भारतकोश
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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

काननेष्विव पुष्पाणि बहिरर्थान् समाचरन् ॥ ११ ॥ शत्रुके दोषोंको प्रकाशित करे और उसके पक्षके लोगोंको अपने पक्षमें आनेके लिये विचलित कर दे। जैसे लोग जंगलसे फूल चुनते हैं, उसी प्रकार राजा बाहरसे धनका संग्रह करे ॥ ११ ॥

उच्छ्रितान् नाशयेत् स्फीतान् नरेन्द्रानचलोपमान् । श्रयेच्छायामविज्ञातां गुप्तं रणमुपाश्रयेत् ॥ १२ ॥ पर्वतके समान ऊँचा सिर करके अविचलभावसे बैठे हुए धनी नरेशोंको नष्ट करे। उनको जताये बिना ही उनकी छायाका आश्रय ले अर्थात् उनके सरदारोंसे मिलकर उनमें फूट डाल दे और गुप्तरूपसे अवसर देखकर उनके साथ युद्ध छेड़ दे ॥ १२ ॥

प्रावृषीवासितग्रीवो मज्जेत निशि निर्जने । मायूरेण गुणेनैव स्त्रीभिश्चालक्षितश्चरेत् ॥ १३ ॥ जैसे मोर आधी रातके समय एकान्त स्थानमें छिपा रहता है, उसी प्रकार राजा वर्षाकालमें शत्रुओंपर चढ़ाई न करके अदृश्यभावसे ही महलमें रहे। मोरके ही गुणको अपनाकर स्त्रियोंसे अलक्षित रहकर विचरे ॥ १३ ॥

न जह्याच्च तनुत्राणं रक्षेदात्मानमात्मना । चारभूमिष्वभिगतान् पाशांश्च परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥ अपने कवचको कभी न उतारे। स्वयं ही शरीरकी रक्षा करे। घूमने-फिरनेके स्थानोंपर शत्रुओंद्वारा जो जाल बिछाये गये हों, उनका निवारण करे ॥ १४ ॥

प्रणयेद् वापि तां भूमिं प्रणश्येद् गहने पुनः । हन्यात्क्रुद्धानतिविषास्तान् जिह्मगतयोऽहितान् ॥ १५ ॥ राजा सुयोग समझे तो जहाँ शत्रुओंका जाल बिछा हो, वहाँ भी अपने-आपको ले जाय। यदि संकटकी सम्भावना हो तो गहन वनमें छिप जाय तथा जो कुटिल चाल चलनेवाले हों, उन क्रोधमें भरे हुए शत्रुओंको अत्यन्त विषैले सर्पोंके समान समझकर मार डाले ॥ १५ ॥

नाशयेद् बलबर्हाणि संनिवासान् निवासयेत् । सदा बर्हिनिभः कामं प्रशस्तं कृतमाचरेत् । सर्वतश्चाददेत् प्रज्ञां पतंगं गहनेष्विव ॥ १६ ॥ शत्रुकी सेनाकी पाँख काट डाले—उसे दुर्बल कर दे, श्रेष्ठ पुरुषोंको अपने निकट बसावे। मोरके समान स्वेच्छानुसार उत्तम कार्य करे—जैसे मोर अपने पंख फैलाता है, उसी प्रकार अपने पक्ष (सेना और सहायकों) का विस्तार करे। सबसे बुद्धि—सद्विचार ग्रहण करे और जैसे टिड्डियोंका दल जंगलमें जहाँ गिरता है, वहाँ वृक्षोंपर पत्तेतक नहीं छोड़ता, उसी प्रकार शत्रुओंपर आक्रमण करके उनका सर्वस्व नष्ट कर दे ॥ १६ ॥

एवं मयूरवद् राजा स्वराज्यं परिपालयेत् ।

आत्मवृद्धिकरीं नीतिं विदधीत विचक्षणः ॥ १७ ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजा अपने स्थानकी रक्षा करनेवाले मोरके समान अपने राज्यका भलीभाँति पालन करे तथा उसी नीतिका आश्रय ले, जो अपनी उन्नतिमें सहायक हो ॥ १७ ॥

आत्मसंयमनं बुद्ध्या परबुद्ध्यावधारणम् ।
बुद्ध्या चात्मगुणप्राप्तिरेतच्छास्त्रनिदर्शनम् ॥ १८ ॥
केवल अपनी बुद्धिसे मनको वशमें किया जाता है। मन्त्री आदि दूसरोंकी बुद्धिके सहयोगसे कर्तव्यका निश्चय किया जाता है और शास्त्रीय बुद्धिसे आत्मगुणकी प्राप्ति होती है। यही शास्त्रका प्रयोजन है ॥ १८ ॥

परं विश्वासयेत् साम्ना स्वशक्तिं चोपलक्षयेत् ।
आत्मनः परिमर्शेन बुद्धिं बुद्ध्या विचारयेत् ॥ १९ ॥
राजा मधुर वाणीद्वारा समझा-बुझाकर अपने प्रति दूसरेका विश्वास उत्पन्न करे। अपनी शक्तिका भी प्रदर्शन करे तथा अपने विचार और बुद्धिसे कर्तव्यका निश्चय करे ॥ १९ ॥

सान्त्वयोगमतिः प्राज्ञः कार्याकार्यप्रयोजकः ।
निगूढबुद्धेर्धीरस्य वक्तव्ये वा कृतं तथा ॥ २० ॥
राजामें सबको समझा-बुझाकर युक्तिसे काम निकालनेकी बुद्धि होनी चाहिये। वह विद्वान् होनेके साथ ही लोगोंको कर्तव्यकी प्रेरणा दे और अकर्तव्यकी ओर जानेसे रोके अथवा जिसकी बुद्धि गूढ़ या गम्भीर है, उस धीर पुरुषको उपदेश देनेकी आवश्यकता ही क्या है? ॥ २० ॥

स निकृष्टां कथां प्राज्ञो यदि बुद्ध्या बृहस्पतिः ।
स्वभावमेष्यते तप्तं कृष्णायसमिवोदके ॥ २१ ॥
वह बुद्धिमान् राजा बुद्धिमें बृहस्पतिके समान होकर भी किसी कारणवश यदि निम्न श्रेणीकी बात कह डाले तो उसे चाहिये कि जैसे तपाया हुआ लोहा पानीमें डालनेसे शान्त हो जाता है, उसी तरह अपने शान्त स्वभावको स्वीकार कर ले ॥ २१ ॥

अनुयुञ्जीत कृत्यानि सर्वाण्येव महीपतिः ।
आगमैरुपदिष्टानि स्वस्य चैव परस्य च ॥ २२ ॥
राजा अपने तथा दूसरेको भी शास्त्रमें बताये हुए समस्त कर्मोंमें ही लगावे ॥ २२ ॥

मृदुशीलं तथा प्राज्ञं शूरं चार्थविधानवित् ।
स्वकर्मणि नियुञ्जीत ये चान्ये च बलाधिकाः ॥ २३ ॥
कार्यसाधनके उपायको जाननेवाला राजा अपने कार्योंमें कोमल-स्वभाव, विद्वान् तथा शूरवीर मनुष्यको तथा अन्य जो अधिक बलशाली व्यक्ति हों, उनको नियुक्त करे ॥ २३ ॥

अथ दृष्ट्वा नियुक्तानि स्वानुरूपेषु कर्मसु ।
सर्वांस्ताननुवर्तेत स्वरांस्तन्त्रीरिवायता ॥ २४ ॥

जैसे वीणाके विस्तृत तार सातों स्वरोंका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा अपने कर्मचारियोंको योग्यता-नुसार कर्मोंमें संलग्न देख उन सबके अनुकूल व्यवहार करे ॥ २४ ॥

धर्माणामविरोधेन सर्वेषां प्रियमाचरेत् ।
ममायमिति राजा यः स पर्वत इवाचलः ॥ २५ ॥
राजाको चाहिये कि सबका प्रिय करे, किंतु धर्ममें बाधा न आने दे। प्रजागणको 'यह मेरा ही प्रियगण है' ऐसा समझनेवाला राजा पर्वतके समान अविचल बना रहता है ॥ २५ ॥

व्यवसायं समाधाय सूर्यो रश्मीनिवायतान् ।
धर्ममेवाभिरक्षेत् कृत्वा तुल्ये प्रियाप्रिये ॥ २६ ॥
जैसे सूर्य अपनी विस्तृत किरणोंका आश्रय ले सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार राजा प्रिय और अप्रियको समान समझकर सुदृढ़ उद्योगका अवलम्बन करके धर्मकी ही रक्षा करे ॥ २६ ॥

कुलप्रकृतिदेशानां धर्मज्ञान् मृदुभाषिणः ।
मध्ये वयसि निर्दोषान् हिते युक्तानविकलवान् ॥ २७ ॥
अलुब्धान् शिक्षितान् दान्तान् धर्मेषु परिनिष्ठितान् ।
स्थापयेत् सर्वकार्येषु राजा धर्मार्थरक्षिणः ॥ २८ ॥
जो लोग कुल, स्वभाव और देशके धर्मको जानते हों, मधुरभाषी हों, युवावस्थामें जिनका जीवन निष्कलंक रहा हो, जो हितसाधनमें तत्पर और घबराहटसे रहित हों, जिनमें लोभका अभाव हो, जो शिक्षित, जितेन्द्रिय, धर्मनिष्ठ तथा धर्म एवं अर्थकी रक्षा करनेवाले हों, उन्हींको राजा अपने समस्त कार्योंमें लगावे ॥ २७-२८ ॥

एतेन च प्रकारेण कृत्यानामागतिं गतिम् ।
युक्तः समनुतिष्ठेत तुष्टश्चारैरुपस्कृतः ॥ २९ ॥
इस प्रकार राजा सदा सावधान रहकर राज्यके प्रत्येक कार्यका आरम्भ और समाप्ति करे। मनमें संतोष रखे और गुप्तचरोंकी सहायतासे राष्ट्रकी सारी बातें जानता रहे ॥ २९ ॥

अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षितुः ।
आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा ॥ ३० ॥
जिसका हर्ष और क्रोध कभी निष्फल नहीं होता, जो स्वयं ही सारे कार्योंकी देखभाल करता है तथा आत्म-विश्वास ही जिसका खजाना है, उस राजाके लिये यह वसुन्धरा (पृथ्वी) ही धन देनेवाली बन जाती है ॥ ३० ॥

व्यक्तश्चानुग्रहो यस्य यथार्थश्चापि निग्रहः ।
गुप्तात्मा गुप्तराष्ट्रश्च स राजा राजधर्मवित् ॥ ३१ ॥

जिसका अनुग्रह सबपर प्रकट है तथा जिसका निग्रह (दण्ड देना) भी यथार्थ कारणसे होता है, जो अपनी और अपने राज्यकी सुरक्षा करता है, वही राजा राजधर्मका ज्ञाता है ।। ३१ ।।

नित्यं राष्ट्रमवेक्षेत गोभिः सूर्य इवोदितः ।
चरान् स्वनुचरान् विद्यात् तथा बुद्ध्या स्वयं चरेत् ।। ३२ ।।
जैसे सूर्य उदित होकर प्रतिदिन अपनी किरणोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करते (या देखते) हैं, उसी प्रकार राजा सदा अपनी दृष्टिसे सम्पूर्ण राष्ट्रका निरीक्षण करे। गुप्तचरोंको बारंबार भेजकर राज्यके समाचार जाने तथा स्वयं अपनी बुद्धिके द्वारा भी सोच-विचारकर कार्य करे ।। ३२ ।।

कालं प्राप्तमुपादद्यान्नार्थं राजा प्रसूचयेत् ।
अहन्यहनि संदुह्यान्महीं गामिव बुद्धिमान् ।। ३३ ।।
बुद्धिमान् राजा समय पड़नेपर ही प्रजासे धन ले। अपनी अर्थ-संग्रहकी नीति किसीके सम्मुख प्रकट न करे। जैसे बुद्धिमान् मनुष्य गायकी रक्षा करते हुए ही उससे दूध दुहता है, उसी प्रकार राजा सदा पृथ्वीका पालन करते हुए ही उससे धनका दोहन करे ।। ३३ ।।

यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनोति मधु षट्पदः ।
तथा द्रव्यमुपादाय राजा कुर्वीत संचयम् ।। ३४ ।।
जैसे मधुमक्खी क्रमशः अनेक फूलोंसे रसका संचय करके शहद तैयार करती है, उसी प्रकार राजा समस्त प्रजाजनोंसे थोड़ा-थोड़ा द्रव्य लेकर उसका संचय करे ।। ३४ ।।

यद्धि गुप्तावशिष्टं स्यात् तद्वित्तं धर्मकामयोः ।
संचयान्न विसर्गी स्याद् राजा शास्त्रविदात्मवान् ।। ३५ ।।
जो धन राज्यकी सुरक्षा करनेसे बचे, उसीको धर्म और उपभोगके कार्यमें खर्च करना चाहिये। शास्त्रज्ञ और मनस्वी राजाको कोषागारके संचित धनसे द्रव्य लेकर भी खर्च नहीं करना चाहिये ।। ३५ ।।

नार्थमल्पं परिभवेन्नावमन्येत शात्रवान् ।
बुद्ध्या तु बुद्धयेदात्मानं न चाबुद्धिषु विश्वसेत् ।। ३६ ।।
थोड़ा-सा भी धन मिलता हो तो उसका तिरस्कार न करे। शत्रु शक्तिहीन हो तो भी उसकी अवहेलना न करे। बुद्धिसे अपने स्वरूप और अवस्थाको समझे तथा बुद्धिहीनोंपर कभी विश्वास न करे ।। ३६ ।।

धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा
धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः ।
अल्पस्य वा बहुनो वा विवृद्धौ
धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ।। ३७ ।।

धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश-कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना—ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ।। ३७ ।।

अग्निः स्तोको वर्धतेऽप्याज्यसिक्तो
बीजं चैकं रोहसहस्रमेति ।
आयव्ययौ विपुलौ संनिशाम्य
तस्मादल्पं नावमन्येत वित्तम् ।। ३८ ।।

थोड़ी-सी भी आग यदि घीसे सिंच जाय तो बढ़कर बहुत बड़ी हो जाती है। एक ही छोटे-से बीजको बो देनेपर उससे सहस्रों बीज पैदा हो जाते हैं। इसी प्रकार महान् आय-व्ययके विषयमें विचार करके थोड़े-से भी धनका अनादर न करे ।। ३८ ।।

बालोऽप्यबालः स्थविरो रिपुर्यः
सदा प्रमत्तं पुरुषं निहन्यात् ।
कालेनान्यस्तस्य मूलं हरेत
कालज्ञाता पार्थिवानां वरिष्ठः ।। ३९ ।।

शत्रु बालक, जवान अथवा बूढ़ा ही क्यों न हो, सदा सावधान न रहनेवाले मनुष्यका नाश कर डालता है। दूसरा कोई धनसम्पन्न शत्रु अनुकूल समयका सहयोग पाकर राजाकी जड़ उखाड़ सकता है। इसलिये जो समयको जानता है, वही समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३९ ।।

हरेत कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या-
दर्थे दीर्घं वीर्यमस्योपहन्यात् ।
रिपुर्द्वेष्टा दुर्बलो वा बली वा
तस्माच्छत्रोर्नैव हीयेद् यतात्मा ।। ४० ।।

द्वेष रखनेवाला शत्रु दुर्बल हो या बलवान्, राजाकी कीर्ति नष्ट कर देता है, उसके धर्ममें बाधा पहुँचाता है तथा अर्थोपार्जनमें उसकी बढ़ी हुई शक्तिका विनाश कर डालता है; इसलिये मनको वशमें रखनेवाला राजा शत्रुको ओरसे लापरवाह न रहे ।। ४० ।।

क्षयं वृद्धिं पालनं संचयं वा
बुद्ध्वाप्युभौ संहतौ सर्वकामौ ।
ततश्चान्यन्मतिमान् संदधीत
तस्माद् राजा बुद्धिमत्तां श्रयेत ।। ४१ ।।

हानि, लाभ, रक्षा और संग्रहको जानकर तथा सदा परस्पर सम्बन्धित ऐश्वर्य और भोगको भी भलीभाँति समझकर बुद्धिमान् राजाको शत्रुके साथ संधि या विग्रह करना चाहिये; इस विषयपर विचार करनेके लिये बुद्धिमानोंका सहारा लेना चाहिये ।। ४१ ।।

बुद्धिर्दीप्ता बलवन्तं हिनस्ति

बलं बुद्ध्या पाल्यते वर्धमानम् ।
शत्रुर्बुद्ध्या सीदते वर्धमानो
बुद्धेः पश्चात् कर्म यत्तत् प्रशस्तम् ॥ ४२ ॥
प्रतिभाशालिनी बुद्धि बलवान्‌को भी पछाड़ देती है। बुद्धिके द्वारा नष्ट होते हुए बलकी भी रक्षा होती है। बढ़ता हुआ शत्रु भी बुद्धिके द्वारा परास्त होकर कष्ट उठाने लगता है। बुद्धिसे सोचकर पीछे जो कर्म किया जाता है, वह सर्वोत्तम होता है ॥ ४२ ॥

सर्वान् कामान् कामयानो हि धीरः
सत्त्वेनाल्पेनाप्नुते हीनदोषः ।
यश्चात्मानं प्रार्थयतेऽर्थ्यमानैः
श्रेयःपात्रं पूर्यते च नाल्पम् ॥ ४३ ॥
जिसने सब प्रकारके दोषोंका त्याग कर दिया है, वह धीर राजा यदि किसी वस्तुकी कामना करे तो वह थोड़ा-सा बल लगानेपर भी अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो आवश्यक वस्तुओंसे सम्पन्न होनेपर भी अपने लिये कुछ चाहता है अर्थात् दूसरोंसे अपनी इच्छा पूरी करानेकी आश रखता है, वह लोभी और अहंकारी नरेश अपने श्रेयका छोटा-सा पात्र भी नहीं भर सकता ॥

तस्माद् राजा प्रगृहीतः प्रजासु
मूलं लक्ष्म्याः सर्वशो ह्याददीत ।
दीर्घं कालं ह्यपि सम्प्रीड्यमानो
विद्युत्सम्पातमपि वा नोर्जितः स्यात् ॥ ४४ ॥
इसलिये राजाको चाहिये कि वह सारी प्रजापर अनुग्रह करते हुए ही उससे कर (धन) वसूल करे। वह दीर्घकालतक प्रजाको सताकर उसपर बिजलीके समान गिरकर अपना प्रभाव न दिखाये ॥ ४४ ॥

विद्या तपो वा विपुलं धनं वा
सर्वं ह्येतद् व्यवसायेन शक्यम् ।
बुद्ध्यायत्तं तन्निवसेद् देहवत्सु
तस्माद् विद्याद् व्यवसायं प्रभूतम् ॥ ४५ ॥
विद्या, तप तथा प्रचुर धन—ये सब उद्योगसे प्राप्त हो सकते हैं। वह उद्योग प्राणियोंमें बुद्धिके अधीन होकर रहता है; अतः उद्योगको ही समस्त कार्योंकी सिद्धिका पर्याप्त साधन समझे ॥ ४५ ॥

यत्रासते मतिमन्तो मनस्विनः
शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च ।
वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं
तस्माद् विद्वान् नावमन्येत देहम् ॥ ४६ ॥

अतः जहाँ ज्ञानेन्द्रियोंमें बुद्धिमान् एवं मनस्वी महर्षि निवास करते हैं,* जिसमें इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवताके रूपमें इन्द्र, विष्णु एवं सरस्वतीका निवास है तथा जिसके भीतर सदा सम्पूर्ण प्राणी वास करते हैं, अर्थात् जो शरीर समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्वाहका आधार है, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि उस मानव-देहकी अवहेलना न करे।।

लुब्धं हन्यात् सम्प्रदानेन नित्यं लुब्धस्तृप्तिं परवित्तस्य नैति । सर्वो लुब्धः कर्मगुणोपभोगे योऽर्थैर्हीनो धर्मकामौ जहाति ॥ ४७ ॥

राजा लोभी मनुष्यको सदा ही कुछ देकर दबाये रखे; क्योंकि लोभी पुरुष दूसरेके धनसे कभी तृप्त नहीं होता। सत्कर्मोंके फलस्वरूप सुखका उपभोग करनेके लिये तो सभी लालायित रहते हैं; परंतु जो लोभी धनहीन है, वह धर्म और काम दोनोंको त्याग देता है ॥ ४७ ॥

धनं भोगं पुत्रदारं समृद्धिं सर्वं लुब्धः प्रार्थयते परेषाम् । लुब्धे दोषाः सम्भवन्तीह सर्वे तस्माद् राजा न प्रगृह्णीत लुब्धम् ॥ ४८ ॥

लोभी मनुष्य दूसरोंके धन, भोग-सामग्री, स्त्री-पुत्र और समृद्धि सबको प्राप्त करना चाहता है। लोभीमें सब प्रकारके दोष प्रकट होते हैं; अतः राजा उसे अपने यहाँ किसी पदपर स्थान न दे ॥ ४८ ॥

संदर्शनेन पुरुषं जघन्यमपि चोदयेत् । आरम्भान् द्विषतां प्राज्ञः सर्वार्थांश्च प्रसूदयेत् ॥ ४९ ॥

बुद्धिमान् राजा नीच मनुष्यको देखते ही अपने यहाँसे दूर हटा दे और यदि उसका वश चले तो वह शत्रुओंके सारे उद्योगों तथा कार्योंका विध्वंस कर डाले ॥ ४९ ॥

धर्मान्वितेषु विज्ञाता मन्त्री गुप्तश्च पाण्डव । आप्तो राजा कुलीनश्च पर्याप्तो राजसंग्रहे ॥ ५० ॥

पाण्डुनन्दन! धर्मात्मा पुरुषोंमें जो विशेषरूपसे सम्पूर्ण विषयोंका ज्ञाता हो, उसीको मन्त्री बनावे और उसकी सुरक्षाका विशेष प्रबन्ध करे। प्रजाका विश्वास-पात्र और कुलीन राजा नरेशोंको वशमें करनेमें समर्थ होता है ॥

विधिप्रयुक्तान् नरदेवधर्मा- नुक्तान् समासेन निबोध बुद्ध्या । इमान् विदध्याद् व्यतिसृत्य यो वै राजा महीं पालयितुं स शक्तः ॥ ५१ ॥

राजाके जो शास्त्रोक्त धर्म हैं, उन्हें संक्षेपसे मैंने यहाँ बताया है। तुम अपनी बुद्धिसे विचार करके उन्हें हृदयमें धारण करो। जो उन्हें गुरुसे सीखकर हृदयमें धारण करता और आचरणमें लाता है, वही राजा अपने राज्यकी रक्षा करनेमें समर्थ होता है॥ ५१॥ अनीतिजं यस्य विधानजं सुखं हठप्रणीतं विधिवत्प्रदृश्यते। न विद्यते तस्य गतिर्महीपते- र्न विद्यते राज्यसुखं ह्यनुत्तमम्॥ ५२॥ जिन्हें अन्यायसे उपार्जित, हठसे प्राप्त तथा दैवके विधानके अनुसार उपलब्ध हुआ सुख विधिके अनुरूप प्राप्त हुआ-सा दिखायी देता है, राजधर्मको न जाननेवाले उस राजाकी कहीं गति नहीं है तथा उसका परम उत्तम राज्यसुख चिरस्थायी नहीं होता॥ ५२॥ धनैर्विशिष्टान् मतिशीलपूजितान् गुणोपपन्नान् युधि दृष्टविक्रमान्। गुणेषु दृष्ट्वा न चिरादिवात्मवान् यतोऽभिसंधाय निहन्ति शात्रवान्॥ ५३॥ उक्त राजधर्मके अनुसार संधि-विग्रह आदि गुणोंके प्रयोगमें सतत सावधान रहनेवाला नरेश धनसम्पन्न, बुद्धि और शीलके द्वारा सम्मानित, गुणवान् तथा युद्धमें जिनका पराक्रम देखा गया है, उन वीर शत्रुओंको भी कूटकौशलपूर्वक नष्ट कर सकता है॥ ५३॥ पश्येदुपायन् विविधैः क्रियापथै- र्न चानुपायेन मतिं निवेशयेत्। श्रियं विशिष्टां विपुलं यशो धनं न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते॥ ५४॥ राजा नाना प्रकारकी कार्यपद्धतियोंद्वारा शत्रु-विजयके बहुत-से उपाय ढूँढ़ निकाले। अयोग्य उपायसे काम लेनेका विचार न करे, जो निर्दोष व्यक्तियोंके भी दोष देखता है, वह मनुष्य विशिष्ट सम्पत्ति, महान् यश और प्रचुर धन नहीं पा सकता॥ ५४॥ प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तितौ यथा सुहृत्सु विज्ञाय निवृत्य चोभयोः। यदेव मित्रं गुरुभारमावहेत् तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद् बुधः॥ ५५॥ सुहृदोंमेंसे जो दो मित्र प्रेमपूर्वक साथ-साथ एक कार्यमें प्रवृत्त होते हों और साथ-ही-साथ उससे निवृत्त होते हों, उन्हें अच्छी तरह जानकर उन दोनोंमेंसे जो मित्र लौटकर मित्रका गुरुतर भार वहन कर सके, उसीको विद्वान् पुरुष अत्यन्त स्नेही मित्र मानकर दूसरोंके सामने उसका उदाहरण दें॥ ५५॥

एतान् मयोक्तांश्च राजधर्मान् नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व । अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन सर्वो हि लोको नृप धर्ममूलः ॥ ५६ ॥

नरेश्वर! मेरे बताये हुए इन राजधर्मोंका आचरण करो और प्रजाके पालनमें मन लगाओ। इससे तुम सुखपूर्वक पुण्यफल प्राप्त करोगे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का मूल धर्म ही है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राजधर्मकथने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राजधर्मका वर्णनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥


* 'इमावेव गौतमभरद्वाजौ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंका गौतम, भरद्वाज, वसिष्ठ और विश्वामित्र आदि महर्षियोंसे सम्बन्ध सूचित होता है।

दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अयं पितामहेनोक्तो राजधर्मः सनातनः ।
ईश्वरश्च महादण्डो दण्डे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आपने यह सनातन राजधर्मका वर्णन किया है। इसके अनुसार महान् दण्ड ही सबका ईश्वर है, दण्डके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ॥ १ ॥
देवतानामृषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
यक्षरक्षःपिशाचानां साध्यानां च विशेषतः ॥ २ ॥
सर्वेषां प्राणिनां लोके तिर्यग्योनिनिवासिनाम् ।
सर्वव्यापी महातेजा दण्डः श्रेयानिति प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! देवता, ऋषि, पितर, महात्मा, यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा साध्यगण एवं पशु-पक्षियोंकी योनिमें निवास करनेवाले जगत्के समस्त प्राणियोंके लिये भी सर्वव्यापी महातेजस्वी दण्ड ही कल्याणका साधन है ।।
इत्येवमुक्तं भवता दण्डे वै सचराचरम् ।
पश्यता लोकमासक्तं ससुरासुरमानुषम् ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ४ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंसहित इस सम्पूर्ण विश्वको अपने समीप देखते हुए आपने कहा है कि दण्डपर ही चराचर जगत् प्रतिष्ठित है। भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थ रूपसे यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
को दण्डः कीदृशो दण्डः किंरूपः किंपरायणः ।
किमात्मकः कथंभूतः कथमूर्तिः कथं प्रभो ॥ ५ ॥
दण्ड क्या है? कैसा है? उसका स्वरूप किस तरहका है? और किसके आधारपर उसकी स्थिति है? प्रभो! उसका उपादान क्या है? उसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? उसका आकार कैसा है? ॥ ५ ॥
जागर्ति च कथं दण्डः प्रजास्ववहितात्मकः ।
कश्च पूर्वापरमिदं जागर्ति प्रतिपालयन् ॥ ६ ॥
वह किस प्रकार सावधान रहकर सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करनेके लिये जागता रहता है? कौन इस पूर्वापर जगत्का प्रतिपालन करता हुआ जागता है? ॥ ६ ॥
कश्च विज्ञायते पूर्वं को वरो दण्डसंज्ञितः ।

किंसंस्थश्च भवेद् दण्डः का वास्य गतिरुच्यते ॥ ७ ॥
पहले इसे किस नामसे जाना जाता था? कौन दण्ड प्रसिद्ध है? दण्डका आधार क्या है? तथा उसकी गति क्या बतायी गयी है? ॥ ७ ॥

भीष्म उवाच

शृणु कौरव्य यो दण्डो व्यवहारो यथा च सः ।
यस्मिन् हि सर्वमायत्तं स दण्ड इह केवलः ॥ ८ ॥
**भीष्मजीने कहा—**कुरुनन्दन! दण्डका जो स्वरूप है तथा जिस प्रकार उसको 'व्यवहार' कहा जाता है, वह सब तुम्हें बताता हूँ; सुनो। इस संसारमें सब कुछ जिसके अधीन है, वही अद्वितीय पदार्थ यहाँ 'दण्ड' कहलाता है ॥ ८ ॥
धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते ।
तस्य लोपः कथं न स्याल्लोकेष्ववहितात्मनः ॥ ९ ॥
इत्येवं व्यवहारस्य व्यवहारत्वमिष्यते ।
महाराज! धर्मका ही दूसरा नाम व्यवहार है। लोकमें सतत सावधान रहनेवाले पुरुषके धर्मका किसी तरह लोप न हो, इसीलिये दण्डकी आवश्यकता है और यही उस व्यवहारका व्यवहारत्व³ है ॥ ९ १/२ ॥
अपि चैतत् पुरा राजन् मनुना प्रोक्तमादितः ॥ १० ॥
सुप्रणीतेन दण्डेन प्रियाप्रियसमात्मना ।
प्रजा रक्षति यः सम्यग्धर्म एव स केवलः ॥ ११ ॥
राजन्! पूर्वकालमें मनुने यह उपदेश दिया है कि जो राजा प्रिय और अप्रियके प्रति समान भाव रखकर—किसीके प्रति पक्षपात न करके दण्डका ठीक-ठीक उपयोग करते हुए प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, उसका वह कार्य केवल धर्म है ॥ १०-११ ॥
यथोक्तमेतद् वचनं प्रागेव मनुना पुरा ।
यन्मयोक्तं मनुष्येन्द्र ब्रह्मणो वचनं महत् ॥ १२ ॥
प्रागिदं वचनं प्रोक्तमतः प्राग्वचनं विदुः ।
व्यवहारस्य चाख्यानाद् व्यवहार इहोच्यते ॥ १३ ॥
नरेन्द्र! उपर्युक्त सारी बातें मनुजीने पहले ही कह दी हैं और मैंने जो बात कही है, वह ब्रह्माजीका महान् वचन है। यही वचन मनुजीके द्वारा पहले कहा गया है; इसलिये इसको 'प्राग्वचन' के नामसे भी जानते हैं। इसमें व्यवहारका प्रतिपादन होनेसे यहाँ व्यवहार नाम दिया गया है ॥ १२-१३ ॥
दण्डे त्रिवर्गः सततं सुप्रणीते प्रवर्तते ।
दैवं हि परमो दण्डो रूपतोऽग्निरिवोत्थितः ॥ १४ ॥

दण्डका ठीक-ठीक उपयोग होनेपर राजाके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि सदा होती रहती है। इसलिये दण्ड महान् देवता है, यह अग्निके समान तेजस्वी रूपसे प्रकट हुआ है॥ १४॥

नीलोत्पलदलश्यामश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।
अष्टपान्नैंकनयनः शंकुकर्णोर्ध्वरोमवान् ॥ १५ ॥
इसके शरीरकी कान्ति नील कमलदलके समान श्याम है, इसके चार दाढ़ें और चार भुजाएँ हैं। आठ पैर और अनेक नेत्र हैं। इसके कान खूँटेके समान हैं और रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए हैं॥ १५॥

जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः ।
एतद् रूपं बिभर्त्युग्रं दण्डो नित्यं दुराधरः ॥ १६ ॥
इसके सिरपर जटा है, मुखमें दो जिह्वाएँ हैं, मुखका रंग ताँबेके समान है, शरीरको ढकनेके लिये उसने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है, इस प्रकार दुर्धर्ष दण्ड सदा यह भयंकर रूप धारण किये रहता है³॥

असिर्धनुर्गदा शक्तिस्त्रिशूलं मुद्गरः शरः ।
मुसलं परशुश्चक्रं पाशो दण्डर्ष्टितोमराः ॥ १७ ॥
सर्वप्रहरणीयानि सन्ति यानीह कानिचित् ।
दण्ड एव स सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ॥ १८ ॥
खड्ग, धनुष, गदा, शक्ति, त्रिशूल, मुद्गर, बाण, मुसल, परसा, चक्र, पाश, दण्ड, ऋष्टि, तोमर तथा दूसरे-दूसरे जो कोई प्रहार करनेयोग्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उन सबके रूपमें सर्वात्मा दण्ड ही मूर्तिमान् होकर जगत्में विचरता है॥ १७-१८॥

भिन्दंश्छिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पाटयंस्तथा ।
घातयन्नभिधावंश्च दण्ड एव चरत्युत ॥ १९ ॥
वही अपराधियोंको भेदता, छेदता, पीड़ा देता, काटता, चीरता, फाड़ता तथा मरवाता है। इस प्रकार दण्ड ही सब ओर दौड़ता-फिरता है॥ १९॥

असिर्विशसनो धर्मस्तीक्ष्णवर्मा दुराधरः ।
श्रीगर्भो विजयः शास्ता व्यवहारः सनातनः ॥ २० ॥
शास्त्रं ब्राह्मणमन्त्राश्च शास्ता प्राग्वदतां वरः ।
धर्मपालोऽक्षरो देवः सत्यगो नित्यगोऽग्रजः ॥ २१ ॥
असङ्गो रुद्रतनयो मनुज्येष्ठः शिवंकरः ।
नामान्येतानि दण्डस्य कीर्तितानि युधिष्ठिर ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! असि, विशसन, धर्म, तीक्ष्णवर्मा, दुराधर, श्रीगर्भ, विजय, शास्ता, व्यवहार, सनातन, शास्त्र, ब्राह्मण, मन्त्र, शास्ता, प्राग्वदतांवर, धर्मपाल, अक्षर, देव, सत्यग, नित्यग,

अग्रज, असंग, रुद्रतनय, मनु, ज्येष्ठ और शिवंकर—ये दण्डके नाम कहे गये हैं ॥ २०—२२ ॥

दण्डो हि भगवान् विष्णुर्दण्डो नारायणः प्रभुः ।
शश्वद् रूपं महद् बिभ्रन्महान् पुरुष उच्यते ॥ २३ ॥
दण्ड सर्वत्र व्यापक होनेके कारण भगवान् विष्णु है और नरों (मनुष्यों) का अयन (आश्रय) होनेसे नारायण कहलाता है। वह प्रभावशाली होनेसे प्रभु और सदा महत् रूप धारण करता है, इसलिये महान् पुरुष कहलाता है ॥

तथोक्ता ब्रह्मकन्येति लक्ष्मीर्वृत्तिः सरस्वती ।
दण्डनीतिर्जगद्धात्री दण्डो हि बहुविग्रहः ॥ २४ ॥
इसी प्रकार दण्डनीति भी ब्रह्माजीकी कन्या कही गयी है। लक्ष्मी, वृत्ति, सरस्वती तथा जगद्धात्री भी उसीके नाम हैं। इस प्रकार दण्डके बहुत-से रूप हैं ॥

अर्थानर्थौ सुखं दुःखं धर्माधर्मौ बलाबले ।
दौर्भाग्यं भागधेयं च पुण्यापुण्ये गुणागुणौ ॥ २५ ॥
कामाकामावृतुर्मासः शर्वरी दिवसः क्षणः ।
अप्रमादः प्रमादश्च हर्षक्रोधौ शमो दमः ॥ २६ ॥
दैवं पुरुषकारश्च मोक्षामोक्षौ भयाभये ।
हिंसाहिंसे तपो यज्ञः संयमोऽथ विषाविषम् ॥ २७ ॥
अन्तश्चादिश्च मध्यं च कृत्यानां च प्रपञ्चनम् ।
मदः प्रमादो दर्पश्च दम्भो धैर्यं नयानयौ ॥ २८ ॥
अशक्तिः शक्तिरित्येवं मानस्तम्भौ व्ययाव्ययौ ।
विनयश्च विसर्गश्च कालाकालौ च भारत ॥ २९ ॥
अनृतं ज्ञानिता सत्यं श्रद्धाश्रद्धे तथैव च ।
क्लीबता व्यवसायश्च लाभालाभौ जयाजयौ ॥ ३० ॥
तीक्ष्णता मृदुता मृत्युरागमानागमौ तथा ।
विरोधश्चाविरोधश्च कार्याकार्ये बलाबले ॥ ३१ ॥
असूया चानसूया च धर्माधर्मौ तथैव च ।
अपत्रपानपत्रपे ह्रीश्च सम्पद्विपत्पदम् ॥ ३२ ॥
तेजः कर्माणि पाण्डित्यं वाक्शक्तिस्तत्त्वबुद्धिता ।
एवं दण्डस्य कौरव्य लोकेऽस्मिन् बहुरूपता ॥ ३३ ॥

अर्थ-अनर्थ, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म, बल-अबल, दौर्भाग्य-सौभाग्य, पुण्य-पाप, गुण-अवगुण, काम-अकाम, ऋतु-मास, दिन-रात, क्षण, प्रमाद-अप्रमाद, हर्ष-क्रोध, शम-दम, दैव-पुरुषार्थ, बन्ध-मोक्ष, भय-अभय, हिंसा-अहिंसा, तप-यज्ञ, संयम, विष-अविष, आदि, अन्त, मध्य, कार्यविस्तार, मद, असावधानता, दर्प, दम्भ, धैर्य, नीति-अनीति, शक्ति-

अशक्ति, मान, स्तब्धता, व्यय-अव्यय, विनय, दान, काल-अकाल, सत्य-असत्य, ज्ञान, श्रद्धा-अश्रद्धा, अकर्मण्यता, उद्योग, लाभ-हानि, जय-पराजय, तीक्ष्णता-मृदुता, मृत्यु, आना-जाना, विरोध-अविरोध, कर्तव्य-अकर्तव्य, सबलता-निर्बलता, असूया-अनसूया, धर्म-अधर्म, लज्जा-अलज्जा, सम्पत्ति-विपत्ति, स्थान, तेज, कर्म, पाण्डित्य, वाक्शक्ति तथा तत्त्वबोध—ये सब दण्डके ही अनेक नाम और रूप हैं। कुरुनन्दन! इस प्रकार इस जगत्में दण्डके बहुत-से रूप हैं ।। २५—३३ ।।

न स्याद् यदीह दण्डो वै प्रमथेयुः परस्परम् ।
भयाद् दण्डस्य नान्योन्यं घ्नन्ति चैव युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर! यदि संसारमें दण्डकी व्यवस्था न होती तो सब लोग एक-दूसरेको नष्ट कर डालते। दण्डके ही भयसे मनुष्य आपसमें मार-काट नहीं मचाते हैं ।। ३४ ।।

दण्डेन रक्ष्यमाणा हि राजन्नहरहः प्रजाः ।
राजानं वर्धयन्तीह तस्माद् दण्डः परायणम् ॥ ३५ ॥
राजन्! दण्डसे सुरक्षित रहती हुई प्रजा ही इस जगत्में अपने राजाको प्रतिदिन धन-धान्यसे सम्पन्न करती रहती है। इसलिये दण्ड ही सबको आश्रय देनेवाला है ।। ३५ ।।

व्यवस्थापयति क्षिप्रमिमं लोकं नरेश्वर ।
सत्ये व्यवस्थितो धर्मो ब्राह्मणेष्ववतिष्ठते ॥ ३६ ॥
नरेश्वर! दण्ड ही इस लोकको शीघ्र ही सत्यमें स्थापित करता है। सत्यमें ही धर्मकी स्थिति है और धर्म ब्राह्मणोंमें स्थित है ।। ३६ ।।

धर्मयुक्ता द्विजश्रेष्ठा वेदयुक्ता भवन्ति च ।
बभूव यज्ञो वेदेभ्यो यज्ञः प्रीणाति देवताः ॥ ३७ ॥
प्रीताश्च देवता नित्यमिन्द्रे परिवदन्त्यपि ।
अन्नं ददाति शक्रश्चाप्यनुगृह्णन्निमाः प्रजाः ॥ ३८ ॥
प्राणाश्च सर्वभूतानां नित्यमन्ने प्रतिष्ठिताः ।
तस्मात् प्रजाः प्रतिष्ठन्ते दण्डो जागर्ति तासु च ॥ ३९ ॥
धर्मयुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदोंका स्वाध्याय करते हैं। वेदोंसे ही यज्ञ प्रकट हुआ है। यज्ञ देवताओंको तृप्त करता है। तृप्त हुए देवता इन्द्रसे प्रजाके लिये प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, इससे इन्द्र प्रजाजनोंपर अनुग्रह करके (समयपर वर्षाके द्वारा खेती उपजाकर) उन्हें अन्न देता है, समस्त प्राणियोंके प्राण सदा अन्नपर ही टिके हुए हैं; इसलिये दण्डसे ही प्रजाओंकी स्थिति बनी हुई है। वही उनकी रक्षाके लिये सदा जाग्रत् रहता है ।। ३७—३९ ।।

एवंप्रयोजनश्चैव दण्डः क्षत्रियतां गतः ।
रक्षन् प्रजाः स जागर्ति नित्यं स्ववहितोऽक्षरः ॥ ४० ॥
इस प्रकार रक्षारूपी प्रयोजन सिद्ध करनेवाला दण्ड क्षत्रियभावको प्राप्त हुआ है। वह अविनाशी होनेके कारण सदा सावधान होकर प्रजाकी रक्षाके लिये जागता रहता

है ॥ ४० ॥ ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्त्वं चित्तं प्रजापतिः । भूतात्मा जीव इत्येवं नामभिः प्रोच्यतेऽष्टभिः ॥ ४१ ॥ ईश्वर, पुरुष, प्राण, सत्त्व, चित्त, प्रजापति, भूतात्मा तथा जीव—इन आठ नामोंसे दण्डका ही प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४१ ॥ अददद् दण्डमेवास्मै धृतमैश्वर्यमेव च । बलेन यश्च संयुक्तः सदा पञ्चविधात्मकः ॥ ४२ ॥ जो सर्वदा सैनिक-बलसे सम्पन्न है तथा जो धर्म, व्यवहार, दण्ड, ईश्वर और जीवरूपसे पाँच* प्रकारके स्वरूप धारण करता है, उस राजाको ईश्वरने ही दण्डनीति तथा अपना ऐश्वर्य प्रदान किया है ॥ ४२ ॥ कुलं बहुधनामात्याः प्रज्ञा प्रोक्ता बलानि तु । आहार्यमष्टकैर्द्रव्यैर्बलमन्यद् युधिष्ठिर ॥ ४३ ॥ युधिष्ठिर! राजाका बल दो तरह का होता है—एक प्राकृत और दूसरा आहार्य। उनमेंसे कुल, प्रचुर धन, मन्त्री तथा बुद्धि—ये चार प्राकृतिक बल कहे गये हैं, आहार्य बल उससे भिन्न है। वह निम्नांकित आठ वस्तुओंके द्वारा आठ प्रकारका माना गया है ॥ ४३ ॥ हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तिर्नावो विष्टिस्तथैव च । दैशिकाश्चाविकाश्चैव तदष्टाङ्गं बलं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, नौका, बेगार, देशकी प्रजा तथा भेड़ आदि पशु—ये आठ अंगोंवाला बल आहार्य माना गया है ॥ ४४ ॥ अथवाङ्गस्य युक्तस्य रथिनो हस्तियायिनः । अश्वारोहाः पदाताश्च मन्त्रिणो रसदाश्च ये ॥ ४५ ॥ भिक्षुकाः प्राड्विवाकाश्च मौहूर्ता दैवचिन्तकाः । कोशो मित्राणि धान्यं च सर्वोपकरणानि च ॥ ४६ ॥ सप्तप्रकृति चाष्टाङ्गं शरीरमिह यद् विदुः । राज्यस्य दण्डमेवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च ॥ ४७ ॥ अथवा संयुक्त अंगके रथी, हाथीसवार, घुड़सवार, पैदल, मन्त्री, वैद्य, भिक्षुक, वकील, ज्योतिषी, दैवज्ञ, कोश, मित्र, धान्य तथा अन्य सब सामग्री, राज्यकी सात प्रकृतियाँ (स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोश, राष्ट्र, दुर्ग और सेना) और उपर्युक्त आठ अंगोंसे युक्त बल—इन सबको राज्यका शरीर माना गया है। इन सबमें दण्ड ही प्रधान अंग है, क्योंकि दण्ड ही सबकी उत्पत्तिका कारण है ॥ ४५—४७ ॥ ईश्वरेण प्रयत्नेन कारणात् क्षत्रियस्य च । दण्डो दत्तः समानात्मा दण्डो हीदं सनातनम् ॥ ४८ ॥

ईश्वरने यत्नपूर्वक धर्मरक्षाके लिये क्षत्रियके हाथमें उसके समान जातिवाला दण्ड समर्पित किया है; इसलिये दण्ड ही इस सनातन व्यवहारका कारण है ॥ राज्ञां पूज्यतमो नान्यो यथा धर्मः प्रदर्शितः । ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं स्वधर्मस्थापनाय च ॥ ४९ ॥ ब्रह्माजीने लोकरक्षा तथा स्वधर्मकी स्थापनाके निमित्त जिस धर्मका प्रदर्शन (उपदेश) किया था, वह दण्ड ही है। राजाओंके लिये उससे बढ़कर परम पूजनीय दूसरा धर्म नहीं है ॥ ४९ ॥ भर्तृप्रत्यय उत्पन्नो व्यवहारस्तथापरः । तस्माद् यः स हितो दृष्टो भर्तृप्रत्ययलक्षणः ॥ ५० ॥ स्वामी अथवा विचारकके विश्वासके अनुसार जो व्यवहार उत्पन्न होता है, वह (वादी-प्रतिवादीद्वारा उठाये हुए विवादसे उत्पन्न व्यवहारकी अपेक्षा) भिन्न है। उससे जो दण्ड दिया जाता है, उसका नाम है 'भर्तृप्रत्ययलक्षण' वह सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर देखा गया है (यह पहला भेद है) ॥ ५० ॥ व्यवहारस्तु वेदात्मा वेदप्रत्यय उच्यते । मौलश्च नरशार्दूल शास्त्रोक्तश्च तथा परः ॥ ५१ ॥ नरश्रेष्ठ! वेदप्रतिपादित दोषोंका आचरण करने-वाले अपराधीके लिये जो व्यवहार या विचार होता है, वह वेदप्रत्यय कहलाता है (यह दूसरा भेद है) और कुलाचार भंग करनेके अपराधपर किये जानेवाले विचार या व्यवहारको मौल कहते हैं (यह तीसरा भेद है)। इसमें भी शास्त्रोक्त दण्डका ही विधान किया जाता है ॥ उक्तो यश्चापि दण्डोऽसौ भर्तृप्रत्ययलक्षणः । ज्ञेयो नः स नरेन्द्रस्थो दण्डः प्रत्यय एव च ॥ ५२ ॥ पहले जो भर्तृप्रत्ययलक्षण दण्ड बताया गया है, वह हमें राजामें ही स्थित जानना चाहिये; क्योंकि वह विश्वास और दण्ड राजापर ही अवलम्बित है ॥ ५२ ॥ दण्डः प्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मकः स्मृतः । व्यवहारः स्मृतो यश्च स वेदविषयात्मकः ॥ ५३ ॥ यद्यपि स्वामीके विश्वासके आधारपर ही वह दण्ड देखा गया है; तथापि उसे भी व्यवहारस्वरूप ही माना गया है। जिसे व्यवहार माना गया है, वह भी वेदोक्त विषयसे भिन्न नहीं है ॥ ५३ ॥ यश्च वेदप्रसूतात्मा स धर्मो गुणदर्शनः । धर्मप्रत्यय उद्दिष्टो यथाधर्मं कृतात्मभिः ॥ ५४ ॥ जिसका स्वरूप वेदसे प्रकट हुआ है, वह धर्म ही है। जो धर्म है, वह अपना गुण (लाभ) दिखाता ही है। पुण्यात्मा पुरुषोंने धर्मके अनुसार ही धर्मविश्वास मूलक दण्डका प्रतिपादन किया है ॥ ५४ ॥

व्यवहारः प्रजागोप्ता ब्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर ।
त्रीन् धारयति लोकान् वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ॥ ५५ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका बताया हुआ जो प्रजा-रक्षक व्यवहार है, वह सत्यस्वरूप होनेके साथ ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है, वही तीनों लोकोंको धारण करता है ॥ ५५ ॥

यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः ।
व्यवहारश्च दृष्टो यः स वेद इति निश्चितम् ॥ ५६ ॥
जो दण्ड है, वही हमारी दृष्टिमें सनातन व्यवहार है। जो व्यवहार देखा गया है, वही वेद है, यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है ॥ ५६ ॥

यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ।
ब्रह्मा पितामहः पूर्वं बभूवाथ प्रजापतिः ॥ ५७ ॥
जो वेद है, वही धर्म है और जो धर्म है, वही सत्पुरुषोंका सन्मार्ग है। सत्पुरुष हैं लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी, जो सबसे पहले प्रकट हुए थे ॥ ५७ ॥

लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् ।
समनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ॥ ५८ ॥
वे ही देवता, मनुष्य, नाग, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा हैं ॥

ततोऽन्यो व्यवहारोऽयं भर्तृप्रत्ययलक्षणः ।
तस्मादिदमथोवाच व्यवहारनिदर्शनम् ॥ ५९ ॥
उन्हींसे भर्तृप्रत्यय नामक इस अन्य प्रकारके दण्डकी प्रवृत्ति हुई; फिर उन्होंने ही इस व्यवहारके लिये यह आदर्श वाक्य कहा— ॥ ५९ ॥

माता पिता च भ्राता च भार्या चैव पुरोहितः ।
नादण्ड्यो विद्यते राज्ञो यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥ ६० ॥
'माता, पिता, भाई, स्त्री तथा पुरोहित कोई भी क्यों न हो, जो अपने धर्ममें स्थिर नहीं रहता, उसे राजा अवश्य दण्ड दे, राजाके लिये कोई भी अदण्डनीय नहीं है' ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डस्वरूपाधिकथने
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डके स्वरूपका वर्णनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥


१- 'विगतः अवहारः धर्मस्य येन सः व्यवहारः'। दूर हो गया है धर्मका अवहार (लोप) जिसके द्वारा, वह व्यवहार है। इस व्युत्पत्तिके अनुसार धर्मको लुप्त होनेसे बचाना ही व्यवहारका व्यवहारत्व है।

३-यहाँ पद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें आये हुए पदोंकी नीलकण्ठने व्यावहारिक दण्डके विशेषणरूपसे भी संगति लगायी है। इन विशेषणोंको रूपक मानकर अर्थ किया है।

* किन्हीं-किन्हींके मतमें प्रजाके जीवन, धन, मान, स्वास्थ्य और न्यायकी रक्षा करनेके कारण राजाका स्वरूप पाँच प्रकारका बताया गया है।

दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अङ्गेषु राजा द्युतिमान् वसुहोम इति श्रुतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस दण्डकी उत्पत्तिके विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। उसे भी तुम सुन लो। अंगदेशमें वसुहोम नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा राज्य करते थे ॥ १ ॥

स राजा धर्मविन्नित्यं सह पत्न्या महातपाः ।
मुञ्जपृष्ठं जगामाथ पितृदेवर्षिपूजितम् ॥ २ ॥
'एक समयकी बात है, वे महातपस्वी धर्मज्ञ नरेश अपनी पत्नीके साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंसे पूजित मुंजपृष्ठ नामक तीर्थस्थानमें आये ॥ २ ॥

तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते ।
यत्र मुञ्जावटे रामो जटाहरणमादिशत् ॥ ३ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभिः संशितव्रतैः ।
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्तः स देशो रुद्रसेवितः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय पर्वत सुमेरुके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर है, जहाँ मुंजावटमें परशुरामजीने अपनी जटाएँ बाँधनेका आदेश दिया था। तभीसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने उस रुद्रसेवित प्रदेशको मुंजपृष्ठ नाम दे दिया ॥ ३-४ ॥

स तत्र बहुभिर्युक्तस्तदा श्रुतिमयैर्गुणैः ।
ब्राह्मणानामनुमतो देवर्षिसदृशोऽभवत् ॥ ५ ॥
वे वहाँ बहुतेरे वेदोक्त गुणोंसे सम्पन्न हो तपस्या करने लगे। उस तपके प्रभावसे वे देवर्षियोंके तुल्य हो गये। ब्राह्मणोंमें उनका बड़ा सम्मान होने लगा ॥ ५ ॥

तं कदाचिददीनात्मा सखा शक्रस्य मानितः ।
अभ्यगच्छन्महीपालो मान्धाता शत्रुकर्शनः ॥ ६ ॥
एक दिन इन्द्रके सम्मानित सखा उदारचेता शत्रुसूदन राजा मान्धाता उनके दर्शनके लिये आये ॥

सोपसृत्य तु मान्धाता वसुहोमं नराधिपम् ।
दृष्ट्वा प्रकृष्टतपसं विनतोऽग्रेऽभ्यतिष्ठत ॥ ७ ॥

राजा मान्धाता उत्तम तपस्वी अंगनरेश वसुहोमके पास पहुँचकर दर्शन करके उनके सामने विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ७ ॥ वसुहोमोऽपि राज्ञो वै पाद्यमर्घ्यं न्यवेदयत् । सप्ताङ्गस्य तु राज्यस्य पप्रच्छ कुशलाव्यये ॥ ८ ॥ वसुहोमने भी राजाको पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया तथा सातों अंगोंसे युक्त उनके राज्यका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥ सद्गिराचरितं पूर्वं यथावदनुयायिनम् । अपृच्छद् वसुहोमस्तं राजन् किं करवाणि ते ॥ ९ ॥ पूर्वकालमें साधु पुरुषोंने जिस पथका अनुसरण किया था, उसीपर यथावत् रूपसे निरन्तर चलनेवाले मान्धातासे वसुहोमने पूछा—'राजन्! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' ॥ ९ ॥ सोऽब्रवीत्परमप्रीतो मान्धाता राजसत्तमम् । वसुहोमं महाप्राज्ञमासीनं कुरुनन्दन ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! तब परम प्रसन्न हुए मान्धाताने वहाँ बैठे हुए महाज्ञानी नृपश्रेष्ठ वसुहोमसे पूछा ॥ १० ॥

मान्धातोवाच

बृहस्पतेर्मतं राजन्नधीतं सकलं त्वया । तथैवौशनसं शास्त्रं विज्ञातं ते नरोत्तम ॥ ११ ॥ **मान्धाता बोले—**राजन्! नरश्रेष्ठ! आपने बृहस्पतिके सम्पूर्ण मतका अध्ययन किया है। साथ ही शुक्राचार्यके नीतिशास्त्रका भी आपको पूर्ण ज्ञान है ॥ ११ ॥ तदहं ज्ञातुमिच्छामि दण्ड उत्पद्यते कथम् । किं चास्य पूर्वं जागर्ति किं वा परममुच्यते ॥ १२ ॥ अतः मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि दण्डकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसके पहले कौन-सी वस्तु जागरूक थी? तथा इस दण्डको सबसे उत्कृष्ट क्यों कहा जाता है? ॥ कथं क्षत्रियसंस्थश्च दण्डः सम्प्रत्यवस्थितः । ब्रूहि मे सुमहाप्राज्ञ दास्याम्याचार्यवेतनम् ॥ १३ ॥ इस समय यह दण्ड क्षत्रियोंके हाथमें कैसे आया है? महामते! यह सब मुझे बताइये। मैं आपको गुरुदक्षिणा प्रदान करूँगा ॥ १३ ॥

वसुहोम उवाच

शृणु राजन् यथा दण्डः सम्भूतो लोकसंग्रहः । प्रजाविनयरक्षार्थं धर्मस्यात्मा सनातनः ॥ १४ ॥