाका धर्म कहलाता है ।। ३५ ।।

यदा शारणिकान् राजा पुत्रवत् परिरक्षति । भिनत्ति च न मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३६ ।। जब राजा व्यापारियोंकी पुत्रके समान रक्षा करता है और धर्मकी मर्यादाको भंग नहीं करता, तब वह भी राजाका धर्म कहलाता है ।। ३६ ।।

यदाऽऽप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयान्वितः । कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३७ ।। जब वह राग और द्वेषका अनादर करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा श्रद्धापूर्वक यजन करता है, तब वह राजाका धर्म कहा जाता है ।। ३७ ।।

कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु परिमार्जति । हर्षं संजनयन् नृणां स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३८ ।। जब वह दीन, अनाथ और वृद्धोंके आँसू पोंछता है और इस बर्तावद्वारा सब लोगोंके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करता है, तब उसका वह सद्भाव राजाका धर्म कहलाता है ।। ३८ ।।

विवर्धयति मित्राणि तथारींश्चापि कर्षति । सम्पूजयति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३९ ।। वह जो मित्रोंकी वृद्धि, शत्रुओंका नाश और साधु पुरुषोंका समादर करता है, उसे राजाका धर्म कहते हैं ।। ३९ ।।

सत्यं पालयति प्रीत्या नित्यं भूमिं प्रयच्छति । पूजयेदतिथीन् भृत्यान् स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ४० ।। राजा जो प्रेमपूर्वक सत्यका पालन करता है, प्रतिदिन भूदान देता है और अतिथियों तथा भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंका सत्कार करता है, वह राजाका धर्म कहलाता है ।। ४० ।।

निग्रहानुग्रहौ चोभौ यत्र स्यातां प्रतिष्ठितौ ।

अस्मिन् लोके परे चैव राजा स प्राप्नुते फलम् ॥ ४१ ॥
जिसमें निग्रह¹ और अनुग्रह² दोनों प्रतिष्ठित हों, वह राजा इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल पाता है ॥ ४१ ॥

यमो राजा धार्मिकाणां मान्धातः परमेश्वरः ।
संयच्छन् भवति प्राणानसंयच्छंस्तु पातकः ॥ ४२ ॥
मान्धाता! राजा दुष्टोंको दण्ड देनेके कारण यम तथा धार्मिकोंपर अनुग्रह करनेके कारण उनके लिये परमेश्वरके समान है। जब वह अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखता है, तब शासनमें समर्थ होता है और जब संयममें नहीं रखता, तब मर्यादासे नीचे गिर जाता है ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृत्यानवमन्य च ।
यदा सम्यक् प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ४३ ॥
जब राजा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यका बिना अवहेलनाके सत्कार करके उनको उचित बर्तावके साथ अपनाता है, तब वह राजाका धर्म कहलाता है ॥ ४३ ॥

यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः ।
तथा राज्ञानुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत् प्रजाः ॥ ४४ ॥
जैसे यमराज सभी प्राणियोंपर समानरूपसे शासन करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी बिना किसी भेदभावके समस्त प्रजाओंपर विधिपूर्वक नियन्त्रण रखना चाहिये ॥ ४४ ॥

सहस्राक्षेण राजा हि सर्वथैवोपमीयते ।
स पश्यति च यं धर्मं स धर्मः पुरुषर्षभ ॥ ४५ ॥
पुरुषप्रवर! राजाकी उपमा सब प्रकारसे हजार नेत्रोंवाले इन्द्रसे दी जाती है; अतः राजा जिस धर्मको भलीभाँति समझकर निश्चित कर देता है वही श्रेष्ठ धर्म माना गया है ॥ ४५ ॥

अप्रमादेन शिक्षेथाः क्षमां बुद्धिं धृतिं मतिम् ।
भूतानां चैव जिज्ञासा साध्वसाधु च सर्वदा ॥ ४६ ॥
राजन्! तुम सावधान होकर क्षमा, विवेक, धृति और बुद्धिकी शिक्षा ग्रहण करो। समस्त प्राणियोंकी शक्ति तथा भलाई-बुराईको भी सदा जाननेकी इच्छा करो ॥

संग्रहः सर्वभूतानां दानं च मधुरं वचः ।
पौरजानपदांश्चैव गोप्तव्यास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥
समस्त प्राणियोंको अपने अनुकूल बनाये रखना, दान देना और मीठे वचन बोलना सीखो। नगर और बाहर गाँववाले लोगोंकी तुम्हें इस प्रकार रक्षा करनी चाहिये, जिससे उन्हें सुख मिले ॥ ४७ ॥

न जात्वदक्षो नृपतिः प्रजाः शक्नोति रक्षितुम् ।
भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुष्करम् ॥ ४८ ॥
तात! जो दक्ष नहीं है, वह राजा कभी प्रजाकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि यह राज्यका संचालनरूप अत्यंत दुष्कर कार्य बहुत बड़ा भार है ॥ ४८ ॥

तद्दण्डविन्नृपः प्राज्ञः शूरः शक्नोति रक्षितुम् । न हि शक्यमदण्डेन क्लीबेनाबुद्धिनापि वा ॥ ४९ ॥ राज्यकी रक्षा तो वही राजा कर सकता है, जो बुद्धिमान् और शूरवीर होनेके साथ ही दण्ड देनेकी नीतिको भी जानता हो। जो दण्ड देनेसे हिचकता हो, वह नपुंसक और बुद्धिहीन नरेश कदापि राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता ॥ ४९ ॥

अभिरूपैः कुले जातैर्दक्षैर्भक्तैर्बहुश्रुतैः । सर्वा बुद्धीः परीक्षेतस्तापसाश्रमिणामपि ॥ ५० ॥ तुम्हें रूपवान्, कुलीन, कार्यदक्ष, राजभक्त एवं बहुज्ञ मन्त्रियोंके साथ रहकर तापसों और आश्रम-वासियोंकी भी सम्पूर्ण बुद्धियों (सारे विचारों) की परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५० ॥

अतस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै परम् । स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनङ्क्ष्यति ॥ ५१ ॥ ऐसा करनेसे तुमको सम्पूर्ण भूतोंके परम धर्मका ज्ञान हो जायगा; फिर स्वदेशमें रहो या परदेशमें, कहीं भी तुम्हारा धर्म नष्ट नहीं होगा ॥ ५१ ॥

तस्मादर्थाच्च कामाच्च धर्म एवोत्तरो भवेत् । अस्मिँल्लोके परे चैव धर्मात्मा सुखमेधते ॥ ५२ ॥ इस तरह विचार करनेसे अर्थ और कामकी अपेक्षा धर्म ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। धर्मात्मा पुरुष इहलोकमें और परलोकमें भी सुख भोगता है ॥ ५२ ॥

त्यजन्ति दारान् पुत्रांश्च मनुष्याः परिपूजिताः । संग्रहश्चैव भूतानां दानं च मधुरा च वाक् ॥ ५३ ॥ अप्रमादश्च शौचं च राज्ञो भूतिकरं महत् । एतेभ्यश्चैव मान्धातः सततं मा प्रमादिथाः ॥ ५४ ॥ यदि मनुष्योंका सम्मान किया जाय तो वे सम्मान-दाताके हितके लिये अपने पुत्रों और स्त्रियोंको भी छोड़ देते हैं। समस्त प्राणियोंको अपने पक्षमें मिलाये रखना, दान देना, मीठे वचन बोलना, प्रमादका त्याग करना तथा बाहर और भीतरसे पवित्र रहना—ये राजाका ऐश्वर्य बढ़ानेवाले बहुत बड़े साधन हैं। मान्धाता! तुम इन सब बातोंकी ओरसे कभी प्रमाद न करना ॥

अप्रमत्तो भवेद् राजा छिद्रदर्शी परात्मनोः । नास्यच्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमान्वियात् ॥ ५५ ॥ राजाको सदा सावधान रहना चाहिये। वह शत्रु का तथा अपना भी छिद्र देखे और यह प्रयत्न करे कि शत्रु मेरा छिद्र अच्छी तरह न देखने पाये; परंतु यदि शत्रुके छिद्रों (दुर्बलताओं) का पता लग जाय तो वह उसपर चढ़ाई कर दे ॥ ५५ ॥

एतद् वृत्तं वासवस्य यमस्य वरुणस्य च ।

राजर्षीणां च सर्वेषां तत् त्वमप्यनुपालय ।। ५६ ।।
इन्द्र, यम, वरुण तथा सम्पूर्ण राजर्षियोंका यही बर्ताव है, तुम भी इसका निरन्तर पालन करो ।। ५६ ।।
तत् कुरुष्व महाराज वृत्तं राजर्षिसेवितम् ।
आतिष्ठ दिव्यं पन्थानमह्नाय पुरुषर्षभ ।। ५७ ।।
पुरुषप्रवर महाराज! राजर्षियोंद्वारा सेवित उस आचारका तुम पालन करो और शीघ्र ही प्रकाशयुक्त दिव्य मार्गका आश्रय लो ।। ५७ ।।
धर्मवृत्तं हि राजानं प्रेत्य चेह च भारत ।
देवर्षिपितृगन्धर्वाः कीर्तयन्ति महौजसः ।। ५८ ।।
भारत!* महातेजस्वी देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व इहलोक और परलोकमें भी धर्मपरायण राजाके यशका गान करते रहते हैं ।। ५८ ।।

भीष्म उवाच

स एवमुक्तो मान्धाता तेनोतथ्येन भारत ।
कृतवानविशङ्कश्च एकः प्राप च मेदिनीम् ।। ५९ ।।
भीष्मजी कहते हैं—भरतनन्दन! उतथ्यके इस प्रकार उपदेश देनेपर मान्धाताने निःशंक होकर उनकी आज्ञाका पालन किया और सारी पृथ्वीका एकछत्र राज्य पा लिया ।। ५९ ।।
भवानपि तथा सम्यङ्मान्धातेव महीपते ।
धर्मं कृत्वा महीं रक्ष स्वर्गे स्थानमवाप्स्यसि ।। ६० ।।
पृथ्वीनाथ! मान्धाताकी ही भाँति तुम भी अच्छी तरह धर्मका पालन करते हुए इस पृथ्वीकी रक्षा करो; फिर तुम भी स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लोगे ।। ६० ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु
एकनवतितमोऽध्यायः ।। ९१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९१ ।।


१. दुष्टोंको दण्ड देनेका स्वभाव।
२. दीन-दुखियों तथा साधु पुरुषोंके प्रति दया एवं सहानुभूति।
* उतथ्यने राजा मान्धाताको उपदेश दिया है और मान्धाता सूर्यवंशी नरेश थे, इसलिये उनके उद्देश्यसे 'भारत' सम्बोधन पद यद्यपि उचित नहीं है तथापि यह प्रसंग भीष्मजी युधिष्ठिरको सुनाते हैं; अतः यह समझना चाहिये कि युधिष्ठिरके उद्देश्यसे उन्होंने यहाँ 'भारत' विशेषणका प्रयोग किया है।

राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश

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द्विनवतितमोऽध्यायः

राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् राजा वर्तेत धार्मिकः ।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुश्रेष्ठ पितामह! धर्मात्मा राजा यदि धर्ममें स्थित रहना चाहे तो उसे किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये? यह मैं आपसे पूछता हूँ; आप मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें लोग तत्त्वज्ञानी महात्मा वामदेवजीद्वारा दिये हुए उपदेशरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

राजा वसुमना नाम ज्ञानवान् धृतिमान् शुचिः ।
महर्षिं परिपप्रच्छ वामदेवं तपस्विनम् ॥ ३ ॥
वसुमना नामक एक प्रसिद्ध राजा हो गये हैं, जो ज्ञानवान्, धैर्यवान् और पवित्र आचार-विचारवाले थे। उन्होंने एक दिन तपस्वी महर्षि वामदेवजीसे पूछा— ॥

धर्मार्थसहितैर्वाक्यैर्भगवन्ननुशाधि माम् ।
येन वृत्तेन वै तिष्ठन् न हीयेयं स्वधर्मतः ॥ ४ ॥
‘भगवन्! मैं किस बर्तावका पालन करता रहूँ, जिससे अपने धर्मसे कभी न गिरूँ। आप अपने अर्थ और धर्मयुक्त वचनोंद्वारा मुझे इसी बातका उपदेश दीजिये’ ॥ ४ ॥

तमब्रवीद् वामदेवस्तेजस्वी तपतां वरः ।
हेमवर्णं सुखासीनं ययातिमिव नाहुषम् ॥ ५ ॥
तब तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी महर्षि वामदेवने नहुषपुत्र ययातिके समान सुखपूर्वक बैठे हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले राजा वसुमनासे कहा ॥ ५ ॥

वामदेव उवाच

धर्ममेवानुवर्तस्व न धर्माद् विद्यते परम् ।
धर्मे स्थिता हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिमाम् ॥ ६ ॥
वामदेवजी बोले— राजन्! तुम धर्मका ही अनुसरण करो। धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि धर्ममें स्थित रहनेवाले राजा इस सारी पृथ्‍वीको जीत लेते हैं ॥ ६ ॥

अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः । वृद्ध्यां च कुरुते बुद्धिं स धर्मेण विराजते ॥ ७ ॥ जो भूपाल धर्मको अर्थ-सिद्धिकी अपेक्षा भी बड़ा मानता है और उसीको बढ़ानेमें अपने मन और बुद्धिका उपयोग करता है, वह धर्मके कारण बड़ी शोभा पाता है ॥ ७ ॥

अधर्मदर्शी यो राजा बलादेव प्रवर्तते । क्षिप्रमेवापयातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ ॥ ८ ॥ इसके विपरीत जो राजा अधर्मपर ही दृष्टि रखकर बलपूर्वक उसमें प्रवृत्त होता है, उसे धर्म और अर्थ दोनों पुरुषार्थ शीघ्र छोड़कर चल देते हैं ॥ ८ ॥

असत्पापिष्ठसचिवो वध्यो लोकस्य धर्महा । सहैव परिवारेण क्षिप्रमेवावसीदति ॥ ९ ॥ जो दुष्ट एवं पापिष्ठ मन्त्रियोंकी सहायतासे धर्मको हानि पहुँचाता है, वह सब लोगोंका वध्य हो जाता है और अपने परिवारके साथ ही शीघ्र संकटमें पड़ जाता है ॥

अर्थानामननुष्ठाता कामचारी विकत्थनः । अपि सर्वां महीं लब्ध्वा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १० ॥ जो राजा अर्थ-सिद्धिकी चेष्टा नहीं करता और स्वेच्छाचारी हो बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, वह सारी पृथ्वीका राज्य पाकर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥

अथाददानः कल्याणमनसूयुर्जितेन्द्रियः । वर्धते मतिमान् राजा स्रोतोभिरिव सागरः ॥ ११ ॥ परंतु जो कल्याणकारी गुणोंको ग्रहण करनेवाला, अनिन्दक, जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् होता है, वह राजा उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त होता है, जैसे नदियोंके प्रवाहसे समुद्र ॥ ११ ॥

न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः । बुद्धितो मित्रतश्चापि सततं वसुधाधिपः ॥ १२ ॥ राजाको चाहिये कि वह सदा धर्म, अर्थ, काम, बुद्धि और मित्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी कभी अपनेको पूर्ण न माने—सदा उन सबके संग्रहको बढ़ानेकी ही चेष्टा करे ॥ १२ ॥

एतेष्वेव हि सर्वेषु लोकयात्रा प्रतिष्ठिता । एतानि शृण्वँल्लभते यशः कीर्तिं श्रियं प्रजाः ॥ १३ ॥ राजाकी जीवनयात्रा इन्हीं सबोंपर अवलम्बित है। इन सबको सुनने और ग्रहण करनेसे राजाको यश, कीर्ति, लक्ष्मी और प्रजाकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तकः । अर्थान् समीक्ष्य भजते स ध्रुवं महदश्नुते ॥ १४ ॥ जो इस प्रकार धर्मके प्रति आग्रह रखनेवाला एवं धर्म और अर्थका चिन्तन करनेवाला है तथा अर्थपर भलीभाँति विचार करके उसका सेवन करता है, वह निश्चय ही महान्

फलका भागी होता है ॥ १४ ॥
अदाता ह्यनतिस्नेहो दण्डेनावर्तयन् प्रजाः ।
साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १५ ॥
जो दुःसाहसी, दान न देनेवाला और स्नेहशून्य तथा दण्डके द्वारा प्रजाको बार-बार सताता है, वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥
अथ पापकृतं बुद्ध्या न च पश्यत्यबुद्धिमान् ।
अकीर्त्याभिसमायुक्तो भूयो नरकमश्रुते ॥ १६ ॥
जो बुद्धिहीन राजा पाप करके भी अपनी बुद्धिके द्वारा अपनेको पापी नहीं समझता, वह इस लोकमें अपकीर्तिसे कलंकित हो परलोकमें नरकका भागी होता है ॥ १६ ॥
अथ मानयितुर्दान्मः श्लक्ष्णस्य वशवर्तिनः ।
व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवाः ॥ १७ ॥
जो सबका मान करनेवाला, दानी, स्नेहयुक्त तथा दूसरोंके वशवर्ती होकर रहता है, उसपर यदि कोई संकट आ जाय तो सब लोग उसे अपना ही संकट मानकर उसको मिटानेकी चेष्टा करते हैं ॥ १७ ॥
यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्यानपि पृच्छति ।
सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं सुखमश्रुते ॥ १८ ॥
जिसको धर्मके विषयमें शिक्षा देनेवाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरोंसे भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जानेपर सुखभोगमें आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकालतक सुख नहीं भोग पाता है ॥ १८ ॥
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।
धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्रुते ॥ १९ ॥
जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ-सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु
द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवजीकी गीताविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥

वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन

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त्रिनवतितमोऽध्यायः

वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन

वामदेव उवाच

यत्राधर्मं प्रणयते दुर्बले बलवत्तरः ।
तां वृत्तिमुपजीवन्ति ये भवन्ति तदन्वयाः ॥ १ ॥
**वामदेवजी कहते हैं—**राजन्! जिस राज्यमें अत्यन्त बलवान् राजा दुर्बल प्रजापर अधर्म या अत्याचार करने लगता है, वहाँ उसके अनुचर भी उसी बर्तावको अपनी जीविकाका साधन बना लेते हैं ॥ १ ॥

राजानमनुवर्तन्ते तं पापाभिप्रवर्तकम् ।
अविनीतमनुष्यं तत् क्षिप्रं राष्ट्रं विनश्यति ॥ २ ॥
वे उस पापप्रवर्तक राजाका ही अनुसरण करते हैं; अतः उद्दण्ड मनुष्योंसे भरा हुआ वह राष्ट्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥

यद् वृत्तमुपजीवन्ति प्रकृतिस्थस्य मानवाः ।
तदेव विषमस्थस्य स्वजनोऽपि न मृष्यते ॥ ३ ॥
अच्छी अवस्थामें रहनेपर मनुष्यके जिस बर्तावका दूसरे लोग भी आश्रय लेते हैं, संकटमें पड़ जानेपर उसी मनुष्यके उसी बर्तावको उसके स्वजन भी नहीं सहन करते हैं ॥ ३ ॥

साहसप्रकृतिर्यत्र किंचिदुल्बणमाचरेत् ।
अशास्त्रलक्षणो राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ४ ॥
दुःसाहसी प्रकृतिवाला जो राजा जहाँ कुछ उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करता है, वहाँ शास्त्रोक्त मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥

योऽत्यन्ताचरितां वृत्तिं क्षत्रियो नानुवर्तते ।
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ५ ॥
जो क्षत्रिय राज्यमें रहनेवाले विजित या अविजित मनुष्योंकी अत्यन्त आचरणमें लायी हुई वृत्तिका अनुवर्तन नहीं करता (अर्थात् उन लोगोंको अपने परम्परागत आचार-विचारका पालन नहीं करने देता) वह क्षत्रिय-धर्मसे गिर जाता है ॥ ५ ॥

द्विषन्तं कृतकल्याणं गृहीत्वा नृपतिं रणे ।
यो न मानयते द्वेषात् क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ६ ॥
यदि कोई राजा पहलेका उपकारी हो और किसी कारणवश वर्तमानकालमें द्वेष करने लगा हो तो उस समय जो भूपाल उसे युद्धमें बंदी बनाकर द्वेषवश उसका सम्मान नहीं करता, वह भी क्षत्रियधर्मसे गिर जाता है ॥

शक्तः स्यात् सुसुखो राजा कुर्यात् करणमापदि ।

प्रियो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥

राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुखका अनुभव करे और करावे तथा आपत्तिमें पड़

जाय तो उसके निवारणका प्रयत्न करे। ऐसा करनेसे वह सब प्राणियोंका प्रिय होता है और

कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ।।

अप्रियं यस्य कुर्वीत भूयस्तस्य प्रियं चरेत् ।

नचिरेण प्रियः स स्याद् योऽप्रियः प्रियमाचरेत् ॥ ८ ॥

राजाको चाहिये कि यदि किसीका अप्रिय किया हो तो फिर उसका प्रिय भी करे। इस

प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है तो थोड़े ही समयमें वह प्रिय हो जाता

है ।। ८ ।।

मृषावादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।

न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥ ९ ॥

मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरोंका प्रिय करे।

किसी कामनासे, क्रोधसे तथा द्वेषसे भी धर्मका त्याग न करे ।। ९ ।।

(अमाययैव वर्तेत न च सत्यं त्यजेद् बुधः ।

दमं धर्मं च शीलं च क्षत्रधर्मं प्रजाहितम् ॥)

नापत्रपेत प्रश्नेषु नाविभाव्यां गिरं सृजेत् ।

न त्वरेत न चासूयेत् तथा संगृह्यते परः ॥ १० ॥

विद्वान् राजा छल-कपट छोड़कर ही बर्ताव करे। सत्यको कभी न छोड़े। इन्द्रिय-संयम,

धर्माचरण, सुशीलता, क्षत्रियधर्म तथा प्रजाके हितका कभी परित्याग न करे। यदि कोई

कुछ पूछे तो उसका उत्तर देनेमें संकोच न करे, बिना विचारे कोई बात मुँहसे न निकाले,

किसी काममें जल्दबाजी न करे और किसीकी निन्दा न करे, ऐसा बर्ताव करनेसे शत्रु भी

अपने वशमें हो जाता है ।। १० ।।

प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।

न तप्येदर्धकृच्छ्रेषु प्रजाहितमनुस्मरन् ॥ ११ ॥

यदि अपना प्रिय हो जाय तो बहुत प्रसन्न न हो और अप्रिय हो जाय तो अत्यन्त चिन्ता

न करे। यदि आर्थिक संकट आ पड़े तो प्रजाके हितका चिन्तन करते हुए तनिक भी संतप्त

न हो ।। ११ ।।

यः प्रियं कुरुते नित्यं गुणतो वसुधाधिपः ।

तस्य कर्माणि सिद्ध्यन्ति न च संत्यज्यते श्रिया ॥ १२ ॥

जो भूपाल अपने गुणोंसे सदा सबका प्रिय करता है, उसके सभी कर्म सफल होते हैं

और सम्पत्ति कभी उसका साथ नहीं छोड़ती ।। १२ ।।

निवृत्तं प्रतिकूलेषु वर्तमानमनुप्रिये ।