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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन

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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा दस्युः समर्यादः प्रेत्यभावे न नश्यति ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जो दस्यु (डाकू) मर्यादाका पालन करता है, वह मरनेके बाद दुर्गतिमें नहीं पड़ता। इस विषयमें विद्वान् पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥

प्रहर्ता मतिमान् शूरः श्रुतवाननृशंसवान् ।
रक्षन्नाश्रमिणां धर्मं ब्रह्मण्यो गुरुपूजकः ॥ २ ॥
निषाद्यां क्षत्रियाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः ।
कायव्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात् सिद्धिमाप्तवान् ॥ ३ ॥
कायव्यनामसे प्रसिद्ध एक निषादपुत्रने दस्यु होनेपर भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी। वह प्रहारकुशल, शूरवीर, बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ, क्रूरतारहित, आश्रमवासियोंके धर्मकी रक्षा करनेवाला, ब्राह्मणभक्त और गुरुपूजक था। वह क्षत्रिय पितासे एक निषादजातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था; अतः क्षत्रियधर्मका निरन्तर पालन करता था ॥ २-३ ॥

अरण्ये सायं पूर्वाह्ने मृगयूथप्रकोपिता ।
विधिज्ञो मृगजातीनां नैषादानां च कोविदः ॥ ४ ॥
कायव्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालके समय वनमें जाकर मृगोंकी टोलियोंको उत्तेजित कर देता था। वह मृगोंकी विभिन्न जातियोंके स्वभावसे परिचित तथा उन्हें काबूमें करनेकी कलाको जाननेवाला था। निषादोंमें वह सबसे निपुण था ॥ ४ ॥

सर्वकाननदेशज्ञः पारियात्रचरः सदा ।
धर्मज्ञः सर्वभूतानाममोघेषुर्दृढायुधः ॥ ५ ॥
उसे वनके सम्पूर्ण प्रदेशोंका ज्ञान था। वह सदा पारियात्र पर्वतपर विचरनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके धर्मोंका ज्ञाता था। उसका बाण लक्ष्य बेधनेमें अचूक था। उसके सारे अस्त्र-शस्त्र सुदृढ़ थे ॥ ५ ॥

अप्यनेकशतं सेनामेक एव जिगाय सः ।
स वृद्धावन्धबधिरौ महारण्येऽभ्यपूजयत् ॥ ६ ॥

वह सैकड़ों मनुष्योंकी सेनाको अकेले ही जीत लेता था और उस महान् वनमें रहकर अपने अन्धे और बहरे माता-पिताकी सेवा-पूजा किया करता था ॥ ६ ॥
मधुमांसैर्मूलफलैरन्नैरुच्चावचैरपि ।
सत्कृत्य भोजयामास मान्यान् परिचचार च ॥ ७ ॥
वह निषाद मधु, मांस, फल, मूल तथा नाना प्रकारके अन्नोंद्वारा माता-पिताको सत्कारपूर्वक भोजन कराता था तथा दूसरे-दूसरे माननीय पुरुषोंकी भी सेवा-पूजा किया करता था ॥ ७ ॥
आरण्यकान् प्रव्रजितान् ब्राह्मणान् परिपूजयन् ।
अपि तेभ्यो गृहान् गत्वा निनाय सततं वने ॥ ८ ॥
वह वनमें रहनेवाले वानप्रस्थ और संन्यासी ब्राह्मणोंकी पूजा करता और प्रतिदिन उनके घरमें जाकर उनके लिये अन्न आदि वस्तुएँ पहुँचा देता था ॥ ८ ॥
येऽस्मान्न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कया ।
तेषामासज्य गेहेषु कल्प एव स गच्छति ॥ ९ ॥
जो लोग लुटेरेके घरका भोजन होनेकी आशंकासे उसके हाथसे अन्न नहीं ग्रहण करते थे, उनके घरोंमें वह बड़े सबेरे ही अन्न और फल-मूल आदि भोजन-सामग्री रख जाता था ॥ ९ ॥
बहूनि च सहस्राणि ग्रामणित्वेऽभिवव्रिरे ।
निर्मर्यादानि दस्यूनां निरनुक्रोशवर्तिनाम् ॥ १० ॥
एक दिन मर्यादाका अतिक्रमण और भाँति-भाँतिके क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले कई हजार डाकुओंने उससे अपना सरदार बननेके लिये प्रार्थना की ॥ १० ॥

दस्यव ऊचुः

मुहूर्तदेशकालज्ञः प्राज्ञः शूरो दृढव्रतः ।
ग्रामणीर्भव नो मुख्यः सर्वेषामेव सम्मतः ॥ ११ ॥
**डाकू बोले—**तुम देश, काल और मुहूर्तके ज्ञाता, विद्वान्, शूरवीर और दृढप्रतिज्ञ हो; इसलिये हम सब लोगोंकी सम्मतिसे तुम हमारे सरदार हो जाओ ॥ ११ ॥
यथा यथा वक्ष्यसि नः करिष्यामस्तथा तथा ।
पालयास्मान् यथान्यायं यथा माता यथा पिता ॥ १२ ॥
तुम हमें जैसी-जैसी आज्ञा दोगे, वैसा-ही-वैसा हम करेंगे। तुम माता-पिताके समान हमारी यथोचित रीतिसे रक्षा करो ॥ १२ ॥

कायव्य उवाच

मा वधीस्त्वं स्त्रियं भीरुं मा शिशुं मा तपस्विनम् ।
नायुद्धयमानो हन्तव्यो न च ग्राह्या बलात् स्त्रियः ॥ १३ ॥

कायव्यने कहा—प्रिय बन्धुओ! तुम कभी स्त्री, डरपोक, बालक और तपस्वीकी हत्या न करना। जो तुमसे युद्ध न कर रहा हो, उसका भी वध न करना। स्त्रियोंको कभी बलपूर्वक न पकड़ना ॥ १३ ॥ सर्वथा स्त्री न हन्तव्या सर्वसत्त्वेषु केनचित् । नित्यं तु ब्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ॥ १४ ॥ तुममेंसे कोई भी सभी प्राणियोंके स्त्रीवर्गकी किसी तरह भी हत्या न करे। ब्राह्मणोंके हितका सदा ध्यान रखना। आवश्यकता हो तो उनकी रक्षाके लिये युद्ध भी करना ॥ १४ ॥ शस्यं च नापि हर्तव्यं सारविघ्नं च मा कृथाः । पूज्यन्ते यत्र देवाश्च पितरोऽतिथयस्तथा ॥ १५ ॥ खेतकी फसल न उखाड़ लाना, विवाह आदि उत्सवोंमें विघ्न न डालना, जहाँ देवता, पितर और अतिथियोंकी पूजा होती हो, वहाँ कोई उपद्रव न खड़ा करना ॥ १५ ॥ सर्वभूतेष्वपि च वै ब्राह्मणो मोक्षमर्हति । कार्याचोपचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि या भवेत् ॥ १६ ॥ समस्त प्राणियोंमें ब्राह्मण विशेषरूपसे डाकुओंके हाथसे छुटकारा पानेका अधिकारी है। अपना सर्वस्व लगाकर भी तुम्हें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रयन्ति पराभवम् । न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥ १७ ॥ देखो, ब्राह्मणलोग कुपित होकर जिसके पराभवका चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकोंमें कोई रक्षक नहीं होता ॥ १७ ॥ यो ब्राह्मणान् परिवदेद् विनाशं चापि रोचयेत् । सूर्योदय इव ध्वान्ते ध्रुवं तस्य पराभवः ॥ १८ ॥ जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार अवश्य ही पतन हो जाता है ॥ इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षेत सर्वशः । ये ये नो न प्रदास्यन्ति तांस्तांस्तेनाभियास्यसि ॥ १९ ॥ तुम लोग यहीं बैठे-बैठे लुटेरेपनका जो फल है, उसे पानेकी अभिलाषा रखो। जो-जो व्यापारी हमें स्वेच्छासे धन नहीं देंगे, उन्हीं-उन्हींपर तुम दल बाँधकर आक्रमण करोगे ॥ १९ ॥ शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वृद्ध्यर्थं विनिश्चयः । ये च शिष्टान् प्रबाधन्ते दण्डस्तेषां वधः स्मृतः ॥ २० ॥ दण्डका विधान दुष्टोंके दमनके लिये है, अपना धन बढ़ानेके लिये नहीं। जो शिष्ट पुरुषोंको सताते हैं, उनका वध ही उनके लिये दण्ड माना गया है ॥ २० ॥ ये च राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन ।

तदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा ॥ २१ ॥
जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिका लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः ।
अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २२ ॥
जो दस्युजातिमें उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्रके अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होनेपर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं (ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ) ॥ २२ ॥

भीष्म उवाच

ते सर्वमेवानुचक्रुः कायव्यस्यानुशासनम् ।
वृद्धिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ॥ २३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! यह सुनकर उन दस्युओंने कायव्यकी सारी आज्ञा मान ली और सदा उसका अनुसरण किया। इससे उन सभीकी उन्नति हुई और वे पाप-कर्मोंसे हट गये ॥ २३ ॥
कायव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् ।
साधूनामाचरन् क्षेमं दस्यून् पापान्निवर्तयम् ॥ २४ ॥
कायव्यने उस पुण्यकर्मसे बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषोंका कल्याण करते हुए डाकुओंको पापसे बचा लिया था ॥ २४ ॥
इदं कायव्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत् ।
नारण्येभ्यो हि भूतेभ्यो भयं प्राप्नोति किंचन ॥ २५ ॥
जो प्रतिदिन कायव्यके इस चरित्रका चिन्तन करता है, उसे वनवासी प्राणियोंसे किंचिन्मात्र भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २५ ॥
न भयं तस्य भूतेभ्यः सर्वेभ्यश्चैव भारत ।
नासतो विद्यते राजन् स ह्यारण्येषु गोपतिः ॥ २६ ॥
भारत! उसे सम्पूर्ण भूतोंसे भी भय नहीं होता। राजन्! किसी दुष्टात्मासे भी उसको डर नहीं लगता। वह तो वनका अधिपति हो जाता है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कायव्यचरिते
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कायव्यका चरित्रविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥

अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।

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षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार

भीष्म उवाच

अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
येन मार्गेण राजा वै कोशं संजनयत्युत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जिस मार्ग या उपायसे राजा अपना खजाना भरता है, उसके विषयमें प्राचीन इतिहासके जानकारलोग ब्रह्माजीकी कही हुई कुछ गाथाएँ कहा करते हैं ॥ १ ॥

न धनं यज्ञशीलानां हार्यं देवस्वमेव च ।
दस्यूनां निष्क्रियाणां च क्षत्रियो हर्तुमर्हति ॥ २ ॥
राजाको यज्ञानुष्ठान करनेवाले द्विजोंका धन नहीं लेना चाहिये। इसी प्रकार उसे देवसम्पत्तिमें भी हाथ नहीं लगाना चाहिये। वह लुटेरों तथा अकर्मण्य मनुष्योंके धनका अपहरण कर सकता है ॥ २ ॥

इमाः प्रजाः क्षत्रियाणां राज्यभोगाश्च भारत ।
धनं हि क्षत्रियस्यैव द्वितीयस्य न विद्यते ॥ ३ ॥
तदस्य स्याद् बलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव च ।
भरतनन्दन! ये समस्त प्रजाएँ क्षत्रियोंकी हैं। राज्यभोग भी क्षत्रियोंके ही हैं और सारा धन भी उन्हींका है, दूसरेका नहीं है; किंतु वह धन उसकी सेनाके लिये है या यज्ञानुष्ठानके लिये ॥ ३ ½ ॥

अभोग्याश्चौषधीश्छित्त्वा भोग्या एव पचन्त्युत ॥ ४ ॥
यो वै न देवान् न पितॄन् न मर्त्यान् हविषार्चति ।
अनर्थकं धनं तत्र प्राहुर्धर्मविदो जनाः ॥ ५ ॥
हरेत् तद् द्रविणं राजन् धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
ततः प्रीणयते लोकं न कोशं तद्धिधं नृपः ॥ ६ ॥
राजन्! जो खानेयोग्य नहीं हैं, उन ओषधियों या वृक्षोंको काटकर मनुष्य उनके द्वारा खानेयोग्य ओषधियोंको पकाते हैं। इसी प्रकार जो देवताओं, पितरों और मनुष्योंका हविष्यके द्वारा पूजन नहीं करता है, उसके धनको धर्मज्ञ पुरुषोंने व्यर्थ बताया है। अतः धर्मात्मा राजा ऐसे धनको छीन ले और उसके द्वारा प्रजाका पालन करे, किंतु वैसे धनसे राजा अपना कोश न भरे ॥ ४—६ ॥

असाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यो यः प्रयच्छति ।
आत्मानं संक्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव सः ॥ ७ ॥
जो राजा दुष्टोंसे धन छीनकर उसे श्रेष्ठ पुरुषोंमें बाँट देता है, वह अपने-आपको सेतु बनाकर उन सबको पार कर देता है। उसे सम्पूर्ण धर्मोंका ज्ञाता ही मानना चाहिये ॥ ७ ॥

तथा तथा जयेल्लोकान् शक्त्या चैव यथा यथा ।
उद्भिञ्जा जन्तवो यद्वच्छुक्लजीवा यथा यथा ॥ ८ ॥
अनिमित्तात् सम्भवन्ति तथायज्ञः प्रजायते ॥ ९ ॥
यथैव दंशमशकं यथा चाण्डपिपीलिकम् ।
सैव वृत्तिरयज्ञेषु यथा धर्मो विधीयते ॥ १० ॥
धर्मज्ञ राजा अपनी शक्तिके अनुसार उसी-उसी तरह लोकोंपर विजय प्राप्त करे, जैसे उद्भिज्ज जन्तु (वृक्ष आदि) अपनी शक्तिके अनुसार आगे बढ़ते हैं तथा जैसे वज्रकीट आदि क्षुद्र जीव बिना ही निमित्तके उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही बिना ही कारणके यज्ञहीन कर्तव्यविरोधी मनुष्य भी राज्यमें उत्पन्न हो जाते हैं। अतः राजाको चाहिये कि मच्छर, डाँस और चींटी आदि कीटोंके साथ जैसा बर्ताव किया जाता है, वही बर्ताव उन सत्कर्मविरोधियोंके साथ करे, जिससे धर्मका प्रचार हो ॥ ८—१० ॥

यथा ह्यकस्माद् भवति भूमौ पांसुर्विलोलितः ।
तथैवेह भवेद् धर्मः सूक्ष्मः सूक्ष्मतरस्तथा ॥ ११ ॥
जिस प्रकार अकस्मात् पृथ्वीकी धूलको लेकर सिलपर पीसा जाय तो वह और भी महीन ही होती है, उसी प्रकार विचार करनेसे धर्मका स्वरूप उत्तरोत्तर सूक्ष्म जान पड़ता है ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥

१३७-

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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

आनेवाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री—इन तीन मत्स्योंका दृष्टान्त

भीष्म उवाच

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, उसे अनागतविधाता कहते हैं तथा जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका उपाय सूझ जाता है, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति’ कहलाता है। ये दो ही प्रकारके लोग सुखसे अपनी उन्नति करते हैं; परंतु जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला होता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य नष्ट हो जाता है॥ १॥

अत्रैव चेदमव्यग्रं शृणुष्वाख्यानमुत्तमम्।
दीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये॥ २॥
कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय करनेमें जो दीर्घसूत्री होता है, उसको लेकर मैं एक सुन्दर उपाख्यान सुना रहा हूँ। तुम स्वस्थचित्त होकर सुनो॥ २॥

नातिगाधे जलाधारे सुहृदः कुशलास्त्रयः।
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय बभूवुः सहचारिणः॥ ३॥
कुन्तीनन्दन! कहते हैं, एक तालाबमें जो अधिक गहरा नहीं था, बहुत-सी मछलियाँ रहती थीं, उसी जलाशयमें तीन कार्यकुशल मत्स्य भी रहते थे, जो सदा साथ-साथ विचरनेवाले और एक-दूसरेके सुहृद् थे॥ ३॥

तत्रैको दीर्घकालज्ञ उत्पन्नप्रतिभोऽपरः।
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रयाणां सहचारिणाम्॥ ४॥
वहाँ उन तीनों सहचारियोंमेंसे एक तो (अनागतविधाता था, जो) आनेवाले दीर्घकालतककी बात सोच लेता था। दूसरा प्रत्युत्पन्नमति था, जिसकी प्रतिभा ठीक समयपर ही काम दे देती थी और तीसरा दीर्घसूत्री था (जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करता था)॥ ४॥

कदाचित् तं जलस्थायं मत्स्यबन्धाः समन्ततः।
निस्रावयामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः॥ ५॥
एक दिन कुछ मछलीमारोंने उस जलाशयमें चारों ओरसे नालियाँ बनाकर अनेक द्वारोंसे उसका पानी आसपासकी नीची भूमिमें निकालना आरम्भ कर दिया॥ ५॥

प्रक्षीयमाणं तं दृष्ट्वा जलस्थायं भयागमे ।
अब्रवीद् दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहृदौ तदा ॥ ६ ॥
जलाशयका पानी घटता देख भय आनेकी सम्भावना समझकर दूरतककी बातें सोचनेवाले उस मत्स्यने अपने उन दोनों सुहृदोंसे कहा— ॥ ६ ॥

इयमापत् समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम् ।
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न दुष्यति ॥ ७ ॥
‘बन्धुओ! जान पड़ता है कि इस जलाशयमें रहनेवाले सभी मत्स्योंपर संकट आ पहुँचा है; इसलिये जबतक हमारे निकलनेका मार्ग दूषित न हो जाय, तबतक शीघ्र ही हमें यहाँसे अन्यत्र चले जाना चाहिये ॥ ७ ॥

अनागतमनर्थं हि सुनयैर्यैः प्रबाधयेत् ।
स न संशयमाप्नोति रोचतां भो व्रजामहे ॥ ८ ॥
‘जो आनेवाले संकटको उसके आनेसे पहले ही अपनी अच्छी नीतिद्वारा मिटा देता है, वह कभी प्राण जानेके संशयमें नहीं पड़ता। यदि आपलोगोंको मेरी बात ठीक जान पड़े तो चलिये, दूसरे जलाशयको चलें’ ॥ ८ ॥

दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽब्रवीत् सम्यगुच्यते ।
न तु कार्या त्वरा तावदिति मे निश्चिता मतिः ॥ ९ ॥
इसपर वहाँ जो दीर्घसूत्री था, उसने कहा—‘मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो; परंतु मेरा यह दृढ़ विचार है कि अभी हमें जल्दी नहीं करनी चाहिये’ ॥ ९ ॥

अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञः प्राब्रवीद् दीर्घदर्शिनम् ।
प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायातः परिहास्यते ॥ १० ॥
तदनन्तर प्रत्युत्पन्नमतिने दूरदर्शीसे कहा—‘मित्र! जब समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्यायतः कोई युक्ति ढूँढ़ निकालनेमें कभी नहीं चूकती है’ ॥ १० ॥

एवं श्रुत्वा निराक्रम्य दीर्घदर्शी महामतिः ।
जगाम स्रोतसा तेन गम्भीरं सलिलाशयम् ॥ ११ ॥
यह सुनकर परम बुद्धिमान् दीर्घदर्शी (अनागत-विधाता) वहाँसे निकलकर एक नालीके रास्तेसे दूसरे गहरे जलाशयमें चला गया ॥ ११ ॥

ततः प्रसृततोयं तं प्रसमीक्ष्य जलाशयम् ।
बबन्धुर्विविधैर्योगैर्मत्स्यान् मत्स्योपजीविनः ॥ १२ ॥
तदनन्तर मछलियोंसे ही जीविका चलानेवाले मछलीमारोंने जब यह देखा कि जलाशयका जल प्रायः बाहर निकल चुका है, तब उन्होंने अनेक उपायोंद्वारा वहाँकी सब मछलियोंको फँसा लिया ॥ १२ ॥

विलोद्यमाने तस्मिंस्तु स्रुततोये जलाशये ।
अगच्छद् बन्धनं तत्र दीर्घसूत्रः सहापरैः ॥ १३ ॥

जिसका पानी बाहर निकल चुका था, वह जलाशय जब मथा जाने लगा, तब दीर्घसूत्री भी दूसरे मत्स्योंके साथ जालमें फँस गया ।। १३ ।। उद्याने क्रियमाणे तु मत्स्यानां तत्र रज्जुभिः । प्रविश्यान्तरमेतेषां स्थितः सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १४ ॥ जब मछलीमार रस्सी खींचकर मछलियोंसे भरे हुए उस जालको उठाने लगे, तब प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य भी उन्हीं मत्स्योंके भीतर घुसकर जालमें बँध-सा गया ।। १४ ।। गृह्यमेव तदुद्यानं गृहीत्वा तं तथैव सः । सर्वानैव च तांस्तत्र ते विदुर्ग्रथितानिति ॥ १५ ॥ वह जाल मुखसे पकड़ने योग्य था; अतः उसकी ताँतको मुँहमें लेकर वह भी अन्य मछलियोंकी तरह बँधा हुआ प्रतीत होने लगा। मछलीमारोंने उन सब मछलियोंको वहाँ बँधा हुआ ही समझा ।। १५ ।। ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विपुले जले । मुक्त्वा रज्जुं प्रमुक्तोऽसौ शीघ्रं सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १६ ॥ तदनन्तर उस जालको लेकर वे मछलीमार जब दूसरे अगाध जलवाले जलाशयके समीप गये और उन मछलियोंको धोने लगे, उसी समय प्रत्युत्पन्नमति मुखमें ली हुई जालकी रस्सीको छोड़कर उसके बन्धनसे मुक्त हो गया और जलमें समा गया ।। १६ ।। दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनबुद्धिरचेतनः । मरणं प्राप्तवान् मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः ॥ १७ ॥ परंतु बुद्धिहीन और आलसी मूर्ख दीर्घसूत्री अचेत होकर मृत्युको प्राप्त हुआ, जैसे कोई इन्द्रियोंके नष्ट होनेसे नष्ट हो जाता है ।। १७ ।। एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नावबुद्ध्यते । स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ॥ १८ ॥ इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिरपर आये हुए कालको नहीं समझ पाता, वह उस दीर्घसूत्री मत्स्यके समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।। १८ ।। आदौ न कुरुते श्रेयः कुशलोऽस्मीति यः पुमान् । स संशयमवाप्नोति यथा सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १९ ॥ जो पुरुष यह समझकर कि मैं बड़ा कार्यकुशल हूँ, पहलेसे ही अपने कल्याणका उपाय नहीं करता, वह प्रत्युत्पन्नमति मत्स्यके समान प्राणसंशयकी स्थितिमें पड़ जाता है ।। १९ ।। अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः । द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्रो विनश्यति ॥ २० ॥ जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, वह 'अनागतविधाता' और जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका कोई उपाय सूझ जाता है, वह 'प्रत्युत्पन्नमति'—

ये दो ही सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं; परंतु प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला ‘दीर्घसूत्री’ नष्ट हो जाता है ॥ २० ॥

काष्ठाः कला मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः ।
मासाः पक्षाः षड् ऋतवः कल्पः संवत्सरास्तथा ॥ २१ ॥
पृथिवी देश इत्युक्तः कालः स च न दृश्यते ।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं ध्यायते यच्च तत्तथा ॥ २२ ॥

काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर और कल्प—इन्हें ‘काल’ कहते हैं तथा पृथ्वीको ‘देश’ कहा जाता है। इनमेंसे देशका तो दर्शन होता है, किंतु काल दिखायी नहीं देता है। अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये जिस देश और कालको उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥

एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः ।
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामे चाभिमतौ नृणाम् ॥ २३ ॥

ऋषियोंने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्रमें इन देश और कालको ही कार्य-सिद्धिका प्रधान उपाय बताया है। मनुष्योंकी कामना-सिद्धिमें भी ये देश और काल ही प्रधान माने गये हैं ॥ २३ ॥

परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् ।
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ॥ २४ ॥

जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करनेवाला तथा सतत सावधान रहनेवाला है, वह अभीष्ट देश और कालका ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोगसे इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि शाकुलोपाख्याने
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें शाकुलोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥

१३८-

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अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान

युधिष्ठिर उवाच
सर्वत्र बुद्धिः कथिता श्रेष्ठा ते भरतर्षभ।
अनागता तथोत्पन्ना दीर्घसूत्रा विनाशिनी ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भरतश्रेष्ठ! आपने सर्वत्र अनागत (संकट आनेसे पहले ही आत्मरक्षाकी व्यवस्था करनेवाली) तथा प्रत्युत्पन्न (समयपर बचावका उपाय सोच लेनेवाली) बुद्धिको ही श्रेष्ठ बताया है और प्रत्येक कार्यमें आलस्यके कारण विलम्ब करनेवाली बुद्धिको विनाशकारी बताया है ॥ १ ॥

तदिच्छामि परां श्रोतुं बुद्धिं ते भरतर्षभ।
यथा राजा न मुह्येत शत्रुभिः परिवारितः ॥ २ ॥
धर्मार्थकुशलो राजा धर्मशास्त्रविशारदः।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
भरतभूषण! अतः अब मैं उस श्रेष्ठ बुद्धिके विषयमें आपसे सुनना चाहता हूँ, जिसका आश्रय लेनेसे धर्म और अर्थमें कुशल तथा धर्मशास्त्रविशारद राजा शत्रुओं-द्वारा घिरा रहनेपर भी मोहमें नहीं पड़ता। कुरुश्रेष्ठ! उसी बुद्धिके विषयमें मैं आपसे प्रश्न करता हूँ; अतः आप मेरे लिये उसकी व्याख्या करें ॥ २-३ ॥

शत्रुभिर्बहुभिर्ग्रस्तो यथा वर्तेत पार्थिवः।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वमेव यथाविधि ॥ ४ ॥
बहुत-से शत्रुओंका आक्रमण हो जानेपर राजाको कैसा बर्ताव करना चाहिये? यह सब कुछ मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

विषमस्थं हि राजानं शत्रवः परिपन्थिनः।
बहवोऽप्येकमुद्धर्तुं यतन्ते पूर्वतापिताः ॥ ५ ॥
पहलेके सताये हुए डाकू आदि शत्रु जब राजाको संकटमें पड़ा हुआ देखते हैं, तब वे बहुत-से मिलकर उस असहाय राजाको उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करते हैं ॥ ५ ॥

सर्वत्र प्रार्थ्यमानेन दुर्बलेन महाबलैः।
एकेनैवासहायेन शक्यं स्थातुं भवेत् कथम् ॥ ६ ॥
जब अनेक महाबली शत्रु किसी दुर्बल राजाको सब ओरसे हड़प जानेके लिये तैयार हो जायँ, तब उस एकमात्र असहाय नरेशके द्वारा उस परिस्थितिका कैसे सामना किया जा

सकता है? ॥ ६ ॥ कथं मित्रमरिं चापि विन्दते भरतर्षभ । चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ॥ ७ ॥ राजा किस प्रकार मित्र और शत्रुको अपने वशमें करता है तथा उसे शत्रु और मित्रके बीचमें रहकर कैसी चेष्टा करनी चाहिये? ॥ ७ ॥ प्रज्ञातलक्षणे मित्रे तथैवामित्रतां गते । कथं तु पुरुषः कुर्यात् कृत्वा किं वा सुखी भवेत् ॥ ८ ॥ पहले लक्षणोंद्वारा जिसे मित्र समझा गया है, वही मनुष्य यदि शत्रु हो जाय, तब उसके साथ कोई पुरुष कैसा बर्ताव करे? अथवा क्या करके वह सुखी हो? ॥ ८ ॥ विग्रहं केन वा कुर्यात् संधिं वा केन योजयेत् । कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेत बलवानपि ॥ ९ ॥ किसके साथ विग्रह करे? अथवा किसके साथ संधि जोड़े और बलवान् पुरुष भी यदि शत्रुओंके बीचमें मिल जाय तो उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ ९ ॥ एतद् वै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं परंतप । नैतस्य कश्चिद् वक्तास्ति श्रोता वापि सुदुर्लभः ॥ १० ॥ ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् सत्यसंधाज्जितेन्द्रियात् । तदन्विष्य महाभाग सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ११ ॥ परंतप पितामह! यह कार्य समस्त कार्योंमें श्रेष्ठ है। सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा, दूसरा कोई इस विषयको बतानेवाला नहीं है। इसको सुननेवाला भी दुर्लभ ही है। अतः महाभाग! आप उसका अनुसंधान करके यह सारा विषय मुझसे कहिये ॥ १०-११ ॥

भीष्म उवाच त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो युधिष्ठिर सुखोदयः । शृणु मे पुत्र कार्त्स्न्येन गुह्यमापत्सु भारत ॥ १२ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन बेटा युधिष्ठिर! तुम्हारा यह विस्तारपूर्वक पूछना बहुत ठीक है। यह सुखकी प्राप्ति करानेवाला है। आपत्तिके समय क्या करना चाहिये? यह विषय गोपनीय होनेसे सबको मालूम नहीं है। तुम यह सब रहस्य मुझसे सुनो ॥ १२ ॥ अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति । सामर्थ्ययोगात् कार्याणामनित्या वै सदा गतिः ॥ १३ ॥ भिन्न-भिन्न कार्योंका ऐसा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण कभी शत्रु भी मित्र बन जाता है और कभी मित्रका मन भी द्वेषभावसे दूषित हो जाता है। वास्तवमें शत्रु-मित्रकी परिस्थिति सदा एक-सी नहीं रहती है ॥ १३ ॥

तस्माद् विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् । देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥ १४ ॥ अतः देश-कालको समझकर कर्तव्य-अकर्तव्यका निश्चय करके किसीपर विश्वास और किसीके साथ युद्ध करना चाहिये ॥ १४ ॥

संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः । अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥ १५ ॥ भारत! कर्तव्यका विचार करके सदा हित चाहनेवाले विद्वान् मित्रोंके साथ संधि करनी चाहिये और आवश्यकता पड़नेपर शत्रुओंसे भी संधि कर लेनी चाहिये; क्योंकि प्राणोंकी रक्षा सदा ही कर्तव्य है ॥ १५ ॥

यो ह्यमित्रैर्नरो नित्यं न संदध्यादपण्डितः । न सोऽर्थं प्राप्नुयात् किंचित् फलान्यपि च भारत ॥ १६ ॥ भारत! जो मूर्ख मानव शत्रुओंके साथ कभी किसी भी दशामें संधि ही नहीं करता, वह अपने किसी भी उद्देश्यको सिद्ध नहीं कर सकता और न कोई फल ही पा सकता है ॥ १६ ॥

यस्त्वमित्रेण संदध्यानमित्रेण च विरुद्ध्यते । अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद् विन्दते फलम् ॥ १७ ॥ जो स्वार्थसिद्धिका अवसर देखकर शत्रुसे तो संधि कर लेता है और मित्रोंके साथ विरोध बढ़ा लेता है, वह महान् फल प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मार्जारस्य च संवादं न्यग्रोधे मूषिकस्य च ॥ १८ ॥ इस विषयमें विद्वान् पुरुष वटवृक्षके आश्रयमें रहनेवाले एक बिलाव और चूहेके संवादरूप एक प्रचीन कथानकका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ १८ ॥

वने महति कस्मिंश्चिन्न्यग्रोधः सुमहानभूत् । लताजालपरिच्छिन्नो नानाद्विजगणान्वितः ॥ १९ ॥ किसी महान् वनमें एक विशाल बरगदका वृक्ष था, जो लतासमूहोंसे आच्छादित तथा भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे सुशोभित था ॥ १९ ॥

स्कन्धवान् मेघसङ्काशः शीतच्छायो मनोरमः । अरण्यमभितो जातः स तु व्यालमृगाकुलः ॥ २० ॥ वह अपनी मोटी-मोटी डालियोंसे हरा-भरा होनेके कारण मेघके समान दिखायी देता था। उसकी छाया शीतल थी। वह मनोरम वृक्ष वनके समीप होनेके कारण बहुत-से सर्पों तथा पशुओंका आश्रय बना हुआ था ॥ २० ॥

तस्य मूलं समाश्रित्य कृत्वा शतमुखं बिलम् । वसति स्म महाप्राज्ञः पलितो नाम मूषिकः ॥ २१ ॥

उसीकी जड़मे सौ दरवाजोंका बिल बनाकर पलित नामक एक परम बुद्धिमान् चूहा निवास करता था ।। २१ ।।

शाखां तस्य समाश्रित्य वसति स्म सुखं पुरा ।
लोमशो नाम मार्जारः पक्षिसंघातखादकः ।। २२ ।।
उसी बरगदकी डालीपर पहले लोमश नामका एक बिलाव भी बड़े सुखसे रहता था। पक्षियोंका समूह ही उसका भोजन था ।। २२ ।।

तत्र चागत्य चाण्डालो ह्यररण्ये कृतकेतनः ।
प्रयोजयति चोन्माथं नित्यमस्तंगते रवौ ।। २३ ।।
तत्र स्नायुमयान् पाशान् यथावत् संविधाय सः ।
गृहं गत्वा सुखं शेते प्रभातामेति शर्वरीम् ।। २४ ।।
उसी वनमें एक चाण्डाल भी घर बनाकर रहता था। वह प्रतिदिन सायंकाल सूर्यास्त हो जानेपर वहाँ आकर जाल फैला देता और उसकी ताँतकी डोरियोंको यथास्थान लगा घर जाकर मौजसे सोता था; फिर सबेरा होनेपर वहाँ आया करता था ।। २३-२४ ।।

तत्र स्म नित्यं बध्यन्ते नक्तं बहुविधा मृगाः ।
कदाचिदत्र मार्जारस्त्वप्रमत्तो व्यबध्यत ।। २५ ।।
रातको उस जालमें प्रतिदिन नाना प्रकारके पशु फँस जाते थे (उन्हींको लेनेके लिये वह सबेरे आता था)। एक दिन अपनी असावधानीके कारण पूर्वोक्त बिलाव भी उस जालमें फँस गया ।। २५ ।।

तस्मिन् बद्धे महाप्राणे शत्रौ नित्याततायिनि ।
तं कालं पलितो ज्ञात्वा प्रचचार सुनिर्भयः ।। २६ ।।
उस महान् शक्तिशाली और नित्य आततायी शत्रुके फँस जानेपर जब पलितको यह समाचार मालूम हुआ, तब वह उस समय बिलसे बाहर निकलकर सब ओर निर्भय विचरने लगा ।। २६ ।।

तेनानुचरता तस्मिन् वने विश्वस्तचारिणा ।
भक्ष्यं मृगयमाणेन चिराद् दृष्टं तदामिषम् ।। २७ ।।
स तमुन्माथमारुह्य तदामिषमभक्षयत् ।। २८ ।।
उस वनमें विश्वस्त होकर विचरते तथा आहारकी खोज करते हुए उस चूहेने बहुत देरके बाद वह माँस देखा, जो जालपर बिखेरा गया था। चूहा उस जालपर चढ़कर उस मांसको खाने लगा ।। २७-२८ ।।

तस्योपरि सपत्नस्य बद्धस्य मनसा हसन् ।
आमिषे तु प्रसक्तः स कदाचिदवलोकयन् ।। २९ ।।
जालके ऊपर मांस खानेमें लगा हुआ वह चूहा अपने शत्रुके ऊपर मन-ही-मन हँस रहा था। इतनेहीमें कभी उसकी दृष्टि दूसरी ओर घूम गयी ।। २९ ।।

अपश्यदपरं घोरमात्मनः शत्रुमागतम् । शरप्रसूनसङ्काशं महीविवरशायिनम् ॥ ३० ॥ फिर तो उसने एक दूसरे भयंकर शत्रुको वहाँ आया हुआ देखा, जो सरकण्डेके फूलके समान भूरे रंगका था। वह धरतीमें विवर बनाकर उसके भीतर सोया करता था ॥ ३० ॥

नकुलं हरिणं नाम चपलं ताम्रलोचनम् । तेन मूषिकगन्धेन त्वरमाणमुपागतम् ॥ ३१ ॥ वह जातिका न्यौला था। उसकी आँखें ताँबेके समान दिखायी देती थीं। वह चपल नेवला हरिणके नामसे प्रसिद्ध था और उसी चूहेकी गन्ध पाकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचा था ॥ ३१ ॥

भक्ष्यार्थं संलिहानं तं भूमावूर्ध्वमुखं स्थितम् । शाखागतमरिं चान्यमपश्यत् कोटरालयम् ॥ ३२ ॥ उलूकं चन्द्रकं नाम तीक्ष्णतुण्डं क्षपाचरम् । इधर तो वह नेवला अपना आहार ग्रहण करनेके लिये जीभ लपलपाता हुआ ऊपर मुँह किये पृथ्वीपर खड़ा था और दूसरी ओर बरगदकी शाखापर बैठा हुआ दूसरा ही शत्रु दिखायी दिया, जो वृक्षके खोंखलेमें निवास करता था। वह चन्द्रक नामसे प्रसिद्ध उल्लू था। उसकी चोंच बड़ी तीखी थी। वह रातमें विचरनेवाला पक्षी था ॥ ३२ १/२ ॥

गतस्य विषयं तत्र नकुलोलूकयोस्तथा ॥ ३३ ॥ अथास्यासीदियं चिन्ता तत् प्राप्य सुमहद् भयम् । न्यौले और उल्लू—दोनोंका लक्ष्य बने हुए उस चूहेको बड़ा भय हुआ। अब उसे इस प्रकार चिन्ता होने लगी— ॥

आपद्यस्यां सुकष्टायां मरणे प्रत्युपस्थिते ॥ ३४ ॥ समन्ताद् भय उत्पन्ने कथं कार्यं हितैषिणा । ‘अहो! इस कष्टदायिनी विपत्तिमें मृत्यु निकट आकर खड़ी है। चारों ओरसे भय उत्पन्न हो गया है। ऐसी अवस्थामें अपना हित चाहनेवाले प्राणीको किस उपायका अवलम्बन करना चाहिये?’ ॥ ३४ १/२ ॥

स तथा सर्वतो रुद्धः सर्वत्र भयदर्शनः ॥ ३५ ॥ अभवद् भयसंतप्तश्चक्रे च परमां मतिम् । इस प्रकार सब ओरसे उसका मार्ग अवरुद्ध हो गया था। सर्वत्र उसे भय-ही-भय दिखायी देता था। उस भयसे वह संतप्त हो उठा। इसके बाद उसने पुनः श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले सोचना आरम्भ किया— ॥ ३५ १/२ ॥

आपद्धिनाशभूयिष्ठं गर्तः कार्यं हि जीवितम् ॥ ३६ ॥ समन्तात् संशयात् सैषा तस्मादापदुपस्थिता ।

'आपत्तिमें पड़कर विनाशके समीप पहुँचे हुए प्राणियोंको भी अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न तो करना ही चाहिये। आज सब ओरसे प्राणोंका संशय उपस्थित है; अतः यह मुझपर बड़ी भारी आपत्ति आ गयी है।। ३६ १/२ ।। गतं मां सहसा भूमिं नकुलो भक्षयिष्यति ।। ३७ ।। उलूकश्चेह तिष्ठन्तं मार्जारः पाशसंक्षयात् । 'यदि मैं पृथ्वीपर उतरकर भागता हूँ तो सहसा नेवला मुझे पकड़कर खा जायगा। यदि यहीं ठहर जाता हूँ तो उल्लू मुझे चोंचसे मार डालेगा और यदि जाल काटकर भीतर घुसता हूँ तो बिलाव जीवित नहीं छोड़ेगा ।। ३७ १/२ ।। न त्वेवास्मद्विधः प्राज्ञः सम्मोहं गन्तुमर्हति ।। ३८ ।। करिष्ये जीविते यत्नं यावद् युक्त्या प्रतिग्रहात् । 'तथापि मुझ-जैसे बुद्धिमान्‌को घबराना नहीं चाहिये। अतः जहाँतक युक्ति काम देगी, परस्पर सहयोगका आदान-प्रदान करके मैं जीवन-रक्षाके लिये प्रयत्न करूँगा ।। ३८ १/२ ।। न हि बुद्ध्यान्वितः प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ।। ३९ ।। निमज्जत्यापदं प्राप्य महतीं दारुणामपि ।। ४० ।। 'बुद्धिमान्, विद्वान् और नीतिशास्त्रमें निपुण पुरुष भारी और भयंकर विपत्तिमें पड़नेपर भी उसमें डूब नहीं जाता है—उससे छूटनेकी चेष्टा करता है ।। ३९-४० ।। न त्वन्यामिह मार्जाराद् गतिं पश्यामि साम्प्रतम् । विषमस्थो ह्ययं शत्रुः कृत्यं चास्य महन्मया ।। ४१ ।। 'मैं इस समय इस बिलावका सहारा लेनेके सिवा, अपने लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं देखता। यद्यपि यह मेरा कट्टर शत्रु है, तथापि इस समय स्वयं ही भारी संकटमें पड़ा हुआ है। मेरे द्वारा इसका भी बड़ा भारी काम निकल सकता है ।। ४१ ।। जीवितार्थी कथं त्वद्य शत्रुभिः प्रार्थितस्त्रिभिः । तस्मादेनमहं शत्रुं मार्जारं संश्रयामि वै ।। ४२ ।। 'इधर, मैं भी जीवनकी रक्षा चाहता हूँ, तीन-तीन शत्रु मुझपर घात लगाये बैठे हैं; अतः क्यों न आज मैं अपने शत्रु इस बिलावका ही आश्रय लूँ? ।। ४२ ।। नीतिशास्त्रं समाश्रित्य हितमस्योपवर्णये । येनेमं शत्रुसंघातं मतिपूर्वेण वञ्चये ।। ४३ ।। 'आज नीतिशास्त्रका सहारा लेकर इसके हितका वर्णन करूँगा जिससे बुद्धिके द्वारा इस शत्रुसमुदायको धोखा देकर बच जाऊँगा ।। ४३ ।। अयमत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गतः । मूढो ग्राहयितुं स्वार्थं सङ्गत्या यदि शक्यते ।। ४४ ।। 'इसमें संदेह नहीं कि बिलाव मेरा महान् दुश्मन है, तथापि इस समय महान् संकटमें है। यदि सम्भव हो तो इस मूर्खको संगतिके द्वारा स्वार्थ सिद्ध करनेकी बातपर राजी

करूँ ॥ ४४ ॥ कदाचिद् व्यसनं प्राप्य संधिं कुर्यान्मया सह । बलिना संनिकृष्टस्य शत्रोरपि परिग्रहः ॥ ४५ ॥ कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना । ‘हो सकता है कि विपत्तिमें पड़ा होनेके कारण यह मेरे साथ संधि कर ले। आचार्योंका कथन है कि संकट आ पड़नेपर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले बलवान् पुरुषको भी अपने निकटवर्ती शत्रुसे मेल कर लेना चाहिये ॥ ४५ १/२ ॥ श्रेष्ठो हि पण्डितः शत्रुर्न च मित्रमपण्डितः ॥ ४६ ॥ मम त्वमित्रे माजरि जीवितं सम्प्रतिष्ठितम् । ‘विद्वान् शत्रु भी अच्छा होता है किंतु मूर्ख मित्र भी अच्छा नहीं है। मेरा जीवन तो आज मेरे शत्रु बिलावके ही अधीन है ॥ ४६ १/२ ॥ हन्तास्मै सम्प्रवक्ष्यामि हेतुमात्माभिरक्षणे ॥ ४७ ॥ अपीदानीमयं शत्रुः सङ्गत्या पण्डितो भवेत् । ‘अच्छा, अब मैं इसे आत्मरक्षाके लिये एक युक्ति बता रहा हूँ। सम्भव है, यह शत्रु इस समय मेरी संगतिसे विद्वान् हो जाय—विवेकसे काम ले’ ॥ ४७ १/२ ॥ एवं विचिन्तयामास मूषिकः शत्रुचेष्टितम् ॥ ४८ ॥ ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः संधिविग्रहकालवित् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं मार्जारं मूषिकोऽब्रवीत् ॥ ४९ ॥ इस प्रकार चूहेने शत्रुकी चेष्टापर विचार किया। वह अर्थसिद्धिके उपायको यथार्थरूपसे जाननेवाला तथा संधि और विग्रहके अवसरको समझनेवाला था। उसने बिलावको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें कहा— ॥ ४८-४९ ॥ सौहृदेनाभिभाषे त्वां कच्चिन्मार्जार जीवसि । जीवितं हि तवेच्छामि श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५० ॥ ‘भैया बिलाव! मैं तुम्हारे प्रति मैत्रीका भाव रखकर बातचीत कर रहा हूँ। तुम अभी जीवित तो हो न? मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहे; क्योंकि इसमें मेरी और तुम्हारी दोनोंकी एक-सी भलाई है ॥ ५० ॥ न ते सौम्य भयं कार्यं जीविष्यसि यथासुखम् । अहं त्वामुद्धरिष्यामि यदि मां न जिघांससि ॥ ५१ ॥ ‘सौम्य! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम आनन्दपूर्वक जीवित रह सकोगे। यदि मुझे मार डालनेकी इच्छा त्याग दो तो मैं इस संकटसे तुम्हारा उद्धार कर दूँगा ॥ ५१ ॥ अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दुष्करः प्रतिभाति मे । येन शक्यस्त्वया मोक्षः प्राप्तुं श्रेयस्तथा मया ॥ ५२ ॥

‘एक उपाय है जिससे तुम इस संकटसे छुटकारा पा सकते हो और मैं भी कल्याणका भागी हो सकता हूँ। यद्यपि वह उपाय मुझे दुष्कर प्रतीत होता है ॥ ५२ ॥
मयाप्युपायो दृष्टोऽयं विचार्य मतिमात्मनः ।
आत्मार्थं च त्वदर्थं च श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५३ ॥
‘मैंने अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह सोच-विचार करके अपने और तुम्हारे लिये एक उपाय ढूँढ़ निकाला है, जिससे हम दोनोंकी समानरूपसे भलाई होगी ॥ ५३ ॥
इदं हि नकुलोलूकं पापबुद्ध्याभिसंस्थितम् ।
न धर्षयति मार्जार तेन मे स्वस्ति साम्प्रतम् ॥ ५४ ॥
‘मार्जार! देखो, ये नेवला और उल्लू दोनों पापबुद्धिसे यहाँ ठहरे हुए हैं। मेरी ओर घात लगाये बैठे हैं। जबतक वे मुझपर आक्रमण नहीं करते, तभीतक मैं कुशलसे हूँ ॥ ५४ ॥
कूजंश्चपलनेत्रोऽयं कौशिको मां निरीक्षते ।
नगशाखाग्रगः पापस्तस्याहं भृशमुद्विजे ॥ ५५ ॥
‘यह चंचल नेत्रोंवाला पापी उल्लू वृक्षकी डालीपर बैठकर ‘हू हू’ करता मेरी ही ओर घूर रहा है। उससे मुझे बड़ा डर लगता है ॥ ५५ ॥
सतां साप्तपदं मैत्रं स सखा मेऽसि पण्डितः ।
सांवास्यकं करिष्यामि नास्ति ते भयमद्य वै ॥ ५६ ॥
‘साधु पुरुषोंमें तो सात पग साथ-साथ चलनेसे ही मित्रता हो जाती है। हम और तुम तो यहाँ सदासे ही साथ रहते हैं; अतः तुम मेरे विद्वान् मित्र हो। मैं इतने दिन साथ रहनेका अपना मित्रोचित धर्म अवश्य निभाऊँगा, इसलिये अब तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ५६ ॥
न हि शक्तोऽसि मार्जार पाशं छेत्तुं मया विना ।
अहं छेत्स्यामि पाशांस्ते यदि मां त्वं न हिंससि ॥ ५७ ॥
‘मार्जार! तुम मेरी सहायताके बिना अपना यह बन्धन नहीं काट सकते। यदि तुम मेरी हिंसा न करो तो मैं तुम्हारे ये सारे बन्धन काट डालूँगा ॥ ५७ ॥
त्वमाश्रितो द्रुमस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रितः ।
चिरोषितावुभावावां वृक्षेऽस्मिन् विदितं च ते ॥ ५८ ॥
‘तुम इस पेड़के ऊपर रहते हो और मैं इसकी जड़में रहता हूँ। इस प्रकार हम दोनों चिरकालसे इस वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, यह बात तो तुम्हें ज्ञात ही है ॥ ५८ ॥
यस्मिन्नाश्वासते कश्चिद् यश्च नाश्वसिति क्वचित् ।
न तौ धीराः प्रशंसन्ति नित्यमुद्विग्नमानसौ ॥ ५९ ॥
‘जिसपर कोई भरोसा नहीं करता तथा जो दूसरे किसीपर स्वयं भी भरोसा नहीं करता, उन दोनोंकी धीर पुरुष कोई प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि उनके मनमें सदा उद्वेग भरा रहता है ॥ ५९ ॥
तस्माद् विवर्धतां प्रीतिर्नित्यं संगतमस्तु नौ ।

कालातीतमहिथं तु न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥ ६० ॥ 'अतः हमलोगोंमें सदा प्रेम बढ़े तथा नित्य प्रति हमारी संगति बनी रहे। जब कार्यका समय बीत जाता है, उसके बाद विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ ६० ॥

अर्थयुक्तिमिमां तत्र यथाभूतां निशामय । तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ॥ ६१ ॥ 'बिलाव! हम दोनोंके प्रयोजनका जो यह संयोग आ बना है, उसे यथार्थरूपसे सुनो। मैं तुम्हारे जीवनकी रक्षा चाहता हूँ और तुम मेरे जीवनकी रक्षा चाहते हो ॥ ६१ ॥

कश्चित् तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् । स तारयति तत् काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ॥ ६२ ॥ 'कोई पुरुष जब लकड़ीके सहारे किसी गहरी एवं विशाल नदीको पार करता है, तब उस लकड़ीको भी किनारे लगा देता है तथा वह लकड़ी भी उसे तारनेमें सहायक होती है ॥ ६२ ॥

ईदृशो नौ समायोगो भविष्यति सुविस्तरः । अहं त्वां तारयिष्यामि मां च त्वं तारयिष्यसि ॥ ६३ ॥ 'इसी प्रकार हम दोनोंका यह संयोग चिरस्थायी होगा। मैं तुम्हें विपत्तिसे पार कर दूँगा और तुम मुझे आपत्तिसे बचा लोगे' ॥ ६३ ॥

एवमुक्त्वा तु पलितस्तमर्थमुभयोर्हितम् । हेतुमद् ग्रहणीयं च कालापेक्षी न्यवेक्ष्य च ॥ ६४ ॥ इस प्रकार पलित दोनोंके लिये हितकर, युक्तियुक्त और मानने योग्य बात कहकर उत्तर मिलनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हुआ बिलावकी ओर देखने लगा ॥ ६४ ॥

अथ सुव्याहृतं श्रुत्वा तस्य शत्रोर्विचक्षणः । हेतुमद् ग्रहणीयार्थं मार्जारो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६५ ॥ अपने उस शत्रुके यह युक्तियुक्त और मान लेने योग्य सुन्दर भाषण सुनकर बुद्धिमान् बिलाव कुछ बोलनेको उद्यत हुआ ॥ ६५ ॥

बुद्धिमान् वाक्यसम्पन्नस्तद्वाक्यमनुवर्णयन् । स्वामवस्थां समीक्ष्याथ साम्नैव प्रत्यपूजयत् ॥ ६६ ॥ उसकी बुद्धि अच्छी थी। वह बोलनेकी कलामें कुशल था। पहले तो उसने चूहेकी बातको मन-ही-मन दुहराया; फिर अपनी दशापर दृष्टिपात करके उसने सामनीतिसे ही उस चूहेकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ६६ ॥

ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो मणिवैदूर्यलोचनः । मूषिकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽब्रवीत् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर जिसके आगेके दाँत बड़े तीखे थे और दोनों नेत्र नीलमके समान चमक रहे थे, उस लोमश नामक बिलावने चूहेकी ओर किंचिद् दृष्टिपात करके इस प्रकार कहा

— ।। ६७ ।।
नन्दामि सौम्य भद्रं ते यो मां जीवितुमिच्छसि ।
श्रेयश्च यदि जानीषे क्रियतां मा विचारय ।। ६८ ।।
‘सौम्य! मैं तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, जो कि तुम मुझे जीवन प्रदान करना चाहते हो। यदि हमारे कल्याणका उपाय जानते हो तो इसे अवश्य करो, कोई अन्यथा विचार मनमें न लाओ ।। ६८ ।।
अहं हि भृशमापन्नस्त्वमापन्नपरो मम ।
द्वयोरापन्नयोः संधिः क्रियतां मा चिराय च ।। ६९ ।।
‘मैं भारी विपत्तिमें फँसा हूँ और तुम भी महान् संकटमें पड़े हुए हो। इस प्रकार आपत्तिमें पड़े हुए हम दोनोंको संधि कर लेनी चाहिये। इसमें विलम्ब न हो ।। ६९ ।।
विधास्ये प्राप्तकालं यत् कार्यं सिद्धिकरं विभो ।
मयि कृच्छ्राद् विनिर्मुक्ते न विनङ्क्ष्यति ते कृतम् ।। ७० ।।
‘प्रभो! समय आनेपर तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि करनेवाला जो भी कार्य होगा, उसे अवश्य करूँगा। इस संकटसे मेरे मुक्त हो जानेपर तुम्हारा किया हुआ उपकार नष्ट नहीं होगा। मैं इसका बदला अवश्य चुकाऊँगा ।। ७० ।।
न्यस्तमानोऽस्मि भक्तोऽस्मि शिष्यस्त्वद्धितकृत् तथा ।
निदेशवशवर्ती च भवन्तं शरणं गतः ।। ७१ ।।
‘इस समय मेरा मान भंग हो चुका है। मैं तुम्हारा भक्त और शिष्य हो गया हूँ। तुम्हारे हितका साधन करूँगा और सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहूँगा। मैं सब प्रकारसे तुम्हारी शरणमें आ गया हूँ’ ।। ७१ ।।
इत्येवमुक्तः पलितो मार्जारं वशमागतम् ।
वाक्यं हितमुवाचेदमभिनीतार्थमर्थवित् ।। ७२ ।।
बिलावके ऐसा कहनेपर अपने प्रयोजनको समझनेवाले पलितने वशमें आये हुए उस बिलावसे यह अभिप्रायपूर्ण हितकर बात कही— ।। ७२ ।।
उदारं यद् भवानाह नैतच्चित्रं भवद्विधे ।
विहितो यस्तु मार्गो मे हितार्थं शृणु तं मम ।। ७३ ।।
‘भैया बिलाव! आपने जो उदारतापूर्ण वचन कहा है, यह आप-जैसे बुद्धिमान्‌के लिये आश्चर्यकी बात नहीं है। मैंने दोनोंके हितके लिये जो बात निर्धारित की है, वह मुझसे सुनो ।। ७३ ।।
अहं त्वानुप्रवेक्ष्यामि नकुलान्मे महत् भयम् ।
त्रायस्व भो मा वधीस्त्वं शक्तोऽस्मि तव रक्षणे ।। ७४ ।।
‘भैया! इस नेवलेसे मुझे बड़ा डर लग रहा है। इसलिये मैं तुम्हारे पीछे इस जालमें प्रवेश कर जाऊँगा, परंतु दादा! तुम मुझे मार न डालना, बचा लेना; क्योंकि जीवित रहनेपर