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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
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प्राण ५१

होगे। तुम लोगो को मालूम है, वक्तृता देते-देते मे जिस दिन मस्त हो जाता हूँ, उस दिन मेरी वक्तृता तुमको बहुत अच्छी लगती है, पर जब कभी मेरी उत्तेजना घट जाती है, तो तुम्हें मेरी वक्तृता मे उतना आनन्द नही मिलता।

जगत् को हिला-डुला देनेवाले तीव्र इच्छाशक्तिसम्पन्न महापुरुष अपने प्राण मे बहुत ऊँचा कम्पन उत्पन्न करके उस प्राण के वेग को इतना अधिक कर सकते है और उसको इतनी शक्ति से युक्त कर सकते है कि वह दूसरे को पल भर मे लपेट लेती है, हजारो मनुष्य उनकी ओर खिच जाते है और ससार के आधे लोग उनके भाव से परिचालित हो जाते है। जगत् मे जितने महापुरुष हुए है, सभी प्राणजित् थे। इस प्राण-सयम के बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे। वे अपने प्राण के भीतर अति उच्च कम्पन पैदा कर सकते थे, और उसी से उन्हे समस्त ससार पर प्रभाव विस्तार करने की क्षमता प्राप्त हुई थी। ससार मे तेज या शक्ति के जितने विकास देखे जाते है, सभी प्राण के संयम से उत्पन्न होते है। मनुष्य को यह तथ्य भले ही मालूम न हो, पर और किसी तरह इसकी व्याख्या नही हो सकती। तुम्हारे शरीर मे यह प्राण कभी एक ओर अधिक और दूसरी ओर कम हो जाता है। प्राण के इस प्रकार असामजस्य से ही रोग की उत्पत्ति होती है। अतिरिक्त प्राण को हटाकर, जहाँ प्राण का अभाव है, वहाँ का अभाव भर सकने से ही रोग अच्छा हो जाता है। प्राण कहाँ अधिक है और कहाँ अल्प, इसका ज्ञान प्राप्त करना भी प्राणायाम का अग है। अनुभव-शक्ति इतनी सूक्ष्म हो जायगी कि मन समझ जायगा, पैर के अँगूठे मे या हाथ की उँगली मे जितना प्राण आवश्यक है, उतना वहाँ नही है, और मन उस

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प्राण के अभाव को पूरा करने मे भी समर्थ हो जायगा । इस प्रकार प्राणायाम के अनेक अग हैं। इनको धीरे-धीरे, एक के बाद एक, सीखना होगा । अतएव यह स्पष्ट है कि विभिन्न रूपो में प्रकाशित प्राण का सयम करना और उसको विभिन्न प्रकार से चलाना ही राजयोग का एकमात्र लक्ष्य है। जब कोई अपनी समुदय शक्तियो का सयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही सयम करता है। जब कोई ध्यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही सयम कर रहा है।'

महासागर की ओर यदि देखो, तो प्रतीत होगा कि वहाँ पर्वतकाय बडी-बडी तरगें हैं, फिर छोटी-छोटी तरगें भी हैं, और छोटे-छोटे बुलबुले भी। पर इन सबके पीछे वही अनन्त महा-समुद्र है। एक ओर वह छोटा बुलबुला अनन्त समुद्र से युक्त है, फिर दूसरी ओर वह बडी तरंग भी उसी महासमुद्र से युक्त है। इसी प्रकार, ससार मे कोई महापुरुष हो सकता है, और कोई छोटा बुलबुला-जैसा सामान्य व्यक्ति, परन्तु सभी उसी अनन्त महाशक्ति-समुद्र से युक्त हैं। इस महाशक्ति से जीव का जन्मगत सम्बन्ध है। जहाँ भी जीवनी-शक्ति का प्रकाश देखो, वहाँ समझना कि उसके पीछे अनन्त शक्ति का भण्डार है। एक छोटासा फफूँदी (कुकुरमुत्ता) है, वह, सम्भव है, इतना छोटा, इतना सूक्ष्म हो कि उसे अनुवीक्षण यन्त्र द्वारा देखना पडे, उससे आरम्भ करो। देखोगे कि वह अनन्त शक्ति के भण्डार से क्रमश शक्ति सग्रह करके एक अन्य रूप धारण कर रहा है। कालान्तर में वह उद्भिद् के रूप मे परिणत होता है, वही फिर एक पशु का आकार ग्रहण करता है, फिर मनुष्य का रूप लेकर वही अन्त में ईश्वर-रूप में परिणत हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य है कि

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प्राण ५३

प्राकृतिक नियम से इस व्यापार के घटते-घटते लाखो साल पार हो जाते है। परन्तु यह समय है क्या ? वेग—साधना का वेग बढा देकर समय काफी घटाया जा सकता है। योगियो का कहना है कि साधारण प्रयत्न से जिस काम को अधिक समय लगता है, वही, वेग वढा देने पर, बहुत थोडे समय में सध सकता है। हो सकता है, कोई मनुष्य इस ससार की अनन्त शक्तिराशि में से बहुत थोडी-थोडी शक्ति लेकर चले। इस प्रकार चलने पर उसे देव-जन्म प्राप्त करते, सम्भव है, एक लाख वर्ष लग जायें, फिर और भी ऊँची अवस्था प्राप्त करते शायद पाँच लाख वर्ष लगे। फिर पूर्ण सिद्ध होते और भी पाँच लाख साल लगे। पर उन्नति का वेग वढा देने पर यह समय कम हो जाता है। पर्याप्त प्रयत्न करने पर छ वर्ष या छ महीने मे ही यह सिद्धिलाभ क्यो न हो सकेगा ? युक्ति तो बताती है कि इसमे कोई निर्दिष्ट सीमाबद्ध समय नही है। सोचो, कोई वाष्पीय यन्त्र, निर्दिष्ट परिमाण में कोयला देने पर, प्रति घण्टा दो मील चल सकता है, तो अधिक कोयला देने पर वह और भी शीघ्र चलेगा। इसी प्रकार, यदि हम भी तीव्र वेगसम्पन्न (योगसूत्र—१।२१) हो, तो इसी जन्म में मुक्तिलाभ क्यो न कर सकेगे ? हाँ, हम यह जानते अवश्य हैं कि अन्त मे सभी मुक्ति पाएँगे। पर इस प्रकार युग-युग तक हम प्रतीक्षा क्यो करे ? इसी क्षण, इस शरीर में ही, इस मनुष्य-देह में ही हम मुक्ति-लाभ करने मे समर्थ क्यो न होगे ? हम इसी समय वह अनन्त ज्ञान, वह अनन्त शक्ति क्यों न प्राप्त कर सकेगे ?

आत्मा की उन्नति का वेग वढाकर किस प्रकार थोड़े समय मे मुक्ति पाई जा सकती है, यही सारी योग-विद्या का लक्ष्य और उद्देश्य है। जब तक सारे मनुष्य मुक्त नही हो जाते, तब तक

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५४ राजयोग

प्रतीक्षा करते हुए थोडा-थोडा करके अग्रसर न होकर, प्रकृति के अनन्त शक्ति-भाण्डार मे से शक्ति ग्रहण करने की शक्ति बढाकर किस प्रकार शीघ्र मुक्ति-लाभ किया जा सकता है, योगियो ने इसका उपाय खोज निकाला है। ससार के सभी महापुरुष, साधु और सिद्ध पुरुषो ने क्या किया है ? उन्होने एक जन्म मे ही, समय को कम करके, उन सब अवस्थाओ का भोग कर लिया है, जिनमे से होते हुए साधारण मानव करोडो जन्मो मे मुक्त होता है। एक जन्म मे ही वे अपनी मुक्ति का मार्ग तय कर लेते है। वे दूसरी कोई चिन्ता नही करते, दूसरी बात के लिए एक निमिषमात्र भी समय नही देते। उनका पल भर भी व्यर्थ नही जाता। इस प्रकार उनकी मुक्ति का समय घट जाता है। एकाग्रता का यही अर्थ है कि शक्ति-सचय की क्षमता को बढाकर समय को घटा लेना। राजयोग इसी एकाग्रता की शक्ति को प्राप्त करने का विज्ञान है।

इस प्राणायाम के साथ प्रेततत्त्व (spiritualism) का क्या सम्बन्ध है ? वह भी एक तरह का प्राणायाम है। यदि यह सत्य हो कि परलोकगत आत्मा का अस्तित्व है और उसे हम देख भर नही पाते, तो यह भी बहुत सम्भव है कि यही पर शायद लाखो आत्माएँ है, जिन्हे हम न देख पाते है, न अनुभव कर पाते है, न छू पाते है। सम्भव है, हम सदा उनके शरीर के भीतर से आ-जा रहे हो। और यह भी बहुत सम्भव है कि वे भी हमे देखने या किसी प्रकार से अनुभव करने मे असमर्थ हो। यह मानो एक वृत्त के भीतर एक और वृत्त है, एक जगत् के भीतर एक और जगत्। जो एक ही भूमि (plane) पर रहते है, वे ही एक दूसरे को देख सकते है। हम पचेन्द्रियविशिष्ट प्राणी

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प्राण ५५

हैं। हमारे प्राण का कम्पन एक विशेष प्रकार का है। जिनके प्राण का कम्पन हमारी तरह का है, उन्ही को हम देख सकेगे। परन्तु यदि कोई ऐसा प्राणी हो, जिसका प्राण अपेक्षाकृत उच्च कम्पन-शील है, तो उसे हम न देख पाएंगे। प्रकाश की उज्ज्वलता अत्यन्त अधिक बढ़ जाने पर हम उसे नही देख पाते, किन्तु बहुत से प्राणियो की आँखे ऐसी शक्तियुक्त है कि वे उस तरह का प्रकाश देख सकती है। इसके विपरीत, यदि आलोक के परमाणुओ का कम्पन अत्यन्त मृदु या हल्का हो, तो भी उसे हम नही देख पाते, परन्तु उल्लू और बिल्ली आदि प्राणी उसे देख लेते है। हमारी दृष्टि इस प्राण-कम्पन के एक विशेष प्रकार को ही देखने मे समर्थ है। इसी प्रकार वायुराशि की बात लो। वायु मानो स्तर-पर-स्तर रची हुई है। पृथ्वी का निकटवर्ती स्तर अपने से ऊँचे-वाले स्तर से अधिक घना है, और इस तरह हम जितने ऊँचे उठते जायेंगे, हमे यही दिखेगा कि वायु क्रमश तरल होती जा रही है। इसी प्रकार समुद्र की बात लो, समुद्र के जितने ही गहरे प्रदेश मे जाओगे, पानी का दबाव उतना ही बढेगा। जो प्राणी समुद्र के नीचे रहते हैं, वे कभी ऊपर नही आ सकते, क्योकि यदि वे आयें, तो उसी समय उनका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाय।

सम्पूर्ण जगत् को 'ईथर' (आकाश-तत्त्व) के एक समुद्र के रूप में सोचो। प्राण की शक्ति से वह मानो स्पन्दित हो रहा है और विभिन्न मात्रा मे स्पन्दनशील स्तरो मे बँटा हुआ है। तो देखोगे, जिस स्थान से स्पन्दन शुरू हुआ है, उससे तुम जितनी दूर जाओगे, उतना ही वह स्पन्दन मृदु रूप से अनुभूत होगा, केन्द्र के पास स्पन्दन बहुत द्रुत होता है। और भी सोचो, भिन्न-भिन्न प्रकार के स्पन्दन एक-एक स्तर हैं। इस सम्पूर्ण

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स्पन्दन-क्षेत्र को एक वृत्त के रूप मे सोचो, सिद्धि उसका केन्द्र है, इस केन्द्र से हम जितनी दूर जायेंगे, स्पन्दन उतना ही मृदु होता जायगा। भूत सबसे बाहरी स्तर है, मन उससे निकटवर्ती, और आत्मा मानो केन्द्रस्वरूप है। इस प्रकार विचार करने से हम देखेंगे कि जो प्राणी एक स्तर पर वास करते है, वे एक दूसरे को पहिचान सकेगे, परन्तु अपने से नीचे या ऊँचे स्तरवाले जीवों को न पहिचान सकेंगे। फिर भी, जैसे हम अणुवीक्षण यंत्र और दूरवीन की सहायता से अपनी दृष्टि का क्षेत्र वढा सकते है, उसी प्रकार मन को विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से युक्त करके हम दूसरे स्तर का समाचार अर्थात् वहाँ क्या हो रहा है यह जान सकते है। समझो, इसी कमरे मे ऐसे बहुत से प्राणी हैं, जिन्हे हम नही देख पाते। वे सब प्राण के एक प्रकार के स्पन्दन के फल हैं, और हम एक दूसरे प्रकार के। मान लो कि वे प्राण के अधिक स्पन्दन से युक्त हैं और हम उनकी तुलना मे कम स्पन्दन से। हम भी प्राणरूप मूल वस्तु से गढे हुए है, और वे भी वही है। सभी एक ही समुद्र के भिन्न-भिन्न अंश मात्र हैं। विभिन्नता है केवल स्पन्दन की मात्रा मे। यदि मन को मैं अधिक स्पन्दन-विशिष्ट कर सका, तो मै फिर इस स्तर पर न रहूँगा, मैं फिर तुम लोगो को न देख पाऊँगा। तुम मेरी दृष्टि से अन्तर्हित हो जाओगे और वे मेरी आँखो के सामने आ जायेंगे। तुममें से शायद बहुतो को मालूम है कि यह व्यापार सत्य है। मन को इस प्रकार उच्च से उच्चतर स्पन्दन-विशिष्ट करने को योगशास्त्र में एकमात्र 'समाधि' शब्द द्वारा अभिहित किया गया है। समाधि की निम्नतर अवस्थाओ मे इन अदृश्य प्राणियो को प्रत्यक्ष किया जाता है। और समाधि की सर्वोच्च

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प्राण ५७

अवस्या तो वह है, जब हमे सत्यस्वरूप ब्रह्म के दर्शन होते है। तब हम उस उपादान को जान लेते है, जिससे इन सब बहुविध जीवों की उत्पत्ति हुई है। जैसे एक मृत्पिण्ड को जान लेने पर समस्त मृत्पिण्ड ज्ञात हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म-दर्शन से सम्पूर्ण जगत् भी जाना जा सकता है।

इस प्रकार हम देखते है कि प्रेततत्त्व-विद्या में जो कुछ सत्य है, वह भी प्राणायाम के ही अन्तर्भूत है। इसी-प्रकार, जब कभी तुम देखो कि कोई दल या सम्प्रदाय किसी रहस्यात्मक या गुप्त तत्त्व के आविष्कार की चेष्टा कर रहा है, तो समझना, वह यथार्थत. किसी परिमाण मे इस राजयोग की ही साधना कर रहा है, प्राण-सयम की ही चेष्टा कर रहा है। जहाँ कही किसी प्रकार की असाधारण शक्ति का विकास हुआ है, वहाँ प्राण की ही शक्ति का विकास समझना चाहिए। यहाँ तक कि भौतिक विज्ञान भी प्राणायाम के अन्तर्गत किए जा सकते हैं। वाष्पीय यन्त्र को कौन संचालित करता है ? प्राण ही वाष्प के भीतर से उसको चलाता है। ये जो विद्युत् की अद्भुत क्रियाएँ दीख पडती है, ये सब प्राण के छोड भला और क्या हो सकती है ? पदार्थ-विज्ञान है क्या ? वह बाहरी उपायों द्वारा प्राणायाम है। प्राण जब मानसिक शक्ति के रूप से प्रकाशित होता है, तब मानसिक उपायो द्वारा ही उसका सयम किया जा सकता है। जिस प्राणायाम मे प्राण के स्थूल रूपो को बाह्य उपायो द्वारा जीतने की चेष्टा की जाती है, उसे पदार्थ-विज्ञान या भौतिक विज्ञान कहते है, और जिस प्राणायाम मे प्राण के मानसिक विकासो को मानसिक उपायो द्वारा सयत करने की चेष्टा की जाती है, उसी को राजयोग कहते हैं।

चतुर्थ अध्याय

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चतुर्थ अध्याय

प्राण का आध्यात्मिक रूप

योगियों के मतानुसार मेरुदण्ड के भीतर इड़ा और पिंगला नाम के दो स्नायविक शक्तिप्रवाह, और मेरुदण्डस्थ मज्जा के बीच सुषुम्ना नाम की एक शून्य नाली है। इस शून्य नाली के सबसे नीचे कुण्डलिनी का आधारभूत पद्म अवस्थित है। योगियों का कहना है कि वह त्रिकोणाकार है। योगियों की रूपक भाषा में कुण्डलिनी शक्ति उस स्थान पर कुण्डलाकार हो विराज रही है। जब यह कुण्डलिनी शक्ति जगती है, तब वह इस शून्य नाली के भीतर से मार्ग बनाकर ऊपर उठने का प्रयत्न करती है, और ज्यो-ज्यो वह एक-एक सोपान ऊपर उठती जाती है, त्यो-त्यों मन के स्तर-पर-स्तर मानो खुलते जाते हैं और योगी को अनेक प्रकार के अलौकिक दर्शन होने लगते हैं तथा अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होने लगती हैं। जब वह कुण्डलिनी मस्तक पर चढ़ जाती है, तब योगी सम्पूर्ण रूप से शरीर और मन से पृथक हो जाते हैं और उनकी आत्मा अपने मुक्त स्वभाव की उपलब्धि करती है। हमें मालूम है कि मेरुमज्जा एक विशेष प्रकार से गठित है। अँगरेजी के आठ अंक (8) को यदि इस तरह (∞) लम्बा कर लिया जाय, तो देखेंगे कि उसके दो अंश हैं और वे दोनों अंश बीच से जुड़े हुए हैं। इस तरह के अनेक अंकों को एक-पर-एक रखने पर जैसा दीख पड़ता है, मेरुमज्जा बहुत-कुछ वैसी ही है। उसके बाईं ओर इड़ा है और दाहिनी ओर पिंगला, और जो शून्य नाली मेरुमज्जा के ठीक बीच में से गई है, वही सुषुम्ना है। कटिप्रदेशस्थ मेरुदण्ड की कुछ अस्थियों के बाद ही मेरुमज्जा

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प्राण का आध्यात्मिक रूप ५९

समाप्त हो गई है, परन्तु वहाँ से भी तागे के समान एक बहुत ही सूक्ष्म पदार्थ बराबर नीचे उतरता गया है। सुपुम्ना नाली वहाँ भी अवस्थित है, परन्तु वहाँ बहुत सूक्ष्म हो गई है। नीचे की ओर उस नाली का मुँह बन्द रहता है। उसके निकट ही कटिप्रदेशस्थ नाडी-जाल (Sacral Plexus) अवस्थित है। आजकल के शरीरविधानशास्त्र (Physiology) के मत से वह त्रिकोणाकार है। इन विभिन्न नाडी-जालो के केन्द्र मेरुमज्जा के भीतर अवस्थित है, वे नाडी-जाल योगियो के भिन्न-भिन्न पद्मो या चक्रो के तौर पर लिए जा सकते है।

योगियो का कहना है कि सबसे नीचे मूलाधार से लेकर मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार या सहस्रदल पद्म तक कुछ केन्द्र है। यदि हम उन पद्मो को पूर्वोक्त नाडी-जाल (plexus) समझें, तो आजकल के शरीरविधानशास्त्र के द्वारा बहुत सहज ही योगियों की बात का मर्म समझ मे आ जायगा। हमे मालूम है कि हमारे स्नायुओ के भीतर दो प्रकार के प्रवाह हैं, उनमे से एक को अन्तर्मुखी और दूसरे को बहिर्मुखी, एक को ज्ञानात्मक और दूसरे को गति-आत्मक, एक को केन्द्र की ओर जानेवाला और दूसरे को केन्द्र से दूर जानेवाला कहा जा सकता है। उनमे से एक मस्तिष्क की ओर सवाद ले जाता है, और दूसरा मस्तिष्क से बाहर, समुदाय अगो मे। परन्तु अन्त मे ये प्रवाह मस्तिष्क से सयुक्त हो जाते हैं। आगे आनेवाले विषय को स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमे कुछ और बाते ध्यान मे रखनी होगी। यह मेरुमज्जा मस्तिष्क मे जाकर एक प्रकार के 'बल्व' मे—medulla नामक एक अडाकार पदार्थ मे अन्त हो जाती है, जो मस्तिष्क के साथ संयुक्त नहीं है, वरन् मस्तिष्क मे जो एक

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६० राजयोग

तरल पदार्थ है, उसमे तैरता रहता है। अत यदि सिर पर कोई आघात लगे, तो उस आघात की शक्ति उस तरल पदार्थ मे बिखर जाती है, और इससे उस बल्ब को कोई चोट नही पहुँचती। यह एक महत्त्वपूर्ण बात है, जो हमे स्मरण रखनी चाहिए। दूसरे, हमे यह भी जान लेना होगा कि इन सब चक्रो मे से सबसे नीचे स्थित मूलाधार, मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार और नाभिदेश मे स्थित मणिपूर—इन तीन चक्रो की बात हमे विशेष रूप से ध्यान में रखनी होगी।

अब पदार्थ-विज्ञान का एक तत्त्व हमे समझना है। हम लोगो ने विद्युत् और उससे सयुक्त अन्य बहुविध शक्तियो की बाते सुनी हैं। विद्युत् क्या है, यह किसी को मालूम नही। हम लोग इतना ही जानते है कि विद्युत् एक प्रकार की गति है। जगत् मे और भी अनेक प्रकार की गतियां हैं, विद्युत् से उनका भेद क्या है? मान लो, यह टेबुल चल रहा है और उसके परमाणु विभिन्न दिशाओ मे जा रहे हैं। अब यदि उनको अनवरत एक ही दिशा मे चलाया जाय, तो वही गति विद्युत् की शक्ति मे परिणत हो जायगी। समस्त परमाणु यदि एक ओर गतिशील हो, तो उसी को वैद्युत-गति कहते हैं। इस कमरे मे जो वायु है, उसके सारे परमाणुओं को यदि लगातार एक ओर चलाया जाय, तो यह कमरा एक महान् विद्युदाधार-यन्त्र (battery) के रूप मे परिणत हो जायगा।

शारीरविधानशास्त्र की एक और बात हमें स्मरण करनी होगी। वह यह कि जो स्नायु-केन्द्र श्वास-प्रश्वास-यन्त्रो को नियमित करता है, उसका सारे स्नायु-प्रवाहो पर भी कुछ अधिकार है। यह केन्द्र वक्ष के ठीक दूसरी ओर मेरुदण्ड में अवस्थित है। यह

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श्वास-प्रश्वास-यंत्रों को नियमित करता है और दूसरे जो स्नायु-चक्र हैं, उन पर भी कुछ प्रभाव डालता है।

अब हम प्राणायाम-क्रिया के साधन का कारण समझ सकेंगे। पहले तो, यदि श्वास-प्रश्वास की गति नियमित की जाय, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा मे गतिशील होने का प्रयत्न करेंगे। जब विभिन्न दिशाओ मे दौड़नेवाला मन एकमुखी होकर एक दृढ इच्छाशक्ति के रूप मे परिणत होता है, तब सारे स्नायु-प्रवाह भी परिवर्तित होकर एक प्रकार की विद्युद्वत् गति प्राप्त करते हैं, क्योकि स्नायुओ पर विद्युत्-क्रिया करने पर देखा गया है कि उनके दोनो प्रान्तो मे धनात्मक और ऋणात्मक इन विपरीत शक्तिद्वय का उद्भव होता है। इसी से यह स्पष्ट है कि जब इच्छाशक्ति स्नायु-प्रवाह के रूप मे परिणत होती है, तब वह एक प्रकार के विद्युत् का आकार धारण कर लेती है। जब शरीर की सारी गतियां सम्पूर्ण रूप से एकाभिमुखी होती है, तब वह शरीर मानो इच्छाशक्ति का एक प्रबल विद्युदाधार बन जाता है। यह प्रबल इच्छाशक्ति प्राप्त करना ही योगी का उद्देश है। इस तरह, शरीरविधानशास्त्र की सहायता से प्राणायाम-क्रिया की व्याख्या की जा सकती है। वह शरीर के भीतर एक प्रकार की एकमुखी गति पैदा कर देती है और श्वास-प्रश्वास-केन्द्र पर आधिपत्य करके शरीर के अन्यान्य केन्द्रों को भी वश में लाने मे सहायता पहुँचाती हैं। यहाँ पर प्राणायाम का लक्ष्य मूलाधार में कुण्डलाकार मे अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति को उद्बुद्ध-करना है।

हम जो कुछ देखते हैं, कल्पना करते है या जो कोई स्वप्न देखते हैं, सारे अनुभव हमे आकाश मे करने पडते हैं। हम

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साधारणत जिस परिदृश्यमान आकाश को देखते हैं, उसका नाम है महाकाश । योगी जब दूसरो का मनोभाव समझने लगते है या अलौकिक वस्तुएँ देखने लगते हे, तब वे सब दर्शन चित्ताकाश में होते है । और जब अनुभूति विषयशून्य हो जाती है, जब आत्मा अपने स्वरूप मे प्रकाशित होती है, तब उसका नाम है चिदाकाश । जब कुण्डलिनी शक्ति जागकर सुषम्ना नाडी मे प्रवेश करती है, तब जो सब विषय अनुभूत होते हैं, वे चित्ताकाश मे ही होते है । जब वह उस नाडी की अन्तिम सीमा मस्तक मे पहुँचती है, तब चिदाकाश मे एक विषयशून्य ज्ञान अनुभूत होता है ।

अब विद्युत् की उपमा फिर से ली जाय । हम देखते हैं कि मनुष्य केवल तार के योग से एक जगह से दूसरी जगह विद्युत्-प्रवाह चला सकता है, परन्तु प्रकृति अपने महान् शक्ति-प्रवाहो को भेजने के लिए किसी तार का सहारा नही लेती । इसी से अच्छी तरह समझ मे आ जाता है कि किसी प्रवाह को चलाने के लिए वास्तव में तार की कोई आवश्यकता नही । हम तार के बिना काम नही कर सकते, इसीलिए हमे उसकी आवश्यकता पडती है । जैसे विद्युत्-प्रवाह तार की सहायता से विभिन्न दिशाओ मे प्रवाहित होता है, ठीक उसी तरह बाहर के विषय से जो ज्ञान-प्रवाह मस्तिष्क में अथवा मस्तिष्क से जो कर्मप्रवाह बहिर्देश मे प्रवाहित होता है, वह स्नायू-तन्तुरूप तार की ही सहायता से होता है । मेरुमज्जा-मध्यस्थ ज्ञानात्मक और कर्मात्मक-स्नायुगच्छ-स्तम्भ ही योगियो की इडा और पिंगला नाडियाँ हैं। प्रधानत उन दोनो नाडियो के भीतर से ही पूर्वोक्त अन्तर्मुखी


* पाठक यह ध्यान रखें कि यह बात बेतार-का-तार के आविष्कार के पूर्व ही कही गई । थी

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और वहिर्मुखी शक्तिप्रवाहद्वय आना-जाना कर रहे है। परन्तु बात अब यह है कि इस प्रकार के तार के समान किसी पदार्थ की सहायता बिना मस्तिष्क से चारो ओर विभिन्न संवाद भेजना और भिन्न-भिन्न स्थानो से मस्तिष्क का विभिन्न संवाद ग्रहण करना सम्भव क्यो न होगा? प्रकृति में तो ऐसे व्यापार घटते देखे जाते हैं। योगियो का कहना है कि इसमें कृतकार्य होने पर ही भौतिक बन्धनों को लांघा जा सकता है। तो अब इसमे कृतकार्य होने का उपाय क्या है? यदि मेरुदण्डमध्यस्थ सुषुम्ना के भीतर से स्नायु-प्रवाह चलाया जा सके, तो यह समस्या मिट जायगी। मन ने ही यह स्नायु-जाल तैयार किया है, और उसी को यह जाल तोडकर किसी प्रकार की सहायता की राह न देखते हुए, अपना काम करना होगा। तभी सारा ज्ञान हमारे अधिकार मे आयगा, देह का बन्धन फिर न रह जायगा। इसीलिए सुषुम्ना नाडी पर विजय पाना हमारे लिए इतना आवश्यक है। यदि तुम इस शून्य नाली के भीतर से, स्नायु-जाल की सहायता के बिना भी मानसिक प्रवाह चला सको, तो बस इस समस्या की मीमांसा हो गई। योगी कहते हैं कि वह सम्भव है।

साधारण मनुष्यो के भीतर सुषुम्ना नीचे की ओर बन्द रहती है; उससे कोई कार्य नही होता। योगियो का कहना है कि इस सुषुम्ना का द्वार खोलकर उससे स्नायु-प्रवाह चलाने की एक निर्दिष्ट प्रणाली है। उस साधना मे सफल होने पर स्नायु-प्रवाह उसके भीतर से चलाया जा सकता है। बाह्य विषय के स्पर्श से उत्पन्न प्रवाह जब किसी केन्द्र पर पहुँचता है, तब उस केन्द्र से एक प्रतिक्रिया होती है। स्वैर केन्द्रो (automatic centres) में उन प्रतिक्रियाओ का फल केवल गति होता है, पर

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राजयोग

चेतनयुक्त केन्द्रो (conscious centres) में पहले अनुभव, और फिर बाद मे गति होती है। सारी अनुभूतियाँ बाहर से आई हुई क्रियाओ की प्रतिक्रिया मात्र है। तो फिर स्वप्न मे अनुभूति किस तरह होती है? उस समय तो बाहर की कोई क्रिया नही रहती। अतएव स्पष्ट है कि विषय के अभिघात से पैदा हुई स्नायविक गतिया शरीर के किसी-न-किसी स्थान पर अवश्य अव्यक्त भाव से रहती है। मान लो, मैने एक नगर देखा। "नगर" नामक बाहरी वस्तु-समूह के आघात की जो प्रतिक्रिया है, उसी से उस नगर की अनुभूति होती है। अर्थात् उस नगर के बाहरी वस्तु-समूह द्वारा हमारे अन्तर्वाही स्नायुओ मे जो गतिविशेष उत्पन्न हुई है, उससे मस्तिष्क के भीतर के परमाणुओ में एक गति पैदा हो गई है। आज बहुत दिन बाद भी वह नगर मेरी स्मृति मे आता है। इस स्मृति में भी ठीक वही व्यापार होता है, पर अपेक्षाकृत हल्के रूप मे। किन्तु जो क्रिया मस्तिष्क के भीतर उस प्रकार का मृदुतर कम्पन ला देती है, वह भला कहा से आती है? यह तो कभी नही कहा जा सकता कि वह उसी पहले के विषय-अभिघात से पैदा हुई है। अत स्पष्ट है कि विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाह या सवेदनाएँ शरीर के किसी स्थान पर कुण्डलीकृत होकर विद्यमान हैं और उनके अभिघात के फल से ही स्वप्न-अनुभूति रूप मृदु प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती हैं। जिस केन्द्र में विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाहों के बचे हुए अग या सस्कार-समष्टि मानो सचित-सी रहती है, उसे मूलाधार कहते हैं, और उस कुण्डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। सम्भवत. गतिगतियो का अवशिष्ट अश भी इसी जगह कुण्डलीकृत होकर संचित है, क्योकि वाह्य

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ओं

ओं तत् सत्.

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वस्तुओ पर दीर्घ काल चिन्तन और आलोचना के बाद, शरीर के जिस स्थान पर यह मूलाधार चक्र (सम्भवत Sacral Plexus) अवस्थित है, उसे गरम होते देखते हैं । अब, यदि इस कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर उसे ज्ञातभाव से सुषुम्ना नाली मे से प्रवाहित करते हुए एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र को ऊपर लाया जाय, तो वह ज्यो-ज्यो विभिन्न केन्द्रो पर क्रिया करेगी, त्यो-त्यो प्रबल प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होगी। जब शक्ति का बिलकुल सामान्य अग किसी स्नायु-तन्तु के भीतर से प्रवाहित होकर विभिन्न केन्द्रो से प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, तब वही स्वप्न अथवा कल्पना के नाम से अभिहित होता है। किन्तु जब मूलाधार मे सचित विपुलायतन शक्तिपुज दीर्घकालव्यापी तीव्र ध्यान के बल से उद्बुद्ध होकर सुषुम्ना-मार्ग मे भ्रमण करता है और विभिन्न केन्द्रो पर आघात करता है, तो उस समय जो प्रतिक्रिया होती है, वह बड़ी ही प्रबल है। वह स्वप्न अथवा कल्पनाकालीन प्रतिक्रिया से तो अनन्तगुनी श्रेष्ठ है ही, पर जाग्रत्कालीन विषय-ज्ञान की प्रतिक्रिया से भी अनन्तगुनी प्रबल है। यही अतीन्द्रिय अनुभूति है। फिर जब वह शक्तिपुज समस्त ज्ञान के, समस्त अनुभूतियो के केन्द्रस्वरूप मस्तिष्क मे पहुँचता है, तब सम्पूर्ण मस्तिष्क और उसके अनुभवसम्पन्न प्रत्येक परमाणु से मानो प्रतिक्रिया होने लगती है। इसका फल है ज्ञान का पूर्ण प्रकाश या आत्मानुभूति । कुण्डलिनी शक्ति जैसे-जैसे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र को जाती है, वैसे-ही-वैसे मन का मानो एक-एक परदा खुलता जाता है और तब योगी इस जगत् की सूक्ष्म या कारण अवस्था की उपलब्धि करते है। और तभी विषय-स्पर्श से उत्पन्न हुई संवेदना और उसकी प्रतिक्रियारूप जो जगत् के कारण है, उनका यथार्थ स्वरूप हमे ज्ञात हो जाता

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६६ राजयोग

है। अतएव तब हम सारे विषयो का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते है; क्योकि कारण को जान लेने पर कार्य का ज्ञान अवश्य आयगा।

(इस प्रकार हमने देखा कि कुण्डलिनी को जगा देना ही तत्त्वज्ञान, ज्ञानातीत अनुभूति या आत्मानुभूति का एकमात्र उपाय है। कुण्डलिनी को जाग्रत् करने के अनेक उपाय हैं। किसी की कुण्डलिनी भगवान के प्रति प्रेम के बल से ही जाग्रत् हो जाती है, किसी की सिद्ध महापुरुषो की कृपा से और किसी की सूक्ष्म ज्ञान-विचार द्वारा। लोग जिसे अलौकिक शक्ति या ज्ञान कहते हैं, उसका जहाँ कही कुछ प्रकाश दिख पडे, तो समझना होगा कि वहाँ कुछ परिमाण में यह कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के भीतर किसी तरह प्रवेश कर गई है। तो भी इस प्रकार की अलौकिक घटनाओ मे से अधिकतर स्थलो में देखा जायगा कि उस व्यक्ति ने बिना जाने एकाएक ऐसी कोई साधना कर डाली है, जिससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति अज्ञात-भाव से कुछ परिमाण मे स्वतन्त्र होकर सुषुम्ना के भीतर प्रवेश कर गई है। जिस किसी प्रकार की उपासना हो, वह, ज्ञातभाव से अथवा अज्ञातभाव से, उसी एक लक्ष्य पर पहुँचा देती है अर्थात् उससे कुण्डलिनी जाग्रत् हो जाती है। जो सोचते है कि मैंने अपनी प्रार्थना का उत्तर पाया, उन्हे मालूम नही कि प्रार्थना-रूप मनोवृत्ति के द्वारा वे अपनी ही देह मे स्थित अनन्त शक्ति के एक बिन्दु को जगाने मे समर्थ हुए है। अतएव मनुष्य बिना जाने जिसकी विभिन्न नामो से, डरते-डरते और कष्ट उठाकर उपासना करता है, उसके पास किस तरह अग्रसर होना होगा, यह जान लेने पर समझ में आ जायगा कि वह प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर में प्रकृत जीवन्त शक्ति के रूप में विराजमान है और

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प्राण का आध्यात्मिक रूप ६७

अनन्त सुख की जननी है—योगीगण ससार के सामने उच्च कण्ठ से यही घोषणा करते हैं। अतएव राजयोग यथार्थ धर्मविज्ञान है। वह सारी उपासना, सारी प्रार्थना, विभिन्न प्रकार की साधना-पद्धति और समुदाय अलौकिक घटनाओ की युक्तिसंगत व्याख्या है।

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पंचम अध्याय

अध्यात्म प्राण का संयम

अब हम प्राणायाम की विभिन्न क्रियाओ के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे। हमने पहले ही देखा है कि योगियो के मत मे साधना का पहला अंग फेफडे की गति को अपने अधीन करना है। हमारा उद्देश्य है—शरीर के भीतर जो सूक्ष्म गतियाँ हो रही हैं, उनका अनुभव प्राप्त करना। हमारा मन बिलकुल बाहर आ पडा है, वह भीतर की सूक्ष्म गतियों को बिलकुल नही पकड सकता। हम जब उनका अनुभव प्राप्त करने मे समर्थ होगे, तो उन पर विजय पा लेगे। ये स्नायविक शक्तिप्रवाह शरीर मे सर्वत्र चल रहे हैं, वे प्रत्येक पेशी मे जाकर उसको जीवन-शक्ति दे रहे हैं, किन्तु हम उनका अनुभव नही कर पाते। योगियो का कहना है कि प्रयत्न करने पर हम उनका अनुभव प्राप्त करना सीख जायेंगे। पहले फेफडे की गति पर विजय पाने की चेष्टा करनी होगी। कुछ काल तक यह कर सकने पर हम सूक्ष्मतर गतियो को भी वश मे ला सकेगे।

अब प्राणायाम की क्रियाओ की चर्चा की जाय। पहले तो, सीधे होकर बैठना होगा। देह को ठीक सीधी रखना होगा। यद्यपि मेरुमज्जा मेरुदण्ड से संलग्न नही है, फिर भी वह मेरुदण्ड के भीतर अवस्थित है। टेढा होकर बैठने से वह अस्त-व्यस्त हो जाती है। अतएव देखना होगा कि वह स्वच्छन्द भाव से रहे। टेढे बैठकर ध्यान करने की चेष्टा करने से अपनी ही हानि होती है। शरीर के तीनो भाग—वक्ष, ग्रीवा और मस्तक—सदा एक रेखा मे ठीक सीधे रखने होगे। देखोगे, बहुत थोडे अभ्यास से वह श्वास-प्रश्वास