महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1079)
इन्द्रका भगवान् विष्णुके साथ प्रश्नोत्तर
इस तरह इन सबकी पूजा करनेसे मैं महामना मनुष्योंपर संतुष्ट होता हूँ। जो मेरी पूजा करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा ॥ १३ ॥
अपि वा ब्राह्मणं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमागतम् ।
ब्राह्मणाग्र्याहुतिं दत्त्वा अमृतं तस्य भोजनम् ॥ १४ ॥
'ब्रह्मचारी ब्राह्मणको घरपर आया देख गृहस्थ पुरुष ब्राह्मणको प्रथम भोजन कराये, तत्पश्चात् स्वयं अवशिष्ट अन्नको ग्रहण करे तो उसका वह भोजन अमृतके समान माना गया है ॥ १४ ॥
ऐन्द्रीं संध्यामुपासित्वा आदित्याभिमुखः स्थितः ।
सर्वतीर्थेषु स स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १५ ॥
'जो प्रातःकालकी संध्या करके सूर्यके सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीर्थोंमें स्नानका फल मिलता है और वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ १५ ॥
एतद् वः कथितं गुह्यमखिलेन तपोधनाः ।
संशयं पृच्छमानानां किं भूयः कथयाम्यहम् ॥ १६ ॥
'तपोधनो! तुमलोगोंने जो संशय पूछा है, उसके समाधानके लिये मैंने यह सारा गूढ़ रहस्य तुम्हें बताया है। बताओ और क्या कहूँ' ॥ १६ ॥
बलदेव उवाच
श्रूयतां परमं गुह्यं मानुषाणां सुखावहम् ।
अजानन्तो यदबुधाः क्लिश्यन्ते भूतपीडिताः ॥ १७ ॥
**बलदेवजीने कहा—**जो मनुष्योंको सुख देनेवाला है तथा मूर्ख मानव जिसे न जाननेके कारण भूतोंसे पीड़ित हो नाना प्रकारके कष्ट उठाते रहते हैं, वह परम गोपनीय विषय मैं बता रहा हूँ; उसे सुनो ॥ १७ ॥
कल्य उत्थाय यो मर्त्यः स्पृशेद् गां वै घृतं दधि ।
सर्षपं च प्रियङ्गुं च कल्मषात् प्रतिमुच्यते ॥ १८ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गाय, घी, दही, सरसों और राईका स्पर्श करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥
भूतानि चैव सर्वाणि अग्रतः पृष्ठतोऽपि वा ।
उच्छिष्टं वापि छिद्रेषु वर्जयन्ति तपोधनाः ॥ १९ ॥
तपस्वी पुरुष आगे या पीछेसे आनेवाले सभी हिंसक जन्तुओंको त्याग देते—उन्हें छोड़कर दूर हट जाते हैं। इसी प्रकार संकटके समय भी वे उच्छिष्ट वस्तुका सदा परित्याग ही करते हैं ॥ १९ ॥
देवा ऊचुः
प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं तोयपूर्णमुदङ्मुखः ।
उपवासं तु गृह्णीयाद् यद् वा संकल्पयेद् व्रतम् ॥ २० ॥
देवता बोले— मनुष्य जलसे भरा हुआ ताँबेका पात्र लेकर उत्तराभिमुख हो उपवासका नियम ले अथवा और किसी व्रतका संकल्प करे ॥ २० ॥
देवतास्तस्य तुष्यन्ति कामिकं चापि सिध्यति ।
अन्यथा हि वृथा मर्त्याः कुर्वते स्वल्पबुद्धयः ॥ २१ ॥
जो ऐसा करता है, उसके ऊपर देवता संतुष्ट होते हैं और उसकी सारी मनोवांछा सिद्ध हो जाती है; परन्तु मंदबुद्धि मानव ऐसा न करके व्यर्थ दूसरे-दूसरे कार्य किया करते हैं ॥ २१ ॥
उपवासे बलौ चापि ताम्रपात्रं विशिष्यते ।
बलिर्भिक्षा तथार्घ्यं च पितॄणां च तिलोदकम् ॥ २२ ॥
ताम्रपात्रेण दातव्यमन्यथाल्पफलं भवेत् ।
गुह्यमेतत् समुद्दिष्टं यथा तुष्यन्ति देवताः ॥ २३ ॥
उपवासका संकल्प लेने और पूजाका उपचार समर्पित करनेमें ताम्रपात्रको उत्तम माना गया है। पूजन-सामग्री, भिक्षा, अर्घ्य तथा पितरोंके लिये तिल-मिश्रित जल ताम्रपात्रके द्वारा देने चाहिये अन्यथा उनका फल बहुत थोड़ा होता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात बतायी गयी है। इसके अनुसार कार्य करनेसे देवता संतुष्ट होते हैं ॥ २२-२३ ॥
धर्म उवाच
राजपौरुषिके विप्रे घण्टिके परिचारिके ।
गोरक्षके वाणिजके तथा कारुकुशीलवे ॥ २४ ॥
मित्रद्रुह्यनधीयाने यश्च स्याद् वृषलीपतिः ।
एतेषु दैवं पित्र्यं वा न देयं स्यात् कथंचन ॥ २५ ॥
पिण्डदास्तस्य हीयन्ते न च प्रीणाति वै पितॄन् ।
धर्मने कहा— ब्राह्मण यदि राजाका कर्मचारी हो, वेतन लेकर घण्टा बजानेका काम करता हो, दूसरोंका सेवक हो, गोरक्षा एवं वाणिज्यका व्यवसाय करता हो, शिल्पी या नट हो, मित्रद्रोही हो, वेद न पढ़ा हो अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीका पति हो, ऐसे लोगोंको किसी तरह भी देवकार्य (यज्ञ) और पितृकार्य (श्राद्ध) का अन्न आदि नहीं देना चाहिये। जो इन्हें पिण्ड या अन्न देते हैं, उनकी अवनति होती है तथा उनके पितरोंको भी तृप्ति नहीं होती ॥ २४-२५½ ॥
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ॥ २६ ॥
पितरस्तस्य देवाश्च अग्नयश्च तथैव हि ।
निराशाः प्रतिगच्छन्ति अतिथेरप्रतिग्रहात् ॥ २७ ॥
जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं ।। २६-२७ ।। स्त्रीघ्नैर्गोघ्नैः कृतघ्नैश्च ब्रह्मघ्नैर्गुरुतल्पगैः । तुल्यदोषो भवत्येभिर्यस्यातिथिर्नार्चितः ।। २८ ।। जिसके यहाँ अतिथिका सत्कार नहीं होता, उस पुरुषको स्त्रीहत्यारों, गोघातकों, कृतघ्नों, ब्रह्मघातियों और गुरुपत्नीगामियोंके समान पाप लगता है ।। २८ ।।
अग्निरुवाच
पादमुद्यम्य यो मर्त्यः स्पृशेद् गाश्च सुदुर्मतिः । ब्राह्मणं वा महाभागं दीप्यमानं तथानलम् ।। २९ ।। तस्य दोषान् प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं समाहिताः । अग्नि बोले— जो दुर्बुद्धि मनुष्य लात उठाकर उससे गौका, महाभाग ब्राह्मणका अथवा प्रज्वलित अग्निका स्पर्श करता है, उसके दोष बता रहा हूँ, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। २९ १/२ ।। दिवं स्पृशत्यशब्दोऽस्य त्रस्यन्ति पितरश्च वै ।। ३० ।। वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम् । पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्णति ।। ३१ ।। ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो उठते हैं। देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं ।। ३०-३१ ।। आजन्मनां शतं चैव नरके पच्यते तु सः । निष्कृतिं च न तस्यापि अनुमन्यन्ति कर्हिचित् ।। ३२ ।। वह सौ जन्मोंतक नरकमें पकाया जाता है। ऋषिगण कभी उसके उद्धारका अनुमोदन नहीं करते हैं ।। तस्माद् गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन । ब्राह्मणश्च महातेजा दीप्यमानस्तथानलः ।। ३३ ।। श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता । एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु यः पादमुत्सृजेत् ।। ३४ ।। इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये। जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है ।। ३३-३४ ।।
विश्वामित्र उवाच
श्रूयतां परमं गुह्यं रहस्यं धर्मसंहितम् ।
परमान्नेन यो दद्यात् पितॄणामौपहारिकम् ॥ ३५ ॥ गजच्छायायां पूर्वस्यां कुतपे दक्षिणामुखः । यदा भाद्रपदे मासि भवते बहुले मघा ॥ ३६ ॥ श्रूयतां तस्य दानस्य यादृशो गुणविस्तरः । कृतं तेन महच्छ्राद्धं वर्षाणीह त्रयोदश ॥ ३७ ॥ **विश्वामित्र बोले—**देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमें) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगत्में तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान् श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३५—३७ ॥
गाव ऊचुः बहुले समंगे ह्यकुतोऽभये च क्षेमे च सख्येव हि भूयसी च । यथा पुरा ब्रह्मपुरे सवत्सा शतक्रतोर्वज्रधरस्य यज्ञे ॥ ३८ ॥ भूयश्च या विष्णुपदे स्थिता या विभावसोश्चापि पथे स्थिता या । देवाश्च सर्वे सह नारदेन प्रकुर्वते सर्वसहेति नाम ॥ ३९ ॥ **गौओंने कहा—**पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें 'बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी' इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो-जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका 'सर्वसहा' नाम रख दिया ॥ ३८-३९ ॥ मन्त्रेणैतेनाभिवन्देत यो वै विमुच्यते पापकृतेन कर्मणा । लोकानवाप्नोति पुरंदरस्य गवां फलं चन्द्रमसो द्युतिं च ॥ ४० ॥ ये दोनों श्लोक मिलकर एक मन्त्र है। उस मन्त्रसे जो गौओंकी वन्दना करता है, वह पापकर्मसे मुक्त हो जाता है। गोसेवाके फलस्वरूप उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा वह चन्द्रमाके समान कान्तिलाभ करता है ॥ ४० ॥
एतं हि मन्त्रं त्रिदशाभिजुष्टं
पठेत् यः पर्वसु गोष्ठमध्ये ।
न तस्य पापं न भयं न शोकः
सहस्रनेत्रस्य च याति लोकम् ॥ ४१ ॥
जो पर्वके दिन गोशालामें इस देवसेवित मन्त्रका पाठ करता है, उसे न पाप होता है, न भय होता है और न शोक ही प्राप्त होता है। वह सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ४१ ॥
भीष्म उवाच
अथ सप्त महाभागा ऋषयो लोकविश्रुताः ।
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् ॥ ४२ ॥
प्रदक्षिणमभिक्रम्य सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर महान् सौभाग्यशाली विश्वविख्यात वसिष्ठ आदि सभी सप्तर्षियोंने कमलयोनि ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा की और सब-के-सब हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये ॥ ४२ १/२ ॥
उवाच वचनं तेषां वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः ॥ ४३ ॥
सर्वप्राणिहितं प्रश्नं ब्रह्मक्षत्रे विशेषतः ।
उनमेंसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिने समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा विशेषतः ब्राह्मण और क्षत्रियजातिके लिये लाभदायक प्रश्न उपस्थित किया— ॥ ४३ १/२ ॥
द्रव्यहीनाः कथं मर्त्या दरिद्राः साधुवर्तिनः ॥ ४४ ॥
प्राप्नुवन्तीह यज्ञस्य फलं केन च कर्मणा ।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ ४५ ॥
‘भगवन्! इस संसारमें सदाचारी मनुष्य प्रायः दरिद्र एवं द्रव्यहीन हैं। वे किस कर्मसे किस तरह यहाँ यज्ञका फल पा सकते हैं?’ उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा ॥ ४४-४५ ॥
ब्रह्मोवाच
अहो प्रश्नो महाभागा गूढार्थः परमः शुभः ।
सूक्ष्मः श्रेयांश्च मर्त्यानां भवद्भिः समुदाहृतः ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले—महान् भाग्यशाली सप्तर्षियो! तुम लोगोंने परम शुभकारक, गूढ़ अर्थसे युक्त, सूक्ष्म एवं मनुष्योंके लिये कल्याणकारी प्रश्न सामने रखा है ॥
श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये निखिलेन तपोधनाः ।
यथा यज्ञफलं मर्त्यो लभते नात्र संशयः ॥ ४७ ॥
तपोधनो! मनुष्य जिस प्रकार बिना किसी संशयके यज्ञका फल पाता है, वह सब पूर्णरूपसे बताऊँगा, सुनो ।। पौषमासस्य शुक्ले वै यदा युज्येत रोहिणी । तेन नक्षत्रयोगेन आकाशशयनो भवेत् ।। ४८ ।। एकवस्त्रः शुचिः स्नातः श्रद्दधानः समाहितः । सोमस्य रश्मयः पीत्वा महायज्ञफलं लभेत् ।। ४९ ।। पौषमासके शुक्ल पक्षमें जिस दिन रोहिणी नक्षत्रका योग हो, उस दिनकी रातमें मनुष्य स्नान आदिसे शुद्ध हो एक वस्त्र धारण करके श्रद्धा और एकाग्रताके साथ खुले मैदानमें आकाशके नीचे शयन करे और चन्द्रमाकी किरणोंका ही पान करता रहे। ऐसा करनेसे उसको महान् यज्ञका फल मिलता है ।। ४८-४९ ।। एतद् वः परमं गुह्यं कथितं द्विजसत्तमाः । यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति सूक्ष्मतत्त्वार्थदर्शिनः ।। ५० ।। विप्रवरो! तुमलोग सूक्ष्मतत्त्व एवं अर्थके ज्ञाता हो। तुमने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसके अनुसार मैंने तुम्हें यह परम गूढ़ रहस्य बताया है ।। ५० ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२६ ।।
अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन
विभावसुरुवाच
सलिलस्याञ्जलिं पूर्णमक्षतांश्च घृतोत्तराः ।
सोमस्योत्तिष्ठमानस्य तज्जलं चाक्षतांश्च तान् ॥ १ ॥
स्थितो ह्यभिमुखो मर्त्यः पौर्णमास्यां बलिं हरेत् ।
अग्निकार्यं कृतं तेन हुताश्चास्याग्नयस्त्रयः ॥ २ ॥
**अग्निदेवने कहा—**जो मनुष्य पूर्णिमा तिथिको चन्द्रोदयके समय चन्द्रमाकी ओर मुँह करके उन्हें जलकी भरी हुई एक अंजलि घी और अक्षतके साथ भेंट करता है, उसने अग्निहोत्रका कार्य सम्पन्न कर लिया। उसके द्वारा गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियोंको भलीभाँति आहुति दे दी गयी ॥ १-२ ॥
वनस्पतिं च यो हन्यादमावास्यामबुद्धिमान् ।
अपि ह्येकेन पत्रेण लिप्यते ब्रह्महत्यया ॥ ३ ॥
जो मूर्ख अमावास्याके दिन किसी वनस्पतिका एक पत्ता भी तोड़ता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ३ ॥
दन्तकाष्ठं तु यः खादेदमावास्यामबुद्धिमान् ।
हिंसितश्चन्द्रमास्तेन पितरश्चोद्विजन्ति च ॥ ४ ॥
जो बुद्धिहीन मानव अमावास्या तिथिको दन्तधावन काष्ठ चबाता है, उसके द्वारा चन्द्रमाकी हिंसा होती है और पितर भी उससे उद्विग्न हो उठते हैं ॥ ४ ॥
हव्यं न तस्य देवाश्च प्रतिगृह्णन्ति पर्वसु ।
कुप्यन्ते पितरश्चास्य कुले वंशोऽस्य हीयते ॥ ५ ॥
पर्वके दिन उसके दिये हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं। उसके पितर भी कुपित हो जाते हैं और उसके कुलमें वंशकी हानि होती है ॥ ५ ॥
श्रीरुवाच
प्रकीर्णं भाजनं यत्र भिन्नभाण्डमथासनम् ।
योषितश्चैव हन्यते कश्मलोपहते गृहे ॥ ६ ॥
देवताः पितरश्चैव उत्सवे पर्वणीषु वा ।
निराशाः प्रतिगच्छन्ति कश्मलोपहताद् गृहात् ॥ ७ ॥
**लक्ष्मी बोलीं—**जिस घरमें सब पात्र इधर-उधर बिखरे पड़े हों, बर्तन फूटे और आसन फटे हों तथा जहाँ स्त्रियाँ मारी-पीटी जाती हों, वह घर पापके कारण दूषित होता है। पापसे दूषित हुए उस गृहसे उत्सव और पर्वके अवसरोंपर देवता और पितर निराश लौट जाते हैं—उस घरकी पूजा नहीं स्वीकार करते ।। ६-७ ।।
अंगिरा उवाच
यस्तु संवत्सरं पूर्णं दद्याद् दीपं करञ्जके । सुवर्चलामूलहस्तः प्रजा तस्य विवर्धते ।। ८ ।। **अंगिराने कहा—**जो पूरे एक वर्षतक करंज (करज) वृक्षके नीचे दीपदान करे और ब्राह्मीबूटीकी जड़ हाथमें लिये रहे, उसकी संतति बढ़ती है ।। ८ ।।
गार्ग्य उवाच
आतिथ्यं सततं कुर्याद् दीपं दद्यात् प्रतिश्रये । वर्जयानो दिवा स्वापं न च मांसानि भक्षयेत् ।। ९ ।। गोब्राह्मणं न हिंस्याच्च पुष्कराणि च कीर्तयेत् । एष श्रेष्ठतमो धर्मः सरहस्यो महाफलः ।। १० ।। **गार्ग्यने कहा—**सदा अतिथियोंका सत्कार करे, घरमें दीपक जलाये, दिनमें सोना छोड़ दे। मांस कभी न खाय। गौ और ब्राह्मणकी हत्या न करे तथा तीनों पुष्कर तीर्थोंका प्रतिदिन नाम लिया करे। यह रहस्यसहित श्रेष्ठतम धर्म महान् फल देनेवाला है ।। ९-१० ।।
अपि क्रतुशतैरिष्ट्वा क्षयं गच्छति तद्धविः । न तु क्षीयन्ति ते धर्माः श्रद्दधानैः प्रयोजिताः ।। ११ ।। सैकड़ों बार किये हुए यज्ञका फल भी क्षीण हो जाता है; किंतु श्रद्धालु पुरुषोंद्वारा उपर्युक्त धर्मोंका पालन किया जाय तो वे कभी क्षीण नहीं होते ।। ११ ।।
इदं च परमं गुह्यं सरहस्यं निबोधत । श्राद्धकल्पे च दैवे च तीर्थिके पर्वणीषु च ।। १२ ।। रजस्वला च या नारी श्वित्रिकापुत्रिका च या । एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवताः ।। १३ ।। पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश । यह परम गोपनीय रहस्यकी बात सुनो। श्राद्धमें, यज्ञमें, तीर्थमें और पर्वोंके दिन देवताओंके लिये जो हविष्य तैयार किया जाता है, उसे यदि रजस्वला, कोढ़ी अथवा वन्ध्या स्त्री देख ले तो उनके नेत्रोंद्वारा देखे हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं तथा पितर भी तेरह वर्षोंतक असंतुष्ट रहते हैं ।। १२-१३½ ।।
शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् । कीर्तयेद् भारतं चैव तथा स्यादक्षयं हविः ।। १४ ।।
श्राद्ध और यज्ञके दिन मनुष्य स्नान आदिसे पवित्र होकर श्वेत वस्त्र धारण करे। ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये तथा महाभारत (गीता आदि) का पाठ करे। ऐसा करनेसे उसका हव्य और कव्य अक्षय होता है ॥ १४ ॥
धौम्य उवाच
भिन्नभाण्डं च खट्वां च कुक्कुटं शूनकं तथा । अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुहः ॥ १५ ॥ **धौम्य बोले—**घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अश्वत्थादि वृक्षका होना अच्छा नहीं माना गया है ॥ १५ ॥
भिन्नभाण्डे कलिं प्राहुः खट्वायां तु धनक्षयः । कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्रन्ति देवताः । वृक्षमूले ध्रुवं सत्त्वं तस्माद् वृक्षं न रोपयेत् ॥ १६ ॥ फूटे बर्तनमें कलियुगका वास कहा गया है। टूटी खाट रहनेसे धनकी हानि होती है। मुर्गे और कुत्तेके रहनेपर देवता उस घरमें हविष्य नहीं ग्रहण करते तथा मकानके अंदर कोई बड़ा वृक्ष होनेपर उसकी जड़के अंदर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओंका रहना अनिवार्य हो जाता है; इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगावे ॥ १६ ॥
जमदग्निरुवाच
यो यजेदश्वमेधेन वाजपेयशतेन ह । अवाक्शिरा वा लम्बेत सत्रं वा स्फीतमाहरेत् ॥ १७ ॥ न यस्य हृदयं शुद्धं नरकं स ध्रुवं व्रजेत् । तुल्यं यज्ञश्च सत्यं च हृदयस्य च शुद्धता ॥ १८ ॥ **जमदग्नि बोले—**कोई अश्वमेध या सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करे, नीचे मस्तक करके वृक्षमें लटके अथवा समृद्धिशाली सत्र खोल दे; किंतु जिसका हृदय शुद्ध नहीं है, वह पापी निश्चय ही नरकमें जाता है; क्योंकि यज्ञ, सत्य और हृदयकी शुद्धि तीनों बराबर हैं (फिर भी हृदयकी शुद्धि सर्वश्रेष्ठ है) ॥ १७-१८ ॥
शुद्धेन मनसा दत्त्वा सक्तुप्रस्थं द्विजातये । ब्रह्मलोकमनुप्राप्तः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १९ ॥ (प्राचीन समयमें एक ब्राह्मण) शुद्ध हृदयसे ब्राह्मणको सेरभर सत्तू दान करके ही ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ था। हृदयकी शुद्धिका महत्त्व बतानेके लिये यह एक ही दृष्टान्त पर्याप्त होगा ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन
वायुरुवाच
किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि मानुषाणां सुखावहम् ।
सरहस्यांश्च ये दोषास्तान् शृणुध्वं समाहिताः ॥ १ ॥
वायुदेवने कहा— मैं मनुष्योंके लिये सुखदायक धर्मका किंचित् वर्णन करता हूँ और रहस्यसहित जो दोष हैं, उन्हें भी बतलाता हूँ। तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ १ ॥
अग्निकार्यं च कर्तव्यं परमान्नेन भोजनम् ।
दीपकश्चापि कर्तव्यः पितॄणां सतिलोदकः ॥ २ ॥
प्रतिदिन अग्निहोत्र करना चाहिये। श्राद्धके दिन उत्तम अन्नके द्वारा ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। पितरोंके लिये दीप-दान तथा तिलमिश्रित जलसे तर्पण करना चाहिये ॥ २ ॥
एतेन विधिना मर्त्यः श्रद्धानः समाहितः ।
चतुरो वार्षिकान् मासान् यो ददाति तिलोदकम् ॥ ३ ॥
भोजनं च यथाशक्त्या ब्राह्मणे वेदपारगे ।
पशुबन्धशतस्येह फलं प्राप्नोति पुष्कलम् ॥ ४ ॥
जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्रताके साथ इस विधिसे वर्षाके चार महीनोंतक पितरोंको तिलमिश्रित जलकी अंजलि देता है और वेद-शास्त्रके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको यथाशक्ति भोजन कराता है, वह सौ यज्ञोंका पूरा फल प्राप्त कर लेता है ॥ ३-४ ॥
इदं चैवापरं गुह्यमप्रशस्तं निबोधत ।
अग्नेस्तु वृषलो नेता हविर्मूढाश्च योषितः ॥ ५ ॥
मन्यते धर्म एवेति स चाधर्मेण लिप्यते ।
अग्नयस्तस्य कुप्यन्ति शूद्रयोनिं स गच्छति ॥ ६ ॥
अब यह दूसरी उस गोपनीय बातको सुनो, जो उत्तम नहीं है अर्थात् निन्दनीय है। यदि शूद्र किसी द्विजके अग्निहोत्रकी अग्निको एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाता है तथा मूर्ख स्त्रियाँ यज्ञ-सम्बन्धी हविष्यको ले जाती हैं—इस कार्यको जो धर्म ही समझता है, वह अधर्मसे लिप्त होता है। उसके ऊपर अग्नियोंका कोप होता है और वह शूद्रयोनिमें जन्म लेता है ॥ ५-६ ॥
पितरश्च न तुष्यन्ति सह देवैर्विशेषतः ।
प्रायश्चित्तं तु यत् तत्र ब्रुवतस्तन्निबोध मे ॥ ७ ॥
उसके ऊपर देवताओंसहित पितर भी विशेष संतुष्ट नहीं होते हैं। ऐसे स्थलोंपर जो प्रायश्चित्तका विधान है, उसे बताता हूँ, सुनो ।। ७ ।।
यत् कृत्वा तु नरः सम्यक् सुखी भवति विज्वरः ।
गवां मूत्रपुरीषेण पयसा च घृतेन च ।। ८ ।।
अग्निकार्यं त्र्यहं कुर्यान्निराहारः समाहितः ।
ततः संवत्सरे पूर्णे प्रतिगृह्णन्ति देवताः ।। ९ ।।
हृष्यन्ति पितरश्चास्य श्राद्धकाल उपस्थिते ।
उसका भलीभाँति अनुष्ठान करके मनुष्य सुखी और निश्चिन्त हो जाता है। द्विजको चाहिये कि वह निराहार एवं एकाग्रचित्त होकर तीन दिनोंतक गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध और गोघृतसे अग्निमें आहुति दे। तत्पश्चात् एक वर्ष पूर्ण होनेपर देवता उसकी पूजा ग्रहण करते हैं और पितर भी उसके यहाँ श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर प्रसन्न होते हैं ।। ८-९½ ।।
एष ह्यधर्मो धर्मश्च सरहस्यः प्रकीर्तितः ।। १० ।।
मर्त्यानां स्वर्गकामानां प्रेत्य स्वर्गसुखावहः ।। ११ ।।
इस प्रकार मैंने रहस्यसहित धर्म और अधर्मका वर्णन किया। यह स्वर्गकी कामनावाले मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् स्वर्गीय सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२८ ।।
लोमशद्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
लोमशद्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन
लोमश उवाच
परदारेषु ये सक्ता अकृत्वा दारसंग्रहम् ।
निराशाः पितरस्तेषां श्राद्धकाले भवन्ति वै ॥ १ ॥
लोशमजीने कहा—जो स्वयं विवाह न करके परायी स्त्रियोंमें आसक्त हैं, उनके यहाँ श्राद्ध-काल आनेपर पितर निराश हो जाते हैं ॥ १ ॥
परदाररतिर्यश्च यश्च वन्ध्यामुपासते ।
ब्रह्मस्वं हरते यश्च समदोषा भवन्ति ते ॥ २ ॥
जो परायी स्त्रीमें आसक्त है, जो वन्ध्या स्त्रीका सेवन करता है तथा जो ब्राह्मणका धन हर लेता है—ये तीनों समान दोषके भागी होते हैं ॥ २ ॥
असम्भाष्या भवन्त्येते पितॄणां नाज संशयः ।
देवताः पितरश्चैषां नाभिनन्दन्ति तद्धविः ॥ ३ ॥
ये पितरोंकी दृष्टिमें बात करनेयोग्य नहीं रह जाते हैं, इसमें संशय नहीं है और देवता तथा पितर उसके हविष्यको आदर नहीं देते हैं ॥ ३ ॥
तस्मात् परस्य वै दारांस्त्यजेद् वन्ध्यां च योषितम् ।
ब्रह्मस्वं हि न हर्तव्यमात्मनो हितमिच्छता ॥ ४ ॥
अतः अपना हित चाहनेवाले पुरुषको परायी स्त्री और वन्ध्या स्त्रीका त्याग कर देना चाहिये तथा ब्राह्मणके धनका कभी अपहरण नहीं करना चाहिये ॥ ४ ॥
श्रूयतां चापरं गुह्यं रहस्यं धर्मसंहितम् ।
श्रद्दधानेन कर्तव्यं गुरूणां वचनं सदा ॥ ५ ॥
अब दूसरी धर्मयुक्त गोपनीय रहस्यकी बात सुनो। सदा श्रद्धापूर्वक गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ॥ ५ ॥
द्वादश्यां पौर्णमास्यां च मासि मासि घृताक्षतम् ।
ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छेत तस्य पुण्यं निबोधत ॥ ६ ॥
प्रत्येक मासकी द्वादशी और पूर्णिमाके दिन ब्राह्मणोंको घृतसहित चावलोंका दान करे। इसका जो पुण्य है, उसे सुनो ॥ ६ ॥
सोमश्च वर्धते तेन समुद्रश्च महोदधिः ।
अश्वमेधचतुर्भागं फलं सृजति वासवः ॥ ७ ॥
उस दानसे चन्द्रमा तथा महोदधि समुद्रकी वृद्धि होती है और उस दाताको इन्द्र अश्वमेध यज्ञका चतुर्थांश फल देते हैं ॥ ७ ॥
दानेनैतेन तेजस्वी वीर्यवांश्च भवेन्नरः ।
प्रीतश्च भगवान् सोम इष्टान् कामान् प्रयच्छति ॥ ८ ॥
उस दानसे मनुष्य तेजस्वी और बलवान् होता है और भगवान् सोम प्रसन्न होकर उसे अभीष्ट कामनाएँ प्रदान करते हैं ॥ ८ ॥
श्रूयतां चापरो धर्मः सरहस्यो महाफलः ।
इदं कलियुगं प्राप्य मनुष्याणां सुखावहः ॥ ९ ॥
अब दूसरे महान् फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका वर्णन सुनो। जो इस कलियुगको पाकर मनुष्योंके लिये सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ९ ॥
कल्यमुत्थाय यो मर्त्यः स्नातः शुक्लेन वाससा ।
तिलपात्रं प्रयच्छेत ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ १० ॥
तिलोदकं च यो दद्यात् पितॄणां मधुना सह ।
दीपकं कृसरं चैव श्रूयतां तस्य यत् फलम् ॥ ११ ॥
जो मनुष्य सबेरे उठकर स्नान करके पवित्र सफेद वस्त्रसे युक्त हो मनको एकाग्र करके ब्राह्मणोंको तिल-पात्रका दान करता है और पितरोंके लिये मधुयुक्त तिलोदक, दीपक एवं खिचड़ी देता है, उसको जो फल मिलता है, उसका वर्णन सुनो ॥ १०-११ ॥
तिलपात्रे फलं प्राह भगवान् पाकशासनः ।
गोप्रदानं च यः कुर्याद् भूमिदानं च शाश्वतम् ॥ १२ ॥
अग्निष्टोमं च यो यज्ञं यजेत बहुदक्षिणम् ।
तिलपात्रं सहैतेन समं मन्यन्ति देवताः ॥ १३ ॥
भगवान् इन्द्रने तिल-पात्रके दानका फल इस प्रकार बतलाया है—जो सदा गो-दान और भूमि-दान करता है तथा जो बहुत-सी दक्षिणावाले अग्निष्टोम यज्ञका अनुष्ठान करता है, उसके इन पुण्य-कर्मोंके समान ही देवतालोग तिल-पात्रके दानको भी मानते हैं ॥ १२-१३ ॥
तिलोदकं सदा श्राद्धे मन्यन्ते पितरोऽक्षयम् ।
दीपे च कृसरे चैव तुष्यन्तेऽस्य पितामहाः ॥ १४ ॥
पितरलोग सदा श्राद्धमें तिलसहित जलका दान करना अक्षय मानते हैं। दीपदान और खिचड़ीके दानसे उसके पितामह संतुष्ट होते हैं ॥ १४ ॥
स्वर्गे च पितृलोके च पितृदेवाभिपूजितम् ।
एवमेतन्मयोद्दिष्टमृषिदृष्टं पुरातनम् ॥ १५ ॥
यह पुरातन धर्म-रहस्य ऋषियोंद्वारा देखा गया है। स्वर्गलोक और पितृलोकमें भी देवताओं तथा पितरोंने इसका समादर किया है। इस प्रकार इस धर्मका मैंने वर्णन किया है ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि लोमशरहस्ये
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लोमशवर्णित धर्मका रहस्यविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥
अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन
त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन
भीष्म उवाच
ततस्त्वृषिगणाः सर्वे पितरश्च सदेवताः ।
अरुन्धतीं तपोवृद्धामपृच्छन्त समाहिताः ॥ १ ॥
समानशीलां वीर्येण वसिष्ठस्य महात्मनः ।
त्वत्तो धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।
यत्ते गुह्यतमं भद्रे तत् प्रभाषितुमर्हसि ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सभी ऋषियों, पितरों और देवताओंने तपस्यामें बढ़ी-चढ़ी हुई अरुन्धती देवीसे, जो शील और शक्तिमें महात्मा वसिष्ठजीके ही समान थीं, एकाग्रचित्त होकर पूछा—'भद्रे! हम आपके मुँहसे धर्मका रहस्य सुनना चाहते हैं। आपकी दृष्टिमें जो गुह्यतम धर्म हो, उसे बतानेकी कृपा करें' ॥ १-२ ॥
अरुन्धत्युवाच
तपोवृद्धिर्मया प्राप्ता भवतां स्मरणेन वै ।
भवतां च प्रसादेन धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ ३ ॥
सगुह्यान् सरहस्यांश्च तान् शृणुध्वमशेषतः ।
श्रद्दधाने प्रयोक्तव्या यस्य शुद्धं तथा मनः ॥ ४ ॥
अरुन्धती बोली—देवगण! आपलोगोंने मुझे स्मरण किया, इससे मेरे तपकी वृद्धि हुई है। अब मैं आप ही लोगोंकी कृपासे गोपनीय रहस्योंसहित सनातन धर्मोंका वर्णन करती हूँ, आपलोग वह सब सुनें। जिसका मन शुद्ध हो, उस श्रद्धालु पुरुषको ही इन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये ॥ ३-४ ॥
अश्रद्दधानो मानी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
असम्भाष्या हि चत्वारो नैषां धर्मः प्रकाशयेत् ॥ ५ ॥
जो श्रद्धासे रहित, अभिमानी, ब्रह्महत्यारे और गुरुस्त्रीगामी हैं, इन चार प्रकारके मनुष्योंसे बात भी नहीं करनी चाहिये। इनके सामने धर्मके रहस्यको प्रकाशित न करे ॥ ५ ॥
अहन्यहनि यो दद्यात् कपिलां द्वादशीः समाः ।
मासि मासि च सत्रेण यो यजेत सदा नरः ॥ ६ ॥
गवां शतसहस्रं च यो दद्याज्ज्येष्ठपुष्करे ।
न तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति ॥ ७ ॥ जो मनुष्य बारह वर्षोंतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है ॥ ६-७ ॥ श्रूयतां चापरो धर्मो मनुष्याणां सुखावहः । श्रद्दधानेन कर्तव्यः सरहस्यो महाफलः ॥ ८ ॥ अब मनुष्योंके लिये सुखदायक तथा महान् फल देनेवाले दूसरे धर्मका रहस्यसहित वर्णन सुनो। श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये ॥ ८ ॥ कल्यमुत्थाय गोमध्ये गृह्य दर्भान् सहोदकान् । निषिञ्चेत गवां शृङ्गे मस्तकेन च तज्जलम् ॥ ९ ॥ प्रतीच्छेत निराहारस्तस्य धर्मफलं शृणु । सबेरे उठकर कुश और जल हाथमें ले गौओंके बीचमें जाय। वहाँ गौओंके सींगपर जल छिड़के और सींगसे गिरे हुए जलको अपने मस्तकपर धारण करे। साथ ही उस दिन निराहार रहे। ऐसे पुरुषको जो धर्मका फल मिलता है, उसे सुनो ॥ ९१/२ ॥ श्रूयन्ते यानि तीर्थानि त्रिषु लोकेषु कानिचित् ॥ १० ॥ सिद्धचारणजुष्टानि सेवितानि महर्षिभिः । अभिषेकः समस्तेषां गवां शृङ्गोदकस्य च ॥ ११ ॥ तीनों लोकोंमें सिद्ध, चारण और महर्षियोंसे सेवित जो कोई भी तीर्थ सुने जाते हैं, उन सबमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही गायोंके सींगके जलसे अपने मस्तकको सींचनेसे प्राप्त होता है ॥ १०-११ ॥ साधु साध्विति चोद्दिष्टं देवतैः पितृभिस्तथा । भूतैश्चैव सुसंहृष्टैः पूजिता साप्यरुन्धती ॥ १२ ॥ यह सुनकर देवता, पितर और समस्त प्राणी बहुत प्रसन्न हुए। उन सबने उन्हें साधुवाद दिया और अरुन्धती देवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १२ ॥
पितामह उवाच
अहो धर्मो महाभागे सरहस्य उदाहृतः । वरं ददामि ते धन्ये तपस्ते वर्धतां सदा ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— महाभागे! तुम धन्य हो, तुमने रहस्यसहित अद्भुत धर्मका वर्णन किया है। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम्हारी तपस्या सदा बढ़ती रहे ॥ १३ ॥
यम उवाच
रमणीया कथा दिव्या युष्मत्तो या मया श्रुता ।
श्रूयतां चित्रगुप्तस्य भाषितं मम च प्रियम् ।। १४ ।। **यमराजने कहा—**देवताओ और महर्षियो! मैंने आपलोगोंके मुखसे दिव्य एवं मनोरम कथा सुनी है, अब आपलोग चित्रगुप्तका तथा मेरा भी प्रिय भाषण सुनिये ।। रहस्यं धर्मसंयुक्तं शक्यं श्रोतुं महर्षिभिः । श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता ।। १५ ।। इस धर्मयुक्त रहस्यको महर्षि भी सुन सकते हैं। अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको भी इसे श्रवण करना चाहिये ।। १५ ।। न हि पुण्यं तथा पापं कृतं किंचिद् विनश्यति । पर्वकाले च यत् किंचिदादित्यं चाधितिष्ठति ।। १६ ।। मनुष्यका किया हुआ कोई भी पुण्य तथा पाप भोगके बिना नष्ट नहीं होता। पर्वकालमें जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब सूर्यदेवके पास पहुँचता है ।। प्रेतलोकं गते मर्त्ये तत् तत् सर्वं विभावसुः । प्रतिजानाति पुण्यात्मा तच्च तत्रोपयुज्यते ।। १७ ।। जब मनुष्य प्रेतलोकको जाता है, उस समय सूर्यदेव वे सारी वस्तुएँ उसे अर्पित कर देते हैं और पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें उन वस्तुओंका उपभोग करता है ।। किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि चित्रगुप्तमतं शुभम् । पानीयं चैव दीपं च दातव्यं सततं तथा ।। १८ ।। अब मैं चित्रगुप्तके मतके अनुसार कुछ कल्याण-कारी धर्मका वर्णन करता हूँ। मनुष्यको जलदान और दीपदान सदा ही करने चाहिये ।। १८ ।। उपानहौ च छत्रं च कपिला च यथातथम् । पुष्करे कपिला देया ब्राह्मणे वेदपारगे ।। १९ ।। अग्निहोत्रं च यत्नेन सर्वशः प्रतिपालयेत् । उपानह (जूता), छत्र तथा कपिला गौका भी यथोचित रीतिसे दान करना चाहिये। पुष्कर तीर्थमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला गाय देनी चाहिये और अग्निहोत्रके नियमका सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये ।। १९½ ।। अयं चैवापरो धर्मश्चित्रगुप्तेन भाषितः ।। २० ।। फलमस्य पृथक्त्वेन श्रोतुमर्हन्ति सत्तमाः । प्रलयं सर्वभूतैस्तु गन्तव्यं कालपर्ययात् ।। २१ ।। इसके सिवा यह एक दूसरा धर्म भी चित्रगुप्तने बताया है। उसके पृथक्-पृथक् फलका वर्णन सभी साधु पुरुष सुनें। समस्त प्राणी कालक्रमसे प्रलयको प्राप्त होते हैं ।। तत्र दुर्गमनुप्राप्ताः क्षुत्तृष्णारिपीडिताः । दह्यमाना विपच्यन्ते न तत्रास्ति पलायनम् ।। २२ ।।
पापोंके कारण दुर्गम नरकमें पड़े हुए प्राणी भूख-प्याससे पीड़ित हो अतामें जलते हुए पकाये जाते हैं। वहाँ उस यातनासे निकल भागनेका कोई उपाय नहीं है ।। अन्धकारं तमो घोरं प्रविशन्त्यल्पबुद्धयः । तत्र धर्मं प्रवक्ष्यामि येन दुर्गाणि संतरेत् ।। २३ ।। मन्दबुद्धि मनुष्य ही नरकके घोर दुःखमय अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। उस अवसरके लिये मैं धर्मका उपदेश करता हूँ, जिससे मनुष्य दुर्गम नरकसे पार हो सकता है ।। २३ ।। अल्पव्ययं महार्थं च प्रेत्य चैव सुखोदयम् । पानीयस्य गुणा दिव्याः प्रेतलोके विशेषतः ।। २४ ।। उस धर्ममें व्यय बहुत थोड़ा है, परंतु लाभ महान् है। उससे मृत्युके पश्चात् भी उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं। प्रेतलोकमें ये गुण विशेषरूपसे लक्षित होते हैं ।। २४ ।। तत्र पुण्योदका नाम नदी तेषां विधीयते । अक्षयं सलिलं तत्र शीतलं ह्यमृतोपमम् ।। २५ ।। वहाँ पुण्योदका नामसे प्रसिद्ध नदी है, जो यमलोकनिवासियोंके लिये विहित है। उसमें अमृतके समान मधुर, शीतल एवं अक्षय जल भरा रहता है ।। स तत्र तोयं पिबति पानीयं यः प्रयच्छति । प्रदीपस्य प्रदानेन श्रूयतां गुणविस्तरः ।। २६ ।। जो यहाँ जलदान करता है, वही परलोकमें जानेपर उस नदीका जल पीता है। अब दीपदानसे जो अधिकाधिक लाभ होता है, उसको सुनो ।। २६ ।। तमोऽन्धकारं नियतं दीपदो न प्रपश्यति । प्रभां चास्य प्रयच्छन्ति सोमभास्करपावकाः ।। २७ ।। दीपदान करनेवाला मनुष्य नरकके नियत अन्धकारका दर्शन नहीं करता। उसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि प्रकाश देते रहते हैं ।। २७ ।। देवताश्चानुमन्यन्ते विमलाः सर्वतो दिशः । द्योतते च यथाऽऽदित्यः प्रेतलोकगतो नरः ।। २८ ।। देवता भी दीपदान करनेवालेका आदर करते हैं। उसके लिये सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल होती हैं तथा प्रेतलोकमें जानेपर वह मनुष्य सूर्यके समान प्रकाशित होता है ।। तस्माद् दीपः प्रदातव्यः पानीयं च विशेषतः । कपिलां ये प्रयच्छन्ति ब्राह्मणे वेदपारगे ।। २९ ।। पुष्करे च विशेषेण श्रूयतां तस्य यत् फलम् । गोशतं सवृषं तेन दत्तं भवति शाश्वतम् ।। ३० ।। इसलिये विशेष यत्न करके दीप और जलका दान करना चाहिये। विशेषतः पुष्कर तीर्थमें जो वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला दान करते हैं, उन्हें उस दानका जो