महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२८३-
त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
अस्मिन् वृत्रवधे देव विवक्षा मम जायते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! देव! इस वृत्रवधके प्रसंगमें मुझे कुछ पूछनेकी इच्छा हो रही है ॥ १ ॥
ज्वरेण मोहितो वृत्रः कथितस्ते जनाधिप ।
निहतो वासवेनेह वज्रेणेति तदानघ ॥ २ ॥
निष्पाप जनेश्वर! आपने कहा है कि वृत्रासुर ज्वरसे मोहित हो गया था, उसी अवस्थामें इन्द्रने अपने वज्रसे उसे मार डाला ॥ २ ॥
कथमेष महाप्राज्ञ ज्वरः प्रादुर्बभौ कुतः ।
ज्वरोत्पत्तिं निपुणतः श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ ३ ॥
महामते! प्रभो! यह ज्वर कैसे और कहाँसे उत्पन्न हुआ? मैं ज्वरकी उत्पत्तिका प्रसंग भलीभाँति सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन् ज्वरस्येमं सम्भवं लोकविश्रुतम् ।
विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशश्चैव भारत ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! ज्वरकी उत्पत्तिका यह वृत्तान्त सम्पूर्ण लोकोंमें प्रसिद्ध है, सुनो। भारत! यह प्रसंग जैसा है, उसे मैं विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
पुरा मेरोर्महाराज शृङ्गं त्रैलोक्यपूजितम् ।
ज्योतिष्कं नाम सावित्रं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ ५ ॥
अप्रमेयमनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत ।
भरतनन्दन! महाराज! पूर्वकालमें सुमेरु पर्वतका ज्योतिष्क नामसे प्रसिद्ध एक शिखर था, जो सविता (सूर्य) देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण सावित्र कहलाता था। वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, अप्रमेय, समस्त लोकोंके लिये अगम्य और तीनों लोकोंद्वारा पूजित था ॥
तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते ॥ ६ ॥
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो बभूव ह ।
शैलराजसुता चास्य नित्यं पार्श्वे स्थिता बभौ ॥ ७ ॥
सुवर्णमय धातुसे विभूषित उस पर्वतशिखरके तटपर बैठे हुए महादेवजी उसी प्रकार अपूर्व शोभा पाते थे मानो किसी सुन्दर पर्यङ्कपर बैठे हों। वहीं प्रतिदिन उनके वामपार्श्वमें रहकर गिरिराजनन्दिनी भगवती पार्वती भी अनुपम शोभा पाती थीं ॥ ६-७ ॥
तथा देवा महात्मानो वसवश्चामितौजसः ।
तथैव च महात्मानावश्विनौ भिषजां वरौ ।
तथा वैश्रवणो राजा गुह्यकैरभिसंवृतः ॥ ८ ॥
यक्षाणामीश्वरः श्रीमान् कैलासनिलयः प्रभुः ।
(शङ्खपद्मनिधिभ्यां च ऋद्ध्या परमया सह ।)
उपासन्त महात्मानमुशना च महामुनिः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार वहाँ बहुत-से महामनस्वी देवता, अमित तेजस्वी वसुगण, चिकित्सकोंमें श्रेष्ठ महामना अश्विनीकुमार, शंखनिधि, पद्मनिधि तथा उत्तम ऋद्धिके साथ गुह्यकोंसे घिरे हुए कैलासवासी यक्षपति प्रभुतासम्पन्न श्रीमान् राजा कुबेर तथा महामुनि शुक्राचार्य—ये सभी परमात्मा महादेवजीकी उपासना किया करते थे ॥ ८-९ ॥
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव च महर्षयः ।
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा देवर्षयोऽपरे ॥ १० ॥
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ ।
अप्सरोगणसंघाश्च समाजग्मुरनेकणः ॥ ११ ॥
सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि तथा अन्य देवर्षि, विश्वावसु गन्धर्व, नारद, पर्वत और अप्सराओंके अनेक समुदाय उस पर्वतपर महादेवजीकी आराधनाके लिये आया करते थे ॥ १०-११ ॥
ववौ सुखः शिवो वायुर्नानागन्धवहः शुचिः ।
सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो द्रुमास्तथा ॥ १२ ॥
वहाँ नाना प्रकारकी सुगन्धको फैलानेवाली, पवित्र, सुखद एवं मंगलमयी वायु चलती रहती थी। सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित होनेवाले खिले हुए वृक्ष उस शिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १२ ॥
तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः ।
महादेवं पशुपतिं पर्युपासन्त भारत ॥ १३ ॥
भारत! तपस्याके धनी सिद्ध और विद्याधर भी वहाँ पशुपति महादेवजीकी उपासनामें तत्पर रहते थे ॥
भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ ।
राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महाबलाः ॥ १४ ॥
बहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यताः ।
देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमाः ॥ १५ ॥ महाराज! अनेक रूप धारण करनेवाले भूत, महाभयंकर राक्षस, महाबली और बहुत-से रूप धारण करनेवाले पिशाच, जो महादेवजीके अनुचर थे, वहाँ हर्षमें भरकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये खड़े रहते थे। वे सब-के-सब अग्निके समान तेजस्वी थे ॥
नन्दी च भगवांस्तत्र देवस्यानुमते स्थितः । प्रगृह्य ज्वलितं शूलं दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ १६ ॥ महादेवजीकी आज्ञासे भगवान् नन्दी अपने तेजसे देदीप्यमान हो हाथमें प्रज्वलित शूल लेकर वहाँ खड़े रहते थे ॥ १६ ॥
गङ्गा च सरितां श्रेष्ठा सर्वतीर्थजलोद्भवा । पर्युपासत तं देवं रूपिणी कुरुनन्दन ॥ १७ ॥ कुरुनन्दन! समस्त तीर्थोंके जलोंको लेकर प्रकट हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजी वहाँ दिव्यरूप धारण करके देवाधिदेव महादेवजीकी आराधना करती थीं ॥ १७ ॥
स एवं भगवांस्तत्र पूज्यमानः सुरर्षिभिः । देवैश्च सुमहातेजा महादेवो व्यतिष्ठत ॥ १८ ॥ इस प्रकार देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित होते हुए महातेजस्वी भगवान् महादेव वहाँ नित्य विराजमान थे ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य दक्षो नाम प्रजापतिः । पूर्वोक्तेन विधानेन यक्ष्यमाणोऽन्वपद्यत ॥ १९ ॥ कुछ कालके अनन्तर दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापतिने पूर्वोक्त शास्त्रीय विधानके अनुसार यज्ञ करनेका संकल्प लेकर उसके लिये तैयारी आरम्भ कर दी ॥ १९ ॥
ततस्तस्य मखं देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । गमनाय समागम्य बुद्धिमापेदिरे तदा ॥ २० ॥ उस समय इन्द्र आदि सब देवताओंने दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें जानेके लिये परस्पर मिलकर निश्चय किया ॥
ते विमानैर्महात्मानो ज्वलनार्कसमप्रभैः । देवस्यानुमतेऽगच्छन् गङ्गाद्वारमिति श्रुतिः ॥ २१ ॥ वे महामनस्वी देवता सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विमानोंपर बैठकर महादेवजीकी आज्ञा ले गङ्गाद्वार (हरिद्वार) को गये—यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २१ ॥
प्रस्थिता देवता दृष्ट्वा शैलराजसुता तदा । उवाच वचनं साध्वी देवं पशुपतिं पतिम् ॥ २२ ॥ देवताओंको प्रस्थित हुआ देख सती साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमाने अपने स्वामी पशुपति महादेवजीसे पूछा— ॥ २२ ॥
भगवन् क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः । ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम् ॥ २३ ॥ 'भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जा रहे हैं? तत्त्वज्ञ परमेश्वर! ठीक-ठीक बताइये। मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है' ॥ २३ ॥
महेश्वर उवाच
दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः । हयमेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ॥ २४ ॥ महेश्वरने कहा— महाभागे! श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष अश्वमेध यज्ञ करते हैं; उसीमें ये सब देवता जा रहे हैं ॥
उमोवाच
यज्ञमेतं महादेव किमर्थं नाधिगच्छसि । केन वा प्रतिषेधेन गमनं ते न विद्यते ॥ २५ ॥ उमा बोलीं— महादेव! इस यज्ञमें आप क्यों नहीं पधार रहे हैं? किस प्रतिबन्धके कारण आपका वहाँ जाना नहीं हो रहा है? ॥ २५ ॥
महेश्वर उवाच
सुरैरेव महाभागे पूर्वमेतदनुष्ठितम् । यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ॥ २६ ॥ महेश्वरने कहा— महाभागे! देवताओंने ही पहले ऐसा निश्चय किया था। उन्होंने सभी यज्ञोंमेंसे किसीमें भी मेरे लिये भाग नियत नहीं किया ॥ २६ ॥
पूर्वोथायोपपन्नेन मार्गेण वरवर्णिनि । न मे सुराः प्रयच्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ॥ २७ ॥ सुन्दरि! पूर्वनिश्चित नियमके अनुसार धर्मकी दृष्टिसे ही देवतालोग यज्ञमें मुझे भाग नहीं अर्पित करते हैं ॥ २७ ॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेषु प्रभावाभ्यधिको गुणैः । अजय्यश्चाप्यधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिया ॥ २८ ॥ अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः । अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ॥ २९ ॥ उमाने कहा— भगवन्! आप समस्त प्राणियोंमें सबसे अधिक प्रभावशाली, गुणवान्, अजेय, अधृष्य, तेजस्वी, यशस्वी तथा श्रीसम्पन्न हैं। महाभाग! यज्ञमें जो इस प्रकार
आपको भाग देनेका निषेध किया गया है, इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है। अनघ! इस अपमानसे मेरा सारा शरीर काँप रहा है ॥ २८-२९ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा तु सा देवी तदा पशुपतिं पतिम् ।
तूष्णींभूताभवद् राजन् दह्यमानेन चेतसा ॥ ३० ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! अपने पति भगवान् पशुपतिसे ऐसा कहकर पार्वतीदेवी चुप हो गयीं, परंतु उनका हृदय शोकसे दग्ध हो रहा था ॥ ३० ॥
अथ देव्या मतं ज्ञात्वा हृद्गतं यच्चिकीर्षितम् ।
स समाज्ञापयामास तिष्ठ त्वमिति नन्दिनम् ॥ ३१ ॥
पार्वतीदेवीके मनमें क्या है और वे क्या करना चाहती हैं, इस बातको जानकर महादेवजीने नन्दीको आज्ञा दी कि तुम यहीं खड़े रहो ॥ ३१ ॥
ततो योगबलं कृत्वा सर्वयोगेश्वरेश्वरः ।
तं यज्ञं स महातेजा भीमैरनुचरैस्तदा ॥ ३२ ॥
सहसा घातयामास देवदेवः पिनाकधृक् ।
तदनन्तर सम्पूर्ण योगेश्वरोंके भी ईश्वर महातेजस्वी देवाधिदेव पिनाकधारी शिवने योगबलका आश्रय ले अपने भयानक सेवकोंद्वारा उस यज्ञको सहसा नष्ट करा दिया ॥ ३२ १/२ ॥
केचिन्नादानमुञ्चन्त केचिद्धासांश्च चक्रिरे ॥ ३३ ॥
रुधिरेणापरे राजंस्तत्राग्निं समवाकिरन् ।
राजन्! भगवान् शिवके अनुचरोंमेंसे कोई तो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे, किन्हींने अट्टहास करना आस्मभ कर दिया तथा दूसरे यज्ञाग्निको बुझानेके लिये उसपर रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ १/२ ॥
केचिद् यूपान् समुत्पाट्य बभ्रमुर्विकृताननाः ॥ ३४ ॥
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान् ।
कोई विकराल मुखवाले पार्षद यज्ञके यूरोको उखाड़कर वहाँ चारों ओर चक्कर लगाने लगे। दूसरोंने यज्ञके परिचारकोंको अपने मुखका ग्रास बना लिया ॥ ३४ १/२ ॥
ततः स यज्ञो नृपते वध्यमानः समन्ततः ॥ ३५ ॥
आस्थाय मृगरूपं वै खमेवाभ्यगमत् तदा ।
नरेश्वर! इस प्रकार जब सब ओरसे आघात होने लगा, तब वह यज्ञ मृगका रूप धारण करके आकाशकी ओर ही भाग चला ॥ ३५ १/२ ॥
तं तु यज्ञं तथारूपं गच्छन्तमुपलभ्य सः ॥ ३६ ॥
धनुरादाय बाणेन तदान्वसरत प्रभुः ।
यज्ञको मृगका रूप धारण करके भागते देख भगवान् शिवने धनुष हाथमें लेकर अपने बाणके द्वारा उसका पीछा किया।। ३६ १/२ ।।
ततस्तस्य सुरेशस्य क्रोधादमिततेजसः ।। ३७ ।।
ललाटात् प्रसृतो घोरः स्वेदबिन्दुर्भभूव ह ।
तस्मिन् पतितमात्रे च स्वेदबिन्दौ तदा भुवि ।। ३८ ।।
प्रादुर्बभूव सुमहानग्निः कालानलोपमः ।
तत्पश्चात् अमिततेजस्वी देवेश्वर महादेवजीके क्रोधके कारण उनके ललाटसे भयंकर पसीनेकी बूँद प्रकट हुई। उस पसीनेके बिन्दुके पृथ्वीपर पड़ते ही कालाग्निके समान विशाल अग्निपुंजका प्रादुर्भाव हुआ ।।
तत्र चाजायत तदा पुरुषः पुरुषर्षभ ।। ३९ ।।
ह्रस्वोऽतिमात्रं रक्ताक्षो हरिश्मश्रुर्विभीषणः ।
पुरुषप्रवर! उस समय उस आगसे एक नाटा-सा पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसकी आँखें बहुत ही लाल थीं। दाढ़ी और मूँछके बाल भूरे रंगके थे। वह देखनेमें बड़ा डरावना जान पड़ता था ।। ३९ १/२ ।।
ऊर्ध्वकेशोऽतिरोमाङ्गः श्येनोल्लूकस्तथैव च ।। ४० ।।
करालकृष्णवर्णश्च रक्तवासास्तथैव च ।
तं यज्ञं सुमहामत्त्वोऽदहत् कक्षमिवानलः ।। ४१ ।।
उसके केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे। उसके सारे अंग बाज और उल्लूके समान अतिशय रोमावलियोंसे भरे थे। शरीरका रंग काला और विकराल था। उसके वस्त्र लाल रंगके थे। उस महान् शक्तिशाली पुरुषने उस यज्ञको उसी प्रकार दग्ध कर दिया, जैसे आग सूखे काठ या घास फूसके ढेरको जलाकर भस्म कर डालती है ।। ४०-४१ ।।
व्यचरत् सर्वतो देवान् प्राद्रवत् स ऋषींस्तथा ।
देवाश्चाप्याद्रवन् सर्वे ततो भीता दिशो दश ।। ४२ ।।
तत्पश्चात् वह पुरुष सब ओर विचरने लगा और देवताओं तथा ऋषियोंकी ओर दौड़ा। उसे देखकर सब देवता भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ।। ४२ ।।
तेन तस्मिन् विचरता पुरुषेण विशाम्पते ।
पृथिवी ह्यचलद् राजन्नतीव भरतर्षभ ।। ४३ ।।
राजन्! भरतभूषण! प्रजानाथ! उस यज्ञमें विचरते हुए उस पुरुषके पैरोंकी धमकसे यह पृथिवी बड़े जोर-जोरसे काँपने लगी ।। ४३ ।।
हाहाभूतं जगत् सर्वमुपलक्ष्य तदा प्रभुः ।
पितामहो महादेवं दर्शयन् प्रत्यभाषत ।। ४४ ।।
उस समय सारे जगत्में हाहाकार मच गया। यह सब देखकर भगवान् ब्रह्माने महादेवजीको जगत्की यह दुर्दशा दिखाते हुए उनसे इस प्रकार कहा ।। ४४ ।।
ब्रह्मोवाच भवतोऽपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो । क्रियतां प्रतिसंहारः सर्वदेवेश्वर त्वया ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले— सर्वदेवेश्वर! प्रभो! अब आप अपने बढ़े हुए उस क्रोधको शान्त कीजिये। आजसे सब देवता आपको भी यज्ञका भाग दिया करेंगे ॥ ४५ ॥ इमा हि देवताः सर्वा ऋषयश्च परंतप । तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ४६ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले महादेव! ये सब देवता और ऋषि आपके क्रोधसे संतप्त होकर कहीं शान्ति नहीं पा रहे हैं ॥ ४६ ॥ यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात् ते विबुधोत्तम । ज्वरो नामैष धर्मज्ञ लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ ४७ ॥ धर्मज्ञ देवेश्वर! आपके पसीनेसे जो यह पुरुष प्रकट हुआ है, इसका नाम होगा ज्वर। यह समस्त लोकोंमें विचरण करेगा ॥ ४७ ॥ एकीभूतस्य न त्वस्य धारणे तेजसः प्रभो । समर्था सकला पृथ्वी बहुधा सृज्यतामयम् ॥ ४८ ॥ प्रभो! आपका तेजरूप यह ज्वर जबतक एक रूपमें रहेगा, तबतक यह सारी पृथ्वी इसे धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। अतः इसे अनेक रूपोंमें विभक्त कर दीजिये ॥ ४८ ॥ इत्युक्तो ब्रह्मणा देवो भागे चापि प्रकल्पिते । भगवन्तं तथेत्याह ब्रह्माणममितौजसम् ॥ ४९ ॥ जब ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा और यज्ञमें भाग मिलनेकी भी व्यवस्था हो गयी, तब महादेवजी अमिततेजस्वी भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—‘तथास्तु’ ऐसा ही हो ॥ परां च प्रीतिमगमदुत्स्मयंश्च पिनाकधृक् । अवाप च तदा भागं यथोक्तं ब्रह्मणा भवः ॥ ५० ॥ पिनाकधारी शिवको उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई और वे मुस्कराने लगे। जैसा कि ब्रह्माजीने कहा था, उसके अनुसार उन्होंने यज्ञमें भाग प्राप्त कर लिया ॥ ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो बहुधा व्यसृजत् तदा । शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ॥ ५१ ॥ वत्स युधिष्ठिर! उस समय समस्त धर्मोंके ज्ञाता भगवान् शिवने सम्पूर्ण प्राणियोंकी शान्तिके लिये ज्वरको अनेक रूपोंमें बाँट दिया, उसे भी सुन लो ॥ ५१ ॥ शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतु । अपां तु नीलिकां विद्यान्निर्मोकं भुजगेषु च ॥ ५२ ॥ खोरकः सौरभेयाणामूषरं पृथिवीतले ।
पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ।। ५३ ।।
हाथियोंके मस्तकमें जो ताप या पीड़ा होती है, वही उनका ज्वर है। पर्वतोंका ज्वर
शिलाजीतके रूपमें प्रकट होता है। सेवारको पानीका ज्वर समझना चाहिये। सर्पोंका ज्वर
केंचुल है। गाय-बैलोंके खुरोंमें जो खोरक नामवाला रोग होता है, वही उनका ज्वर है।
पृथ्वीका ज्वर ऊसरके रूपमें प्रकट होता है। धर्मज्ञ युधिष्ठिर! पशुओंकी दृष्टि-शक्तिका जो
अवरोध होता है, वह भी उनका ज्वर ही है ।। ५२-५३ ।।
रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च बर्हिणाम् ।
नेत्ररोगः कोकिलस्य ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ।। ५४ ।।
घोड़ोंके गलेके छेदमें जो मांसखण्ड बढ़ जाता है, वही उनका ज्वर है। मोरोंकी
शिखाका निकलना ही उनके लिये ज्वर है। कोकिलका जो नेत्ररोग है, उसे भी महात्मा
शिवने ज्वर बताया है ।। ५४ ।।
अवीनां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् ।
शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ।। ५५ ।।
समस्त भेड़ोंका पित्तभेद भी ज्वर ही है—यह हमारे सुननेमें आया है। समस्त तोतोंके
लिये हिचकीको ही ज्वर बताया गया है ।। ५५ ।।
शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते ।
मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष भारत ।। ५६ ।।
धर्मज्ञ भरतनन्दन! सिंहोंमें थकावटका होना ही ज्वर कहलाता है; परंतु मनुष्योंमें यह
ज्वरके नामसे ही प्रसिद्ध है ।।
मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् ।
एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः ।। ५७ ।।
नमस्यश्चैव मान्यश्च सर्वप्राणिभिरीश्वरः ।
अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभृतां वरः ।। ५८ ।।
भगवान् महेश्वरका तेजरूप यह ज्वर अत्यन्त दारुण है। यह मृत्युकालमें, जन्मके
समय तथा बीचमें भी मनुष्योंके शरीरमें प्रवेश कर जाता है। यह सर्वसमर्थ माहेश्वर ज्वर
समस्त प्राणियोंके लिये वन्दनीय और माननीय है। इसीने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरके
शरीरमें प्रवेश किया था ।। ५७-५८ ।।
व्यजृम्भत ततः शक्रस्तस्मै वज्रमवासृजत् ।
प्रविश्य वज्रं वृत्रं च दारयामास भारत ।। ५९ ।।
भारत! उस ज्वरसे पीड़ित होकर जब वह जँभाई लेने लगा, उसी समय इन्द्रने उसपर
वज्रका प्रहार किया। वज्रने उसके शरीरमें घुसकर उसे चीर डाला ।। ५९ ।।
दारितश्च स वज्रेण महायोगी महासुरः ।
जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ।। ६० ।।
वज्रसे विदीर्ण हुआ महायोगी एवं महान् असुर वृत्र अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके परम धामको चला गया ।। ६० ।।
विष्णुभक्त्या हि तेनेदं जगद् व्याप्तमभूत् तदा ।
तस्माच्च निहतो युद्धे विष्णोः स्थानमवाप्तवान् ।। ६१ ।।
भगवान् विष्णुकी भक्तिके प्रभावसे ही उसने अपनी विशाल कायाद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर लिया था। अतः युद्धमें मारे जानेपर उसने विष्णुधाम प्राप्त कर लिया ।। ६१ ।।
इत्येष वृत्रमाश्रित्य ज्वरस्य महतो मया ।
विस्तरः कथितः पुत्र किमन्यत् प्रब्रवीमि ते ।। ६२ ।।
बेटा! इस प्रकार वृत्रासुरके वधके प्रसंगसे मैंने महान् माहेश्वर ज्वरकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। अब तुमसे और क्या कहूँ? ।। ६२ ।।
इमां ज्वरोत्पत्तिमदीनमानसः
पठेत् सदा यः सुसमाहितो नरः ।
विमुक्तरोगः स सुखी मुदा युतो
लभेत कामान् स यथामनीषितान् ।। ६३ ।।
जो उदारचित्त एवं एकाग्र होकर ज्वरकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको सदा पढ़ता है, वह मनुष्य रोगमुक्त, सुखी एवं प्रसन्न होकर मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। ६३ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ज्वरोत्पत्तिर्नाम त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ज्वरकी उत्पत्तिविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६३ १/२ श्लोक हैं)
२८४-
चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा
जनमेजय उवाच
प्राचेतसस्य दक्षस्य कथं वैवस्वतेऽन्तरे ।
विनाशमगमद् ब्रह्मन् हयमेधः प्रजापतेः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! वैवस्वत मन्वन्तरमें प्रचेताओेंके पुत्र दक्षप्रजापतिका अश्वमेध यज्ञ कैसे नष्ट हो गया? ॥ १ ॥
देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः ।
प्रसादात् तस्य दक्षेण स यज्ञः संधितः कथम् ।
एतद् वेदितुमिच्छेयं तन्मे ब्रूहि यथातथम् ॥ २ ॥
दक्षके यज्ञमें मेरा आवाहन न होना पार्वतीके दुःखका कारण बन गया है—यह जानकर भगवान् शंकर, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं, जब कुपित हो उठे, तब फिर उन्हींकी कृपापूर्ण प्रसन्नतासे दक्ष-प्रजापतिका यह यज्ञ कैसे सम्पन्न हुआ? मैं यह वृत्तान्त जानना चाहता हूँ, आप इसे यथार्थ रूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुरा हिमवतः पृष्ठे दक्षो वै यज्ञमाहरत् ।
गङ्गाद्वारे शुभे देशे ऋषिसिद्धनिषेविते ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— प्राचीन कालकी बात है—हिमालयके पार्श्ववर्ती गङ्गाद्वार (हरिद्वार) के शुभ देशमें, जहाँ ऋषियों तथा सिद्ध पुरुषोंका निवास है, प्रजापति दक्षने अपने यज्ञका आयोजन किया था ॥ ३ ॥
गन्धर्वाप्सरसाकीर्णे नानाद्रुमलतावृते ।
ऋषिसङ्घैः परिवृतं दक्षं धर्मभृतां वरम् ॥ ४ ॥
पृथिव्यामन्तरिक्षे च ये च स्वर्लोकवासिनः ।
सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा उपतस्थुः प्रजापतिम् ॥ ५ ॥
वह स्थान गन्धर्वों और अप्सराओंसे भरा था। भाँति-भाँतिके वृक्षसमूह और लताएँ वहाँ सब ओर छा रही थीं। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष ऋषिसमुदायसे घिरे हुए बैठे।
उस समय पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकके निवासी भी वहाँ जुटे हुए थे और वे सब-के-सब हाथ जोड़कर प्रजापतिको प्रणाम करके उनकी सेवामें खड़े थे॥ ४-५॥ देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः। हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ तुम्बुरुर्नारदस्तथा॥ ६॥ विश्वावसुर्विश्वसेनो गन्धर्वाप्सरसस्तथा। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, विश्वसेन तथा दूसरे-दूसरे गन्धर्व और अप्सराएँ वहाँ उपस्थित थीं॥ ६१/२॥
आदित्या वसवो रुद्राः साध्याः सह मरुद्गणैः॥ ७॥ इन्द्रेण सहिताः सर्वे आगता यज्ञभागिनः। आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य और मरुद्गण—ये सब-के-सब इन्द्रके साथ यज्ञमें भाग लेनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ७१/२॥
ऊष्मपाः सोमपाश्चैव धूमपा आज्यपास्तथा॥ ८॥ ऋषयः पितरश्चैव आगता ब्रह्मणा सह। ऊष्मपा (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले), सोमपा (सोमरस पीनेवाले), धूमपा (यज्ञमें धूम-पान करनेवाले) और आज्यपा (घृत-पान करनेवाले) पितर और ऋषि भी ब्रह्माजीके साथ उस यज्ञमें पधारे थे॥
एते चान्ये च बहवो भूतग्रामाश्चतुर्विधाः॥ ९॥ जरायुजाण्डजाश्चैव सहसा स्वेदजोद्भिदैः। ये तथा और भी बहुत-से चतुर्विध प्राणिसमुदाय जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज वहाँ उपस्थित हुए थे॥ ९१/२॥
आहूता मन्त्रिताः सर्वे देवाश्च सह पत्निभिः॥ १०॥ विराजन्ते विमानस्था दीप्यमाना इवाग्नयः। जिन्हें निमन्त्रित करके बुलाया गया था, वे सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ विमानपर बैठकर आते समय प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे॥
तान् दृष्ट्वा मन्युनाऽऽविष्टो दधीचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ११॥ नायं यज्ञो न वा धर्मो यत्र रुद्रो न इज्यते। वधबन्धं प्रपन्ना वै किं नु कालस्य पर्ययः॥ १२॥ (महामुनि दधीचि भी उस यज्ञमण्डपमें उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि देवता और दानव आदिका समाज तो खूब जुटा हुआ है; परंतु भगवान् शंकर दिखायी नहीं देते हैं। जान पड़ता है उनका आवाहन नहीं किया गया है। इससे उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ।) उन सब देवताओंको वहाँ उपस्थित देख दधीचि क्रोधमें भर गये और बोले—'सज्जनो! जिसमें भगवान् शिवकी पूजा नहीं होती है, वह न यज्ञ है और न धर्म। यह यज्ञ भी भगवान् शिवके
बिना यज्ञ कहनेयोग्य नहीं रहा। इसका आयोजन करनेवाले लोग वध और बन्धनकी
दुर्दशामें पड़नेवाले हैं। अहो! कालका कैसा उलट-फेर है ।। ११-१२ ।।
किंनु मोहान्न पश्यन्ति विनाशं पर्युपस्थितम् ।
उपस्थितं महाघोरं न बुध्यन्ति महाध्वरे ॥ १३ ॥
'इस महायज्ञमें अत्यन्त घोर विनाश उपस्थित होनेवाला है; किंतु मोहवश कोई देख
नहीं रहे हैं—समझ नहीं पाते हैं' ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वा स महायोगी पश्यति ध्यानचक्षुषा ।
स पश्यति महादेवं देवीं च वरदां शुभाम् ॥ १४ ॥
नारदं च महात्मानं तस्या देव्याः समीपतः ।
संतोषं परमं लेभे इति निश्चित्य योगवित् ॥ १५ ॥
एकमन्त्रास्तु ते सर्वे येनेशो न निमन्त्रितः ।
ऐसा कहकर महायोगी दधीचिने जब ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें भगवान् शंकर
और मंगलमयी वरदायिनी देवी पार्वतीजीका दर्शन हुआ। उनके पास ही महात्मा नारदजी
भी दिखायी दिये, इससे उनको बड़ा संतोष हुआ। योगवेत्ता दधीचिको यह निश्चय हो गया कि ये सब देवता एकमत हो गये हैं। इसीलिये इन्होंने महेश्वरको यहाँ निमन्त्रित नहीं किया है ।।
तस्माद् देशादपक्रम्य दधीचिर्वाक्यमब्रवीत् ।। १६ ।।
अपूज्यपूजनाच्चैव पूज्यानां चाप्यपूजनात् ।
नृघातकसमं पापं शश्वत् प्राप्नोति मानवः ।। १७ ।।
यह बात ध्यानमें आते ही दधीचि यज्ञशालासे अलग हो गये और दूर जाकर कहने लगे—‘सज्जनो! अपूजनीय पुरुषकी पूजा करनेसे और पूजनीय महापुरुषकी पूजा न करनेसे मनुष्य सदा ही नरहत्याके समान पापका भागी होता है ।। १६-१७ ।।
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ।
देवतानामृषीणां च मध्ये सत्यं ब्रवीम्यहम् ।। १८ ।।
‘मैंने पहले कभी झूठ नहीं कहा है और आगे भी कभी झूठ नहीं कहूँगा। इन देवताओं तथा ऋषियोंके बीचमें मैं सच्ची बात कह रहा हूँ’ ।। १८ ।।
आगतं पशुभर्तारं स्रष्टारं जगतः पतिम् ।
अध्वरे ह्यग्रभोक्तारं सर्वेषां पश्यत प्रभुम् ।। १९ ।।
‘भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले, सम्पूर्ण जीवोंके रक्षक, स्वामी तथा सबके प्रभु हैं। तुम सब लोग देख लेना, वे इस यज्ञमें प्रधान भोक्ताके रूपमें उपस्थित होंगे’ ।। १९ ।।
दक्ष उवाच
सन्ति नो बहवो रुद्राः शूलहस्ताः कपर्दिनः ।
एकादशस्थानगता नाहं वेद्मि महेश्वरम् ।। २० ।।
**दक्षने कहा—**हाथोंमें शूल और मस्तकपर जटाजूट धारण करनेवाले बहुत-से रुद्र हमारे यहाँ रहते हैं। वे ग्यारह हैं और ग्यारह स्थानोंमें निवास करते हैं। उनके सिवा दूसरे किसी महेश्वरको मैं नहीं जानता ।। २० ।।
दधीचिरुवाच
सर्वेषामेव मन्त्रोऽयं येनासौ न निमन्त्रितः ।
यथाहं शंकरादूर्ध्वं नान्यं पश्यामि दैवतम् ।
तथा दक्षस्य विपुलो यज्ञोऽयं न भविष्यति ।। २१ ।।
**दधीचि बोले—**मैं जानता हूँ, आप सब लोगोंका ही यह मिल-जुलकर किया हुआ निश्चय है। इसीलिये उन महादेवजीको निमन्त्रित नहीं किया गया है; परंतु मैं भगवान् शंकरसे बढ़कर दूसरे किसी देवताको नहीं देखता। यदि यह सत्य है तो प्रजापति दक्षका यह विशाल यज्ञ निश्चय ही नष्ट हो जायगा ।। २१ ।।
दक्ष उवाच
एतन्मखेशाय सुवर्णपात्रे हविः समस्तं विधिमन्त्रपूतम् । विष्णोर्नयाम्यप्रतिमस्य भागं प्रभुर्विभुश्चाहवनीय एषः ॥ २२ ॥ **दक्षने कहा—**महर्षे! देखो, विधिपूर्वक मन्त्रसे पवित्र की हुई यह सारी हवि सुवर्णके पात्रमें रखी हुई है। यह यज्ञेश्वर श्रीविष्णुको समर्पित है। भगवान् विष्णुकी कहीं समता नहीं है। मैं उन्हींको हविष्यका यह भाग अर्पित करूँगा। ये भगवान् विष्णु ही सर्वसमर्थ, व्यापक और यज्ञभाग अर्पित करनेके योग्य हैं ॥ २२ ॥
देव्युवाच
किं नाम दानं नियमं तपो वा कुर्यामहं येन पतिर्ममाद्य । लभेत भागं भगवानचिन्त्यो ह्यर्धं तथा भागमथो तृतीयम् ॥ २३ ॥ (दूसरी ओर कैलास पर्वतपर) पार्वती देवी (बहुत दुखी होकर) कह रही थीं—आह, मैं कौन-सा व्रत, दान या तप करूँ, जिसके प्रभावसे आज मेरे पतिदेव अचिन्त्य भगवान् शंकरको यज्ञका आधा अथवा तिहाई भाग अवश्य प्राप्त हो?' ॥ २३ ॥
एवं ब्रुवाणां भगवान् स पत्नीं प्रहृष्टरूपः क्षुभितामुवाच । न वेत्सि मां देवि कृशोदराङ्गि किं नाम युक्तं वचनं मखेशे ॥ २४ ॥ क्षोभमें भरकर इस प्रकार बोलती हुई पत्नीकी बात सुनकर भगवान् शंकर हर्षसे खिल उठे और इस प्रकार बोले—‘देवि! कृशोदराङ्गि! तू मुझे नहीं जानती, मैं सम्पूर्ण यज्ञोंका ईश्वर हूँ। मेरे विषयमें किस प्रकारके वचन कहना चाहिये, यह भी तुम नहीं जानती ॥ २४ ॥
अहं विजानामि विशालनेत्रे ध्यानेन हीना न विदन्त्यसन्तः । तवाद्य मोहेन च सेन्द्रदेवा लोकास्त्रयः सर्वत एव मूढाः ॥ २५ ॥ ‘पर मैं सब कुछ जानता हूँ। विशाललोचने! जिनका चित्त एकाग्र नहीं है, वे ध्यानशून्य असाधु पुरुष मेरे स्वरूपको नहीं जानते। आज तुम्हारे इस मोहसे इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोक सब ओरसे किंकर्तव्य-विमूढ हो गये हैं ॥ २५ ॥
मामध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरं सामगाश्चोपगान्ति । मां ब्राह्मणा ब्रह्मविदो यजन्ते ममाध्वर्यवः कल्पयन्ते च भागम् ॥ २६ ॥ 'यज्ञमें प्रस्तोतालोग मेरी स्तुति करते हैं। सामगान करनेवाले ब्राह्मण रथन्तर सामके रूपमें मेरी ही महिमाका गान करते हैं। वेदवेत्ता विप्र मेरा ही यजन करते और ऋत्विज्लोग यज्ञमें मुझे ही भाग अर्पित करते हैं' ॥ २६ ॥
देव्युवाच
सुप्राकृतोऽपि पुरुषः सर्वः स्त्रीजनसंसदि । स्तौति गर्वायते चापि स्वमात्मानं न संशयः ॥ २७ ॥ देवीने कहा—नाथ! अत्यन्त गँवार पुरुष भी क्यों न हो, प्रायः सभी स्त्रियोंके बीचमें अपनी प्रशंसाके गीत गाते और अपनी श्रेष्ठतापर गर्व करते हैं—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ २७ ॥
श्रीभगवानुवाच
नात्मानं स्तौमि देवेशि पश्य मे तनुमध्यमे । यं स्रक्ष्यामि वरारोहे यागार्थे वरवर्णिनि ॥ २८ ॥ श्रीभगवान् शिव बोले—देवेश्वरि! तनुमध्यमे! वरारोहे! वरवर्णिनि! मैं अपनी प्रशंसा नहीं करता हूँ। मेरा प्रभाव देखो। जिसके कारण तुम्हें दुःख हुआ है, उस यज्ञको नष्ट करनेके लिये मैं जिस वीर पुरुषकी सृष्टि कर रहा हूँ' उसपर दृष्टिपात करो ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् पत्नीमुमां प्राणैरपि प्रियाम् । सोऽसृजद् भगवान् वक्त्राद् भूतं घोरं प्रहर्षणम् ॥ २९ ॥ अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पत्नी उमासे ऐसी बात कहकर भगवान् महेश्वरने अपने मुखसे एक अद्भुत एवं भयंकर प्राणीको प्रकट किया, जो उनका हर्ष बढ़ानेवाला था ॥ २९ ॥
तमुवाचाक्षिप मखं दक्षस्येति महेश्वरः । ततो वक्त्राद् विमुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया ॥ ३० ॥ देव्या मन्युव्यपोहार्थं हतो दक्षस्य वै क्रतुः । महेश्वरने उस पुरुषको आज्ञा दी—'वीर! तुम दक्षके यज्ञका नाश कर दो।' फिर तो भगवान्के मुखसे निकले हुए उस सिंहके समान पराक्रमी एक ही वीरने पार्वतीदेवीके दुःख और क्रोधका निवारण करनेके लिये खेलही खेलमें प्रजापति दक्षके उस यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ ३० १/२ ॥
मन्युना च महाभीमा महाकाली महेश्वरी ॥ ३१ ॥
आत्मनः कर्मसाक्षित्वे तेन सार्धं सहानुगा ।
उस समय भवानीके क्रोधसे प्रकट हुई अत्यन्त भयंकर रूपवाली महाकाली महेश्वरीने भी अपना पराक्रम दिखानेके लिये सेवकोंसहित उस वीरके साथ प्रस्थान किया था ।। ३१ १/३ ।।
देवस्यानुमतं मत्वा प्रणम्य शिरसा ततः ॥ ३२ ॥
आत्मनः सदृशः शौर्याद् बलरूपसमन्वितः ।
स एव भगवान् क्रोधः प्रतिरूपसमन्वितः ॥ ३३ ॥
अनन्तबलवीर्यश्च अनन्तबलपौरुषः ।
वीरभद्र इति ख्यातो देव्या मन्युप्रमार्जकः ॥ ३४ ॥
(वीरभद्रने किस प्रकार उस यज्ञका विध्वंस किया, यह प्रसंग आगे बताया जाता है—) महादेवजीकी अनुमति जानकर उसने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। वह वीर अपने ही समान शौर्य, रूप और बलसे सम्पन्न था (उसकी कहीं उपमा नहीं थी)। भगवान् शिवका वह सब कुछ करनेमें समर्थ क्रोध ही मूर्तिमान् होकर उस वीरके रूपमें प्रकट हुआ था। उसके बल, वीर्य, शक्ति और पुरुषार्थका कहीं अन्त नहीं था। पार्वतीदेवीके क्रोध और खेदका निवारण करनेवाला वह पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ ।। ३२—३४ ।।
सोऽसृजद् रोमकूपेभ्यो रौम्यान् नाम गणेश्वरान् ।
रुद्रतुल्या गणा रौद्रा रुद्रवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥
उसने अपने रोमकूपोंसे सैन्य नामवाले गणेश्वरोंको प्रकट किया, जो रुद्रके समान ही होनेके कारण रौद्रगण कहलाये। उन सबके बल-पराक्रम भी रुद्रके ही समान थे ।। ३५ ।।
ते निपेतुरतस्तूर्णं दक्षयज्ञविहिंसया ।
भीमरूपा महाकायाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३६ ॥
ततः किलकिलाशब्दैराकाशं पूरयन्निव ।
वे भयंकर रूपधारी विशालकाय रुद्रगण सैकड़ों और हजारोंकी टोलियाँ बनाकर अपनी किलकारियोंसे आकाशको गुँजाते हुए-से दक्षयज्ञका विध्वंस करनेके लिये बड़ी तेजीके साथ टूट पड़े ।। ३६ १/३ ।।
तेन शब्देन महता त्रस्तास्तत्र दिवौकसः ॥ ३७ ॥
पर्वताश्च व्यशीर्यन्त चकम्पे च वसुंधरा ।
मारुताश्चैव घूर्णन्ते चुक्षुभे वरुणालयः ॥ ३८ ॥
उस महाभयंकर कोलाहलसे उस यज्ञमें पधारे हुए समस्त देवता व्याकुल हो उठे। पर्वत टूक-टूक होकर बिखर गये। धरती डोलने लगी, आँधी चलने लगी और समुद्रमें तूफान आ गया ।। ३७-३८ ।।
अग्नयो नैव दीप्यन्ते नैव दीप्यति भास्करः ।
ग्रहा नैव प्रकाशन्ते नक्षत्राणि न चन्द्रमाः ॥ ३९ ॥
ऋषयो न प्रकाशन्ते न देवा न च मानुषाः ।
एवं तु तिमिरीभूते निर्दहन्त्यपमानिताः ।। ४० ।।
उस समय आग नहीं जलती थी, सूर्यका प्रकाश फीका पड़ गया; ग्रह, नक्षत्र और
चन्द्रमा भी निस्तेज हो गये। इस प्रकार वहाँ चारों ओर अँधेरा छा गया। देवता, ऋषि और
मनुष्य—सभी छिप गये—कोई दिखायी नहीं देते थे। दक्षसे अपमानित हुए रुद्रगण
यज्ञशालामें सब ओर आग लगाने लगे ।। ३९-४० ।।
प्रहरन्त्यपरे घोरा यूपानुत्पाटयन्ति च ।
प्रमर्दन्ति तथा चान्ये विमर्दन्ति तथा परे ।। ४१ ।।
दूसरे भयंकर भूत उसी यज्ञके सदस्योंको पीटने लगे। कुछ यूप उखाड़ने लगे। बहुतेरे
रुद्रगण यज्ञकी सामग्रीको कुचलने और रौंदने लगे ।। ४१ ।।
आधावन्ति प्रधावन्ति वायुवेगा मनोजवाः ।
चूर्णयन्ते यज्ञपात्राणि दिव्यान्याभरणानि च ।। ४२ ।।
वायु और मनके समान वेगशाली कितने ही पार्षद इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। कुछ
लोग यज्ञके उपयोगमें आनेवाले पात्रों तथा दिव्य आभूषणोंको चूर-चूर कर रहे थे ।। ४२ ।।
विशीर्यमाणा दृश्यन्ते तारा इव नभस्तले ।
दिव्यान्नपानभक्ष्याणां राशयः पर्वतोपमाः ।। ४३ ।।
उनके बिखरकर गिरते हुए टुकड़े आकाशमें छिटके हुए तारोंके समान दिखायी देते थे।
उस यज्ञभूमिमें जहाँ-तहाँ दिव्य अन्न, पान और भक्ष्य पदार्थोंके पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते
थे ।। ४३ ।।
क्षीरनद्योऽथ दृश्यते घृतपायसकर्दमाः ।
दधिमण्डोदका दिव्याः खण्डशर्करवालुकाः ।। ४४ ।।
दूधकी दिव्य नदियाँ वहाँ बहती दीखती थीं, घी और खीरकी कीच जम गयी थी, दही
और मट्ठा पानीकी तरह बह रहे थे तथा खाँड़ और शक्कर वहाँ बालूकी भाँति बिछ गये
थे ।। ४४ ।।
षड् रसान् निवहन्त्येता गुडकुल्या मनोरमाः ।
उच्चावचानि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च ।। ४५ ।।
ये सब नदियाँ षड्रस भोजन प्रवाहित कर रही थीं। गुड़के रसकी छोटी-छोटी मनोरम
नहरें दृष्टिगोचर होती थीं। नाना प्रकारके फलोंके गूदे और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-पदार्थ
प्रस्तुत किये गये थे ।। ४५ ।।
पानकानि च दिव्यानि लेह्यचोष्याणि यानि च ।
भुञ्जते विविधैर्वक्त्रैर्विलम्पन्त्याक्षिपन्ति च ।। ४६ ।।
दिव्य पेय पदार्थ, लेह्य और चोष्य आदि जो-जो भोजन वहाँ उपलब्ध हुए, उन सबको
वे रुद्रगण अपने विविध मुखोंद्वारा खाने, नष्ट करने और चारों ओर छींटने तथा फेंकने
लगे ॥ ४६ ॥ रुद्रकोपान्महाकायाः कालाग्निसदृशोपमाः । क्षोभयन् सुरसैन्यानि भीषयन्तः समन्ततः ॥ ४७ ॥ वे विशालकाय भूत रुद्रदेवके क्रोधसे कालाग्निके समान होकर देवताओंकी सेनाओंको चारों ओरसे डराने और क्षुब्ध करने लगे ॥ ४७ ॥ क्रीडन्ति विविधाकाराश्चिक्षिपुः सुरयोषितः । रुद्रक्रोधात् प्रयत्नेन सर्वदेवैः सुरक्षितम् ॥ ४८ ॥ तं यज्ञमदहच्छीघ्रं रुद्रकर्मा समन्ततः । अनेक प्रकारकी आकृतिवाले वे रुद्रगण खेलते-कूदते और देवांगनाओंको दूर फेंक देते थे। यद्यपि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर प्रयत्नपूर्वक उस यज्ञकी रक्षा की थी तथापि रुद्रकर्मा वीरभद्रने रुद्रदेवके क्रोधसे प्रेरित हो सब ओरसे शीघ्र ही उसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४८ १/२ ॥ चकार भैरवं नादं सर्वभूतभयंकरम् ॥ ४९ ॥ छित्त्वा शिरो वै यज्ञस्य ननाद च मुमोद च । तत्पश्चात् उसने ऐसी भीषण गर्जना की, जो समस्त प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली थी। फिर उसने यज्ञका सिर काटकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया और मन-ही-मन आनन्दका अनुभव किया ॥ ४९ १/२ ॥ ततो ब्रह्मादयो देवा दक्षश्चैव प्रजापतिः ॥ ५० ॥ ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कथ्यतां को भवानिति । तब ब्रह्मा आदि देवता तथा प्रजापति दक्ष—ये सब के-सब हाथ जोड़कर बोले—‘देवदेव! कहिये, आप कौन हैं?’ ॥ ५० १/२ ॥
वीरभद्र उवाच
नाहं रुद्रो न वा देवी नैव भोक्तुमिहागतः ॥ ५१ ॥ देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः । **वीरभद्रने कहा—**ब्रह्मन्! मैं न तो रुद्र हूँ, न देवी हूँ और न यहाँ भोजन करनेके लिये ही आया हूँ। तुम्हारा यह यज्ञ देवी पार्वतीके रोषका कारण बन गया है—ऐसा जानकर सर्वात्मा भगवान् शिव कुपित हो उठे हैं ॥ ५१ १/२ ॥ द्रष्टुं वा नैव विप्रेन्द्रान् नैव कौतूहलेन वा ॥ ५२ ॥ तव यज्ञविघातार्थं सम्प्राप्तं विद्धि मामिह । मैं यहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका दर्शन करने या कौतूहलवश इस यज्ञका तमाशा देखनेके लिये नहीं आया हूँ। तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं तुम्हारे इस यज्ञका विनाश करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥
वीरभद्र इति ख्यातो रुद्रकोपाद् विनिःसृतः ॥ ५३ ॥ भद्रकालीति विख्याता देव्याः कोपाद् विनिःसृता । प्रेषितौ देवदेवेन यज्ञान्तिकमिहागतौ ॥ ५४ ॥ मेरा नाम वीरभद्र है। रुद्रदेवके क्रोधसे मेरा प्राकट्य हुआ है। यह नारी भद्रकालीके नामसे विख्यात है और देवी पार्वतीके कोपसे प्रकट हुई है। देवाधिदेव महादेवने हम दोनोंको यहाँ भेजा है। इसलिये हम दोनों इस यज्ञके निकट आये हैं॥ ५३-५४ ॥ शरणं गच्छ विप्रेन्द्र देवदेवमुमापतिम् । वरं क्रोधोऽपि देवस्य वरदानं न चान्यतः ॥ ५५ ॥ विप्रवर! तुम देवाधिदेव उमावल्लभ भगवान् शिवकी शरणमें जाओ। महादेवजीका क्रोध भी परम मंगलमय है और दूसरोंसे मिला हुआ वरदान भी मंगलकारक नहीं होता ॥ ५५ ॥ वीरभद्रवचः श्रुत्वा दक्षो धर्मभृतां वरः । तोषयामास स्तोत्रेण प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ५६ ॥ वीरभद्रकी यह बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दक्षने भगवान् शिवके उद्देश्यसे प्रणाम करके निम्नांकित स्तोत्रके द्वारा उनकी स्तुति की— ॥ ५६ ॥ प्रपद्ये देवमीशानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् । महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ५७ ॥ ‘जो सम्पूर्ण जगत्के शासक, पालक, महान् आत्मा, नित्य, सनातन, अविकारी और आराध्यदेव हैं, उन महादेवजीकी आज मैं शरण लेता हूँ’ ॥ ५७ ॥ प्राणापानौ संनिरुध्य वक्त्रस्थानेन यत्नतः । विचार्य सर्वतो दृष्टिं बहुदृष्टिरमित्रजित् ॥ ५८ ॥ सहसा देवदेवेशो ह्यग्निकुण्डात् समुत्थितः । बिभ्रत्सूर्यसहस्रस्य तेजः संवर्तकोपमः ॥ ५९ ॥ स्मितं कृत्वाब्रवीद् वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । तब अनेक नेत्रोंवाले, शत्रुविजयी, महादेव अपने मुखोंद्वारा यत्नपूर्वक प्राण और अपान वायुको अवरुद्ध करके सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिपात करते हुए सहसा अग्निकुण्डसे निकल पड़े। प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी स्वरूपसे सहस्रों सूर्योंकी प्रभा धारण किये वे दक्षके सामने खड़े हो गये और मुसकराकर बोले—‘प्रजापते! बोलो, मैं आज तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ’ ॥ ५८-५९ १/२ ॥ श्राविते च मखाध्याये देवानां गुरुणा ततः ॥ ६० ॥ तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा दक्षो देवं प्रजापतिः । भीतशङ्कितवित्रस्तः सबाष्पवदनेक्षणः ॥ ६१ ॥ यदि प्रसन्नो भगवान् यदि चाहं भवत्प्रियः ।
यदि वाहमनुग्राह्यो यदि वा वरदो मम ॥ ६२ ॥
यद् दग्धं भक्षितं पीतमशितं यच्च नाशितम् ।
चूर्णीकृतापविद्धं च यज्ञसम्भारमीदृशम् ॥ ६३ ॥
दीर्घकालेन महता प्रयत्नेन सुसंचितम् ।
तन्न मिथ्या भवेन्मह्यं वरमेतमहं वृणे ॥ ६४ ॥
उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात् प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान् प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो जला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो' ॥ ६०—६४ ॥