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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

**७—योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता**<br>(पण्डित श्रीजानकीनाथजी शर्मा)

* योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता *


योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता

(लेखक—पं० श्रीजानकीनाथजी शर्मा)

योगवासिष्ठके अध्येता तथा मननकर्ताओंसे यह बात छिपी नहीं है कि यह ग्रन्थ भारत ही नहीं, विश्वसाहित्यमे ज्ञानात्मक, सूक्ष्मविचार-तत्त्वनिरूपक तथा श्रेष्ठ सदुक्तिपूर्ण ग्रन्थोंमें सर्व-श्रेष्ठ है। यह महारामायण, वासिष्ठरामायण आदि नामोंसे भी विख्यात है। स्वयं भगवान् वसिष्ठने ही कहा है कि 'संसार-सर्पके विषसे विकल तथा विषयविषूचिकासे पीड़ित मृतप्राय प्राणियोंके लिये योगवासिष्ठ परम पवित्र अमोघ गारुड़-मन्त्र है। इसे सुन लेनेपर जीवन्मुक्ति सुखका अनुभव होता है।'* स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे कि 'योगवासिष्ठ मेरे लिये सर्वाधिक आश्चर्य एवं चमत्कारपूर्ण ग्रन्थ है।'† डा० भगवानदासने 'मिस्टिक एक्सपेरियन्सेज' पुस्तककी प्रस्तावनामें लिखा है 'योगवासिष्ठ सिद्धावस्थाका ग्रन्थ है। इसके विचार, दर्शन, रहस्य, निरूपण-प्रणाली, भाषा, अलंकार—सब एक-से-एक आश्चर्यकर हैं।' लाला बैजनाथजीने इसके हिंदी-भाषान्तरकी भूमिकामें लिखा था कि 'वेदान्त-ग्रन्थोंमें योगवासिष्ठकी कोटिका कोई भी ग्रन्थ नहीं है' (भाग २ की भूमिका)। पिछले दिनों स्वामी भूमानन्दजी (जगद्गुरु आश्रम चटगाँव, बंगाल) डा० भीखनलालजी आत्रेय, श्रीक्षितीशचन्द्रजी चक्रवर्ती आदि महान् विद्वानोंने इसकी बड़ी प्रशंसा की तथा इसपर पर्याप्त मनन-अनुसंधान कर स्वतन्त्र पुस्तकें लिखी हैं।

तथापि आजके जगत्‌में कुछ ऐसे मतवादी भी हैं, जिनकी योगवासिष्ठके विरुद्ध स्वाभाविक उपेक्षा है। वे लोग कहते हैं कि योगवासिष्ठ १७ वीं शतीकी रचना है। कई लोगोंका मत है कि यह स्वामी विद्यारण्यजीकी कृति है। कुछ भावुक वैष्णवों-का कथन है कि इसमें श्रीरामचन्द्रको शोकविकल दिखलाया गया है; शिष्यरूपमें दिखलाया गया है; इसमें भक्तिकी महिमा नहीं है अतः सर्वथा उपेक्षणीय है। जे० एन० फक्यूहरका मत था कि 'योगवासिष्ठ ईसाकी १३वीं तथा १४वीं शतीके बीचमें लिखा गया था।'१ (Religious Lectures of India pp 228) प्रोफ़ेसर शिवप्रसाद भट्टाचार्यका मत है कि यह १० से १२ वीं शतीके मध्यकी कृति है (The Proceedings of the Madras Oriental Conference P 545)। जर्मन विद्वान् डा० विंटरनिट्जके मतानुसार 'यह शंकराचार्यके अनुयायियोंकी कृति है और ७से ८ शतीतक्की रचना है।‡।' डा० भीखनलाल आत्रेय इसे ईसाकी ६ ठी शतीकी रचना मानते हैं। उनका कथन है कि भर्तृहरिके वाक्यपदीयमें तथा योगवासिष्ठमें कुछ समान पद हैं। इनमें योगवासिष्ठ ही पुराना हो सकता है। अतः योगवासिष्ठ कालिदासके बाद और भर्तृहरिके पहलेकी रचना है; इसलिये लगभग ६ ठी शतीमें ही इसको रखना युक्तिसंगत होगा।§

शङ्काओंका समुचित समाधान

वस्तुतः ये सब शङ्काएँ आलस्य (योगवासिष्ठको तथा अन्य ग्रन्थोंको देखनेका कष्ट न करने) प्रमाद, मानसिक मतभेद तथा पाश्चात्यके प्रभावके कारण ही हैं। ये सब कथन एक प्रकारसे अयुक्तिपूर्णमात्र भी हैं। जो लोग कहते हैं कि योग-वासिष्ठ १७वीं शतीकी रचना है, उन्हें देखना चाहिये कि १७वीं शतीके आस-पासकी आनन्दबोधेन्द्र सरस्वतीकी वासिष्ठरामायण-तात्पर्य-प्रकाश नामकी टीका है१। इसीके आसपासकी अन्र्तयारण्य, आत्मसुख, आनन्दवर्धन, गङ्गाधरेन्द्र, माधव-सरस्वती तथा सदानन्द यतिकी टीकाएँ हैं। १६ वीं शतीके आचार्य श्रीमद्मधुसूदन सरस्वतीने अपने ग्रन्थ सिद्धान्तबिन्दु, अद्वैतरत्न-


*(क) दुःसहा राम संसारविषविषद्विषूचिका।
योगगारुडमन्त्रेण पावनेन प्रशाम्यति ॥ (२।१२।१०)
(ख) जीवन्मुक्तत्वसंसिद्धिस्तु श्रुते समनुभूयते ।
स्वयमेव यथा पीते नीरोगत्व वरौषधे ॥ (३।८।२५)

† One of the greatest books and the most wonderful according to me ever written under the sun is 'Yoga Vasistha'
(In the Woods of God-Realization, Delhi edition, Vol. 111, p 295)

‡ As Shankara does not mention the work, it is probably written by one of his contemporaries. (Geschichte der Indischen Literature-Vol. III, pp 44)

§ Hence we may place it after Kalidas and before Bhartrihari, is somewhere in the 6 th century A D. (Vasistha Darshanam, the Probable Date of Composition of Yoga Vasistha, p 18)

१. ऋतुरससुरगमही(१७६६)शकविकारियुगवत्सरस्य शिशिरर्तौ,
(तात्पर्यप्रकाशोपसंहार)

२. यह टीका १४ वीं शतीकी होनी चाहिये; क्योंकि इनकी 'रामार्चनचन्द्रिका'का उल्लेख 'निर्णयसिन्धु'आदिमें बार-बार हुआ है।

६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *


रक्षण, वेदान्तकल्पलतिका, संक्षेपशारीरक-व्याख्या तथा गीताकी 'गूढार्थदीपिका' व्याख्यामें—प्रायः सर्वत्र योगवासिष्ठके हजारों वचन उद्धृत किये हैं। केवल गीताके ६।३२ तथा ३६ वें श्लोकोंकी व्याख्यामें ही इन्होंने योगवासिष्ठके पच्चासों श्लोकोंको उद्धृत किया है। इनसे भी पूर्व चौदहवीं शताब्दी-के सर्वोपरि विद्वान् वेदान्ताचार्य श्रीविद्यारण्य स्वामीने अपने 'जीवन्मुक्ति-विवेक' तथा 'पञ्चदशी' ग्रन्थोंमें योगवासिष्ठके श्लोकों-को बड़े आदरसे बार-बार उद्धृत किया है³। इनके गुरु श्रीशंकरानन्द भी 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' (गीता १३।४) की व्याख्यामें लिखते हैं—'वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु ऋषिभिर्वसिष्ठ-पराशरादिभिर्बहुप्रकारं प्रतिपादितम्'। यहाँ वसिष्ठनिर्मित

३. (क) अत एवाह वसिष्ठः—'द्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव।' (६।२३। पर मधुसूदनी)
(ख) वासिष्ठरामायणादिषु तदेव तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासना-क्षयश्चेति त्रयमभ्यसनीयम्। तदुक्तं वासिष्ठे—
तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यास विदुर्बुधाः ॥
(गीता ६।३२ पर मधुसूदन)

४. परास्य शक्तिर्विविधा क्रियाज्ञानफलात्मिका।
(क) इति वेदवचः प्राह वसिष्ठश्च तथाम्रवीत्।
सर्वशक्तिपरं ब्रह्म नित्यमापूर्णमद्वयम् ॥
ययोल्लसति शक्त्यासौ प्रकाशमधिगच्छति।
चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेषूपलभ्यते ॥
स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्।
यन्मनाङ् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥
इत्यादि (पञ्चदशी १३।१४ से २८ वें श्लोकतक सब योगवासिष्ठके ही श्लोक हैं)
'वसिष्ठश्च तथाब्रवीत्' की व्याख्यामें रामकृष्णपण्डित लिखते हैं—'वासिष्ठाभिधे ग्रन्थे।'
(ख) वसिष्ठः—'अतएव हि राम त्वं श्रेय प्राप्नोषि शाश्वतम्।
स्वप्रयत्नोपनीतेन पौरुषेणैव नान्यथा ॥
(जीवन्मुक्तिविवेक पृष्ठ ३५)
यह श्लोक योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहारप्रकरणका है।
सच्ची बात तो यह है कि 'जीवन्मुक्तिविवेक' यागवासिष्ठपर ही आधारित है। इसमें योगवासिष्ठको वाल्मीकिलिखित भी बतलाया है—'वासनाभेदो वाल्मीकिना दर्शितः वासिष्ठे—वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा' इत्यादि' ये सब योगवासिष्ठके ही श्लोक हैं। इसमें प्रायः आधे ग्रन्थमें योगवासिष्ठके श्लोक ही हैं।

५. नमः श्रीशंकरानन्दगुरुपादाम्बुजन्मने। (पञ्चदशी १।१)


'योगवासिष्ठ' का सुस्पष्ट उल्लेख है। इनसे भी बहुत पहलेके १२ वीं शतीके विद्वान् श्रीश्रीधर स्वामीने अपनी सुबोधिनी नामक गीता-व्याख्यामें योगवासिष्ठके श्लोकोंको कई बार उद्धृत किया है⁶। इससे भी पूर्व गौड़ अभिनन्द नामक काश्मीरी विद्वान्ने जिसका समय ९वीं शतीका मध्यकाल माना जाता है, 'योगवासिष्ठसार' नामका ग्रन्थ लिखा था। इसमें उसने प्रायः ६ सहस्र श्लोकोंमें ही द्वात्रिंशत्सहस्रात्मक (३२००० वाले) योगवासिष्ठ ग्रन्थके सारभूत श्लोकोंका संग्रह किया है। इससे सिद्ध है कि योगवासिष्ठ इससे भी बहुत पहलेका ग्रन्थ है।

श्रीशंकराचार्य और योगवासिष्ठ

जो लोग कहते हैं कि शंकराचार्यके अनुयायियोंमेंसे ही किसी एकने 'योगवासिष्ठ' बना दिया, वह भी केवल उनका अविचारित निर्णय मात्र है। जिस प्रकार शंकरानन्द, नीलकण्ठ, श्रीधरस्वामी, मधुसूदन सरस्वती आदिने गीताके १३।४ श्लोकके 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की व्याख्यामें 'वसिष्ठादिभिः प्रतिपादितम्' लिखा है, उसी प्रकार शंकराचार्य भी लिखते हैं—ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। मधुसूदन सरस्वती तथा भाष्योत्कर्षदीपिकाकारने इन्हीं शब्दोंकी व्याख्या करते हुए लिखा है—'वसिष्ठाभिधे योगशास्त्रे'

इतना ही नहीं, 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' (१।८) के भाष्यमें वे सुस्पष्ट शब्दोंमें लिखते हैं—

तथा च वासिष्ठे योगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम्—
यथाऽऽत्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥
संसृतिः कस्य तात स्यान्मोक्षो वा विद्यया विभो।

और लगातार दो श्लोकोंमें प्रश्न करके पुनः 'वसिष्ठः' लिखकर 'तस्यैव नित्यशुद्धस्य सदानन्दमयात्मनः' आदि योगवासिष्ठके दो श्लोकोंको उत्तररूपमे लिखते हैं। इसी प्रकार वे 'सनत्सुजातीयभाष्य' (१।१५) में भी लिखते हैं—तथा चाह भगवान् वसिष्ठः –

६. (क) तदुक्तं वसिष्ठेन—
प्राणे गते यथा देह सुखदुःखे न विन्दति।
तथा चेत् प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥
(५।२३ गीता-व्याख्या)
(ख) वसिष्ठेन चोक्तम्—'न कर्माण्ये त्यजेद् योगी कर्म-भिस्त्यज्यते ह्यसौ।' (गीता १८।२ की व्याख्या)
(ग) ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्योगशास्त्रेषु निरूपितम्'
(गीता १३।४ की व्याख्या)

* योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता * ७


चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति ।
वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥
वे पुनः इसी ग्रन्थके इसी अध्यायके ३१ वें श्लोकके भाष्यमें लिखते हैं—तथा चाह भगवान् वसिष्ठः —
यत्र सन्तं न चासन्तं नाश‍्रुतं न बहुश्रुतम् ।
न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित् स ब्राह्मणः ॥
यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रन्थ शंकराचार्यकृत नहीं हैं, क्योंकि 'शंकरदिग्विजयकार' ने भी लिखा है—
समत्सृजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ।
स्वामी भूमानन्दजीने Influence of the Yoga-vasistha on Shankaracharya नामकी पुस्तिकामें तुलनात्मक अध्ययनद्वारा यह भी दिखलाया है कि शंकराचार्यकी विवेकचूड़ामणि, सारतत्त्वोपदेश, लघुवाक्यवृत्ति, प्रबोधानुभूति, प्रबोधसुधाकर आदि वृत्तियोंपर योगवासिष्ठके किन-किन श्लोकोंकी छाप या प्रभाव है । उदाहरणार्थ—'प्राणस्पन्दविरोधाद् सत्सङ्गाद् वासनात्यागात् । हरिचरणभक्तियोगान्मनः स्ववेगं जहाति शनैः ॥' इस प्रबोधसुधाकर ( ७७ ) के श्लोक पर 'अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च । वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥ एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ।' योगवासिष्ठ ( ५ । ९२ । ३५ ) इस श्लोककी छाप है । इससे सिद्ध है कि योगवासिष्ठ शंकराचार्यके समय इस समयसे कही अधिक निर्भ्रान्त तथा समादरणीय ग्रन्थ था । यह स्मरर्णाई है कि शंकराचार्यका समय आजसे २३ सौ वर्ष पूर्व है । देखिये 'कल्याण' वर्ष ११, अङ्क ८, 'सिद्धान्त' ७ । २७ ।

श्रीरामका तिरस्कार नहीं

कुछ वैष्णवजनोंको यह आपत्ति है कि श्रीरामका इसमें शोकाकुल होना—शोकसे पीला पड़ना बतलाया गया है, परमात्मा शोकयुक्त या शिष्य नहीं बनता । इसके उत्तरमें नम्र निवेदन है कि श्रीरामका शोक जैसा वाल्मीकि आदि रामायणोंमें सीताहरण या लक्ष्मणमूर्च्छा आदिके बाद है, वैसी तो योगवासिष्ठमें कोई बात भी नहीं है । योगवासिष्ठमें राम संसारसे खिन्न होकर खाना-पीना छोड़ रहे हैं, एकान्तवास करते हैं । यह भोगोंसे वैराग्य उत्तम अधिकारीका लक्षण है । भोजन छोड़नेसे उनका पीला हो जाना स्वाभाविक है । बाल्यावस्थामें विद्याग्रहणार्थ उनके द्वारा भगवान् वसिष्ठका शिष्यत्व स्वीकार करना सभी रामायणोंमें वर्णित है, उसी बाल्यावस्थामें विश्वामित्रके यागसंरक्षणके पूर्व ही इनका योगवासिष्ठका ग्रहण, तदुचित अधिकारसम्पादन, सम्पूर्ण विश्वको एकदम चकित कर देनेवाले प्रश्न-भाषण योगवासिष्ठद्वारा मन्त्रविद्या रामके माहात्म्याधिक्यके प्रतिपादक तथा साधक ही हैं, बाधक नहीं ।

योगवासिष्ठमें श्रीरामका महाविष्णुत्व-निरूपण

योगवासिष्ठमें महर्षि वाल्मीकिने बार-बार श्रीरामको महाविष्णु बतलाया है । कुछ थोड़े प्रसङ्ग यहाँ उदाहरणस्वरूप उपस्थित किये जा रहे हैं—

चिदानन्दस्वरूपे हि रामे चैतन्यविग्रहे ।
( १ । १ । ५६ )
शापव्याजवशादेव राजवेशधरो हरिः ।
( १ । १ । ५५ )
वृन्दया शापितो विष्णुस्तेन मानुषतां गतः ।
( १ । १ । ६५ )
अहं वेद्मि महात्मानं रामं राजीवलोचनम् ।
वसिष्ठश्च महातेजा ये चान्ये दीर्घदर्शिनः ॥
( १ । ७ । २१ )

बालक रामके ज्ञानपूर्ण भाषण सुनकर सभी मुनि अनेकानेक लोकोंसे दौड़ पड़ते हैं और आश्चर्यचकित होकर कहने लग जाते हैं—

न रामेण समोऽस्तीह दृष्टो लोकेषु कश्चन ।
विवेकानुदारात्मा न भावी चेति नो मतिः ॥
( योग० १ । ३३ । ४५ )

अर्थात् तीनों लोकोंमें आजतक श्रीरामके समान ज्ञानी एवं उदार व्यक्ति न तो कोई हुआ और न भविष्यमें होनेवाला है ऐसी हमलोगोंकी बुद्धि कहती है,—हमारा निश्चय है ।

इतना ही नहीं, श्रीरामके अमृतमय प्रवचनको सुनकर घोड़े घास खाना छोड़ देते हैं, रानियाँ गवाक्षमे देखती हुई चित्रलिखित-सी खड़ी रह जाती हैं, देरतक लगातार पुष्पवृष्टि होती रहती है, सभी मन्त्री, सामन्त, नागरिक, राजकुमार एकटक देखते रह जाते हैं । पिंजरेके पक्षी, रानमहलके क्रीडामृग भी कान खड़े करके ध्यानसे सुनते रह जाते हैं । सिद्धमुनियोंकी परम्परा सभाभवनमें सुदूरसे दौड़ पड़ती है—

सामन्तैः राजपुत्रैश्च ग्राहगणैर्गृहवादिभिः ।
तथा भृत्यैरमात्यैश्च पञ्जरस्थैश्च पक्षिभिः ॥
क्रीडामृगैर्गतस्पन्दैस्तुरङ्गैस्त्यक्तचर्वणैः ।
कौसल्याप्रमुखैश्चैव निजवातायनस्थितैः ॥
संशान्तभूषणारावैरस्पन्दैर्वनितागणैः ।

* अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् *


सिद्धैर्नभश्चरैश्चैव तथा गन्धर्वकिन्नरैः।
रामस्य ता विचित्रार्था महोदारा गिरः श्रुताः ॥
( १ । ३० । ७–११ )

श्रीरामके शिष्यत्वका भी उत्तर है। योग्य अधिकारी श्रीरामसे दूसरा कौन मिलता ? अतः स्वयं प्रश्न करके वसिष्ठके हृदयमें प्रविष्ट होकर उन्होंने यह ज्ञान प्रकट किया। देखिये वासिष्ठमहारामायण-तात्पर्यटीकाका उपोद्घात, श्लोक ११—

आविश्यान्तर्वसिष्ठं बहिरपि कलयन् शिष्यभावं वितेने।
यः संवादेन शास्त्रामृतजलधिममुं रामचन्द्रं प्रपद्ये ॥

योगवासिष्ठके अन्तमें भी 'नारायण' कहकर श्रीरामको नमस्कार किया गया है।

योगवासिष्ठमें भक्ति

योगवासिष्ठमें भक्तिकी बात भी बहुत है । यों तो उपरिनिर्दिष्ट प्रकरण भी, जिसकी छाया सम्भवतः भागवतकारके वेणुगीतपर पड़ती है और जिसमें कहा गया है कि 'श्रीकृष्णके वेणुगीतको श्रवणकर बछड़े दूध पीना भूल जाते हैं, नदियोंका वेग भग्न हो जाता है, गौएँ कवल नहीं लेतीं, कम भक्ति-रससे ओतप्रोत नहीं है। तथापि इस तरहके अन्य भी कई प्रसङ्ग योगवासिष्ठमें हैं। उपशम-प्रकरणके ३३ वें अध्यायकी प्रह्लादकृत विष्णुस्तुति संस्कृतसाहित्यकी अद्भुत निधि है। वह सब स्तुतियोंको एक बार मात कर देती है। श्रीवसिष्ठकी भगवान् शङ्करसे मिलनेके वादकी प्रार्थना भी अत्यद्भुत भक्ति-रससे परिपूर्ण है। कई स्थानोंपर भगवत्स्मरणकी बडी महिमा है। ध्यानकी प्रशंसा तो सर्वत्र है ही।

भक्तशिरोमणि तुलसीदासजीको भी योगवासिष्ठ मान्य था। उनके उत्तरकाण्डके भुशुण्डिचरित्रपर भुशुण्डोपाख्यान (योग-वासिष्ठ-निर्वाणप्रकरण पूर्वार्द्ध १४ से २८ अध्याय) की छाया है। भुशुण्डके दीर्घजीवित्वका क्रम, कारणादि यहाँ बड़े विस्तारसे निरूपित है। विनयपत्रिकाके २०५ वें पदमें वे लिखते हैं—

जौ मन भज्यो चहै हरि सुरतरु ।
सम, संतोष, विचार, विमल अति सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरू

इसपर योगवासिष्ठके 'शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधु-संगमः ।' ( २ । ११ । ६० ) 'तथा संतोषः साधुसङ्गमश्च विचारोऽथ शमस्तथा ।' ( २ । १६ । १८) आदि मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके १२ से १६ वें अध्यायतकतके उपदेशोका ही प्रभाव है। 'वेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥' आदिसे भी इसका समर्थन-सा होता है।

योगवासिष्ठ किसकी रचना ?

यों योगवासिष्ठको वाल्मीकिकी रचना बतलाया गया है । कई लोग इसमें 'उवाच' आदि अलङ्कारोंकी भरमार देखकर अन्यकी कृति समझते हैं । पर जो हो, यह तो उन्हे भी मानना पड़ेगा कि पदमाधुर्य, भावगाम्भीर्य, निरूपणशैली, तत्त्वप्रदर्शन, सूक्ष्मेक्षिका, प्रखरविचार, सर्वत्र नवीनता तथा अमृतोपम पवित्रतम साधु उपदेशोंकी शृङ्खला देखते हुए यह वाल्मीकि-रामायण या विश्वके किसी भी ग्रन्थसे निम्नकोटिका नहीं है। अतः इसका रचयिता जो भी हो, साक्षात् ईश्वर है या ईश्वरप्राप्त है। ग्रन्थ सर्वथा निर्दोष है। कई प्रकरण तो वाल्मीकिसे मिलते भी हैं। विश्वामित्र-दशरथ-संवादमें प्रायः वाल्मीकिके ही श्लोक हैं। जो अधिक हैं, वे रम्यतर हैं। 'उवाच' आदि लिखना—भिन्न शैली अपनाना भी एक लेखकद्वारा सम्भव है ही। अतः वाल्मीकिरचित मानना युक्तिसंगत ही है।

उपसंहार

ध्यानसे देखा जाय तो भागवत, वाल्मीकिरामायण तथा अन्य पुराणोंसे योगवासिष्ठका वर्णन अधिक ही मिलता है। वस्तुतः भाषा, छन्दरचना तथा विचार-प्रवणताकी दृष्टिसे योग-वासिष्ठ सर्वोत्तम ग्रन्थ प्रतीत होता है। इसलिये श्रेष्ठ साधक इसके कालनिर्णयके चक्करमें न पड़कर इससे वास्तविक लाभ उठानेके प्रयत्नमें लग जाते हैं। यही होना भी चाहिये। किंतु साधारण व्यक्ति इससे वञ्चित न रह जायँ तथा व्यापक भ्रान्त धारणा शान्त हो जाय, इसीलिये यह यत्किंचित् प्रयास किया गया है।

वस्तुतः योगवासिष्ठ भारतीय ज्ञानरविकों एक अनुपम रश्मि है। इसमें ससार, उसके तरनेके उपाय, दैव, पुरुषार्थ, तत्त्वज्ञान एव उसके साधनोंके प्रत्येक अङ्गपर इतना क्रम-क्रमसे विचार किया गया है कि देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। कल्याणकामी मनुष्योंको इससे अवश्य लाभ उठाना चाहिये यही प्रार्थना है।

**८—योगवासिष्ठकी आजके आत्मशान्ति, विश्व-शान्तिके इच्छुक विश्वको चुनौती तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं शमाभास**<br>(श्रीरामनिवासजी शर्मा)

* योगवासिष्ठकी आजके आत्म-शान्ति, विश्व-शान्ति के इच्छुक विश्वको चुनौती * ९


योगवासिष्ठकी आजके आत्म-शान्ति, विश्व-शान्ति के इच्छुक विश्वको चुनौती

तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं ज्ञानाभास

(लेखक—प० श्रीरामनिवासी शर्मा)

शास्त्र कहते हैं ज्ञानके बिना मुक्ति नहीं।^१ आधुनिक विद्वान् भी प्रकारान्तरसे यही कहते हैं— Knowledge is power परंतु ज्ञान और ज्ञान-शक्तिमें अन्तर है। ज्ञानसे शक्ति तभी प्राप्त होती है जब कि मनुष्य ज्ञानार्थमें ढल जाता है। क्रियाहीन ज्ञान तो शक्तिहीन ही होता है। यह भी न भुलाना चाहिये कि ज्ञानसे शक्ति और मुक्ति तभी प्राप्त होती है, जब कि वह अध्यात्म हो। आजका ज्ञान तो— १—भौतिक है २—तर्कमात्र है ३—शिल्पिवत् है ४—अवास्तविक है ५—केवल प्रवृत्तप्राण है ६—यश और जीविकाका साधन है आजका ऐसा सारहीन अनात्म-ज्ञान योगवासिष्ठके मतसे ज्ञानाभास है और ऐसे ज्ञानका धनी व्यक्ति ज्ञानबन्धु है तथा ज्ञानशिल्पी। वह वास्तविक ज्ञानी नहीं, उससे तो अज्ञानी ही अच्छा है—

आत्मज्ञानं विदुर्ज्ञानं ज्ञानान्यन्यानि यानि तु।
तानि ज्ञानावभासानि सारस्यानवबोधनात् ॥
\hfill (यो० वा० ६।२१।७)

अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञानबन्धुताम् ॥
व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रभोगार्थ शिल्पिवत् ॥
\hfill (यो० वा० ६।२१।१-३)

हम देखते हैं आज भारत भी ज्ञान-बन्धुता और ज्ञाना-भासका शिकार हो रहा है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनोंके ही मतसे यह चरित्रहीन होता जा रहा है। भारतेतर देशोंकी दशा तो इससे भी बुरी है। वे तो इस दिशाके गुरु ही हैं, अतः उनका जीवन एकमात्र प्रवृत्ति-प्रधान है एव सर्वाधिक भोगप्रधान।

योगवासिष्ठकारके मतसे तो ज्ञानी वही है जो जानने योग्य वस्तुको जानकर वासनामुक्त तथा कर्मतत्पर होता है—

ज्ञात्वा सम्यगनुष्ठानं दृश्यते येन कर्मसु ।
निर्वासनात्मकं ज्ञस्य स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥
\hfill (यो० वा० ६।२२।२)


योगवासिष्ठकार यह भी कहते हैं कि जिसकी इच्छाएँ शान्त हो गयी हों एवं जिसकी शीतलता कृत्रिम न होकर वास्तविक हो तथा जिसका पुनर्जन्मका खटका मिट गया हो, वही ज्ञानी है, अन्यथा खाना-पहनना और लेना-देना आदि तो शिल्पीकी जीविकामात्र है—

अन्तःशीतलतेहासु प्राज्ञैर्यस्यावलोक्यते।
अकृत्रिमैकशान्तस्य स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥
\hfill (यो० वा० ६।२२।१)

अपुनर्जन्मने यः स्याद्बोधः स ज्ञानशब्दभाक् ।
वसनाशनदा शेषा व्यवस्था शिल्पजीविका ॥
\hfill (यो० वा० ६।२१।४)

योगवासिष्ठकारका यह भी मत है कि जो मनुष्य कामना तथा संकल्प-विकल्पसे मुक्त होकर शान्तचित्तसे अवसरानुसार कार्य करता है वही पण्डित है—

प्रवाहपतिते कार्ये कामसंकल्पवर्जितः ।
तिष्ठत्याकाशहृदयो यः स पण्डित उच्यते ॥
\hfill (यो० वा० ६।२७।५)

योगवासिष्ठके मतसे सच्चा आर्यपुरुष वही है जो कर्तव्यका पालन करता है और अकर्तव्यसे बचता है एव प्रकृत आचारविचारमें संलग्न रहता है—

कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् ।
तिष्ठति प्राकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः ॥
\hfill (यो० वा० ६।१२६।५४)

योगवासिष्ठकारकी आर्यपुरुषलक्षण-विषयक यह भी समुद्घोषणा है कि जो व्यक्ति शास्त्र-सदाचार एव परिस्थिति-सम्मत तथा मनःपूत व्यवहार करता है वही आर्य है—

यथाचारं यथाशास्त्रं यथाचित्तं यथास्थितम् ।
व्यवहारमुपादत्ते यः स आर्य इति स्मृतः ॥
\hfill (यो० वा० ६।१७६।१७)

किस विज्ञसे यह बात छिपी हुई है कि आजका मानव आर्योचित योगवासिष्ठ-अभिमत व्यक्तित्वसे सर्वथा दूर होता जा रहा है अपितु वह मानवोचित व्यक्तित्वसे न पहचाना जाकर विद्वान, प्रशासक, बाबू, हाकिम, वकील आदि विशेषणोंसे पहचाना और पुकारा जाता है। पाश्चात्य देशोंमें भी बाइबलके इस वाक्यका सम्मान दृष्टिगोचर नहीं होता—


१. ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।

**९—भगवान् वसिष्ठकी जय** (श्रीसूरजचंदजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी')

१० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *


Man it does not mean this or that but humanity.

ऐसा क्यों हो रहा है । इसका एकमात्र कारण यही है कि हमारे विश्वविद्यालयोंका आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हो पाता । सभी सुधार-योजनाओंपर भी अमल नहीं किया जाता और न घर और बाहर बालकोंकी शिक्षा-दीक्षापर ही समुचित ध्यान दिया जाता है । ऐसी दशामें तथाकथित आर्य-व्यक्तित्व बालकोंमें कैसे उत्पन्न हो सकता है ? इसी सत्यपर प्रकारान्तरसे राष्ट्रपति डा० राजेन्द्रप्रसादजीके ये शब्द पूर्णतः चरितार्थ होते हैं—

हम अपने सामने कितने भी महान् व उच्च आदर्शोंको लेकर जिस-किसी तरहकी राज-व्यवस्था क्यों न स्थापित कर लें, हमारी आर्थिक व सामाजिक विचारधारा कितनी भी समान व उदार क्यों न हो, पर जबतक हमारी अगली पीढ़ीका शारीरिक एवं मानसिक सौष्ठव व गठन शिशु-जीवनमें ही ठीक न होगा, तबतक देशमें हम सुख व शान्ति स्थापित करनेमें सफल नहीं हो सकते ।

यहाँ योगवासिष्ठ-सम्मत यह बात भी विचारणीय है कि ज्ञान-विकास और आत्म-ज्ञानप्राप्ति न केवल शास्त्र और गुरु-वचन-साध्य ही है प्रत्युत स्वानुभवका भी विषय है—

शास्त्रार्थे बुध्यते नात्मा गुरुवचनतो न च ।
बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतस्ततः ॥
\hfill (यो० वा०)

इस समय हम देखते हैं हमारे विद्यार्थी आत्मनिर्भर नहीं हो पाते । वे केवल पुस्तक-कीट और परप्रत्ययनेय मति ही बने रहते हैं । वे यह भी नहीं समझते कि पेड़ भीतरसे बढ़ता है, माली और उपकरण तो उसके निमित्तमात्र होते हैं । वे प्रायः इस वैदिक सत्यसे भी अनभिज्ञ-से ही रहते हैं—

‘आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत् ।’

एतद्विषयक योगवासिष्ठकी तो यह सम्मति है कि आत्म-शान्ति और विश्व-शान्ति आत्म-विकास और आत्म-ज्ञानसे ही प्राप्त होती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं । अतएव सर्वदुःखहर्त्ता आत्मावलोकनमें ही भूति-विभूतिके इच्छुक व्यक्ति लगा रहे—

करोतु भुवने राज्यं विशत्वम्भोदमम्बुवत् ।
आत्मलाभादृते जन्तुर्विश्रान्तिमधिगच्छति ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ५ । २४)

आत्मावलोकने यत्नः कर्त्तव्यो भूतिमिच्छता ।
सर्वदुःखशिरश्छेद आत्मालोकेन जायते ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ७५ । ४६)

योगवासिष्ठसम्मत आत्मावलोकनसे न केवल आत्म-शान्ति प्राप्त होती है अपितु योगवासिष्ठके बार-बारके पाठ और अवलोकनसे विश्वबन्धुता—प्राणस्पृहणीय नागरिकता भी प्राप्त होती है, जो आजकी अत्यधिक वाञ्छनीय वस्तु है—

एतच्छास्त्राभ्यासात् पौनःपुन्येन वीक्षणात् ।
परा नागरतोदेति महत्त्वगुणशालिनी ॥
\hfill (यो० वा० २ । १८ । ३६, ८)

योगवासिष्ठकारके मतसे योगवासिष्ठ-ग्रन्थावलोकनका एकान्त फल यह भी है—

बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरिति न संशयः ।
जीवन्मुक्तत्वमस्मिंस्तु श्रुतिः समनुभूयते¹ ॥
\hfill (यो० वा० ३ । ८ । १३ । १५)


भगवान् वसिष्ठकी जय

(लेखक—पं० श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी (डाँगीजी))

योगवासिष्ठके प्रवक्ता भगवान् वसिष्ठका परिचय कराना अत्यन्त कठिन है, फिर भी उनके पारमार्थिक स्वरूपका मनन करना हो तो उनका भगवान्‌के अवतारोंके साथ क्या सम्बन्ध है ? उसे स्मरण किया जाना अनिवार्य आवश्यक है ।

मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् रामके गुरु, भगवान् परशुरामके पिता महर्षि जमदग्नि और भगवान् दत्तात्रेयके मौसा, परम सिद्ध भगवान् कपिल और परमहंस नवयोगेश्वर तथा जड़-भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवके दादा, राजर्षि आग्नीध्रके बहनोई, भगवान् मनुके पुत्र, आद्य नरेन्द्र प्रियव्रतकी बहन देवी देवहूतिके जामाता भगवान् वसिष्ठकी सदा काल जय हो, विजय हो, जिन्होंने संसार-चक्रको छेदन करनेके लिये पुण्य-कर्मका चक्र बताया और पुण्यकर्मके चक्रको भंग करनेके लिये धर्मचक्र चलाया और फिर गुरुचक्रका प्रवर्त्तन करके सिद्धचक्रमें प्रवेश करा दिया—अजातवादके परम रहस्यमय सिद्धान्तके आद्य प्रणेता भगवान् वसिष्ठ ही हैं ।

इस अद्वैत, तुरीय और अज तत्त्वमे भी परं तुरीयातीत, द्वैताद्वैतातीत और अवाच्यपदगांभीर्य परमतत्त्वके प्रणेता भगवान् वसिष्ठ सर्वत्र सर्वथा, सर्वदा सम्पूर्ण आराध्य बनें ।


१. इस ग्रन्थके श्रवणसे परम ज्ञान प्राप्त होता है, फिर जीवन्मुक्तिका अनुभव होने लगता है ।

**१०—योगवासिष्ठका साध्य-साधन**

* योगवासिष्ठका साध्य-साधन *

११


योगवासिष्ठका साध्य-साधन

योगवासिष्ठ महारामायणका प्रारम्भ होता है—देवराज इन्द्रके द्वारा, महर्षि वाल्मीकिके पास राजा अरिष्टनेमिके भेजे जानेके प्रसङ्गसे । अरिष्टनेमि महर्षि वाल्मीकिसे मोक्षका साधन पूछते हैं । उसके उत्तरमें वाल्मीकिजी महाराज अपने शिष्य भरद्वाजके साथ हुए संवादका वर्णन करते हुए भगवान् रामके प्राकट्यकी बात सुनाते हैं । तदनन्तर महर्षि विश्वामित्र-के दशरथ-दरबारमें आकर यज्ञरक्षार्थ रामको माँगनेका प्रसङ्ग सुनाकर रामके वैराग्य तथा राम-वसिष्ठ-संवादके रूपमें छः प्रकरणोंमें 'योगवासिष्ठ' नामक विशाल ग्रन्थका श्रवण कराते हैं ।

योगवासिष्ठ अजातवाद या केवल ब्रह्मवादका ग्रन्थ है । इसके सिद्धान्तानुसार एकमात्र चेतनतत्त्व परब्रह्मके अतिरिक्त कोई अन्य सत्ता ही नहीं है । जैसे समुद्रमें अनन्त तरङ्गों उठती-मिटती रहती हैं, वे समुद्रसे भिन्न नहीं हैं, इसी प्रकार नित्य समरूप अनादि अनन्त सच्चिदानन्दघन परमात्म-चैतन्यरूप समुद्रमें नाना प्रकारके अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशकी लीला-तरङ्गें दीखती रहती हैं । चित्त या अहंकार—जो वास्तवमें चेतन-ब्रह्मसे अभिन्न तथा ब्रह्मरूप ही है—इस दृश्य-प्रपञ्चका—सृष्टि, स्थिति-विनाशका कारण है । अहङ्कारका नाश होते ही, जो अहंकारकी सत्ता न माननेसे ही नाश हो जाता है, केवल एक ब्रह्म-चैतन्य ही रह जाता है । इसी एक तत्त्वका विभिन्न आख्यानों, इतिहासों, कथाओंके द्वारा इस विशाल ग्रन्थमें प्रतिपादन किया गया है । यह ग्रन्थ पुनरुक्तिपूर्ण है । एक ही सत्य तत्त्वको दृढ़ता-पूर्वक हृदयमें जमा देनेके लिये, एक ही सत्य तत्त्वकी अनुभूति या प्राप्ति करा देनेके लिये बार-बार विभिन्न रूपोंसे एक-सी ही युक्तियों तथा उपमाओंका उल्लेख किया गया है ।

सृष्टि न कभी हुई, न है—एकमात्र ब्रह्म ही है । इस प्रकार सृष्टिका अभाव प्रतिपादन करनेपर भी इस ग्रन्थमें कहीं भी यथेच्छाचार, शास्त्रनिषिद्ध व्यवहार, रागद्वेष-कामक्रोधादि-जनित अनाचार, भ्रष्टाचार, दुष्ट-सङ्ग आदिका समर्थन नहीं किया गया है; वरं बड़ी कड़ाईके साथ शास्त्राज्ञापालन-रूप सदाचारपरायणता एवं त्यागमय पुण्यमय जीवनकी आवश्यकता बतायी गयी है । राग, ममता, कामना, तृष्णा, इच्छा और इनके मूल अहंकारके त्यागकी महत्ता स्थान-स्थानपर बतलायी गयी है । इन्द्रियभोगोंमें फँसे हुए मनुष्योंकी घोर दुर्दशाका वर्णन करते हुए वैराग्यकी अत्यन्त प्रयोजनीयताका प्रतिपादन किया गया है । साधक पुरुषको अहम्भावनारूप ग्रन्थिका यथार्थ ब्रह्मज्ञानके द्वारा भेदन करके सच्चा ज्ञानी बननेका उपदेश दिया गया है; केवल ज्ञानका कथनमात्र करनेवाले 'ज्ञानबन्धु' ( नकली ज्ञानी ) बननेका नहीं । महर्षि वसिष्ठने यहाँतक कहा है कि 'वे ज्ञानबन्धु ( नकली ज्ञानी ) से तो अज्ञानीको अच्छा समझते हैं ( क्योंकि वह बेचारे अपनेको तथा दूसरोंको धोखा तो नहीं देते । ) महर्षि कहते हैं—

ज्ञानिनैव सदा भाव्यं राम न ज्ञानबन्धुना ।
अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञानबन्धुताम् ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २१ । १ )

फिर भगवान् श्रीरामके पूछनेपर नकली ज्ञानी ( ज्ञान-बन्धु ) के लक्षण बतलाते हैं ।

व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रं भोगाय शिल्पिवत् ।
यतते न त्वनुष्ठाने ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥
कर्मस्पन्देषु नो बोधः फलितो यस्य दृश्यते ।
बोधशिल्पोपजीवित्वाज्ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥
वसनाशनमात्रेण तुष्टाः शास्त्रफलानि ये ।
जानन्ति ज्ञानबन्धूंस्तान्विद्याच्छास्त्रार्थदृष्टिरिनः ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २१ । ३–५ )

'जैसे शिल्पी जीविकाके लिये ही शिल्पकला सीखता है, वैसे ही जो मनुष्य केवल भोगप्राप्तिके लिये ही शास्त्रोंको पढ़ता और उसकी व्याख्या करता है, स्वयं शास्त्रके अनुसार आचरणके लिये प्रयत्न नहीं करता, वह ज्ञानबन्धु कहलाता है । शास्त्राध्ययनसे जिसको शाब्दिक बोध हो गया है, परन्तु उस बोधका फल जो विनाशशील भोगों—दृश्याकारोंसे वैराग्य होना चाहिये, सो नहीं हुआ तो उसका यह शास्त्रज्ञान शिल्पमात्र है—तत्त्वज्ञानकी बातें बनाकर दूसरोंको ठगनेके लिये चातुर्यपूर्ण कलामात्र है ।, उस कलासे केवल जीविका चलानेवाला होनेके कारण वह मनुष्य ज्ञानबन्धु कहलाता है । जो केवल भोजन-वस्त्रमें ही संतुष्ट रहकर भोजनादिकी प्राप्तिको ही शास्त्राध्ययनका फल समझते हैं, वे शास्त्रोंके अर्थको एक

१२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *

शिल्पकला ही मानते हैं। ऐसे लोगोंको ज्ञानबन्धु जानना चाहिये।' फिर कहते हैं—

अपुनर्जन्मने यः स्याद् बोधः स ज्ञानशब्दभाक् ।
वसनाशनदा शेषा व्यवस्था शिल्पजीविका ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २२ । ४ )

'जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है, पुनर्जन्मकी नहीं, उसीका नाम ज्ञान है। उसके अतिरिक्त दूसरा जो शब्दज्ञानका चातुर्य है, वह तो रोटी-कपड़ा प्राप्त करनेकी कलामात्र है। उसे केवल भोजन-वस्त्र जुटानेवाली व्यवस्था समझना चाहिये।'

इस परम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये शम ( मनकी स्ववशता ), दम (इन्द्रियनिग्रह), शास्त्रीय सदाचारका सेवन, दैवी सम्पत्ति-के गुणोंका अर्जन तथा भोग-वैराग्यपूर्वक ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे सद्गुरुके शरणमें जाना आवश्यक है। सद्गुरु वही है, जो शिष्यके अज्ञानान्धकारको अपने निर्मल स्वप्रकाश ज्ञानकी विमल ज्योतिसे हर ले और शिष्य वही है, जो विनय तथा सेवापरायण होकर ज्ञानी गुरुसे प्रश्न करे और उनके आज्ञा-अनुसार अपना जीवन निर्माण करे। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—

अतत्त्वज्ञमनादेयवचनं वाग्विदांवर ।
यः पृच्छति नरं तस्मान्नास्ति मूढतरोऽपरः ॥
प्रामाणिकस्य तज्ज्ञस्य वक्तुः पृष्टस्य यत्नतः ।
नानुतिष्ठति यो वाक्यं नान्यस्तस्मान्नराधमः ॥
( मुमुक्षु प्रकरण ११ । ४५-४६ )

"वाग्नेत्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! जो तत्त्वका ज्ञान नहीं रखता, उसके वचन मानने योग्य नहीं हैं। ऐसे तत्त्वज्ञानहीन मनुष्यसे जो तत्त्वविषयक प्रश्न करता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई 'मूर्ख' नहीं है।" (साथ ही, जो मनुष्य किसी सच्चे ज्ञानी महात्मासे) "पूछकर भी उस प्रमाणकुशल तथा तत्त्वज्ञानी वक्ताके उपदेशके अनुसार यत्नपूर्वक आचरण नहीं करता, उससे बढ़कर 'नराधम' भी दूसरा कोई नहीं है।"

अतएव न तो बिना जाने-समझे किसीसे पूछना चाहिये तथा न तत्त्वज्ञ महात्माका उपदेश प्राप्त करके उसकी अवहेलना ही करनी चाहिये। साथ ही तत्त्वज्ञ पुरुषको भी चाहिये कि वे यथार्थ अधिकारीको ही तत्त्वका उपदेश दें। महर्षि कहते हैं—

पूर्वापरसमाधानक्षमबुद्धावनिन्दिते ।
पृष्टं प्राज्ञेन वक्तव्यं नाधमे पशुधर्मिणी ॥
प्रामाणिकार्थयोग्यत्वं पृच्छकस्याविचार्य च ।
यो वक्ति तमिह प्राज्ञाः प्राहुर्मूढतरं नरम् ॥
( मुमुक्षु-प्रकरण ११ । ४९-५० )

'ज्ञानी महात्माको चाहिये कि पूर्वापरका विचार करके यथार्थ निश्चय करनेमें जिसकी बुद्धि समर्थ हो, जिसके आचरण निन्दनीय न हों, ऐसे ही पुरुषको उसके पूछे हुए तत्त्वका उपदेश दे। जो आहार-निद्रा, भय-मैथुन आदि पशुधर्मसे संयुक्त है, ऐसे अधमको उपदेश न दे। प्रश्नकर्त्तामें श्रुति आदि प्रमाणोंके द्वारा निर्णय किये हुए तत्त्व-पदार्थको ग्रहण करनेकी योग्यता है या नहीं, इसका विचार किये बिना ही जो वक्ता उसे उपदेश देता है, उसको ज्ञानीजन इस लोकमें महान् मूढ़ बतलाते हैं।'

इसीलिये महर्षि वसिष्ठ आदर्श गुरु हैं तथा भगवान् रामचन्द्र आदर्श शिष्य हैं। गुरु-शिष्यको इन्हींका अनुसरण करनेवाले होना चाहिये।

मुमुक्षुके जीवनमें सहज ही शास्त्रानुकूल आचरण, संयम, सत्य, शम, दम, विषय-वैराग्य और मोक्षकी तीव्र इच्छा होनी ही चाहिये। महर्षि वसिष्ठ तो शम, दम, सत्यादि गुणोंसे रहित मनुष्यको मनुष्य ही नहीं मानते। वे कहते हैं—

येषां गुणेष्वसंतोषो रागो येषां श्रुतं प्रति ।
सत्यव्यसनिनो ये च ते नराः पशवोऽपरे ॥
( स्थिति-प्रकरण ३२ । ४० )

'जिनका (इन शम-दमादि) गुणोंके विषयमें संतोष नहीं है (इनको जो बढ़ाना ही चाहते हैं), जिनका शास्त्रके प्रति अनुराग है तथा जिनको सत्यके आचरणका ही व्यसन है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं, दूसरे तो पशु ही हैं।'

अतएव सच्चे कल्याणकामी पुरुषोंको इन शास्त्रानुमोदित गुणोंसे सम्पन्न होकर परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये पूर्णरूपसे साधनाभ्यास करना चाहिये। इसके लिये सच्चे महात्मा पुरुषोंका सङ्ग तथा सेवन (उनके कथनानुसार जीवन-निर्माण) आवश्यक है। इसके बिना कोरे तप, तीर्थ या शास्त्राध्ययनसे सफलता नहीं मिलती। पर महात्मा सच्चे होने चाहिये। और कुछ न हो तो इतना अवश्य देख ले कि हम जिनका सङ्ग करते हैं, उनकी संगतिसे दुर्गुणों-दुराचारोंका

* योगवासिष्ठका साध्य-साधन * १३

नाश होता है या नहीं। उनके जीवनगत सहस्र शास्त्रप्रतिपादित आचरणोंसे हमें दुराचार-दुर्गुणोंके त्याग और सदाचार-सद्गुणोंके ग्रहणके लिये प्रेरणा मिलती है या नहीं। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—

लोभमोहरुषां यस्य तनुतानुदिनं भवेत्।
यथाशास्त्रं विहरति स्वकर्मसु स सज्जनः॥
(स्थिति-प्रकरण ३३।१५)

'जिसके सङ्गसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हैं और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंका आचरण करनेमें लगा रहता हो, वह सत् पुरुष है।'

मोक्षके द्वारपर निवास करनेवाले ये चार द्वारपाल बतलाये गये हैं—शम, विचार, संतोष और साधुसङ्ग । इन चारोंकी भलीभाँति सेवा की जाती है तो ये मोक्षरूपी राज-प्रासादका द्वार खोल देते हैं।

ऐसे सैकड़ों, हजारों वचन इस महान् ग्रन्थमें हैं, जिनमें शास्त्रोक्त आचरण, संयम, नियम आदि साधनोंकी उपादेयता और नितान्त प्रयोजनीयताका उपदेश भरा है।

योगवासिष्ठमें दैवकी बड़ी निन्दा तथा पौरुषकी प्रशंसा की गयी है। एवं निष्कामभावसे सावधानीके साथ शास्त्रानुकूल सत्कर्म करनेपर बहुत जोर दिया गया है। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—

यस्तूदारचमत्कारः सदाचारविहारवान्।
स निर्याति जगन्मोहान्मृगेन्द्रः पञ्जरादिव॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ६।२८)

व्यवहारसहस्राणि यान्युपायान्ति यान्ति च।
यथाशास्त्रं विहर्तव्यं तेषु त्यक्त्वा सुखासुखे॥
यथाशास्त्रमनुच्छिन्नां मर्यादां स्वामनुज्झतः।
उपतिष्ठन्ति सर्वाणि रत्नान्यम्बुनिधाविव॥
स्वार्थप्रापककार्यैकप्रयत्नपरता बुधैः।
प्रोक्ता पौरुषशब्देन सा सिद्धयै शास्त्रयन्त्रिता॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ६।३०-३२)

'जो पुरुष उदार-स्वभाव तथा सत्कर्मके सम्पादनमें कुशल है, सदाचार ही जिसका विहार है, वह जगत्के मोह-पाशसे

सं० यो० व० अं० २—

वैसे ही निकल जाता है, जैसे पिंजरेसे सिंह । संसारमें आने-जानेवाले सहस्रों व्यवहार हैं। उनमें सुख और दुःख-बुद्धिका त्याग करके शास्त्रानुकूल आचरण करना चाहिये । शास्त्रके अनुकूल और कभी उच्छिन्न न होनेवाली अपनी मर्यादाका जो त्याग नहीं करता, उस पुरुषको समस्त अभीष्ट वस्तुएँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे सागरमें गोता लगानेवालेको रत्नोंका समूह । जिसमें अपना मानव-जीवनका प्रधान कार्य—स्वार्थ सधता हो, उस स्वार्थकी प्राप्ति करानेवाले साधनोंमें ही तत्पर हो रहनेको विद्वान्लोग 'पौरुष' कहते हैं'।

ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु प्रकरण ७।३)

'जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोका नाश कर डालते हैं। वे आलसी मनुष्य आप ही अपने शत्रु हैं।'

अशुभेषु समाविष्टं शुभेष्वेवावतारयेत्।
प्रयत्नाच्चित्तमित्येष सर्वशास्त्रार्थसंग्रहः॥
यच्छ्रेयो यदनुच्छं च यदपायविवर्जितम्।
तत्तदाचर यत्नेन पुत्रेति गुरवः स्थिताः॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ७।१२-१३)

'अशुभ कर्मोंमें लगे हुए मनको वहाँसे हटाकर प्रयत्नपूर्वक शुभ कर्मोंमें लगाना चाहिये। यह सब शास्त्रोंके सारका संग्रह है। जो वस्तु कल्याणकारी है, वह तुच्छ नहीं है (वही सबसे श्रेष्ठ है)। तथा जिसका कभी नाश नहीं होता, उसीका यत्नपूर्वक आचरण करना चाहिये—गुरुजन यही उपदेश देते हैं।'

जीवनमुक्तके लक्षण बतलाते हुए महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—

यथास्थितमिदं यस्य व्यवहारवतोऽपि च।
अस्तं गतं स्थितं व्योम जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
नोदैत्यनिष्टतां यातो जाग्रत्येव सुषुप्तवत्।
य आस्ते व्यवहर्तैव जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
नोदेति नास्तमायाति सुखे दुःखे मुखप्रभा।
यथाप्राप्तस्थितेर्यस्य जीवन्मुक्तः स उच्यते॥

१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *

यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधो जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ यस्य नाहंकृतो भावो यस्य बुद्धिर्न लिप्यते । कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्योन्मेषनिमेषार्द्धाद्विदः प्रलयसम्भवौ । पश्येत् त्रिलोक्याः स्वसमः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोन्मुक्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ( उत्पत्ति-प्रकरण ९ । ४-७, ९-१२ )

'यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी दृष्टिमें यह जगत् ज्यों-का-त्यों बना हुआ ही विलीन हो जाता है और आकाशके समान शून्य प्रतीत होने लगता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो व्यवहारमें लगा हुआ ही एकमात्र बोधनिष्ठा-को प्राप्त होकर जाग्रद्-अवस्थामें भी सुषुप्त पुरुषकी भाँति राग-द्वेष, हर्ष-शोकादिसे रहित हो जाता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं। जिसके मुखकी कान्ति सुखमें उदित नहीं होती-जगमगाती नहीं और दुःखमें अस्त-फीकी नहीं हो जाती और जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तोषपूर्वक जो जीवन-निर्वाह करता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो निर्विकार आत्मामें सुषुप्तिकी तरह स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूप निद्राका निवारण हो जानेसे सदा जागता रहता है, पर जो जाग्रत् भी नहीं है, भोग-जगत्में सदा सोया हुआ है अर्थात् भोगबुद्धिसे जो किसी भी पदार्थका उपभोग नहीं करता और जिसका ज्ञान वासनारहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसमें अहङ्कारका भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म करते समय कर्तृत्वके और कर्म न करते समय अकर्तृत्वके अभिमानसे लिप्त नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप परमात्माके किञ्चित् उन्मेष तथा निमेषमें ही तीनों लोकोंकी प्रलय तथा उत्पत्ति देखता है और जिसका सबके प्रति समान आत्मभाव है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। न तो जिससे लोगोंको उद्वेग होता है और न लोगोंसे जिसको उद्वेग होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिसकी संसारके प्रति सत्यता-बुद्धि नहीं रही है, जो अवयवयुक्त दीखनेपर भी वस्तुतः अवयव-

रहित है। जो चित्तयुक्त होकर भी वास्तवमें चित्तसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है।' जीवन्मुक्तकी इस स्वरूप-व्याख्यासे पता लगता है कि यथार्थ ज्ञान ही जीवन्मुक्तका स्वरूप होता है। केवल मौखिक ज्ञान तो प्रदर्शनमात्र तथा ढोंगकी चीज है।

योगवासिष्ठमें योगके साधन तथा योगसिद्धियोंका एवं योगभूमिकाओंका भी महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन है। उनका मर्म बिना अनुभवी योगसिद्ध गुरुके समझमें आना बहुत कठिन है। योगवासिष्ठमें दर्शन तथा योगसम्बन्धी ऐसे-ऐसे शब्द आये हैं, जिनका अर्थ समझना केवल भाषाज्ञानसाध्य नहीं, परन्तु साधन-साध्य है।

योगवासिष्ठमें कर्म और भक्तिका कहीं निषेध नहीं है। कर्मकी तो परमावश्यकता ही बतलायी है। पौरुष कर्ममय ही होता है। अवश्य ही वह कर्म होना चाहिये कामना, आसक्ति तथा अहंकारसे रहित। यद्यपि भक्तिका वैष्णवशास्त्रों-जैसा वर्णन नहीं है, तथापि सदाचार-सत्सङ्गमूलक उपासनाका जगह-जगह प्रतिपादन है। प्रह्लादके प्रसङ्गसे भक्तिकी भी बहुत बातें आयी हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रको पूर्णब्रह्म बतलाकर स्वयं वसिष्ठने नमस्कार किया है। महर्षि भरद्वाजने अपने तथा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीमें भेद बतलाते हुए महर्षि वाल्मीकिजीसे कहा है—

श्रीरामचन्द्रजी तो परम योगी, समस्त विश्वके वन्दनीय, देवताओंके ईश्वर, अजन्मा, अविनाशी, विशुद्ध ज्ञान-स्वभाव, समस्त गुणोंके निधान, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके आधार एव तीनों लोकोंके उत्पादन, संरक्षण और अनुग्रह करनेवाले हैं—

स खलु परमयोगी विश्ववन्द्यः सुरेश्वरो जननमरणहीनः शुद्धबोधस्वभावः। सकलगुणनिधानं सन्निधानं रमाया- स्त्रिजगदुदयरक्षानुग्रहाणामधीशः ॥ नि० प्र० पूर्वार्ध ० १२७ । २)

महर्षि विश्वामित्रने भगवान श्रीरामचन्द्रकी बहुत बड़ी महिमाका गान किया है और वसिष्ठादि सभी उसे सुनकर अत्यन्त आह्लादित हुए हैं।

.. इसी श्रीरामचन्द्रजीका अज्ञानी बनकर ज्ञान प्राप्त करनेकी

**११—योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये**<br>(भक्त श्रीरामशरणदासजी)

* योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये * १५

बात, सो लीलामय भगवान्‌के लिये इसमें कौन-सी दोषकी बात है। जो भगवान् श्रीरामचन्द्र विद्यार्थी बनकर गुरु वसिष्ठसे विद्याध्ययन करते हैं, विश्वामित्रसे अस्त्र-शिक्षा ग्रहण करते हैं, सच्चे पतिके रूपमें सीताके दुःखसे महान् दुखी होते हैं, स्त्रैण तथा अज्ञकी भाँति सीताके लिये वन-वन रोते फिरते और जिस किसीसे सीताका पता पूछते हैं, लक्ष्मण के लिये विलाप-प्रलाप करते हैं, वे भगवान् यदि लोक-संग्रहके लिये अज्ञानी, वैराग्यवान् तथा मुमुक्षु बनकर आदर्श शिष्य लीलामें प्रवृत्त होकर महर्षि वसिष्ठको ज्ञानशास्त्रके प्रतिपादन-में प्रवृत्त करते हैं और उसे सुनकर अपनेको कृतार्थ मानते हैं तो इससे उनकी परात्परता, परब्रह्मरूपता, विशुद्धज्ञानस्वरूपता, ईश्वरता आदिमें कहीं कुछ कमी आ जाती हो-यह तो मानना ही भूल है।

कुछ सज्जनोंका कथन है कि योगवासिष्ठमें बहुत अनुचित रूपसे नारी-निन्दा की गयी है; पर वस्तुतः ऐसी भी बात नहीं है। यों तो भोगदृष्टिसे जो कुछ भी आसक्ति-कामना बढ़ानेवाली चीजें हैं, परमार्थ क्षेत्रमें वे सभी निन्दनीय तथा त्याज्य हैं—नारी, धन, राज्य, इन्द्रियोंके प्रत्येक विषय। पर योगवासिष्ठमें 'नारी-गौरव' की प्रतिष्ठा है। शिखिध्वज-जैसे राज्यत्यागी अरण्यवासी तपोमूर्ति पुरुषको चूडाला नारी ही विशुद्ध ज्ञानका उपदेश करके उन्हें परमपद प्राप्त करवाती है तथा अहंकारशून्य होकर राजकर्मके प्रतिपालनमें प्रवृत्त कराती है। चूडाला-जैसी योगसिद्धा, ज्ञान-विज्ञानसम्पन्ना, ब्रह्मकनिष्ठ ब्रह्मस्वरूपा नारीका जिस ग्रन्थमें विशद वर्णन हो और नारी इतनी उच्च स्तरतक पहुँच सकती है; इसका जिसमें प्रतिपादन हो, उस ग्रन्थको नारी-निन्दक मानना कभी युक्तिसंगत नहीं है।

योगवासिष्ठमें सुन्दर-सुन्दर आख्यानों, इतिहासोंके द्वारा बड़ी ही सुन्दर रीतिसे ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादन हुआ है, जो एक महान् कार्य है। इसमें दोषदृष्टि न करके सभीको अपनी रुचि तथा भावके अनुसार यथासाध्य लाभ उठाना चाहिये।


योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये

( लेखक—भक्त श्रीरामशरणदासजी )

'कल्याण'का विशेषाङ्क योगवासिष्ठाङ्क निकल रहा है, यह बड़े ही आनन्दकी बात है। यह बड़ा ही उपादेय सर्वश्रेष्ठ ज्ञानप्रतिपादक महान् ग्रन्थ है। इसमें आत्मा-परमात्मा, जीव-जगत्, बन्धन-मोक्ष आदि दुरुह विषयोंका बहुत ही सुन्दर स्पष्टीकरण किया गया है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक स्वयं परमात्मा भगवान् श्रीराघवेन्द्र और परम पूज्य ज्ञानस्वरूप महर्षि वसिष्ठके संवादरूपमें यह निस्सन्देह अत्युत्कृष्ट रचना है। इसलिये इसका प्रकाशन बहुत ही आदरणीय है। परंतु बड़े खेदके साथ निवेदन करते हुए मैं यह नम्रताके साथ चेतावनी देता हूँ कि इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये। मैंने देखा है कि ढोंगी लोग संतों-का वेष बनाकर 'योगवासिष्ठ' और 'विचारसागर' लिये गाँव-गाँव घूमते हैं, चेला-चेली बनाते हैं। शास्त्रीय वर्णाश्रमधर्म, सदाचार, शम, दम, ईश्वरभक्ति, भगवत्पूजन, नामजप-कीर्तन, संध्या-अर्चना, श्राद्ध-तर्पण आदिका घोर विरोध करके लोगोंको उच्छृङ्खल बनाते हैं। उनको मनमाना आचरण करनेके लिये प्रेरणा देते हैं और अपना उल्लू सीधा करनेके लिये जगत्‌को तथा जागतिक व्यवहारोंको मिथ्या बताकर 'अहं ब्रह्मास्मि' की रट लगाकर 'एक ब्रह्म' बने हुए ये अनधिकारी कलियुगी पाखण्डीलोग खुले-आम शास्त्राचारके सर्वथा विरुद्ध आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, विलास, व्यभिचार, अभक्ष्य-भक्षणका प्रचार करते हैं और जनताको ब्रह्मज्ञानके नामपर नरकानलमें झोंकते हैं। ऐसे लोगोंके द्वारा इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये। यही मेरा नम्र निवेदन है।

**१२—श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन [ कविता ]**<br>(पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री)

१६ * अविच्छिन्नश्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *


श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन

( रचयिता—पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री )

तप-तेज-पुंज जगदाभिराम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

चारों वेदोंका रस वरिष्ठ।
वेदान्त विषय जो था गरिष्ठ ॥
कर सरल कथाओंमें प्रविष्ट।
कर दिया उसे लघुतम सुमिष्ट ॥
यह देख तुम्हारा कलित काम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

यह युक्ति दिखाकर तुम न्यारी।
बन गये विश्वके हितकारी ॥
अतएव ज्ञानके अधिकारी।
हैं सभी तुम्हारे आभारी ॥
गा रहे तुम्हारे गुणग्राम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

जिस समय सूर्यवंशी नरेश।
संचालित करते थे स्वदेश ॥
उस समय उन्हें दे सदुपदेश।
हरते थे तुम मानसिक क्लेश ॥
पाते थे वे जगसे विराम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

श्रीरामचन्द्रको पात्र जान।
जो दिया उन्हें था महाज्ञान ॥
मुनि वाल्मीकिने अमृत मान।
वह भर सुछन्दोंमें निदान ॥
रच ग्रन्थ योगवासिष्ठ नाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

यह ग्रन्थ मिटा विष-विषय चाव।
अध्यात्म ओर करता झुकाव ॥
हर जीव ब्रह्मका भेदभाव।
बन रहा भवाम्बुधि हेतु नाव ॥
यह श्रेय तुम्हींको है ललाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

हैं इसमें वर्णित वे सुयोग।
हरते हैं जो भवजनित रोग ॥
जिनका समयोचित कर प्रयोग।
पाते हैं शुभगति साधु लोग ॥
खण्डित कर माया मोह दाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

उपदेश तुम्हारा है विचित्र।
जो करता है हियको पवित्र ॥
जिससे जन बनकर सच्चरित्र।
हो जाते हैं ब्रह्मज्ञ 'मित्र' ॥
मिलता है उनको परम धाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥

**१—सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्‌के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना**

श्रीपरमात्मने नमः

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वैराग्य-प्रकरण

सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्‌के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना

यतः सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च।
यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नमः॥
सृष्टिके आरम्भमें सम्पूर्ण भूत जिनसे प्रकट होकर प्रतीतिके विषय होते हैं, स्थितिकालमें जिनमें ही स्थित होते हैं और प्रलयकाल आनेपर जिनमें ही लीन हो जाते हैं, उन सत्यस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।

ज्ञाता ज्ञानं तथा ज्ञेयं द्रष्टा दर्शनदृश्यभूः।
कर्ता हेतुः क्रिया यस्मात् तस्मै ज्ञप्त्यात्मने नमः॥
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तथा कर्ता, कारण और क्रिया—इन सबका जिनसे ही आविर्भाव होता है, उन ज्ञानस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।

स्फुरन्ति सीकरा यस्मादानन्द्याम्बरेऽवनौ।
सर्वेषां जीवनं तस्मै ब्रह्मानन्दात्मने नमः॥
जिनसे स्वर्ग और भूतल आदि सभी लोकोंमें आनन्द-रूपी जलके कण स्फुरित होते हैं—प्राणियोंके अनुभवमें आते हैं तथा जो समस्त जीवोंके जीवनाधार हैं, उन पूर्ण चिन्मय आनन्दके महासागररूप परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है!

पूर्वकालमें सुतीक्ष्ण नामसे प्रसिद्ध कोई ब्राह्मण थे, जिनके मनमें संशय छा गया था; अतः उन्होंने महर्षि अगस्तिके आश्रममें जाकर उन महामुनिसे आदरपूर्वक पूछा—'भगवन्! आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं। आपको सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तका सुनिश्चित ज्ञान है। मेरे हृदयमें एक महान् संदेह है, आप कृपापूर्वक इसका समाधान कीजिये। मोक्षका साधन कर्म है या ज्ञान है अथवा दोनों ही हैं? इन तीनों पक्षोंमेंसे किसी एकका निश्चय करके जो वास्तवमें मोक्षका कारण हो, उसका प्रतिपादन कीजिये।'

अगस्तिने कहा—ब्रह्मन्! जैसे दोनों ही पक्षोंसे पक्षियोंका आकाशमें उड़ना सम्भव होता है, उसी प्रकार ज्ञान और निष्काम कर्म दोनोंसे ही परमपदकी प्राप्ति होती है। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जिसका


१. अगस्ति और अगस्त्य एक ही महर्षिके नाम हैं।

१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ। पहलेकी बात है, कारुण्य नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो अग्निवेश्यके पुत्र थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था तथा वे वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् थे। गुरुके यहाँसे विद्या पढकर अपने घर लौटनेके बाद वे संध्या-वन्दन आदि कोई भी कर्म न करते हुए चुपचाप बैठे रहने लगे। उनके मनमें संशय भरा हुआ था। पिता अग्निवेश्यने देखा कि मेरा पुत्र शास्त्रोक्त कर्मोंका परित्याग करके निन्दनीय हो गया है, तब वे उसके हितके लिये इस प्रकार बोले।

अग्निवेश्यने कहा—'बेटा ! यह क्या बात है ! तुम अपने कर्त्तव्य-कर्मोंका पालन क्यों नहीं करते ? बताओ तो सही। यदि सत्कर्मोंके अनुष्ठानमें नहीं लगोगे तो तुम्हें परम सिद्धि कैसे प्राप्त होगी ? तुम जो इस कर्त्तव्य-कर्मसे निवृत्त हो रहे हो, इसमें क्या कारण है ? यह मुझसे कहो।

कारुण्य बोले—पिताजी ! आजीवन अग्निहोत्र और प्रतिदिन संध्योपासना करे—इस प्रवृत्तिरूप धर्मका श्रुति और स्मृतिने विधान अथवा प्रतिपादन किया है। साथ ही एक दूसरी श्रुति भी है, जिसके अनुसार न धनसे, न कर्मसे और न संतानके उत्पादनसे ही मोक्ष प्राप्त होता है। मुख्य-मुख्य यतियोंने एकमात्र त्यागसे ही अमृतत्वरूप मोक्ष सुखका अनुभव किया है १। पूज्य पिताजी ! इन दो प्रकारकी श्रुतियोंमेंसे मुझे किसके आदेशका पालन करना चाहिये ?' इस संशयमें पड़कर मैं कर्मकी ओरसे उदासीन हो गया हूँ।

अगस्ति कहते हैं—तात सुतीक्ष्ण ! पितासे यों कहकर वे ब्राह्मण कारुण्य चुप हो गये। पुत्रको इस प्रकार कर्मसे उदासीन हुआ देख पिताने पुनः उससे कहा !

अग्निवेश्य बोले—बेटा ! मैं तुमसे एक कथा कहता हूँ, उसे सुनो और उसके सम्पूर्ण तात्पर्यका अपने हृदयमें निश्चय कर लेनेके पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो।

सुरुचि नामसे प्रसिद्ध कोई देवलोककी स्त्री थी, जो अप्सराओंमें श्रेष्ठ समझी जाती थी। एक दिन वह मयूरोंके झुंडसे घिरे हुए हिमालयके एक शिखरपर बैठी थी। उसी समय उसने अन्तरिक्षमें इन्द्रके एक दूतको कहीं जाते देखा। उसे देखकर अप्सराओंमें श्रेष्ठ महाभागा सुरुचिने इस प्रकार पूछा—'महाभाग देवदूत ! आप कहाँसे आ रहे हैं और इस समय कहाँ जायेंगे ? यह सब कृपा करके मुझे बताइये।'

देवदूतने कहा—भद्रे ! सुनो; जो वृत्तान्त जैसे घटित हुआ है, वह सब मैं तुम्हें विस्तारसे बता रहा हूँ। सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरी ! धर्मात्मा राजा अरिष्टनेमि अपने पुत्रको राज्य देकर स्वयं वीतराग हो तपस्याके लिये वनमें चले गये और अब गन्धमादन पर्वतपर वे तपस्या


१. न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। ( कैवल्य० २ तथा महानारायणोपनिषद् १० । ५ )

वैराग्य-प्रकरण ] * भगवान्‌के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना *- १६


कर रहे हैं। वहाँ वनमें ज्यों ही उन्होंने दुस्तर तपस्या आरम्भ की, त्यों ही देवराज इन्द्रने मुझे आदेश दिया—'दूत ! तुम यह विमान लेकर शीघ्र वहाँ जाओ। इस विमानमें अप्सराओंके समुदायको भी साथ ले लो। नाना प्रकारके वाद्य इसकी शोभा बढ़ाते रहें। गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और किंनर आदिसे भी यह सुशोभित होना चाहिये। इसमें ताल, वेणु और मृदङ्ग आदि भी रख लो। इस प्रकार भाँति भाँतिके वृक्षोंसे भरे हुए सुन्दर गन्धमादन पर्वतपर पहुँचकर तुम राजा अरिष्टनेमिको इस विमानपर चढ़ा लो और उन्हें स्वर्गका सुख भोगनेके लिये अमरावती नगरीमें ले जाओ।'

देवराज इन्द्रकी यह आज्ञा पाकर मैं सामग्रियोंसे संयुक्त विमान ले उस पर्वतपर गया। वहाँ पहुँचकर राजा अरिष्टनेमिके आश्रमपर गया; फिर मैंने देवराज इन्द्रकी सारी आज्ञा राजासे कह सुनायी। शुभे ! वे मेरी बात सुनकर संदेहमें पड़ गये और इस प्रकार बोले—'देवदूत ! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, आप मेरे इस प्रश्नका उत्तर दें। स्वर्गमें कौन-कौन-से गुण हैं और कौन-कौन-से दोष ? आप मेरे सामने उनका सुस्पष्ट वर्णन कीजिये। स्वर्गलोकमें रहनेके गुण-दोषको जाननेके पश्चात् मेरी जैसी रुचि होगी, वैसा करूँगा।'

मैंने कहा—'राजन् ! स्वर्गलोकमें जीव अपने पुण्यकी सामग्रीके अनुसार उत्तम सुखका उपभोग करता है। उत्तम पुण्यसे उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होती है, मध्यम पुण्यसे मध्यम स्वर्ग मिलता है और इनकी अपेक्षा निम्न श्रेणीके पुण्यमे उसके अनुरूप स्वर्ग सुलभ होता है। इसके विपरीत कुछ नहीं होता। स्वर्गमें भी दूसरोंको अपनेसे ऊँची स्थितिमें देखकर लोगोंके लिये उनका उत्कर्ष असह्य हो उठता है। जो लोग समान स्थितिमें होते हैं, वे भी अपने बराबरवालोंके साथ स्पर्धा (लागडाँट) रखते हैं तथा जो स्वर्गवासी अपनेसे हीन स्थितिमें होते हैं, उनको अपनी अपेक्षा अल्पसुखी देखकर अधिक सुखवालोंको संतोष होता है। इस प्रकार असहिष्णुता, स्पर्धा और संतोषका अनुभव करते हुए पुण्यात्मा पुरुष तभीतक स्वर्गमें रहते हैं, जबतक उनके पुण्योंका भोग समाप्त नहीं हो जाता। पुण्योंका क्षय हो जानेपर वे जीव पुनः इस मर्त्यलोकमें प्रवेश करते हैं और पार्थिव-शरीर धारण करते रहते हैं। राजन् ! स्वर्गमें इसी तरहके गुण और दोष विद्यमान हैं।'

भद्रे ! मेरी यह बात सुनकर राजाने इस प्रकार उत्तर दिया—'देवदूत ! जहाँ ऐसा फल प्राप्त होता है, उस स्वर्गलोकमें मैं नहीं जाना चाहता। आप इस विमानको लेकर जैसे आये थे, वैसे ही देवराज इन्द्रके पास चले जाइये। आपको नमस्कार है।'

भद्रे ! जब राजाने मुझसे ऐसी बात कही, तब मैं इन्द्रके समक्ष यह वृत्तान्त निवेदन करनेके लिये लौट गया। वहाँ जब मैंने सब बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं, तब देवराज इन्द्रको महान् आश्चर्य हुआ और वे स्निग्ध एवं मधुर वाणीमें मुझसे पुनः बोले।

इन्द्रने कहा—दूत ! तुम फिर वहाँ जाओ और उस विरक्त राजाको आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये तत्त्वज्ञ महर्षि वाल्मीकिके आश्रममें ले जाओ। वहाँ महर्षि वाल्मीकिसे मेरा यह संदेश कह देना—'महामुने ! इन विनयशील, वीतराग तथा स्वर्गकी भी इच्छा न रखनेवाले नरेशको आप तत्त्वज्ञानका उपदेश दीजिये। ये जन्म-मरणरूप संसार-दुःखसे पीड़ित हैं; अतः आपके दिये हुए तत्त्व-ज्ञानके उपदेशसे इन्हें मोक्ष प्राप्त होगा।'

यों कहकर देवराजने मुझे राजा अरिष्टनेमिके पास भेजा। तब मैंने पुन वहाँ जाकर राजाको वाल्मीकिजीके पास पहुँचाया, उनसे देवराज इन्द्रका संदेश कहा तथा राजाने उन महर्षिसे मोक्षका साधन पूछा। तदनन्तर वाल्मीकिजीने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कुशलप्रश्नोंकी बात आरम्भ करते हुए राजासे उनके आरोग्यका समाचार पूछा।

२० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

राजाने कहा—भगवन् ! आपको धर्मके तत्त्वका ज्ञान है। जाननेयोग्य जितनी भी बातें हैं, वे सब आपको ज्ञात हैं। विद्वानोंमें श्रेष्ठ महर्षे ! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। यही मेरी कुशल है। भगवन् ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। आप बिना किसी विघ्न-बाधाके मेरी शङ्काका समाधान करें। संसार-बन्धनके दुःखसे मुझे जो पीड़ा हो रही है, उससे किस प्रकार मेरा छुटकारा होगा ? यह बताइये।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—राजन् ! सुनो; मैं तुमसे अखण्ड रामायणकी कथा कहूँगा। उसे सुनकर यत्नपूर्वक हृदयमें धारण कर लेनेपर तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे। राजेन्द्र ! वह रामायण महर्षि वसिष्ठ और श्रीरामके संवादरूपमें वर्णित है। वह मोक्षप्राप्तिके उपायकी मङ्गलमयी कथा है। मैंने तुम्हारे स्वभावको समझ लिया है; अतः तुम्हें अधिकारी मानकर मैं तुमसे वह कथा कहूँगा। विद्वान् नरेश ! सुनो।

राजाने पूछा—तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महामुने ! श्रीराम कौन हैं ? उनका स्वरूप कैसा है ? वे किसके वंशज थे ? वे बद्ध थे या मुक्त ? पहले आप मुझे इन्हीं बातों-का निश्चिन ज्ञान प्रदान कीजिये ।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—स्वयं भगवान् श्रीहरि ही शाप-के पालनके बहाने राजा श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। वे प्रभु सर्वज्ञ होनेपर भी ( अपने भक्त महर्षियोंकी वाणीको सत्य करनेके लिये ही ) आरोपित अथवा स्वेच्छासे गृहीत अज्ञानसे युक्त हो साधारण मनुष्योंकी भाँति अल्पज्ञ-से हो गये।

राजाने पूछा—महर्षे ! श्रीराम तो सच्चिदानन्द-स्वरूप चैतन्यघनविग्रह थे । उन्हें शाप प्राप्त होनेका क्या कारण था ? यह बताइये । साथ ही यह भी कहिये कि उन्हें शाप देनेवाला कौन था ?

श्रीवाल्मीकिजीने कहा – राजन् ! ( ब्रह्माजीके मानस पुत्र ) सनत्कुमार, जो सर्वथा निष्काम थे, ब्रह्मलोकमें निवास करते थे। एक दिन त्रिलोकीनाथ सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोकसे वहाँ पधारे। उस समय ब्रह्माजीने वहाँ उनका पूजन किया। सत्यलोकमें निवास करनेवाले दूसरे-दूसरे महात्माओंने भी उनका स्वागत-सत्कार किया। केवल सनत्कुमारने उनके आदर-सत्कारमें कोई भाग नहीं लिया—वे चुपचाप बैठे ही रह गये। तब उनकी ओर देखकर सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरिने कहा—'सनत्कुमार ! तुम अपनेको निष्काम समझकर अहंकारी हो गये हो, इसीलिये जडवत् स्तम्भ बने बैठे हो। इस गर्वयुक्त चेष्टाके कारण तुम शाप या दण्ड पानेके योग्य हो, अतः शरजन्मा कुमारके नामसे विख्यात हो दूसरा शरीर धारण करो।' यह सुनकर सनत्कुमारने भी भगवान् विष्णुको शाप दिया—'देवेश्वर ! आप भी अपनी सर्वज्ञताको कुछ कालके लिये छोड़कर अज्ञानी जीवके समान हो जायेंगे।' एक समय अपनी पत्नीको श्रीहरिके चक्रसे मारी गयी देख महर्षि भृगुका क्रोध बहुत बढ़ गया। वे उन्हें शाप देते हुए बोले—'विष्णो !

**२—इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना**

वैराग्य-प्रकरण ] * इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा * २१


आपको भी कुछ कालके लिये अपनी पत्नीसे वियोगका कष्ट सहना पड़ेगा।' इस प्रकार सनत्कुमार और भृगुके शाप देनेपर (उनकी वाणी सत्य करनेके लिये) भगवान् विष्णु उस शापसे मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए। राजन्! भगवान् विष्णुको शापका बहाना क्यों लेना पड़ा, इसका सब कारण मैंने तुम्हें बता दिया, अब तुम्हारे प्रश्नके अनुसार अन्य सारी बातें भी बता रहा हूँ। तुम सावधान होकर सुनो। ( सर्ग १ )


इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना

दिवि भूमौ तथाऽऽकाशे बहिरन्तश्च मे विभुः ।
यो विभात्यवभासात्मा तस्मै सर्वात्मने नमः ॥

जो प्रकाश (ज्ञान) स्वरूप सर्वव्यापी परमात्मा स्वर्गमें, भूतलमें, आकाशमें तथा हमारे अंदर और बाहर—सर्वत्र प्रकाशित हो रहे हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं— राजन् ! 'मैं संसाररूपी बन्धनमें बँधा हुआ हूँ, किंतु इससे मुक्त हो सकता हूँ—ऐसा जिसका निश्चय है तथा जो न तो अत्यन्त अज्ञानी है और न तत्त्वज्ञानी ही है, वही इस शास्त्रको सुनने अथवा पढ़नेका अधिकारी है। जो पहले कथारूपी उपायसे युक्त रामायणके बाल, अयोध्या आदि सभी काण्डोंका विचार (परिशीलन) करके मोक्षके उपायभूत इन वैराग्य आदि छः प्रकरणोंका विचार (अनुशीलन) करता है, वह विद्वान् पुरुष फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता (वह यहाँके जन्म आदि दुःखोंसे सदाके लिये छुटकारा पा जाता है)। शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश ! यह रामायण पूर्व और उत्तर—दो खण्डोंसे युक्त है। इसमें राग-द्वेष आदि दोषोंको दूर करनेके लिये रामकथारूपी प्रबल उपाय बताये गये हैं। पहले इन बाल आदि सात काण्डोंकी रचना करके मैंने एकाग्रचित्त हो अपने बुद्धिमान् एवं विनयशील शिष्य भरद्वाजको इसका ज्ञान प्रदान किया; ठीक उसी तरह, जैसे समुद्र मणि या रत्नकी इच्छा रखनेवाले याचकको मणि प्रदान करता है। बुद्धिमान् भरद्वाजने मुझसे कथारूपी उपायवाले इन सात काण्डोंका अध्ययन करनेके पश्चात् मेरुपर्वतके किसी गहन वनमें ब्रह्माजीके सामने इनका वर्णन किया। इससे महान् आशयवाले लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा भरद्वाजके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उनसे बोले—'बेटा ! तुम मुझसे कोई वर माँग लो।'

**५—मेरुपर्वतपर भरद्वाजकी लोक-पितामह ब्रह्मासे वर-याचना** ... **२१**

२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भरद्वाजने कहा—भगवन् ! भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी पितामह ! जिस उपायसे यह समस्त मानव-समुदाय सम्पूर्ण दुःखसे छुटकारा पा जाय, वह मुझे बताइये । आज मुझे यही वर अच्छा लगता है ।

श्रीब्रह्माजीने कहा—वत्स ! तुम इस विषयमें शीघ्र ही प्रयत्नपूर्वक अपने गुरु वाल्मीकिजीसे प्रार्थना करो । उन्होंने जिस निर्दोष रामायणकी रचना आरम्भ की है, उसका श्रवण कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण मोहसे पार हो जायेंगे ।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाजसे यों कहकर सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा भगवान् ब्रह्मा उनके साथ ही मेरे आश्रमपर आये । उस समय मैंने शीघ्र ही अर्घ्य, पाद्य आदिके द्वारा उन भगवान् ब्रह्माजीका पूजन किया । तत्पश्चात् समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले ब्रह्माजीने मुझसे कहा—'श्रेष्ठ महर्षे ! श्रीरामचन्द्रजीके स्वभाव एवं स्वरूपका वर्णन करनेवाले इस निर्दोष रामायणका आरम्भ करके जबतक इसकी समाप्ति न हो जाय, तबतक कितना ही उद्वेग क्यों न हो, तुम इसका परित्याग न करना । इस ग्रन्थके अनुशीलनसे यह जगत् इस संसाररूपी क्लेशसे उसी प्रकार शीघ्र पार हो जायगा, जैसे जहाजके द्वारा लोग अविलम्ब समुद्रसे पार हो जाते हैं। तुम लोकहितके लिये इस रामायण नामक शास्त्रकी रचना करो । इसी बातको कहनेके लिये मैं स्वयं यहाँतक आया हूँ ।' तत्पश्चात् वे मेरे उस पवित्र आश्रमसे उसी क्षण अदृश्य हो गये । तब भरद्वाजने कहा—'भगवन् ! महामना श्रीरामचन्द्रजी, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, यशस्विनी सीतादेवी तथा श्रीरामचन्द्रजीका अनुसरण करनेवाले परम बुद्धिमान् मन्त्रिपुत्र—इन सबने इस संसाररूपी संकटमें पड़कर कैसा व्यवहार किया था, यह बात मुझे बताइये । इसे सुनकर अन्य लोगोंके साथ मैं भी वैसा ही बर्ताव करूँगा ।'

राजेन्द्र ! जब भरद्वाजने आदरपूर्वक मुझसे पूर्वोक्त विषयका प्रतिपादन करनेके लिये अनुरोध किया, तब मैं भगवान् ब्रह्माजीकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उक्त विषयके वर्णनमें प्रवृत्त हुआ और बोला—'वत्स भरद्वाज ! सुनो; तुमने जैसा पूछा है, उसके अनुसार तुम्हें सब कुछ बताता हूँ । मेरे उपदेशको सुननेसे तुम अपना सारा मोह दूर कर सकोगे । बुद्धिमान् भरद्वाज ! तुम वैसा ही व्यवहार करो, जैसा कि आनन्दस्वरूप कमलनयन भगवान् श्रीरामने समस्त संसारमें अनासक्तभावसे रहकर किया था ।'

महामना भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, सीता, राजा दशरथ, श्रीरामसखा कृताङ्ग और अविरोध, पुरोहित वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्यान्य आठ मन्त्री—ये सभी ज्ञानमें पारंगत थे । धृष्टि, जयन्त, भास, सत्यवादी विजय, विभीषण, सुपंपण, हनुमान् और इन्द्रजित्—ये श्रीरामके आठ मन्त्री बताये गये हैं । ये सब-के-सब समदर्शी थे । इनका चित्त विषयोंमें आसक्त नहीं था । ये सभी जीवन्मुक्त महात्मा थे और प्रारब्धवश जो कुछ प्राप्त होता, उसीमें संतुष्ट रहकर तदनुकूल व्यवहार करते थे । बेटा ! इन लोगोंने जिस प्रकार होम, दान और आदान-प्रदान किया था, इन्होंने जगत्में जिस प्रकार निवास किया था और जिस प्रकार स्मरण-चिन्तन अथवा श्रौत-स्मार्त कर्मोंका पालन किया था, उसी प्रकार यदि तुम भी बर्ताव करते हो तो संसाररूपी संकटसे छूटे हुए ही हो । उदार एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न पुरुष अपार संसार-समुद्रमें गिरनेपर भी यदि उपर्युक्त उत्कृष्ट साधनको अपना ले तो उसे न तो शोक प्राप्त होता है और न वह दीनता अथवा दुःखमें ही पड़ता है। सब प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त हो वह परमानन्द-सुधाका पान करके सदाके लिये परम तृप्त हो जाता है।

(सर्ग २)

**३—जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्‌के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन**

वैराग्य-प्रकरण ] * जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थयात्राका वर्णन * २३


जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्‌के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन

भरद्वाज बोले—ब्रह्मन् ! आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथासे आरम्भ करके क्रमशः जीवन्मुक्तकी स्थितिका मुझसे वर्णन कीजिये जिससे मैं सदाके लिये परम सुखी हो जाऊँ ।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—साधु पुरुष भरद्वाज ! जैसे रूपरहित आकाशमें नील-पीत आदि वर्णोंका भ्रम होता है उसी प्रकार निर्गुण निराकार ब्रह्ममें अज्ञानवश जगत्‌की सत्ताका भ्रम होता है । यह जो जगत्सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हो गया है, इसे इस तरह भुला दिया जाय कि फिर कभी इसका स्मरण ही न हो—इसीको मैं उत्तम ज्ञान मानता हूँ । इस दृश्य-प्रपञ्चका अत्यन्त अभाव है—यह बिना हुए ही भासित हो रहा है, जबतक ऐसा बोध नहीं होता, तबतक कोई कभी भी उस उत्कृष्ट आत्मज्ञानका अनुभव नहीं कर सकता; इसलिये आत्मज्ञानका अन्वेषण—उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये । इस (योग-वासिष्ठरूप) शास्त्रका ज्ञान होनेपर इसी जीवनमें उस आत्मतत्त्वका बोध हो जाय—यह सर्वथा सम्भव ही है—वह होकर ही रहेगा । इसी उद्देश्यसे इस शास्त्रका विस्तार (प्रचार-प्रसार) किया जाता है । यदि तुम (श्रद्धा-भक्तिके साथ) इस शास्त्रका श्रवण करोगे तो निश्चय ही तुम्हें उस आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो जायगा; अन्यथा उसकी प्राप्ति असम्भव है ।

निष्पाप भरद्वाज ! यह जगत्रूपी भ्रम यद्यपि प्रत्यक्ष दिखायी देता है, तो भी इस शास्त्रके विचारसे अनायास ही ऐसा अनुभव हो जाता है कि 'यह है ही नहीं'—ठीक उसी तरह जैसे आकाशमें नील आदि वर्ण प्रत्यक्ष दीखनेपर भी विचार करनेसे बिना परिश्रमके ही यह समझमें आ जाता है कि इसका अस्तित्व नहीं है । यह दृश्य-जगत् वास्तवमें है ही नहीं, ऐसा बोध होनेपर जब मनसे दृश्य-प्रपञ्चका मार्जन (निवारण या अभाव) हो जाय, तब परमनिर्वाणरूप शान्तिका स्वतः अनुभव होने लगता है । ब्रह्मन् ! सम्पूर्णरूपसे वासनाओंका जो परित्याग (अत्यन्त अभाव) है, वही उत्तम मोक्ष कहलाता है । उसे अविद्यारूपी मलसे रहित ज्ञानी ही प्राप्त कर सकते हैं । विप्रवर ! जैसे शीतके नष्ट होनेपर हिमकण तुरंत गल जाते हैं, उसी प्रकार वासनाओंके क्षीण हो जानेपर (वासना-पुञ्जरूप) चित्त भी शीघ्र ही गल जाता है (उसका अभाव-सा हो जाता है) ।

वासना दो प्रकारकी बतायी गयी है—एक शुद्ध वासना और दूसरी मलिन वासना । मलिन वासना जन्मकी हेतुभूत है—उसके द्वारा जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ता है और शुद्ध वासना जन्मका नाश करनेवाली (अर्थात् मोक्षकी साधिका) है । विद्वानोंने मलिन वासनाको पुनर्जन्मकी प्राप्ति करानेवाली बताया है । अज्ञान ही उसकी घनीभूत आकृति है तथा वह बढ़े हुए अहङ्कारसे सुशोभित होती है । जो भुने हुए बीजके समान पुनर्जन्मरूपी अङ्कुरको उत्पन्न करनेकी शक्तिको त्यागकर केवल शरीरधारण मात्रके लिये स्थित रहती है, वह वासना 'शुद्धा' कही गयी है । जो लोग शुद्ध वासनासे युक्त हैं, वे फिर जन्मरूप अनर्थके भाजन नहीं होते । जानने योग्य परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले वे परम बुद्धिमान् पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहलाते हैं ।

महामते भरद्वाज ! अब तुम श्रीरामचन्द्रजीकी जीवन-चर्यासे सम्बन्ध रखनेवाली इस मङ्गलकारिणी कथाका क्रमशः श्रवण करो । मैं उसका वर्णन करूँगा, उसीके द्वारा तुम सदाके लिये सम्पूर्ण तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लोगे । वत्स ! जिन्हें कहींसे भी कोई भय नहीं है, वे कमल-नयन भगवान् श्रीराम जब अध्ययनके पश्चात् विद्यालयसे निकलकर घरको लौटे, तब भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हुए उन्होंने राजभवनमें कुछ दिन व्यतीत किये । तदनन्तर

२४ * अविच्छिन्नचिदारामैः पुमांस्तीर्ण नेतरेत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कुछ समय बीतनेपर, जब कि राजा दशरथ भूमण्डलके पालनमें लगे थे और प्रजावर्गके लोग रोग-शोकसे रहित हो बड़े सुखसे दिन बिता रहे थे, एक दिन अनन्त कल्याणमय गुणोंसे सुशोभित होनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तीर्थों तथा पुण्यमय आश्रमोंके दर्शनकी अत्यन्त उत्कण्ठा जाग उठी। तब श्रीरामने पिताके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।

श्रीराम बोले—पिताजी ! मेरे स्वामी महाराज ! मेरे मनमें तीर्थों, देवमन्दिरों, वनों तथा आश्रमोंका दर्शन करनेके लिये बड़ी उत्कंठा हो रही है। आपके समक्ष मेरी यह पहली याचना है, आप इसे सफल करने योग्य हैं। नाथ ! संसारमें ऐसा कोई याचक नहीं है, जिसे अभीष्ट वस्तु देकर आपने उसका आदर न किया हो।

श्रीराम पहली बार प्रार्थी होकर राजाके समक्ष उपस्थित हुए थे। उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर राजा दशरथने वसिष्ठजीके साथ विचार करके उन्हें तीर्थ-दर्शनके लिये आज्ञा दे दी। उस समय शुभ नक्षत्र और शुभ दिनमें ब्राह्मणोंने आकर उनके लिये स्वस्तिवाचन किया। उनके शरीरको माङ्गलिक वेष-भूषासे अलंकृत किया गया। माताओंने उन्हें हृदयसे लगा-लगाकर आशीर्वाद दिये और आभूषण पहनाये। फिर वे रघुनाथजी तीर्थ-यात्राके लिये उद्यत हो लक्ष्मण और शत्रुघ्न—इन दो भाइयों, वसिष्ठजीके भेजे हुए शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों तथा अपने ऊपर स्नेह रखनेवाले कुछ इने-गिने राजकुमारोंके साथ अपने उस राजभवनसे बाहर निकले। श्रीरामचन्द्रजी दान-मान आदिसे ब्राह्मणोंको अपने अनुकूल बनाते, सब ओरसे प्रजाओंके आशीर्वाद सुनते और सम्पूर्ण दिशाओंके दृश्योंपर दृष्टिपात करते वन्य-प्रदेशोंमें भ्रमण करने लगे। उन्होंने अपने निवास-स्थान उस कोसल जनपदसे आरम्भ करके स्नान, दान, तप और ध्यानपूर्वक क्रमशः समस्त तीर्थ-स्थानोंका दर्शन किया। नदियोंके पवित्र तट, पुण्य वन, पावन आश्रम, जंगल, जनपदोंकी सीमाओंमें स्थित समुद्र और पर्वतोंके तट, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल आभावाली गङ्गा, नील कमलकी-सी कान्तिवाली निर्मल कलिन्दनन्दिनी यमुना, सरस्वती, शतद्रू (सतलज), चन्द्रभागा (चिनाब), इरावती (रावी), वेणी, कृष्णवेणी, निर्विन्ध्या, सरयू, चर्मण्वती (चम्बल), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), बाहुदा, प्रयाग, नैमिषारण्य, धर्मारण्य, गया, वाराणसी (काशीपुरी), श्रीशैल, केदारनाथ, पुष्कर, क्रमप्राप्त मानस सरोवर, उत्तरमानस, वड़वामुख, अन्य तीर्थसमुदाय, अग्नितीर्थ, महातीर्थ, इन्द्रद्युम्न सरोवर आदि पुण्यतीर्थ, सरोवर, सरिताएँ, नद, तालाब या कुण्ड—इन सबका उन्होंने आदरपूर्वक दर्शन किया।


१. वेणी नदी कृष्णामें मिलनेसे पहले केवल वेणी कहलाती है, कृष्णामें संगम होनेके पश्चात् उसका नाम कृष्णवेणी हो जाता है।
२. कुछ लोगोंकी मान्यताके अनुसार बाहुदा सुप्रसिद्ध राप्ती नदीकी एक सहायक नदी है।