न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
षट्पक्षीप्रकरणम् [ ३९-४० ]
३६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० मपोहाच्छब्दस्योपलब्धिलक्षणाऽभिव्यक्तिर्भवतीति। तस्मात् 'उत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यते' इति ॥ ३८ ॥ षट्पक्षीप्रकरणम् [ ३९-४० ] हेतोश्चेदनेकान्तिकत्वमुपपाद्यते, अनैकान्तिकत्वादसाधकः स्याद् इति। यदि चानैकान्तिकत्वादसाधकत्वम्; प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः ॥ ३९ ॥ प्रतिषेधोऽप्यनैकान्तिकः। किञ्चित् प्रतिषेधति, किञ्चिन्नेति—अनैकान्ति- कत्वादसाधक इति। अथ वा—शब्दस्यानित्यत्वपक्षे प्रयत्नानन्तरमुत्पादो नाभिव्यक्तिरिति विशेषहेत्वभावः। नित्यत्वपक्षेऽपि प्रयत्नानन्तरमभिव्यक्ति- र्नोत्पाद इति विशेषहेत्वभावः। सोऽयमुभयपक्षसमो विशेषहेत्वभाव इत्युभय- मप्यनैकान्तिकमिति ॥ ३९ ॥ सर्वत्रैवम् ॥ ४० ॥ शब्द की उपलब्धिलक्षण अभिव्यक्ति होती हो। अतः यही मानना चाहिये कि 'शब्द उत्पन्न होता है न कि अभिव्यक्त' ॥ ३८ ॥ [ इस प्रकार चौबीस जातियों का क्रमशः लक्षण तथा प्रत्याख्यानोपाय बताते हुए, शब्दानित्यत्व भी साथ-साथ सिद्ध कर दिया गया। अब षट्पक्षीरूप कथाभास का प्रसंग उठा रहे हैं— ] 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण, घट की तरह'—यह स्थापनावादी का प्रथम पक्ष है। यहाँ हेतु में व्यभिचार दोष दिखाकर 'व्यभिचार होने से प्रयत्नानन्तरीयकत्व हेतु शब्दानित्यत्व सिद्ध नहीं कर सकता' यह द्वितीय पक्ष प्रति- वादी का है। यदि व्यभिचार होने से हेतु साध्य का असाधक है तो प्रतिषेध में भी समानदोष है ॥ ३९ ॥ प्रतिषेध भी व्यभिचरित है; क्योंकि वह किसी में नित्यत्व का प्रतिषेध करता है, किसी में नहीं। यों अनैकान्तिक होने से प्रतिषेध भी असाधक है। यह तीसरा पक्ष है। अथवा—शब्द के अनित्यत्वपक्ष में प्रयत्न के पश्चात् उत्पाद है, अभिव्यक्ति नहीं'— इसमें कोई विशेष हेतु नहीं दिया गया। उधर नित्यत्वपक्ष में 'प्रयत्न के पश्चात् अभि- व्यक्ति है, उत्पाद नहीं'—इसमें भी कोई विशेष हेतु नहीं दिया गया। इस प्रकार, दोनों ही पक्षों में विशेषहेत्वभाव समान है, अतः यहाँ अनैकान्तिक दोष है ॥ ३९ ॥ [ प्रसङ्गोपात्त एक बात बीच में ही कह रहे हैं— ] सर्वत्र ऐसा ही है ॥ ४० ॥
४२. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६७
४२. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६७ सर्वेषु साधर्म्यप्रभृतिषु प्रतिषेधहेतुषु यत्र यत्राविशेषो दृश्यते, तत्रोभयोः पक्षयोः समः प्रसज्यत इति ॥ ४० ॥ प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद् दोषः ॥ ४१ ॥ योऽयं प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः-अनैकान्तिकत्वमापद्यते, सोऽयं प्रतिषेधस्य प्रतिषेधेऽपि समानः । तत्र 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्' इति साधन- वादिनः स्थापना, प्रथमः पक्षः । 'प्रयत्नकार्यनेकत्वात् कार्यसमः' इति दूषण- वादिनः प्रतिषेधहेतुना द्वितीयः पक्षः, स च 'प्रतिषेधः' इत्युच्यते । तस्यास्य 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इति तृतीयः पक्षो 'विप्रतिषेधः' उच्यते । तस्मिन् प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो दोषोऽनैकान्तिकत्वं चतुर्थः पक्षः ॥ ४१ ॥ प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥४२॥ प्रतिषेधं द्वितीय पक्षं सदोषमभ्युपेत्य तदुद्धारमनुक्त्वाऽनुज्ञाय प्रतिषेध- विप्रतिषेधे तृतीयपक्षे समानमनैकान्तिकत्वमिति समानं दूषणं प्रसजतो दूषणवादिनो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति पञ्चमः पक्षः ॥ ४२ ॥ सभी 'साधर्म्यसम' प्रभृति प्रतिषेधहेतुओं ( जातियों ) में, जहाँ जहाँ विशेष नहीं दिखायी देता, वहाँ दोनों ही पक्षों में समान दोष आता है ॥ ४० ॥ [ पुनः प्रकृत में आते हैं-- ] प्रतिषेध के विप्रतिषेध ( खण्डन ) में प्रतिषेध के समान ही दोष हैं ॥ ४१ ॥ यह जो प्रतिषेध में सर्वत्र समान दोष—व्यभिचार—बतलाया था, वह प्रतिषेध के खण्डन में भी समान ही है । यह चतुर्थ पक्ष हुआ । यहाँ क्रमशः—१. 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है'—यह प्रथम- पक्ष है । २. 'प्रयत्न के अनेक कार्य होने से यहाँ कार्यसम दोष है'—यह हेतुपुरस्सर प्रतिषेधात्मक द्वितीयपक्ष है । ३. 'दोनों पक्षों में व्यभिचारदोष समानरूप से है'—यह विप्रतिषेधात्मक तृतीयपक्ष है । तथा ४. 'प्रतिषेध का खण्डन करने में भी व्यभिचाररूप समान दोष है'—यह चतुर्थपक्ष है ॥ ४१ ॥ अब पञ्चमपक्ष कहते हैं— दोषयुक्त को प्रतिषेध मानकर प्रतिषेध के विप्रतिषेध में समानदोष प्रसङ्ग उठाना 'मतानुज्ञा' ( निग्रहस्थान या स्वीकृति ) है ॥ ४२ ॥ प्रतिषेधपरक द्वितीय पक्ष को दोषयुक्त मानकर उसका खण्डन न कह कर, अपितु स्वीकार करके प्रतिषेध के खण्डनपरक तृतीय पक्ष में समान अनैकान्तिकत्व है, अतः ऐसा कहनेवाले को दूषण प्रसक्त होने की दशा में दोषवादी की 'मतानुज्ञा' प्रसक्त हुई । यह पञ्चम पक्ष है ॥ ४२ ॥
३६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात् समानो दोष इति ॥ ४३ ॥ स्थापनापक्षे प्रयत्नकार्यानिकत्वादिति दोषः स्थापनाहेतुवादिनः स्वपक्ष- लक्षणो भवति । कस्मात् ? स्वपक्षसमुत्थत्वात् । सोऽयं स्वपक्षलक्षणं दोष- मपेक्षमाणोऽनुद्धृत्यानुज्ञाय प्रतिषेधेऽपि समानो दोष इत्युपपद्यमानं दोषं परपक्षे उपसंहरति । इत्थं चानैकान्तिकः प्रतिषेध इति हेतुं निर्दिशति । तत्र स्वपक्ष- लक्षणापेक्षयोपपद्यमानदोषोपसंहारे हेतुनिर्देशे च सत्यनेन परपक्षोऽभ्युपगतो भवति । कथं कृत्वा ? यः परेण प्रयत्नकार्यानेकत्वादित्यादिनाऽनैकान्तिकदोष उक्तः, तमनुद्धृत्य 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इत्याह । एवं स्थापनां सदोषा- मभ्युपेत्य प्रतिषेधेऽपि समानं दोषं प्रसजतः परपक्षाभ्युपगमात् समानो दोषो भवति । यथा परस्य प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति, तथाऽस्यापि स्थापनां सदोषामभ्युपेत्य प्रतिषेधेऽपि समानं दोषं प्रसजतो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति । स खल्वयं षष्ठः पक्षः । तत्र खलु स्थापनाहेतुवादिनः प्रथमतृतीयपञ्चमपक्षाः, प्रतिषेधहेतुवादिनः द्वितीयचतुर्थषष्ठपक्षाः । तेषां साध्वसाधुतायां मीमांस्यमानायां चतुर्थषष्ठयोरर्था- अपने पक्ष में दोष के लक्षण की अपेक्षा से हेतु के निर्देश में, परपक्ष में दोष मानने से अथवा उपपादन के उपसंहार से, दोष देखने में समान दोष है ॥ ४३ ॥ 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है'—इस स्थापनापक्ष में प्रयत्न- कार्यनिकत्वहेतु से दोषोद्भावन स्थापनाहेतुवादी (प्रतिपक्षी) का स्वपक्षलक्षण है; क्योंकि वह इसी हेतु से अपना पक्ष समुपस्थापित कर रहा है। वह स्थापनावादी स्वपक्षलक्षण दोष को समझता हुआ भी उसे न हटाकर, यों उसे स्वीकार करता हुआ 'प्रतिषेध में भी समान दोष है' ऐसा कहकर, उपपन्न दोष को परपक्ष में उपसंहृत करता है, और इस तरह प्रतिषेध अनैकान्तिक हेतुदोष का निर्देश करता है। वहाँ स्वपक्षलक्षण की अपेक्षा से उपपद्यमान दोष का उपसंहार तथा हेतु का निर्देश होने पर परपक्ष में दोष स्वीकृत होता है। कैसे ? वह प्रतिपक्षी द्वारा कहा गया 'प्रयत्नकार्यों के अनेक होने से' इत्यादि हेतु में अनैकान्तिक दोष का खण्डन किये बिना, 'प्रतिषेध में भी समान दोष है'—ऐसा कहता है । इसी तरह प्रतिपक्षी की सदोष स्थापना को स्वीकार कर प्रतिषेध में भी समान दोष देते हुए परपक्ष को स्वीकार करता है, अतः उक्त मत में भी समान दोष आता है। अतः जैसे प्रतिपक्षी के प्रतिषेध को सदोष समझकर प्रतिषेध के विप्रतिषेध में समान दोष 'मतानुज्ञा' प्रसक्त होता है, उसी तरह इसके स्थापनापक्ष को भी सदोष मानकर प्रतिषेध में समान दोष प्रसक्त करने वाले को 'मतानुज्ञा' प्रसक्त होगी। यह षष्ठ पक्ष है। यहाँ—प्रथम, तृतीय तथा पञ्चम पक्ष स्थापनाहेतुवादी के हैं; तथा द्वितीय, चतुर्थ एवं षष्ठ पक्ष प्रतिषेधहेतुवादी के हैं। इन पक्षों को साधुता, असाधुता का विचार करने
४३. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६९
४३. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६९ विशेषात् पुनरुक्तदोषप्रसङ्गः । चतुर्थपक्षे समानदोषत्वं परस्योच्यते-प्रतिषेध- विप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोष इति; षष्ठेऽपि परपक्षाभ्युपगमात् समानो दोष इति समानदोषत्वमेवोच्यते, नार्थविशेषः कश्चिदस्ति । समानस्तुतीयपञ्चमयोः पुरुक्तदोषप्रसङ्गः । तृतीयपक्षेऽपि 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इति समानत्व- मभ्युपगम्यते । पञ्चमपक्षेऽपि प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गोऽभ्यु- गम्यते, नार्थविशेषः कश्चिदुच्यत इति । तत्र पञ्चमषष्ठपक्षयोः अर्थाविशेषात् पुनरुक्तदोषः, तृतीयचतुर्थयोर्मतानुज्ञा, प्रथमद्वितीययोर्विशेषहेत्वभाव इति— षट्पक्ष्यामुभयोरसिद्धिः । कदा षट्पक्षी ? यदा 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इत्येवं प्रवर्त्तते, तदोभयोः पक्षयोरसिद्धिः। यदा तु 'कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः' इत्यनेन तृतीयपक्षो युज्यते, तदा विशेषहेतुवचनात् 'प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः शब्दस्य नाभिव्यक्तिः' इति सिद्धः प्रथमपक्षः, न षट्पक्षी प्रवर्त्तत इति ॥ ४३ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमाध्यायस्याद्यमाह्निकम् ० पर चतुर्थ तथा षष्ठ पक्ष में अर्थ भिन्न न होने से पुनरुक्त दोष है; क्योंकि चतुर्थ पक्ष में प्रतिषेध के खण्डन में 'प्रतिषेध दोष की तरह दोष ही हैं'—ऐसा कहकर दूसरे को समानदोष दिया जाता है, तथा षष्ठ पक्ष में भी 'परपक्ष की स्वीकृति से समान दोष ही ही हैं'—ऐसा कहने से समानदोषत्व के अतिरिक्त कोई नयी बात नहीं कही गयी । इसी प्रकार तृतीय तथा पञ्चम पक्ष में भी पुनरुक्त दोष ही है । तृतीय पक्ष में 'प्रतिषेध में भी समान दोष हैं' ऐसा कहने से समानत्व ही कहा जा रहा है, तथा पञ्चमपक्ष में भी प्रतिषेध के खण्डन में समानदोष-प्रसङ्ग स्वीकार किया जा रहा है, कोई नयी बात नहीं कही जा रही । इस प्रकार पञ्चम तथा षष्ठ पक्ष में भिन्न अर्थ न होने से पुनरुक्त दोष है, तृतीय तथा चतुर्थ में मतानुज्ञा है, प्रथम तथा द्वितीय में विशेषहेत्वभाव है—यों इस षट्पक्षी में वादी, प्रतिवादी दोनों में से किसी के भी पक्ष की सिद्धि ( तत्त्वनिर्णय ) नहीं होगी । यह षट्पक्षी कब होती है ? जब 'प्रतिषेध में समान दोष हैं'—ऐसा कहा जाता हैं, तब दोनों ही पक्षों की असिद्धि है । किन्तु जब 'कार्यान्यत्व में प्रयत्नाहेतुत्व अनुपलब्धि- कारणोपपादन से सिद्ध हैं'—ऐसा तीसरा पक्ष रखा जाता है तब विशेषहेतु-वचन से शब्द का प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होना ही सिद्ध होता है, न कि अभिव्यक्ति । यों प्रथम पक्ष ही सिद्ध है—ऐसा तत्त्वनिर्णय हो जाता है । तब यह षट्पक्षी प्रवृत्त नहीं होती ॥ ४३ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में पञ्चमाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त ० न्या० द० ८-२४
३७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० [ द्वितीयमाह्निकम् ] विप्रतिपत्त्यप्रतिपत्त्योर्विकल्पान्निग्रहस्थानबहुत्वमिति सङ्क्षेपेणोक्तम् ( १.२.२०), तदिदानीं विभजनीयम् । निग्रहस्थानानि खलु पराजयवस्तून्य- पराधाधिकरणानि प्रायेण प्रतिज्ञाद्यवयवाश्रयाणि तत्त्ववादिनमतत्त्ववादिनं चाभिसम्प्लवन्ते । तेषां विभागः— प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासो हेत्वन्तरमर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकमप्राप्तकालं न्यूनमधिकं पुनरुक्तमननुभाषणमज्ञानम- प्रतिभा विक्षेपो मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं निरनुयोज्यानुयोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वा- भासाश्च निग्रहस्थानानि ॥ १ ॥ तानीमानि द्वाविंशतिधा विभज्य लक्ष्यन्ते ॥ १ ॥ निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् [ २-६ ] प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा स्वदृष्टान्ते प्रतिज्ञाहानिः ॥ २ ॥ साध्यधर्मप्रत्यनीकेन धर्मेण प्रत्यवस्थिते प्रतिदृष्टान्तधर्मं स्वदृष्टान्तेऽभ्यनु- जानन् प्रतिज्ञां जहातीति 'प्रतिज्ञाहानिः' । निदर्शनम्—'ऐन्द्रियकत्वादनित्यः 'विप्रतिपत्ति तथा अप्रतिपत्ति के विकल्प से बहुत से निग्रहस्थान हैं' ऐसा हम पीछे ( १. २. २०) संक्षेप से बता आये हैं। उसका अब विस्तार से वर्णन करना चाहिये। निग्रहस्थान वे होते हैं जिनमें जकड़े जाने से वादी या प्रतिवादी पराजय पा सकते हैं। ये निग्रहस्थान पराजयाधिकरण हैं तथा प्रतिज्ञादि अवयवों का आश्रय लिये रहते हैं। और वादी प्रतिवादी को किङ्कर्तव्यविमूढ बनाते हैं, अतः इनका ज्ञान भी होना आवश्यक है। उन निग्रहस्थानों का विभाग ( परिगणन ) यह है— १. प्रतिज्ञाहानि, २. प्रतिज्ञान्तर, ३. प्रतिज्ञाविरोध, ४. प्रतिज्ञासंन्यास, ५. हेत्व- न्तर, ६. अर्थान्तर, ७. निरर्थक, ८. अविज्ञातार्थ, ९. अपार्थक, १०. अप्राप्तकाल, ११. न्यून, १२. अधिक, १३. पुनरुक्त, १४. अननुभाषण, १५. अज्ञान, १६. अप्रतिभा, १७. विक्षेप, १८. मतानुज्ञा, १९. पर्यनुयोज्योपेक्षण, २०. निरनुयोज्यानुयोग, २१. अप- सिद्धान्त तथा २२. हेत्वाभास—ये निग्रहस्थान हैं ॥ १ ॥ इन बाईस प्रकार से विभक्त निग्रहस्थानों का वक्ष्यमाण सूत्रों में लक्षण करेंगे ॥१॥ उनमें प्रथम 'प्रतिज्ञाहानि' निग्रहस्थान का लक्षण कर रहे हैं— परपक्ष के धर्म को मानना अपने पक्ष में 'प्रतिज्ञाहानि' कहलाता है ॥ २ ॥ वादी स्थापनापक्ष उपस्थित करता है, तब प्रतिवादी वादिसाध्यरूप धर्म का विरुद्ध धर्म से प्रत्याख्यान करता है, और प्रतिदृष्टान्त भी कहता है। अब यदि वादी प्रति- वाद्युक्त प्रतिदृष्टान्तधर्म (साध्यविरुद्ध धर्म) को ( स्वदृष्टान्त में ) स्वीकार कर लेता हो तो प्रतिज्ञा को छोड़ बैठता है यह उसकी प्रतिज्ञाहानि है। उदाहरण के लिये—'ऐन्द्रियक
३. सू० ] निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७१
३. सू० ] निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७१ शब्दो घटवत्' इति कृते, अपर आह—'दृष्टमैन्द्रियकत्वं सामान्ये नित्ये, कस्मान्न तथा शब्दः' इति प्रत्यवस्थिते, इदमाह—'यद्यैन्द्रियकं सामान्यं नित्यं कामं घटो नित्योस्तु' इति । स खल्वयं साधकस्य दृष्टान्तस्य नित्यत्वं प्रसञ्जयन्निगमनान्तमेव पक्षं जहाति, पक्षं जहत्प्रतिज्ञां जहातीत्युच्यते; प्रतिज्ञाश्रयत्वात् पक्षस्येति ॥ २ ॥ प्रतिज्ञातार्थ प्रतिषेधेधर्मविकल्पात् तदर्थनिर्देशः प्रतिज्ञान्तरम् ॥ ३ ॥ प्रतिज्ञातार्थः अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात् घटवत्' इत्युक्ते योऽस्य प्रतिषेधः प्रतिदृष्टान्तेन हेतुव्यभिचारः 'सामान्यमैन्द्रियकं नित्यम्' इति, तस्मिंश्च प्रतिज्ञातार्थ- प्रतिषेधे धर्मविकल्पादिति दृष्टान्तप्रतिदृष्टान्तयोः साधर्म्ययोगे धर्मभेदात् 'सामान्य- मैन्द्रियकं सर्वगतम्, ऐन्द्रियकस्त्वसर्वगतो घटः' इति धर्मविकल्पात्तदर्थनिर्देश इति साध्यसिद्धयर्थम्, कथम् ? यथा घटोऽसर्वगतः, एवं शब्दोऽप्यसर्वंगतो घटवदेवा- नित्य इति । 'तत्रानित्यः शब्द' इति पूर्वा प्रतिज्ञा, 'असर्वगतः' इति द्वितीया प्रतिज्ञा प्रतिज्ञान्तरम् । तत्कथं निग्रहस्थानमिति ? न प्रतिज्ञायाः साधनं प्रतिज्ञान्तरम्, किन्तु हेतुदृष्टान्तौ साधनं प्रतिज्ञायाः, तदेतदसाधनोपादान- मनर्थकमिति । आनर्थक्यान्निग्रहस्थानमिति ॥ ३ ॥ होने से शब्द अनित्य है, घट की तरह'—ऐसा प्रयोग करने पर प्रतिवादी कहे—'यह ऐन्द्रियकत्व सामान्य नित्य में भी देखा गया है, तो शब्द भी नित्य क्यों न मान लिया जाये', इसे सुनकर वादी कहे कि 'यदि ऐन्द्रियकसामान्य नित्य है .तो क्यों न घट भी नित्य मान लिया जाये !' यों यह वादी प्रतिवाद्युक्त ऐन्द्रियकत्व हेतु से नित्यत्व स्वीकार कर अपने पक्ष को निगमनान्त तक सिद्ध न कर सका । यों पक्ष को छोड़ता हुआ वह अपनी प्रतिज्ञा से भी च्युत हो गया; क्योंकि प्रतिज्ञा पक्षाश्रित ही होती है ॥ २ ॥ प्रतिज्ञात अर्थ का निषेध होने पर धर्मविकल्प से उस अर्थ के निर्देश को 'प्रतिज्ञान्तर निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ३ ॥ वादी (वैशेषिक) द्वारा 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से, घट की तरह' यह प्रतिज्ञातार्थ कहने पर, इसका 'सामान्य ऐन्द्रियक नित्य होता है' इस प्रकार प्रतिदृष्टान्त से प्रतिवादी (मीमांसक ने) प्रतिषेध किया, इस ऐन्द्रियक में अनित्यत्व के प्रतिषेध में प्रति- वादी द्वारा 'सामान्य ऐन्द्रियक सर्वगत होता है, यह दृष्टान्त और प्रतिदृष्टान्त में साधर्म्य होते हुए भी धर्मविकल्प है, जैसे सामान्य सर्वगत है । घट असर्वगत इस दशा में असर्व- गतत्व मान कर 'घट असर्वगत होने से अनित्य है तो शब्द भी असर्वगत है, वह भी घट की तरह अनित्य है' । इसके पूर्व 'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा थी, अभी 'शब्द असर्वगत है' यह दूसरी प्रतिज्ञा हुई । इसे ही 'प्रतिज्ञान्तर' कह देते हैं । यह निग्रहस्थान कैसे हुआ ? प्रतिज्ञा का साधन 'प्रतिज्ञान्तर' नहीं, अपितु हेतु दृष्टान्त होते हैं, वह न देकर प्रतिज्ञा का साधन करना 'प्रतिज्ञान्तर' है । यों साधन प्रकट न करने से प्रतिज्ञा निरर्थक हो गयी और वादी पराजित हो गया । अतः यह 'प्रतिज्ञान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ३ ॥
३७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः ॥ ४ ॥ गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यमिति प्रतिज्ञा, रूपांदितोऽर्थान्तरस्यानुपलब्धेरिति हेतुः, सोऽयं प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः । कथम् ! यदि गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्, रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिर्नोपपद्यते । अथ रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिः, 'गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्' इति नोपपद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यं रूपादिभ्यश्चा- र्थान्तरस्यानुपलब्धिरिति विरुध्यते = व्याहन्यते, न सम्भवतीति ॥ ४ ॥ पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः ॥ ५ ॥ 'अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात्' इत्युक्ते परो ब्रूयात्—'सामान्यमैन्द्रियकं न चानित्यमेवं शब्दोऽप्यैन्द्रियको न चानित्यः' इति । एवं प्रतिषिद्धे पक्षे यदि ब्रूयात्—'कः पुनराह अनित्यः शब्दः' इति ! सोऽयं प्रतिज्ञातार्थनिह्नवः प्रतिज्ञा- संन्यास इति ॥ ५ ॥ अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ॥ ६ ॥ निदर्शनम्—'एकप्रकृतीदं व्यक्तम्' इति प्रतिज्ञा, कस्माद्धेतोः ? एकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात् । मृत्पूर्वकाणां शरावादीनां दृष्टं परिमाणम् । यावान् प्रकृतेर्व्यूहो भवति तावान् विकार इति, दृष्टं च प्रतिविकारं परिमाणम् । प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध 'प्रतिज्ञाविरोध' कहलाता है ॥ ४ ॥ 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह प्रतिज्ञा हुई । 'रूपादि से अर्थान्तर की उपलब्धि न होने से'—यह हेतु है । यहाँ प्रतिज्ञा-हेतु का विरोध है । कैसे ? यदि द्रव्य गुण- व्यतिरिक्त है तो रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि उपपन्न नहीं होती । तथा यदि रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि है तो 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह उपपन्न नहीं होता । द्रव्य गुणव्यतिरिक्त हो तथा रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि भी हो ये दोनों विषय परस्पर विरुद्ध हैं, यों विरुद्ध होने से ये दोनों बातें (प्रतिज्ञा और हेतु) एक साथ सम्भव नहीं ॥ ४ ॥ स्वपक्षप्रतिषेध होने पर प्रतिज्ञातार्थ को छिपाना 'प्रतिज्ञा-संन्यास' कहलाता है ॥ ५ ॥ 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से' ऐसा कहने पर प्रतिवादी कहे—'सामान्य ऐन्द्रियक है, पर अनित्य नहीं है; इसी तरह शब्द भी ऐन्द्रियक है; वह भी अनित्य नहीं' । यों प्रतिषिद्ध होने पर वादी यदि यह कहें—'हमने कब कहा कि शब्द अनित्य है !' यह प्रतिज्ञातार्थनिह्नव (उसको छिपाना या उससे हट जाना) 'प्रतिज्ञासंन्यास' कहलाता हैं ॥५॥ सामान्य रूप से उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर उसमें कुछ 'विशेष' लगाकर सिद्धि चाहने वाले का 'हेत्वन्तर' निग्रहस्थान होता है ॥ ६ ॥ उदाहरण—वादी ( साङ्ख्यमतानुयायी ) की प्रतिज्ञा है—'व्यक्त एकप्रकृति है', किस हेतु से ? 'एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण होने से' । मृत्तिका से बने शरावादि में परिमाण देखा जाता है, जितने प्रकार की प्रकृति का संस्थान होता है उन सभी का विकार देखा जाता है। प्रत्येक विकार में परिमाण भी देखा जाता है । यह परिमाण
पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु-
७. सू० ] निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७३ अस्ति चेदं परिमाणं प्रतिव्यक्तम्, तदेकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात्पश्यामः- व्यक्तमिदमेकप्रकृतीति । अस्य व्यभिचारेण प्रत्यवस्थानम्-नानाप्रकृतीनामेकप्रकृतीनां च विकाराणां दृष्टं परिमाणमिति । एवं प्रत्यवस्थिते आह-एकप्रकृतिसमन्वये सति शरावादि- विकाराणां परिमाणदर्शनात्, सुखदुःखमोहसमन्वितं हीदं व्यक्तं परिमितं गृह्यते, तत्र प्रकृत्यन्तररूपसमन्वयाभावे सत्येकप्रकृतित्वमिति । तदिदमविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषं ब्रुवतो हेत्वन्तरं भवति । सति च हेत्वन्तरभावे पूर्वस्य हेतोरसाधकत्वान्निग्रहस्थानम्, हेत्वन्तरवचने सति यदि हेत्वर्थनिदर्शनो दृष्टान्त उपादीयते ? नेदं व्यक्तमेकप्रकृति भवति; प्रकृत्यन्तरो- पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु- पपत्तेरानर्थक्याद्धेतोरनिवृत्तं निग्रहस्थानमिति ॥ ६ ॥ निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ ७-१० ] प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षणे पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहे हेतुतः साध्यसिद्धौ प्रकृतायां ब्रूयात् नित्यः शब्दो ऽस्पर्शत्वादिति हेतोः । हेतुर्नाम हिनोतेर्धातोस्तुन् प्रत्यये कृदन्तपदम्, प्रत्येक में व्यक्त है । यों एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण से सांख्यानुयायी मानते हैं— 'यह व्यक्त एकप्रकृति है' । प्रतिवादी इसका व्यभिचार से निषेध करता है—'नानाप्रकृतिक तथा एकप्रकृतिक ऐसे दोनों तरह के विकारों का परिमाण लोक में देखा जाता है' । यों, प्रतिषेध किये जाने पर वादी फिर कहता है—'एकप्रकृतिसमन्वय होने की अवस्था में शरावादि विकारों में परिमाण देखा जाने से, सुख-दुःख-मोह-समन्वित यह व्यक्त विशिष्टतया ही गृहीत होता है, तात्पर्य यह है कि इस हेतु में प्रकृत्यन्तररूप समन्वय के अभाव होने पर एक- प्रकृतित्व है' । यों यह, सामान्यरूपेण उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर, हेतुविशेष का निवेश करने पर वादी का हेत्वन्तर हो जाता है । हेत्वन्तरत्व हो जाने पर हेतु के असाधक हो जाने से वह निग्रहस्थान हो गया । हेत्वन्तरवचन होने पर भी, यदि हेत्वर्थनिदर्शन ( साध्य- साधनभाव का व्याप्यव्यापकभाव से निदर्शन ) के लिये दृष्टान्त का उपादान किया जाता है तो प्रकृत्यन्तरोपादान की संभावना से यह व्यक्त का एकप्रकृतित्व नहीं सिद्ध होता । तथा यदि उपादान नहीं किया जाता तो अनिदर्शित हेत्वर्थ में साधकत्व का उपपादन न होने से दृष्टान्त का हेतु निग्रहस्थान रह ही गया ॥ ६ ॥ प्रकृत अर्थ से असम्बद्ध अर्थ कहना 'अर्थान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षण पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह में हेतु से साध्य-सिद्धि करना चाहने पर कोई कहे— 'शब्द नित्य है' । इस में 'अस्पर्शत्व होने से' हेतु दे । यहाँ 'हेतु' शब्द 'हि गतो वृद्धौ च'
३७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० पदं च नामाख्यातोपसर्गनिपाताः, अभिधेयस्य क्रियान्तरयोगाद्विशिष्यमाणरूपः शब्दो नाम१, क्रियाकारक समुदायः, कारकसङ्ख्याविशिष्टक्रियाकालयोगाभि- धाय्याख्यातम्, धात्वर्थमात्रं च कालाभिधानविशिष्टम्, प्रयोगेष्वर्थादभिद्य- मानरूपा निपाताः, उपसृज्यमानाः क्रियाद्योतका उपसर्गा इत्येवमादि— तदर्थान्तरं वेदितव्यमिति ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥ यथा 'नित्यः शब्दः कचटतपाः, जबगडदशत्वात्, झभञ्घढधषवत्' इति । एवम्प्रकारं निरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थगतेरभावाद् वर्णा एवं क्रमेण निर्दिश्यन्त इति ॥ ८ ॥ परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥ यद्वाक्यं परिषदा प्रतिवादिना च त्रिरभिहितमपि न विज्ञायते श्लिष्ट- ( स्वा० ११, पाणिनीय धातु२) इस धातु से 'कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च' इस कृदन्त ( उणादि ) सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर निष्पन्न हुआ है । पद चार प्रकार के होते हैं—१. नाम, २. आख्यात ( तिङन्त ), ३. उपसर्ग, तथा ४. निपात । अभिधेय के क्रियान्तर- सम्बन्ध होने पर विशिष्यमाण रूप 'शब्द' नाम कहलाता है । क्रियाकारक समुदाय या कारक एवं संख्याविशिष्ट क्रिया-कालसम्बन्ध को बतलाने वाला 'आख्यात' कहलाता है । उसमें केवल धात्वर्थ कालाभिधानविशिष्ट होता है । 'निपात' प्रयोगों में अर्थों से अभिद्यमान रूप होते हैं । धातु के समीप में पहले प्रयुक्त होनेवाले 'उपसर्ग' कहलाते हैं । इत्यादि अर्थान्तर जानना चाहिये । यह अर्थान्तरनिग्रहस्थान—वादी, प्रतिवादी— दोनों को ही हो सकता है ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देश की तरह अवाचक-प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है ॥ ८ ॥ जैसे—'कचटतप शब्द नित्य है, ज ब ग ड द श होने से, झ भ ञ घ ढ ध ष' की तरह, इस प्रकार का अवाचक प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है । अभिधानाभिधेय की अनुपपत्ति होने से अर्थबोध नहीं होगा—ऐसा मानकर यहाँ वर्ण का ही क्रमशः निर्देश गया है । इसी तरह भाषानभिज्ञ वादी को अपनी भाषा में हेतु देना भी 'निरर्थक' निग्रह- स्थान है ॥ ८ ॥ परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहने पर भी यदि न समझ पावे तो उसे 'अविज्ञातार्थ' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ९ ॥ जो वाक्य परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार बोलने पर भी न समझ में आवे. क्योंकि या तो वह वाक्य श्लिष्टपद हो, जैसे—श्वेत दौड़ता है'; या अप्रतीत प्रयोग हो, १. 'यथा वृक्षस्तिष्ठति, वृक्षं च्छिनत्तीति भिन्नक्रियायोगाद्विशिष्यमाणरूपो वृक्ष- शब्दः'—इति तात्पर्याचार्याः । २. द्र०—माधवीया धातुवृत्तिः अस्मत्सम्पादिता ।
१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५
१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५ शब्दमप्रतीतप्रयोगमतिद्रुतोच्चरितमित्येवमादिना कारणेन तदविज्ञातम्— अविज्ञातार्थम् । असामर्थ्यसंवरणाय प्रयुक्तमिति निग्रहस्थानमिति ॥ ९ ॥ पौर्वापर्ययोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम् ॥ १० ॥ यत्रानेकस्य पदस्य वाक्यस्य वा पौर्वापर्येणान्वययोगो नास्ति इत्यसम्बद्धार्थ- त्वं गृह्यतं तत्समुदायार्थस्यापायादपार्थकम् । यथा—दश दाडिमानि, षडपूपाः, कुण्डम्, अजाजिनम्, पललपिण्डः, अथ रोरुकमेतत्, कुमार्याः पाय्यम्, तस्याः पिता अप्रतिशीन इति ॥ १० ॥ निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ ११-१३ ] अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम् ॥ ११ ॥ प्रतिज्ञादीनामवयवानां यथालक्षणमर्थवशात् क्रमः, तत्रावयवविपर्यासेन वचनमप्राप्तकालमसम्बद्धार्थं निग्रहस्थानमिति ॥ ११ ॥ हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम् ॥ १२ ॥ प्रतिज्ञादीनामन्यतमेनाप्यवयवेन हीनं न्यूनं निग्रहस्थानम्; साधनाभावे साध्यासिद्धिरिति ॥ १२ ॥ जैसे 'जर्फरीतु, तुर्फरीतु' आदि; या बहुत शीघ्रता में बोला जाता हो । इन अवस्थाओं में वह अविज्ञातवाक्य 'अविज्ञातार्थ' कहलाता है। ऐसा प्रयोग अपना असामर्थ्य छिपाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है ॥ ९ ॥ पौर्वापर्य सम्बन्ध से असम्बद्धार्थक को 'अपार्थक' कहते हैं ॥ १० ॥ जहाँ अनेक पदों या वाक्यों का पौर्वापर्य से अन्वयसम्बन्ध न बनता हो उसे असम्बद्धार्थ (परस्परसाकांक्षत्वरहित) कहते हैं। उस समुदाय का कोई अर्थ न लगने से वह 'अपार्थक' निग्रहस्थान है। जैसे—'दस अनार, छह पूए, कुण्ड, अज की चर्म, पललपिण्ड, यह रौरुक है, कुमारी का पेय, उसका पिता अप्रतिशीन (वृद्ध) हैं'—इत्यादि क्लिष्ट (असम्बद्ध) शब्दप्रयोग से एक वाक्य बोल दिया जाये जो कि अपार्थक (परस्परासम्बद्धार्थक) है ॥ १० ॥ अवयवों का विपर्यस्त वचन 'अप्राप्तकाल' कहलाता हैं ॥ ११ ॥ प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का लक्षणनिर्देशानुसार अर्थ की आकांक्षावश क्रम नियत है। वहाँ अवयव-विपर्यास से बोलना असम्बद्धार्थक होता है अतः वह 'अप्राप्तकाल' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ ११ ॥ किसी एक अवयव से हीन को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ १२ ॥ प्रतिज्ञादि अवयवों में से किसी एक अवयव से हीन प्रयोग को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं; क्योंकि अवयवन्यूनता में साधनोपपादन न होने से साध्य की सिद्धि नहीं बनेगी ॥ १२ ॥
पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ]
३७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ॥ १३ ॥ एकेन कृतत्वाद् अन्यतरस्यानर्थक्यमिति तदेतन्नियमाभ्युपगमे वेदित- व्यमिति ॥ १३ ॥ पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ] शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात् ॥ १४ ॥ अन्यत्रानुवादात् शब्दपुनरुक्तमर्थपुनरुक्तं वा, नित्यः शब्दो नित्यः शब्द इति शब्दपुनरुक्तम्। अर्थपुनरुक्तम्-अनित्यः शब्दो निरोधधर्मको ध्वनिरिति ॥ १४ ॥ अनुवादे त्वपुनरुक्तं शब्दाभ्यासादर्थविशेषोपपत्तेः' ॥ १५ ॥ यथा हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनमिति ॥ १५ ॥ अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनम् ॥ १६ ॥ पुनरुक्तमिति प्रकृतम्। निदर्शनम्-उत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यमित्युक्त्वा अर्थादापन्नस्य योऽभिधायकः शब्दस्तेन स्वशब्देन ब्रूयाद्-अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यम् इति, तच्च पुनरुक्तं वेदितव्यम्। अर्थसम्प्रत्ययार्थे शब्दप्रयोगे प्रतीतः सोऽर्थोऽर्था- पत्त्येति ॥ १६ ॥ हेतु तथा उदाहरणों की अधिकता से 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता हैं ॥ १३ ॥ एक ही हेतु तथा उदाहरण से काम चल जाने पर भी पुनः हेतु आदि का प्रयोग 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता है। परन्तु परिषद् या प्रतिवादी की जिज्ञासा हो तो अधिक हेतु या उदाहरण दिये जा सकते हैं, तब निग्रहस्थान नहीं होता ॥ १३ ॥ शब्द या अर्थ का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' कहलाता है; अनुवाद को छोड़ कर ॥ १४ ॥ अनुवाद को छोड़कर, पुनरुक्त निग्रहस्थान 'शब्द पुनरुक्त' तथा 'अर्थ-पुनरुक्त'- यों दो प्रकार का है। जैसे 'शब्द नित्य है, शब्द नित्य है'-यह 'शब्दपुनरुक्त' हुआ। 'शब्द अनित्य है, ध्वनि निरोधधर्मक है'-यह 'अर्थपुनरुक्त' हुआ ॥ १४ ॥ अनुवाद में दो बार बोलना 'पुनरुक्त' नहीं होता, क्योंकि वहाँ शब्द के दुहराने से अर्थविशेष का बोध होता है ॥ १५ ॥ जैसे हेतुकथन के अनन्तर प्रतिज्ञा का पुनः दुहराना 'निगमन' कहलाता है ॥ १५ ॥ अर्थादापन्न (अर्थ से गृहीत) का स्वशब्द से पुनर्वचन भी ॥ १६ ॥ 'पुनरुक्त' कहलाता है। उदाहरण है जैसे-'उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य हैं'- कहकर अर्थादापन्न वस्तु के बोधक शब्द को पुनः कहना कि 'अनुत्पत्तिधर्मक अनित्य होता है।' यह अर्थादापन्न का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' समझना चाहिये। अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग होने पर जिस अर्थ को अवगत कराता है वह अर्थ अर्थापत्ति से भी गृहीत हो सकता है। अतः उसका पुनर्वचन निग्रहस्थान माना गया है ॥ १६ ॥ १. न्यायसूचीनिबन्धेऽसंगृहीतमपीदं सूत्रं वार्तिकस्वारस्येनात्र गृहीतम् ।
२०. सू० ] उत्तरविरोघिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७
२०. सू० ] उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७ उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ १७-२० ] विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम् ॥ १७ ॥ विज्ञातस्य वाक्यार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना वा त्रिरभिहितस्य यदप्रत्यु- च्चारणं तदननुभाषणं नाम निग्रहस्थानमिति । अप्रत्युच्चारयन् किमाश्रयं परपक्षप्रतिषेधं ब्रूयात् ! ॥ १७ ॥ अविज्ञातं चाज्ञानम् ॥ १८ ॥ विज्ञातार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना त्रिरभिहितस्य यदविज्ञानं तदज्ञानं निग्रहस्थानमिति । अयं खल्वविज्ञाय कस्य प्रतिषेधं ब्रूयादिति ॥ १८ ॥ उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ॥ १९ ॥ परपक्षप्रतिषेध उत्तरम्, तद्यदा न प्रतिपद्यते तदा निगृहीतो भवति ॥ १९ ॥ कार्यव्यासङ्गात् कथाविच्छेदो विक्षेपः ॥ २० ॥ यत्र कर्तव्यं व्यासज्य कथां व्यवच्छिनत्ति—'इदं मे करणीयं विद्यते तस्मिन्न- वसिते पश्चात्कथयामि' इति विक्षेपो नाम निग्रहस्थानम् । एकनिग्रहावसानायां कथायां स्वयमेव कथान्तरं प्रतिपद्यत इति ॥ २० ॥ परिषद् द्वारा जाने हुए अर्थ का तीन बार कहे जाने पर भी उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १७ ॥ परिषद् द्वारा जाने अर्थ को प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहे जाने पर भी ( ज्ञात वाक्यार्थ का ) उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है । ( वादी ) उच्चारण नहीं करता है तो किसका सहारा लेकर प्रतिवादी का खण्डन करेगा ! ॥१७॥ जिसे न समझ पाये वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १८ ॥ प्रतिवादी द्वारा तीन बार उक्त तथा परिषद् द्वारा ज्ञात अर्थ को वादी जब न समझ पावे वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान है । यह बिना जाने किसका खण्डन करेगा ! ॥ १८ ॥ उत्तर न देना 'अप्रतिभा' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १९ ॥ परपक्ष का खण्डन 'उत्तर' कहलाता है, उसे जब नहीं समझता या वह नहीं स्फुरित होता है तो वादी निगृहीत हो जाता है ॥ १९ ॥ कार्य-व्यासक्तिव्याज से कथाविच्छेद करना 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है ॥२०॥ जहाँ अन्य कार्य में व्यासक्त दिखाकर कथा ( वाद ) को रोक दे कि 'आज तो अब मुझे कुछ कार्य है, उसको पूरा कर उत्तर दे सकूँगा' यह 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है । यद्यपि कार्यव्यासङ्ग से कथा रोक देने पर स्पष्टतः यह तो सिद्ध नहीं होता कि वादी को उत्तर नहीं आया, अतः कथा से उठ गया; क्योंकि हो सकता है कि कार्यावसान के बाद वह उचित उत्तर दे सके, परन्तु इस वर्तमान कथा में तो उत्तर न दे पाने से अभी तो उसका निग्रह हो ही गया । जब कार्यावसानान्तर उत्तर देगा तो वह प्रारम्भ दूसरी कथा का ही कहलायेगा ॥ २० ॥
मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ]
३७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ] स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥ २१ ॥ यः परेण चोदितं दोषं स्वपक्षेऽभ्युपगम्यानुद्धृत्य वदति—भवत्पक्षेऽपि समानो दोष इति—स स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषं प्रसञ्जयन् परमत- मनुजानातीति मतानुज्ञा नाम निग्रहस्थानमापद्यत इति ॥ २१ ॥ निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम् ॥ २२ ॥ पर्यनुयोज्यो नाम निग्रहोपपत्त्या चोदनीयः, तस्योपेक्षणं निग्रहस्थानं प्राप्तो- सीत्यननयोगः। एतच्च कस्य पराजय इत्यनुयुक्तया परिषदा वचनीयम्, न खलु निग्रहं प्राप्तः स्वकौपीनं विवृणुयादिति ॥ २२॥ अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः ॥ २३ ॥ निग्रहस्थानलक्षणस्य मिथ्याऽध्यवसायादनिग्रहस्थाने निगृहीतोऽसीति परं ब्रुवन् निरनुयोज्यानुयोगान्निगृहीतो वेदितव्य इति ॥ २३ ॥ कथकान्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् [ २४-२५ ] सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः ॥ २४ ॥ स्वपक्ष में दोषस्वीकृति से परपक्ष में दोष दिखाना 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥२१॥ जो प्रतिवादी द्वारा उठाये गये दोष को अपने मत में स्वीकार करके उसको खंडित न कर कहे—'आपके पक्ष में यह दोष है', तो वह अपने पक्ष में दोष स्वीकार करता हुआ तथा परपक्ष में दोष दिखाता हुआ परपक्ष को स्वीकार करता है, यह 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥ २१ ॥ निग्रहस्थानप्राप्त वादी का निग्रह न करना 'पर्यनुयोज्योपेक्षण' निग्रहस्थान है ॥२२॥ पर्यनुयोज्य का अर्थ है—निग्रहोपपादन से अभियोज्य ( तिरस्करणीय )। उसकी उपेक्षा अर्थात् 'तुम निग्रहस्थान को प्राप्त हो गये हो' ऐसा न कहना यही अननुयोग है। यहाँ किसकी पराजय हुई यह परिषद् को ही निर्णय करना चाहिये। अन्यथा जो निगृहीत हो चुका, वह स्वयं अपना निगृहीतत्व क्यों स्वीकार करेगा ! ॥ २२ ॥ अनिग्रहस्थानप्राप्त को निगृहीत करना 'निरनुयोज्यानुप्रयोग' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २३ ॥ निग्रहस्थानलक्षणक मिथ्याध्यवसाय से अनिग्रहस्थान में भी परपक्ष को 'तुम निग्रह- स्थान को प्राप्त हो चुके हो'—ऐसा कहनेवाला 'निरनुयोज्यानुयोग' निग्रहस्थान से निगृहीत हो जाता है ॥ २३ ॥ सिद्धान्त की प्रतिज्ञा करके उसमें नियम से न रह कर अन्य रीति से वाद उठाना 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २४ ॥
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९ कस्यचिदर्थस्य तथाभावं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातार्थविपर्ययाद् अनियमात् कथां प्रसञ्जयतोऽपसिद्धान्तो वेदितव्यः। यथा 'न सदात्मानं जहाति, न सतो विनाशः, नासदात्मानं लभते, नासदुत्पद्यते' इति सिद्धान्तमभ्युपेत्य स्वपक्षं व्यवस्थापयति- 'एकप्रकृतीदं व्यक्तं विकाराणामन्वयदर्शनात् । मृदन्वितानां शरावादीनां दृष्टमेकप्रकृतित्वम्, तथा चायं व्यक्तभेदः सुखदुःखमोहान्वितो दृश्यते, तस्मात् समन्वयदर्शनात् सुखादिभिरेकप्रकृतीदं शरीरम्' इति । एवमुक्तवाननुयुज्यते-'अथ प्रकृतिविकार इति कथं लक्षितव्यमिति' ? यस्यानवस्थितस्य धर्मान्तरनिवृत्तौ धर्मान्तरं प्रवर्त्तते सा प्रकृतिः, यच्च धर्मान्तरं प्रवर्त्तते निवर्त्तते वा स विकार इति । सोऽयं प्रतिज्ञातार्थविपर्यासादनियमात् कथां प्रसञ्जयति, प्रतिज्ञातं खल्वनेन- नासदाविर्भवति न सत्तिरोभवतीति । सदसतोश्च तिरोभावाविर्भावमन्तरेण न कस्यचित्प्रवृत्तिः प्रवृत्त्युपरमश्च भवति । मृदि खल्ववस्थितायां भविष्यति शरा- वादिलक्षणं धर्मान्तरमिति प्रवृत्तिर्भवति, अभूदिति च प्रवृत्त्युपरमः, तदेतन्मृद्धर्मा- णमापि न स्यात् । एवं प्रत्यवस्थितो यदि सतश्चात्महानमसतरचात्मलाभम- भ्युपैति तदस्यानपसिद्धान्तो निग्रहस्थानं भवति, अथ नाभ्युपैति पक्षोऽस्य न सिध्यति ॥ २४ ॥ किसी अर्थ के तथात्व ( तद्वस्तुनिष्ठितत्व ) को प्रतिज्ञात कर उस अर्थ से विपरीत अनियम से कथा-प्रसङ्ग करने वाले का 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान समझना चाहिये । जैसे कोई वादी 'सत् अपने स्वत्व को नहीं छोड़ता, सत् का नाश नहीं होता, असत् स्वरूप में नहीं रहता, असत् उत्पन्न नहीं होता।' इस सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वपक्ष स्थापित करता हैं-'यह व्यक्त एक-प्रकृति है, विकारों में प्रकृति का सम्बन्ध देखा जाने से । मृत्तिकान्वित शरावादि लोक में एकप्रकृतिक देखे जाते हैं, तथा च-यह व्यक्तभेद ( शरीर ) सुखदुःखमोहान्वित देखा जाता है, अतः इस समन्वयदर्शन से यह शरीर- सुखादि के समन्वय से एकप्रकृति है।' ऐसा कहनेवाले इस वादी को पूछना चाहिये- 'यह प्रकृति है, यह विकार है ?'-यह भेद कैसे करें ? जिसके रहते धर्मान्तर की निवृत्ति होने पर धर्मान्तर प्रवृत्त होता है वह 'प्रकृति' होती है तथा जो धर्मान्तर प्रवृत्त तथा निवृत्त होता रहता है, वह 'विकार' कहलाता है। यों, प्रतिज्ञातार्थ के विपर्यास द्वारा वादी नियम-भङ्ग कर कथा प्रारम्भ करता है। इसने प्रतिज्ञा की थी-असत् का आविर्भाव नहीं होता, सत् का तिरोभाव नहीं होता' । सत् असत् के तिरोभाव, आविर्भाव के विना किसी की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं होती ! मृत्तिका के रहने पर ही शरा- वादिलक्षण धर्मान्तर होगा, अतः प्रवृत्ति हो जाती है, 'था' इस तरह विनाश हो जाता है। यह स्थिति मृत्तिका के विकारों में ( उत्पाद-विनाश ) नहीं हो पायेगी। इस तरह प्रतिषेध करने पर, यदि वादी सत् का नाश तथा असत् का उत्पाद स्वीकार करता है, तो यह उसका 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान हो जायेगा; यदि नहीं स्वीकार करता है तो उसका पक्ष सिद्ध नहीं होगा।
सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया
३८० वात्स्यायनभाष्यसहितं न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः ॥ २५ ॥ हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि । किं पुनर्लक्षणान्तरयोगाद् हेत्वाभासा निग्रहस्थानत्वमापन्नाः, यथा प्रमाणानि प्रमेयत्वम् ? इत्यत आह—यथोक्ता इति । हेत्वाभासलक्षणेनैव निग्रहस्थानभाव इति । त इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिताः परीक्षिताश्चेति ॥ २५ ॥ योऽक्षपादमृषिं न्यायः प्रत्यभाद् वदतां वरम् । तस्य वात्स्यायन इदं भाष्यजातमवर्तयत् ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ✾ समाप्तं चेदं न्यायदर्शनम् ✾ • और यथोक्त हेत्वाभास भी ॥ २५ ॥ निग्रहस्थान है । क्या जैसे प्रमेयादि लक्षण के योग से प्रमाण कभी-कभी प्रमेय बन जाते हैं, उसी तरह हेत्वाभास भी किसी अन्य लक्षण के योग से निग्रहस्थान बनते हैं ? तो उनका लक्षण सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया है । अर्थात् पूर्वोक्त हेत्वाभास-लक्षणों से ही उनमें निग्रहस्थानत्व आ जायेगा । इस प्रकार ये प्रमाणादि पदार्थ क्रमशः गिना दिये गये, उनका लक्षण कर दिया गया, तथा तत्त्वजिज्ञासु जनों के हितार्थ उनकी यथातथ परीक्षा कर दी गयी ॥ २५ ॥ यह न्यायशास्त्र ऋषिश्रेष्ठ अक्षपाद (गौतम) को अलौकिक शक्ति द्वारा ज्ञानगोचर हुआ था, उसी न्यायशास्त्र के भाष्यरूप इस व्याख्यान की वात्स्यायन ने रचना की ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य( सहित न्यायदर्शन )में पञ्चम अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ✾ पञ्चम अध्याय भी समाप्त ✾ • ✾ न्यायदर्शन समाप्त ✾
सूत्र-सूची
सूत्र-सूची अस्मद्गृहीतो ग्रन्थेऽस्मिन् गौतमः सूत्रसंग्रहः। वाचस्पत्यनुकूलोऽयं दीयते साक्षरक्रमः॥ अणुश्यामानित्यत्ववदेतत्० २७१ अभिव्यक्तौ चाभिभवात् २०२ अणुश्यामानित्यत्ववद्वा ३१४ अभ्यासात् १५२ अत्यन्तप्रायैकदेश० ११९ अभ्युपेत्य कालभेदे० १२८ अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं० २१ अयसोऽयस्कान्ताभिगमस० १९१ अध्यापनादप्रतिषेधः १५१ अरण्यगुहापुलिनादिषु० ३३९ अनर्थापत्तावर्थापत्त्य० १३८ अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन० ३७६ अनवस्थाकारित्वादनवस्था० ३३० अर्थापत्तितः प्रतिपक्षासिद्धे० ३५६ अनवस्थायित्वे च० १६५ अर्थापत्तिरप्रमाणमने० १३८ अनिग्रहस्थाने निग्रह० ३७९ अलातचक्रदर्शनं० २६१ अनित्यत्वग्रहाद् बुद्धे० २३७ अवयवनाशेऽप्यवयव्युप० १८२ अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः २८४ अवयवविपर्यासवचनम्० ३७५ अनिमित्तनिमित्तत्वान्ना० २८५ अवयवान्तरभावेऽप्यवृत्ते० ३२२ अनियमे नियमान्नियमः १६६ अवयवावयविप्रसङ्गश्चैव० ३२५ अनुक्तस्यार्थापत्तेः० ३५६ अविज्ञातं चाज्ञानम् ३७७ अनुपलब्भात्मकत्वाद० १५० अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे० ५४ अनुपलब्भात्मकत्वादनुप० ३६० अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तु० ६९ अनुपलब्भादप्यनुपलब्धि० १५० अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यं० ७३ अनुवादे त्वपुनरुक्तं ३७६ अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे० ३७२ अनुवादोपपत्तेश्च १२९ अव्यक्तग्रहणमनवस्था० २५३ अनेकद्रव्यसमवायात्० १९९ अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थित० ७७ अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ६३ अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि० ३२७ अन्तर्बहिश्च कार्यं० ३२७ असत्यर्थे नाभाव इति १४१ अन्यदन्यस्मादन्य० १५३ अस्पर्शत्वात् १५० अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेष० ४६ अस्पर्शत्वादप्रतिषेधः १५७ अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः ३३९ अश्रवणकारणानुपलब्धेः १५४ अप्तेजोवायूनां पूर्वं० २१५ अप्रतिघातात्सन्निकर्षोपपत्तिः २०४ आकाशव्यतिभेदात्तदनुपपत्तिः ३२६ अप्रत्यभिज्ञाने च० २२६ आकाशासर्वगतत्वं वा ३२७ अप्रत्यभिज्ञानं च० २२६ आकृतिः तदपेक्षत्वात् सत्त्व० १७१ अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटल० २०३ आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या० १७३ अभावाद्भावोत्पत्तिः २८०
३८२ न्यायदर्शन- आत्मनित्यत्वे प्रेत्य० २७८ कर्मकारितश्चेन्द्रियाणां० २०० आत्मप्रेरणयहच्छा० २३९ कर्माकाशसाधर्म्या० २२२ आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमन्० २५ कर्मानवस्थायिग्रहणात् २५२ आदर्शोदकयोः प्रसाद० २०६ कारणद्रव्यस्य प्रदेश० १४७ आदित्यरश्मेः स्फटिकान्त० २०४ कारणान्तरादपि तद्धर्मो० ३५९ आदिमत्त्वादेन्द्रियकत्वात् १४३ कार्यव्यासङ्गात्कथाविच्छेदो० ३७७ आप्तोपदेशः शब्दः २४ कार्यान्तरत्वे प्रयत्नाहेतुत्व० ३६५ आप्तोपदेशसामर्थ्या० १२३ कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ६७ आश्रयव्यतिरेकाद् वृक्ष० ३०० कालान्तरेणानिष्पत्ते० २९८ किंचित्साधर्म्यादुप० ३४८ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःख० २७ कृतताकर्त्तव्यतोपपत्ते० ११९ इन्द्रियान्तरविकारात् १८३ कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वाद० ३२१ इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् २१० कृष्णसारे सत्युपलम्भाद्० १९७ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं १७ कुड्यान्तरितानुपलब्धे० २०४ इन्द्रियैर्मनसः० २३६ केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धि० ३२३ क्रमनिर्देशादप्रतिषेधः २८१ ईश्वरः कारणम् २८२ क्रमवृत्तित्वादयुगपद् ० २२६ क्वचिद्धर्मानुपपत्तेः० ३५७ उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ३७७ क्वचिद्विनाशकारणानुपलब्धेः० २३२ उत्पादव्ययदर्शनात् ३०० क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्ति० ९४ उदाहरणसाधर्म्यात् साध्य० ४८ उदाहरणापेक्षस्तथेत्युप० ५१ क्षीरविनाशे कारणानुपलब्धि० २३० उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञाना० ३५९ क्षुदादिभिः प्रवर्त्तनाच्च ३३८ उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वाद् १२२ गन्धक्लेदपाकव्यूहाव० १९५ उपलभ्यमाने चानुपलब्धे० १५४ गन्धत्वाद्यव्यतिरेकाद्० २११ उभयकारणोपपत्तेरु० ३५८ गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः० ३० उभय साधर्म्यात् प्रक्रियासिद्धेः ३५४ गन्धरसरूपस्पर्शशब्दानां० २१४ उभयोः पक्षयोरन्यतरस्या० १५२ गुणान्तरापत्त्युपमर्द० १६६ गोत्वाद् गोसिद्धिवत्तत्सिद्धिः ३४६ ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धाद् ० ३०५ घटादिनिष्पत्तिदर्शनात् ३४९ एकधर्मोपपत्तेरविशेषे ३५७ एकविनाशे द्वितीयाविनाशा० १८२ घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्० २९ एकस्मिन्भेदाभावाद् ३२२ . एकैकश्येनोत्तरोत्तरगुण० २१५ एतेनानियमः प्रत्युक्तः २६७ चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् २८ ऐन्द्रियकत्वाद्रूपा० २५९ जातिविशेषे चानियमात् १२६
सूत्रसूची [ ३८३
सूत्रसूची [ ३८३ ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्त० २४३ तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि १७९ ज्ञातुर्ज्ञानसाधनोपपत्तेः० १८४ तदभावे नास्त्यनन्यता १५३ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च० ३४१ तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च० ९८ ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो० ९७ तदर्थं यमनियमाभ्यामात्म० ३४० ज्ञानविकल्पानां च० ३६१ तदसंशयः पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ३२० ज्ञानसमवेतात्मप्रदेश० २३७ तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम् २३५ ज्ञानायौगपद्यादेकं २६१ तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः १८४ तदाश्रयत्वादपृथग्० ३३१ तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारि० ३४१ तदुपलब्धिरितरेतरद्रव्य० २२१ तत्कारित्वादहेतुः २८३ तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थान० ७५ तत्रिविधं वाक्छलं सामान्य० ६९ तद्विनिवृत्तौ वा प्रमाण० ९२ तत्रैराश्यं रागद्वेषमोहा० २७५ तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम् ५० तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाण० ८७ तद्व्यवस्थानं तु भूयस्त्वात् २२० तत्प्रामाण्ये वा० १४० तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावाद० १७७ तत्त्वप्रधानभेदाच्च० ३३६ तन्त्राधिकरणाभ्युपगम० ४४ तत्त्वभाक्तयोर्नानात्व० १४६ तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ३१९ तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं० ३४२ तयोरप्यभावो वर्तमानाभावे० ११६ तत्सम्बन्धात्फलनिष्पत्ते० ३०१ तल्लिङ्गत्वादिच्छा० २४४ तत्सिद्धेरलक्षितेष्वहेतुः १४१ तल्लक्षणावरोधादप्रतिषेधः २८७ तथाऽत्यन्तसंशयस्तद्धर्म० ७८ ताभ्यां विगृह्य कथनम् ३४३ तथा दोषाः २७५ तेनैव तस्याग्रहणाच्च २२१ तथाभावादुत्पन्नस्य० ३५२ ते विभक्त्यन्ताः पदम् १६८ तथा वैधर्म्यात् ४८ तेषां मोहः पापीयान् २७६ तथाऽऽहारस्य २६५ तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ३२१ तथेत्युपसंहारादुपमान० १२१ तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम् ९९ तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः ३५ त्वक्पर्यन्तत्वाच्छरीरस्य २५९ तददृष्टकारितमिति० २६८ त्वग्व्यतिरेकात् २०७ तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्य० २८६ त्रैकाल्याप्रतिषेधश्च० ८७ तदनुपलब्धेरनुपलम्भा० १४९ त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ८६ तदनुपलब्धेरनुपलम्भाद्० ३६० त्रैकाल्यासिद्धेर्हेतोर्हेतुसमः ३५५ तदनुपलब्धेरहेतुः १९८ तदन्तरालानुलब्धे० १५१ दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थ० १७५ तदप्रामाण्यमनृत० १२६ दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं० ९७ तदभावश्चापवर्गे ३४० दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्या० १२
३८४ ] न्यायदर्शन- दुःखविकल्पे सुखाभिमानाच्च ३०४ न पयसः परिणाम० २३१ दृष्टानुमितानां नियोग० २०६ न पाकजगुणान्तरोत्पत्तेः २५७ दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः १८२ न पार्थिवाप्ययोः० २१६ दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात् ३५० न पुत्रपशुस्त्रीपरिच्छद० ३०१ दृष्टान्ते च साध्यसाधन० ३६३ न पुरुषकर्माभावे २८३ दोषनिमित्तं रूपादयो० ३१८ न प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युप० १०३ दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानाद० ३१८ न प्रदीपप्रकाशवत्तत्सिद्धेः ९२ द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोप० १९९ न प्रलयोऽणुसद्भावात् ३२५ द्रव्यविकारवैषम्यवद् १६१ न प्रवृत्तिः प्रतिसन्ध्याय० ३१३ द्रव्ये स्वगुणपरगुणोप० २५६ न बुद्धिलक्षणाधिष्ठान० २१२ द्विविधस्यापि हेतो० १६० न युगपद्ग्रहणात् २२५ धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भाव० ७२ न युगपदनेकक्रियोपलब्धेः २६१ धारणाऽऽकर्षणोपपत्तेश्च १०७ न युगपदर्थानुपलब्धेः २०९ न रात्रावप्यनुपलब्धेः २०२ न कर्मकर्तृसाधन० १२७ न रूपादीनामितरेतर० २५९ न कर्मानित्यत्वात् १५१ न लक्षणावस्थितापेक्षा० १४१ न कारणावयवभावात् २९७ न विकारधर्मानुपपत्तेः १६१ न कार्याश्रयकर्तृवधात् १८० न विनष्टेभ्योऽनिष्पत्तेः २८१ न केशनखादिष्वनुपलब्धेः २५८ न विषयव्यवस्थानात् १७६ नक्तञ्चरनयनरश्मिदर्शनाच्च २०३ न व्यवस्थानुपपत्तेः २८९ न क्लेशसन्ततेः ३१४ न शब्दगुणोपलब्धेः २२१ न गत्यभावात् २२७ न सङ्कल्पनिमित्तत्वाच्च ३१५ न घटाद् घटानिष्पत्तेः २७९ न सङ्कल्पनिमित्तत्वाद्रागादीनाम् १९३ न घटाभावसामान्यनित्य० १४५ न सद्यः कालान्तरो० २९८ न चतुष्ट्वम् ऐतिह्यार्थापत्ति० १३६ न सर्वगुणानुलब्धेः ३१५ न चावयव्यवयवाः ३२२ न साध्यसमत्वात् २६४ न चैकदेशोपलब्धिरवयवि० १०४ न सामयिकत्वाच्छब्दार्थ० १२५ न तदनवस्थानात् १७० न सुखस्याप्यन्तरालनिष्पत्तेः ३०२ न तदर्थबहुत्वात् २१० न स्मरणकालानियमात् २३९ न तदर्थान्तरभावात् ७३ न स्मृतेः स्मर्तव्यविषयत्वात् १८३ न तदाशुगतित्वान्मनसः २३१ न स्वभावसिद्धिरापेक्षित्वात् २९५ न तद्विकाराणां सुवर्ण० १६२ न स्वभावसिद्धेर्भावानाम् २९३ न दोषलक्षणावरोधा० २७७ न हेतुतः साध्यसिद्धेः० ३५५ न निष्पन्नावश्यम्भावित्वात् ३३९
सूत्रसूची [ ३८५
सूत्रसूची [ ३८५ नाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् २७१ नियमानियमौ तु० २४५ नाकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वा० १७२ निरवयवत्वादहेतुः २९७ नाणुनित्यत्वात् १५१ निर्दिष्टकारणाभावे० ३५९ नातीतानागतयोः० २८१ नेतरेतरधर्मप्रसङ्गात् २०५ नातीतानागतयोरितरे० ११६ नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि० २३४ नातुल्यप्रकृतीनां १६१ नैकदेशत्राससादृश्येभ्यो० ११४ नात्मप्रतिपत्तिहेतूनं० १८६ नैकप्रत्यनीकभावात् २७६ नात्ममनसोः सन्निकर्षाभावे० ९६ नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते० १८१ नानित्यता नित्यत्वात् २८६ नोत्पत्तिकारणानपदेशात् २३६ नानुमीयमानस्य प्रत्यक्षतो० १९८ नोत्पत्तितत्कारणोपलब्धेः २८७ नानुवादपुनरुक्तयोर्विशेषः १३२ नोत्पत्तिनिमित्तत्वान्माता० २६४ नानेकलक्षणैरेकभाव० २९० नोत्पत्तिविनाश० २८७ नान्तःशरीरवृत्ति० २३८ नोत्पत्तिविनाशकारणो० २३० नान्यत्र प्रवृत्त्यभावात् १९१ नोष्णशीतवर्षाकालनिमित्तत्वात् १९० नान्यत्वेऽप्यभ्यास० १५२ न्यूनसमाधिकोपलब्धे० १६० नाप्रत्यक्षे गव्ये प्रमाणार्थ० १२० नाभावप्रामाण्यं० १४० पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्था० ३७२ नार्थविशेषप्राबल्यात् १०१ पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलन० १८९ नार्थविशेषप्राबल्यात् ३३८ परं वा ऋतेः ३२६ नासन्न सन्न सदसत् २९९ परश्वादिष्वारम्भनिवृत्ति० २४४ निःश्वासोच्छ्वासो० १९५ परिशेषाद्यथोक्त० २४८ निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः० ३७८ परिषत्प्रतिवादिभ्यां० ३७४ नित्यमनित्यभावादनित्ये० ३६३ पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः० ८३ नित्यत्वप्रसङ्गश्च० २७० पाणिनिमित्तप्रश्लेषा० १५६ नित्यत्वेऽविकारादनित्यत्वे० १६३ पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च ३१२ नित्यस्याप्रत्याख्यानं २८६ पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः १९५ नित्यानामतीन्द्रियत्वा० १६४ पार्थिवाप्यतैजसं० १९५ निमित्तनैमित्तिकभावाद० २७७ पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ३३ निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च० २७७ पूर्वकृतफलानुबन्धा० २६३ निमित्तानिमित्तयोरर्था० २८५ पूरणप्रदाहपाटनानुप० १२४ नियमश्च निरनुमानः १८४ पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ० ८३ नियमहेत्वभावाद्यथा० २२९ पूर्वकृतफलानुबन्धात्तदुत्पत्तिः २६३ नियमानियमविरोधादनियमे १६६ पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धा० १८८ न्या० द० : २५